सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
🌹 *जय श्री राम*🌹
*गीतावली रामायण*
गङ्गाधरं शशिकिशोरधरं त्रिलोकी -
रक्षाधरं निटिलचन्द्रधरं त्रिधारम्।
भस्मावधूलनधरं गिरिराजकन्या -
दिव्यावलोकनधरं वरदं प्रपद्ये।।
काशीश्वरं सकलभक्तजनार्तिहारं
विश्वेश्वरं प्रतिपालनभव्यभारम्।
रामेश्वरं विजयदानविधानधीरं
गौरीश्वरं वरदहस्तधरं नमाम:।।
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गंगा एवं बालचन्द्र को धारण करने वाले, त्रिलोकी की रक्षा करने वाले, मस्तक पर चन्द्रमा एवं त्रिधार ( गंगा)- को धारण करने वाले, भस्भ का उद्धूलन धारण करने वाले तथा पार्वती को दिव्य दृष्टि से देखने वाले, वरदाता भगवान् शंकर की मैं शरण में हूं।
काशी के ईश्वर, सम्पूर्ण भक्तजन की पीड़ा को दूर करने वाले,प्रणतजनों की रक्षा का भव्य भार धारण करने वाले,भगवान् राम के ईश्वर, विजय प्रदान के विधान में धीर एवं वरद मुद्रा धारण करने वाले, भगवान् गौरीश्वर को हम प्रणाम करते हैं।
|| ॐ नमः शिवाय ||
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*चारू चौक बैठत भई भूप भामिनी सोहै।*
*गोद मोद मूरति लिए सुकृती जन जोहै।।*
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*भावार्थ*👉श्री तुलसीदास जी कहते है कि सुन्दर चौको में बैठी हुई रानियाँ गोद में आनन्द मूर्ति बालकों को लिए अति शोभायमान हो २ही है पु०यवान लोग उन्हें देख रहे है।।
।।१४।।
*जय श्री कृष्ण.......*
*जय जय श्री सीताराम*
*जय जय श्री राधे*
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|| गीता में जाति का वर्णन ||
जन्मना मन्यते जातिः कर्मणा मन्यते कृतिः ।
तस्मात् स्वकीयकर्तव्यं पालनीयं प्रयत्नतः ।।
ऊँच-नीच योनियों में जितने भी शरीर मिलते हैं, वे सब गुण और कर्म के अनुसार ही मिलते हैं।
गुण और कर्म के अनुसार ही मनुष्य का जन्म होता है।
भगवान् ने गीता में कहा है कि प्राणियों के गुणों और कर्मों के अनुसार ही मैंने चारों वर्णों- ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ) की रचना की है-
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चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः
अतः गीता जन्म- ( उत्पत्ति ) से ही जाति मानती है अर्थात् जो मनुष्य जिस वर्ण में जिस जाति के माता - पिता से पैदा हुआ है, उसी से उसकी जाति मानी जाती है, जाति’ शब्द जनी प्रादुर्भावे’ धातु से बनता है, इस लिए जन्म से ही जाति मानी जाती है, कर्म से नहीं।
कर्म से तो कृति’ होती है,जो कृ धातु से बनती है।
परंतु जाति की पूर्ण रक्षा उसके अनुसार कर्तव्य कर्म करने से ही होती है।
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भगवान् ने जन्म के अऩुसार ही कर्मों का विभाग किया है।
मनुष्य जिस वर्ण- ( जाति ) में जन्मा है और शास्त्रों ने उस वर्ण के लिए जिन कर्मों का विधान किया है, वे कर्म उस वर्ण के लिए ‘स्वधर्म’ हैं और उन्हीं कर्मों का जिस वर्ण के लिए निषेध किया है, उस वर्ण के लिए वे कर्म परधर्म’ हैं।
जैसे, यज्ञ कराना, दान लेना आदि कर्म ब्राह्मण के लिए शास्त्र की आज्ञा होने से ‘स्वधर्म’ हैं परंतु वे ही कर्म क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के लिए शास्त्र का निषेध होने से ‘परधर्म’ हैं।
स्वधर्म का पालन करते हुए यदि मनुष्य मर जाय, तो भी उसका कल्याण ही होता है परंतु पर धर्म दूसरों के कर्तव्य कर्म का आचरण जन्म मृत्यु रूप भय को देने वाला है।
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अर्जुन क्षत्रिय थे अतः युद्ध करना उनका स्वधर्म है।
इस लिए भगवान् उनके लिए बड़े स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि क्षत्रिय के लिए सिवाय युद्ध और कोई कल्याणकारक काम नहीं है अगर तू इस धर्ममय युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति का त्याग करके पाप को प्राप्त होगा भगवान् ने गीता में अपने - अपने वर्ण के अनुसार कर्तव्य - कर्म करने पर बहुत जोर देकर कहा है कि निष्कामभाव से अपने - अपने कर्तव्य कर्म में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेता है;
अपने कर्मों के द्वारा परमात्मा का पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
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परमात्मा का पूजन पवित्र वस्तु से
होता है, अपवित्र वस्तु से नहीं।
अपना कर्म ही पवित्र वस्तु है और दूसरों का कर्म अपने लिए ( निषिद्ध होने से ) अपवित्र वस्तु है।
अतः अपने कर्म से परमात्मा का पूजन करने से ही कल्याण होता है और दूसरों के कर्म से पतन होता है।
अपने कर्म ( स्वकर्म ) को भगवान् ने ‘सहज कर्म’ कहा है।
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सहज कर्म का अर्थ है-
साथ में पैदा हुआ।
जैसे, कोई क्षत्रिय के घर में पैदा हुआ तो क्षत्रिय के कर्म भी उसके साथ ही पैदा हो गये।
अतः क्षत्रिय के कर्म उसके लिए सहज कर्म हैं।
भगवान् ने भी चारों वर्णों के सहज, स्वभावज कर्मों का विधान किया है।
इन स्वभावज कर्मों को करता हुआ मनुष्य पाप का भागी नहीं होता।
जैसे, स्वतः प्राप्त हुए न्याययुक्त युद्ध में मनुष्यों की हत्या होती है, पर शास्त्रविहित सजह कर्म होने से क्षत्रिय को पाप नहीं लगता।
मनुष्य जिस जाति में पैदा हुआ है, उसके अनुसार शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म करने से उस जाति की रक्षा हो जाती है और विपरीत कर्म करने से उस जाति में कर्म संकर होकर वर्णसंकर पैदा हो जाता है।
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भगवान् ने भी अपने लिए कहा है कि यदि मैं अपने वर्ण के अनुसार कर्तव्य का पालन न करूँ तो मैं वर्णसंकर पैदा करने वाला तथा संपूर्ण प्रजा का नाश ( पतन ) करने वाला बनूँ।
अतः जो मनुष्य अपने वर्ण के अनुसार कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इंद्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला और पापमय जीवन बिताने वाला मनुष्य संसार में व्यर्थ ही जीता है।
सभी मनुष्यों को चाहिए कि वे अपने - अपने कर्तव्य कर्मों के द्वारा अपनी जाति की रक्षा करें।
इस के लिए पाँच बातों का ख्याल रखना जरूरी है-
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1-विवाह-
कन्या को लेना और देना अपनी जाति में ही होना चाहिए क्योंकि दूसरी जाति की कन्या लेने से रज - वीर्य की विकृति के कारण उनकी संतानों में विकृति ( वर्णसंकरता ) आयेगी।
विकृत संतानों में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा नहीं होगी।
श्रद्धा न होने से वे उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध- तर्पण नहीं करेंगे, उनको पिंड पानी नहीं देंगे।
कभी लोक - लज्जा में आकर दे भी देंगे, तो भी वह श्राद्ध तर्पण, पिंड पानी पितरों को मिलेगा नहीं।
इस से पितर लोग अपने स्थान से गिर जाएंगे।
गीता कहती है कि जो शास्त्र विधि को छोड़कर मनमाने ढंग से कर्म करता है, उसे न तो अंतः करण की शुद्धिरूप सिद्धि मिलती है न सुख मिलता है और न परमगति की प्राप्ति ही होती है।
अतः मनुष्य को कर्तव्य अकर्तव्य के विषय में शास्त्र को ही सामने रखना चाहिए।
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2- भोजन-
भोजन भी अपनी जाति के अनुसार ही होना चाहिए।
जैसे ब्राह्मण के लिए लहसुन, प्याज खाना दोष है परंतु शूद्र के लिए लहसुन, प्याज खाना दोष नहीं है।
यदि हम दूसरी जाति वाले के साथ भोजन करेंगे तो अपनी शुद्धि तो उनमें जाएगी नहीं, पर उनकी अशुद्धि अपने में जरूर आ जाएगी।
अतः मनुष्य को अपनी जाति के अनुसार ही भोजन करना चाहिए।
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3-वेशभूषा-
पाश्चात्य देश का अनुकरण करने से आज अपनी जाति की वेशभूषा प्रायः भ्रष्ट हो गयी है।
प्रायः सभी जातियों की वेशभूषा में दोष आ गया है, जिससे ‘कौन किस जाति का है’-
इस का पता ही नहीं लगता।
अतः मनुष्य को अपनी जाति के अनुसार ही वेशभूषा रखनी चाहिए।
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4. भाषा-
अन्य भाषाओं को, लिपियों को सीखना दोष नहीं है, पर उनके अनुसार स्वयं भी बन जाना बड़ा भारी दोष है।
जैसे अंग्रेज़ी सीखकर अपनी वेशभूषा, खान - पान, रहन - सहन अंग्रेजों का ही बना लेना उस भाषा को लेना नहीं है, प्रत्युत अपने - आपको खो देना है।
अपनी वेशभूषा, खान- पान, रहन - सहन वैसे का वैसा रखते हुए ही अंग्रेजी सीखना अंग्रेजी भाषा एवं लिपि को लेना है।
अतः अन्य भाषाओं का ज्ञान होने पर भी बोलचाल अपनी भाषा में ही होनी चाहिए।
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5- व्यवसाय-
व्यवसाय ( काम - धंधा ) भी अपनी जाति के अनुसार ही होना चाहिए।
गीता ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए अलग - अलग कर्मों का विधान किया है।
|| जय श्री कृष्ण जी ||
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गार्गी वाचकनवी जीवन भर ब्रह्मचारी रहीं और हिंदुओं द्वारा पूजनीय!
वैदिक काल में ही वे वेदों और उपनिषदों की ज्ञाता, बिहार के मिथिला क्षेत्र के मधुबनी जिले में बेनीपट्टी शहर के पास उच्चैठ भगवती मंदिर के परिसर में गार्गी की मूर्ति।
गार्गी वाचक्नवी ( संस्कृत: गार्गी वाचक्नवी ( देवनागरी ) गार्गी वाचक्नवी एक प्राचीन हिंदू ऋषि और दार्शनिक थीं )।
वैदिक साहित्य में,उन्हें एक महान प्राकृतिक दार्शनिक,वेदों की प्रसिद्ध व्याख्याकार,और ब्रह्म विद्या के ज्ञान से परिपूर्ण ब्रह्मवादिनी के रूप में सम्मानित किया जाता है ।
बृहदारण्यक उपनिषद के छठे और आठवें ब्राह्मण में उनका नाम प्रमुखता से मिलता है,क्योंकि वे विदेह के राजा जनक द्वारा आयोजित एक दार्शनिक वाद - विवाद,ब्रह्म यज्ञ में भाग लेती हैं, जिसके दौरान वे आत्मा के मुद्दे पर जटिल प्रश्नों के साथ ऋषि याज्ञवल्क्य को चुनौती देती हैं ।
वे जीवन भर ब्रह्मचारी रहीं और हिंदुओं द्वारा पूजनीय थीं ।
गार्गी, जो ऋषि गार्ग के वंश से थीं और ऋषि वाचकनु की पुत्री थीं।
उनके पिता के नाम पर गार्गी वाचकनावी रखा गया था।
कम उम्र से ही उन्होंने वैदिक ग्रंथों में गहरी रुचि दिखाई और दर्शनशास्त्र में अत्यंत निपुणता प्राप्त की ।
वैदिक काल में ही वे वेदों और उपनिषदों की ज्ञाता बन गईं और अन्य दार्शनिकों के साथ बौद्धिक वाद - विवाद करती थीं।
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बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार,विदेह राज्य के राजा जनक ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया और भारत के सभी ऋषियों, राजाओं और राजकुमारों को इसमें भाग लेने के लिए आमंत्रित किया।
यज्ञ कई दिनों तक चला और आध्यात्मिक पवित्रता और सुगंध का वातावरण बनाने के लिए यज्ञ की अग्नि में चंदन, घी और जौ की प्रचुर मात्रा में अर्पण किया गया।
स्वयं एक विद्वान जनक,ऋषियों की विशाल सभा से प्रभावित हुए और उनमें से उस विद्वान को खोजना चाहते थे जिसे ब्रह्म का सबसे अधिक ज्ञान हो ।
उन्होंने घोषणा की कि वे इस विद्वान को 10 ग्राम सोने से लदी 1000 गायों का पुरस्कार देंगे।
उपस्थित विद्वानों में याज्ञवल्क्य और गार्गी वाचकनवी शामिल थे।
याज्ञवल्क्य कुंडलिनी योग में अपनी निपुणता के कारण स्वयं को उपस्थित लोगों में सबसे उन्नत मानते थे और उन्होंने अपने शिष्य संश्रव को गायों के झुंड को अपने घर ले जाने का आदेश दिया।
इस से पहले कि वह ऐसा कर पाता, वाचक्नवी सहित आठ ऋषियों ने उसे वाद - विवाद के लिए चुनौती दी।
श्याम रंगनाथन बताते हैं कि संवाद के दौरान गार्गी एकमात्र वार्ताकार थीं जिन्होंने याज्ञवल्क्य को दो बार चुनौती दी।
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अश्वला,जनक के पुरोहित, आर्तभाग, भुज्यु ,उषास्ता और उद्दालक जैसे ऋषियों ने याज्ञवल्क्य से वाद - विवाद किया और हार गए।
तब गार्गी की बारी आई।
गार्गी ने याज्ञवल्क्य से विद्वानों में उनकी श्रेष्ठता के दावे पर सवाल उठाया और उन्होंने उनसे वाद - विवाद शुरू कर दिया।
गार्गी और याज्ञवल्क्य का संवाद वास्तविकता के परम "ताना" पर केंद्रित था ( "ताना" का अर्थ है "किसी संरचना या इकाई का मूल आधार या पदार्थ" )।
याज्ञवल्क्य के साथ उनके प्रारंभिक संवाद में आत्मा की अनंत स्थिति जैसे आध्यात्मिक प्रश्न उठाए गए।
फिर उन्होंने उनसे पूछा, "चूंकि यह सारा संसार जल पर आगे - पीछे बुना हुआ है, तो फिर यह किस पर आगे-पीछे बुना हुआ है?"
यह प्रश्न उस सामान्य रूप से ज्ञात ब्रह्मांडीय रूपक को संबोधित करता है जो संसार की आवश्यक अंतर्संबंधता को व्यक्त करता है।
बृहदारण्यक उपनिषद ( 3.6 ) में, वह याज्ञवल्क्य से कई प्रश्न पूछती हैं जिनका उत्तर इस प्रकार दिया गया है:-
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गार्गी, वायु पर।तो फिर वायु किस पर आगे - पीछे बुनी जाती है?
गार्गी, मध्यवर्ती लोकों पर।
तो फिर मध्यवर्ती लोकों के संसार किस पर आगे - पीछे बुने जाते हैं ?
गार्गी, गंधर्वों के लोकों पर।
उसने आगे और भी प्रश्न पूछे,जैसे कि सूर्यों का ब्रह्मांड क्या है , चंद्रमा क्या है,तारे क्या हैं , देवता क्या हैं, इंद्र क्या हैं और प्रजापति क्या हैं ।
गार्गी ने तब याज्ञवल्क्य से वास्तविकता के ताने - बाने के बारे में उसे ज्ञान देने का आग्रह किया और पूछा:-
हे याज्ञवल्क्य, वह क्या है जो आकाश के ऊपर है, जो पृथ्वी के नीचे है, जो इन दोनों के बीच है, आकाश और पृथ्वी के बीच, जिसे लोग भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल कहते हैं -
उस सब के पार जो बुना हुआ है, ताना - बाना?
याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, अंतरिक्ष।
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गार्गी असंतुष्ट होकर अगला प्रश्न पूछी:-
तो फिर, हे प्रार्थना,अंतरिक्ष किस पर बुना गया है?
याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया:-
हे गार्गी, यदि कोई इस संसार में हजारों वर्षों तक यज्ञ, उपासना और तपस्या करे, परन्तु उस अविनाशी को जाने बिना, तो उसका कर्म भी सीमित है।
हे गार्गी, इस अविनाशी के पार ही अदृश्य अंतरिक्ष बुना गया है।
फिर उसने अंतिम प्रश्न पूछा कि ब्रह्म ( अविनाशी जगत ) क्या है।
याज्ञवल्क्य ने गार्गी को आगे न बढ़ने के लिए कहकर बहस समाप्त कर दी, कहीं ऐसा न हो कि वह अपना मानसिक संतुलन खो दे।
इस प्रकार उनकी बहस समाप्त हुई, और उसने याज्ञवल्क्य के श्रेष्ठ ज्ञान को स्वीकार करते हुए कहा:-
आदरणीय ब्राह्मणों, यदि आप उनके समक्ष नतमस्तक हो जाएं तो इसे एक महान कार्य समझें।
मेरा मानना है कि ब्रह्म से संबंधित किसी भी तर्क में कोई भी उन्हें पराजित नहीं कर सकता।
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उनके दार्शनिक विचारों का उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद में भी किया गया है ।
गार्गी को मिथिला के राजा जनक के दरबार में नवरत्नों ( नौ रत्नों ) में से एक के रूप में सम्मानित किया गया था ।
ब्रह्म विद्या के ज्ञान के कारण उन्हें 'ब्रह्मवादिनी' के रूप में मान्यता प्राप्त थी।
प्राचीन भारत की महिला संतों और बुद्धिजीवियों के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक हैं।
|| ब्रह्मचारी गार्गी ||
|| जय श्री कृष्ण जी ||
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