सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन ।।
*‼️राम कृपा ही केवलम्‼️*
❗महात्माकी दुर्लभताका कारण❗
स महात्मा सुदुर्लभ:--
गीता ७.१९
सुदुर्लभ:-- विचारकर देखो भगवान सबमें हैं,
इसलिए सुलभ हैं परन्तु महात्मा दुर्लभ है ।
भगवान् दुर्लभ नहीं हैं ।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।
गीता ७. ३
'हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है।'
तत्त्वरूपसे हैं भगवान, इसलिए सुलभ हैं ।
परन्तु पहचाननेवाला जो है, वह तो हजारों मनुष्योंमें कॊई एक व्यक्ति ईश्वरकी ओर चलना चाहता है ।
और 'यततामपि कश्चित् सिद्धो भवति'- प्रयत्न करनेवाले हजारों - लाखोंमें किसी एकका अन्त:करण शुद्ध होता है ।
और 'यततामपि सिंद्धानां' उन हजारों, लाखों सिद्धोंमें से कोई परमात्माको तत्त्वत: जानता है ।
इस लिए महात्माका मिलना बड़ा मुश्किल और भगवान् का मिलना आसान ।
भगवान् से मिले हुए महात्माका मिलना बड़ा मुश्किल ।
पर यह महाराज, भगवान् भी ऐसे हैं कि ये रहते तो सब जगह हैं, उदासीन भावसे रहते हैं अपने आप न किसीसे जान - पहचान करते हैं...!
न मिलते हैं, पर जब कोई पहले परिचय करा दे कि महाराज !
यह आपका भक्त है, यह आपको दूँढ़ता हुआ आया है और भक्तसे कहे कि भक्तजी देखो, यह भगवान् हैं, तो ये मिलते हैं ।
कोई मिलनिया चाहिए इनको बीचमें ।
जैसै विलायतमें दो आदमी मिलते हैं तो कोई परिचय करानेवाला चाहिए; न परिचय करावे तो दिनभर साथ बैठे रहेंगे, साथ बैठकर खायेंगे और साथ ही रहेंगे, साथ ही चलेंगे, लेकिन आपसमें बातचीत नहीं करेंगे ।
कि क्यों नहीं करते ?
कि अभी किसीने परिचय नहीं करवाया और मनमें बहुत है कि बोलें, बात करें ।
तो यह भगवान् का भी ऐसा स्वभाव है कि ये जीवसे मिलते तब हैं, बोलते तब हैं, जान-पहचान तब करते हैँ जब कोई बीचमें मिलनिया हो, जब कोई भक्तसे कहे- यह रहे भगवान् और भगवान् से कहे कि यह रहा तुम्हारा भक्त ।
यह आपसे मिलनेके लिए बहुत दिनोंसे उत्कठिंत है ।
भगवान् बोलेंगे अरे भाई मिलनेके लिए उत्कठिंत मैं भी था, लेकिन कोई जान-पहचान करानेवाला- महात्मा नहीं था ।
तो, महात्मा सुदुर्लभ: । ।
तो 'सुदुर्लभ'का अर्थ, दो विभाग कर इसकी व्याख्या करनी चाहिए । '
सु' और 'दु:' ये दो उपसर्ग हैं और ' लभ्' धातु है- उससे तो आप बहुत परिचित हो, क्योंकि यही लाभ बन कर आता है ।
तो अलग-अलग दोनोंको जोड़ो- एकबार सुलभ: करो और एकबार दुर्लभ: करो ।
दो व्याख्या इसकी हैं ।
यह महात्मा कैसा ? बोले-- सुलभ: ।
और यह महात्मा कैसा ? तो बोले-- दुर्लभ: । एक ही व्यक्ति सुलभ और दुर्लभ, दोनों करो ?
तो बोले- जो श्रद्धालु हैं और जो संसारके तापसे परितप्त हैं, जो सचमुच दुनियाको छोड़ना चाहते हैं और श्रद्धालु हैं, उनके लिए तो यह महात्मा सुलभ है; और जो संसारको छोड़ना नहीं चाहते पकड़ रखना चाहते हैं और श्रद्धा सम्पन्न नहीं हैं, उनके लिए यह महात्मा दुर्लभ है ।
किसीके लिए सुलभ है, किसीके लिए यह दुर्लभ है ।
स्वयं महात्मा ही देखता है-- कहाँ हमारी जरूरत है ।
जो संसारको छोड़ना चाहता है, श्रद्धालु है, ईश्वरके मार्गमें चलना चाहता है, उसके घरमें महात्मा आ जाता है और जिसके चित्तमें श्रद्धा नहीं है जो संसारको नहीं छोडना चाहता, संसारको ही पकड़ रखना चाहता है ।
उसके घरमें आया हुआ भी लौट जाता है ।
क्योंकि वह पहचानेगा ही नहीं, उसके मनमें तो कीमत धनकी है, उसके मनमें तो कीमत संसारकी है, उसके मनमें कीमत तो संसारी बंधनोंकी है, वस्तुओंकी है, महात्माकी कीमत नहीं है ।
इसी लिए उसके लिए वह दुर्लभ होता है ।
( श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय पर प्रवचन'में संकलित प्रवचनों से )
*🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹*
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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