।। श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन - महात्माकी दुर्लभताका कारण ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन ।।

।। श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन - महात्माकी दुर्लभताका कारण ।। 

*‼️राम कृपा ही केवलम्‼️*

❗महात्माकी दुर्लभताका कारण❗

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 7, श्लोक 19

           स महात्मा सुदुर्लभ:--

 गीता ७.१९

        सुदुर्लभ:--  विचारकर देखो भगवान सबमें हैं, 

इसलिए सुलभ हैं  परन्तु महात्मा दुर्लभ है ।

 भगवान् दुर्लभ नहीं हैं ।




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सरल अर्थ:

अनेक जन्मों के अंत में ज्ञानवान पुरुष मुझे तत्त्वतः जानकर मेरी शरण में आता है और यह अनुभव करता है कि “वासुदेव ही सब कुछ हैं।” ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।

यह श्लोक महात्मा की दुर्लभता को समझने के लिए गीता का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है। 

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने महात्मा की पहचान किसी बाहरी रूप, पद, प्रसिद्धि अथवा केवल धार्मिक कर्म से नहीं बताई, बल्कि ज्ञान, शरणागति और परमात्मा की सर्वव्यापकता के बोध से बताई है।

“बहूनां जन्मनामन्ते” — 

अनेक जन्मों के अंत में भगवान का पहला शब्द ही महात्मा की दुर्लभता का संकेत देता है—

“बहूनां जन्मनामन्ते”।

अर्थात आत्मज्ञान की परिपक्वता कोई सामान्य अथवा अचानक प्राप्त होने वाली अवस्था नहीं है। 

मनुष्य अनेक प्रकार के अनुभवों, कर्मों, संस्कारों और साधनाओं से गुजरता हुआ धीरे-धीरे उस स्थिति तक पहुँचता है जहाँ उसकी बुद्धि संसार के अस्थायी आकर्षणों से ऊपर उठकर परम सत्य की खोज करती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने पूर्वजन्मों का ज्ञान होना आवश्यक है। 

गीता का आध्यात्मिक संदेश यह है कि परमात्मतत्त्व का पूर्ण बोध अत्यंत परिपक्व चेतना की अवस्था है।

मनुष्य पहले संसार में सुख खोजता है, फिर सुख की अस्थिरता को समझता है; कर्म करता है, कर्मफल का अनुभव करता है; इच्छाओं की पूर्ति करता है, फिर नई इच्छाओं का जन्म देखता है। 

धीरे-धीरे उसके भीतर प्रश्न उठता है—

 मनुष्याणां   सहस्रेषु  कश्चिद्यतति    सिद्धये।
 यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।                                           
गीता ७. ३ 

     'हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है।'

       तत्त्वरूपसे हैं भगवान, इसलिए सुलभ हैं । 

परन्तु पहचाननेवाला जो है, वह तो हजारों मनुष्योंमें कॊई एक व्यक्ति ईश्वरकी ओर चलना चाहता है । 

और 'यततामपि कश्चित् सिद्धो भवति'- प्रयत्न करनेवाले हजारों - लाखोंमें किसी एकका अन्त:करण शुद्ध होता है । 

और 'यततामपि सिंद्धानां' उन हजारों, लाखों सिद्धोंमें से कोई परमात्माको तत्त्वत: जानता है ।

इस लिए महात्माका मिलना बड़ा मुश्किल और भगवान् का मिलना आसान । 

भगवान् से मिले हुए महात्माका मिलना बड़ा मुश्किल । 

       पर यह महाराज, भगवान् भी ऐसे हैं कि ये रहते तो सब जगह हैं, उदासीन भावसे रहते हैं अपने आप न किसीसे जान - पहचान करते हैं...! 

न मिलते हैं, पर जब कोई पहले परिचय करा दे कि महाराज ! 

यह आपका भक्त है, यह आपको दूँढ़ता हुआ आया है और भक्तसे कहे कि भक्तजी देखो, यह भगवान् हैं, तो ये मिलते हैं । 

कोई मिलनिया चाहिए इनको बीचमें । 

जैसै विलायतमें दो आदमी मिलते हैं तो कोई परिचय करानेवाला चाहिए; न परिचय करावे तो दिनभर साथ बैठे रहेंगे, साथ बैठकर खायेंगे और साथ ही रहेंगे, साथ ही चलेंगे, लेकिन आपसमें बातचीत नहीं करेंगे ।

 कि क्यों नहीं करते ?

 कि अभी किसीने परिचय नहीं करवाया और मनमें बहुत है कि बोलें, बात करें । 

तो यह भगवान् का भी ऐसा स्वभाव है कि ये जीवसे मिलते तब हैं, बोलते तब हैं, जान-पहचान तब करते हैँ जब कोई बीचमें मिलनिया हो, जब कोई भक्तसे कहे- यह रहे भगवान् और भगवान् से कहे कि यह रहा तुम्हारा भक्त । 

यह आपसे मिलनेके लिए बहुत दिनोंसे उत्कठिंत है । 

भगवान् बोलेंगे अरे भाई मिलनेके लिए उत्कठिंत मैं भी था, लेकिन कोई जान-पहचान करानेवाला- महात्मा नहीं था । 

तो, महात्मा सुदुर्लभ: ।  । 

      तो 'सुदुर्लभ'का अर्थ, दो विभाग कर इसकी व्याख्या करनी चाहिए । '

सु' और 'दु:' ये दो उपसर्ग हैं और ' लभ्' धातु है-  उससे तो आप बहुत परिचित हो, क्योंकि यही लाभ बन कर आता है । 

तो अलग-अलग दोनोंको जोड़ो-  एकबार सुलभ: करो और एकबार दुर्लभ: करो ।

 दो व्याख्या इसकी हैं । 

यह महात्मा कैसा ? बोले-- सुलभ: । 

और यह महात्मा कैसा ? तो बोले-- दुर्लभ: । एक ही व्यक्ति सुलभ और दुर्लभ, दोनों करो ?

 तो बोले- जो श्रद्धालु हैं और जो संसारके तापसे परितप्त हैं, जो सचमुच दुनियाको छोड़ना चाहते हैं और श्रद्धालु हैं, उनके लिए तो यह महात्मा सुलभ है; और जो संसारको छोड़ना नहीं चाहते पकड़ रखना चाहते हैं और श्रद्धा सम्पन्न नहीं हैं, उनके लिए यह महात्मा दुर्लभ है । 

किसीके लिए सुलभ है, किसीके लिए यह दुर्लभ है । 

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥”
— भगवद्गीता 7.3
अर्थात हजारों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील सिद्ध पुरुषों में भी कोई विरला ही भगवान को तत्त्वतः जान पाता है।
यही श्लोक महात्मा की दुर्लभता को समझने का प्रथम आधार देता है। मनुष्य होना एक बात है, साधना करना दूसरी, आत्मतत्त्व को जानना तीसरी और उस ज्ञान में स्थिर होकर परमात्मा को तत्त्वतः जानना उससे भी उच्च अवस्था है।
1. महात्मा शब्द का वास्तविक अर्थ
“महात्मा” दो शब्दों से बना है—महा + आत्मा। यहाँ “महा” का अर्थ केवल महान प्रतिष्ठा वाला नहीं, बल्कि जिसकी आत्मदृष्टि संकीर्ण देहाभिमान से ऊपर उठ चुकी है।
भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—
“महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥”
— भगवद्गीता 9.13
अर्थात हे पार्थ! दैवी प्रकृति का आश्रय लेने वाले महात्मा मुझे समस्त भूतों का अविनाशी आदि कारण जानकर अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।
इसलिए महात्मा की पहचान केवल बाहरी रूप से नहीं की जा सकती। गीता के अनुसार महात्मा की मूल पहचान है—
दैवी प्रकृति का आश्रय,
परमात्मा के प्रति अनन्य भाव,
परम सत्य का ज्ञान,
अहंकार का क्षय,
समत्व,
तथा परमेश्वर में शरणागति।
2. महात्मा दुर्लभ क्यों हैं?
मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति बाहरी संसार की ओर रहती है। इंद्रियाँ विषयों की ओर दौड़ती हैं, मन इच्छाओं का निर्माण करता है और बुद्धि उन इच्छाओं की पूर्ति के उपाय खोजती रहती है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥”
— भगवद्गीता 7.15
यहाँ भगवान बताते हैं कि मोह, आसुरी भाव और माया से प्रभावित होकर मनुष्य परम सत्य की ओर नहीं जाता।
अर्थात महात्मा की दुर्लभता का एक कारण यह है कि मनुष्य की सामान्य चेतना भोग, अहंकार, इच्छा, द्वेष और मोह में उलझी रहती है।
जब तक मनुष्य का लक्ष्य केवल—
“मुझे क्या मिलेगा?”
रहता है, तब तक उसकी चेतना आत्मज्ञान की ओर आसानी से नहीं मुड़ती।
महात्मा की अवस्था में प्रश्न बदल जाता है—
“मैं वास्तव में कौन हूँ?”
“परम सत्य क्या है?”
“जीवन का अंतिम उद्देश्य क्या है?”
और अंततः—
“मैं परमात्मा को कैसे जानूँ और प्राप्त करूँ?”
3. संसार में ज्ञान बहुत है, पर तत्त्वज्ञान दुर्लभ है
भगवान श्रीकृष्ण ने केवल विद्वत्ता को महात्मा होने का प्रमाण नहीं माना।
गीता में चार प्रकार के भक्तों का वर्णन करते हुए भगवान कहते हैं—
“चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥”
— भगवद्गीता 7.16
आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी—ये चार प्रकार के पुण्यात्मा भगवान की भक्ति करते हैं। इनमें ज्ञानी भगवान को अत्यंत प्रिय है।
आगे भगवान कहते हैं—
“बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥”
— भगवद्गीता 7.19
अर्थात अनेक जन्मों के अंत में ज्ञानवान पुरुष मेरी शरण में आता है और यह अनुभव करता है कि वासुदेव ही सब कुछ हैं। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
यहाँ “सुदुर्लभ” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है।
महात्मा इसलिए दुर्लभ नहीं कि परमात्मा किसी को कृपा देना नहीं चाहते, बल्कि इसलिए कि मनुष्य की चेतना को पूर्ण समर्पण और तत्त्वज्ञान तक पहुँचने में दीर्घ साधना लगती है।




4. देह को आत्मा मानना — महात्मा बनने की सबसे बड़ी बाधा
वेदांत परंपरा में अज्ञान की मूल समस्या देह और आत्मा का भेद न समझना है।
मनुष्य सामान्यतः कहता है—
“मैं शरीर हूँ।”
लेकिन गीता शरीर और आत्मा में स्पष्ट भेद बताती है।
भगवान कहते हैं—
“देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥”
— भगवद्गीता 2.13
जैसे इसी शरीर में आत्मा बाल्यावस्था से युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त होती है, वैसे ही मृत्यु के बाद अन्य शरीर की प्राप्ति होती है; धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।
इसलिए महात्मा वह है जिसकी दृष्टि केवल शरीर तक सीमित नहीं रहती।
शरीर बदलता है।
आयु बदलती है।
परिस्थितियाँ बदलती हैं।
सुख-दुःख आते-जाते हैं।
लेकिन आत्मतत्त्व शरीर के परिवर्तन से भिन्न है।
जो इस भेद को समझने लगता है, उसकी जीवन-दृष्टि बदलने लगती है।

5. इच्छाओं का अंत क्यों आवश्यक है?

महात्मा की दुर्लभता का दूसरा कारण मनुष्य की अनंत इच्छाएँ हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥”
— भगवद्गीता 2.62
विषयों का चिंतन संग उत्पन्न करता है, संग से कामना और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
इसके आगे गीता बताती है कि क्रोध से मोह, मोह से स्मृति-विभ्रम और स्मृति-विभ्रम से बुद्धि का नाश हो सकता है।
इस प्रकार मनुष्य की चेतना बाहर की वस्तुओं में जितनी अधिक बंधती जाती है, आत्मतत्त्व की ओर उसका ध्यान उतना ही कठिन होता जाता है।
महात्मा का अर्थ यह नहीं कि संसार की वस्तुएँ उसके सामने नहीं हैं। बल्कि वह उनके बीच रहते हुए भी उनका दास नहीं बनता।

6. समत्व — महात्मा की महत्वपूर्ण पहचान

गीता में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताते हुए भगवान कहते हैं—
“प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥”
— भगवद्गीता 2.55
जब मनुष्य मन में उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को त्यागकर आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
आगे भगवान सुख-दुःख, राग-द्वेष और भय-क्रोध से मुक्त स्थिर बुद्धि का वर्णन करते हैं।
यही अवस्था महात्मा के स्वरूप को समझने में सहायता करती है।
महात्मा संसार से भागने वाला व्यक्ति मात्र नहीं है। बल्कि वह संसार के द्वंद्वों से भीतर से स्वतंत्र होता है।
सुख मिला तो अहंकार नहीं।
दुःख आया तो आत्मविस्मृति नहीं।
प्रशंसा मिली तो उन्माद नहीं।
निंदा हुई तो द्वेष नहीं।
लाभ हुआ तो आसक्ति नहीं।
हानि हुई तो आत्मविश्वास का विनाश नहीं।
ऐसा समत्व साधारण अवस्था नहीं है; इसलिए महात्मा दुर्लभ हैं।
7. दैवी और आसुरी संपदा का अंतर
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान ने दैवी और आसुरी संपदाओं का विस्तृत विवेचन किया है।
दैवी संपदा में अभय, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञानयोग में स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, दया आदि गुण बताए गए हैं।
दूसरी ओर दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान आसुरी संपदा के लक्षण बताए गए हैं।
महात्मा की दुर्लभता को समझने के लिए यह विभाजन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
क्योंकि मनुष्य यदि बाहरी रूप से धार्मिक दिखाई दे, लेकिन भीतर दम्भ, अहंकार, द्वेष और लोभ से भरा हो, तो केवल बाहरी धार्मिकता उसे महात्मा नहीं बनाती।
महात्मा बनने का परिवर्तन भीतर होता है।

8. महात्मा सभी प्राणियों में परमात्मा का संबंध देखता है
गीता में भगवान कहते हैं—
“विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥”
— भगवद्गीता 5.18
ज्ञानी पुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और तथाकथित निम्न अवस्था वाले व्यक्ति में समदृष्टि रखता है।
इसका अर्थ सामाजिक व्यवहार के सभी भेदों का निषेध नहीं है; इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है कि आत्मतत्त्व की दृष्टि से सभी जीवों में एक ही परम चेतना का संबंध है।
यही समदृष्टि महात्मा की महान पहचान है।
वह किसी प्राणी से घृणा को आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं मानता।
9. महात्मा और अहंकार
महात्मा की दुर्लभता का एक बड़ा कारण अहंकार है।
मनुष्य कहता है—
“मैंने किया।”
“मैं श्रेष्ठ हूँ।”
“मेरे कारण सब हुआ।”
“मुझसे बड़ा कौन?”
लेकिन गीता कर्म और प्रकृति के संबंध को समझाती है।
भगवान कहते हैं—
“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥”
— भगवद्गीता 3.27
प्रकृति के गुणों द्वारा सभी कर्म किए जाते हैं, परंतु अहंकार से मोहित व्यक्ति “मैं कर्ता हूँ” ऐसा मानता है।
इसलिए महात्मा कर्म करना छोड़ता नहीं, बल्कि कर्तृत्व के अहंकार को छोड़ता है।
10. कर्मयोग से अंतःकरण की शुद्धि
महात्मा की प्राप्ति केवल ज्ञान की बातें करने से नहीं होती।
भगवान कर्मयोग का मार्ग बताते हैं—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
— भगवद्गीता 2.47
मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, कर्मफल पर नहीं।
फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य करना अंतःकरण को धीरे-धीरे शुद्ध करता है।
यही कारण है कि गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे से विरोधी नहीं, बल्कि साधना की विभिन्न अवस्थाओं और दृष्टियों से जुड़े हुए हैं।
11. भक्ति से महात्मा की अवस्था
गीता के बारहवें अध्याय में भगवान प्रिय भक्त के लक्षण बताते हैं।
ऐसा भक्त किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से रहित रहता है, सुख-दुःख में सम रहता है और क्षमाशील होता है।
इससे स्पष्ट होता है कि भक्ति केवल पूजा की क्रिया नहीं है।
भक्ति का प्रभाव चरित्र में दिखाई देना चाहिए।
यदि भक्ति बढ़ रही है और साथ में अहंकार, क्रोध, द्वेष तथा छल भी बढ़ रहे हैं, तो गीता के दृष्टिकोण से साधना की दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक है।
12. पूर्ण शरणागति — महात्मा की अंतिम दिशा
भगवद्गीता का अंतिम महान संदेश है—
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
— भगवद्गीता 18.66
यहाँ शरणागति का अर्थ बाहरी जिम्मेदारियों से पलायन करना नहीं है। गीता के संपूर्ण संदर्भ में यह परमात्मा के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण की शिक्षा है।
महात्मा की चेतना में अंततः “मैं” की स्वतंत्र सत्ता का अहंकार कम होता जाता है और परम सत्य के प्रति समर्पण बढ़ता जाता है।
13. वैदिक दृष्टि से आत्मा का ज्ञान
उपनिषदों में भी आत्मज्ञान को सर्वोच्च ज्ञान की दिशा में रखा गया है।
कठोपनिषद् में आत्मतत्त्व को अत्यंत सूक्ष्म और दुर्लभ कहा गया है। वहाँ आत्मा के विषय में कहा गया है कि यह केवल बाहरी इंद्रिय-ज्ञान से उपलब्ध होने वाली वस्तु नहीं है।
मुण्डक उपनिषद् में भी परा और अपरा विद्या का विवेचन मिलता है। वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण आदि ज्ञान अपरा विद्या के अंतर्गत बताए जाते हैं, जबकि जिस ज्ञान से अक्षर ब्रह्म का ज्ञान होता है, उसे परा विद्या कहा गया है।
इससे यह समझना चाहिए कि शास्त्रों का उद्देश्य केवल सूचना एकत्र करना नहीं, बल्कि परम सत्य का बोध कराना है।
14. महात्मा बनने में गुरु और शास्त्र का महत्व
आत्मतत्त्व अत्यंत सूक्ष्म है। इसलिए वैदिक परंपरा में गुरु और शास्त्र का महत्व अत्यधिक है।
गीता में भगवान कहते हैं—
“तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥”
— भगवद्गीता 4.34
अर्थात तत्त्वदर्शी ज्ञानी के पास विनयपूर्वक जाकर, प्रश्न करके और सेवा के भाव से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
यहाँ तीन बातें महत्वपूर्ण हैं—
प्रणिपात — विनय,
परिप्रश्न — सत्य जानने की जिज्ञासा,
सेवा — अहंकाररहित समर्पित भाव।
केवल प्रश्न करना पर्याप्त नहीं; प्रश्न के पीछे सत्य जानने की प्रामाणिक जिज्ञासा आवश्यक है।

स्वयं महात्मा ही देखता है-- कहाँ हमारी जरूरत है । 

 जो संसारको छोड़ना चाहता है, श्रद्धालु है, ईश्वरके मार्गमें चलना चाहता है, उसके घरमें महात्मा आ जाता है और जिसके चित्तमें श्रद्धा नहीं है जो संसारको नहीं छोडना चाहता, संसारको ही पकड़ रखना चाहता है ।

क्या जीवन का अंतिम उद्देश्य केवल भौतिक प्राप्तियाँ हैं?
क्या शरीर ही मेरा वास्तविक स्वरूप है?
क्या सुख-दुःख से परे कोई स्थायी सत्य है?
परमात्मा से मेरा वास्तविक संबंध क्या है?
जब ऐसी जिज्ञासा गहरी होती जाती है, तब आत्मज्ञान की दिशा खुलती है।
“ज्ञानवान् मां प्रपद्यते” — ज्ञान का अंतिम परिणाम शरणागति
भगवान ने केवल “ज्ञानवान्” शब्द नहीं कहा, बल्कि उसके आगे “मां प्रपद्यते” कहा।
अर्थात वास्तविक ज्ञान का परिणाम अहंकार नहीं, बल्कि परमात्मा की शरणागति है।
यदि किसी व्यक्ति को बहुत-सा शास्त्रीय ज्ञान हो, अनेक ग्रंथों का अध्ययन हो, मंत्रों का ज्ञान हो, परंतु उसके भीतर अहंकार, द्वेष, लोभ और स्वयं को श्रेष्ठ मानने की भावना लगातार बढ़ती जाए, तो गीता के इस श्लोक के अनुसार अभी ज्ञान की पूर्णता नहीं मानी जा सकती।
तत्त्वज्ञान मनुष्य को विनम्र बनाता है।
वह समझता है कि—
मैं परम सत्य का स्वामी नहीं, सत्य का जिज्ञासु हूँ।
मैं संसार का अंतिम कर्ता नहीं, परम व्यवस्था का एक साधन हूँ।
मेरा शरीर परिवर्तनशील है, पर आत्मतत्त्व उससे भिन्न है।
इसलिए ज्ञान की परिपक्वता अंततः शरणागति में दिखाई देती है।

उसके घरमें आया हुआ भी लौट जाता है । 

क्योंकि वह पहचानेगा ही नहीं, उसके मनमें तो कीमत धनकी है, उसके मनमें तो कीमत संसारकी है, उसके मनमें कीमत तो संसारी बंधनोंकी है, वस्तुओंकी है, महात्माकी कीमत नहीं है ।

“वासुदेवः सर्वमिति” — महात्मा की सबसे ऊँची अनुभूति
इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है—
“वासुदेवः सर्वम्।”
भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार ज्ञानवान पुरुष अंततः इस सत्य को समझता है कि वासुदेव ही सबका परम आधार हैं।
यह वाक्य केवल बोलने के लिए कोई धार्मिक उद्घोष नहीं है। इसके पीछे गहरा दार्शनिक अर्थ है।
संसार में जो कुछ दिखाई देता है, वह परिवर्तनशील है। शरीर बदलता है, संबंध बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं, सुख-दुःख बदलते हैं। लेकिन परम सत्य इन परिवर्तनों के पीछे आधाररूप में स्थित है।
भगवद्गीता 7.7 में भगवान कहते हैं—
“मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥”
अर्थात हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ अन्य कोई परम तत्त्व नहीं है; यह सम्पूर्ण जगत मुझमें उसी प्रकार स्थित है जैसे धागे में मणियों की माला।
इसलिए 7.19 का “वासुदेवः सर्वम्” गीता के व्यापक तत्त्वज्ञान से जुड़ा हुआ है।
“स महात्मा” — इसी अनुभूति वाला पुरुष महात्मा है
भगवान इसके बाद कहते हैं—

“स महात्मा” — वही महात्मा है।
इससे महात्मा की एक बहुत महत्वपूर्ण परिभाषा सामने आती है।
महात्मा वह नहीं जिसे संसार ने महान घोषित कर दिया हो।
महात्मा वह नहीं जो केवल बाहरी रूप से साधु दिखाई दे।
महात्मा वह भी नहीं जो केवल बहुत-से धार्मिक कर्म कर ले।
गीता के इस श्लोक के अनुसार महात्मा की उच्चतम पहचान यह है कि उसका ज्ञान परमात्मा की शरणागति और “वासुदेवः सर्वम्” की अनुभूति तक पहुँच चुका है।
“सुदुर्लभः” — अत्यंत दुर्लभ
अंत में भगवान कहते हैं—
“सुदुर्लभः।”
अर्थात ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
यही हमारे विषय का मूल रहस्य है।
मनुष्य की सामान्य चेतना “मैं” और “मेरा” के चारों ओर घूमती रहती है। शरीर मेरा है, धन मेरा है, परिवार मेरा है, पद मेरा है, प्रतिष्ठा मेरी है—इस प्रकार “ममत्व” बढ़ता जाता है।
लेकिन आत्मज्ञान की दिशा में बढ़ने वाला साधक धीरे-धीरे समझता है कि संसार की कोई भी वस्तु स्थायी रूप से उसकी नहीं है।
भगवद्गीता 2.71 में भगवान कहते हैं—
“विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥”
जो मनुष्य कामनाओं का त्याग करके, ममता और अहंकार से मुक्त होकर जीवन जीता है, वही शांति प्राप्त करता है।
इसलिए ममता और अहंकार का क्षय महात्मा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
7.19 को 7.16–7.18 के संदर्भ में समझना
गीता के सातवें अध्याय में भगवान पहले चार प्रकार के भक्तों का वर्णन करते हैं—
आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।
फिर भगवान कहते हैं—
“तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।”
— भगवद्गीता 7.17
अर्थात उनमें ज्ञानी, जो नित्ययुक्त और एकनिष्ठ है, विशेष है।
इसके बाद भगवान कहते हैं—
“उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।”
— भगवद्गीता 7.18
अर्थात ये सभी भक्त उदार हैं, परंतु ज्ञानी तो मेरे मत में मेरे ही स्वरूप के समान है।
और इसके तुरंत बाद 7.19 में—
“बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते...”
इस क्रम से स्पष्ट होता है कि 7.19 अचानक आया हुआ कथन नहीं है। यह पूरे प्रसंग का चरम बिंदु है—भक्ति से जिज्ञासा, जिज्ञासा से ज्ञान और ज्ञान की परिपक्वता से परमात्मा की शरणागति।
इस श्लोक का साधक के लिए संदेश
भगवद्गीता 7.19 हमें यह नहीं कहती कि महात्मा दुर्लभ हैं इसलिए साधना छोड़ दी जाए। इसके विपरीत, यह श्लोक साधक को अपनी दिशा पहचानने की प्रेरणा देता है।
यदि ज्ञान बढ़ रहा है तो विनय बढ़नी चाहिए।
यदि भक्ति बढ़ रही है तो अहंकार कम होना चाहिए।
यदि पूजा बढ़ रही है तो आचरण में शुद्धता आनी चाहिए।
यदि शास्त्र-अध्ययन बढ़ रहा है तो सत्य की जिज्ञासा गहरी होनी चाहिए।
और यदि परमात्मा के प्रति प्रेम बढ़ रहा है तो अंततः मनुष्य को “वासुदेवः सर्वम्” के भाव की ओर बढ़ना चाहिए।
यही भगवद्गीता 7.19 का वास्तविक सार है—और यही महात्मा की दुर्लभता का शास्त्रीय रहस्य है।

15. महात्मा दुर्लभ हैं, लेकिन मार्ग बंद नहीं है
“महात्मा सुदुर्लभः” सुनकर यह नहीं समझना चाहिए कि महात्मा बनना असंभव है।
गीता का संदेश निराशा का नहीं, साधना का संदेश है।
भगवान मनुष्य को कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग और शरणागति के अनेक मार्गों से अंतःकरण की शुद्धि और परम सत्य की ओर ले जाते हैं।
गीता 6.5 में भगवान कहते हैं—
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।”
मनुष्य को स्वयं अपने आत्मबल से अपने को ऊपर उठाना चाहिए और स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए।
अर्थात साधक के जीवन में प्रत्येक दिन आत्मोन्नति का अवसर है।
16. महात्मा की पहचान क्या है?
शास्त्रीय दृष्टि से महात्मा को पहचानने के लिए बाहरी चमत्कार सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण नहीं हैं।
उसके जीवन में इन गुणों का विकास दिखाई देता है—
ज्ञान में विनय।
भक्ति में अनन्यता।
कर्म में निष्कामता।
व्यवहार में करुणा।
मन में समत्व।
वाणी में सत्य।
चरित्र में संयम।
जीवन में शास्त्रसम्मत आचरण।
परमात्मा में शरणागति।
ऐसे गुण धीरे-धीरे विकसित होते हैं। इसलिए महात्मा दुर्लभ हैं।
निष्कर्ष
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार महात्मा होना केवल किसी विशेष वस्त्र, पदवी, आश्रम, प्रसिद्धि या बाहरी धार्मिक पहचान का विषय नहीं है।
महात्मा वह है जिसकी आत्मदृष्टि व्यापक हो चुकी है।
भगवान श्रीकृष्ण का वचन—
“वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।”
महात्मा की दुर्लभता का मूल रहस्य इसी वाक्य में है।
जब तक मनुष्य “मैं और मेरा” में बंधा है, तब तक उसकी चेतना सीमित रहती है। जब वह देह से परे आत्मतत्त्व को समझने लगता है, कर्म को यज्ञभाव से करता है, फलासक्ति को छोड़ता है, इंद्रियों और मन को संयमित करता है, सभी प्राणियों में समदृष्टि विकसित करता है और अंततः परमेश्वर को ही जीवन का परम आश्रय मानता है—तब महात्मा की दिशा प्रारंभ होती है।
और अनेक जन्मों की साधना के बाद जब ज्ञान परिपक्व होकर इस अनुभूति तक पहुँचता है—
“वासुदेवः सर्वम्” — परम सत्य ही सबका आधार है,
तब गीता ऐसे ज्ञानी को “महात्मा सुदुर्लभः” कहती है।
इसलिए महात्मा की दुर्लभता केवल महात्माओं की संख्या कम होने में नहीं है; वास्तविक दुर्लभता यह है कि मनुष्य अपनी सीमित अहंकारी पहचान से ऊपर उठकर परमात्मतत्त्व को तत्त्वतः जानने के लिए तैयार हो।
यही श्रीमद्भगवद्गीता के महात्मा-विचार का मूल शास्त्रीय सार है।

 इसी लिए उसके लिए वह दुर्लभ होता है ।

 ( श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय पर प्रवचन'में संकलित प्रवचनों से )

*🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹*

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। श्रीरामचरित्रमानस प्रर्वचन - संतों से सुना।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीरामचरित्रमानस प्रर्वचन ।।

*‼️राम कृपा ही केवलम्‼️*

*❗संतों से सुना❗*
संतों से सुना — संतों की वाणी में श्रीरामचरितमानस का अमृत संदेश !
आप जिस साधन को करते हैं, उसको स्थायी रूप से जीवन का अंग बनाइये, अर्थात् चलते-फिरते, उठते-बैठते, हर घण्टे में कम-से-कम कुछ मिनट उसे जरूर करना चाहिए। 

परन्तु साधन करते हुए लक्ष्य पर (जिसको प्राप्त करना है) दृष्टि (हार्दिक भाव) रखनी चाहिए।


 



श्रीरामचरितमानस केवल भगवान श्रीराम की कथा नहीं है। यह मनुष्य के जीवन को धर्म, मर्यादा, भक्ति, प्रेम, त्याग, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलाने वाला दिव्य ग्रंथ है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस में भगवान श्रीराम के चरित्र के माध्यम से यह समझाया है कि मनुष्य संसार में रहते हुए भी अपने जीवन को प्रभु की भक्ति और सदाचार से कैसे पवित्र कर सकता है।

संतों से जब श्रीरामचरितमानस की कथा सुनी जाती है, तब केवल कानों को कथा सुनाई नहीं देती, बल्कि यदि श्रद्धा हो तो वही कथा धीरे-धीरे मन के भीतर उतरती है। मानस का उद्देश्य केवल रामजन्म, वनवास, सीता हरण, लंका विजय और श्रीराम के अयोध्या लौटने का वर्णन करना नहीं है। इन सभी प्रसंगों के भीतर जीवन के गहरे सिद्धांत छिपे हैं।

मानस के आरंभ में ही गोस्वामी तुलसीदासजी संतों की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं—

“बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोउ।”

अर्थात संत समान चित्त वाले होते हैं। उनके लिए हित और अहित करने वाले में भी द्वेष का भाव नहीं रहता। संत का हृदय किसी के प्रति वैर रखने के लिए नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति और जीव के कल्याण के लिए होता है।

इसीलिए संतों से सुनी हुई रामकथा मनुष्य के जीवन में परिवर्तन का कारण बन सकती है। संत हमें केवल यह नहीं बताते कि श्रीराम ने क्या किया; वे यह भी समझाते हैं कि श्रीराम के आचरण से हमें अपने जीवन में क्या सीखना चाहिए।

श्रीराम — मर्यादा और सत्य के आदर्श

श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम का चरित्र सत्य, मर्यादा और धर्म का प्रतीक है। राजा दशरथ ने कैकेयी को दो वरदान दिए थे। उन्हीं वरदानों के कारण श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करना पड़ा।

यहाँ सबसे बड़ी बात यह है कि श्रीराम ने परिस्थिति के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया। उन्होंने पिता के वचन को अपना धर्म माना।

श्रीराम जानते थे कि वनवास उनके लिए सुखद नहीं होगा। राजसिंहासन सामने था, अयोध्या का प्रेम सामने था, माता-पिता का स्नेह सामने था; फिर भी उन्होंने धर्म को सबसे ऊपर रखा।

मानस में श्रीराम का यही चरित्र मनुष्य को सिखाता है कि जीवन में हर समय अपनी इच्छा के अनुसार परिस्थिति नहीं मिलती। कभी-कभी धर्म और कर्तव्य का मार्ग कठिन होता है, लेकिन वही मार्ग अंततः मनुष्य को महान बनाता है।

आज मनुष्य छोटी-सी असुविधा आने पर दुखी हो जाता है। अपनी इच्छा पूरी न होने पर क्रोध करता है। परिवार में कोई बात अपने अनुसार न हो तो संबंधों में दूरी आने लगती है। ऐसे समय श्रीराम का वनगमन हमें याद दिलाता है कि सुख ही जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं है; धर्मपूर्वक जीवन जीना उससे बड़ा उद्देश्य है।


श्रीराम का वनगमन — त्याग की शिक्षा

श्रीराम जब वन जाने लगे तो सीताजी ने भी उनके साथ जाने का निश्चय किया और लक्ष्मणजी ने भी उनका साथ स्वीकार किया।

यह प्रसंग केवल पति-पत्नी या भाई के प्रेम का वर्णन नहीं है। इसमें त्याग और समर्पण का आदर्श दिखाई देता है।

लक्ष्मणजी ने राजमहल का सुख छोड़कर श्रीराम की सेवा को अपना जीवन बना लिया। सीताजी ने भी वन के कठिन जीवन को स्वीकार किया।

यहाँ संतों की शिक्षा यह है कि भक्ति केवल मंदिर में बैठकर भगवान का नाम लेने का नाम नहीं है। भक्ति का वास्तविक स्वरूप सेवा, समर्पण और त्याग में दिखाई देता है।

जिसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम होता है, वह अपने स्वार्थ से ऊपर उठना सीखता है।

निषादराज और श्रीराम का प्रेम

श्रीराम के वनगमन के प्रसंग में निषादराज गुह का प्रसंग अत्यंत भावपूर्ण है। सामाजिक भेदभाव की दृष्टि से नहीं, बल्कि प्रेम की दृष्टि से देखें तो यह प्रसंग बहुत बड़ा संदेश देता है।

श्रीराम ने निषादराज के प्रेम को स्वीकार किया। यहाँ मानस हमें बताता है कि भगवान के लिए बाहरी पद, धन या प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण प्रेम और भक्ति है।

इसी भाव को आगे शबरी के प्रसंग में और भी स्पष्ट रूप मिलता है।

जिस प्रकार भोजन करते समय हृदय में यह भावना होती है कि भूख अवश्य दूर हो जावेगी और भूख दूर होने पर भोजन की क्रिया समाप्त भी हो जाती है, इसी प्रकार हृदय में सद्भाव से यह भावना हो कि साधन करने से लक्ष्य अवश्य प्राप्त होगा। 


शबरी की भक्ति — प्रेम की सरलता

शबरी वर्षों से प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा कर रही थीं। जब श्रीराम उनके आश्रम में पहुँचे तो उन्होंने अत्यंत प्रेम और श्रद्धा से भगवान का स्वागत किया।

श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया। मानस में यह प्रसंग भक्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार है।

श्रीराम कहते हैं—

“प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।”

पहली भक्ति संतों का संग है।

इसके बाद भगवान ने भक्ति के अनेक स्वरूप बताए—भगवान की कथा में प्रेम, गुरु के चरणों में सेवा, कपट छोड़कर भगवान के गुणों का गान, मंत्र और विश्वास के साथ नामस्मरण, इंद्रियों पर संयम, संतों में भगवान का दर्शन, संतोष, सरलता और भगवान पर पूर्ण भरोसा।

इससे स्पष्ट होता है कि भक्ति केवल बाहरी कर्मकांड नहीं है। भक्ति मन के संस्कारों को बदलने की साधना है।

संतों का संग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संत मनुष्य को संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपने मन को भगवान से जोड़ना सिखाते हैं।

हनुमानजी — भक्ति और सेवा का सर्वोच्च आदर्श

श्रीरामचरितमानस में हनुमानजी का चरित्र भक्ति, बुद्धि, शक्ति, विनय और सेवा का अद्भुत संगम है।

श्रीराम और हनुमानजी की पहली भेंट के बाद उनका संबंध केवल सेवक और स्वामी का संबंध नहीं रहता, बल्कि उसमें पूर्ण आत्मसमर्पण दिखाई देता है।

सीताजी की खोज के समय हनुमानजी समुद्र पार करके लंका जाते हैं। मार्ग में अनेक बाधाएँ आती हैं, लेकिन वे अपने उद्देश्य से विचलित नहीं होते।

लंका पहुँचकर वे सीताजी को श्रीराम का संदेश देते हैं और फिर लौटकर श्रीराम को समाचार देते हैं।

हनुमानजी के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके प्रत्येक कार्य के केंद्र में “रामकाज” है।

मानस में आता है—

“राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम।”

अर्थात राम का कार्य किए बिना विश्राम कहाँ?

यह केवल हनुमानजी का कथन नहीं, बल्कि प्रत्येक भक्त के लिए साधना का संदेश है।

जब जीवन का उद्देश्य केवल अपना सुख, अपना धन, अपना सम्मान और अपनी इच्छा बन जाता है, तब मनुष्य भीतर से अशांत रहता है। लेकिन जब जीवन में सेवा का भाव आता है, तब वही जीवन अर्थपूर्ण होने लगता है।

विभीषण — सत्य का पक्ष चुनने की शिक्षा

लंका में विभीषणजी ने रावण को बार-बार समझाया कि माता सीता को श्रीराम को लौटा देना ही उचित है।

विभीषण जानते थे कि रावण उनका भाई है, लंका का राजा है और अत्यंत शक्तिशाली है। फिर भी उन्होंने अधर्म का समर्थन नहीं किया।

जब रावण ने उन्हें अपमानित करके लंका से निकाल दिया, तब विभीषण श्रीराम की शरण में आए।

श्रीराम ने विभीषण को शरण दी।

मानस में श्रीराम की शरणागतवत्सलता का अत्यंत प्रसिद्ध भाव है—

“शरणागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।”

अर्थात जो व्यक्ति शरण में आए, उसे केवल अपने अहित की आशंका से छोड़ देना उचित नहीं।

यहाँ श्रीराम का चरित्र हमें बताता है कि सच्चा धर्म केवल अपने लोगों का पक्ष लेना नहीं है; धर्म का पक्ष लेना है।

रावण — ज्ञान होते हुए भी अहंकार का पतन

रावण विद्वान था, शक्तिशाली था और अनेक प्रकार की विद्या का ज्ञाता था। लेकिन उसका अहंकार उसके ज्ञान पर भारी पड़ गया।

यही मानस का बहुत गहरा संदेश है।

केवल ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। यदि ज्ञान से विनय उत्पन्न नहीं हुई, यदि विद्या से विवेक उत्पन्न नहीं हुआ, यदि शक्ति से मर्यादा नहीं आई, तो वही ज्ञान और शक्ति विनाश का कारण बन सकते हैं।

रावण के जीवन में अहंकार इतना बढ़ गया कि वह सत्य सुनना ही नहीं चाहता था।

विभीषण ने समझाया, मंदोदरी ने समझाया और अनेक लोगों ने उसे उचित मार्ग दिखाया, लेकिन अहंकार ने उसकी बुद्धि को ढक दिया।

इसलिए संतों की वाणी बार-बार मनुष्य को चेताती है कि अहंकार से बड़ा शत्रु दूसरा नहीं।

राम-रावण युद्ध — बाहर से अधिक भीतर का युद्ध

श्रीराम और रावण का युद्ध केवल अयोध्या और लंका के बीच का युद्ध नहीं है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह मनुष्य के भीतर चलने वाले धर्म और अधर्म के संघर्ष का भी प्रतीक है।

रावण के दस सिर को केवल बाहरी रूप में देखने के बजाय मनुष्य के भीतर के अनेक विकारों के रूप में समझा जा सकता है—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार आदि।


श्रीराम का पक्ष सत्य, धर्म, संयम और मर्यादा का पक्ष है।

इसलिए प्रत्येक मनुष्य के भीतर प्रतिदिन एक युद्ध चलता है।

जब क्रोध सत्य पर विजय पा लेता है, तब भीतर का रावण मजबूत होता है।

जब लोभ संतोष को हरा देता है, तब भीतर का रावण मजबूत होता है।

जब अहंकार विनय को समाप्त कर देता है, तब भीतर का रावण मजबूत होता है।

और जब भक्ति, विवेक, सत्य तथा मर्यादा जीवन में स्थापित होते हैं, तब भीतर का राम जागृत होता है।

रामराज्य का संदेश

लंका विजय के बाद श्रीराम अयोध्या लौटते हैं और रामराज्य की स्थापना होती है।

रामराज्य केवल एक राजनीतिक व्यवस्था का नाम नहीं है। इसका मूल भाव है—धर्म, न्याय, करुणा, सुरक्षा, संतोष और लोककल्याण।

गोस्वामी तुलसीदासजी रामराज्य का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वहाँ लोग धर्म के मार्ग पर चलते हैं और परस्पर प्रेम रखते हैं।

यह प्रसंग आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

यदि परिवार में प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकार से पहले अपना कर्तव्य समझे, तो परिवार में रामराज्य जैसा वातावरण बन सकता है।

यदि समाज में व्यक्ति दूसरों के सम्मान और अधिकार का ध्यान रखे, तो समाज में रामराज्य जैसा वातावरण बन सकता है।

यदि शासक न्याय करे और प्रजा धर्मपूर्वक जीवन जिए, तो राज्य में रामराज्य के आदर्श की स्थापना हो सकती है।

संतों से सुना — मानस का सबसे सरल मार्ग

संतों ने रामकथा के माध्यम से जिस सरल मार्ग को बार-बार बताया है, वह है—भगवान का नाम, संतों का संग, सत्संग, सेवा, संयम और सत्य।

कलियुग में मनुष्य के पास समय कम है, मन चंचल है और संसार के आकर्षण बहुत हैं। ऐसे समय भगवान के नाम का आश्रय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

श्रीरामचरितमानस में नाम की महिमा अनेक स्थानों पर आती है।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने स्वयं रामनाम को अत्यंत महत्त्व दिया। उनके लिए रामनाम ऐसा आधार है जो साधक को कठिन समय में भी प्रभु से जोड़ सकता है।

लेकिन नाम केवल मुख से बोलना ही नहीं है। नाम के साथ भाव भी चाहिए।

यदि मुख से “राम” कहा जाए और मन में छल, कपट, द्वेष और अहंकार भरा रहे, तो साधना अधूरी है।

रामनाम का वास्तविक प्रभाव तब प्रकट होता है जब राम का नाम धीरे-धीरे राम के गुणों को जीवन में उतारने लगता है।

राम का नाम लें तो सत्य की ओर बढ़ें।
राम का नाम लें तो मर्यादा रखें।
राम का नाम लें तो माता-पिता का सम्मान करें।
राम का नाम लें तो सेवा करें।
राम का नाम लें तो किसी के प्रति अनावश्यक द्वेष न रखें।

यही संतों से सुनी हुई रामकथा का सार है।

संतों की संगति क्यों आवश्यक है?

श्रीराम ने स्वयं नवधा भक्ति में प्रथम स्थान संत-संग को दिया—

“प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।”

संत-संग का अर्थ केवल किसी साधु के पास बैठना नहीं है। जहाँ भगवान की कथा से मन निर्मल हो, जहाँ सत्य की चर्चा हो, जहाँ लोभ और अहंकार कम हों, जहाँ सेवा और करुणा बढ़े—वही सत्संग है।

मनुष्य जैसा सुनता है, वैसा सोचने लगता है और जैसा सोचता है, वैसा बनने लगता है।

इसलिए मानस का संदेश है कि अपने मन को किस संगति में रखना है, यह मनुष्य के जीवन की दिशा निर्धारित करता है।

आज के जीवन में श्रीरामचरितमानस

आज मनुष्य के पास साधन बहुत हैं, लेकिन शांति कम है। जानकारी बहुत है, लेकिन विवेक की कमी हो सकती है। धन कमाने की इच्छा बहुत है, लेकिन संतोष कम होता जा रहा है।

ऐसे समय श्रीरामचरितमानस हमें वापस मूल जीवन-मूल्यों की ओर ले जाता है।

श्रीराम हमें मर्यादा सिखाते हैं।

सीताजी धैर्य और पवित्रता का आदर्श देती हैं।

लक्ष्मण सेवा और समर्पण सिखाते हैं।

भरत त्याग और भाई-प्रेम का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

हनुमानजी निष्काम भक्ति और प्रभु-सेवा सिखाते हैं।


विभीषण सत्य का पक्ष लेने की शिक्षा देते हैं।

और रावण यह चेतावनी देता है कि कितना भी ज्ञान और वैभव क्यों न हो, यदि अहंकार और अधर्म बढ़ जाएँ तो पतन निश्चित है।

उपसंहार

संतों से सुनी हुई श्रीरामचरितमानस की कथा का सार यही है कि भगवान श्रीराम केवल मंदिर में पूजे जाने वाले देवता नहीं, बल्कि जीवन जीने की मर्यादा के आदर्श हैं।

रामकथा सुनने का फल तभी है जब कथा हमारे व्यवहार में दिखाई दे।

यदि रामकथा सुनकर हमारा क्रोध थोड़ा कम हो जाए—तो कथा सफल है।

यदि किसी दुखी व्यक्ति की सहायता करने की प्रेरणा मिले—तो कथा सफल है।

यदि माता-पिता के प्रति सम्मान बढ़े—तो कथा सफल है।

यदि किसी के प्रति द्वेष कम हो—तो कथा सफल है।

यदि अहंकार घटे और विनय बढ़े—तो कथा सफल है।

यदि मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सेवा करना सीख जाए—तो यही रामकथा की वास्तविक साधना है।

इसलिए संतों से सुना हुआ यह अमृत संदेश अपने हृदय में धारण करें—

राम को केवल मंदिर में मत खोजिए,
राम की मर्यादा अपने आचरण में खोजिए।

राम का नाम केवल जिह्वा पर मत रखिए,
राम के गुण अपने जीवन में उतारिए।

संतों की कथा केवल सुनिए मत,
उस कथा से अपने मन को बदलने का प्रयास कीजिए।

श्रीरामचरितमानस हमें अंततः उसी परम सत्य की ओर ले जाता है जहाँ भक्ति में अहंकार नहीं रहता, सेवा में स्वार्थ नहीं रहता और प्रेम में भेदभाव नहीं रहता।

भगवान श्रीराम के चरणों में यही प्रार्थना है—

हे रघुनाथ! हमारे मन से अहंकार, क्रोध, लोभ और कपट को दूर कीजिए। हमें संतों का संग दीजिए, सत्संग में श्रद्धा दीजिए, आपके नाम में प्रेम दीजिए और ऐसा जीवन दीजिए जिसमें हमारे कर्मों से किसी का अहित न हो।

॥ श्रीसीतारामचंद्र भगवान की जय ॥
॥ पवनसुत हनुमानजी महाराज की जय ॥
॥ संत समाज की जय ॥

लक्ष्य पूरा होने से साधन अपने आप समाप्त हो जाता है।
*🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹*
पंडारामा प्रभु राज्यगुरु  !!!!! शुभमस्तु !!!


🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

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।। अष्ट सिद्धि दाता रहस्य कथा ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
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।। अष्ट सिद्धि दाता रहस्य कथा।।

अष्ट सिद्धि दाता रहस्य कथा ;

श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत • श्री गणेश महापुराण, शिव महापुराण एवं व्रत - पुराण आधारित प्रवचन !

मंगलाचरण

ॐ श्री गणेशाय नमः।

विघ्नों का नाश करने वाले, बुद्धि और विवेक प्रदान करने वाले, समस्त सिद्धियों के दाता भगवान श्री गणेश को नमन। 

जिनके स्मरण से शुभ कार्य का आरंभ होता है, जिनकी उपासना से साधक के भीतर ज्ञान, श्रद्धा, संयम और सदाचार का प्रकाश उत्पन्न होता है, उन गणपति भगवान की महिमा अनंत है।

श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत में आज का प्रवचन है—

अष्ट सिद्धि दाता रहस्य कथा। 

इस विषय का शास्त्रोक्त विवेचन भगवान गणेश, भगवान शिव और सनातन धर्म की साधना - परंपरा के आधार पर किया जाएगा। 

इस में किसी काल्पनिक व्यक्ति, देश या गांव की कहानी नहीं है। 

यहां पुराणों में वर्णित सिद्धांत, देवताओं की महिमा और साधना के वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ को समझने का प्रयास है।


 
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अष्ट सिद्धियों का वास्तविक रहस्य ;


अष्ट सिद्धियां केवल चमत्कार प्राप्त करने की वस्तुएं नहीं हैं। 

योग और पुराणों में इनका संबंध साधना से प्राप्त विशेष शक्तियों से है। 

भगवान गणेश को अष्ट सिद्धियों का दाता कहा जाता है, क्योंकि वे बुद्धि, विवेक, विघ्नविनाश और शुभ आरंभ के अधिष्ठाता देव हैं।

आठ सिद्धियों के नाम हैं—


१ अणिमा
अणु के समान सूक्ष्म होने की सिद्धि।
२ महिमा
अत्यंत विशाल स्वरूप धारण करने की सिद्धि।
३ गरिमा
अत्यधिक भारी होने की सिद्धि।
४ लघिमा
अत्यंत हल्का होने की सिद्धि।
५ प्राप्ति
इच्छित वस्तु या स्थान की प्राप्ति करने की क्षमता।
६ प्राकाम्य
इच्छित कार्य या अनुभव की सिद्धि।
७ ईशित्व
अधिकार और नियंत्रण की विशेष शक्ति।
८ वशित्व
वश में करने या नियंत्रण रखने की शक्ति।

इन सिद्धियों का विस्तृत वर्णन योगशास्त्र में मिलता है। 

श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव को योग - सिद्धियों का ज्ञान दिया है। 

वहां अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व सहित सिद्धियों का उल्लेख है। 

इस प्रकार अष्ट सिद्धियों की परंपरा का आधार योगशास्त्र और पुराण दोनों में दिखाई देता है।

भगवान गणेश और अष्ट सिद्धियों का संबंध ;


शिव महापुराण के रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड में गणेशजी के विवाह का प्रसंग आता है। 

प्रजापति विश्वरूप की दो कन्याएं सिद्धि और बुद्धि थीं। 

भगवान शिव और माता पार्वती ने उनका विवाह गणेशजी के साथ कराया। 

सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ नामक पुत्रों का जन्म हुआ। 

यह प्रसंग गणेशजी की महिमा में सिद्धि, बुद्धि, क्षेम और लाभ के संबंध को स्पष्ट करता है।

यहां एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय अंतर समझना चाहिए। 

शिव महापुराण में सिद्धि और बुद्धि को गणेशजी की पत्नियों के रूप में वर्णित किया गया है, जबकि योगशास्त्र में अणिमा आदि आठ विशेष शक्तियों को सिद्धियां कहा गया है। 

दोनों संदर्भों को एक ही अर्थ में मिलाना उचित नहीं है।

गणेशजी की उपासना का रहस्य यह है कि साधक केवल बाहरी सफलता नहीं मांगता, बल्कि बुद्धि और सिद्धि दोनों के संतुलन की प्रार्थना करता है। 

बुद्धि के बिना सिद्धि अहंकार का कारण बन सकती है और सिद्धि के बिना बुद्धि का उचित उपयोग कठिन हो सकता है।

अणिमा सिद्धि — सूक्ष्मता का ज्ञान ;


अणिमा का अर्थ है अणु के समान सूक्ष्म होने की क्षमता। 

योगपरंपरा में इसे शरीर या चेतना को अत्यंत सूक्ष्म करने वाली सिद्धि के रूप में समझाया गया है। 

इस सिद्धि का आध्यात्मिक संदेश है कि साधक को अपने अहंकार को सूक्ष्म करना चाहिए। जो मनुष्य हर बात में अपना बड़ा होना सिद्ध करना चाहता है, वह ज्ञान से दूर रहता है। 

भगवान गणेश का छोटा - सा मूषक वाहन भी साधक को स्मरण कराता है कि विशाल बुद्धि का अधिष्ठाता देव सूक्ष्म से सूक्ष्म विषय को समझने की क्षमता रखता है।

अणिमा का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक भक्त साधना के द्वारा भौतिक रूप से अदृश्य या सूक्ष्म हो जाएगा। 

शास्त्रीय वर्णन में यह योग - सिद्धि है; सामान्य भक्त के लिए इसका श्रेष्ठ फल विवेक, निरीक्षण और विनम्रता है।






महिमा सिद्धि — विराट चेतना ;


महिमा का अर्थ अत्यंत विशाल स्वरूप धारण करना है। 

योगशास्त्र में यह अणिमा के विपरीत विस्तार की सिद्धि मानी गई है। 

भगवान गणेश का विशाल उदर, गजमुख और व्यापक स्वरूप हमें यह संदेश देता है कि परम ज्ञान सीमित दृष्टि में बंधा नहीं रहता। 

गणेशजी को प्रथम पूज्य कहा जाता है, क्योंकि शुभ कार्य से पहले मन को एकाग्र करना, बुद्धि को जागृत करना और विघ्नों को पहचानना आवश्यक है।

महिमा का आध्यात्मिक अर्थ है—


अपने संकुचित विचारों से ऊपर उठना। 

जो केवल अपने लाभ को देखता है, वह संकीर्ण दृष्टि में रहता है। 

जो समस्त प्राणियों के कल्याण को समझता है, उसकी चेतना व्यापक होती है।

गरिमा और लघिमा — स्थिरता तथा हल्कापन ;


गरिमा का अर्थ अत्यंत भारी होने की सिद्धि और लघिमा का अर्थ अत्यंत हल्का होने की सिद्धि है। 

ये दोनों अष्ट सिद्धियों में वर्णित योगिक शक्तियां हैं। 

गरिमा का आध्यात्मिक संदेश है कि धर्म, सत्य और कर्तव्य में मनुष्य दृढ़ रहे। 

जीवन में कठिनाइयां आएं तो श्रद्धा डगमगाए नहीं। 

लघिमा का संदेश है कि मन पर अनावश्यक चिंता, क्रोध और मोह का बोझ न रखा जाए।

भगवान गणेश का स्मरण करते समय साधक को यह विचार करना चाहिए कि उसका मन किस बोझ से दबा है। 

क्या वह पुरानी चिंता, अहंकार, लोभ या ईर्ष्या को पकड़े हुए है ? 

गणेश उपासना मन को हल्का करने और कर्तव्य में स्थिर होने का अवसर देती है।

प्राप्ति सिद्धि — योग्य वस्तु की प्राप्ति ;


प्राप्ति का अर्थ इच्छित वस्तु या स्थान की प्राप्ति करने की क्षमता है। 

प्राकाम्य का अर्थ इच्छित कार्य या अनुभव की सिद्धि है। 

योगशास्त्र में इन दोनों का वर्णन अष्ट सिद्धियों के अंतर्गत किया गया है। 

इन सिद्धियों का रहस्य समझते समय एक बात महत्वपूर्ण है—

हर इच्छा पूरी होना ही आध्यात्मिक सफलता नहीं है। 

यदि इच्छा धर्म के विरुद्ध हो, तो उसकी पूर्ति भी कल्याणकारी नहीं हो सकती।

गणेशजी बुद्धि के देवता हैं। 

इस लिए उनकी उपासना में प्राप्ति के साथ विवेक की प्रार्थना की जाती है। 

साधक को कहना चाहिए कि हे गणपति, मुझे वही प्राप्त हो जो मेरे धर्म, कर्तव्य और आत्मकल्याण के लिए उचित हो।

ईशित्व और वशित्व — अधिकार का संयम ;


ईशित्व को अधिकार या नियंत्रण की शक्ति तथा वशित्व को वश में करने की शक्ति कहा गया है। 

ये भी योगपरंपरा की अष्ट सिद्धियों में गिनी जाती हैं। 

इन सिद्धियों का आध्यात्मिक संदेश सबसे गहरा है। 

संसार पर अधिकार प्राप्त करने से पहले मनुष्य को अपने मन पर संयम प्राप्त करना चाहिए। 

यदि मन क्रोध, लोभ और अहंकार के वश में है, तो बाहरी अधिकार भी स्थायी शांति नहीं दे सकता।

भगवान गणेश की उपासना में बुद्धि और सिद्धि का संबंध इसी कारण महत्वपूर्ण है। 

सिद्धि को बुद्धि के अधीन रखना चाहिए, और बुद्धि को धर्म के अधीन। 

यह साधना का मार्ग है, चमत्कार के पीछे भागने का नहीं।

श्री गणेश महापुराण में अष्ट सिद्धियों का आध्यात्मिक संकेत ;


श्री गणेश महापुराण भगवान गणेश की उत्पत्ति, स्वरूप, उपासना, व्रत और महिमा का प्रमुख पुराण है। 

गणेशजी को विघ्नराज, एकदंत, लंबोदर, गजानन, सिद्धिविनायक और बुद्धिप्रदायक जैसे नामों से संबोधित किया जाता है। 

इन नामों में उनके विभिन्न गुणों का संकेत मिलता है।

गणेशजी की उपासना में सिद्धि का अर्थ केवल योगिक शक्ति नहीं है। 

सिद्धि का एक सामान्य अर्थ किसी शुभ कार्य की सफलता, साधना की पूर्णता और ज्ञान की उपलब्धि भी है। 

इस लिए गणेशजी को अष्ट सिद्धि दाता कहने का अर्थ यह भी है कि वे साधक को जीवन के आठों प्रकार के आंतरिक विकास की ओर ले जाते हैं।

शास्त्रों में गणेशजी के अनेक स्वरूपों और नामों का वर्णन मिलता है। 

गणेश महापुराण में गणपति के स्वरूप, उपासना और उनके विभिन्न अवतारों का विवेचन किया गया है। 

यहां से यह शिक्षा मिलती है कि गणेशजी का स्मरण केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और कर्म को शुभ दिशा देने की साधना है।

शिव महापुराण में गणेशजी की महिमा ;


शिव महापुराण के रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड में गणेशजी के विवाह का वर्णन सिद्धि और बुद्धि के साथ किया गया है। 

प्रजापति विश्वरूप की कन्याएं सिद्धि और बुद्धि थीं, और उनका विवाह गणेशजी के साथ हुआ। 

उनके पुत्रों के नाम क्षेम और लाभ बताए गए हैं। 

इस प्रसंग का आध्यात्मिक संदेश स्पष्ट है। 

सिद्धि के साथ बुद्धि हो तो जीवन में क्षेम और लाभ का मार्ग खुलता है। 

केवल धन की प्राप्ति लाभ नहीं है; जीवन में शांति, स्वास्थ्य, सदाचार, परिवार का कल्याण और धर्म में स्थिरता भी क्षेम है।

गणेशजी की पूजा करते समय इस प्रसंग को स्मरण करने का अर्थ है कि साधक अपने जीवन में सिद्धि और बुद्धि का संतुलन मांगे। 

बुद्धि के बिना प्राप्त सामर्थ्य अहंकार को बढ़ा सकती है। 

बुद्धि के साथ प्राप्त सामर्थ्य सेवा और कल्याण का साधन बन सकती है।

शिव उपासना और सिद्धि का संबंध ;


शिव महापुराण में अष्ट सिद्धियों का उल्लेख शिव की उपासना के प्रसंग में भी आता है। 

एक शास्त्रीय वर्णन में अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व और कामावसायिता का उल्लेख है। 

कुछ परंपराओं में अंतिम सिद्धि के स्थान पर सर्वज्ञत्व भी कहा गया है। 

यहां एक आवश्यक सावधानी है। 

विभिन्न पुराणों, योगग्रंथों और परंपराओं में अष्ट सिद्धियों के नामों की सूची में अंतर मिलता है। 

इस लिए किसी एक सूची को सभी शास्त्रों की एकमात्र प्रमाणित सूची कहना उचित नहीं है।

शिवजी को महायोगी कहा गया है। 

उनकी उपासना में सिद्धि का उद्देश्य आत्मज्ञान और बंधन से मुक्ति की दिशा में बढ़ना है। 

भगवान गणेश शिव - पार्वती के पुत्र हैं, इस लिए गणेश उपासना और शिव उपासना में आध्यात्मिक संबंध है। 

गणेशजी विघ्नों का नाश करते हैं और शिवजी साधक को ज्ञान तथा वैराग्य की दिशा में ले जाते हैं।

व्रत - पुराण और गणेश चतुर्थी का महत्व ;


गणेश व्रत की परंपरा में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का विशेष महत्व है। 

इस दिन भगवान गणेश की स्थापना, पूजा, मंत्रजप और नैवेद्य अर्पण किया जाता है। 

विभिन्न व्रत - ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं में गणेश चतुर्थी के नियमों तथा पूजा-विधि का वर्णन मिलता है।

गणेश व्रत का वास्तविक उद्देश्य केवल मनोकामना पूरी करना नहीं है। 

व्रत का अर्थ है अपने मन को किसी शुभ संकल्प में स्थिर करना। 

उपवास से शरीर पर संयम, पूजा से मन में श्रद्धा और मंत्रजप से बुद्धि में एकाग्रता का अभ्यास होता है।

गणेशजी को दूर्वा, मोदक, सिंदूर, लाल पुष्प और नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा है। 

इन वस्तुओं का धार्मिक महत्व है, परंतु केवल सामग्री अर्पित कर देने से साधना पूर्ण नहीं होती। 

शुद्ध आचरण, सत्य वचन और किसी के प्रति अनावश्यक द्वेष न रखना भी पूजा का महत्वपूर्ण भाग है।

अष्ट सिद्धि का सच्चा फल क्या है ?


आध्यात्मिक दृष्टि से अष्ट सिद्धियों का सर्वोत्तम फल मनुष्य के भीतर होने वाला परिवर्तन है। 

यदि साधक गणेशजी की उपासना करता है और उसके जीवन में बुद्धि, विनम्रता, धैर्य, संयम तथा सेवा की भावना बढ़ती है, तो यह साधना की सफलता का महत्वपूर्ण संकेत है।

शिव महापुराण के एक प्रसंग में शिवजी के नाम, भस्म और रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन किया गया है। 

वहां शिवनाम - जप को पापों और संसार के दुखों से मुक्ति के लिए अत्यंत प्रभावी साधन बताया गया है। 

इस से यह शिक्षा मिलती है कि देवता की उपासना का लक्ष्य केवल बाहरी चमत्कार नहीं, बल्कि भीतर के दोषों का क्षय और आत्मिक शांति की प्राप्ति है। 

गणेशजी के नाम का जप करते समय साधक अपने मन में यह संकल्प रखे कि वह क्रोध, लोभ, अहंकार, छल और असत्य से दूर रहने का प्रयास करेगा।

साधना में गुरु और शास्त्र का स्थान ;


योगिक सिद्धियों के संबंध में शिव महापुराण में गुरु, शांति, वैराग्य और योगाभ्यास का महत्व बताया गया है। 

साधना के गूढ़ ज्ञान को योग्य शिष्य को देने की परंपरा भी वर्णित है। 

इस लिए अष्ट सिद्धि प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार के तांत्रिक प्रयोग, अज्ञात औषधि, जोखिमपूर्ण तपस्या या अंधविश्वास का सहारा लेना उचित नहीं है। 

शास्त्रों का अध्ययन, योग्य गुरु का मार्गदर्शन, नियमित जप और सदाचार साधना का सुरक्षित तथा सार्थक मार्ग है।

गणेशजी की सरल उपासना में किसी विशेष सिद्धि की इच्छा से अधिक महत्व श्रद्धा और नियमितता का है। 

यदि कोई साधक केवल धन, शक्ति या दूसरों को नियंत्रित करने की इच्छा से पूजा करता है, तो वह गणेश उपासना के व्यापक आध्यात्मिक उद्देश्य को सीमित कर देता है।

अष्ट सिद्धि और आधुनिक जीवन का संदेश ;


आज के जीवन में मनुष्य अनेक प्रकार के तनाव, चिंता, लोभ और प्रतिस्पर्धा से घिरा रहता है। 

ऐसे समय में गणेशजी की उपासना मन को शांत करने और जीवन के कर्तव्यों को व्यवस्थित करने में सहायक आध्यात्मिक अभ्यास हो सकती है।

अणिमा हमें सूक्ष्म निरीक्षण सिखाती है। 

महिमा हमें व्यापक दृष्टि देती है। 

गरिमा धैर्य और स्थिरता का संकेत है। 

लघिमा मन का बोझ कम करने की प्रेरणा देती है। 

प्राप्ति और प्राकाम्य हमें उचित लक्ष्य की ओर बढ़ने का संदेश देते हैं। 

ईशित्व और वशित्व हमें अपने अधिकार तथा इच्छाओं पर संयम रखने की शिक्षा देते हैं।

यह व्याख्या अष्ट सिद्धियों का आधुनिक आध्यात्मिक अर्थ है, न कि योगिक शक्तियों का शास्त्रीय पर्याय। 

वास्तविक योग - सिद्धियों के वर्णन और उनके आध्यात्मिक संकेत में अंतर समझना आवश्यक है।


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अष्ट सिद्धियों के दाता ;


प्रिय उद्धव! पंचभूतों की सूक्ष्मतम मात्राएँ मेरा ही शरीर है। 

जो साधक केवल मेरे उसी शरीर की उपासना करता है और अपने मन को तदाकार बनाकर उसी में लगा देता है अर्थात् मेरे तन्मात्रात्मक शरीर के अतिरिक्त और किसी भी वस्तुका चिन्तन नहीं करता, उसे 'अणिमा' नामकी सिद्धि अर्थात् पत्थर की चट्टान आदि में भी प्रवेश करने की शक्ति - अणुता प्राप्त हो जाती है।।

महत्तत्त्वके रूपमें भी मैं ही प्रकाशित हो रहा हूँ और उस रूप में समस्त व्यावहारिक ज्ञानों का केन्द्र है। 

जो मेरे उस रूपमें अपने मन को महत्तत्त्वाकार करके तन्मय कर देता है, उसे 'महिमा' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है,और इसी प्रकार आकाशादि पंचभूतोंमें - जो मेरे ही शरीर हैं - अलग - अलग मन लगाने से उन - उनकी महत्ता प्राप्त हो जाती है, यह भी 'महिमा' सिद्धिके ही अन्तर्गत है।।

जो योगी वायु आदि चार भूतों के परमाणुओं को मेरा ही रूप समझकर चित्त को तदाकार कर देता है, उसे लघिमा' सिद्धि प्राप्त हो जाती है - 

उसे परमाणुरूप कालके समान सूक्ष्म वस्तु बननेका सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है।।

जो सात्त्विक अहंकार को मेरा स्वरूप समझकर मेरे उसी रूप में चित्तकी धारणा करता है, वह समस्त इन्द्रियों का अधिष्ठाता हो जाता है। 

मेरा चिन्तन करनेवाला भक्त इस प्रकार 'प्राप्ति' नामकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है।।

जो पुरुष मुझ महत्तत्त्वाभिमानी सूत्रात्मा में अपना चित्त स्थिर करता है, उसे मुझ अव्यक्तजन्मा ( सूत्रात्मा ) की 'प्राकाम्य' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है - 

जिससे इच्छानुसार सभी भोग प्राप्त हो जाते हैं।।

जो त्रिगुणमयी माया के स्वामी मेरे कालस्वरूप विश्वरूप की धारणा करता है, वह शरीरों और जीवों को अपने इच्छानुसार प्रेरित करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। 

इस सिद्धि का नाम 'ईशित्व' है।।

जो योगी मेरे नारायण - स्वरूपमें - जिसे तुरीय और भगवान् भी कहते हैं - 

मन को लगा देता है, मेरे स्वाभाविक गुण उसमें प्रकट होने लगते हैं और उसे 'वशिता' नामकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है।।

निर्गुण ब्रह्म भी मैं ही हूँ। 

जो अपना निर्मल मन मेरे इस ब्रह्मस्वरूप में स्थित कर लेता है, उसे परमानन्द - स्वरूपिणी 'कामावसायिता' नामकी सिद्धि प्राप्त होती है। 

इस के मिलनेपर उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, समाप्त हो जाती हैं।।

         || श्रीमद्भागवत 11/15 ||

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गणेशजी की सरल उपासना - विधि ;


दैनिक गणेश साधना !

श्रद्धा, स्वच्छता और सदाचार के साथ।

प्रातः स्नान करके स्वच्छ स्थान पर भगवान गणेश का स्मरण करें।

गणेशजी को पुष्प, दूर्वा और नैवेद्य अर्पित करें, यदि उपलब्ध हो।

“ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें।

अपने कार्यों में सत्य, संयम और किसी के प्रति अनावश्यक अहित न करने का संकल्प लें।

अंत में प्रार्थना करें कि गणेशजी बुद्धि, विवेक और धर्ममय जीवन प्रदान करें।

यह एक सामान्य भक्ति - आधारित उपासना है। 

किसी विशेष तांत्रिक या दीक्षा - आधारित साधना को बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के नहीं करना चाहिए।

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उपसंहार — सिद्धि से अधिक बुद्धि का महत्व ;


अष्ट सिद्धि दाता भगवान गणेश की महिमा का वास्तविक रहस्य यह है कि सिद्धि को बुद्धि से और बुद्धि को धर्म से जोड़कर देखा जाए। 

श्री गणेश महापुराण में गणेशजी की उपासना और महिमा, शिव महापुराण में सिद्धि - बुद्धि का विवाह तथा योग - पुराणों में अष्ट सिद्धियों का वर्णन—

इन सभी से साधक को अपने जीवन में विवेक और शुभ कर्म की प्रेरणा मिलती है। 

जो मनुष्य गणेशजी का स्मरण करता है, वह केवल अपने लिए सफलता की मांग न करे, बल्कि यह भी प्रार्थना करे कि उसकी बुद्धि धर्म में स्थिर रहे, उसके कर्म दूसरों के लिए हितकारी हों और उसके जीवन में अहंकार का नाश हो।

हे विघ्नहर्ता, हे सिद्धिविनायक, हे बुद्धिप्रदायक गणपति! हमें ऐसी सिद्धि प्रदान करें जिससे हमारा मन पवित्र हो, हमारी बुद्धि सत्य को पहचाने, हमारा आचरण धर्ममय हो और हमारे कर्मों से समस्त प्राणियों का कल्याण हो।
ॐ गं गणपतये नमः।
श्री गणेशाय नमः।
जय जय श्री राधे।।
*🙏जय श्री मुरलीधर 🙏*

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।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

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