|| मीरा चरित ||

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

|| मीरा चरित ||
|| मीरा चरित || 

क्रमशः से आगे ............

🌿 दिव्य द्वारिका के दर्शन के पश्चात मीरा के लिए स्वभाविक था कि उसी रस दर्शन की फिर से अनुभूति की लालसा रखना ,उसकी फिर से प्रतीक्षा करना । 

जैसे वृन्दावन में प्रायः वह नित्य ही रात्रि में दिव्य वृन्दावन के दर्शन करती थी , यहाँ भी प्रत्येक सूर्य अस्त के समय सागर तट पर खड़े मीरा को फिर से दिव्य द्वारिका के उस सुगन्धित वातावरण में प्रवेश पाने की प्रतीक्षा होती -

‎पर सब कुछ तो ऐसा नहीं होता जैसा हम चाहते है। 

जहाँ इधर श्री द्वारिका धाम में मीराबाई पल - प्रति-पल विरह में उस क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी ,जब वह अपने जीवन धन प्राणाराध्य श्री द्वारिकाधीश का पुनः सानिध्य प्राप्त कर पायेगी ..........!

तो उधर व्यवहारिक जगत में मेड़ता और चित्तौड़ पर संकट के घनघोर बादल मँडरा रहे थे ।

🌿 मीराबाई के चित्तौड़ - परित्याग के बाद एक - न - एक संकट के बादल सामने आते ही रहे ।

बादशाह अकबर ने योजनाबद्ध रीति से चित्तौड़ पर हमला बोल दिया । 

अकबर का सैन्य बल अधिक होने से 1568 में चित्तौड किले पर मुग़ल आधिपत्य स्थापित हो गया ।

मेड़ता के राव जयमल चित्तौड किले की रक्षा हेतु लड़ते हुए अद्भुत वीरगति को प्राप्त हुए । 

किले पर से भगवा ध्वज के उतरते ही राजपूती गौरव धूलि - धूसरित हो गया । 

सुख - शांति - समृद्धि को दुःख-दरिद्रता-दीनता ने डस लिया ।किसी साधू के कहने पर जन - मानस में यह विचार तेजी से बुदबुदाने लगा कि भक्तिमति मेड़तणी कुँवराणीसा मीराबाई को सताये जाने का ही दुष्परिणाम हैं। 

अब तो यदि महिमामय मीराबाई वापिस मेवाड़ पधारे तो ही रूठे हुये देव संतुष्ट हों !!!

🌿 चित्तौड़ के राजपुरोहित जी के साथ राठौड़ों के पुरोहित , मेवाड़ के प्रथम श्रेणी के दो उमराव , जयमल जी के दोनों पुत्र हरिदास और रामदास और कई राठौड राणावत राजपूत सरदार एकत्रित हो एक दिन मीरा के निवास स्थान का पता पूछते हुए द्वारिका जी पँहुचे ।

🌿 मेवाड़ के राजपुरोहित जी ने मीराबाई को चित्तौड पर आई विपदा का चित्रण करते हुए बताया ," आप के वहाँ से आने के पश्चात धीरेधीरे राज्य में अकाल पड़ गया ।

प्रजा दीन हीन एवं राजकोष रिक्त है ।

बड़े - बूढ़ों को कहना है कि राज्य की यह अनर्थ कुँवरानीसा मेड़तणीजी को सताने और उनके चित्तौड़ परित्याग के कारण बिन न्यौता आया है।

इस लिए मैं आपसे हाथ जोड़ निवदेन कर रहा हूँ कि आप वापिस पधारें तो मेवाड़ की धरा पुनः शस्य-श्यामला हो उठे ।

" राजपुरोहित जी ने सिर से साफा उतारकर भूमि पर रखा - ''मेरी इस पाग की लाज आपके हाथ में हैं.....! 

हमें सनाथ करें......!

हम आपके वहाँ से आ जाने से अनाथ हो गए हैं......। "

मेड़ते के राजपुरोहित उठकर कक्ष में गए।

मीरा ने भूमि पर सिर रख उन्हें प्रणाम किया ।

पुरोहित जी के साथ ही हरिसिंह जी और रामदास जी भी कक्ष में आये ।

उन्होंने मीरा को प्रणाम किया । 

सबने आसन ग्रहण किया ।सबके मुख म्लान थे ।

राजपुरोहित जी ने कहा - " बाईसा हुकम ! 

केवल आपका शवसुर कुल ही आपदाग्रस्त नहीं हैं, पितृकुल भी तितर-बितर हो गाया हैं। 

एक बार किसी साधू ने कहा था ,की मेवाड़ में किसी साधू के अपमान हुआ हैं जिसके कारण यह विपत्ति बरस पड़ी हैं।" 

महाराज ने भी हाथ जोड़कर प्रणाम के साथ अर्ज़ - विनय की हैं।" 

आप वापिस पधारें तो सबकी विपत्ति दूर हो। "

पुरोहित जी महाराज !'' मीरा ने उदास दुखित स्वर में कहा - " मनुष्य केवल अपने ही कर्मो का फल पाता हैं। 

चित्तौड़ और मेड़ता की विपदगाथा सुनकर जी दुःखा ,किन्तु सच मानिये, यह मेरे कारण नहीं हुआ । 

मुझे कभी लगा ही नहीं कि कोई दुःख आया और आया भी हो, तो मुझे आँख उठाकर देखने का समय नहीं था , तब वह दुःख कैसे आया, किसके द्वारा आया , यह सब मुझे कैसे मालुम होता ? 

यह वहम आप दोनों ही ओर के महानुभाव अपने मन से निकाल दे ....!

और मेरे लौटने की बात कैसे संभव हैं ? 

कभी आप लोगो ने अपने ससुराल में सुख - पूर्वक रहती हुई अपनी बहिन - बेटी को कहा -" कि अब तुम पीहर चलो तो सब सुखी हो जायँ ? "

अब इस दिव्य भूमि पर, धाम में आकर कहीं लौटना होता हैं भाई ?" 

कहते हुए मीरा की आँखों से अश्रुबिंदु झलक पड़े।

🌿 '' हरिदास ! 

रामदास ! 

क्षत्राणी तलवार की भेंट चढ़ने के लिए ही पुत्र को जन्म देती हैं बेटा ....! 

तुम्हारे पिता ,काका, भाई युद्ध में मारे गए , इसमें अनोखी बात क्या हुई ? 

वीरों को जागतिक सुख नहीं ,अपना धर्म और कर्तव्य प्रिय होता हैं.... ! 

तुम्हारे पिता ने मुझसे अनेक बार युद्ध में वीरगति प्राप्त करने की अभिलाषा व्यक्त की थी, तुम्हें तो अपने पिता पर गौरव होना चाहिए। " 

🌿 "सम्यक कर्तव्य-पालन का सुख ही सच्चा सुख हैं , अन्यथा देह तो प्रारब्ध के अधीन हैं ।

इसे तो वह सब सहना ही हैं ,जो उसका प्रारब्ध उसे दे.........!

राजपूत की जीवन - निधि धन - धरा - परिवार नहीं हैं ,ईमान ही उसका कर्तव्य हैं । 

अबलाओं की भाँति रोना क्षत्रिय को शोभा नहीं देता । 

उठों और प्रजा की सेवा में जुट जाओ, जिसके लिए तुम्हारा जन्म हुआ हैं !!!"

मीरा ने साथ चलने की बात को टालते हुए कहा ," कुछ दिन मुझे विचार करने का समय प्रदान करें ।

तब तक आप सभी सरदार द्वारिकाधीश के दर्शन एवं सत्संग का लाभ उठावें । "

🌿 मीरा ने उन्हें कह तो दिया कि उसे सोचने का समय प्रदान करें पर उसके अन्तर्मन में एक तूफ़ान सा उठ खड़ा हुआ ।वह करूणावरूणालय भगवान को करूणा की दुहाई देने लगी......! 

"यहाँ तक आने के पश्चात मैं वापिस लौट जाऊँ .....! 

यूँ शरण में आये को लौटा देना तो आपका स्वभाव नहीं ठाकुर !!! 

फिर ऐसी परिस्थितियाँ क्यूँ उत्पन्न कर रहे हो , जो आपके स्वभाव में ही नहीं .......! 

मैं तो आपकी जन्म जन्म की दासी हूँ ......!

मुझे दिशा दिखाओ.....!

हे नाथ !."

"वेश्या गुरु"

एक बहुत प्रसिद्ध सन्त थे। 

दूर दूर से लोग उनसे मिलने और ज्ञान प्राप्त करने आते थे। 

उनके गुणों से प्रभावित हो एक वेश्या भी उनसे मिलने आई। 

उसने उस सन्त से अकेले मे मिलने की विनती की। 

लेकिन लोकापवाद की खातिर सन्त ने हमेशा उसकी विनती को ठुकराया।

अनगिनत बार विनती ठुकराये जाने के बाद भी वो वेश्या उस सन्त के पास अपनी विनती लेकर रोजाना आती रही। 

यह क्रम लगातार कई दिनों तक चलता रहा। 

एक दिन उस सन्त ने झल्लाकर उस वेश्या से कहा की तुम हमेशा अधर्म के कार्य में लिप्त रही हो। 

मैं तुम्हारा गुरु बनना स्वीकार नहीं कर सकता।


          

सन्त की पूरी बात सुनने के बाद वेश्या ने कहा मैं आपको अपने मेहनत से कमाया एक रुपया समर्पित करना चाहती थी। 

जो मैंने अपने पिता के साथ मजदूरी कर कमाया।

ये एक रुपया ही है जो मेरे धर्म की कमाई है। 

आपके शिष्य आपको लाखों रुपये समर्पित कर रहे उनके सामने मुझे ये एक रुपया देंते हुए शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। 

इस लिए मैंने आपसे अकेले मिलने की विनती की।

वेश्या की बातों को सुन कर सन्त आश्चर्यचकित रह गए। 

वेश्या का धैर्य और धर्म के प्रति सम्मान देख के सन्त ने उसे अपना गुरु बना लिया। 

सन्त ने कहा तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ गुण तुम्हारा धैर्य है। 

जिसने तुम्हे तुम्हारे मार्ग से डिगने नही दिया। 
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                          "जय जय श्री राधे"
!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

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