सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। अच्छा सुविचार / कहानी।।
*आप अकेले बोल तो सकते है;*
*परन्तु*
*बातचीत नहीं कर सकते ।*
*आप अकेले आनन्दित हो सकते है*
*परन्तु*
*उत्सव नहीं मना सकते।*
*अकेले आप मुस्करा तो सकते है*
*परन्तु*
*हर्षोल्लास नहीं मना सकते.*
*हम सब एक दूसरे*
*के बिना कुछ नहीं हैं*
*यही रिश्तों की खूबसूरती है ll*
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*दुःख सदा पीछे की तरफ देखता है*
*चिंता सदा इधर - उधर देखती है*
*लेकिन विश्वास हमेशा आगे की ओर देखता है*
*इसलिए हमेशा सकारात्मक रूख अपनायें*
*झूठे इंसान की ऊंची आवाज*
*सच्चे इंसान को खामोश करा देती हैं*
*परन्तु सच्चे इंसान की खामोशी झूठे इंसान की बुनियाद अचूक हिला ही देती हैं*
*किसी ने गौतम बुद्ध से पूछा*
*आप बड़े है फिर भी नीचे बैठते है*
*बहुत ही खूबसूरत जवाब दिया नीचे बैठने वाला इंसान कभी गिरता नहीं.*
*✍️- कच्चे कान*
*-शक्की नजर*
*और...!!*
*- कमज़ोर मन*
*इंसान को अच्छी*
*समृद्धि के बीच भी*
*नरक का अनुभव कराते हैं।*
*🙏जय अंबे🙏*
|| अष्ट सिद्धियों के दाता ||
प्रिय उद्धव! पंचभूतों की सूक्ष्मतम मात्राएँ मेरा ही शरीर है।
जो साधक केवल मेरे उसी शरीर की उपासना करता है और अपने मन को तदाकार बनाकर उसी में लगा देता है अर्थात् मेरे तन्मात्रात्मक शरीर के अतिरिक्त और किसी भी वस्तुका चिन्तन नहीं करता, उसे 'अणिमा' नामकी सिद्धि अर्थात् पत्थर की चट्टान आदि में भी प्रवेश करने की शक्ति -अणुता प्राप्त हो जाती है।।
महत्तत्त्वके रूपमें भी मैं ही प्रकाशित हो रहा हूँ और उस रूप में समस्त व्यावहारिक ज्ञानों का केन्द्र है।
जो मेरे उस रूपमें अपने मन को महत्तत्त्वाकार करके तन्मय कर देता है, उसे 'महिमा' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है,और इसी प्रकार आकाशादि पंचभूतोंमें - जो मेरे ही शरीर हैं - अलग - अलग मन लगाने से उन - उनकी महत्ता प्राप्त हो जाती है, यह भी 'महिमा' सिद्धिके ही अन्तर्गत है।।
जो योगी वायु आदि चार भूतों के परमाणुओं को मेरा ही रूप समझकर चित्त को तदाकार कर देता है, उसे लघिमा' सिद्धि प्राप्त हो जाती है -
उसे परमाणुरूप कालके समान सूक्ष्म वस्तु बननेका सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है।।
जो सात्त्विक अहंकार को मेरा स्वरूप समझकर मेरे उसी रूप में चित्तकी धारणा करता है, वह समस्त इन्द्रियों का अधिष्ठाता हो जाता है।
मेरा चिन्तन करनेवाला भक्त इस प्रकार 'प्राप्ति' नामकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है।।
जो पुरुष मुझ महत्तत्त्वाभिमानी सूत्रात्मा में अपना चित्त स्थिर करता है, उसे मुझ अव्यक्तजन्मा ( सूत्रात्मा ) की 'प्राकाम्य' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है -
जिससे इच्छानुसार सभी भोग प्राप्त हो जाते हैं।।
जो त्रिगुणमयी माया के स्वामी मेरे कालस्वरूप विश्वरूप की धारणा करता है, वह शरीरों और जीवों को अपने इच्छानुसार प्रेरित करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है।
इस सिद्धि का नाम 'ईशित्व' है।।
जो योगी मेरे नारायण - स्वरूपमें - जिसे तुरीय और भगवान् भी कहते हैं -
मन को लगा देता है, मेरे स्वाभाविक गुण उसमें प्रकट होने लगते हैं और उसे 'वशिता' नामकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है।।
निर्गुण ब्रह्म भी मैं ही हूँ।
जो अपना निर्मल मन मेरे इस ब्रह्मस्वरूप में स्थित कर लेता है, उसे परमानन्द - स्वरूपिणी 'कामावसायिता' नामकी सिद्धि प्राप्त होती है।
इस के मिलनेपर उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, समाप्त हो जाती हैं।।
|| श्रीमद्भागवत 11/15 ||
*🙏जय माताजी🙏*
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जय जय श्री राधे
!! गलती का पश्चाताप !!
अध्यापक द्वारा कक्षा में गणित की परीक्षा ली गई।
परीक्षा लेने से पहले उन्होंने सभी विद्यार्थियों से कहा, “जो विद्यार्थी सबसे अधिक अंक प्राप्त करेगा उसे पुरस्कार दिया जाएगा।”
परीक्षा में केवल एक ही प्रश्न दिया गया।
सभी विद्यार्थी उस प्रश्न को हल करने और पुरस्कार प्राप्त करने में जुट गये।
लेकिन प्रश्न अत्यंत कठिन था, सरलता से हल नहीं किया जा सकता था।
सभी विद्यार्थी जी जान से जुटे हुए थे।
बहुत समय तक कोई भी विद्यार्थी उस प्रश्न को हल नहीं कर सका।
अंत में एक बालक प्रश्न हल करके अध्यापक के सामने पहुँचा।
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अध्यापक महोदय ने प्रश्न और उसका हल देखा और पाया कि हल सही है।
उन्होंने इन्तजार किया कि शायद अन्य कोई विद्यार्थी भी सही हल निकाल कर ले आए, किन्तु देर तक कोई भी विद्यार्थी सही हल नहीं निकाल सका।
समय पूरा हो चुका था।
अध्यापक महोदय ने सही हल निकालकर लाने वाले को पुरस्कार दिया।
पुरस्कार – प्राप्त विद्यार्थी नाचते गाते खुशी से झूमते अपने घर पहुँचा।
दूसरे सभी विद्यार्थी हैरान थे कि यह लड़का सही हल कैसे निकाल सका, क्योंकि पढ़ने – लिखने में वह बालक मंदबुद्धि था।
अगले दिन अध्यापक महोदय ज्यों ही कक्षा में आए, त्यों ही पुरस्कार – प्राप्त विद्यार्थी लपक कर उनके चरणों से लिपट गया और फूट – फूट कर रोने लगा।
सभी विद्यार्थी और अध्यापक हैरान थे कि इसे क्या हो गया है।
अध्यापक ने उससे पूछा, “क्या बात हैं तुम रोते क्यों हो ?
तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि पुरस्कार प्राप्त करके तुमने अच्छा विद्यार्थी होने का प्रमाण दिया है। ”
वह बालक रोते हुए बोला, “आप यह पुरस्कार वापस ले लिजीए श्रीमान !”
“पर क्यों ?”
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अध्यापक ने पूछा।
“इसलिए कि मैं इस पुरस्कार का अधिकारी नहीं हूँ।
मैंने पुस्तक में से देखकर, चोरी करके प्रश्न सही हल निकाला था।
मैंने अपनी योग्यता से सही हल नहीं निकाला था।
आप यह पुरस्कार वापस ले लीजिए और मेरी भूल के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए।
भविष्य में मैं ऐसी गलती कभी दोबारा नहीं करूँगा, बालक ने कहा।”
अध्यापक ने उसे वापस बुलाकर कहा, “सही हल तुम्हें नहीं आया, लेकिन धोखा देना भी तुम्हें नहीं आता।
धोखा देना और चोरी करना तुम्हारा स्वभाव नहीं है, इस लिए कल घर जाने के बाद तुम्हारा मन दुखी रहा और तुमने सही बात कह डाली।
तुमने सही हल नही निकाला मुझे इसका इसका दुःख नहीं है, पर तुमने सही बात कह डाली, उसकी मुझे बहुत खुशी है।
गलती मान लेने वाले बालक बड़े होकर बड़ा नाम और काम करते है।”
आगे चलकर यह बालक न्यायमूर्ति गोपाल कृष्ण गोखले के नाम से जाना गया ।।
जय जय श्री राधे।।
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*🙏जय श्री मुरलीधर 🙏*
|| मीरा चरित ||
क्रमशः से आगे ............
🌿 मीरा दिव्य द्वारिका में महारानी रूक्मिणी जी के साथ बैठी है।
वहाँ आलौकिक पेय रस के सेवन पश्चात मीरा षोडश वर्षीया किशोरी सी सुकुमारी हो गई ।
उसी समय सम्मुख द्वार से राजमहिषियों ने प्रवेश किया ।
देवी रूक्मिणी और मीरा उनके स्वागत में उठ खड़ी हुईं।
देवी ने दो पद आगे बढ़कर सबका स्वागत करते हुये कहा ," पधारो बहिनों !
अपनी इस छोटी बहिन से मिलिये। "
आनेवाली महारानियों ने महादेवी के चरण स्पर्श किए और उन्हें आलिगंन दिया।
मीरा ने भी भूमि पर सिर रखकर सबका एकसाथ अभिवादन किया।
सब के आसन ग्रहण करने के पश्चात देवी ने उनका परिचय कराते हुए बताया ," यह मेरी छोटी बहिन सत्यभामा ,यह.......। "
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अब बस सरकार !
बाकी सबसे परिचय कराने का अधिकार मुझे मिले !
यों भी आप हमारी ज्येष्ठा हो !
" हँसते हुये मधुर स्वर में सत्यभामा ने कहा - "
यह है देवी जाम्बवती ,मेरी बड़ी बहिन !
" हरित परिधान धारण किए संकोचशीला जाम्बवती ने मुस्कुरा कर चिबुक स्पर्श किया ।"
यह देवी भद्रा , यह मित्रविन्दा , यह सत्या , यह लक्ष्मणा और यह रविनन्दिनी कालिन्दी।
" मुस्कराते , परिहास करते सब महारानियाँ क्रमवत अतिशय स्नेह से मीरा को मिली , किसी ने आलिंगन किया ,किसी ने कहा ,"
बहिन !
तुम्हें मिलने की बड़े दिनों से लालसा थी।
" सबके हँसने से यूँ लगा जैसे बहुत सी चाँदी की नन्हीं घंटियाँ एक साथ टनटनाई हो !!!!!!!"
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" और ये हमारी बहिनें सोलह सहस्त्र एक सौ !"
मीरा ने सबको एकसाथ हाथ जोड़कर और मस्तक नवा कर प्रणाम किया।
तभी लक्ष्मणा जी हँसती हुई बोली ," सरकार !
हमारी बहिन इस तरह आभूषण और श्रृगांर के बिना रहे......!
लगता है हमें ही वैराग्य का उपदेश करने कोई वैष्णवी आई हो ! "
सबने लक्ष्मणा की बात का अनुमोदन किया।
🌿 "इसे पृथक महल में भेजकर श्रृगांर धारण कराने की व्यवस्था की है मैंने !"
देवी रूक्मिणी बोली।
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" तुम बोलती क्यों नहीं बहिन !
तनिक अपने मुख से बोलो तो मन प्रसन्न हो !
तुम्हारा नाम क्या है ?"
देवी मित्रविन्दा ने स्नेहासिक्त स्वर से पूछा।
" जी क्या निवेदन करूँ ?
यह मीरा आपकी अनुगता दासी है।
मुझे भी सेवा प्रदान कर कृतार्थ करें " मीरा ने सकुचाते हुये कहा ।
" तो हमारे दुलार से , स्नेह से , तुम्हें कृतार्थता का बोध नहीं हुआ बहिन ?"
सत्यभामा जी हँसी।
मीरा ने अचकचाकर पलकें उठाई ," सरकार !
आप सबके कृपा अनुग्रह से दासी धन्य - कृतार्थ हुईं है। "
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🌿 तभी सैरन्ध्री मीरा को श्रृगांर हेतु लेने आ गई।
मणि प्रदीप्त कक्ष में मीरा को सुगन्धित जल से स्नान करा, अगुरू धूप से केश सुखाये।
अमूल्य दिव्य वस्त्र अलंकार धारण करा कर सुन्दर रीति से केश प्रसाधन किया।
उसका सौन्दर्य द्वारिकाधीश की महिषियों से तनिक भी न्यून नहीं लग रहा था।
सोलह श्रृगांर से सुसज्जित कर दासियों ने उन्हें देवी जाम्बवती के पास बिठा दिया।
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🌿 " अहा ! देखो कितनी सुन्दर लग रही है हमारी बहिन !"
सत्या ने मीरा का चिबुक उठाकर ऊपर दिखाया।
मीरा तो संकोच की प्रतिमा सी पलकें झुकाई बैठी रही जैसे अभी अभी विवाह मण्डप से उठकर आई हो।
थोड़ी ही देर में संगीत और नृत्य का समाज जुट गया।
सब महारानियाँ बारी से नृत्य करने लगी।
सत्यभामा ने मीरा को अपने साथ ले लिया।
कितने समय तक यह नृत्योत्सव चलता रहा ।
इसके पश्चात दासियाँ पुनः पेय लेकर प्रस्तुत हुई ।
और उसके बाद भोजन की तैयारी ।
इतने राग - रंग में मीरा को प्रसन्नता तो हुईं पर मन ही मन वह प्राणप्रियतम के दर्शन के लिए आकुल थी।
भोजन के समय भी प्रभु को वहाँ न पा उससे रहा नहीं गया।
मीरा ने सकुचाते हुये जाम्बवती से पूछ ही लिया ,"प्रभु के भोजन से पूर्व ही हम भोजन कर लें ?"
क्रमशः ..................
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