।। श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन ।।

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जय द्वारकाधीश

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*‼️राम कृपा ही केवलम्‼️*

❗महात्माकी दुर्लभताका कारण❗


           स महात्मा सुदुर्लभ:--

 गीता ७.१९

        सुदुर्लभ:--  विचारकर देखो भगवान सबमें हैं, 

इसलिए सुलभ हैं  परन्तु महात्मा दुर्लभ है ।

 भगवान् दुर्लभ नहीं हैं ।




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 मनुष्याणां   सहस्रेषु  कश्चिद्यतति    सिद्धये।
 यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।                                           
गीता ७. ३ 

     'हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है।'

       तत्त्वरूपसे हैं भगवान, इसलिए सुलभ हैं । 

परन्तु पहचाननेवाला जो है, वह तो हजारों मनुष्योंमें कॊई एक व्यक्ति ईश्वरकी ओर चलना चाहता है । 

और 'यततामपि कश्चित् सिद्धो भवति'- प्रयत्न करनेवाले हजारों - लाखोंमें किसी एकका अन्त:करण शुद्ध होता है । 

और 'यततामपि सिंद्धानां' उन हजारों, लाखों सिद्धोंमें से कोई परमात्माको तत्त्वत: जानता है ।

इस लिए महात्माका मिलना बड़ा मुश्किल और भगवान् का मिलना आसान । 

भगवान् से मिले हुए महात्माका मिलना बड़ा मुश्किल । 

       पर यह महाराज, भगवान् भी ऐसे हैं कि ये रहते तो सब जगह हैं, उदासीन भावसे रहते हैं अपने आप न किसीसे जान - पहचान करते हैं...! 

न मिलते हैं, पर जब कोई पहले परिचय करा दे कि महाराज ! 

यह आपका भक्त है, यह आपको दूँढ़ता हुआ आया है और भक्तसे कहे कि भक्तजी देखो, यह भगवान् हैं, तो ये मिलते हैं । 

कोई मिलनिया चाहिए इनको बीचमें । 

जैसै विलायतमें दो आदमी मिलते हैं तो कोई परिचय करानेवाला चाहिए; न परिचय करावे तो दिनभर साथ बैठे रहेंगे, साथ बैठकर खायेंगे और साथ ही रहेंगे, साथ ही चलेंगे, लेकिन आपसमें बातचीत नहीं करेंगे ।

 कि क्यों नहीं करते ?

 कि अभी किसीने परिचय नहीं करवाया और मनमें बहुत है कि बोलें, बात करें । 

तो यह भगवान् का भी ऐसा स्वभाव है कि ये जीवसे मिलते तब हैं, बोलते तब हैं, जान-पहचान तब करते हैँ जब कोई बीचमें मिलनिया हो, जब कोई भक्तसे कहे- यह रहे भगवान् और भगवान् से कहे कि यह रहा तुम्हारा भक्त । 

यह आपसे मिलनेके लिए बहुत दिनोंसे उत्कठिंत है । 

भगवान् बोलेंगे अरे भाई मिलनेके लिए उत्कठिंत मैं भी था, लेकिन कोई जान-पहचान करानेवाला- महात्मा नहीं था । 

तो, महात्मा सुदुर्लभ: ।  । 

      तो 'सुदुर्लभ'का अर्थ, दो विभाग कर इसकी व्याख्या करनी चाहिए । '

सु' और 'दु:' ये दो उपसर्ग हैं और ' लभ्' धातु है-  उससे तो आप बहुत परिचित हो, क्योंकि यही लाभ बन कर आता है । 

तो अलग-अलग दोनोंको जोड़ो-  एकबार सुलभ: करो और एकबार दुर्लभ: करो ।

 दो व्याख्या इसकी हैं । 

यह महात्मा कैसा ? बोले-- सुलभ: । 

और यह महात्मा कैसा ? तो बोले-- दुर्लभ: । एक ही व्यक्ति सुलभ और दुर्लभ, दोनों करो ?

 तो बोले- जो श्रद्धालु हैं और जो संसारके तापसे परितप्त हैं, जो सचमुच दुनियाको छोड़ना चाहते हैं और श्रद्धालु हैं, उनके लिए तो यह महात्मा सुलभ है; और जो संसारको छोड़ना नहीं चाहते पकड़ रखना चाहते हैं और श्रद्धा सम्पन्न नहीं हैं, उनके लिए यह महात्मा दुर्लभ है । 

किसीके लिए सुलभ है, किसीके लिए यह दुर्लभ है । 




स्वयं महात्मा ही देखता है-- कहाँ हमारी जरूरत है । 

 जो संसारको छोड़ना चाहता है, श्रद्धालु है, ईश्वरके मार्गमें चलना चाहता है, उसके घरमें महात्मा आ जाता है और जिसके चित्तमें श्रद्धा नहीं है जो संसारको नहीं छोडना चाहता, संसारको ही पकड़ रखना चाहता है ।

उसके घरमें आया हुआ भी लौट जाता है । 

क्योंकि वह पहचानेगा ही नहीं, उसके मनमें तो कीमत धनकी है, उसके मनमें तो कीमत संसारकी है, उसके मनमें कीमत तो संसारी बंधनोंकी है, वस्तुओंकी है, महात्माकी कीमत नहीं है ।

 इसी लिए उसके लिए वह दुर्लभ होता है ।

 ( श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय पर प्रवचन'में संकलित प्रवचनों से )

*🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹*

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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*❗संतों से सुना❗*

आप जिस साधन को करते हैं, उसको स्थायी रूप से जीवन का अंग बनाइये, अर्थात् चलते-फिरते, उठते-बैठते, हर घण्टे में कम-से-कम कुछ मिनट उसे जरूर करना चाहिए। 

परन्तु साधन करते हुए लक्ष्य पर (जिसको प्राप्त करना है) दृष्टि (हार्दिक भाव) रखनी चाहिए।


 

जिस प्रकार भोजन करते समय हृदय में यह भावना होती है कि भूख अवश्य दूर हो जावेगी और भूख दूर होने पर भोजन की क्रिया समाप्त भी हो जाती है, इसी प्रकार हृदय में सद्भाव से यह भावना हो कि साधन करने से लक्ष्य अवश्य प्राप्त होगा। 

लक्ष्य पूरा होने से साधन अपने आप समाप्त हो जाता है।
*🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹*

मां गंगा का सफर गौमुख से हरिद्वार तक :


उत्तराखंड देवभूमि है। 

यहां पंच प्रयाग में दर्शन से जीवन में उल्लास आता है।


ये प्रमुख पंच प्रयाग हैं विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग।


यह पंच प्रयाग उत्तराखंड की मुख्य नदियों के संगम पर हैं। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नदियों का संगम बहुत ही पवित्र माना जाता है। 

इन पंच प्रयागों का पवित्र जल एक साथ अलकनंदा और भगीरथी का जल भगवान श्रीराम की तपस्थली देवप्रयाग में मिलता है और यहीं से भगीरथी और अलकनंदा का संगम गंगा के रूप में अवतरित होता है। 


उत्तराखंड के हिमालय के क्षेत्र के पंच प्रयाग यानी संगम को सबसे पवित्र माना गया है, क्योंकि गंगा, यमुना सरस्वती और उनकी सहायक नदियों का उत्तराखंड देवभूमि उद्गम स्थल है। 

जिन जगहों पर इनका संगम होता है उन्हें प्रमुख तीर्थ माना जाता है। 

जिनमें स्नान का विशेष महत्व है और इन्हीं संगम स्थलों पर पूर्वजों के मोक्ष के लिए श्राद्ध तर्पण भी किया जाता है।


विष्णुप्रयाग :


बद्रीनाथ से होकर निकलने वाली विष्णु प्रिया अलकनंदा नदी और धौली गंगा नदी का जोशीमठ के नजदीक जिस स्थान पर मिलन होता है इन दोनों नदियों के उस पवित्र संगम को विष्णु प्रयाग कहते हैं। 

इस पवित्र संगम पर भगवान विष्णु का प्राचीन मंदिर है। 

यह या पवित्र संगम तल से 1372 मीटर की ऊंचाई पर है। 

स्कंदपुराण में विष्णुप्रयाग की महिमा बताई गई है। 

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस संगम की प्रमुख नदियों धौलीगंगा और अलकनंदा में पांच-पांच कुंड हैं। 

यहीं से सूक्ष्म बदरिकाश्रम प्रारंभ होता है। 

इसी स्थान पर दाएं जय और बाएं विजय दो पर्वत स्थित हैं, जिन्हें विष्णु भगवान के द्वारपालों के रूप में जाना जाता है।


नंदप्रयाग


अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों के संगम को नंदप्रयाग कहते हैं। 

यह समुद्र तल से 2805 फुट की ऊंचाई पर है। 

पौराणिक कथा के मुताबिक इस स्थान पर मंदाकिनी और अलकनंदा के संगम स्थल पर नंद महाराज ने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए और पुत्र की प्राप्ति की कामना के लिए कठोर तप किया था। 

यहां पर नंदादेवी का दिव्य और भव्य मंदिर है। 

नन्दा का मंदिर, नंद की तपस्थली एवं नंदाकिनी के संगम के कारण इस स्थान का नाम नंदप्रयाग पड़ा।


कर्णप्रयाग


अलकनंदा तथा पिण्डर नदियों का संगम स्थल कर्णप्रयाग के नाम से विख्यात है। 

पिण्डर नदी को कर्ण गंगा भी कहा जाता है। 

इस लिए इस तीर्थ संगम का नाम कर्ण प्रयाग पडा। यहां पर उमा मंदिर और कर्ण मंदिर स्थित है। 

संगम स्थल पर मां भगवती उमा का अत्यंत प्राचीन मंदिर है। 

कहते हैं कि यहां पर दानवीर कर्ण ने कठोर तपस्या की थी और यहां पर संगम से पश्चिम दिशा की तरफ शिलाखंड के रूप में दानवीर कर्ण की तपस्थली और मन्दिर हैं। 

कर्ण की तपस्थली होने के कारण ही यह पवित्र पावन स्थान कर्णप्रयाग के नाम से प्रसिद्ध हुआ।


रुद्रप्रयाग


मंदाकिनी तथा अलकनंदा नदियों के संगम पर रुद्रप्रयाग स्थित है। 

संगम स्थल क्षेत्र में चामुंडा देवी व रुद्रनाथ मंदिर है। 

मान्यता है कि नारद मुनि ने इस पर संगीत के रहस्यों को जानने के लिये रुद्रनाथ महादेव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। 

पौराणिक मान्यता है कि यहां पर ब्रह्मा की आज्ञा से देवर्षि नारद ने कई वर्षों तक भगवान शंकर की तपस्या की थी भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर नारद को सांगोपांग गांधर्व शास्त्र विद्या से पारंगत किया था। 

यहां पर भगवान शंकर का रुद्रेश्वर नामक लिंग है। 

यहीं से केदारनाथ के लिए तीर्थ यात्रा शुरू होती है।


देवप्रयाग


देवप्रयाग में अलकनंदा तथा भागीरथी नदियों का संगम है। 

देवप्रयाग समुद्र तल से 1500 फुट की ऊंचाई पर है। 

गढ़वाल क्षेत्र में भगीरथी नदी को सास तथा अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है। 

देवप्रयाग में शिव मंदिर तथा रघुनाथ मंदिर हैं। 

रघुनाथ मंदिर द्रविड़ शैली से निर्मित है। 

देवप्रयाग को सुदर्शन क्षेत्र भी कहा जाता है। 

स्कंद पुराण के केदारखंड में इस तीर्थ ब्रह्मपुरी क्षेत्र कहा गया है लोक कथाओं के अनुसार देवप्रयाग में देव शर्मा नामक ब्राह्मण ने सतयुग में निराहार सूखे पत्ते चबाकर तथा एक पैर पर खड़े रहकर कई वर्षों तक कठोर तप किया और भगवान विष्णु के दर्शन कर वर प्राप्त किया।

पंडारामा प्रभु राज्यगुरु 

!!!!! शुभमस्तु !!!


🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏


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अच्छा सुविचार / कहानी ।।

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*आप अकेले बोल तो सकते है;*
                    *परन्तु*

       *बातचीत नहीं कर सकते ।*

  *आप अकेले आनन्दित हो सकते है*

                    *परन्तु*

        *उत्सव नहीं मना सकते।*
   *अकेले  आप मुस्करा तो सकते है*

                 *परन्तु*

      *हर्षोल्लास नहीं मना सकते.*

           *हम सब एक दूसरे*
          *के बिना कुछ नहीं हैं*
     *यही रिश्तों की खूबसूरती है ll*


 

       

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*दुःख सदा पीछे की तरफ देखता है*

*चिंता सदा इधर - उधर देखती है*

 *लेकिन विश्वास हमेशा आगे की ओर देखता है*

*इसलिए हमेशा सकारात्मक रूख अपनायें*

*झूठे इंसान की ऊंची आवाज*

 *सच्चे इंसान को खामोश करा देती हैं* 

*परन्तु सच्चे  इंसान की खामोशी झूठे इंसान की बुनियाद अचूक हिला ही देती हैं*

*किसी ने गौतम बुद्ध से पूछा*

*आप बड़े है फिर भी नीचे बैठते है* 

*बहुत ही खूबसूरत जवाब दिया नीचे बैठने वाला इंसान कभी गिरता नहीं.*



*✍️- कच्चे कान*

      *-शक्की नजर*

           *और...!!* 

      *- कमज़ोर मन*

     *इंसान को अच्छी*

     *समृद्धि के बीच भी*

     *नरक का अनुभव कराते हैं।* 
               
        *🙏जय अंबे🙏*

|| अष्ट सिद्धियों के दाता ||

प्रिय उद्धव! पंचभूतों की सूक्ष्मतम मात्राएँ मेरा ही शरीर है। 

जो साधक केवल मेरे उसी शरीर की उपासना करता है और अपने मन को तदाकार बनाकर उसी में लगा देता है अर्थात् मेरे तन्मात्रात्मक शरीर के अतिरिक्त और किसी भी वस्तुका चिन्तन नहीं करता, उसे 'अणिमा' नामकी सिद्धि अर्थात् पत्थर की चट्टान आदि में भी प्रवेश करने की शक्ति -अणुता प्राप्त हो जाती है।।

महत्तत्त्वके रूपमें भी मैं ही प्रकाशित हो रहा हूँ और उस रूप में समस्त व्यावहारिक ज्ञानों का केन्द्र है। 

जो मेरे उस रूपमें अपने मन को महत्तत्त्वाकार करके तन्मय कर देता है, उसे 'महिमा' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है,और इसी प्रकार आकाशादि पंचभूतोंमें - जो मेरे ही शरीर हैं - अलग - अलग मन लगाने से उन - उनकी महत्ता प्राप्त हो जाती है, यह भी 'महिमा' सिद्धिके ही अन्तर्गत है।।

जो योगी वायु आदि चार भूतों के परमाणुओं को मेरा ही रूप समझकर चित्त को तदाकार कर देता है, उसे लघिमा' सिद्धि प्राप्त हो जाती है - 

उसे परमाणुरूप कालके समान सूक्ष्म वस्तु बननेका सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है।।

जो सात्त्विक अहंकार को मेरा स्वरूप समझकर मेरे उसी रूप में चित्तकी धारणा करता है, वह समस्त इन्द्रियों का अधिष्ठाता हो जाता है। 

मेरा चिन्तन करनेवाला भक्त इस प्रकार 'प्राप्ति' नामकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है।।

जो पुरुष मुझ महत्तत्त्वाभिमानी सूत्रात्मा में अपना चित्त स्थिर करता है, उसे मुझ अव्यक्तजन्मा ( सूत्रात्मा ) की 'प्राकाम्य' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है - 

जिससे इच्छानुसार सभी भोग प्राप्त हो जाते हैं।।

जो त्रिगुणमयी माया के स्वामी मेरे कालस्वरूप विश्वरूप की धारणा करता है, वह शरीरों और जीवों को अपने इच्छानुसार प्रेरित करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। 

इस सिद्धि का नाम 'ईशित्व' है।।

जो योगी मेरे नारायण - स्वरूपमें - जिसे तुरीय और भगवान् भी कहते हैं - 

मन को लगा देता है, मेरे स्वाभाविक गुण उसमें प्रकट होने लगते हैं और उसे 'वशिता' नामकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है।।

निर्गुण ब्रह्म भी मैं ही हूँ। 

जो अपना निर्मल मन मेरे इस ब्रह्मस्वरूप में स्थित कर लेता है, उसे परमानन्द - स्वरूपिणी 'कामावसायिता' नामकी सिद्धि प्राप्त होती है। 

इस के मिलनेपर उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, समाप्त हो जाती हैं।।

         || श्रीमद्भागवत 11/15 ||
  
    *🙏जय माताजी🙏*
+++ +++
जय जय श्री राधे

        !! गलती का पश्चाताप !!

अध्यापक द्वारा कक्षा में गणित की परीक्षा ली गई। 

परीक्षा लेने से पहले उन्होंने सभी विद्यार्थियों से कहा, “जो विद्यार्थी सबसे अधिक अंक प्राप्त करेगा उसे पुरस्कार दिया जाएगा।” 

परीक्षा में केवल एक ही प्रश्न दिया गया। 

सभी विद्यार्थी उस प्रश्न को हल करने और पुरस्कार प्राप्त करने में जुट गये। 

लेकिन प्रश्न अत्यंत कठिन था, सरलता से हल नहीं किया जा सकता था। 

सभी विद्यार्थी जी जान से जुटे हुए थे। 

बहुत समय तक कोई भी विद्यार्थी उस प्रश्न को हल नहीं कर सका। 

अंत में एक बालक प्रश्न हल करके अध्यापक के सामने पहुँचा। 
+++ +++
अध्यापक महोदय ने प्रश्न और उसका हल देखा और पाया कि हल सही है।

उन्होंने इन्तजार किया कि शायद अन्य कोई विद्यार्थी भी सही हल निकाल कर ले आए, किन्तु देर तक कोई भी विद्यार्थी सही हल नहीं निकाल सका। 

समय पूरा हो चुका था। 

अध्यापक महोदय ने सही हल निकालकर लाने वाले को पुरस्कार दिया। 

पुरस्कार – प्राप्त विद्यार्थी नाचते गाते खुशी से झूमते अपने घर पहुँचा। 

दूसरे सभी विद्यार्थी हैरान थे कि यह लड़का सही हल कैसे निकाल सका, क्योंकि पढ़ने – लिखने में वह बालक मंदबुद्धि था।

अगले दिन अध्यापक महोदय ज्यों ही कक्षा में आए, त्यों ही पुरस्कार – प्राप्त विद्यार्थी लपक कर उनके चरणों से लिपट गया और फूट – फूट कर रोने लगा। 

सभी विद्यार्थी और अध्यापक हैरान थे कि इसे क्या हो गया है। 

अध्यापक ने उससे पूछा, “क्या बात हैं तुम रोते क्यों हो ? 

तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि पुरस्कार प्राप्त करके तुमने अच्छा विद्यार्थी होने का प्रमाण दिया है। ” 

वह बालक रोते हुए बोला, “आप यह पुरस्कार वापस ले लिजीए श्रीमान !” 

“पर क्यों ?” 
+++ +++
अध्यापक ने पूछा। 

“इसलिए कि मैं इस पुरस्कार का अधिकारी नहीं हूँ। 

मैंने पुस्तक में से देखकर, चोरी करके प्रश्न सही हल निकाला था। 

मैंने अपनी योग्यता से सही हल नहीं निकाला था। 

आप यह पुरस्कार वापस ले लीजिए और मेरी भूल के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए। 

भविष्य में मैं ऐसी गलती कभी दोबारा नहीं करूँगा, बालक ने कहा।” 

अध्यापक ने उसे वापस बुलाकर कहा, “सही हल तुम्हें नहीं आया, लेकिन धोखा देना भी तुम्हें नहीं आता। 

धोखा देना और चोरी करना तुम्हारा स्वभाव नहीं है, इस लिए कल घर जाने के बाद तुम्हारा मन दुखी रहा और तुमने सही बात कह डाली। 

तुमने सही हल नही निकाला मुझे इसका इसका दुःख नहीं है, पर तुमने सही बात कह डाली, उसकी मुझे बहुत खुशी है। 

गलती मान लेने वाले बालक बड़े होकर बड़ा नाम और काम करते है।” 

आगे चलकर यह बालक न्यायमूर्ति गोपाल कृष्ण गोखले के नाम से जाना गया ।।

जय जय श्री राधे।।
+++ +++    
*🙏जय श्री मुरलीधर 🙏*

|| मीरा चरित ||

क्रमशः से आगे ............

🌿 मीरा दिव्य द्वारिका में महारानी रूक्मिणी जी के साथ बैठी है। 
वहाँ आलौकिक पेय रस के सेवन पश्चात मीरा षोडश वर्षीया किशोरी सी सुकुमारी हो गई । 
उसी समय सम्मुख द्वार से राजमहिषियों ने प्रवेश किया । 
देवी रूक्मिणी और मीरा उनके स्वागत में उठ खड़ी हुईं। 
देवी ने दो पद आगे बढ़कर सबका स्वागत करते हुये कहा ," पधारो बहिनों ! 
अपनी इस छोटी बहिन से मिलिये। "
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आनेवाली महारानियों ने महादेवी के चरण स्पर्श किए और उन्हें आलिगंन दिया। 
मीरा ने भी भूमि पर सिर रखकर सबका एकसाथ अभिवादन किया। 
सब के आसन ग्रहण करने के पश्चात देवी ने उनका परिचय कराते हुए बताया ," यह मेरी छोटी बहिन सत्यभामा ,यह.......। "
+++ +++
अब बस सरकार ! 
बाकी सबसे परिचय कराने का अधिकार मुझे मिले ! 
यों भी आप हमारी ज्येष्ठा हो ! 
" हँसते हुये मधुर स्वर में सत्यभामा ने कहा - " 
यह है देवी जाम्बवती ,मेरी बड़ी बहिन ! 
" हरित परिधान धारण किए संकोचशीला जाम्बवती ने मुस्कुरा कर चिबुक स्पर्श किया ।"
यह देवी भद्रा , यह मित्रविन्दा , यह सत्या , यह लक्ष्मणा और यह रविनन्दिनी कालिन्दी। 
" मुस्कराते , परिहास करते सब महारानियाँ क्रमवत अतिशय स्नेह से मीरा को मिली , किसी ने आलिंगन किया ,किसी ने कहा ," 
बहिन ! 
तुम्हें मिलने की बड़े दिनों से लालसा थी। 
" सबके हँसने से यूँ लगा जैसे बहुत सी चाँदी की नन्हीं घंटियाँ एक साथ टनटनाई हो !!!!!!!"
+++ +++
" और ये हमारी बहिनें सोलह सहस्त्र एक सौ !"
मीरा ने सबको एकसाथ हाथ जोड़कर और मस्तक नवा कर प्रणाम किया। 
तभी लक्ष्मणा जी हँसती हुई बोली ," सरकार ! 
हमारी बहिन इस तरह आभूषण और श्रृगांर के बिना रहे......!
लगता है हमें ही वैराग्य का उपदेश करने कोई वैष्णवी आई हो ! " 
सबने लक्ष्मणा की बात का अनुमोदन किया।

🌿 "इसे पृथक महल में भेजकर श्रृगांर धारण कराने की व्यवस्था की है मैंने !" 
देवी रूक्मिणी बोली।
+++ +++
" तुम बोलती क्यों नहीं बहिन ! 
तनिक अपने मुख से बोलो तो मन प्रसन्न हो ! 
तुम्हारा नाम क्या है ?" 
देवी मित्रविन्दा ने स्नेहासिक्त स्वर से पूछा।
" जी क्या निवेदन करूँ ? 
यह मीरा आपकी अनुगता दासी है। 
मुझे भी सेवा प्रदान कर कृतार्थ करें " मीरा ने सकुचाते हुये कहा ।

" तो हमारे दुलार से , स्नेह से , तुम्हें कृतार्थता का बोध नहीं हुआ बहिन ?" 
सत्यभामा जी हँसी।

मीरा ने अचकचाकर पलकें उठाई ," सरकार ! 
आप सबके कृपा अनुग्रह से दासी धन्य - कृतार्थ हुईं है। "
+++ +++
🌿 तभी सैरन्ध्री मीरा को श्रृगांर हेतु लेने आ गई। 
मणि प्रदीप्त कक्ष में मीरा को सुगन्धित जल से स्नान करा, अगुरू धूप से केश सुखाये। 
अमूल्य दिव्य वस्त्र अलंकार धारण करा कर सुन्दर रीति से केश प्रसाधन किया। 
उसका सौन्दर्य द्वारिकाधीश की महिषियों से तनिक भी न्यून नहीं लग रहा था। 
सोलह श्रृगांर से सुसज्जित कर दासियों ने उन्हें देवी जाम्बवती के पास बिठा दिया।
+++ +++
🌿 " अहा ! देखो कितनी सुन्दर लग रही है हमारी बहिन !" 
सत्या ने मीरा का चिबुक उठाकर ऊपर दिखाया। 
मीरा तो संकोच की प्रतिमा सी पलकें झुकाई बैठी रही जैसे अभी अभी विवाह मण्डप से उठकर आई हो। 
थोड़ी ही देर में संगीत और नृत्य का समाज जुट गया। 
सब महारानियाँ बारी से नृत्य करने लगी। 
सत्यभामा ने मीरा को अपने साथ ले लिया। 
कितने समय तक यह नृत्योत्सव चलता रहा ।

इसके पश्चात दासियाँ पुनः पेय लेकर प्रस्तुत हुई ।
और उसके बाद भोजन की तैयारी ।

इतने राग - रंग में मीरा को प्रसन्नता तो हुईं पर मन ही मन वह प्राणप्रियतम के दर्शन के लिए आकुल थी। 
भोजन के समय भी प्रभु को वहाँ न पा उससे रहा नहीं गया। 
मीरा ने सकुचाते हुये जाम्बवती से पूछ ही लिया ,"प्रभु के भोजन से पूर्व ही हम भोजन कर लें ?"

क्रमशः ..................
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*।। आत्मगुंजन ।।**जे लोक की परलोक की**नहीं कामनायें त्यागते ।**संसार के हैं श्वान जे**संसार में अनुरागते ।।*

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

*।।  आत्मगुंजन  ।।*

*जे लोक की परलोक की*
*नहीं कामनायें त्यागते ।*
*संसार के हैं श्वान जे*
*संसार में अनुरागते ।।*

*कंचन जिन्हें प्यारा लगे*
*जे मूढ़ किंकर काम के ।*
*नहीं शान्ति वे पाते कभी*
*नहीं भक्त होते राम के ।।*

*लोग बुराई करें और आप दुखी हो जाओ,*

*लोग तारीफ करें और आप सुखी हो जाओ...* 

*मतलब आपके सुख-दुख का स्विच लोगों के हाथ में,*

*कोशिश करें की* 

*यह स्विच आपके हाथ में हो*
*अधिक पुरुषोत्तम-मास*

*संक्रान्तिरहितो मासो यो वा संक्रान्तियुग्मयुक्।*
*पूर्व: संसर्पसंज्ञ: स्यादंहस्पति तथापरः।।*

*भावार्थ*

 जिस मासमें सूर्यसंक्रान्तिका अभाव हो 

और द्विसंक्रान्तियुक्त–

संयुक्त क्षयमासके पूर्वमें 

अपरमें होवे तो दोनों मलमास क्रमशः 

"संसर्प" तथा "अहंस्पति" के नामसे जाने जाते हैं।
       ्
*🙏🚩हरी वन्दन🚩🙏*

🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
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Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोप...