*श्रीमहालक्ष्मी व्रत कथा* *यह_व्रत_भाद्रपदमास_के_शुक्लपक्ष_की

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

*श्रीमहालक्ष्मी व्रत कथा* 

*यह_व्रत_भाद्रपदमास_के_शुक्लपक्ष_की_अष्टमी_को_आरंभ_करके_आश्विनमास_की_कृष्णपक्ष_अष्टमी_को_समाप्त_किया_जाता_है*  

एक समय महर्षि द्वैपायन व्यास जी हस्तिनापुर आये। 

उनका आगमन सुन समस्त राजकुल के कर्मचारी महाराज धृतराष्ट्र तथा भीष्म सहित उनका सम्मान आदर कर राजमहल में स्वर्ण के सिंहासन पर विराजमान कर अर्घ्य पाद्य आचमन से उनका पूजन किया।  






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व्यास जी के स्वस्थचित्त होने पर राजरानी गंधारी ने महर्षि व्यास जी से हाथ जोड़कर प्रश्न किया ? 

*गांधारी बोली* हे महाराज ! 

आप त्रिकालज्ञ, तत्वदर्शी हैं, आपसे हमारी प्रार्थना है कि हम स्त्रियों को कोई ऐसा व्रत व सरल पूजन बताइए जिससे हमारी राजलक्ष्मी, सुख, पुत्र-पौत्र, परिवार सदा सुखी रहे। 

इतना सुनकर व्यास जी ने कहा 

*व्यास जी बोले* – हम ऐसे व्रत - पूजन का उल्लेख कर रहे हैं, जिससे सदा लक्ष्मी जी स्थिर होकर सुख प्रदान करेंगी।

वह श्री महालक्ष्मी व्रत है।  

जिसका पूजन प्रतिवर्ष आश्विन मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को माना जाता है। 

*तब राजरानी गंधारी ने कहा* – 

हे महात्मन ! 

यह व्रत कैसे आरंभ होता है किस विधि से पूजन होता है ?  

यह विस्तार से बताने का कष्ट करें तब महर्षि जी ने कहा – 

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन सुबह व्रत का मन में संकल्प कर किसी जलाशय में जाकर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहने। 

तत्पश्चात ताजी दूर्वा से महालक्ष्मी जी को जल का तर्पण करके प्रणाम करना चाहिए, और फिर आकर शुद्ध 16 धागों का एक गण्डा बनाकर प्रतिदिन एक गांठ लगानी चाहिए,

इस प्रकार 16 दिनों का 16 गाँठ का एक गण्डा तैयार कर अश्वनी मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी को व्रत रखकर, मंडप बनाकर चँदोवा तानकर उसके नीचे माटी के हाथी पर महालक्ष्मी की मूर्ति स्थापित कर तरह - तरह की पुष्प मालाओं सर श्री लक्ष्मी जी व हाथी का पूजन करके कई पकवान सुवासित पदार्थों का नैवेद्य समर्पण करें । 

तत्पश्चात श्रद्धा सहित महालक्ष्मी व्रत करने से आप लोगों की राजलक्ष्मी सदा स्थिर रहेगी, ऐसा विधान बताकर व्यास जी अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए।

इधर समय अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से समस्त राजघरानों की नारियों ने व नगर – स्त्रियों ने श्री महालक्ष्मी व्रत का आरंभ कर दिया बहुत सी नारीयाँ गांधारी के साथ प्रतिष्ठा मान हेतु व्रत का साथ देने लगी ! 

कुछ नारीयाँ माता कुंती के साथ भी व्रत का आरंभ करने लगी परंतु गांधारी जी द्वारा कुछ द्वेष भाव होने लगा, ऐसा होते होते 15 दिन व्रत के समाप्त होने लगे, होकर सोलहवाँ दिन आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी का आ गया  उस दिन प्रातः काल से नगर नारियों ने उत्सव मनाना आरंभ कर दिया और समस्त नर-नारी राज महल में गांधारी जी के यहां उपस्थित हो तरह - तरह से महालक्ष्मी जी के मंडप व माटी के हाथी बनाने सजाने की बड़ी तैयारियां होने लगी।  

गांधारी जी अपने नगर की सभी प्रतिष्ठित नारियों को बुलाने को सेवक भेजें पर माता कुंती को नहीं बुलाया गया और ना कोई सूचना भेजी उत्सव वाद्य की धुन गुँजारने  लगी जिससे सारे हस्तिनापुर में खुशी की लहर दौड़ गई माता कुंती ने इस अवसर पर अपना अपमान समझकर बड़ा रंज मनाया और व्रत की कोई तैयारी न  की इतने में महाराज युधिष्ठिर, अर्जुन, भीमसेन, नकुल, सहदेव पांचो पांडव उपस्थित हो गए। 

तब अपनी माता को गंभीर देख अर्जुन ने प्रार्थना की हे माता !

आप इतनी दुखी क्यों हो ?  

क्या हम भी आपके दुख का कारण जान सकते हैं और दुख दूर करने में भी सहायक हो सकते हैं । 

आप बताएं तब माता कुंती ने कहा बेटा जाति अपमान से बढ़कर कोई दुख नहीं होता है । 

आज नगर में श्री महालक्ष्मी व्रत उत्सव में  रानी गंधारी ने सारे नगर की सारी औरतों पर मान देकर बुलवाया हैं परंतु तुमसे ईर्ष्यावश मेरा अपमान कर उत्सव में नहीं बुलाया। 

तो पार्थ ने कहा हे माता ! 

क्या वह पूजा का विधान सिर्फ दुर्योधन के महल में ही हो सकता है आप अपने घर नहीं कर सकती ? 

तब कुंती ने कहा बेटा कर सकती हूँ पर वह साज समान इतनी जल्दी नहीं उपलब्ध हो सकता क्योंकि गांधारी के सौ पुत्र पुत्रों ने माटी का विशाल हाथी तैयार करके पूजन का साज सजाया है , वह ऐसा विधान तुमसे नहीं बन सकेगा और उनके उत्सव की तैयारी आज दिन भर से हो रही है तब पार्थ ने कहा हे माता ! 

आप पूजा की तैयारी कर नगर में बुलावा फिरावेन, मैं ऐसे हाथी पूजन को बुला रहा हूं जो आज तक हस्तिनापुर वासियों ने ना देखा ना पूजन किया होगा।

मैं आज ही इंद्रलोक से इंद्र का हाथी *ऐरावत* जो पूजनीय है उसे बुलाकर तुम्हारी पूजा में उपस्थित कर दूंगा, आप अपनी तैयारी करें। 

इधर माता कुंती ने सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया और आज पूजा की विशाल तैयारी होने लगी तब अर्जुन ने सुरपति इंद्र को ऐरावत भेजने को पत्र लिखा और एक दिव्य बाण में बांधकर धनुष पर रखकर देवलोक इंद्रसभा में इंद्र की सभा में फेंका। 




इंद्र ने बाण से निकालकर पत्र खोलकर खोला और पढ़ा तो आश्चर्य से अर्जुन को लिखा–

हे पांडु कुमार ! 

ऐरावत भेज तो दूंगा पर इतनी जल्दी स्वर्ग से कैसे  उतर सकता है, तुम इसका उत्तर शीघ्र ही लिखो। 

पत्र पाकर अर्जुन ने पत्र में बाणों का रास्ता बना के हाथी उतारने की प्रार्थना की प्रार्थना लिख पत्र वापस कर दिया । 

इंद्र ने मतील सारथी को आज्ञा दी कि हाथी को पूर्ण रूप से सजाकर हस्तिनापुर में उतारने का प्रबंध करों। 

महावत ने तरह - तरह के साज समान ऐेरावत को सजाया, देवलोक की अंबर जून डाली गई, स्वर्ण की पालकी रत्नोंजड़ित कलशों से बांधी गई माथे पर  रत्नजड़ित जाली सजाई गई, पैरों में घुंघरू स्वर्ण मणियों की बांधी गई, जिसकी चकाचौंध पर मानव जाति की आंखें नहीं ठहर सकती थीं। 

इधर सारे नगर में धुम हुई की कुंती माता के घर सजीव इंद्र का ऐरावत बाणों के रास्ते पर स्वर्ग से उतर कर पूजा जाएगा। 

सारे नगर के नर - नारी बालक और वृद्धों की भीड़ ऐरावत को देखने एकत्र होने लगी।  

गंधारी के राज महल में भी इस बात की चर्चा की बढ़ी चहल - पहल मच गई, नगर की नारियाँ पूजन थाली ले ले कर भागने लगी और माता कुंती के महल में उपस्थित होने लगी, देखते - देखते सारा महल पूजन करने वाली नारियों के ठसा - ठस भर गया, सारे नगरवासी ऐरावत के दर्शन को गली, सड़क, महल, अटरिया पर एकत्र हो गये। 

माता कुंती ने रावत को खड़ा करने हेतु रंग - बिरंगे चौक को पूर्वाकर नवीन रेशमी वस्त्र बिछावा दिया। 

हस्तिनापुर वासी तरह - तरह की स्वागत तयारी में फूल माला अबीर केसर हाथो में लेकर पंक्तिबद्ध खड़े थे, इधर इंद्र की आज्ञा पाकर ऐरावत स्वर्ग से बाणों के बनाए रास्ते पर धीरे - धीरे आकाश मार्ग से उतरने लगा, जिसके आभूषणों की आवाज नगरवासियों को आने लगी ऐरावत के दर्शन होते ही  नर - नारियों ने जय जयकार के नारे लगाकर लगाना आरंभ किया। 

ठीक सायंकाल ऐरावत माता कुंती के चौक में उतर आया तब समस्त नर - नारियों ने पुष्प माला अबीर केसर को चढ़ा कर स्वागत किया।  

महाराजा धौम्य पुरोहित द्वारा ऐरावत पर महालक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित कराकर वेद मंत्रों द्वारा पूजन की गई। 

नगर वासियों ने भी लक्ष्मी पूजा का स्वागत करके ऐरावत की पूजा की फिर तरह - तरह के मेवा पकवान लेकर ऐरावत को खिलाएं गए, ऊपर से जमुना जल पिलाया गया फिर तरह - तरह के पुष्पों की ऐरावत पर वर्षा की गई। 

पुरोहितों द्वारा *स्वस्ति पुण्याहवाचन* कर व्रती नारियों द्वारा लक्ष्मी जी का पूजन विधान से कराया गया।

कुंती ने व्रत के डोरे के गण्डे में सौलहवीं गाँठ लगाकर लक्ष्मी जी के सामने समर्पण किया। 

ब्राह्मणों को पकवान मेवा मिठाई देकर भोजन की व्यवस्था की गई तब वस्त्र, द्रव्य, स्वर्ण - आभूषण देकर ब्राह्मणों को संतुष्ट किया गया तत्पश्चात सभी व्रती नर - नारियों ने श्री महालक्ष्मी जी की दीपक जलाकर प्रेम से संपूर्ण पूजन कर आरती आरंभ की।

 *इति श्री महालक्ष्मी व्रत कथा समाप्त*

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

॥ श्री श्रीमदभागवत प्रवर्चन - ( नित्य लीला लीन )....! ॥

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

 ॥ श्री श्रीमदभागवत प्रवर्चन -   ( नित्य लीला लीन )....! ॥

श्री श्रीमदभागवत प्रवर्चन -   ( नित्य लीला लीन )....!

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण की नित्य लीला, उनके भक्तों का प्रेम और जीवात्मा की परम गति का वर्णन मिलता है। 

“नित्य लीला लीन” का अर्थ है भगवान की शाश्वत दिव्य लीला में स्थित होना। 

यह किसी साधारण मृत्यु, देह - त्याग या काल्पनिक कथा का नाम नहीं है। 

इस लेख में इसी भाव का शास्त्राधारित विवेचन किया गया है। 


  

अर्जुनने भगवान्‌के बलपर जयद्रथको मारनेका

प्रण करते हुए कहा कि 'जयद्रथ यदि मेरी या महाराज युधिष्ठिरकी और भगवान् पुरुषोत्तमकी शरण न आया, तो कल सूर्यास्तसे पूर्व मैं उसे मार डालूँगा। 

ऐसा न करूँ तो मुझे वीर तथा पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाले लोक न मिलें। 

साथ ही मातृ-हत्यारे, पितृ-हत्यारे, गुरुस्त्रीगामी, चुगलखोर, साधु-निन्दा और पर-निन्दा करनेवाले, धरोहर हड़पनेवाले, विश्वासघाती, ब्रह्महत्यारे, गोहत्यारे-इन पापियोंकी गति मुझे मिले। 

नित्य लीला लीन का वास्तविक अर्थ ;


श्रीमद्भागवत में परमात्मा को समस्त जीवों का आधार, जगत का कारण और भक्ति के द्वारा प्राप्त होने वाला परम पुरुष बताया गया है। 

भगवान का प्राकट्य, उनकी बाललीला, गोचारण, भक्तों के साथ प्रेम, धर्म की स्थापना और अंतर्धान—

ये सभी उनकी दिव्य लीलाओं के प्रसंग हैं। 

नित्य” का अर्थ है जो निरंतर है, जिसका अस्तित्व काल के परिवर्तन से समाप्त नहीं होता। 

“लीला” का अर्थ भगवान की दिव्य क्रीड़ा अथवा स्वेच्छापूर्वक किया गया कार्य है। 

“लीन” का अर्थ है उसमें पूर्णतः तल्लीन होना। 

अतः नित्य लीला लीनता का भाव यह है कि जीव भगवान की शाश्वत सत्ता और भक्ति में अपना मन, कर्म और चित्त समर्पित करे।

यहाँ एक आवश्यक शास्त्रीय भेद समझना चाहिए। 

श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी पर प्रकट होने और उनकी दिव्य लीला का वर्णन है। 

“नित्य लीला” की विस्तृत संकल्पना विशेषतः वैष्णव भक्ति परंपराओं में विकसित हुई है। 

इसलिए किसी आधुनिक व्यक्ति की मृत्यु को बिना प्रमाण “नित्य लीला लीन” कहकर उसके विषय में विशेष आध्यात्मिक सिद्धि का दावा करना शास्त्रसम्मत प्रमाण नहीं माना जा सकता। 

वेदाध्ययनकारी तथा पवित्र व्रतधारी पुरुषोंका अपमान करनेवाले, वृद्ध, साधु और गुरुका तिरस्कार करनेवाले, ब्राह्मण, गौ और अग्निको पैरसे छूनेवाले, जलमें थूकने और मल-मूत्र त्याग करनेवाले, नंगे नहानेवाले, अतिथिको निराश लौटानेवाले, घूसखोर, झूठ बोलनेवाले, ठग, दम्भी, दूसरोंपर दोष लगानेवाले, नौकर, स्त्री, पुत्र और आश्रितको न देकर अकेले ही मीठा खानेवाले, अपने हितकारी आश्रित साधुका पालन न करनेवाले, उपकारीकी निन्दा करनेवाले, निर्दयी, शराबखोर, मर्यादा तोड़नेवाले, कृतघ्न, भरण-पोषण करनेवालेकी निन्दा करनेवाले, बायें हाथसे गोदमें रखकर खानेवाले, धर्मत्यागी, उषाकालमें सोनेवाले, जाड़ेसे डरकर स्नान न करनेवाले, रणसे डरकर भागनेवाले क्षत्रिय, वेदध्वनिसे रहित और एक कुएँके ग्राममें छः मासतक रहनेवाले, शास्त्रकी निन्दा करनेवाले, दिनमें मैथुन करनेवाले, दिनमें सोनेवाले, मकानमें आग लगानेवाले, विष देनेवाले, अग्नि तथा अतिथिसे रहित, गौको जल पीनेसे रोकनेवाले, रजस्वलासे मैथुन करनेवाले, कन्या बेचनेवाले और दान देनेकी प्रतिज्ञा करके लोभवश न देनेवाले आदि लोगोंको जिन नरकोंकी प्राप्ति होती है, वही मुझे भी मिले। 

इसके सिवा मैं यह भी प्रण करता हूँ कि यदि जयद्रथको मारे बिना ही कल सूर्यास्त हो जायगा तो मैं जलती हुई अग्निमें कूदकर जल मरूँगा।' 

अर्जुनकी प्रतिज्ञा सुनकर भगवान्ने अपना पांचजन्य शंख बजाया। 

भगवान्के श्रीमुखकी वायुसे भरे शंखकी ध्वनि प्रलयकालके समान हुई, जिससे आकाश, पाताल- सभी दिशाएँ काँप गयीं।

भगवान्ने एकान्तमें अर्जुनसे कहा- 'भाई! मैंने गुप्तचर भेजकर कौरवोंके यहाँसे समाचार मँगवा लिये हैं, तुम्हारी प्रतिज्ञा सुनकर पहले तो जयद्रथ आदि सभी घबरा गये थे, परंतु अब तो उन्होंने निश्चय कर लिया है कि आचार्य द्रोणसहित छहों महारथी जयद्रथकी रक्षा करेंगे। 

उन छहोंको जीते बिना जयद्रथको पाना कठिन होगा, परंतु तुमने मेरी सम्मति लिये बिना ही ऐसी विकट प्रतिज्ञा कैसे कर ली ?' 

अर्जुनने उत्तरमें कहा, 'भगवन्! मुझे महारथियोंकी कोई चिन्ता नहीं है। 

मैं सबको जीत सकूँगा'-

श्रीमद्भागवत में परम सत्य ;


श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध के प्रथम अध्याय का आरम्भ ही परम सत्य के निरूपण से होता है—

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् ।
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः ।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा ।
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥

भावार्थ: जिससे इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं, जो स्वयंप्रकाश और सर्वज्ञ है, उस परम सत्य का हम ध्यान करते हैं।

यह मंगलाचरण बताता है कि भागवत का मूल विषय सांसारिक घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि परम सत्य का ज्ञान है। 

मनुष्य जब अपनी दृष्टि को केवल शरीर, धन, प्रतिष्ठा और विषयभोग तक सीमित रखता है, तब उसे जीवन का अंतिम प्रयोजन दिखाई नहीं देता। 

भागवत उस दृष्टि को परमात्मा की ओर मोड़ता है। 

तव प्रसादाद् भगवन् किन्नावाप्तं रणे मम।

(द्रोणपर्व ७६। २१)

'हे भगवन्! आपकी कृपासे मुझे रणमें कौन-सी वस्तु अप्राप्त है?' स्वयं जयद्रथने भी दुर्योधनसे ऐसी ही बात कही थी-

वासुदेवसहायस्य गाण्डीवं धुन्वतो धनुः। कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेत् साक्षादपि शतक्रतुः ॥

(द्रोणपर्व ७५।२०)

'वासुदेव श्रीकृष्णकी सहायताप्राप्त गाण्डीवधारी अर्जुनके सामने दूसरेकी तो बात ही क्या है, साक्षात् इन्द्र भी नहीं ठहर सकता।'

भगवान की लीला और जीव का संबंध ;


भगवान श्रीकृष्ण की लीला को सामान्य सांसारिक खेल के समान नहीं समझना चाहिए। 

वैष्णव दर्शन में लीला भगवान की दिव्य सत्ता और उनकी स्वतंत्र इच्छा का प्रकाश है। 

श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध में प्रकृति के गुणों से युक्त सूक्ष्म प्रकृति को भगवान द्वारा लीला के रूप में स्वीकार करने का वर्णन मिलता है। 

श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में श्रीकृष्ण का व्रज में प्राकट्य, बालचरित्र, गोचारण, गोवर्धनधारण और रासलीला का वर्णन है। 

इन प्रसंगों में भगवान का भक्तों के साथ प्रेम, उनकी रक्षा और भक्तों के चित्त में भगवान की प्राप्ति का मार्ग दिखाई देता है। 

भगवान की लीला का श्रवण केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि चित्तशुद्धि और भगवद्भक्ति की साधना के लिए है। 

भागवत के अनुसार भगवान की कथाओं का श्रवण और कीर्तन भक्त के हृदय में भक्ति का विकास करता है।

बात भी यही थी। 

भगवान्‌के कारण ही पाण्डव विजयी हुए थे। 

वे सारी बातें पहलेसे ही सोच रखते थे। 

कहाँ, कैसे, क्या करनेसे उनके प्रण, प्राण तथा प्रतिष्ठाकी रक्षा होगी, इस बातकी दूरदर्शितापूर्ण जितनी चिन्ता श्रीकृष्णको रहती थी, उतनी चिन्ता अर्जुनको नहीं थी और होती भी क्यों, जब वह अपने रथकी लगाम उन्हें सौंप चुका और उनके द्वारा 'माः शुचः' का आश्वासन पा चुका, तब फिर उसकी चिन्ता भी वही करते। 

दूसरे दिन घोर युद्ध हुआ, वीरोंको मारते और सेनाके समुद्रको चीरकर छः महारथी वीरोंसे सुरक्षित, सबके बीचमें स्थित जयद्रथके पास पहुँचनेमें अर्जुनको बहुत समय लग गया। 

भगवान्ने कहा, 'भाई अर्जुन ! 

इन सबको जीतकर सन्ध्यासे पूर्व जयद्रथको मारना बड़ा कठिन है। 

देख, मैं दूसरा ही उपाय रचता हूँ।' 

इतना कहकर -

योगी योगेन संयुक्तो योगिनामीश्वरो हरिः।

सुष्टे तमसि कष्णेन गतोऽस्तमिति भास्करः ॥

(द्रोणपर्व १४६।६८)

योगयुक्त योगेश्वर भगवान् श्रीहरिने सूर्यको ढँकनेके लिये अन्धकारको उत्पन्न किया। 

उस अन्धकारके फैलते ही सूर्य अस्त हो गया। 

सूर्यास्त हुआ देखकर कौरवपक्षीय लोग हर्षसे भर गये। 

जयद्रथ समीप आकर हर्षसे आकाशकी ओर ताकने लगा। 

भगवान्ने कहा, 'अर्जुन ! बस, यही अवसर है, जयद्रथका मस्तक अपने तीक्ष्ण बाणसे काटकर अपनी प्रतिज्ञा सफल कर।' 

अर्जुनने बाण-सन्धान किया। 

जयद्रथ और उसके संरक्षकोंकी बुद्धि चकरा गयी। 

अर्जुनने अपनी बाणधाराओंसे सभीको स्नान करा दिया। 

इतनेमें भगवान्ने अन्धकारको दूर कर दिया। 

सूर्य अस्ताचलकी ओर जाते हुए दिखायी दिये। 

भगवान्ने कहा, 'अर्जुन ! अब जल्दी कर, परंतु खबरदार, जयद्रथका मस्तक जमीनपर न गिरने पाये। 

इसको पिताका वरदान है कि जो कोई इसके सिरको काटकर जमीनपर गिरायेगा, उसके सिरके सौ टुकड़े हो जायेंगे।

नित्य लीला और भगवान का अवतार ;


श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में भगवान श्रीकृष्ण का पृथ्वी पर प्राकट्य वर्णित है। 

देवकी और वसुदेव के यहाँ भगवान का जन्म, कंस का भय, व्रज में बाललीला तथा भक्तों के साथ उनका प्रेम—

ये सभी भागवत के प्रमुख प्रसंग हैं।

भगवान का प्राकट्य सामान्य जीव के जन्म के समान नहीं है। 

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ (४.९)

भावार्थ: हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। 

जो मनुष्य इन्हें तत्त्व से जानता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे प्राप्त होता है।

इस श्लोक में “जन्म कर्म च मे दिव्यम्” भगवान के अवतार और कर्मों की दिव्यता बताता है। 

इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति जो अपने आपको भगवान की लीला में लीन कहे, वह स्वतः मुक्त हो गया। 

श्रीकृष्ण स्वयं तत्त्वज्ञान, भक्ति और पुनर्जन्म से मुक्ति का संबंध बताते हैं।

नित्य लीला लीनता का वास्तविक रहस्य यह है कि जीव भगवान के दिव्य स्वरूप, नाम, गुण, कर्म और भक्ति को समझकर अपने चित्त को उसी में स्थिर करे।

धरण्यां मम पुत्रस्य पातयिष्यति यः शिरः । 
तस्यापि शतधा मूर्द्धा फलिष्यति न संशयः ॥

(द्रोणपर्व १४६ । ११२)

इसलिये तू अपने दिव्य बाणोंसे इसके सिरको काटकर बाणोंके द्वारा ऊपर-का-ऊपर उड़ाकर इसका बूढ़ा बाप जहाँ बैठा सन्ध्यावन्दन कर रहा है, उसकी गोदीमें डाल दे।' 

अर्जुनने वैसा ही किया। 

जयद्रथका मस्तक काटकर अर्जुनने दिव्य बाणोंद्वारा आकाश-मार्गसे प्रेरितकर उसके पिताकी गोदीमें गिरा दिया। 

पिता झिझककर उठा तो उसके द्वारा वह सिर सहसा जमीनपर गिर पड़ा, जिससे उसी समय उसके सिरके सौ टुकड़े हो गये। 

भगवान्‌की दूरदर्शिता और सावधानीसे अर्जुनकी दोनों विपत्तियोंसे अद्भुत रूपमें प्राणरक्षा हो गयी।

भागवत का परम साधन — श्रवण और कीर्तन ;


श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध में नैमिषारण्य के ऋषियों द्वारा सूतजी से भगवान की कथा सुनने का प्रसंग आता है। 

शौनकादि ऋषियों ने पूछा कि कलियुग में मनुष्य के लिए परम कल्याण का साधन क्या है। 

सूतजी ने भगवान की कथा, भक्ति और परम सत्य के ज्ञान का उपदेश किया।

शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥ (१.२.१७)

भावार्थ: जो लोग भगवान श्रीकृष्ण की कथाओं का श्रवण करते हैं, उनके हृदय में स्थित भगवान उन भक्तों के अशुभ संस्कारों को दूर करते हैं।

यहाँ “पुण्यश्रवणकीर्तनः” का तात्पर्य भगवान की कथा सुनने और गाने से है। 

भागवत श्रवण को मन की शुद्धि और भक्ति के विकास का साधन बताता है। 

केवल कथा सुन लेना ही पर्याप्त नहीं; उसका संदेश जीवन में धारण करना आवश्यक है।

इसी कारण आध्यात्मिक संगत का महत्व है। 

सत्संग से मनुष्य को भगवान का स्मरण, शास्त्रों का अध्ययन, गुरु का मार्गदर्शन और धर्ममय जीवन का अभ्यास मिलता है। 

भागवत में भक्तों की संगति और भगवान की कथा के श्रवण को आध्यात्मिक उन्नति के साधन के रूप में वर्णित किया गया है।

श्रीमद्भागवत का रासलीला रहस्य ;


दशम स्कन्ध के रासपञ्चाध्यायी में श्रीकृष्ण और गोपियों की रासलीला का वर्णन है। 

यह भागवत का अत्यंत गहन और भक्तिपरक प्रसंग है। 

इस लीला को सांसारिक कामना के स्तर पर समझना उचित नहीं। 

भागवत के दशम स्कन्ध ३३.४० में कहा गया है—

विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदं च विष्णोः
श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः ।
भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं
हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः ॥

भावार्थ: जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु की व्रजवधुओं के साथ हुई इस लीला को सुनता या वर्णन करता है, वह परम भक्ति प्राप्त करके हृदय के कामरूपी रोग से शीघ्र मुक्त होता है।

इस श्लोक का संदेश स्पष्ट है—

रासलीला का श्रवण श्रद्धा, भक्ति और संयम के साथ किया जाना चाहिए। 

भगवान की लीला को मनुष्य की विषयवासना के समान मानना भागवत के उपदेश के विपरीत है। 

भागवत की कथा का उद्देश्य कामना को बढ़ाना नहीं, बल्कि हृदय के विकारों का शमन करना है।

नित्य लीला लीनता और मृत्यु का सत्य ;


श्रीमद्भागवत में मृत्यु को शरीर का परिवर्तन और जीव की आगे की गति के संदर्भ में समझाया गया है। 

भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं—

न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ (२.२०)

भावार्थ: आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। 

शरीर नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।

यह श्लोक आत्मा की नित्यता का सिद्धान्त बताता है। 

परंतु आत्मा का नित्य होना और किसी व्यक्ति का भगवान की नित्य लीला में प्रवेश कर जाना एक ही बात नहीं है। 

भागवत और गीता में मुक्ति के लिए ज्ञान, भक्ति, कर्म और परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है।

इसलिए “नित्य लीला लीन” शब्द का प्रयोग श्रद्धापूर्वक करते समय उसके वास्तविक अर्थ को समझना चाहिए। 

केवल मृत्यु को नित्य लीला में प्रवेश कहना, बिना शास्त्रीय प्रमाण के, उचित नहीं है।

भगवान की नित्य सत्ता और भक्त की परम गति ;


श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में भगवान श्रीकृष्ण का उद्धव को दिया गया उपदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और भगवान की प्राप्ति के मार्ग का वर्णन है। 

भगवान का उपदेश है—

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ (भगवद्गीता ९.३४)

भावार्थ: मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो। 

इस प्रकार मुझे परम लक्ष्य मानकर तुम मुझे प्राप्त करोगे।

यह श्लोक नित्य लीला लीनता का साधन स्पष्ट करता है। 

मन को भगवान में लगाना, भक्ति करना, पूजा करना और भगवान को परम लक्ष्य मानना—

यही भगवद्भक्ति का मार्ग है।

भक्ति केवल पूजा के समय तक सीमित नहीं होनी चाहिए। 

दैनिक जीवन में सत्य बोलना, धर्म का पालन करना, जीवों के प्रति दया, माता - पिता और गुरु का सम्मान, तथा अपने कर्तव्यों का पालन करना भी आध्यात्मिक जीवन का अंग है।

नित्य लीला लीनता का आंतरिक रहस्य ;


नित्य लीला लीनता का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि मनुष्य अपनी पहचान को केवल शरीर और संसार तक सीमित न रखे। 

वह अपने जीवन को भगवान की सेवा, भक्ति और धर्म के लिए समर्पित करे।

श्रीमद्भागवत में भगवान के भक्तों के चरित्रों द्वारा यह शिक्षा मिलती है कि भगवान की प्राप्ति केवल बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और शुद्ध भाव से होती है। 

प्रह्लाद, ध्रुव, अम्बरीष और अन्य भक्तों के प्रसंगों में भक्ति की शक्ति का वर्णन है। 

भक्ति में तीन प्रमुख तत्व हैं—

भगवान का स्मरण: मन में भगवान के नाम, स्वरूप और गुणों का स्मरण करना।

भगवान की सेवा: पूजा, कीर्तन, शास्त्रश्रवण और लोककल्याणकारी कार्यों द्वारा भगवान की सेवा करना।

भगवान में समर्पण: सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीवन-मरण में भगवान को परम आश्रय मानना।

जब मनुष्य इस भाव से जीवन जीता है, तब उसका चित्त भगवान की ओर स्थिर होने लगता है। 

यही नित्य लीला लीनता की साधना है।

कलियुग में भागवत का संदेश ;


श्रीमद्भागवत में कलियुग के लिए भगवान के नाम, कथा और भक्ति का विशेष महत्व बताया गया है। 

भागवत का मुख्य उद्देश्य जीव को संसार के बंधन से निकालकर परमात्मा की प्राप्ति की ओर ले जाना है। 

इसलिए भागवत प्रवचन केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का विषय है। 

जो मनुष्य नियमित रूप से भगवान की कथा सुनता है, शास्त्रों का अध्ययन करता है और धर्म का पालन करता है, वह अपने चित्त को शुद्ध करने का प्रयास करता है।

भागवत का संदेश यह नहीं कि संसार छोड़कर ही भगवान मिलेंगे। 

बल्कि मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी भगवान की भक्ति कर सकता है। 

गृहस्थ, साधु, विद्यार्थी, कर्मयोगी—

सभी भगवान की भक्ति के अधिकारी हैं।

नित्य लीला लीनता और गुरु - शास्त्र ;


श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध में सूतजी, शौनकादि ऋषियों और अन्य महात्माओं के संवाद द्वारा गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व दिखाई देता है। 

शास्त्रों का अध्ययन करते समय योग्य गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। 

गुरु शास्त्रों के अर्थ को स्पष्ट करते हैं, साधना का मार्ग बताते हैं और साधक को भ्रम से बचाते हैं।

नित्य लीला लीनता का मार्ग केवल भावनात्मक अनुभव का विषय नहीं है। 

इस में शास्त्र का अध्ययन, भक्ति का अभ्यास और गुरु की सेवा सम्मिलित हैं।

भगवान की कथा सुनते समय मन में श्रद्धा होनी चाहिए, लेकिन श्रद्धा के साथ विवेक भी आवश्यक है। 
जो बात शास्त्र में स्पष्ट रूप से कही गई है, उसे प्रमाण मानना चाहिए; जो बात किसी विशेष परंपरा की व्याख्या है, उसे उसी रूप में समझना चाहिए।

नित्य लीला लीनता का फल ;


श्रीमद्भागवत का परम फल भगवान की भक्ति और परम सत्य की प्राप्ति है। 

भागवत में भक्तियोग, ज्ञानयोग और वैराग्य के द्वारा जीव के आध्यात्मिक उत्थान का वर्णन मिलता है। 

नित्य लीला लीनता का फल यह है कि मनुष्य भगवान के नाम, रूप, गुण और कथा में प्रेम प्राप्त करे। 

उसका मन सांसारिक विकारों से धीरे-धीरे मुक्त हो और भगवान की भक्ति में स्थिर हो।

भगवान की नित्य लीला का स्मरण भक्त के भीतर आश्रय, शांति और भक्ति की भावना उत्पन्न करता है। 

जब मनुष्य भगवान को अपना परम आश्रय मानता है, तब संसार के सुख-दुःख उसे अपने कर्तव्य से विचलित नहीं करते।

यह अवस्था केवल मृत्यु के बाद की कल्पना नहीं, बल्कि जीवन में भी साधना द्वारा प्राप्त होने वाली आध्यात्मिक स्थिति है।

शास्त्राधारित निष्कर्ष ;


श्रीमद्भागवत का संदेश है कि भगवान परम सत्य हैं, उनकी लीला दिव्य है और भक्ति उनके प्राप्ति का मुख्य साधन है।

"नित्य लीला लीन” का शास्त्रीय अर्थ भगवान की शाश्वत दिव्य लीला में स्थित होना है। 

इस भाव को समझने के लिए भागवत के दशम स्कन्ध की कृष्णलीला, प्रथम स्कन्ध का भागवत माहात्म्य और ग्यारहवें स्कन्ध के उद्धवोपदेश का अध्ययन उपयोगी है। 

मनुष्य को भगवान की कथा सुननी चाहिए, उनका नाम स्मरण करना चाहिए, धर्म का पालन करना चाहिए और गुरु-शास्त्र के मार्गदर्शन में भक्ति करनी चाहिए। 

यही आध्यात्मिक संगत का वास्तविक फल है।

समापन प्रार्थना ;


हे श्रीकृष्ण! हमारे मन को अपने चरणों में स्थिर करो। 

हमें सत्य, धर्म, भक्ति और सदाचार के मार्ग पर चलने की शक्ति दो। 

हमारे हृदय से काम, क्रोध, लोभ और मोह के विकार दूर करो। 

हमें अपनी दिव्य लीला का स्मरण, अपने भक्तों की संगति और शास्त्रों के ज्ञान का प्रकाश प्राप्त हो। 

हे प्रभु! हमारे जीवन का परम लक्ष्य आपकी भक्ति और आपकी प्राप्ति हो।

हरिः ॐ तत्सत्।

शास्त्रीय आधार: श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम, दशम और ग्यारहवें स्कन्ध तथा श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय, चतुर्थ और नवम अध्याय। शुभ संध्या ! जय श्री राधे कृष्ण !!
🌹🙏🌹🙏🌹
!!!!! शुभमस्तु !!!

🍁 *विचार संजीवनी* 🍁

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

🍁 *विचार संजीवनी* 🍁


*ऐसा माने कि ठाकुर जी का संसार है, ठाकुर जी का परिवार है, ठाकुर जी के रुपए हैं, ठाकुर जी का घर है।*

*हम तो ठाकुर जी का काम करते हैं। 

मुनीम की तरह रहें। 

मालिक न बनें।* 

जो काम करें उसका अहसान ठाकुर जी पर रखें कि महाराज ! 

हम आपका काम करते हैं। 

हमारा यहाँ क्या है ? 

परिवार आपका, घर आपका, धन आपका, जमीन आपकी।  






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यह ही सच्ची बात है, क्योंकि जब जन्मे थे, नंग - धड़ंग आए थे।  

एक धागा भी पास में नहीं था और मरेंगे तो यह लाश भी यहीं पड़ी रहेगी।  

लाश को भी साथ नहीं ले जा सकते, तो धन - संपत्ति, वैभव - परिवार साथ में ले जा सकेंगे क्या ?  

*साथ में लाए नहीं, साथ में ले जा सकते नहीं और यहॉं रहते हुए भी इन सबको अपने मन-मुताबिक बना सकते नहीं।*  

आपका प्रत्यक्ष अनुभव है कि आपके लड़के-लड़की आपका कहना नहीं मानते, स्त्रियाँ नहीं मानतीं, कुटुम्बी-जन नहीं मानते। 

तो सिद्ध हुआ कि आप इनको अपने मन - मुताबिक नहीं बना सकते और जितने दिन चाहे साथ में रख नहीं सकते, बदल नहीं सकते। 

स्वभाव बदल दें या रंग बदल दें-- यह आपके हाथ की बात नहीं। 

फिर भी इनको कहते हैं--'मेरी चीजें' । 

ये  'मेरे' कैसे हुए बताइए ? 

अतः मानना ही होगा कि यह सब मेरे नहीं हैं; भगवान के दिए हुए हैं और भगवान के हैं।

राम !             राम !!            राम !!!





|| सुमन्त्रजी का अयोध्या लौटना :-||


श्रीरामको पहुँचाकर जब निषादराज वापस लौटे तो देखा सुमन्त्रजी वहीं व्याकुल पड़े हैं। 

वे 'हा राम ! हा राम!' 

कहते हुए लम्बी साँसें ले रहे हैं। 

रथके घोड़े भी घास चरना छोड़ दिये हैं और श्रीराम जिधर गये थे, उधर ही मुड़ - मुड़कर देख रहे हैं।

निषादराज उनकी दशा देखकर अत्यन्त दुःखी हुए। 

उन्होंने सुमन्त्रसे कहा— 'सुमन्त्रजी ! 

आप अब विषादका त्याग कर दें। 

आप परम विद्वान् एवं परमार्थके सच्चे ज्ञाता हैं। 

आप विधाताको ही वाम जानकर रथपर बैठकर अयोध्या जायँ। 

जब आप ही अपना धैर्य खो देंगे तो महाराज दशरथ और महारानी कौसल्याको सान्त्वना कौन देगा ? 

उनका तो श्रीराम - वनवाससे संसार ही लुट गया है। 

मेरी आपसे विनती है कि आप रथको लेकर शीघ्र अयोध्या पहुँचें।' 

ऐसा कहकर निषादराजने बरबस सुमन्त्रजी को रथ में बैठा दिया।

भगवान् श्रीराम के वियोग से सुमन्त्रजी का शरीर अत्यन्त शिथिल हो गया था। 

वे चाहकर भी रथको नहीं चला पा रहे थे। 

घोड़े भी पीछे देखकर बार - बार हिनहिना रहे थे, मानो वे श्रीरामको लिये बिना जाना ही नहीं चाहते हैं। 
किसी तरह सायंकाल सुमन्त्रजी अयोध्या पहुँचे।

उनकी अवस्था उस व्यापारी - जैसी थी, जो व्यापार के लिये घरसे गया हो और मूल भी हारकर घर वापस आ गया हो। 

सारी अयोध्यापुरी सूनी हो गयी थी। 

कहीं एक शब्द भी नहीं सुनायी देता था।

अयोध्याकी ऐसी दशा देखकर सुमन्त्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ। 

वे सोचने लगे - कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि श्रीराम के विरह जनित संताप से महाराज सहित सभी लोग शोकाग्नि में दग्ध हो गये हों ?'

चिन्तित सुमन्त्र जब नगर के द्वार पर पहुँचे, तब हजारों लोगों ने दौड़ते हुए रथ को घेर लिया और 'श्रीराम कहाँ हैं ?' 

यह पूछते हुए वे रथ के साथ दौड़ने लगे।

उस समय सुमन्त्र ने उन लोगों से कहा- 'सज्जनो ! 

मैं गङ्गाजी के किनारे तक ही रघुनाथ के साथ गया था। 

वहाँ से उन्होंने मुझे लौट जानेकी आज्ञा दी। 

मेरे काफी अनुनय - विनय के बाद भी उन्होंने अयोध्या लौटना स्वीकार नहीं किया। 

अतः मैं उनसे विदा लेकर लौट आया हूँ। 

वे तीनों लोग वहाँसे गङ्गाके उस पार चले गये।' 

यह जानकर सब लोगोंकी आँखोंसे आँसुओंकी धाराएँ बहने लगीं। 

वे सब 'हमें धिक्कार है' ऐसा कहकर लम्बी साँसें खींचने लगे और करुण क्रन्दन करने लगे।

बाजार के बीच से निकलते हुए सुमन्त्रजी को स्त्रियों के रोने की आवाज सुनायी दी। 

वे महलों की खिड़कियों पर बैठकर श्रीरामके वियोग से संतप्त होकर विलाप कर रही थीं। 

राजमार्ग पर पहुँचकर सुमन्त्र ने अपना मुख ढँक लिया। 

वे रथ लेकर सीधे महाराज दशरथ के भवन की ओर गये। 

उन्होंने देखा कि महाराज पुत्र - शोक में मलिन और आतुर हो रहे हैं। 

सुमन्त्रजी महाराज के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये। 

महाराज दशरथने कहा -'सुमन्त्र ! 

तुम श्रीरामका सन्देश बताओ। 

क्या वे तुम्हारे विनय करने पर भी नहीं माने और वन चले गये ? 

क्या तुम सुकुमारी सीता को भी नहीं लौटा पाये ? 

मेरा भाग्य ही खोटा है। 

किसी का कोई दोष नहीं है।'

सुमन्त्रने कहा-'महाराज ! 

धर्मात्मा श्रीराम ने आपके चरणों में प्रणाम कहा है। 

उन्होंने कहा है कि मैं वनवास की अवधि पूरी करके महाराजका दर्शन करूँगा। 

वे मेरी चिन्ता न करें।'

श्रीरामका संदेश सुनकर महाराज दशरथ ने कहा— 'सुमन्त्र ! 

मुझे राम के पास ले चलो, नहीं तो मेरे प्राण निकलना ही चाहते हैं।' 

इस तरह श्रीरामके वियोग में 'हा राम! हा राम!' कहते हुए महाराज दशरथने अपना प्राण त्याग दिया।

        || जय सियाराम जय हनुमान ||

श्री लिंग महापुराण🌷🌷

पंचाक्षर महात्म्य वर्णन....! 
    
इस मन्त्र का वामदेव ऋषि पंक्ति छन्द, देवता साक्षात् मैं ही शिव हूँ, नकारादि पाँच बीज पंच भूतात्मक हैं। 

सर्वव्यापी अव्यय ( ॐ ) प्रणव उसकी आत्मा में हैं। 

हे देवि ! तुम इसकी शक्ति हो।

इस मन्त्र के द्वारा बताये गए विधि पूर्वक न्यास आदि भी करने चाहिए। 

हे शुभे ! 

इसके बाद मैं तुमसे मन्त्र का ग्रहण करना कहता हूँ।

सत्य परायण, ध्यान परायण गुरु को प्राप्त करके शुद्ध भाव से मन, वाणी और कर्म के द्वारा तथा अनेकों द्रव्यों द्वारा आचार्य ( गुरु ) को सन्तुष्ट करके विधि पूर्वक गुरु मुख से मन्त्र ग्रहण करना चाहिए। 

शुचि स्थान में, अच्छे ग्रह में, अच्छे काल में तथा नक्षत्र में तथा श्रेष्ठ योग में मन्त्र ग्रहण करना चाहिए। 

गृह में मन्त्र जपना समान जानना चाहिए। 
गौ के खिरक में सौ गुना और शिवजी के पास में अनन्त गुना मन्त्र का फल होता है।

जप यज्ञ से सौ गुना उपाँशु जप का होता है। 

जो मन्त्र वाणी से उच्चारण किया जाता है वह वाचिक कहा जाता है। 

जो धीरे - धीरे ओठों को कुछ हिलाते हुए जप किया जाता है उसे उपाँशु कहते हैं। 

केवल मन बुद्धि के द्वारा जप किया जाए और शब्दार्थ का, चिन्तन किया जाए वह मानसिक जप होता है। 

तीनों उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। 

जप यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं। 

वे विपुल भोगों को तथा मोक्ष को देते हैं, जप से जन्मान्तरों के पाप क्षय होते हैं, मृत्यु को भी जीत लिया जाता है। 

जप से सिद्धि प्राप्त होती है परन्तु सदाचारी पुरुष को सब सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं दुराचारी को नहीं, क्योंकि उसका साधन निष्फल है। 

अतः आचार ही परम धर्म है। 

आचार ही परम तप है तथा आचार ही परम विद्या है। 

आचार से ही परम गति है। 

आचारवान पुरुष ही सब फलों को पाता है तथा आचारहीन पुरुष संसार में निन्दित होता है। 

इस लिये सिद्धि की इच्छा वाले पुरुष को सब प्रकार से आचारवान होना चाहिए।

संन्ध्योपासना करने वाले पुरुष को सब कार्य तथा फल प्राप्त होते हैं। 

अतः काम, क्रोध, लोभ, मोह किसी प्रकार से भी संध्या को नहीं त्यागना चाहिए। 

संध्या न करने से ब्राह्मण ब्राह्मणत्व से नष्ट होता है। 

असत्य भाषण नहीं करना चाहिये। 

पर दारा, पर द्रव्य, पर हिंसा मन वाणी से भी नहीं करनी चाहिए। 

शूद्रान्न, बासा अन्न, गणान्न तथा राजान्न का सदा त्याग करना चाहिए। 

अन्न का परिशोधन अवश्य चाहिए।

बिना स्नान किये, बिना जप किये हुए, अग्नि कार्य न किए हुए भोजन न करें। 

रात्रि में तथा बिना दीपक के तथा पर्णपृष्ठ पर फूटे पात्र में तथा गली में, पतितों के पास भोजन नहीं करना चाहिए। 

शूद्र का शेष तथा बालकों के साथ भोजन न करे। 

शुद्धान्न तथा सुसंस्कृत भोजन का एकाग्र चित्त से भोजन करना चाहिए। 

शिव इसके भोक्ता हैं ऐसा ध्यान करना चाहिए। 

मुंह से, खड़ा होकर, बायें हाथ से, दूसरे के हाथ से जल नहीं पीना चाहिए। 

अकेला मार्ग में न चले, बाहुओं से नदी को पार न करे, कुआं को न लांघे, पीठ पीछे गुरु या देवता अथवा सूर्य को करके जप आदिक न करे।

अग्नि में पैरों को न तपावे, अग्नि में मल का त्याग न करे। 

जल में पैरों को न पीटे, जल में नाक, थूक आदि मल का त्याग न करे।

अज, स्वान, खर, ऊँट, मार्जार तथा तुष की धूलि का स्पर्श न करे। 

जिसके घर में बिल्ली रहती है वह अन्त्यज के घर के समान है। 

उस घर में ब्राह्मणों को भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि वह चाण्डाल के समान है।

पाद की हवा, सूप की हवा, प्राण और मुख की हवा मनुष्य के सुकृत का हरण करती है अतः इनसे सदा बचना चाहिए। 

पाग बाँध करके, कंचुकी बाँधकर, केश खोलकर, नंगे होकर, अपवित्र हाथों से, मैल धारण किये हुए जप नहीं करना चाहिए। 

क्रोध, मद, जंभाई लेना, थूकना, प्रलाप, कुत्ता का या नीच का दर्शन, नींद आना ये जप के द्वेषी हैं। 

इनके हो जाने पर सूर्य का दर्शन करना चाहिए तथा आचमन, प्राणायाम करके शेष जप करना चाहिए। 

बिना आसन पर बैठकर, सोकर, खाट पर बैठकर जप न करना चाहिए।

आसन पर बैठकर, रेशमी वस्त्र या बाघ चर्म या लकड़ी का या ताल पर्ण का आसन पर बैठकर मंत्रार्थ का विचार करते हुए जप करना चाहिए। 

त्रिकाल गुरु की पूजा करनी चाहिए। गुरु और शिव एक ही हैं। 

शिव विद्या और गुरु भक्ति के अनुसार फल मिलता है। 

श्री की इच्छा वाले पुरुष को गुरु की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। 

गुरु के सम्पर्क से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं। 

गुरु के सन्तुष्ट होने पर सब पाप नष्ट होते हैं। 

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभी देव गुरु की कृपा से ही उस पर सन्तुष्ट होते हैं। 

अतः कर्म, मन, वाणी से गुरु को क्रोध नहीं करना चाहिए। 

गुरु के क्रोध से आयु, ज्ञान, क्रिया सब नष्ट होते हैं। 

उसके यज्ञ निष्फल होते हैं।

शिवजी कहते हैं जो इन्द्रियों का दमन करके पंचाक्षर मन्त्र का जप करता है वह पंच भूतों से विजय को प्राप्त करता है। 

मन का संयम करके जो चार लाख जप करता है वह सभी इन्द्रियों को विजय कर लेता है। 

जो पच्चीस लाख जप करता है वह पच्चीस तत्वों को जीत लेता है। 

बीज सहित संपुट सहित सौ लाख जप करने वाला पवित्र आत्मा परम गति को प्राप्त होकर मुझे पाता है। 

जो इस पंचाक्षर विधि को देव या पितृ कार्य में ब्राह्मणों से सुनेगा या सुनायेगा वह परम गति को प्राप्त होगा।

क्रमशः शेष अगले अंक में...



संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण 

श्रीअयोध्या - माहात्म्य

सम्भेदतीर्थ, सीताकुण्ड, गुप्तहरि और चक्रहरि तीर्थ की महिमा......! 
  
भगवान् शिव बोले - जो संसारसमुद्रसे तारने और गरुड़जीको सुख देनेवाले हैं, घनीभूत मोहान्धकारका निवारण करनेके लिये चन्द्रस्वरूप हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। 

जहाँ ज्ञानमयी मणिकी प्रज्वलित शिखा प्रकाशित होती है तथा जो चित्तमें भगवत्संगरूपी सुधाकी वर्षा करनेवाली चन्द्रिकाके तुल्य है, मानसके उद्यानमें जो प्रवाहित होती है, उस भगवद्भक्तिरूपी मन्दाकिनीकी मैं शरण लेता हूँ। 

वह लीलापूर्वक उत्साहशक्तिको जाग्रत् करनेवाली तथा सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त है। 

सात्त्विक भावोंकी पूर्वकोटि है। 

उसे ही वैष्णवी शक्ति कहते हैं। 

हवासे हिलते हुए कमलदलके पर्वके भीतर रहनेवाले पतनशील जन्तुओंकी भाँति पतनके गर्तमें गिरनेवाले प्राणियोंको स्थिरता देनेवाली एकमात्र श्रीहरिकी स्मृति ही है। 

हृदयकमलकी कलिकाको विकसित करनेवाली ज्ञानरूपी किरणमालाओंसे मण्डित सूर्यस्वरूप आप भगवान्‌को नमस्कार है। 

योगियोंकी एकमात्र गति आप संयमशील श्रीहरिको नमस्कार है। 

तेज और अन्धकार दोनोंसे परे विराजमान आप परमेश्वरको नमस्कार है। 

आप यज्ञस्वरूप, हविष्यके उपभोक्ता तथा ऋक्, यजु एवं सामवेदस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। 

भगवती सरस्वतीके द्वारा गाये जानेवाले दिव्य सद्‌गुणोंसे विभूषित आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। 

आप शान्तस्वरूप, धर्मके निधि, क्षेत्रज्ञ एवं अमृतात्मा हैं, आपको नमस्कार है। 

आप साधकके योगकी प्रतिष्ठा तथा जीवके एकमात्र हेतु हैं, आपको नमस्कार है। 

आप घोरस्वरूप, मायाकी विधि तथा सहस्रों मस्तकवाले हैं, आपको नमस्कार है। 

आप योगनिद्रास्वरूप होकर शयन करते और अपने नाभिकमलसे उत्पन्न संसारकी सृष्टि रचते हैं, आपको नमस्कार है। 

आप जलस्वरूप एवं संसारकी स्थितिके कारण हैं, आपको नमस्कार है। 

आपके कार्योद्वारा आपकी शक्तिका अनुमान होता है। 

आप महाबली, सबके जीवन और परमात्मा हैं, आपको नमस्कार है। 

समस्त भूतोंके रक्षक और प्राण आप ही हैं, आप ही विश्व तथा उसके स्रष्टा ब्रह्मा हैं, आपको नमस्कार है। 

आप नृसिंहशरीर धारण करके दर्पयुक्त हो दैत्यका संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही सबके पराक्रम हैं। 

आपका हृदय अनन्त है। 

आप सम्पूर्ण संसारके भावको ग्रहण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। 

आप संसारके कारणभूत अज्ञानरूपी घोर अन्धकारका नाश करनेवाले हैं। 

आपका धाम अचिन्त्य है, आपको नमस्कार है। 

आप गूढ़रूपसे स्थित तथा अत्यन्त उद्वेगकारक रुद्र हैं, आपको नमस्कार है। 

आप शान्त हैं, जहाँ समस्त ऊर्मियाँ शान्त हो जाती हैं ऐसे कैवल्यपदको देनेवाले हैं। 

सम्पूर्ण भावपदार्थोंसे परे तथा सर्वमय हैं, आपको नमस्कार है। 

जो नील कमलके समान श्याम हैं और चमकते हुए केसरके समान सुशोभित कौस्तुभमणि धारण करते हैं तथा नेत्रोंके लिये रसायनरूप हैं, ऐसे आप भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ।

क्रमशः...
शेष अगले अंक में जारी




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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

श्रीमद् देवी भागवत - वृंदावन के इस देवी मंदिर में दर्शन पूजन से बन जाते हैं शादी के संयोग,

श्रीमद् देवी भागवत  - वृंदावन के इस देवी मंदिर में दर्शन पूजन से बन जाते हैं शादी के संयोग, श्रीमद् देवी भागवत  - वृंदावन के इस देवी मंदिर म...