*श्रीमहालक्ष्मी व्रत कथा* *यह_व्रत_भाद्रपदमास_के_शुक्लपक्ष_की

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

*श्रीमहालक्ष्मी व्रत कथा* 

*यह_व्रत_भाद्रपदमास_के_शुक्लपक्ष_की_अष्टमी_को_आरंभ_करके_आश्विनमास_की_कृष्णपक्ष_अष्टमी_को_समाप्त_किया_जाता_है*  

एक समय महर्षि द्वैपायन व्यास जी हस्तिनापुर आये। 

उनका आगमन सुन समस्त राजकुल के कर्मचारी महाराज धृतराष्ट्र तथा भीष्म सहित उनका सम्मान आदर कर राजमहल में स्वर्ण के सिंहासन पर विराजमान कर अर्घ्य पाद्य आचमन से उनका पूजन किया।  






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व्यास जी के स्वस्थचित्त होने पर राजरानी गंधारी ने महर्षि व्यास जी से हाथ जोड़कर प्रश्न किया ? 

*गांधारी बोली* हे महाराज ! 

आप त्रिकालज्ञ, तत्वदर्शी हैं, आपसे हमारी प्रार्थना है कि हम स्त्रियों को कोई ऐसा व्रत व सरल पूजन बताइए जिससे हमारी राजलक्ष्मी, सुख, पुत्र-पौत्र, परिवार सदा सुखी रहे। 

इतना सुनकर व्यास जी ने कहा 

*व्यास जी बोले* – हम ऐसे व्रत - पूजन का उल्लेख कर रहे हैं, जिससे सदा लक्ष्मी जी स्थिर होकर सुख प्रदान करेंगी।

वह श्री महालक्ष्मी व्रत है।  

जिसका पूजन प्रतिवर्ष आश्विन मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को माना जाता है। 

*तब राजरानी गंधारी ने कहा* – 

हे महात्मन ! 

यह व्रत कैसे आरंभ होता है किस विधि से पूजन होता है ?  

यह विस्तार से बताने का कष्ट करें तब महर्षि जी ने कहा – 

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन सुबह व्रत का मन में संकल्प कर किसी जलाशय में जाकर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहने। 

तत्पश्चात ताजी दूर्वा से महालक्ष्मी जी को जल का तर्पण करके प्रणाम करना चाहिए, और फिर आकर शुद्ध 16 धागों का एक गण्डा बनाकर प्रतिदिन एक गांठ लगानी चाहिए,

इस प्रकार 16 दिनों का 16 गाँठ का एक गण्डा तैयार कर अश्वनी मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी को व्रत रखकर, मंडप बनाकर चँदोवा तानकर उसके नीचे माटी के हाथी पर महालक्ष्मी की मूर्ति स्थापित कर तरह - तरह की पुष्प मालाओं सर श्री लक्ष्मी जी व हाथी का पूजन करके कई पकवान सुवासित पदार्थों का नैवेद्य समर्पण करें । 

तत्पश्चात श्रद्धा सहित महालक्ष्मी व्रत करने से आप लोगों की राजलक्ष्मी सदा स्थिर रहेगी, ऐसा विधान बताकर व्यास जी अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए।

इधर समय अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से समस्त राजघरानों की नारियों ने व नगर – स्त्रियों ने श्री महालक्ष्मी व्रत का आरंभ कर दिया बहुत सी नारीयाँ गांधारी के साथ प्रतिष्ठा मान हेतु व्रत का साथ देने लगी ! 

कुछ नारीयाँ माता कुंती के साथ भी व्रत का आरंभ करने लगी परंतु गांधारी जी द्वारा कुछ द्वेष भाव होने लगा, ऐसा होते होते 15 दिन व्रत के समाप्त होने लगे, होकर सोलहवाँ दिन आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी का आ गया  उस दिन प्रातः काल से नगर नारियों ने उत्सव मनाना आरंभ कर दिया और समस्त नर-नारी राज महल में गांधारी जी के यहां उपस्थित हो तरह - तरह से महालक्ष्मी जी के मंडप व माटी के हाथी बनाने सजाने की बड़ी तैयारियां होने लगी।  

गांधारी जी अपने नगर की सभी प्रतिष्ठित नारियों को बुलाने को सेवक भेजें पर माता कुंती को नहीं बुलाया गया और ना कोई सूचना भेजी उत्सव वाद्य की धुन गुँजारने  लगी जिससे सारे हस्तिनापुर में खुशी की लहर दौड़ गई माता कुंती ने इस अवसर पर अपना अपमान समझकर बड़ा रंज मनाया और व्रत की कोई तैयारी न  की इतने में महाराज युधिष्ठिर, अर्जुन, भीमसेन, नकुल, सहदेव पांचो पांडव उपस्थित हो गए। 

तब अपनी माता को गंभीर देख अर्जुन ने प्रार्थना की हे माता !

आप इतनी दुखी क्यों हो ?  

क्या हम भी आपके दुख का कारण जान सकते हैं और दुख दूर करने में भी सहायक हो सकते हैं । 

आप बताएं तब माता कुंती ने कहा बेटा जाति अपमान से बढ़कर कोई दुख नहीं होता है । 

आज नगर में श्री महालक्ष्मी व्रत उत्सव में  रानी गंधारी ने सारे नगर की सारी औरतों पर मान देकर बुलवाया हैं परंतु तुमसे ईर्ष्यावश मेरा अपमान कर उत्सव में नहीं बुलाया। 

तो पार्थ ने कहा हे माता ! 

क्या वह पूजा का विधान सिर्फ दुर्योधन के महल में ही हो सकता है आप अपने घर नहीं कर सकती ? 

तब कुंती ने कहा बेटा कर सकती हूँ पर वह साज समान इतनी जल्दी नहीं उपलब्ध हो सकता क्योंकि गांधारी के सौ पुत्र पुत्रों ने माटी का विशाल हाथी तैयार करके पूजन का साज सजाया है , वह ऐसा विधान तुमसे नहीं बन सकेगा और उनके उत्सव की तैयारी आज दिन भर से हो रही है तब पार्थ ने कहा हे माता ! 

आप पूजा की तैयारी कर नगर में बुलावा फिरावेन, मैं ऐसे हाथी पूजन को बुला रहा हूं जो आज तक हस्तिनापुर वासियों ने ना देखा ना पूजन किया होगा।

मैं आज ही इंद्रलोक से इंद्र का हाथी *ऐरावत* जो पूजनीय है उसे बुलाकर तुम्हारी पूजा में उपस्थित कर दूंगा, आप अपनी तैयारी करें। 

इधर माता कुंती ने सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया और आज पूजा की विशाल तैयारी होने लगी तब अर्जुन ने सुरपति इंद्र को ऐरावत भेजने को पत्र लिखा और एक दिव्य बाण में बांधकर धनुष पर रखकर देवलोक इंद्रसभा में इंद्र की सभा में फेंका। 




इंद्र ने बाण से निकालकर पत्र खोलकर खोला और पढ़ा तो आश्चर्य से अर्जुन को लिखा–

हे पांडु कुमार ! 

ऐरावत भेज तो दूंगा पर इतनी जल्दी स्वर्ग से कैसे  उतर सकता है, तुम इसका उत्तर शीघ्र ही लिखो। 

पत्र पाकर अर्जुन ने पत्र में बाणों का रास्ता बना के हाथी उतारने की प्रार्थना की प्रार्थना लिख पत्र वापस कर दिया । 

इंद्र ने मतील सारथी को आज्ञा दी कि हाथी को पूर्ण रूप से सजाकर हस्तिनापुर में उतारने का प्रबंध करों। 

महावत ने तरह - तरह के साज समान ऐेरावत को सजाया, देवलोक की अंबर जून डाली गई, स्वर्ण की पालकी रत्नोंजड़ित कलशों से बांधी गई माथे पर  रत्नजड़ित जाली सजाई गई, पैरों में घुंघरू स्वर्ण मणियों की बांधी गई, जिसकी चकाचौंध पर मानव जाति की आंखें नहीं ठहर सकती थीं। 

इधर सारे नगर में धुम हुई की कुंती माता के घर सजीव इंद्र का ऐरावत बाणों के रास्ते पर स्वर्ग से उतर कर पूजा जाएगा। 

सारे नगर के नर - नारी बालक और वृद्धों की भीड़ ऐरावत को देखने एकत्र होने लगी।  

गंधारी के राज महल में भी इस बात की चर्चा की बढ़ी चहल - पहल मच गई, नगर की नारियाँ पूजन थाली ले ले कर भागने लगी और माता कुंती के महल में उपस्थित होने लगी, देखते - देखते सारा महल पूजन करने वाली नारियों के ठसा - ठस भर गया, सारे नगरवासी ऐरावत के दर्शन को गली, सड़क, महल, अटरिया पर एकत्र हो गये। 

माता कुंती ने रावत को खड़ा करने हेतु रंग - बिरंगे चौक को पूर्वाकर नवीन रेशमी वस्त्र बिछावा दिया। 

हस्तिनापुर वासी तरह - तरह की स्वागत तयारी में फूल माला अबीर केसर हाथो में लेकर पंक्तिबद्ध खड़े थे, इधर इंद्र की आज्ञा पाकर ऐरावत स्वर्ग से बाणों के बनाए रास्ते पर धीरे - धीरे आकाश मार्ग से उतरने लगा, जिसके आभूषणों की आवाज नगरवासियों को आने लगी ऐरावत के दर्शन होते ही  नर - नारियों ने जय जयकार के नारे लगाकर लगाना आरंभ किया। 

ठीक सायंकाल ऐरावत माता कुंती के चौक में उतर आया तब समस्त नर - नारियों ने पुष्प माला अबीर केसर को चढ़ा कर स्वागत किया।  

महाराजा धौम्य पुरोहित द्वारा ऐरावत पर महालक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित कराकर वेद मंत्रों द्वारा पूजन की गई। 

नगर वासियों ने भी लक्ष्मी पूजा का स्वागत करके ऐरावत की पूजा की फिर तरह - तरह के मेवा पकवान लेकर ऐरावत को खिलाएं गए, ऊपर से जमुना जल पिलाया गया फिर तरह - तरह के पुष्पों की ऐरावत पर वर्षा की गई। 

पुरोहितों द्वारा *स्वस्ति पुण्याहवाचन* कर व्रती नारियों द्वारा लक्ष्मी जी का पूजन विधान से कराया गया।

कुंती ने व्रत के डोरे के गण्डे में सौलहवीं गाँठ लगाकर लक्ष्मी जी के सामने समर्पण किया। 

ब्राह्मणों को पकवान मेवा मिठाई देकर भोजन की व्यवस्था की गई तब वस्त्र, द्रव्य, स्वर्ण - आभूषण देकर ब्राह्मणों को संतुष्ट किया गया तत्पश्चात सभी व्रती नर - नारियों ने श्री महालक्ष्मी जी की दीपक जलाकर प्रेम से संपूर्ण पूजन कर आरती आरंभ की।

 *इति श्री महालक्ष्मी व्रत कथा समाप्त*

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

॥ आज का भगवद चिन्तन ॥

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 ॥ आज का भगवद चिन्तन ॥
            
  🐂       जो काम धीरे बोलकर, मुस्कुराकर और प्रेम से बोलकर कराया जा सकता है उसे तेज आवाज में बोलकर और चिल्लाकर करवाना मूर्खों का काम है। और जो काम केवल गुस्सा दिखाकर हो सकता है, उसके लिए वास्तव में गुस्सा करना यह महामूर्खों का काम हैं।
   🐂         अपनी बात मनवाने के लिए अपने अधिकार या बल का प्रयोग करना यह पूरी तरह पागलपन होता है। प्रेम ही ऐसा हथियार है जिससे सारी दुनिया को जीता जा सकता है । प्रेम की विजय ही सच्ची विजय है।

  🐂         आज प्रत्येक घर में ईर्ष्या, संघर्ष, दुःख और अशांति का जो वातावरण है उसका एक ही कारण है और वह है प्रेम का अभाव। आग को आग नहीं बुझाती पानी बुझाता है। प्रेम से दुनिया को तो क्या दुनिया बनाने वाले तक को जीता जा सकता है। पशु -पक्षी भी प्रेम की भाषा समझते हैं। प्रेम बाटों, इसकी खुशबू कभी ख़तम नहीं होती ।

 शुभ संध्या !
जय श्री राधे कृष्ण !!
🌹🙏🌹🙏🌹
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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🍁 *विचार संजीवनी* 🍁*ऐसा माने कि ठाकुर जी का संसार है,

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जय द्वारकाधीश

🍁 *विचार संजीवनी* 🍁


*ऐसा माने कि ठाकुर जी का संसार है, ठाकुर जी का परिवार है, ठाकुर जी के रुपए हैं, ठाकुर जी का घर है।*

*हम तो ठाकुर जी का काम करते हैं। 

मुनीम की तरह रहें। 

मालिक न बनें।* 

जो काम करें उसका अहसान ठाकुर जी पर रखें कि महाराज ! 

हम आपका काम करते हैं। 

हमारा यहाँ क्या है ? 

परिवार आपका, घर आपका, धन आपका, जमीन आपकी।  






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यह ही सच्ची बात है, क्योंकि जब जन्मे थे, नंग - धड़ंग आए थे।  

एक धागा भी पास में नहीं था और मरेंगे तो यह लाश भी यहीं पड़ी रहेगी।  

लाश को भी साथ नहीं ले जा सकते, तो धन - संपत्ति, वैभव - परिवार साथ में ले जा सकेंगे क्या ?  

*साथ में लाए नहीं, साथ में ले जा सकते नहीं और यहॉं रहते हुए भी इन सबको अपने मन-मुताबिक बना सकते नहीं।*  

आपका प्रत्यक्ष अनुभव है कि आपके लड़के-लड़की आपका कहना नहीं मानते, स्त्रियाँ नहीं मानतीं, कुटुम्बी-जन नहीं मानते। 

तो सिद्ध हुआ कि आप इनको अपने मन - मुताबिक नहीं बना सकते और जितने दिन चाहे साथ में रख नहीं सकते, बदल नहीं सकते। 

स्वभाव बदल दें या रंग बदल दें-- यह आपके हाथ की बात नहीं। 

फिर भी इनको कहते हैं--'मेरी चीजें' । 

ये  'मेरे' कैसे हुए बताइए ? 

अतः मानना ही होगा कि यह सब मेरे नहीं हैं; भगवान के दिए हुए हैं और भगवान के हैं।

राम !             राम !!            राम !!!





|| सुमन्त्रजी का अयोध्या लौटना :-||


श्रीरामको पहुँचाकर जब निषादराज वापस लौटे तो देखा सुमन्त्रजी वहीं व्याकुल पड़े हैं। 

वे 'हा राम ! हा राम!' 

कहते हुए लम्बी साँसें ले रहे हैं। 

रथके घोड़े भी घास चरना छोड़ दिये हैं और श्रीराम जिधर गये थे, उधर ही मुड़ - मुड़कर देख रहे हैं।

निषादराज उनकी दशा देखकर अत्यन्त दुःखी हुए। 

उन्होंने सुमन्त्रसे कहा— 'सुमन्त्रजी ! 

आप अब विषादका त्याग कर दें। 

आप परम विद्वान् एवं परमार्थके सच्चे ज्ञाता हैं। 

आप विधाताको ही वाम जानकर रथपर बैठकर अयोध्या जायँ। 

जब आप ही अपना धैर्य खो देंगे तो महाराज दशरथ और महारानी कौसल्याको सान्त्वना कौन देगा ? 

उनका तो श्रीराम - वनवाससे संसार ही लुट गया है। 

मेरी आपसे विनती है कि आप रथको लेकर शीघ्र अयोध्या पहुँचें।' 

ऐसा कहकर निषादराजने बरबस सुमन्त्रजी को रथ में बैठा दिया।

भगवान् श्रीराम के वियोग से सुमन्त्रजी का शरीर अत्यन्त शिथिल हो गया था। 

वे चाहकर भी रथको नहीं चला पा रहे थे। 

घोड़े भी पीछे देखकर बार - बार हिनहिना रहे थे, मानो वे श्रीरामको लिये बिना जाना ही नहीं चाहते हैं। 
किसी तरह सायंकाल सुमन्त्रजी अयोध्या पहुँचे।

उनकी अवस्था उस व्यापारी - जैसी थी, जो व्यापार के लिये घरसे गया हो और मूल भी हारकर घर वापस आ गया हो। 

सारी अयोध्यापुरी सूनी हो गयी थी। 

कहीं एक शब्द भी नहीं सुनायी देता था।

अयोध्याकी ऐसी दशा देखकर सुमन्त्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ। 

वे सोचने लगे - कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि श्रीराम के विरह जनित संताप से महाराज सहित सभी लोग शोकाग्नि में दग्ध हो गये हों ?'

चिन्तित सुमन्त्र जब नगर के द्वार पर पहुँचे, तब हजारों लोगों ने दौड़ते हुए रथ को घेर लिया और 'श्रीराम कहाँ हैं ?' 

यह पूछते हुए वे रथ के साथ दौड़ने लगे।

उस समय सुमन्त्र ने उन लोगों से कहा- 'सज्जनो ! 

मैं गङ्गाजी के किनारे तक ही रघुनाथ के साथ गया था। 

वहाँ से उन्होंने मुझे लौट जानेकी आज्ञा दी। 

मेरे काफी अनुनय - विनय के बाद भी उन्होंने अयोध्या लौटना स्वीकार नहीं किया। 

अतः मैं उनसे विदा लेकर लौट आया हूँ। 

वे तीनों लोग वहाँसे गङ्गाके उस पार चले गये।' 

यह जानकर सब लोगोंकी आँखोंसे आँसुओंकी धाराएँ बहने लगीं। 

वे सब 'हमें धिक्कार है' ऐसा कहकर लम्बी साँसें खींचने लगे और करुण क्रन्दन करने लगे।

बाजार के बीच से निकलते हुए सुमन्त्रजी को स्त्रियों के रोने की आवाज सुनायी दी। 

वे महलों की खिड़कियों पर बैठकर श्रीरामके वियोग से संतप्त होकर विलाप कर रही थीं। 

राजमार्ग पर पहुँचकर सुमन्त्र ने अपना मुख ढँक लिया। 

वे रथ लेकर सीधे महाराज दशरथ के भवन की ओर गये। 

उन्होंने देखा कि महाराज पुत्र - शोक में मलिन और आतुर हो रहे हैं। 

सुमन्त्रजी महाराज के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये। 

महाराज दशरथने कहा -'सुमन्त्र ! 

तुम श्रीरामका सन्देश बताओ। 

क्या वे तुम्हारे विनय करने पर भी नहीं माने और वन चले गये ? 

क्या तुम सुकुमारी सीता को भी नहीं लौटा पाये ? 

मेरा भाग्य ही खोटा है। 

किसी का कोई दोष नहीं है।'

सुमन्त्रने कहा-'महाराज ! 

धर्मात्मा श्रीराम ने आपके चरणों में प्रणाम कहा है। 

उन्होंने कहा है कि मैं वनवास की अवधि पूरी करके महाराजका दर्शन करूँगा। 

वे मेरी चिन्ता न करें।'

श्रीरामका संदेश सुनकर महाराज दशरथ ने कहा— 'सुमन्त्र ! 

मुझे राम के पास ले चलो, नहीं तो मेरे प्राण निकलना ही चाहते हैं।' 

इस तरह श्रीरामके वियोग में 'हा राम! हा राम!' कहते हुए महाराज दशरथने अपना प्राण त्याग दिया।

        || जय सियाराम जय हनुमान ||

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

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⚔️ #शस्त्र_की_महत्ता

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जय द्वारकाधीश

⚔️ #शस्त्र_की_महत्ता

#दधीचि_ऋषि ने देश के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था !

🏹 उनकी हड्डियों से तीन धनुष बने- १. गांडीव, २. पिनाक और ३. सारंग !

🏹 जिसमे से गांडीव अर्जुन को मिला था जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता !

🏹 सारंग से भगवान राम ने युद्ध किया था और रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था !

🏹 और, पिनाक भगवान शिव जी के पास था जिसे तपस्या के माध्यम से खुश रावण ने शिव जी से मांग लिया था ! परन्तु ,  वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में जनकपुरी में छोड़ आया था !
इसी पिनाक की नित्य सेवा सीताजी किया करती थी ! पिनाक का भंजन करके ही भगवान राम ने सीता जी का वरण किया था !

ब्रह्मर्षि दधिची की हड्डियों से ही "एकघ्नी नामक वज्र" भी बना था , जो भगवान इन्द्र को प्राप्त हुआ था !

इस एकघ्नी वज्र को इन्द्र ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर उन्होंने कर्ण को दे दिया था! इसी एकघ्नी से महाभारत के युद्ध में भीम का महाप्रतापी पुत्र घतोत्कक्ष कर्ण के हाथों मारा गया था ! और भी कई अश्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ था उनकी हड्डियों से !

लेकिन दधिची के इस अस्थि-दान का उद्देश्य क्या था...???

क्या उनका सन्देश यही था कि  उनकी आने वाली पीढ़ी नपुंसकों और कायरों की भांति मुंह छुपा कर घर में बैठ जाए और शत्रु की खुशामद करे....??? नहीं..

कोई ऐसा काल नहीं है जब मनुष्य शस्त्रों से दूर रहा हो..

हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ से ले कर ऋषि-मुनियों तक का एक दम स्पष्ट सन्देश और आह्वान रहा है कि....

''हे सनातनी वीरो.शस्त्र उठाओ और अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करो !''

बस आज भी सबके लिए यही एक मात्र सन्देश है !
राष्ट्र और धर्म रक्षा के लिए अंततः बस एक ही मार्ग है !

#सशक्त_बनो..!
जय श्री कृष्ण....!!!
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

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।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

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