गीतावली रामायण — श्रीराम के नामकरण-संस्कार का शास्त्रोक्त प्रसंग ;

 सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........

जय द्वारकाधीश


गीतावली रामायण — श्रीराम के नामकरण-संस्कार का शास्त्रोक्त प्रसंग ;

गीतावली रामायण — श्रीराम के नामकरण-संस्कार का शास्त्रोक्त प्रसंग ;

गोस्वामी तुलसीदासजी विरचित गीतावली — बालकाण्ड ;

चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनी सोहैं।

गोद मोद-मूरति लिए, सुकृती जन जोहैं॥

सुख-सुखमा, कौतुक कला देखि-सुनि मुनि मोहैं।

सो समाज कहैं बरनिकै, ऐसे कबि को हैं?॥


यह पद गोस्वामी तुलसीदासजी की गीतावली में भगवान् श्रीराम के जन्म के पश्चात् होने वाले नामकरण - संस्कार के प्रसंग में आता है। 

तुलसीदासजी ने यहाँ किसी काल्पनिक घटना का निर्माण नहीं किया है, बल्कि श्रीराम के जन्म, उनके भाइयों के नामकरण और उस अवसर पर उपस्थित मंगलमय वातावरण को अपनी भक्तिपूर्ण ब्रजभाषा में प्रस्तुत किया है। 

उपलब्ध गीतावली - पाठ में इस के पहले वशिष्ठजी द्वारा वेद - विहित विधि से संस्कार कराने और फिर शिशुओं सहित कौसल्या को बुलाने का प्रसंग आता है। 

उसके बाद सधवा स्त्रियाँ मंगलभाव से आती हैं और अपने - अपने रुचिकर वेश में सम्मिलित होती हैं। 

उसी क्रम में यह पद आता है।




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“चारु चौक” का अर्थ क्या है?


तुलसीदासजी कहते हैं—


“चारु चौक बैठत भई...”


यहाँ चारु का अर्थ है—

सुन्दर, मनोहर, शोभायुक्त।


चौक से आशय उस शुभ स्थान से है जिसे संस्कार अथवा मांगलिक अवसर के लिए विधिपूर्वक सजाया गया था।


अर्थात् यह कोई साधारण बैठने का स्थान नहीं था। 

नामकरण जैसे संस्कार में वैदिक विधि, मंगलाचार और गृहस्थ - परम्परा के अनुसार शुद्ध तथा मांगलिक व्यवस्था की जाती थी।


गीतावली के इसी प्रसंग में तुलसीदासजी इससे पहले बताते हैं कि सेवक सजग हैं, समयानुकूल व्यवस्था की जा रही है और “चित्र चारु चौकैं रचीं”—

सुन्दर चौक बनाए गए हैं। 

फिर सरोवर और वापिका आदि से सम्बन्धित मंगल - सज्जा तथा सुगन्धित द्रव्यों का भी उल्लेख मिलता है।


इस से स्पष्ट होता है कि “चारु चौक” केवल काव्य - सौन्दर्य का शब्द नहीं है, बल्कि उस समय के मांगलिक संस्कार की धार्मिक - सामाजिक व्यवस्था का भी संकेत है।


“भूप-भामिनी” कौन हैं?


इसके बाद तुलसीदासजी कहते हैं—


“भूप-भामिनी सोहैं।”


यहाँ भूप अर्थात् राजा और भामिनी अर्थात् राजमहल की स्त्रियाँ अथवा रानियाँ।


प्रसंग श्रीराम तथा उनके तीनों भाइयों के नामकरण का है। 

अतः यहाँ दशरथजी की रानियों और माताओं का भाव सामने आता है।


यहाँ किसी अज्ञात या काल्पनिक स्त्री का नाम जोड़ना आवश्यक नहीं है। 

स्वयं तुलसीदासजी के पाठ में प्रसंग पहले से स्पष्ट है।


नामकरण - संस्कार के इस अवसर पर माताएँ अपने - अपने बालकों को लेकर उपस्थित हैं और मंगलमय चौक में बैठी हुई शोभा पा रही हैं।


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*चारू चौक बैठत भई भूप भामिनी सोहै।*

*गोद मोद मूरति लिए सुकृती जन जोहै।।*

यह दृश्य केवल राजसी वैभव का वर्णन नहीं है। 

तुलसीदासजी का ध्यान मातृत्व और बालरूप की माधुर्यता पर है।


“गोद मोद-मूरति लिए” — बालक ही आनन्द की मूर्ति हैं ;


इस पद की सबसे सुन्दर पंक्ति है—


“गोद मोद-मूरति लिए...”


मोद अर्थात् आनन्द।


मूरति अर्थात् मूर्ति या साकार रूप।


अर्थात् माताओं की गोद में ऐसे बालक हैं जो स्वयं आनन्द के साकार स्वरूप प्रतीत हो रहे हैं।


यहाँ तुलसीदासजी केवल बालकों की शारीरिक सुन्दरता का वर्णन नहीं कर रहे। 

वे बालरूप में प्रकट भगवान् श्रीराम और उनके भाइयों को आनन्द का केन्द्र बना रहे हैं।


श्रीरामचरितमानस में भी रामजन्म के प्रसंग में सम्पूर्ण वातावरण में आनन्द का वर्णन मिलता है। 

तुलसीदासजी वहाँ कहते हैं कि श्रीराम के प्रकट होने पर देवता, मुनि और मनुष्य सभी प्रसन्न होते हैं तथा मंगल का वातावरण बन जाता है। 

इसी प्रकार गीतावली में भी बालकों के जन्म और नामकरण को केवल पारिवारिक घटना न मानकर मंगलमय दिव्य प्रसंग के रूप में चित्रित किया गया है।






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*भावार्थ*👉श्री तुलसीदास जी कहते है कि सुन्दर चौको में बैठी हुई रानियाँ गोद में आनन्द मूर्ति बालकों को लिए अति शोभायमान हो २ही है पु०यवान लोग उन्हें देख रहे है।।

।।१४।।


नामकरण - संस्कार का शास्त्रीय आधार ;


यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए।


भारतीय वैदिक परम्परा में नामकरण केवल किसी बालक को पहचान देने के लिए नाम रख देने की साधारण प्रक्रिया नहीं है। 

यह संस्कार - परम्परा का एक अंग है।


धर्मशास्त्रीय परम्परा में जातकर्म के बाद नामकरण का विधान आता है। 

बालक के लिए शुभ, अर्थपूर्ण और परम्परा के अनुकूल नाम निर्धारित किए जाते हैं।


इसी धार्मिक संस्कार-परम्परा को तुलसीदासजी ने श्रीरामकथा में भक्तिभाव के साथ चित्रित किया है।


गीतावली के पूर्ववर्ती पदों में स्पष्ट है कि वेद - विहित विधि से क्रिया सम्पन्न होती है और गुरुजन तथा ब्राह्मण उपस्थित हैं। 

इस के बाद बालकों को लेकर माताओं को बुलाया जाता है।


अर्थात् तुलसीदासजी का वर्णन केवल कल्पना पर आधारित राजदरबार का दृश्य नहीं है। 

इस में वेद - विहित संस्कार, गुरु, ब्राह्मण, माताएँ और बालकों का नामकरण—

सभी का क्रम उपस्थित है।


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चारों बालकों का नामकरण ;


नामकरण के प्रसंग में चारों भाइयों को नाम प्राप्त होते हैं—


राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न।


तुलसीदासजी आगे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि चारों बालकों के नाम अत्यन्त सुन्दर और अर्थपूर्ण हैं।


उनके नाम केवल पारिवारिक पहचान नहीं हैं। 

प्रत्येक नाम अपने भीतर एक विशेष धार्मिक अर्थ रखता है।


राम ;


“राम” नाम स्वयं भारतीय वैष्णव और रामभक्ति परम्परा में परम पवित्र माना गया है।


श्रीरामचरितमानस के आरम्भ में तुलसीदासजी रामनाम की महिमा का विस्तार से स्मरण करते हैं। 

वे रामनाम को ब्रह्मा, विष्णु और शिव से सम्बद्ध परम पवित्र नाम के रूप में स्तुत करते हैं।


इस लिए नामकरण में सबसे ज्येष्ठ बालक को राम नाम मिलना केवल एक सामान्य नामकरण नहीं है। 

तुलसीदासजी की भक्ति-दृष्टि में यह स्वयं परम मंगल का विषय है।


भरत ;


दूसरे बालक का नाम भरत रखा गया।


“भरत” नाम का सम्बन्ध धारण करने, पोषण करने और भार वहन करने के अर्थों से जोड़ा जाता है। 

रामकथा की आगे की घटनाओं में भरत का चरित्र श्रीराम के प्रति अद्वितीय भ्रातृभक्ति और त्याग के रूप में सामने आता है।


किन्तु यहाँ हमें भविष्य की घटनाओं को काल्पनिक रूप से जोड़ने की आवश्यकता नहीं है।

तुलसीदासजी स्वयं नामकरण के समय चारों नामों की ओर संकेत करते हैं और आगे उनके नामों के फल एवं अर्थ को काव्यात्मक ढंग से व्यक्त करते हैं।


लक्ष्मण ;


तीसरे बालक का नाम लक्ष्मण है।


लक्ष्मण का नाम रामकथा में श्रीराम के अनन्य सेवक, अनुज और सहचर के रूप में प्रसिद्ध होता है।


गीतावली के इस प्रसंग में अभी वे शिशु हैं। 

इस लिए इस पद का मूल दृश्य माताओं की गोद में बैठे बालकों का है।


यही शास्त्रीय लेखन की मर्यादा है—

जिस समय जो प्रसंग है, उसी को उसी सीमा में समझना।


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शत्रुघ्न ;


चौथे बालक का नाम शत्रुघ्न है।


नाम स्वयं अपने अर्थ की ओर संकेत करता है—

शत्रुओं का विनाश करने वाला।


तुलसीदासजी के पद में चारों नामों का धार्मिक और मंगलकारी अर्थ आगे की पंक्तियों में सामने आता है।


“सुकृती जन जोहैं” — 

पुण्यवान लोग दर्शन कर रहे हैं


अब पद का दूसरा अत्यन्त महत्वपूर्ण भाग है—


“सुकृती जन जोहैं।”


सुकृती अर्थात् पुण्यवान, शुभ कर्म करने वाले।


जोहैं अर्थात् देखते हैं, निहारते हैं।


अर्थात् जिनकी गोद में आनन्दस्वरूप बालक हैं, उन माताओं को पुण्यवान लोग देख रहे हैं।


यहाँ तुलसीदासजी ने दर्शन की भावना को विशेष महत्व दिया है।


भगवान् का बालरूप केवल माता - पिता के लिए ही आनन्द का कारण नहीं है। 

उस दिव्य बालरूप का दर्शन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने को भाग्यशाली अनुभव करता है।


यह भाव रामचरितमानस के अनेक प्रसंगों में भी दिखाई देता है—

जहाँ श्रीराम के रूप, चरित्र या बाललीला का दर्शन करने वाले जन अपने जीवन को धन्य मानते हैं। 

तुलसीदासजी की भक्ति-काव्य परम्परा में भगवान् के दर्शन स्वयं कृपा का विषय हैं।


इस लिए “सुकृती जन जोहैं” का अर्थ केवल “लोग देख रहे हैं” कहना पर्याप्त नहीं है।


यहाँ दर्शन की आध्यात्मिक महत्ता भी है।


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मातृत्व और भगवद्भक्ति का अद्भुत मिलन ;


इस पद की विशेषता यह है कि तुलसीदासजी ने श्रीराम को एक ओर परम दिव्य सत्ता के रूप में स्वीकार किया है और दूसरी ओर उन्हें माता की गोद में बैठे बालक के रूप में भी दिखाया है।


यही रामभक्ति की माधुर्यपूर्ण विशेषता है।


जो परम सत्ता समस्त जगत का आधार है, वही माता की गोद में बालरूप धारण करती हुई दिखाई देती है।


इसमें भक्तिभाव की एक अत्यन्त गहरी अनुभूति है—


ईश्वर दूर नहीं हैं।


वे माता की गोद में हैं।


वे बालक के रूप में दिखाई दे रहे हैं।


उनका दर्शन किया जा सकता है।


उनकी बाललीला में आनन्द पाया जा सकता है।


इसी लिए तुलसीदासजी ने “मोद-मूरति” कहा।


मुनियों को भी मोह लेने वाला दृश्य ;


इस पद के अगले चरण में तुलसीदासजी कहते हैं—

“सुख-सुखमा, कौतुक कला देखि-सुनि मुनि मोहैं।”

अर्थात् वहाँ का सुख, सौन्दर्य और कौतुक ऐसा है कि मुनि भी उसे देखकर और सुनकर मोहित हो जाते हैं।

यहाँ मुनियों का उल्लेख अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

यदि केवल राजपरिवार का उत्सव होता, तो तुलसीदासजी केवल राजपरिवार और नगरवासियों की प्रसन्नता का वर्णन कर सकते थे।

किन्तु वे कहते हैं कि वहाँ उपस्थित मुनि भी उस दृश्य को देखकर मोहित हैं।

इसका कारण बालरूप की दिव्यता है।

नामकरण संस्कार के अवसर पर वेद-विहित कर्म हो रहा है। 

गुरुजन और ब्राह्मण उपस्थित हैं। 

माताएँ बालकों को लेकर बैठी हैं। 

मांगलिक वातावरण है। 

और उस सम्पूर्ण दृश्य का केन्द्र हैं—चार दिव्य बालक।

“ऐसे कवि को हैं?” — तुलसीदासजी की विनम्रता ;


पद के अन्त में तुलसीदासजी स्वयं प्रश्न करते हैं—

“सो समाज कहैं बरनिकै, ऐसे कबि को हैं?”

अर्थात् ऐसा समाज या ऐसा अद्भुत दृश्य वर्णन करने वाला कवि भला कौन हो सकता है?

यह तुलसीदासजी की काव्यगत विनम्रता है।

वे स्वयं अपने वर्णन को पर्याप्त नहीं मानते।

भगवान् के बालरूप का सौन्दर्य इतना अधिक है कि उसे शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना कठिन है।

यही कारण है कि तुलसीदासजी बार-बार अपनी वाणी की सीमा स्वीकार करते हैं।

भगवान् का रूप, लीला और महिमा अनन्त है; कवि की भाषा सीमित है।

इसलिए वे कहते हैं कि ऐसा दृश्य कौन-सा कवि पूरी तरह वर्णित कर सकता है?

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यह प्रसंग केवल राजसी उत्सव नहीं है ;


इस पद को केवल राजमहल के उत्सव के रूप में पढ़ना इसके आध्यात्मिक अर्थ को छोटा कर देगा।


यहाँ चार स्तर एक साथ दिखाई देते हैं—


पहला — संस्कार।

वेद-विहित नामकरण की धार्मिक परम्परा।


दूसरा — मातृत्व।

माताओं की गोद में बालकों का आनन्द।


तीसरा — दर्शन।

सुकृती जन उस बालरूप को निहार रहे हैं।


चौथा — भक्ति।

जिस बालक को लोग गोद में देख रहे हैं, वही भक्तों के आराध्य भगवान् श्रीराम हैं।


इसी लिए यह पद छोटा होते हुए भी अत्यन्त गहरा है।


तुलसीदासजी की कथा और प्रमाण की मर्यादा ;


आपने विशेष रूप से कहा है कि कथा में किसी व्यक्ति, गाँव, राज्य या देश का काल्पनिक नाम न जोड़ा जाए। इस प्रसंग में वास्तव में ऐसा करने की कोई आवश्यकता भी नहीं है।


तुलसीदासजी की गीतावली स्वयं इस घटना का आधार देती है। 

उपलब्ध पाठ में जन्मोत्सव, छठी, नामकरण, वेद - विहित क्रिया, गुरु वशिष्ठ, माताएँ और चारों बालकों का क्रम मिलता है।


और श्रीरामचरितमानस में भी श्रीराम के जन्म तथा उनके परिवार से सम्बन्धित प्रसंग विस्तार से मिलता है। 

तुलसीदासजी स्वयं मानस के आरम्भ में यह स्पष्ट करते हैं कि उनकी रचना अनेक पुराणों, निगम - आगम और रामायण से सम्मत कथा पर आधारित है।


इसलिए शास्त्रोक्त लेखन में सही तरीका यही है कि जहाँ मूल ग्रन्थ प्रमाण देता है, वहीं तक बात कही जाए; उसके आगे अपनी ओर से कोई संवाद, घटना, पात्र या स्थान न बनाया जाए।


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इस पद का सच्चा भाव ;


“चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनी सोहैं” में बाहरी सौन्दर्य है।


“गोद मोद-मूरति लिए” में मातृस्नेह है।


“सुकृती जन जोहैं” में दर्शन की महिमा है।


“मुनि मोहैं” में भगवान् के बालरूप की दिव्यता है।


और—


“ऐसे कबि को हैं?”


में उस दिव्य दृश्य को पूर्णतः शब्दों में बाँध न पाने की कवि की विनम्रता है।


इस लिए इस पद को केवल एक सुंदर काव्य-पंक्ति के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है।


यह श्रीराम के बालरूप, नामकरण-संस्कार और भक्तों के दर्शनानन्द का पद है।

जब चारों बालक अपनी माताओं की गोद में हैं, मांगलिक चौक सजा हुआ है, वेद-

विहित संस्कार सम्पन्न हो रहा है, गुरुजन उपस्थित हैं और सुकृती जन उस बालरूप को निहार रहे हैं—

तब तुलसीदासजी को वह सम्पूर्ण दृश्य सामान्य सांसारिक उत्सव नहीं दिखाई देता।

उनके लिए वह भगवान् के बालस्वरूप का मंगलमय दर्शन है।

माता की गोद में बालक है—

पर भक्त की दृष्टि में वह केवल बालक नहीं।

वह वही श्रीराम हैं जिनके नाम का स्मरण तुलसीदासजी बार-बार करते हैं।

इसी लिए—

“गोद मोद-मूरति लिए”

केवल मातृत्व का चित्र नहीं है।

यह उस परम आनन्द का चित्र है जो भगवान् के बालरूप के दर्शन से उत्पन्न होता है।

और—

“सुकृती जन जोहैं”

का संकेत है कि ऐसे दिव्य दर्शन का अवसर स्वयं में पुण्य और सौभाग्य का विषय है।

अतः इस पद का सार यही है—

मांगलिक संस्कार से सुशोभित चौक, माताओं की गोद में विराजमान चारों बालक, उन्हें निहारते पुण्यवान जन, और उस दिव्य दृश्य को देखकर मोहित होते मुनिजन—

यह सब मिलकर श्रीराम के नामकरण-संस्कार को भक्तिमय और मंगलमय बना देते हैं।


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मूल पद ;


चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनी सोहैं।

गोद मोद-मूरति लिए, सुकृती जन जोहैं॥

सुख-सुखमा, कौतुक कला देखि-सुनि मुनि मोहैं।

सो समाज कहैं बरनिकै, ऐसे कबि को हैं?॥


यह पद गोस्वामी तुलसीदासजी की गीतावली के बालकाण्ड में श्रीराम और उनके तीनों भाइयों के नामकरण - संस्कार से सम्बन्धित प्रसंग में आता है। 

उपलब्ध पाठ में इसके पहले सुन्दर चौक बनाए जाने, मंगल - सज्जा होने, वेदों के ज्ञाता कुलगुरु वशिष्ठजी के विराजने तथा कौसल्या सहित बालकों को बुलाने की व्यवस्था का वर्णन आता है। 

उसके बाद सधवा स्त्रियाँ मंगलगान करती हुई आती हैं और अपने - अपने रुचिकर वेश में सम्मिलित होती हैं। 

फिर यह पद आता है।


इस लिए इस पद को समझने के लिए केवल दो पंक्तियों का भावार्थ पर्याप्त नहीं है। 

इस के पीछे पूरा नामकरण - संस्कार, चारों बालकों का दिव्य बालरूप और उस अवसर का मंगलमय वातावरण समझना आवश्यक है।


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नामकरण - संस्कार की तैयारी ;


तुलसीदासजी के वर्णन में श्रीराम के जन्म के बाद अयोध्या में अनेक मंगलमय प्रसंग आते हैं।

जन्मोत्सव के पश्चात् बालकों के संस्कारों का क्रम आगे बढ़ता है।


गीतावली में नामकरण के प्रसंग से पहले तुलसीदासजी बताते हैं कि गृह, आँगन, चौहट, गली और बाजार सजाए गए। 

कलश, चँवर, तोरण, ध्वजा और वितान लगाए गए। 

सुन्दर चौक बनाए गए और मांगलिक सामग्री से वातावरण सजाया गया।


यह विवरण महत्वपूर्ण है।


क्योंकि नामकरण केवल नाम बोल देने की सामान्य पारिवारिक क्रिया नहीं, बल्कि वैदिक संस्कार-परम्परा से सम्बद्ध धार्मिक कर्म है।


इसी लिए गीतावली में इसके साथ वेद - विहित विधि, गुरु और ब्राह्मणों की उपस्थिति तथा मंगलाचार का उल्लेख आता है।


तुलसीदासजी का वर्णन यह बताता है कि यह पूरा आयोजन धार्मिक विधि और लोक - मंगल दोनों से जुड़ा हुआ है।


कुलगुरु वशिष्ठ और वेद - विहित विधि ;


गीतावली के इस क्रम में तुलसीदासजी कहते हैं कि चारों वेदों के ज्ञाता और रघुकुल के गुरु वशिष्ठजी विराजमान हुए।


फिर लोकरीति और वेद - विधि के अनुसार उन्होंने उचित व्यवस्था की और कौसल्या को बालक सहित बुलाने का संदेश दिया।


यहाँ तुलसीदासजी ने कोई काल्पनिक संवाद नहीं बनाया है।


वह सीधे संस्कार की धार्मिक व्यवस्था को सामने रखते हैं।


इस का विशेष महत्व है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि बालकों के नामकरण का प्रसंग गुरु, वेद - विधि और संस्कार - परम्परा के साथ जुड़ा हुआ है।


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मंगलमय स्त्रियों का आगमन ;


जब नामकरण का शुभ अवसर आया तो सधवा स्त्रियाँ मंगलगान करती हुई आईं।


गीतावली में आता है—


“सुनत सुआसिनि लै चली गावत बड़भागीं।”


अर्थात् मंगल का समाचार सुनकर सौभाग्यवती स्त्रियाँ बालकों को देखने और मंगल में सम्मिलित होने के लिए चलीं।


तुलसीदासजी इसके बाद अत्यन्त सुंदर बात कहते हैं—


“उमा-रमा, सारद-सची लखि सुति अनुरागी।”


अर्थात् उनका अनुराग ऐसा है मानो उमा, रमा, सरस्वती और शची आदि दिव्य स्त्रियाँ भी इस बालरूप को देखकर आकर्षित हों।


फिर—


“निज - निज रुचि बेष बिरचिकै हिलि-मिलि संग लागीं।”


अर्थात् वे अपनी - अपनी रुचि के अनुसार वेश धारण करके मिल - जुलकर मंगल में सम्मिलित हुईं।


यहाँ भी किसी अनजान व्यक्ति या काल्पनिक पात्र को जोड़ने की आवश्यकता नहीं है।


तुलसीदासजी का मूल पाठ स्वयं दृश्य प्रस्तुत कर रहा है।


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अब आता है आपका मुख्य पद ;


“चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनी सोहैं।”


चारु — सुन्दर, मनोहर।


चौक — मांगलिक संस्कार के लिए सजाया गया पवित्र स्थान।


भूप-भामिनी — राजा के परिवार की स्त्रियाँ, अर्थात् राजमहल की माताएँ/रानियाँ।


सोहैं — शोभायमान हो रही हैं।


अर्थ यह हुआ कि सुन्दर मांगलिक चौक में राजपरिवार की स्त्रियाँ बैठी हुई अत्यन्त शोभायमान हो रही हैं।


लेकिन तुलसीदासजी की दृष्टि केवल बाहरी सजावट पर नहीं रुकती।


अगली पंक्ति में वे उस दृश्य का वास्तविक केन्द्र बताते हैं—


“गोद मोद-मूरति लिए...”


माताओं की गोद में बालक हैं और वे बालक स्वयं आनन्द की मूर्ति हैं।


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“गोद मोद-मूरति” का गहरा अर्थ ;


यह पद इस पूरे प्रसंग का सबसे मधुर भाग है।


तुलसीदासजी ने यह नहीं कहा कि माताओं की गोद में केवल सुन्दर बच्चे हैं।


उन्होंने कहा—


“मोद-मूरति”।


अर्थात् आनन्द का साकार रूप।


श्रीराम का बालरूप तुलसीदासजी के लिए ऐसा स्वरूप है जिसमें दर्शन करने वाले को आनन्द प्राप्त होता है।


माता के लिए वह पुत्र है।


परिवार के लिए वह बालक है।


मुनियों के लिए वह दिव्य दर्शन का विषय है।


और भक्त के लिए वह स्वयं आराध्य भगवान् का बालस्वरूप है।


यही कारण है कि तुलसीदासजी की रामभक्ति में बालरूप अत्यन्त महत्वपूर्ण है।




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“सुकृती जन जोहैं” — पुण्यवान लोग दर्शन कर रहे हैं ;


इसके बाद तुलसीदासजी कहते हैं—


“सुकृती जन जोहैं।”


सुकृती अर्थात् पुण्यवान।


जोहैं अर्थात् निहारते हैं, देखते हैं।


अर्थात् उस दिव्य बालरूप को देखने वाले लोग स्वयं को सौभाग्यशाली मानने योग्य हैं।


यहाँ “देखना” सामान्य दृष्टि से देखने मात्र का अर्थ नहीं रखता।


भक्ति परम्परा में भगवान् का दर्शन स्वयं अनुग्रह का विषय माना जाता है।


इसलिए तुलसीदासजी के लिए यह दृश्य ऐसा है जिसमें केवल माताएँ ही आनन्दित नहीं हैं; जो लोग इस बालरूप को देख रहे हैं, वे भी धन्य हैं।


बालक कौन हैं?


इस नामकरण-संस्कार के प्रसंग में चार बालक हैं—


राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न।


नामकरण के बाद यही चार नाम रामकथा में स्थायी रूप से प्रसिद्ध होते हैं।


यहाँ एक बात विशेष रूप से समझनी चाहिए।


इस पद में तुलसीदासजी का मुख्य ध्यान चारों बालकों के नामों का दार्शनिक विश्लेषण करने से अधिक उनके बालरूप और नामकरण के मंगलमय वातावरण पर है।


इसलिए इस पद का मूल भाव है—


चारों बालक माताओं की गोद में हैं, संस्कार हो रहा है और सब लोग उस दृश्य का आनन्द ले रहे हैं।


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“सुख-सुखमा” — सुख का भी सौन्दर्य ;


अगली पंक्ति है—


“सुख-सुखमा, कौतुक कला देखि-सुनि मुनि मोहैं।”


यहाँ तुलसीदासजी उस दृश्य की सीमा और भी आगे बढ़ा देते हैं।


सुख की भी एक सुषमा है—एक विशेष शोभा।


और उस मंगलमय आयोजन की कौतुक-कला इतनी मनोहर है कि मुनिजन भी उसे देखकर और सुनकर मोहित हो जाते हैं।


यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है।


मुनि सामान्यतः संसार के विषयों से ऊपर उठे हुए माने जाते हैं।


किन्तु भगवान् के बालरूप का ऐसा माधुर्य है कि वह मुनियों के मन को भी आकर्षित करता है।


यहाँ “मोह” को सांसारिक आसक्ति के सामान्य अर्थ में नहीं लेना चाहिए।


यह भगवत्स्वरूप के माधुर्य से उत्पन्न विस्मय और आनन्द का काव्यात्मक वर्णन है।


“सो समाज कहैं बरनिकै”


इसके बाद तुलसीदासजी कहते हैं—


“सो समाज कहैं बरनिकै...”


अर्थात् उस पूरे समाज, सभा और मंगलमय दृश्य का वर्णन कौन कर सकता है?


यहाँ “समाज” का अर्थ केवल भीड़ नहीं है।


यहाँ उपस्थित हैं—


- गुरुजन,

- ब्राह्मण,

- माताएँ,

- मंगलगान करती स्त्रियाँ,

- बालक,

- सुकृती जन,

- और उस दिव्य अवसर का सम्पूर्ण मंगलमय वातावरण।


इस लिए तुलसीदासजी को लगता है कि इस दृश्य का पूर्ण वर्णन करना सामान्य कवि के लिए सम्भव नहीं।


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“ऐसे कवि को हैं?” — तुलसीदासजी की विनम्रता ;


अन्तिम चरण है—


“ऐसे कबि को हैं?”


अर्थात् ऐसा कवि कौन है जो इस दृश्य का सम्पूर्ण वर्णन कर सके?


यह तुलसीदासजी की विशेष काव्य-विनय है।


भगवान् के स्वरूप और लीला की महिमा अनन्त है और मनुष्य की वाणी सीमित।


इसलिए कवि कहता है कि वह उस दृश्य को जितना कह सकता है, कह रहा है; लेकिन उसकी सम्पूर्णता शब्दों में बाँधना कठिन है।


यह भावना तुलसीदासजी के सम्पूर्ण रामकाव्य में बार-बार दिखाई देती है।


नामकरण केवल उत्सव नहीं, संस्कार है ;


इस पूरे प्रसंग को केवल राजमहल के उत्सव के रूप में समझना अधूरा होगा।


यह संस्कार है।


वेद-विहित विधि का उल्लेख है।


गुरु वशिष्ठ की उपस्थिति है।


मंगलाचार है।


बालकों का नामकरण है।


और उसी के साथ भगवान् के बालरूप का दर्शन है।


अर्थात् यहाँ धर्म और प्रेम, दोनों एक साथ हैं।


संस्कार धर्म की व्यवस्था देता है और मातृस्नेह उस संस्कार में जीवन का माधुर्य भरता है।


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नामों में छिपा मंगल ;


नामकरण के बाद चारों भाइयों के नाम प्रसिद्ध होते हैं—


राम ;


राम नाम भारतीय भक्ति परम्परा में स्वयं मंगल का आधार है।


तुलसीदासजी के लिए राम केवल दशरथ - पुत्र नहीं हैं। 

वे परम आराध्य हैं।


भरत ;


भरत नाम आगे चलकर भ्रातृप्रेम, त्याग और रामनिष्ठा से जुड़ता है।


लक्ष्मण ;


लक्ष्मण श्रीराम के अनन्य अनुज और सेवाभाव के आदर्श रूप में सामने आते हैं।


शत्रुघ्न :


शत्रुघ्न नाम ही उसके अर्थ की ओर संकेत करता है—

शत्रुओं का नाश करने वाला।


लेकिन नामकरण के समय ये चारों अभी बालक हैं।


इस लिए तुलसीदासजी का यह पद हमें सबसे पहले उनके बालरूप का दर्शन कराता है।


गीतावली और रामकथा का प्रमाण ;


यहाँ यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि गीतावली को अलग - थलग पढ़ने के बजाय तुलसीदासजी के सम्पूर्ण रामकाव्य की परम्परा में पढ़ना चाहिए।


श्रीरामचरितमानस में भी श्रीराम के जन्म और बालरूप का विस्तार मिलता है।


बालकाण्ड में रामजन्म के समय मंगल, देवताओं का आनन्द, पुष्पवर्षा और अयोध्या की प्रसन्नता का वर्णन है। 

तुलसीदासजी की रामभक्ति में राम का जन्म स्वयं मंगल और आनन्द का उदय है।


गीतावली उसी रामकथा को अधिक गीतात्मक और भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत करती है।


इसलिए यहाँ अलग से काल्पनिक कहानी बनाने की कोई आवश्यकता नहीं।


मूल ग्रन्थ में ही पर्याप्त सामग्री है।


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इस पद का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश ;


इस पद का सार केवल यह नहीं है कि “रानियाँ सुन्दर चौक में बैठी थीं।”


इसके भीतर एक गहरा भक्तिभाव है।


भगवान् का बालरूप स्वयं आनन्द का स्रोत है।


माता की गोद में बैठा बालक सामान्य दृष्टि से छोटा है, पर भक्त की दृष्टि में वही परम आनन्द का केन्द्र है।


इसलिए—


“गोद मोद-मूरति लिए”


रामभक्ति की अत्यन्त मधुर अभिव्यक्ति है।


माता उन्हें गोद में धारण करती है।


और भक्त अपने हृदय में।


माता के लिए राम पुत्र हैं।


भक्त के लिए राम आराध्य हैं।


और तुलसीदासजी के लिए दोनों भाव एक साथ मिल जाते हैं।


संपूर्ण प्रसंग का क्रम ;


अब पूरे प्रसंग को क्रम से देखें तो चित्र स्पष्ट हो जाता है—


पहले मंगल की तैयारी होती है।


घर, आँगन और मार्ग सजते हैं।


सुन्दर चौक बनाए जाते हैं।


कलश, तोरण, ध्वजा और अन्य मंगल-सज्जा होती है।


चारों वेदों के ज्ञाता कुलगुरु वशिष्ठजी विराजते हैं।


वेद-विहित और लोकरीति के अनुसार संस्कार की व्यवस्था होती है।


कौसल्या को बालक सहित बुलाया जाता है।


मंगलगान करती हुई सधवा स्त्रियाँ आती हैं।


वे अपने-अपने रुचिकर वेश में सम्मिलित होती हैं।


फिर माताएँ सुन्दर चौक में बैठती हैं।


उनकी गोद में चारों बालक हैं।


वे बालक स्वयं आनन्द की मूर्ति हैं।


सुकृती जन उन्हें निहारते हैं।


उस दृश्य को देखकर मुनिजन भी मोहित होते हैं।


और तुलसीदासजी कहते हैं—


ऐसे अद्भुत समाज का पूर्ण वर्णन करने वाला कवि भला कौन है?


इसके बाद संस्कार की अगली क्रियाएँ आती हैं और बालकों के नामकरण का क्रम आगे बढ़ता है। 

उपलब्ध पाठ में इसके बाद वशिष्ठजी द्वारा रक्षा-ऋचाओं के पाठ और फिर “राम” नाम के उद्घोष का वर्णन भी आता है।


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एक महत्वपूर्ण पाठ-सुधार ;


आपके द्वारा दिया गया पाठ—


“चारू चौक बैठत भई भूप भामिनी सोहै।

गोद मोद मूरति लिए सुकृती जन जोहै।”


भाव की दृष्टि से ठीक है, लेकिन उपलब्ध पाठों में शब्दरूप कुछ इस प्रकार भी मिलता है—


“चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनी सोहैं।

गोद मोद-मूरति लिए, सुकृती जन जोहैं॥”


और उसके साथ पूरा अगला पद है—


“सुख-सुखमा, कौतुक कला देखि-सुनि मुनि मोहैं।

सो समाज कहैं बरनिकै, ऐसे कबि को हैं?॥”


इस लिए यदि आप इसे अपने फेसबुक पोस्ट या ब्लॉग में प्रकाशित कर रहे हैं, तो अपनी मुद्रित गीतावली की प्रति के पाठ को प्राथमिकता दें, क्योंकि विभिन्न संस्करणों में मात्रा, वर्तनी और पद-संख्या में छोटे पाठभेद मिलते हैं।


निष्कर्ष ;


“चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनी सोहैं” कोई स्वतंत्र काल्पनिक कहानी नहीं है।


यह गोस्वामी तुलसीदासजी की गीतावली के बालकाण्ड में श्रीराम और उनके भाइयों के नामकरण-संस्कार से जुड़ा हुआ पद है।


इसमें—


सुन्दर मांगलिक चौक है,

राजपरिवार की माताएँ हैं,

उनकी गोद में चारों बालक हैं,

बालक आनन्द की मूर्ति हैं,

पुण्यवान जन दर्शन कर रहे हैं,

मुनिजन उस दिव्य कौतुक को देखकर मोहित हैं,

और कवि स्वयं उस दृश्य को पूर्णतः वर्णित करने में अपनी वाणी को असमर्थ अनुभव करता है।


यही इस पद की वास्तविक आत्मा है।


तुलसीदासजी का मूल पद ही पर्याप्त प्रमाण है।


और उस पद के पीछे जो धार्मिक आधार है, वह है—


वेद-विहित संस्कार, गुरु-परम्परा, नामकरण, मातृस्नेह और श्रीराम के दिव्य बालरूप का दर्शन।


अन्ततः तुलसीदासजी के शब्दों में यही भाव रह जाता है—


गोद में बालक नहीं,

गोद में आनन्द की मूर्ति है।


दर्शन करने वाले केवल दर्शक नहीं,

वे सुकृती हैं।


मुनि केवल देखने वाले नहीं,

वे भी उस बालमाधुर्य से मोहित हैं।


और उस सम्पूर्ण दृश्य का वर्णन करने वाला कवि भी अपनी वाणी की सीमा स्वीकार करता है—


“सो समाज कहैं बरनिकै, ऐसे कबि को हैं?”


🌹 श्रीरामचन्द्रजी के बालरूप को बारम्बार प्रणाम। 🌹


॥ श्रीरामार्पणमस्तु ॥

॥ जय श्रीराम ॥


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