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जय द्वारकाधीश
।। श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन ।।
।। श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन - महात्माकी दुर्लभताका कारण ।।
*‼️राम कृपा ही केवलम्‼️*
❗महात्माकी दुर्लभताका कारण❗
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 7, श्लोक 19
स महात्मा सुदुर्लभ:--
गीता ७.१९
सुदुर्लभ:-- विचारकर देखो भगवान सबमें हैं,
इसलिए सुलभ हैं परन्तु महात्मा दुर्लभ है ।
भगवान् दुर्लभ नहीं हैं ।
सरल अर्थ:
अनेक जन्मों के अंत में ज्ञानवान पुरुष मुझे तत्त्वतः जानकर मेरी शरण में आता है और यह अनुभव करता है कि “वासुदेव ही सब कुछ हैं।” ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
यह श्लोक महात्मा की दुर्लभता को समझने के लिए गीता का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने महात्मा की पहचान किसी बाहरी रूप, पद, प्रसिद्धि अथवा केवल धार्मिक कर्म से नहीं बताई, बल्कि ज्ञान, शरणागति और परमात्मा की सर्वव्यापकता के बोध से बताई है।
“बहूनां जन्मनामन्ते” —
अनेक जन्मों के अंत में भगवान का पहला शब्द ही महात्मा की दुर्लभता का संकेत देता है—
“बहूनां जन्मनामन्ते”।
अर्थात आत्मज्ञान की परिपक्वता कोई सामान्य अथवा अचानक प्राप्त होने वाली अवस्था नहीं है।
मनुष्य अनेक प्रकार के अनुभवों, कर्मों, संस्कारों और साधनाओं से गुजरता हुआ धीरे-धीरे उस स्थिति तक पहुँचता है जहाँ उसकी बुद्धि संसार के अस्थायी आकर्षणों से ऊपर उठकर परम सत्य की खोज करती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने पूर्वजन्मों का ज्ञान होना आवश्यक है।
गीता का आध्यात्मिक संदेश यह है कि परमात्मतत्त्व का पूर्ण बोध अत्यंत परिपक्व चेतना की अवस्था है।
मनुष्य पहले संसार में सुख खोजता है, फिर सुख की अस्थिरता को समझता है; कर्म करता है, कर्मफल का अनुभव करता है; इच्छाओं की पूर्ति करता है, फिर नई इच्छाओं का जन्म देखता है।
धीरे-धीरे उसके भीतर प्रश्न उठता है—
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।
गीता ७. ३
'हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है।'
तत्त्वरूपसे हैं भगवान, इसलिए सुलभ हैं ।
परन्तु पहचाननेवाला जो है, वह तो हजारों मनुष्योंमें कॊई एक व्यक्ति ईश्वरकी ओर चलना चाहता है ।
और 'यततामपि कश्चित् सिद्धो भवति'- प्रयत्न करनेवाले हजारों - लाखोंमें किसी एकका अन्त:करण शुद्ध होता है ।
और 'यततामपि सिंद्धानां' उन हजारों, लाखों सिद्धोंमें से कोई परमात्माको तत्त्वत: जानता है ।
इस लिए महात्माका मिलना बड़ा मुश्किल और भगवान् का मिलना आसान ।
भगवान् से मिले हुए महात्माका मिलना बड़ा मुश्किल ।
पर यह महाराज, भगवान् भी ऐसे हैं कि ये रहते तो सब जगह हैं, उदासीन भावसे रहते हैं अपने आप न किसीसे जान - पहचान करते हैं...!
न मिलते हैं, पर जब कोई पहले परिचय करा दे कि महाराज !
यह आपका भक्त है, यह आपको दूँढ़ता हुआ आया है और भक्तसे कहे कि भक्तजी देखो, यह भगवान् हैं, तो ये मिलते हैं ।
कोई मिलनिया चाहिए इनको बीचमें ।
जैसै विलायतमें दो आदमी मिलते हैं तो कोई परिचय करानेवाला चाहिए; न परिचय करावे तो दिनभर साथ बैठे रहेंगे, साथ बैठकर खायेंगे और साथ ही रहेंगे, साथ ही चलेंगे, लेकिन आपसमें बातचीत नहीं करेंगे ।
कि क्यों नहीं करते ?
कि अभी किसीने परिचय नहीं करवाया और मनमें बहुत है कि बोलें, बात करें ।
तो यह भगवान् का भी ऐसा स्वभाव है कि ये जीवसे मिलते तब हैं, बोलते तब हैं, जान-पहचान तब करते हैँ जब कोई बीचमें मिलनिया हो, जब कोई भक्तसे कहे- यह रहे भगवान् और भगवान् से कहे कि यह रहा तुम्हारा भक्त ।
यह आपसे मिलनेके लिए बहुत दिनोंसे उत्कठिंत है ।
भगवान् बोलेंगे अरे भाई मिलनेके लिए उत्कठिंत मैं भी था, लेकिन कोई जान-पहचान करानेवाला- महात्मा नहीं था ।
तो, महात्मा सुदुर्लभ: । ।
तो 'सुदुर्लभ'का अर्थ, दो विभाग कर इसकी व्याख्या करनी चाहिए । '
सु' और 'दु:' ये दो उपसर्ग हैं और ' लभ्' धातु है- उससे तो आप बहुत परिचित हो, क्योंकि यही लाभ बन कर आता है ।
तो अलग-अलग दोनोंको जोड़ो- एकबार सुलभ: करो और एकबार दुर्लभ: करो ।
दो व्याख्या इसकी हैं ।
यह महात्मा कैसा ? बोले-- सुलभ: ।
और यह महात्मा कैसा ? तो बोले-- दुर्लभ: । एक ही व्यक्ति सुलभ और दुर्लभ, दोनों करो ?
तो बोले- जो श्रद्धालु हैं और जो संसारके तापसे परितप्त हैं, जो सचमुच दुनियाको छोड़ना चाहते हैं और श्रद्धालु हैं, उनके लिए तो यह महात्मा सुलभ है; और जो संसारको छोड़ना नहीं चाहते पकड़ रखना चाहते हैं और श्रद्धा सम्पन्न नहीं हैं, उनके लिए यह महात्मा दुर्लभ है ।
किसीके लिए सुलभ है, किसीके लिए यह दुर्लभ है ।
श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥”
— भगवद्गीता 7.3
अर्थात हजारों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील सिद्ध पुरुषों में भी कोई विरला ही भगवान को तत्त्वतः जान पाता है।
यही श्लोक महात्मा की दुर्लभता को समझने का प्रथम आधार देता है। मनुष्य होना एक बात है, साधना करना दूसरी, आत्मतत्त्व को जानना तीसरी और उस ज्ञान में स्थिर होकर परमात्मा को तत्त्वतः जानना उससे भी उच्च अवस्था है।
1. महात्मा शब्द का वास्तविक अर्थ
“महात्मा” दो शब्दों से बना है—महा + आत्मा। यहाँ “महा” का अर्थ केवल महान प्रतिष्ठा वाला नहीं, बल्कि जिसकी आत्मदृष्टि संकीर्ण देहाभिमान से ऊपर उठ चुकी है।
भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—
“महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥”
— भगवद्गीता 9.13
अर्थात हे पार्थ! दैवी प्रकृति का आश्रय लेने वाले महात्मा मुझे समस्त भूतों का अविनाशी आदि कारण जानकर अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।
इसलिए महात्मा की पहचान केवल बाहरी रूप से नहीं की जा सकती। गीता के अनुसार महात्मा की मूल पहचान है—
दैवी प्रकृति का आश्रय,
परमात्मा के प्रति अनन्य भाव,
परम सत्य का ज्ञान,
अहंकार का क्षय,
समत्व,
तथा परमेश्वर में शरणागति।
2. महात्मा दुर्लभ क्यों हैं?
मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति बाहरी संसार की ओर रहती है। इंद्रियाँ विषयों की ओर दौड़ती हैं, मन इच्छाओं का निर्माण करता है और बुद्धि उन इच्छाओं की पूर्ति के उपाय खोजती रहती है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥”
— भगवद्गीता 7.15
यहाँ भगवान बताते हैं कि मोह, आसुरी भाव और माया से प्रभावित होकर मनुष्य परम सत्य की ओर नहीं जाता।
अर्थात महात्मा की दुर्लभता का एक कारण यह है कि मनुष्य की सामान्य चेतना भोग, अहंकार, इच्छा, द्वेष और मोह में उलझी रहती है।
जब तक मनुष्य का लक्ष्य केवल—
“मुझे क्या मिलेगा?”
रहता है, तब तक उसकी चेतना आत्मज्ञान की ओर आसानी से नहीं मुड़ती।
महात्मा की अवस्था में प्रश्न बदल जाता है—
“मैं वास्तव में कौन हूँ?”
“परम सत्य क्या है?”
“जीवन का अंतिम उद्देश्य क्या है?”
और अंततः—
“मैं परमात्मा को कैसे जानूँ और प्राप्त करूँ?”
3. संसार में ज्ञान बहुत है, पर तत्त्वज्ञान दुर्लभ है
भगवान श्रीकृष्ण ने केवल विद्वत्ता को महात्मा होने का प्रमाण नहीं माना।
गीता में चार प्रकार के भक्तों का वर्णन करते हुए भगवान कहते हैं—
“चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥”
— भगवद्गीता 7.16
आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी—ये चार प्रकार के पुण्यात्मा भगवान की भक्ति करते हैं। इनमें ज्ञानी भगवान को अत्यंत प्रिय है।
आगे भगवान कहते हैं—
“बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥”
— भगवद्गीता 7.19
अर्थात अनेक जन्मों के अंत में ज्ञानवान पुरुष मेरी शरण में आता है और यह अनुभव करता है कि वासुदेव ही सब कुछ हैं। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
यहाँ “सुदुर्लभ” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है।
महात्मा इसलिए दुर्लभ नहीं कि परमात्मा किसी को कृपा देना नहीं चाहते, बल्कि इसलिए कि मनुष्य की चेतना को पूर्ण समर्पण और तत्त्वज्ञान तक पहुँचने में दीर्घ साधना लगती है।
4. देह को आत्मा मानना — महात्मा बनने की सबसे बड़ी बाधा
वेदांत परंपरा में अज्ञान की मूल समस्या देह और आत्मा का भेद न समझना है।
मनुष्य सामान्यतः कहता है—
“मैं शरीर हूँ।”
लेकिन गीता शरीर और आत्मा में स्पष्ट भेद बताती है।
भगवान कहते हैं—
“देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥”
— भगवद्गीता 2.13
जैसे इसी शरीर में आत्मा बाल्यावस्था से युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त होती है, वैसे ही मृत्यु के बाद अन्य शरीर की प्राप्ति होती है; धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।
इसलिए महात्मा वह है जिसकी दृष्टि केवल शरीर तक सीमित नहीं रहती।
शरीर बदलता है।
आयु बदलती है।
परिस्थितियाँ बदलती हैं।
सुख-दुःख आते-जाते हैं।
लेकिन आत्मतत्त्व शरीर के परिवर्तन से भिन्न है।
जो इस भेद को समझने लगता है, उसकी जीवन-दृष्टि बदलने लगती है।
5. इच्छाओं का अंत क्यों आवश्यक है?
महात्मा की दुर्लभता का दूसरा कारण मनुष्य की अनंत इच्छाएँ हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥”
— भगवद्गीता 2.62
विषयों का चिंतन संग उत्पन्न करता है, संग से कामना और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
इसके आगे गीता बताती है कि क्रोध से मोह, मोह से स्मृति-विभ्रम और स्मृति-विभ्रम से बुद्धि का नाश हो सकता है।
इस प्रकार मनुष्य की चेतना बाहर की वस्तुओं में जितनी अधिक बंधती जाती है, आत्मतत्त्व की ओर उसका ध्यान उतना ही कठिन होता जाता है।
महात्मा का अर्थ यह नहीं कि संसार की वस्तुएँ उसके सामने नहीं हैं। बल्कि वह उनके बीच रहते हुए भी उनका दास नहीं बनता।
6. समत्व — महात्मा की महत्वपूर्ण पहचान
गीता में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताते हुए भगवान कहते हैं—
“प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥”
— भगवद्गीता 2.55
जब मनुष्य मन में उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को त्यागकर आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
आगे भगवान सुख-दुःख, राग-द्वेष और भय-क्रोध से मुक्त स्थिर बुद्धि का वर्णन करते हैं।
यही अवस्था महात्मा के स्वरूप को समझने में सहायता करती है।
महात्मा संसार से भागने वाला व्यक्ति मात्र नहीं है। बल्कि वह संसार के द्वंद्वों से भीतर से स्वतंत्र होता है।
सुख मिला तो अहंकार नहीं।
दुःख आया तो आत्मविस्मृति नहीं।
प्रशंसा मिली तो उन्माद नहीं।
निंदा हुई तो द्वेष नहीं।
लाभ हुआ तो आसक्ति नहीं।
हानि हुई तो आत्मविश्वास का विनाश नहीं।
ऐसा समत्व साधारण अवस्था नहीं है; इसलिए महात्मा दुर्लभ हैं।
7. दैवी और आसुरी संपदा का अंतर
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान ने दैवी और आसुरी संपदाओं का विस्तृत विवेचन किया है।
दैवी संपदा में अभय, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञानयोग में स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, दया आदि गुण बताए गए हैं।
दूसरी ओर दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान आसुरी संपदा के लक्षण बताए गए हैं।
महात्मा की दुर्लभता को समझने के लिए यह विभाजन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
क्योंकि मनुष्य यदि बाहरी रूप से धार्मिक दिखाई दे, लेकिन भीतर दम्भ, अहंकार, द्वेष और लोभ से भरा हो, तो केवल बाहरी धार्मिकता उसे महात्मा नहीं बनाती।
महात्मा बनने का परिवर्तन भीतर होता है।
8. महात्मा सभी प्राणियों में परमात्मा का संबंध देखता है
गीता में भगवान कहते हैं—
“विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥”
— भगवद्गीता 5.18
ज्ञानी पुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और तथाकथित निम्न अवस्था वाले व्यक्ति में समदृष्टि रखता है।
इसका अर्थ सामाजिक व्यवहार के सभी भेदों का निषेध नहीं है; इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है कि आत्मतत्त्व की दृष्टि से सभी जीवों में एक ही परम चेतना का संबंध है।
यही समदृष्टि महात्मा की महान पहचान है।
वह किसी प्राणी से घृणा को आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं मानता।
9. महात्मा और अहंकार
महात्मा की दुर्लभता का एक बड़ा कारण अहंकार है।
मनुष्य कहता है—
“मैंने किया।”
“मैं श्रेष्ठ हूँ।”
“मेरे कारण सब हुआ।”
“मुझसे बड़ा कौन?”
लेकिन गीता कर्म और प्रकृति के संबंध को समझाती है।
भगवान कहते हैं—
“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥”
— भगवद्गीता 3.27
प्रकृति के गुणों द्वारा सभी कर्म किए जाते हैं, परंतु अहंकार से मोहित व्यक्ति “मैं कर्ता हूँ” ऐसा मानता है।
इसलिए महात्मा कर्म करना छोड़ता नहीं, बल्कि कर्तृत्व के अहंकार को छोड़ता है।
10. कर्मयोग से अंतःकरण की शुद्धि
महात्मा की प्राप्ति केवल ज्ञान की बातें करने से नहीं होती।
भगवान कर्मयोग का मार्ग बताते हैं—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
— भगवद्गीता 2.47
मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, कर्मफल पर नहीं।
फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य करना अंतःकरण को धीरे-धीरे शुद्ध करता है।
यही कारण है कि गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे से विरोधी नहीं, बल्कि साधना की विभिन्न अवस्थाओं और दृष्टियों से जुड़े हुए हैं।
11. भक्ति से महात्मा की अवस्था
गीता के बारहवें अध्याय में भगवान प्रिय भक्त के लक्षण बताते हैं।
ऐसा भक्त किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से रहित रहता है, सुख-दुःख में सम रहता है और क्षमाशील होता है।
इससे स्पष्ट होता है कि भक्ति केवल पूजा की क्रिया नहीं है।
भक्ति का प्रभाव चरित्र में दिखाई देना चाहिए।
यदि भक्ति बढ़ रही है और साथ में अहंकार, क्रोध, द्वेष तथा छल भी बढ़ रहे हैं, तो गीता के दृष्टिकोण से साधना की दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक है।
12. पूर्ण शरणागति — महात्मा की अंतिम दिशा
भगवद्गीता का अंतिम महान संदेश है—
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
— भगवद्गीता 18.66
यहाँ शरणागति का अर्थ बाहरी जिम्मेदारियों से पलायन करना नहीं है। गीता के संपूर्ण संदर्भ में यह परमात्मा के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण की शिक्षा है।
महात्मा की चेतना में अंततः “मैं” की स्वतंत्र सत्ता का अहंकार कम होता जाता है और परम सत्य के प्रति समर्पण बढ़ता जाता है।
13. वैदिक दृष्टि से आत्मा का ज्ञान
उपनिषदों में भी आत्मज्ञान को सर्वोच्च ज्ञान की दिशा में रखा गया है।
कठोपनिषद् में आत्मतत्त्व को अत्यंत सूक्ष्म और दुर्लभ कहा गया है। वहाँ आत्मा के विषय में कहा गया है कि यह केवल बाहरी इंद्रिय-ज्ञान से उपलब्ध होने वाली वस्तु नहीं है।
मुण्डक उपनिषद् में भी परा और अपरा विद्या का विवेचन मिलता है। वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण आदि ज्ञान अपरा विद्या के अंतर्गत बताए जाते हैं, जबकि जिस ज्ञान से अक्षर ब्रह्म का ज्ञान होता है, उसे परा विद्या कहा गया है।
इससे यह समझना चाहिए कि शास्त्रों का उद्देश्य केवल सूचना एकत्र करना नहीं, बल्कि परम सत्य का बोध कराना है।
14. महात्मा बनने में गुरु और शास्त्र का महत्व
आत्मतत्त्व अत्यंत सूक्ष्म है। इसलिए वैदिक परंपरा में गुरु और शास्त्र का महत्व अत्यधिक है।
गीता में भगवान कहते हैं—
“तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥”
— भगवद्गीता 4.34
अर्थात तत्त्वदर्शी ज्ञानी के पास विनयपूर्वक जाकर, प्रश्न करके और सेवा के भाव से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
यहाँ तीन बातें महत्वपूर्ण हैं—
प्रणिपात — विनय,
परिप्रश्न — सत्य जानने की जिज्ञासा,
सेवा — अहंकाररहित समर्पित भाव।
केवल प्रश्न करना पर्याप्त नहीं; प्रश्न के पीछे सत्य जानने की प्रामाणिक जिज्ञासा आवश्यक है।
स्वयं महात्मा ही देखता है-- कहाँ हमारी जरूरत है ।
जो संसारको छोड़ना चाहता है, श्रद्धालु है, ईश्वरके मार्गमें चलना चाहता है, उसके घरमें महात्मा आ जाता है और जिसके चित्तमें श्रद्धा नहीं है जो संसारको नहीं छोडना चाहता, संसारको ही पकड़ रखना चाहता है ।
क्या जीवन का अंतिम उद्देश्य केवल भौतिक प्राप्तियाँ हैं?
क्या शरीर ही मेरा वास्तविक स्वरूप है?
क्या सुख-दुःख से परे कोई स्थायी सत्य है?
परमात्मा से मेरा वास्तविक संबंध क्या है?
जब ऐसी जिज्ञासा गहरी होती जाती है, तब आत्मज्ञान की दिशा खुलती है।
“ज्ञानवान् मां प्रपद्यते” — ज्ञान का अंतिम परिणाम शरणागति
भगवान ने केवल “ज्ञानवान्” शब्द नहीं कहा, बल्कि उसके आगे “मां प्रपद्यते” कहा।
अर्थात वास्तविक ज्ञान का परिणाम अहंकार नहीं, बल्कि परमात्मा की शरणागति है।
यदि किसी व्यक्ति को बहुत-सा शास्त्रीय ज्ञान हो, अनेक ग्रंथों का अध्ययन हो, मंत्रों का ज्ञान हो, परंतु उसके भीतर अहंकार, द्वेष, लोभ और स्वयं को श्रेष्ठ मानने की भावना लगातार बढ़ती जाए, तो गीता के इस श्लोक के अनुसार अभी ज्ञान की पूर्णता नहीं मानी जा सकती।
तत्त्वज्ञान मनुष्य को विनम्र बनाता है।
वह समझता है कि—
मैं परम सत्य का स्वामी नहीं, सत्य का जिज्ञासु हूँ।
मैं संसार का अंतिम कर्ता नहीं, परम व्यवस्था का एक साधन हूँ।
मेरा शरीर परिवर्तनशील है, पर आत्मतत्त्व उससे भिन्न है।
इसलिए ज्ञान की परिपक्वता अंततः शरणागति में दिखाई देती है।
उसके घरमें आया हुआ भी लौट जाता है ।
क्योंकि वह पहचानेगा ही नहीं, उसके मनमें तो कीमत धनकी है, उसके मनमें तो कीमत संसारकी है, उसके मनमें कीमत तो संसारी बंधनोंकी है, वस्तुओंकी है, महात्माकी कीमत नहीं है ।
“वासुदेवः सर्वमिति” — महात्मा की सबसे ऊँची अनुभूति
इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है—
“वासुदेवः सर्वम्।”
भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार ज्ञानवान पुरुष अंततः इस सत्य को समझता है कि वासुदेव ही सबका परम आधार हैं।
यह वाक्य केवल बोलने के लिए कोई धार्मिक उद्घोष नहीं है। इसके पीछे गहरा दार्शनिक अर्थ है।
संसार में जो कुछ दिखाई देता है, वह परिवर्तनशील है। शरीर बदलता है, संबंध बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं, सुख-दुःख बदलते हैं। लेकिन परम सत्य इन परिवर्तनों के पीछे आधाररूप में स्थित है।
भगवद्गीता 7.7 में भगवान कहते हैं—
“मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥”
अर्थात हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ अन्य कोई परम तत्त्व नहीं है; यह सम्पूर्ण जगत मुझमें उसी प्रकार स्थित है जैसे धागे में मणियों की माला।
इसलिए 7.19 का “वासुदेवः सर्वम्” गीता के व्यापक तत्त्वज्ञान से जुड़ा हुआ है।
“स महात्मा” — इसी अनुभूति वाला पुरुष महात्मा है
भगवान इसके बाद कहते हैं—
“स महात्मा” — वही महात्मा है।
इससे महात्मा की एक बहुत महत्वपूर्ण परिभाषा सामने आती है।
महात्मा वह नहीं जिसे संसार ने महान घोषित कर दिया हो।
महात्मा वह नहीं जो केवल बाहरी रूप से साधु दिखाई दे।
महात्मा वह भी नहीं जो केवल बहुत-से धार्मिक कर्म कर ले।
गीता के इस श्लोक के अनुसार महात्मा की उच्चतम पहचान यह है कि उसका ज्ञान परमात्मा की शरणागति और “वासुदेवः सर्वम्” की अनुभूति तक पहुँच चुका है।
“सुदुर्लभः” — अत्यंत दुर्लभ
अंत में भगवान कहते हैं—
“सुदुर्लभः।”
अर्थात ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
यही हमारे विषय का मूल रहस्य है।
मनुष्य की सामान्य चेतना “मैं” और “मेरा” के चारों ओर घूमती रहती है। शरीर मेरा है, धन मेरा है, परिवार मेरा है, पद मेरा है, प्रतिष्ठा मेरी है—इस प्रकार “ममत्व” बढ़ता जाता है।
लेकिन आत्मज्ञान की दिशा में बढ़ने वाला साधक धीरे-धीरे समझता है कि संसार की कोई भी वस्तु स्थायी रूप से उसकी नहीं है।
भगवद्गीता 2.71 में भगवान कहते हैं—
“विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥”
जो मनुष्य कामनाओं का त्याग करके, ममता और अहंकार से मुक्त होकर जीवन जीता है, वही शांति प्राप्त करता है।
इसलिए ममता और अहंकार का क्षय महात्मा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
7.19 को 7.16–7.18 के संदर्भ में समझना
गीता के सातवें अध्याय में भगवान पहले चार प्रकार के भक्तों का वर्णन करते हैं—
आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।
फिर भगवान कहते हैं—
“तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।”
— भगवद्गीता 7.17
अर्थात उनमें ज्ञानी, जो नित्ययुक्त और एकनिष्ठ है, विशेष है।
इसके बाद भगवान कहते हैं—
“उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।”
— भगवद्गीता 7.18
अर्थात ये सभी भक्त उदार हैं, परंतु ज्ञानी तो मेरे मत में मेरे ही स्वरूप के समान है।
और इसके तुरंत बाद 7.19 में—
“बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते...”
इस क्रम से स्पष्ट होता है कि 7.19 अचानक आया हुआ कथन नहीं है। यह पूरे प्रसंग का चरम बिंदु है—भक्ति से जिज्ञासा, जिज्ञासा से ज्ञान और ज्ञान की परिपक्वता से परमात्मा की शरणागति।
इस श्लोक का साधक के लिए संदेश
भगवद्गीता 7.19 हमें यह नहीं कहती कि महात्मा दुर्लभ हैं इसलिए साधना छोड़ दी जाए। इसके विपरीत, यह श्लोक साधक को अपनी दिशा पहचानने की प्रेरणा देता है।
यदि ज्ञान बढ़ रहा है तो विनय बढ़नी चाहिए।
यदि भक्ति बढ़ रही है तो अहंकार कम होना चाहिए।
यदि पूजा बढ़ रही है तो आचरण में शुद्धता आनी चाहिए।
यदि शास्त्र-अध्ययन बढ़ रहा है तो सत्य की जिज्ञासा गहरी होनी चाहिए।
और यदि परमात्मा के प्रति प्रेम बढ़ रहा है तो अंततः मनुष्य को “वासुदेवः सर्वम्” के भाव की ओर बढ़ना चाहिए।
यही भगवद्गीता 7.19 का वास्तविक सार है—और यही महात्मा की दुर्लभता का शास्त्रीय रहस्य है।
15. महात्मा दुर्लभ हैं, लेकिन मार्ग बंद नहीं है
“महात्मा सुदुर्लभः” सुनकर यह नहीं समझना चाहिए कि महात्मा बनना असंभव है।
गीता का संदेश निराशा का नहीं, साधना का संदेश है।
भगवान मनुष्य को कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग और शरणागति के अनेक मार्गों से अंतःकरण की शुद्धि और परम सत्य की ओर ले जाते हैं।
गीता 6.5 में भगवान कहते हैं—
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।”
मनुष्य को स्वयं अपने आत्मबल से अपने को ऊपर उठाना चाहिए और स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए।
अर्थात साधक के जीवन में प्रत्येक दिन आत्मोन्नति का अवसर है।
16. महात्मा की पहचान क्या है?
शास्त्रीय दृष्टि से महात्मा को पहचानने के लिए बाहरी चमत्कार सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण नहीं हैं।
उसके जीवन में इन गुणों का विकास दिखाई देता है—
ज्ञान में विनय।
भक्ति में अनन्यता।
कर्म में निष्कामता।
व्यवहार में करुणा।
मन में समत्व।
वाणी में सत्य।
चरित्र में संयम।
जीवन में शास्त्रसम्मत आचरण।
परमात्मा में शरणागति।
ऐसे गुण धीरे-धीरे विकसित होते हैं। इसलिए महात्मा दुर्लभ हैं।
निष्कर्ष
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार महात्मा होना केवल किसी विशेष वस्त्र, पदवी, आश्रम, प्रसिद्धि या बाहरी धार्मिक पहचान का विषय नहीं है।
महात्मा वह है जिसकी आत्मदृष्टि व्यापक हो चुकी है।
भगवान श्रीकृष्ण का वचन—
“वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।”
महात्मा की दुर्लभता का मूल रहस्य इसी वाक्य में है।
जब तक मनुष्य “मैं और मेरा” में बंधा है, तब तक उसकी चेतना सीमित रहती है। जब वह देह से परे आत्मतत्त्व को समझने लगता है, कर्म को यज्ञभाव से करता है, फलासक्ति को छोड़ता है, इंद्रियों और मन को संयमित करता है, सभी प्राणियों में समदृष्टि विकसित करता है और अंततः परमेश्वर को ही जीवन का परम आश्रय मानता है—तब महात्मा की दिशा प्रारंभ होती है।
और अनेक जन्मों की साधना के बाद जब ज्ञान परिपक्व होकर इस अनुभूति तक पहुँचता है—
“वासुदेवः सर्वम्” — परम सत्य ही सबका आधार है,
तब गीता ऐसे ज्ञानी को “महात्मा सुदुर्लभः” कहती है।
इसलिए महात्मा की दुर्लभता केवल महात्माओं की संख्या कम होने में नहीं है; वास्तविक दुर्लभता यह है कि मनुष्य अपनी सीमित अहंकारी पहचान से ऊपर उठकर परमात्मतत्त्व को तत्त्वतः जानने के लिए तैयार हो।
यही श्रीमद्भगवद्गीता के महात्मा-विचार का मूल शास्त्रीय सार है।
इसी लिए उसके लिए वह दुर्लभ होता है ।
( श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय पर प्रवचन'में संकलित प्रवचनों से )
*🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹*
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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