।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।। किसी भक्त ने एक बार तुलसीदास जी......

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........

जय द्वारकाधीश

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

*।।श्री राम: शरणं मम।।* 

किसी भक्त ने एक बार तुलसीदास जी महाराजश्री से पूछा कि अंत:करण चतुष्टय में भगवान की उपस्थिति कैसे संभव है ?

सहज रूप से तुलसीदास जी महाराजश्री ने उत्तर देते हुए कहा देखो.......!

*मन* जब बार-बार भगवान की लीलाओं का चिंतन करने की इच्छा करे और संसार की अनिच्छा करे तो समझो मन में भगवान है।

*बुद्धि* जब भगवान के कार्यों की सुसमीक्षा में लगकर सुख लेने लगे और उन्हीं का समर्थन करने लगे तो समझ लो बुद्धि भगवदाकार हो चुकी है।

*चित्त* रूपी घर साफ सुथरा होकर भगवान का आश्रय बन जाये अर्थात भगवान को चित्त से निकलने की इच्छा ही ना हो तो समझ लो कि भगवान चित्त में निवास कर चुके हैं। 


श्री रामचरित्रमानस प्रवचन  Sarswatijyotish.com


खासकर तब जब हमारे चित्त में दूसरे के रहने की जगह ही ना हो। 

चित्त के स्वामी भगवान अंदर रहे और दुर्गुण दुर्विचार रूपी अनाधिकारी प्रवेश न करने पाये, तब चित्त में भगवान के होने का प्रमाण बनता है।

*अहंकार* का आधार जब केवल यह रह जाये कि मैं अपने प्रभु का सेवक हूं और मेरे ठाकुर जी मेरे स्वामी है तो यह अहं भक्त को विकृत नहीं होने देता है।

और इसको संक्षेप में ऐसे समझ लो कि यदि अंत:करण के इन चार कमरों में से एक में भी  साधक इमानदारी से सच्चा हो जाये, तो फिर चारों में भगवान अपने आप कब्जा कर लेते हैं और साधक धन्य हो जाता है।

जय श्री राम राम राम....!!!

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अग्नि की उत्पत्ति कथा तथा वेद एवं पुराणों में माहात्म्य :


एक समय पार्वती ने शिवजी से पूछा कि हे देव! आप जिस अग्नि देव की उपासना करते हैं उस देव के बारे में कुछ परिचय दीजिये। 

शिवजी ने उत्तर देना स्वीकार किया। 

तब पार्वती ने पूछा कि यह अग्नि किस महिने, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र त तथा लग्न में उत्पन्न हुई है।

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श्री महादेवजी ने कहा-आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की आध्धी रात्रि में मीन लग्न की चतुर्दशी तिथि में शनिवार तथा रोहिणी नक्षत्र में ऊपर मुख किये हुए सर्वप्रथम पाताल से दृष्ट होती हुई अगोचर नाम्धारी यह अग्नि प्रगट हुई। 

उस महान अग्नि के माता-पिता कौन है? गौत्र क्या है? 

तथा कितनी जिह्वा से प्रगट होती है?

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श्री महादेवजी ने कहा-वन से उत्पन्न हुई सूखी आम्रादि की समिधा लकड़ी ही इस अग्नि देव की माता है क्योंकि लकड़ी में स्वाभाविक रूप से अग्नि रहती है , जलाने पर अग्नि के संयोग से अग्नि प्रगट होती है,  अग्निदेव अरणस के गर्भ से ही प्रगट होती है इसलिये लकड़ी ही माता है तथा वन को उत्पन्न करने वाला जल होता है इसलिये जल ही इसका पिता है। 

शाण्डिल्य ही जिसका गोत्र है। 

ऐसे गोत्र तथा विशेषणों वाली वनस्पति की पुत्री यह अग्नि देव इस धरती पर प्रगट हुई जो तेजोमय होकर सभी को प्रकाशित करती हुई उष्णता प्रदान करती है।

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इस प्रत्यक्ष अग्नि देव के अग्निष्टोमादि चार प्रधान  यज्ञ जो चारों वेदों में वर्णित है वही शृंग अर्थात् श्रेष्ठता है। 

इस महादेव अग्नि के भूत, भविष्य वर्तमान ये तीन चरण हैं। 

इन तीनों कालों में यह विद्यमान रहती है। 

इह लौकिक पार लौकिक इन दो तरह की ऊंचाइयों को छूनेवाली यह परम अग्नि सात वारों में सामान्य रूप से हवन करने योग्य है क्योंकि ग्रह नक्षत्रों से यह उपर है...! 

इस लिये इन सातों हाथों से यह आहुति ग्रहण कर लेती है तथा मृत्युलोक, स्वर्ग लोक पाताल लोक इन तीनों लोकों में ही बराबर बनी रहती है अर्थात् तीनों लोक इस अग्नि से ही बंध्धे हुऐ स्थिर है। 

जिस प्रकार से मदमस्त वृषभ ध्वनि करता है उसी प्रकार से जब यह घृतादि आहुति से जब यह अग्नि प्रसन्न हो जाती है तो यह भी दिव्य ध्वनि करती है। 

इन विशेषणों से युक्त अग्नि देवता महान कल्याणकारी रूप धारण करके हमारे मृत्यु लोकस्थ प्राणियों में प्रवेश करे जिससे हम तेजस्वी हो सकें और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। 

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सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जिस अग्नि ने उदर में समाहित कर रखा है, वह विश्वरूपा अग्नि देवी है जिसके उदर में प्रलयकालीन में सभी जीव शयन करते हैं तथा उत्पत्ति काल में भी सभी ओर से अग्नि वेष्टित है। 

उसकी ही परछाया से जगत आच्छादित है तथा जैसा गीता में कहा है अहं वैश्वानरो भूत्वा‘‘ अर्थात् यह अग्नि ही सर्वोपरि देव है। 

जिस अग्नि के बारह आदित्य यानि सूर्य ही बारह नेत्र है। 

उसके द्वारा सम्पूर्ण जगत को देखती है। 

सात इनकी जिह्वाएं जैसे काली,  कराली, मनोजवा, सुलोहिता , सुध्धूम्रवर्णा,  स्फुलिंगिनी , विश्वरूपी  इन सातों जिह्वाओं द्वारा ही सम्पूर्ण आहुति को ग्रहण करती है। 

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इस महान अग्नि देव के ये सात प्रिय भोजन सामग्री है। 

जिसमें सर्व प्रथम घी, , दूसरा यव , तीसरा तिल, चौथा दही, पांचवां खीर, छठा श्री खंड, सातवीं मिठाई यही हवनीय सामग्री है जिसे अग्नि देव अति आनन्द से सातों जिह्वाओं द्वारा ग्रहण करते है।

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भजन करने वाले ऋत्विक जन की यह अग्नि चाहे ऊध्ध्र्वमुखी हो चाहे अध्धोमुखी हो अथवा सामने मुख वाली हो हर स्थिति में सहायता ही करती है तथा इस अग्निदेव में प्रेम पूर्वक ‘‘स्वाहा‘‘ कहकर दी हुई मिष्ठान्नादि आहुति महा विष्णु के मुख में प्रवेश करती है अर्थात् महा विष्णु प्रेम पूर्वक ग्रहण करते हैं जिससे सम्पूर्ण देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीनों देवता तृप्त हो जाते हैं। 

इन्हीं देवों को प्रसन्न करने का एक मात्र साधन यही है।


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पुराणों में अग्नि का महात्म्य :


अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं। 

ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। 

सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।

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वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है। 

अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व - साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है। 

ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार - बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है।

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आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे - आगे चलते हैं। 

युद्ध में सेनापति का काम करते हैं इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था।

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पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। 

ये सब देवताओं के मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हीं के द्वारा देवताओं तक पहुँचती है। 

केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं।

इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती हैं। 

ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में अग्नि की प्रार्थना करते हुए विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अग्निदेवता की स्तुति करता हूँ, जो सभी यज्ञों के पुरोहित कहे गये हैं। 

पुरोहित राजा का सर्वप्रथम आचार्य होता है और वह उसके समस्त अभीष्ट को सिद्ध करता है। 

उसी प्रकार अग्निदेव भी यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं।

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अग्निदेव की सात जिह्वाएँ बतायी गयी हैं। 

उन जिह्वाओं के नाम : - काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णी, स्फुलिंगी तथा विश्वरुचि हैं।

पुराणों के अनुसार अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। 

इनके पुत्र-पौत्रों की संख्या उनंचास है। 

भगवान कार्तिकेय को अग्निदेवता का भी पुत्र माना गया है। 

स्वारोचिष नामक द्वितीय स्थान पर परिगणित हैं। 

ये आग्नेय कोण के अधिपति हैं। 

अग्नि नामक प्रसिद्ध पुराण के ये ही वक्ता हैं। 

प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर इनका मुख्य तीर्थ है। 

इन्हीं के समीप भगवान कार्तिकेय, श्राद्धदेव तथा गौओं के भी तीर्थ हैं।

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अग्निदेव की कृपा के पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। 

उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। 

महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा माँगने का निवेदन किया। 

गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुण्डल माँगा। 

उत्तंक ने महाराज के पास पहुँचकर उनकी आज्ञा से महारानी से कुण्डल प्राप्त किया। 

रानी ने कुण्डल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुण्डलों को सावधानी से ले जाइयेगा, नहीं तो तक्षक नाग कुण्डल आप से छीन लेगा। 

मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुण्डलों को लेकर पाताल में चला गया। 

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अग्निदेव की कृपा से ही उत्तंक दुबारा कुण्डल प्राप्त करके गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। 

अग्निदेव ने ही अपनी ब्रह्मचारी भक्त उपकोशल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था।

अग्नि की प्रार्थना उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त करता है। 

उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है।

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अग्निदेव का बीजमन्त्र रं तथा मुख्य मन्त्र रं वह्निचैतन्याय नम: है।

ऋग्वेद के अनुसार,अग्निदेव अपने यजमान पर वैसे ही कृपा करते हैं, जैसे राजा सर्वगुणसम्पन्न वीर पुरुष का सम्मान करता है। 

एक बार अग्नि अपने हाथों में अन्न धारण करके गुफा में बैठ गए। 

अत: सब देवता बहुत भयभीत हुए। 

अमर देवताओं ने अग्नि का महत्व ठीक से नहीं पहचाना था। 

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वे थके पैरों से चलते हुए ध्यान में लगे हुए अग्नि के पास पहुँचे। 

मरुतों ने तीन वर्षों तक अग्नि की स्तुति की। 

अंगिरा ने मंत्रों द्वारा अग्नि की स्तुति तथा पणि नामक असुर को नाद से ही नष्ट कर डाला। 

देवताओं ने जांघ के बल बैठकर अग्निदेव की पूजा की। 

अंगिरा ने यज्ञाग्नि धारण करके अग्नि को ही साधना का लक्ष्य बनाया।

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तदनन्तर आकाश में ज्योतिस्वरूप सूर्य और ध्वजस्वरूप किरणों की प्राप्ति हुई। 

देवताओं ने अग्नि में अवस्थित इक्कीस गूढ़ पद प्राप्त कर अपनी रक्षा की। 

अग्नि और सोम ने युद्ध में बृसय की सन्तान नष्ट कर डाली तथा पणि की गौएं हर लीं। 

अग्नि के अश्वों का नाम रोहित तथा रथ का नाम धूमकेतु है।

!!!!! शुभमस्तु !!!

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🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 

-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )

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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 

नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........

जय द्वारकाधीश


।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

*"मैं न होता तो क्या होता”*

अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्हों ने देखा मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर वे गदगद हो गये। 


वे सोचने लगे। 





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यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो सीता जी को कौन बचाता???


बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है,  मै न होता तो क्या होता ? 


परन्तु ये क्या हुआ सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। 

तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं।


आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है की उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है। 


अब उन्हें क्या करना चाहिए? 


श्री रामचरित्रमानस प्रवचन


जो प्रभु इच्छा।


जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है।

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आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...

 *मै न होता तो क्या होता*🙏🙏🙏जय श्री राम!!💐💐💐

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बहू ने बुजुर्ग को पेंशन न मिलने पर घर से निकाला!

अगले ही दिन बुर्जुग ने जो किया...!

सर्दियों की हल्की ठंड थी। 

सुबह का उजाला अभी - अभी फैलना शुरू हुआ था। 

शहर के किनारे बसे एक पुराने मोहल्ले में एक छोटा सा घर था, जिसमें रहते थे 78 वर्षीय राम प्रसाद शर्मा, उनका बेटा मनोज और बहू सीमा। 

साथ में दो छोटे-छोटे पोते भी थे। 

राम प्रसाद का चेहरा झुर्रियों से भरा था, पर उनकी आंखों में एक गहरी शांति और गरिमा थी। 

उनकी चाल धीमी थी, मगर हर कदम में एक सलीका था। 

वे अपने छोटे से पेंशन पर ही गुजारा करते थे।

+++ +++

महीने की शुरुआत में जो रकम आती, उसका एक हिस्सा बच्चों के लिए चॉकलेट या छोटी-छोटी चीजें खरीदने में खर्च हो जाता और बाकी घर के खर्च में दे देते। 

खुद के लिए बस जरूरत भर का। 

पर इस बार किस्मत ने अजीब मोड़ लिया। 

पेंशन आने की तारीख बीत गई, लेकिन रकम खाते में नहीं आई। 

राम प्रसाद ने सोचा शायद एक-दो दिन में आ जाएगी, इसलिए किसी को बताया नहीं।

+++ +++

लेकिन जब सीमा को बैंक से पैसे ना मिलने की बात पता चली तो उसके लहजे में बदलाव आने लगा। 

वह दिन भर चाय का कप जोर से मेज पर रखती, मनोज जो पास ही अखबार पढ़ रहा था, चुप रहता।उसने न पिता का साथ दिया, न पत्नी को रोका। 

शाम तक ताने और कड़वे शब्द बढ़ते गए। सीमा ने पोते-पोतियों के सामने कहा, अब तो इनके आने का भी कोई मतलब नहीं।

महीने की पेंशन भी नहीं आ रही। 

बस घर में बोझ बनकर बैठे हैं।

राम प्रसाद चुपचाप सुनते रहे। 

उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बस एक गहरी चुप्पी थी, जैसे मन में कुछ तय कर लिया हो।

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एक रात की चुप्पी और एक फैसला-

रात को जब सब सो चुके थे, राम प्रसाद ने अपनी पुरानी कपड़े की थैली निकाली, जिसमें बस दो-तीन जोड़ी कपड़े, एक पुराना रजाई का कवर और एक छोटा फोटो एलबम था। 

पोते की पुरानी ड्राइंग कॉपी भी उसमें रखी थी, जिसमें बच्चे ने लिखा था, मैं तुमसे प्यार करता हूं, दादा जी। 

उन्होंने थैली कंधे पर डाली, दरवाजा खोला और बाहर निकल गए।ठंडी हवा चली, पर उनके कदम स्थिर थे। 

सुबह तक किसी ने ध्यान नहीं दिया। 

जब सीमा ने देखा कि राम प्रसाद बिस्तर पर नहीं हैं तो उसने मनोज से कहा, कहीं अपने किसी रिश्तेदार के यहां चले गए होंगे। 

अच्छा ही है, थोड़ी राहत मिल जाएगी।” 

मनोज बस चुपचाप सिर झुका कर बैठा रहा।

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सुबह की अफरातफरी-

अगली सुबह मोहल्ले की गली में अचानक अफरातफरी मच गई। 

दूर से गाड़ियों के हॉर्न सुनाई देने लगे। 

पड़ोसी खिड़कियों से झांकने लगे। 

देखते ही देखते गली में एक लंबा सरकारी काफिला दाखिल हुआ। 

काले रंग की ऐसी हुई, दो पुलिस जीप और पीछे मीडिया वैन। 

गाड़ियां घर के सामने आकर रुकीं। पुलिस अफसरों ने चारों तरफ घेरा बना लिया। 

दरवाजा खुला और पहले बाहर उतरे दो सफेद शर्ट और काले कोट पहने अधिकारी। 

उनके पीछे राम प्रसाद शर्मा थे। 

मगर यह वही साधारण कपड़ों में झुके कंधों वाले बुजुर्ग नहीं थे। 

आज उन्होंने ग्रे रंग का सिलवाया हुआ सूट पहना था। 

गले में नेशनल सर्विस का बैज चमक रहा था। 

जूतों में चमक थी और चाल सीधी, आत्मविश्वास से भरी हुई।

+++ +++

सीमा के हाथ से चाय का कप गिर गया। 

मनोज दरवाजे पर जम सा गया। 

पड़ोसी काफूसी करने लगे, अरे यह तो कोई बड़े अफसर लग रहे हैं। 

क्या यह वही शर्मा जी हैं जो यहां चुपचाप रहते थे?

राम प्रसाद ने ऊपर देखा। 

घर की बालकनी में सीमा खड़ी थी, चेहरा पीला पड़ चुका था। 

मनोज ने नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं की। 

भीड़ की फुसफुसाहट और कैमरों की फ्लैश के बीच राम प्रसाद ने गहरी सांस ली। 

अब उनकी कहानी, उनका सच और उनकी चुप्पी टूटने वाली थी।

+++ +++

सच का पर्दाफाश-

गली में हलचल बढ़ चुकी थी। 

पत्रकार माइक्रोफोन लेकर आगे बढ़े। 

कैमरे चालू हो गए। 

लोग अपने-अपने घरों से निकल कर देखने लगे। 

आखिर यह माजरा क्या है?

राम प्रसाद ने बिना किसी जल्दबाजी के घर के दरवाजे की ओर कदम बढ़ाए। 

उनके पीछे एक सीनियर पुलिस अफसर चल रहा था जो बार-बार झुककर उनसे कुछ कह रहा था। 

सीमा दरवाजे पर खड़ी थी, हाथ कांप रहे थे।

राम प्रसाद ने चुप्पी तोड़ी, मनोज, पता है मैं कल रात कहां था?

मनोज ने धीमे स्वर में कहा, नहीं, बाबूजी।

मैं गया था जिला कलेक्टर के दफ्तर। 

पेंशन रुकी क्यों?

यह देखने। 

वहां पता चला कि विभाग में रिश्वतखोरी हो रही है। 

पैसे देने वालों की फाइलें पहले पास होती हैं, बाकियों को महीनों लटकाया जाता है।

उनकी आवाज स्थिर थी, लेकिन हर शब्द में एक ठंडा गुस्सा था। 

भीड़ खामोश होकर सुन रही थी।

+++ +++

मैंने खुद जाकर सबूत इकट्ठा किए और फिर आज सुबह मुख्य सचिव और मीडिया को बुलाकर यहां लाया ताकि उन्हें दिखा सकूं कि जो इंसान पेंशन के लिए भटक रहा था, वह कोई मजबूर बुजुर्ग नहीं बल्कि वही अफसर है जिसने इस राज्य की कई योजनाएं शुरू की थीं।

सीमा के पैर कांप गए। 

वह सोचने लगी कि वह कितनी गलत थी।

परिवार की टूटती दीवारें राम प्रसाद ने सीमा की तरफ देखा और कहा, लेकिन जो सबसे बड़ा घाव दिया वह यह था कि तुमने मुझे बच्चों की नजरों में गिरा दिया।

उनके शब्द तीर की तरह चुभे। 

पत्रकारों ने सवाल करने शुरू किए, सर, क्या आप कार्यवाही करवाएंगे? 

क्या आप भ्रष्ट अफसरों को सस्पेंड कराएंगे?

राम प्रसाद ने कहा, न्याय जरूर होगा और शुरुआत मैं अपने ही घर से करूंगा। 

क्योंकि सम्मान की शिक्षा घर से मिलती है। 

अगर घर में ही बुजुर्गों का अपमान हो तो समाज में क्या उम्मीद करेंगे?

भीड़ में हलचल मच गई। 

सीमा के आंसू निकल पड़े, लेकिन इस बार राम प्रसाद का चेहरा कठोर था।

+++ +++

उन्होंने पुलिस अफसर की ओर इशारा किया, “चलो अब दफ्तर चलते हैं। 

रिपोर्ट दर्ज करनी है।

राम प्रसाद खड़े हुए और जैसे ही बाहर निकले, कैमरों की फ्लैश फिर से चमक उठी। 

गली में हर कोई सोच रहा था, इस आदमी ने कल तक चुपचाप अपमान सहा और आज पूरे सिस्टम को हिला दिया।

असली सच का खुलासा हुआ दफ्तर पहुंचते ही मीडिया और अफसर पीछे हट गए। 

अब कमरे में बस राम प्रसाद, कलेक्टर और कुछ भरोसेमंद अधिकारी बैठे थे।कलेक्टर ने धीरे से कहा, सर, आप चाहे तो इन मामलों को सीधा मंत्रालय भेज सकते हैं।

आपके पास सबूत भी हैं और अधिकार भी।

राम प्रसाद ने कुर्सी पर टिकते हुए गहरी सांस ली, मुझे पता है, लेकिन यह सिर्फ कागज का मामला नहीं है। 

यह इंसानियत का मामला है। 

जिस विभाग का काम बुजुर्गों की सेवा करना है, वहीं अगर उनका शोषण हो, तो यह मेरी आत्मा को चोट पहुंचाता है।

+++ +++

कलेक्टर चुप हो गए। 

थोड़ी देर की खामोशी के बाद उनके एक पुराने साथी शर्मा जी जो विशेष रूप से मिलने आए थे, धीरे से बोले, राम प्रसाद जी, अब तो आप रिटायर हो चुके हैं। 

इतनी मेहनत, इतनी गुप्त जांच, आखिर क्यों?

राम प्रसाद ने उनकी ओर देखा और आवाज धीमी कर दी, क्योंकि मैंने अपनी मां को इसी सिस्टम के हाथों मरते देखा है।

कमरे का माहौल ठंडा पड़ गया। 

मेरी मां विधवा थी। 

पेंशन उनका हक थी। 

लेकिन महीनों तक उन्हें सिर्फ टालमटोल और बेइज्जती मिली। 

उन्होंने कभी रिश्वत नहीं दी और एक दिन लाइनों में खड़े- खड़े धूप में गिर पड़ी। 

फिर कभी उठी ही नहीं। 

उसी दिन मैंने कसम खाई थी कि अपने पद का इस्तेमाल सिर्फ कागजी आदेशों के लिए नहीं करूंगा बल्कि इस सिस्टम को इंसानियत सिखाने के लिए करूंगा।

+++ +++

कलेक्टर की आंखें भर आईं। 

शर्मा जी ने धीमे स्वर में कहा, तो इस लिए आप रिटायर होने के बाद भी साधारण कपड़ों में छोटे से घर में चुपचाप रह रहे थे।

राम प्रसाद ने सिर हिलाया, हां। 

असली चेहरा तभी दिखता है जब सामने वाला सोचता है कि तुम बेबस हो। 

मैं जानबूझकर साधारण जीवन जीता रहा ताकि देख सकूं आज भी इस देश में इंसानियत बची है या नहीं।

इसी दौरान बाहर से एक कांस्टेबल आया, सर, घर से मैडम और उनके पति आए हैं। 

मिलने की इजाजत चाहिए।

राम प्रसाद ने गहरी सांस ली, बुला लो।

दरवाजा खुला और सीमा अंदर आई। 

पीछे-पीछे मनोज। 

दोनों के चेहरे पर शर्म और पछतावा साफ था।

सीमा ने आते ही पैरों में गिरते हुए कहा,बाबूजी, मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। 

मुझे माफ कर दीजिए। 

उस वक्त बस गुस्से में मैं नहीं समझ पाई कि आपने हमारे लिए कितनी कुर्बानियां दी हैं।

+++ +++

राम प्रसाद ने उसे उठाया, लेकिन चेहरे पर सख्ती बरकरार थी, गलती इंसान से होती है, लेकिन बुजुर्ग का अपमान गलती नहीं, चरित्र का आईना होता है। 

मैंने जो सिखाना था, वह आज तुम्हें और इस पूरे मोहल्ले को सिखा दिया है।

मनोज की आंखें झुकी थीं। 

उसने धीमे स्वर में कहा, बाबूजी, मैं आपका बेटा होकर भी आपके साथ खड़ा नहीं हुआ। 

आज जिंदगी भर उस शर्म के साथ जीना पड़ेगा।

राम प्रसाद ने बस इतना कहा, अगर सच में शर्म है तो इसे बदल दो। 

अपने घर से,अपने बच्चों से शुरू करो ताकि अगली पीढ़ी सीख सके। 

बुजुर्ग बोझ नहीं होते, वरदान होते हैं।

+++ +++

सीमा और मनोज चुपचाप सिर हिलाते रहे। 

जाते-जाते राम प्रसाद ने कलेक्टर से कहा, इन अफसरों पर सख्त कार्रवाई करो। 

और हां, पेंशन विभाग में एक नया नियम लागू करना। 

जो भी बुजुर्ग पेंशन के लिए आए, उसे बैठाकर चाय पिलाओ। 

यह कानून से बड़ा आदेश होगा। 

इंसानियत का आदेश।

कमरे में सन्नाटा था, लेकिन उस सन्नाटे में एक अजीब सी गरिमा थी।

अंत में राम प्रसाद उठकर बाहर निकले। 

बाहर बारिश रुक चुकी थी और गली के लोग उनके लिए ताली बजा रहे थे। 

लेकिन उनके कदम भारी थे क्योंकि वह जानते थे असली लड़ाई अभी भी जारी थी।

      || जय श्री राम!! ||

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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏 

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सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........

जय द्वारकाधीश

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राधा कृष्ण प्रेम प्रसंग 🦚❤️

प्रसंग 1

राधा के बिना कृष्ण अधूरे

एक बार श्री कृष्ण से पूछा गया: "आपका नाम 'राधा-कृष्ण' क्यों है, 'कृष्ण-राधा' क्यों नहीं?"

प्रभु ने उत्तर दिया:

"क्योंकि राधा मेरी आत्मा है और मैं उसका शरीर। 

बिना आत्मा के शरीर का कोई अस्तित्व नहीं होता, इस लिए नाम हमेशा 'राधा' से शुरू होता है।"

सीख:

> प्रेम में सम्मान और समर्पण सबसे ऊपर होता है।

बाल गोपाल की दी हुई जिंदगी।

नेह अपनत्व पूरित भई बन्दगी।।01।।

मैंनें कीड़े-मकोडों को जाना नहीं-

बाल गोपाल की हो गई बन्दगी।।02।।

बाल गोपाल की नित्य करुणा मिली-

सत्य में दूर मन की गई गंदगी।।03।।

बन गए श्याम जबसे हमारे सखा-

बाल गोपाल बस माँगती जिंदगी।।04।।

मेरा गोपाल मुझको दिखता है पथ-

फँस भँवर में अगर भटकती जिंदगी।।05।।

मित्रवर नंद के बाल गोपाल से-

स्नेह अविराम ही माँगती ज़िन्दगी।।06।।

अष्टपल सत्य में रात दिन बंधुवर-

बाल गोपाल प्रिय सोचती ज़िन्दगी।।07।।


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बाल गोपाल से प्रीति जिनको नहीं-

उनकी काहे की कैसी रही ज़िन्दगी।।08।।

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जबसे प्रभु  में मन को रमाया 'राधिके'-

तबसे ही बन गयी कीर्तन मेरी ज़िन्दगी।।09।।

जय जय श्री कृष्ण


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|| मीरा चरित ||

क्रमशः से आगे ..................

राणा विक्रमादित्य ने मीरा को बाँस की छाब में दो काले भुजंग भिजवाये और कहलवाया कि शालिगराम जी और फूल है। 

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छाब का ढक्कन खोलते ही नाग निकले, लेकिन देखते ही देखते एक ने शालिगराम का स्वरूप ले लिया और एक ने रत्नों के हार का ।


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जब दासी कुमकुम को चेत आया तो वह मीरा के चरणों में सिर रखकर रो पड़ी -

 " मैं कुछ नहीं जानती अन्नदाता ! 

मुझे तो महाराणा के सेवक ने यह छाब पकड़ाई और कहा कि शालिगराम जी और फूल है मैं आपके यहाँ पहुँचा दूँ।

यदि मैं इस साज़िश के बारे में जानती होऊँ तो भगवान इसी समय मेरे प्राण हर लें" फिर एकाएक चौंक कर बोली ," वे कहाँ गये दोनों कालींगढ़ ? "

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" ये रहे। " 

मीरा ने एक हाथ से शालिगराम जी को और दूसरे से गले में पड़े हार को छूते हुये बताया - 

" तुम डरो मत ! 

मेरे साँवरे समर्थ है। "

श्यामकुँवर बहुत क्रोधित हुई यह सब देखकर और बोली ," अभी जाकर काकोसा से पूछती हूँ कि यह सब क्या है ? अभी तक तो सुनते ही थे पर आज तो आँखों के समक्ष सब देख लिया। "


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पर मीरा ने बेटी को शांत कर समझाया ," कुछ नहीं पूछना है और हमारे पास प्रमाण भी कहाँ है कि उन्होंने साँप भेजे ।फिर साँप है कहाँ ? 

ब्लकि गोमती , जा !जोशी जी को बुला ला ,बोलना शालिगराम प्रभु पधारे है। 

प्राणप्रतिष्ठा करनी है। 

और चम्पा ! 

प्रभु के आगमन पर उत्सव भोग की तैयारी करो , और सब महलों में प्रसाद भी बंटेगा। "

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श्यामकुँवर तो यह सब देख सकते में आ गई - एक शरणागत का ,एक भक्त का किसी भी स्थिति को देखने का ,उस स्थिति को संभालने का ही नहीं ब्लकि उसे प्रभु की लीला मान उसे उत्सव का स्वरूप दे देना - कितना भावभीना दृष्टिकोण है !"

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" और मेरे लिए क्या आज्ञा है हुकम ? "

कुमकुम रो पड़ी - " जो यह प्रसाद मेरे पल्ले में न बँधा होता तो वे नाग मुझे अवश्य डस गये होते। 

अब वहाँ जाकर क्या अर्ज़ करूँ ?"

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" केवल यही कहना कि छाब को मैं कुंवराणी के पास रख आई हूँ और अर्ज़ कर दिया है कि शालिगराम और फूलों के हार है। 

इच्छा हो तो उत्सव के पश्चात आकर तुम प्रसाद ले जाना। 

"मीरा ने कहा।"

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" न जाने किस जन्म के पाप का उदय हुआ कि ऐसे कार्य में निमित्त बनी। 

यदि आपको कुछ हो जाता अन्नदाता ! "

तो मुझे नरक में भी ठिकाना न मिलता। 

हुज़ूर आप तो पीहर पधार रही है....... 

मुझे भी कोई सेवा प्रदान कर देती !

" दासी ने आँसू पौंछते हुये कहा। "

+++ +++

" मेरी क्या सेवा ? 

सेवा तो ठाकुर जी की है। 

उनका जो नाम अच्छा लगे , उठते - बैठते काम करते हुये लेती रहो। "

जीभ को न तो खाली रहने दो और न फालतू बातों में उलझायो। 

यह कोई कठिन काम नहीं है , पर आदत नहीं होने से प्रारम्भ में कठिन लगेगा ।

आदत बनने पर तो लोग घोड़े - ऊँट पर भी नींद ले लेते है। 

बस इतना ध्यान रखना कि नियम छूटे नहीं। 

"मीरा ने कहा।"

+++ +++

" मुझे ....... भी एक...... ठाकुर जी....... बख्शावें। 

म्हूँ लायक तो कोय न , पण हुज़र री दया दृष्टि सूँ तर जाऊँली। " 

कुमकुम ने संकोच से आँचल फैला कर कहा।

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मीरा उसके भाव से प्रसन्न हो बोली ," बहुत भाग्यशाली हो जो ठाकुर जी की सेवा की इच्छा जगी। 

प्रसाद लेने आवोगी तो जोशीजी भगवान और नाम दोनों दे देंगे। 

इनके नाम में सारी मुसीबतों के फंद काटने की शक्ति है। 

यदि तुम नाम भगवान को पकड़े रहोगी तो आगे - से - आगे राह स्वयं सूझती जायेगी और वह स्वयं भी आकर तुम्हारे ह्रदय में ,नयनों में बस जायेंगे। "

+++ +++

" आज तो मेरा भाग्य खुल गया।" 

कहते हुये उसने अपने आँसुओं से मीरा के चरण पखार दिए ।

+++ +++

शालिगराम जी के पधारने का उत्सव हुआ। 

जब जोशी जी ने शालिगराम भगवान का पंचामृत अभिषेक हुआ तो श्यामकुँवर और दासियों ने जयघोष कर मीरा का उत्साह वर्द्धन किया। 

मीरा भगवान के स्वयं घर पधारने से प्रसन्न चित्त मुद्रा में पर अतिशय भावुक हो विनम्रता से शीश निवाया। 

और ह्रदय के समस्त भावों से प्रियतम का स्वागत करने में तन्मय हो गईं.........!

🌿म्हाँरे घर आयो प्रियतम प्यारा ...........!

क्रमशः ..................

मीरा चरित...!


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संतोषं परमं सुखं :

एक गांव में एक गरीब आदमी रहता था। 

वह बहुत मेहनत करता, किंतु फिर भी वह धन न कमा पाता। 

इस प्रकार उसके दिन बड़ी मुश्किल से बीत रहे थे। 

कई बार तो ऐसा हो जाता कि उसे कई कई दिनों तक सिर्फ एक वक्त का खाना खाकर ही गुजारा करना पड़ता। 

इस मुसीबत से छुटकारा पाने का कोई उपाय उसे न सूझता। 

एक दिन उसे एक महात्मा जी मिल गए। 

उसने उन महात्मा जी की खूब सेवा की। 

महात्मा जी उसकी सेवा से प्रसन्न हो गए। 

और उसे भगवान की आराधना का एक मंत्र दिया। 

मंत्र से कैसे प्रभु का स्मरण किया जाए, उसकी पूरी विधि भी महात्मा जी ने उसे बता दी।

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वह व्यक्ति उस मंत्र से भगवान का स्मरण करने लगा। 

कुछ दिन मंत्राराधना करने पर देवी उसके सामने प्रकट हुई। 

देवी ने उससे कहा, ”मैं तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हूं। 

बोलो क्या चाहेते हो? 

निर्भय होकर मांगो।“

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देवी को इस प्रकार सामने प्रकट हुआ देख वह व्यक्ति एकाएक घबरा गया। 

क्या मांगा जाए, यह वह तुरंत तय ही न कर सका, इस लिए हड़बड़ाहट में बोला, ”देवी जी, इस समय तो नहीं, हां मैं कल आपसे मांग लूंगा।“ 

देवी जी कल प्रातः आने के लिए कहकर अंतर्धान हो गई।

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घर जाकर वह व्यक्ति सोच में पड़ गया कि देवी से क्या मांगा जाए ? 

उसके मन में आया कि रहने के लिए घर नहीं है, इस लिए वही मांगा जाए। 

घर भी कैसा मांगा जाए, वह उस पर विचार करने लगा। 

ये जमींदार लोग गांव के सब लोगों पर रोब गांठते हैं, इस लिए देवी से वर मांगकर मैं जमींदार हो जाऊं, तो अच्छा रहे। 

यह विचार कर उसने जमींदारी मांगने का निर्णय कर लिया।

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इस विचार के आने के बाद वह सोचने लगा कि जब लगान भरने का समय आता है, तब ये जमींदार भी तो तहसीलदार साहब की आरजू मिन्नतें करते हैं। 

इस प्रकार इन जमींदारों से बड़ा तो तहसीलदार ही है, इस लिए जब बनना ही है तो बड़ा तहसीलदार क्यों न बन जाऊं?

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इस प्रकार विचार कर वह तहसीलदार बनने की इच्छा करने लगा। 

अब वह इस निर्णय से खुश था। 

लेकिन, उसके मन में विचार समाप्त नहीं हुए और कुछ देर बाद उसे जिलाधीश का ध्यान हो आया। 

वह जानता था कि जिलाधीश साहब के सामने तहसीलदार भी कुछ नहीं है। 

तहसीलदार तो भीगी बिल्ली सा बना रहता है, जिलाधीश के सामने। 

इस तरह उसे अब तहसीलदार का पद भी फीका लगने लगा था। 

अतः इच्छाएं बढ़ती चली गईं। 

वह सोचने विचारने में ही इतना फंस गया कि कुछ तय नहीं कर पाया कि क्या मांगा जाए। 

इस तरह तो दिन बीता ही, रात भी बीत गई।

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दूसरे दिन सवेरा हुआ। 

वह अभी भी कुछ निर्णय नहीं कर पाया था। 

ज्यों ही सूरज की पहली किरण पृथ्वी पर पड़ी त्यों ही देवी उसके सामने प्रकट हो गईं। 

उन्होंने पूछा, ”बोलो, अब क्या चाहते हो? 

अब तो तुमने सोच विचार कर निश्चय कर लिया होगा कि क्या मांगना है?“

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उसने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, ”देवी, मुझे कुछ नहीं चाहिए। 

मुझे तो सिर्फ भगवान की भक्ति और आत्म संतोष का गुण दीजिए। 

यही मेरे लिए पर्याप्त है।“ 

देवी ने पूछा, ”क्यों भई, तुमने धन दौलत क्यों नहीं मांगी?“

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वह विनम्रता से बोला, ”देवी, मेरे पास दौलत नहीं आई। 

बस आने की आशा मात्र हुई तो मुझे उसकी चिंता से रात भर नींद नहीं आई। 

यदि वास्तव में मुझे दौलत मिल जाएगी, तो फिर नींद तो एकदम विदा ही हो जाएगी। 

इस लिए मैं जैसा हूं, वैसा ही रहना चाहता हूं।

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आत्म संतोष का गुण ही सबसे बड़ी दौलत होती है। 

आप मुझे यही दीजिए। 

साथ ही यह संसार सागर पार करने के लिए भगवान नाम के स्मरण का गुण दीजिए।“

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देवी ने उसे आर्शीवाद दे दिया। 

वह व्यक्ति पहले की तरह प्रसन्नता से अपना जीवन बिताने लगा।

जीवन में संतुष्टि  से बड़ा कोई धन नहीं है और न ही इससे बड़ा कोई सुख है।

जय जय श्री राधे

!!!!! शुभमस्तु !!!

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🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

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