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जय द्वारकाधीश
।। अष्ट सिद्धि दाता रहस्य कथा।।
अष्ट सिद्धि दाता रहस्य कथा ;
श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत • श्री गणेश महापुराण, शिव महापुराण एवं व्रत - पुराण आधारित प्रवचन !
मंगलाचरण
ॐ श्री गणेशाय नमः।
विघ्नों का नाश करने वाले, बुद्धि और विवेक प्रदान करने वाले, समस्त सिद्धियों के दाता भगवान श्री गणेश को नमन।
जिनके स्मरण से शुभ कार्य का आरंभ होता है, जिनकी उपासना से साधक के भीतर ज्ञान, श्रद्धा, संयम और सदाचार का प्रकाश उत्पन्न होता है, उन गणपति भगवान की महिमा अनंत है।
श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत में आज का प्रवचन है—
अष्ट सिद्धि दाता रहस्य कथा।
इस विषय का शास्त्रोक्त विवेचन भगवान गणेश, भगवान शिव और सनातन धर्म की साधना - परंपरा के आधार पर किया जाएगा।
इस में किसी काल्पनिक व्यक्ति, देश या गांव की कहानी नहीं है।
यहां पुराणों में वर्णित सिद्धांत, देवताओं की महिमा और साधना के वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ को समझने का प्रयास है।
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अष्ट सिद्धियों का वास्तविक रहस्य ;
अष्ट सिद्धियां केवल चमत्कार प्राप्त करने की वस्तुएं नहीं हैं।
योग और पुराणों में इनका संबंध साधना से प्राप्त विशेष शक्तियों से है।
भगवान गणेश को अष्ट सिद्धियों का दाता कहा जाता है, क्योंकि वे बुद्धि, विवेक, विघ्नविनाश और शुभ आरंभ के अधिष्ठाता देव हैं।
आठ सिद्धियों के नाम हैं—
१ अणिमा
अणु के समान सूक्ष्म होने की सिद्धि।
२ महिमा
अत्यंत विशाल स्वरूप धारण करने की सिद्धि।
३ गरिमा
अत्यधिक भारी होने की सिद्धि।
४ लघिमा
अत्यंत हल्का होने की सिद्धि।
५ प्राप्ति
इच्छित वस्तु या स्थान की प्राप्ति करने की क्षमता।
६ प्राकाम्य
इच्छित कार्य या अनुभव की सिद्धि।
७ ईशित्व
अधिकार और नियंत्रण की विशेष शक्ति।
८ वशित्व
वश में करने या नियंत्रण रखने की शक्ति।
इन सिद्धियों का विस्तृत वर्णन योगशास्त्र में मिलता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव को योग - सिद्धियों का ज्ञान दिया है।
वहां अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व सहित सिद्धियों का उल्लेख है।
इस प्रकार अष्ट सिद्धियों की परंपरा का आधार योगशास्त्र और पुराण दोनों में दिखाई देता है।
भगवान गणेश और अष्ट सिद्धियों का संबंध ;
शिव महापुराण के रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड में गणेशजी के विवाह का प्रसंग आता है।
प्रजापति विश्वरूप की दो कन्याएं सिद्धि और बुद्धि थीं।
भगवान शिव और माता पार्वती ने उनका विवाह गणेशजी के साथ कराया।
सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ नामक पुत्रों का जन्म हुआ।
यह प्रसंग गणेशजी की महिमा में सिद्धि, बुद्धि, क्षेम और लाभ के संबंध को स्पष्ट करता है।
यहां एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय अंतर समझना चाहिए।
शिव महापुराण में सिद्धि और बुद्धि को गणेशजी की पत्नियों के रूप में वर्णित किया गया है, जबकि योगशास्त्र में अणिमा आदि आठ विशेष शक्तियों को सिद्धियां कहा गया है।
दोनों संदर्भों को एक ही अर्थ में मिलाना उचित नहीं है।
गणेशजी की उपासना का रहस्य यह है कि साधक केवल बाहरी सफलता नहीं मांगता, बल्कि बुद्धि और सिद्धि दोनों के संतुलन की प्रार्थना करता है।
बुद्धि के बिना सिद्धि अहंकार का कारण बन सकती है और सिद्धि के बिना बुद्धि का उचित उपयोग कठिन हो सकता है।
अणिमा सिद्धि — सूक्ष्मता का ज्ञान ;
अणिमा का अर्थ है अणु के समान सूक्ष्म होने की क्षमता।
योगपरंपरा में इसे शरीर या चेतना को अत्यंत सूक्ष्म करने वाली सिद्धि के रूप में समझाया गया है।
इस सिद्धि का आध्यात्मिक संदेश है कि साधक को अपने अहंकार को सूक्ष्म करना चाहिए। जो मनुष्य हर बात में अपना बड़ा होना सिद्ध करना चाहता है, वह ज्ञान से दूर रहता है।
भगवान गणेश का छोटा - सा मूषक वाहन भी साधक को स्मरण कराता है कि विशाल बुद्धि का अधिष्ठाता देव सूक्ष्म से सूक्ष्म विषय को समझने की क्षमता रखता है।
अणिमा का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक भक्त साधना के द्वारा भौतिक रूप से अदृश्य या सूक्ष्म हो जाएगा।
शास्त्रीय वर्णन में यह योग - सिद्धि है; सामान्य भक्त के लिए इसका श्रेष्ठ फल विवेक, निरीक्षण और विनम्रता है।
महिमा सिद्धि — विराट चेतना ;
महिमा का अर्थ अत्यंत विशाल स्वरूप धारण करना है।
योगशास्त्र में यह अणिमा के विपरीत विस्तार की सिद्धि मानी गई है।
भगवान गणेश का विशाल उदर, गजमुख और व्यापक स्वरूप हमें यह संदेश देता है कि परम ज्ञान सीमित दृष्टि में बंधा नहीं रहता।
गणेशजी को प्रथम पूज्य कहा जाता है, क्योंकि शुभ कार्य से पहले मन को एकाग्र करना, बुद्धि को जागृत करना और विघ्नों को पहचानना आवश्यक है।
महिमा का आध्यात्मिक अर्थ है—
अपने संकुचित विचारों से ऊपर उठना।
जो केवल अपने लाभ को देखता है, वह संकीर्ण दृष्टि में रहता है।
जो समस्त प्राणियों के कल्याण को समझता है, उसकी चेतना व्यापक होती है।
गरिमा और लघिमा — स्थिरता तथा हल्कापन ;
गरिमा का अर्थ अत्यंत भारी होने की सिद्धि और लघिमा का अर्थ अत्यंत हल्का होने की सिद्धि है।
ये दोनों अष्ट सिद्धियों में वर्णित योगिक शक्तियां हैं।
गरिमा का आध्यात्मिक संदेश है कि धर्म, सत्य और कर्तव्य में मनुष्य दृढ़ रहे।
जीवन में कठिनाइयां आएं तो श्रद्धा डगमगाए नहीं।
लघिमा का संदेश है कि मन पर अनावश्यक चिंता, क्रोध और मोह का बोझ न रखा जाए।
भगवान गणेश का स्मरण करते समय साधक को यह विचार करना चाहिए कि उसका मन किस बोझ से दबा है।
क्या वह पुरानी चिंता, अहंकार, लोभ या ईर्ष्या को पकड़े हुए है ?
गणेश उपासना मन को हल्का करने और कर्तव्य में स्थिर होने का अवसर देती है।
प्राप्ति सिद्धि — योग्य वस्तु की प्राप्ति ;
प्राप्ति का अर्थ इच्छित वस्तु या स्थान की प्राप्ति करने की क्षमता है।
प्राकाम्य का अर्थ इच्छित कार्य या अनुभव की सिद्धि है।
योगशास्त्र में इन दोनों का वर्णन अष्ट सिद्धियों के अंतर्गत किया गया है।
इन सिद्धियों का रहस्य समझते समय एक बात महत्वपूर्ण है—
हर इच्छा पूरी होना ही आध्यात्मिक सफलता नहीं है।
यदि इच्छा धर्म के विरुद्ध हो, तो उसकी पूर्ति भी कल्याणकारी नहीं हो सकती।
गणेशजी बुद्धि के देवता हैं।
इस लिए उनकी उपासना में प्राप्ति के साथ विवेक की प्रार्थना की जाती है।
साधक को कहना चाहिए कि हे गणपति, मुझे वही प्राप्त हो जो मेरे धर्म, कर्तव्य और आत्मकल्याण के लिए उचित हो।
ईशित्व और वशित्व — अधिकार का संयम ;
ईशित्व को अधिकार या नियंत्रण की शक्ति तथा वशित्व को वश में करने की शक्ति कहा गया है।
ये भी योगपरंपरा की अष्ट सिद्धियों में गिनी जाती हैं।
इन सिद्धियों का आध्यात्मिक संदेश सबसे गहरा है।
संसार पर अधिकार प्राप्त करने से पहले मनुष्य को अपने मन पर संयम प्राप्त करना चाहिए।
यदि मन क्रोध, लोभ और अहंकार के वश में है, तो बाहरी अधिकार भी स्थायी शांति नहीं दे सकता।
भगवान गणेश की उपासना में बुद्धि और सिद्धि का संबंध इसी कारण महत्वपूर्ण है।
सिद्धि को बुद्धि के अधीन रखना चाहिए, और बुद्धि को धर्म के अधीन।
यह साधना का मार्ग है, चमत्कार के पीछे भागने का नहीं।
श्री गणेश महापुराण में अष्ट सिद्धियों का आध्यात्मिक संकेत ;
श्री गणेश महापुराण भगवान गणेश की उत्पत्ति, स्वरूप, उपासना, व्रत और महिमा का प्रमुख पुराण है।
गणेशजी को विघ्नराज, एकदंत, लंबोदर, गजानन, सिद्धिविनायक और बुद्धिप्रदायक जैसे नामों से संबोधित किया जाता है।
इन नामों में उनके विभिन्न गुणों का संकेत मिलता है।
गणेशजी की उपासना में सिद्धि का अर्थ केवल योगिक शक्ति नहीं है।
सिद्धि का एक सामान्य अर्थ किसी शुभ कार्य की सफलता, साधना की पूर्णता और ज्ञान की उपलब्धि भी है।
इस लिए गणेशजी को अष्ट सिद्धि दाता कहने का अर्थ यह भी है कि वे साधक को जीवन के आठों प्रकार के आंतरिक विकास की ओर ले जाते हैं।
शास्त्रों में गणेशजी के अनेक स्वरूपों और नामों का वर्णन मिलता है।
गणेश महापुराण में गणपति के स्वरूप, उपासना और उनके विभिन्न अवतारों का विवेचन किया गया है।
यहां से यह शिक्षा मिलती है कि गणेशजी का स्मरण केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और कर्म को शुभ दिशा देने की साधना है।
शिव महापुराण में गणेशजी की महिमा ;
शिव महापुराण के रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड में गणेशजी के विवाह का वर्णन सिद्धि और बुद्धि के साथ किया गया है।
प्रजापति विश्वरूप की कन्याएं सिद्धि और बुद्धि थीं, और उनका विवाह गणेशजी के साथ हुआ।
उनके पुत्रों के नाम क्षेम और लाभ बताए गए हैं।
इस प्रसंग का आध्यात्मिक संदेश स्पष्ट है।
सिद्धि के साथ बुद्धि हो तो जीवन में क्षेम और लाभ का मार्ग खुलता है।
केवल धन की प्राप्ति लाभ नहीं है; जीवन में शांति, स्वास्थ्य, सदाचार, परिवार का कल्याण और धर्म में स्थिरता भी क्षेम है।
गणेशजी की पूजा करते समय इस प्रसंग को स्मरण करने का अर्थ है कि साधक अपने जीवन में सिद्धि और बुद्धि का संतुलन मांगे।
बुद्धि के बिना प्राप्त सामर्थ्य अहंकार को बढ़ा सकती है।
बुद्धि के साथ प्राप्त सामर्थ्य सेवा और कल्याण का साधन बन सकती है।
शिव उपासना और सिद्धि का संबंध ;
शिव महापुराण में अष्ट सिद्धियों का उल्लेख शिव की उपासना के प्रसंग में भी आता है।
एक शास्त्रीय वर्णन में अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व और कामावसायिता का उल्लेख है।
कुछ परंपराओं में अंतिम सिद्धि के स्थान पर सर्वज्ञत्व भी कहा गया है।
यहां एक आवश्यक सावधानी है।
विभिन्न पुराणों, योगग्रंथों और परंपराओं में अष्ट सिद्धियों के नामों की सूची में अंतर मिलता है।
इस लिए किसी एक सूची को सभी शास्त्रों की एकमात्र प्रमाणित सूची कहना उचित नहीं है।
शिवजी को महायोगी कहा गया है।
उनकी उपासना में सिद्धि का उद्देश्य आत्मज्ञान और बंधन से मुक्ति की दिशा में बढ़ना है।
भगवान गणेश शिव - पार्वती के पुत्र हैं, इस लिए गणेश उपासना और शिव उपासना में आध्यात्मिक संबंध है।
गणेशजी विघ्नों का नाश करते हैं और शिवजी साधक को ज्ञान तथा वैराग्य की दिशा में ले जाते हैं।
व्रत - पुराण और गणेश चतुर्थी का महत्व ;
गणेश व्रत की परंपरा में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का विशेष महत्व है।
इस दिन भगवान गणेश की स्थापना, पूजा, मंत्रजप और नैवेद्य अर्पण किया जाता है।
विभिन्न व्रत - ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं में गणेश चतुर्थी के नियमों तथा पूजा-विधि का वर्णन मिलता है।
गणेश व्रत का वास्तविक उद्देश्य केवल मनोकामना पूरी करना नहीं है।
व्रत का अर्थ है अपने मन को किसी शुभ संकल्प में स्थिर करना।
उपवास से शरीर पर संयम, पूजा से मन में श्रद्धा और मंत्रजप से बुद्धि में एकाग्रता का अभ्यास होता है।
गणेशजी को दूर्वा, मोदक, सिंदूर, लाल पुष्प और नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा है।
इन वस्तुओं का धार्मिक महत्व है, परंतु केवल सामग्री अर्पित कर देने से साधना पूर्ण नहीं होती।
शुद्ध आचरण, सत्य वचन और किसी के प्रति अनावश्यक द्वेष न रखना भी पूजा का महत्वपूर्ण भाग है।
अष्ट सिद्धि का सच्चा फल क्या है ?
आध्यात्मिक दृष्टि से अष्ट सिद्धियों का सर्वोत्तम फल मनुष्य के भीतर होने वाला परिवर्तन है।
यदि साधक गणेशजी की उपासना करता है और उसके जीवन में बुद्धि, विनम्रता, धैर्य, संयम तथा सेवा की भावना बढ़ती है, तो यह साधना की सफलता का महत्वपूर्ण संकेत है।
शिव महापुराण के एक प्रसंग में शिवजी के नाम, भस्म और रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन किया गया है।
वहां शिवनाम - जप को पापों और संसार के दुखों से मुक्ति के लिए अत्यंत प्रभावी साधन बताया गया है।
इस से यह शिक्षा मिलती है कि देवता की उपासना का लक्ष्य केवल बाहरी चमत्कार नहीं, बल्कि भीतर के दोषों का क्षय और आत्मिक शांति की प्राप्ति है।
गणेशजी के नाम का जप करते समय साधक अपने मन में यह संकल्प रखे कि वह क्रोध, लोभ, अहंकार, छल और असत्य से दूर रहने का प्रयास करेगा।
साधना में गुरु और शास्त्र का स्थान ;
योगिक सिद्धियों के संबंध में शिव महापुराण में गुरु, शांति, वैराग्य और योगाभ्यास का महत्व बताया गया है।
साधना के गूढ़ ज्ञान को योग्य शिष्य को देने की परंपरा भी वर्णित है।
इस लिए अष्ट सिद्धि प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार के तांत्रिक प्रयोग, अज्ञात औषधि, जोखिमपूर्ण तपस्या या अंधविश्वास का सहारा लेना उचित नहीं है।
शास्त्रों का अध्ययन, योग्य गुरु का मार्गदर्शन, नियमित जप और सदाचार साधना का सुरक्षित तथा सार्थक मार्ग है।
गणेशजी की सरल उपासना में किसी विशेष सिद्धि की इच्छा से अधिक महत्व श्रद्धा और नियमितता का है।
यदि कोई साधक केवल धन, शक्ति या दूसरों को नियंत्रित करने की इच्छा से पूजा करता है, तो वह गणेश उपासना के व्यापक आध्यात्मिक उद्देश्य को सीमित कर देता है।
अष्ट सिद्धि और आधुनिक जीवन का संदेश ;
आज के जीवन में मनुष्य अनेक प्रकार के तनाव, चिंता, लोभ और प्रतिस्पर्धा से घिरा रहता है।
ऐसे समय में गणेशजी की उपासना मन को शांत करने और जीवन के कर्तव्यों को व्यवस्थित करने में सहायक आध्यात्मिक अभ्यास हो सकती है।
अणिमा हमें सूक्ष्म निरीक्षण सिखाती है।
महिमा हमें व्यापक दृष्टि देती है।
गरिमा धैर्य और स्थिरता का संकेत है।
लघिमा मन का बोझ कम करने की प्रेरणा देती है।
प्राप्ति और प्राकाम्य हमें उचित लक्ष्य की ओर बढ़ने का संदेश देते हैं।
ईशित्व और वशित्व हमें अपने अधिकार तथा इच्छाओं पर संयम रखने की शिक्षा देते हैं।
यह व्याख्या अष्ट सिद्धियों का आधुनिक आध्यात्मिक अर्थ है, न कि योगिक शक्तियों का शास्त्रीय पर्याय।
वास्तविक योग - सिद्धियों के वर्णन और उनके आध्यात्मिक संकेत में अंतर समझना आवश्यक है।
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अष्ट सिद्धियों के दाता ;
प्रिय उद्धव! पंचभूतों की सूक्ष्मतम मात्राएँ मेरा ही शरीर है।
जो साधक केवल मेरे उसी शरीर की उपासना करता है और अपने मन को तदाकार बनाकर उसी में लगा देता है अर्थात् मेरे तन्मात्रात्मक शरीर के अतिरिक्त और किसी भी वस्तुका चिन्तन नहीं करता, उसे 'अणिमा' नामकी सिद्धि अर्थात् पत्थर की चट्टान आदि में भी प्रवेश करने की शक्ति - अणुता प्राप्त हो जाती है।।
महत्तत्त्वके रूपमें भी मैं ही प्रकाशित हो रहा हूँ और उस रूप में समस्त व्यावहारिक ज्ञानों का केन्द्र है।
जो मेरे उस रूपमें अपने मन को महत्तत्त्वाकार करके तन्मय कर देता है, उसे 'महिमा' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है,और इसी प्रकार आकाशादि पंचभूतोंमें - जो मेरे ही शरीर हैं - अलग - अलग मन लगाने से उन - उनकी महत्ता प्राप्त हो जाती है, यह भी 'महिमा' सिद्धिके ही अन्तर्गत है।।
जो योगी वायु आदि चार भूतों के परमाणुओं को मेरा ही रूप समझकर चित्त को तदाकार कर देता है, उसे लघिमा' सिद्धि प्राप्त हो जाती है -
उसे परमाणुरूप कालके समान सूक्ष्म वस्तु बननेका सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है।।
जो सात्त्विक अहंकार को मेरा स्वरूप समझकर मेरे उसी रूप में चित्तकी धारणा करता है, वह समस्त इन्द्रियों का अधिष्ठाता हो जाता है।
मेरा चिन्तन करनेवाला भक्त इस प्रकार 'प्राप्ति' नामकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है।।
जो पुरुष मुझ महत्तत्त्वाभिमानी सूत्रात्मा में अपना चित्त स्थिर करता है, उसे मुझ अव्यक्तजन्मा ( सूत्रात्मा ) की 'प्राकाम्य' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है -
जिससे इच्छानुसार सभी भोग प्राप्त हो जाते हैं।।
जो त्रिगुणमयी माया के स्वामी मेरे कालस्वरूप विश्वरूप की धारणा करता है, वह शरीरों और जीवों को अपने इच्छानुसार प्रेरित करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है।
इस सिद्धि का नाम 'ईशित्व' है।।
जो योगी मेरे नारायण - स्वरूपमें - जिसे तुरीय और भगवान् भी कहते हैं -
मन को लगा देता है, मेरे स्वाभाविक गुण उसमें प्रकट होने लगते हैं और उसे 'वशिता' नामकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है।।
निर्गुण ब्रह्म भी मैं ही हूँ।
जो अपना निर्मल मन मेरे इस ब्रह्मस्वरूप में स्थित कर लेता है, उसे परमानन्द - स्वरूपिणी 'कामावसायिता' नामकी सिद्धि प्राप्त होती है।
इस के मिलनेपर उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, समाप्त हो जाती हैं।।
|| श्रीमद्भागवत 11/15 ||
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गणेशजी की सरल उपासना - विधि ;
दैनिक गणेश साधना !
श्रद्धा, स्वच्छता और सदाचार के साथ।
प्रातः स्नान करके स्वच्छ स्थान पर भगवान गणेश का स्मरण करें।
गणेशजी को पुष्प, दूर्वा और नैवेद्य अर्पित करें, यदि उपलब्ध हो।
“ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें।
अपने कार्यों में सत्य, संयम और किसी के प्रति अनावश्यक अहित न करने का संकल्प लें।
अंत में प्रार्थना करें कि गणेशजी बुद्धि, विवेक और धर्ममय जीवन प्रदान करें।
यह एक सामान्य भक्ति - आधारित उपासना है।
किसी विशेष तांत्रिक या दीक्षा - आधारित साधना को बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के नहीं करना चाहिए।
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उपसंहार — सिद्धि से अधिक बुद्धि का महत्व ;
अष्ट सिद्धि दाता भगवान गणेश की महिमा का वास्तविक रहस्य यह है कि सिद्धि को बुद्धि से और बुद्धि को धर्म से जोड़कर देखा जाए।
श्री गणेश महापुराण में गणेशजी की उपासना और महिमा, शिव महापुराण में सिद्धि - बुद्धि का विवाह तथा योग - पुराणों में अष्ट सिद्धियों का वर्णन—
इन सभी से साधक को अपने जीवन में विवेक और शुभ कर्म की प्रेरणा मिलती है।
जो मनुष्य गणेशजी का स्मरण करता है, वह केवल अपने लिए सफलता की मांग न करे, बल्कि यह भी प्रार्थना करे कि उसकी बुद्धि धर्म में स्थिर रहे, उसके कर्म दूसरों के लिए हितकारी हों और उसके जीवन में अहंकार का नाश हो।
हे विघ्नहर्ता, हे सिद्धिविनायक, हे बुद्धिप्रदायक गणपति! हमें ऐसी सिद्धि प्रदान करें जिससे हमारा मन पवित्र हो, हमारी बुद्धि सत्य को पहचाने, हमारा आचरण धर्ममय हो और हमारे कर्मों से समस्त प्राणियों का कल्याण हो।
ॐ गं गणपतये नमः।
श्री गणेशाय नमः।
जय जय श्री राधे।।
*🙏जय श्री मुरलीधर 🙏*
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