सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
🌹 *जय श्री राम*🌹
*गीतावली रामायण*
*चारू चौक बैठत भई भूप भामिनी सोहै।*
*गोद मोद मूरति लिए सुकृती जन जोहै।।*
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*भावार्थ*👉श्री तुलसीदास जी कहते है कि सुन्दर चौको में बैठी हुई रानियाँ गोद में आनन्द मूर्ति बालकों को लिए अति शोभायमान हो २ही है पु०यवान लोग उन्हें देख रहे है।।
।।१४।।
*जय श्री कृष्ण.......*
*जय जय श्री सीताराम*
*जय जय श्री राधे*
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|| गीता में जाति का वर्णन ||
जन्मना मन्यते जातिः कर्मणा मन्यते कृतिः ।
तस्मात् स्वकीयकर्तव्यं पालनीयं प्रयत्नतः ।।
ऊँच-नीच योनियों में जितने भी शरीर मिलते हैं, वे सब गुण और कर्म के अनुसार ही मिलते हैं।
गुण और कर्म के अनुसार ही मनुष्य का जन्म होता है।
भगवान् ने गीता में कहा है कि प्राणियों के गुणों और कर्मों के अनुसार ही मैंने चारों वर्णों- ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ) की रचना की है-
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः
अतः गीता जन्म- ( उत्पत्ति ) से ही जाति मानती है अर्थात् जो मनुष्य जिस वर्ण में जिस जाति के माता - पिता से पैदा हुआ है, उसी से उसकी जाति मानी जाती है, जाति’ शब्द जनी प्रादुर्भावे’ धातु से बनता है, इस लिए जन्म से ही जाति मानी जाती है, कर्म से नहीं।
कर्म से तो कृति’ होती है,जो कृ धातु से बनती है।
परंतु जाति की पूर्ण रक्षा उसके अनुसार कर्तव्य कर्म करने से ही होती है।
भगवान् ने जन्म के अऩुसार ही
कर्मों का विभाग किया है।
मनुष्य जिस वर्ण- ( जाति ) में जन्मा है और शास्त्रों ने उस वर्ण के लिए जिन कर्मों का विधान किया है, वे कर्म उस वर्ण के लिए ‘स्वधर्म’ हैं और उन्हीं कर्मों का जिस वर्ण के लिए निषेध किया है, उस वर्ण के लिए वे कर्म परधर्म’ हैं।
जैसे, यज्ञ कराना, दान लेना आदि कर्म ब्राह्मण के लिए शास्त्र की आज्ञा होने से ‘स्वधर्म’ हैं परंतु वे ही कर्म क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के लिए शास्त्र का निषेध होने से ‘परधर्म’ हैं।
स्वधर्म का पालन करते हुए यदि मनुष्य मर जाय, तो भी उसका कल्याण ही होता है परंतु पर धर्म दूसरों के कर्तव्य कर्म का आचरण जन्म मृत्यु रूप भय को देने वाला है।
अर्जुन क्षत्रिय थे अतः युद्ध करना उनका स्वधर्म है।
इस लिए भगवान् उनके लिए बड़े स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि क्षत्रिय के लिए सिवाय युद्ध और कोई कल्याणकारक काम नहीं है अगर तू इस धर्ममय युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति का त्याग करके पाप को प्राप्त होगा भगवान् ने गीता में अपने - अपने वर्ण के अनुसार कर्तव्य - कर्म करने पर बहुत जोर देकर कहा है कि निष्कामभाव से अपने - अपने कर्तव्य कर्म में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेता है;
अपने कर्मों के द्वारा परमात्मा का पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
परमात्मा का पूजन पवित्र वस्तु से
होता है, अपवित्र वस्तु से नहीं।
अपना कर्म ही पवित्र वस्तु है और दूसरों का कर्म अपने लिए ( निषिद्ध होने से ) अपवित्र वस्तु है।
अतः अपने कर्म से परमात्मा का पूजन करने से ही कल्याण होता है और दूसरों के कर्म से पतन होता है।
अपने कर्म ( स्वकर्म ) को भगवान् ने ‘सहज कर्म’ कहा है।
सहज कर्म का अर्थ है-
साथ में पैदा हुआ।
जैसे, कोई क्षत्रिय के घर में पैदा हुआ तो क्षत्रिय के कर्म भी उसके साथ ही पैदा हो गये।
अतः क्षत्रिय के कर्म उसके लिए सहज कर्म हैं।
भगवान् ने भी चारों वर्णों के सहज, स्वभावज कर्मों का विधान किया है।
इन स्वभावज कर्मों को करता हुआ मनुष्य पाप का भागी नहीं होता।
जैसे, स्वतः प्राप्त हुए न्याययुक्त युद्ध में मनुष्यों की हत्या होती है, पर शास्त्रविहित सजह कर्म होने से क्षत्रिय को पाप नहीं लगता।
मनुष्य जिस जाति में पैदा हुआ है, उसके अनुसार शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म करने से उस जाति की रक्षा हो जाती है और विपरीत कर्म करने से उस जाति में कर्म संकर होकर वर्णसंकर पैदा हो जाता है।
भगवान् ने भी अपने लिए कहा है कि यदि मैं अपने वर्ण के अनुसार कर्तव्य का पालन न करूँ तो मैं वर्णसंकर पैदा करने वाला तथा संपूर्ण प्रजा का नाश ( पतन ) करने वाला बनूँ।
अतः जो मनुष्य अपने वर्ण के अनुसार कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इंद्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला और पापमय जीवन बिताने वाला मनुष्य संसार में व्यर्थ ही जीता है।
सभी मनुष्यों को चाहिए कि वे अपने - अपने कर्तव्य कर्मों के द्वारा अपनी जाति की रक्षा करें।
इस के लिए पाँच बातों का ख्याल रखना जरूरी है-
1-विवाह-
कन्या को लेना और देना अपनी जाति में ही होना चाहिए क्योंकि दूसरी जाति की कन्या लेने से रज - वीर्य की विकृति के कारण उनकी संतानों में विकृति ( वर्णसंकरता ) आयेगी।
विकृत संतानों में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा नहीं होगी।
श्रद्धा न होने से वे उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध- तर्पण नहीं करेंगे, उनको पिंड पानी नहीं देंगे।
कभी लोक - लज्जा में आकर दे भी देंगे, तो भी वह श्राद्ध तर्पण, पिंड पानी पितरों को मिलेगा नहीं।
इस से पितर लोग अपने स्थान से गिर जाएंगे।
गीता कहती है कि जो शास्त्र विधि को छोड़कर मनमाने ढंग से कर्म करता है, उसे न तो अंतः करण की शुद्धिरूप सिद्धि मिलती है न सुख मिलता है और न परमगति की प्राप्ति ही होती है।
अतः मनुष्य को कर्तव्य अकर्तव्य के विषय में शास्त्र को ही सामने रखना चाहिए।
2- भोजन-
भोजन भी अपनी जाति के अनुसार ही होना चाहिए।
जैसे ब्राह्मण के लिए लहसुन, प्याज खाना दोष है परंतु शूद्र के लिए लहसुन, प्याज खाना दोष नहीं है।
यदि हम दूसरी जाति वाले के साथ भोजन करेंगे तो अपनी शुद्धि तो उनमें जाएगी नहीं, पर उनकी अशुद्धि अपने में जरूर आ जाएगी।
अतः मनुष्य को अपनी जाति के अनुसार ही भोजन करना चाहिए।
3-वेशभूषा-
पाश्चात्य देश का अनुकरण करने से आज अपनी जाति की वेशभूषा प्रायः भ्रष्ट हो गयी है।
प्रायः सभी जातियों की वेशभूषा में दोष आ गया है, जिससे ‘कौन किस जाति का है’-
इस का पता ही नहीं लगता।
अतः मनुष्य को अपनी जाति के अनुसार ही वेशभूषा रखनी चाहिए।
4. भाषा-
अन्य भाषाओं को, लिपियों को सीखना दोष नहीं है, पर उनके अनुसार स्वयं भी बन जाना बड़ा भारी दोष है।
जैसे अंग्रेज़ी सीखकर अपनी वेशभूषा, खान - पान, रहन - सहन अंग्रेजों का ही बना लेना उस भाषा को लेना नहीं है, प्रत्युत अपने - आपको खो देना है।
अपनी वेशभूषा, खान- पान, रहन - सहन वैसे का वैसा रखते हुए ही अंग्रेजी सीखना अंग्रेजी भाषा एवं लिपि को लेना है।
अतः अन्य भाषाओं का ज्ञान होने पर भी बोलचाल अपनी भाषा में ही होनी चाहिए।
5- व्यवसाय-
व्यवसाय ( काम - धंधा ) भी अपनी जाति के अनुसार ही होना चाहिए।
गीता ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए अलग - अलग कर्मों का विधान किया है।
|| जय श्री कृष्ण जी ||
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(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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