कलहोपाख्यान- कैकेयी का पूर्वजन्म।

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जय द्वारकाधीश

*कलहोपाख्यान- कैकेयी का पूर्वजन्म ।*

आनन्द रामायण में एक कथा आती है। 

रामविवाह के उपरान्त अयोध्या वापसी के समय राजा दशरथ अपने परिवार के साथ कुछ समय के लिये मुद्गल ऋषि के आश्रम पर रुके थे। 

वहां पर राजा दशरथ की प्रार्थना पर ऋषिवर ने कुछ भूत तो कुछ भविष्य की बातें बतायी। 

यह कथा आनन्द रामायण के सारकाण्ड में वर्णित है। 

इसी प्रसंग में ऋषि ने राजा दशरथ और कैकेयी के पूर्वजन्म की एक कथा कही।

ऋषिवर ने कहा- सह्याद्रि के करबीरपुर में ब्रह्मदत्त नामक एक बड़े ही धर्मनिष्ट ब्राह्मण रहा करते थे। 







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वह कार्तिक मास का निरंतर व्रतसेवन और जागरण किया करते थे। 

वह धर्म में बहुत ही गहरी आस्था रखते थे। 

वह सदा श्री हरि विष्णु के "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करते रहते थे। 

एक दिन उन्होंने कार्तिक मास का जागरण किया और चौथे पहर में निर्माल्य को विसर्जित करने के लिए किसी सरोवर पर जा रहे थे। 

अचानक उनकी नजर एक राक्षसी पर पड़ी जो कि लगभग नंग धड़ंग और भयंकर आकृति वाली, घुरघुराते हुए बात करती थी। 

और वह ब्राह्मण को देखकर उस पर झपटी। 

जैसे ही वह झपटी अचानक ब्रह्म दत्त आत्मरक्षा के लिए जो भी उनके हाथ में था, पत्र, पुष्प, तुलसी और गंगाजल, उसको आत्मरक्षा में वह राक्षसी पर फेंककर मारने लगे। 

तुलसी दल, गंगाजल और निर्माल्य के प्रभाव से अचानक उस राक्षसी के पाप धुल गए और वह अपने पूर्व जन्म का स्मरण कर बैठी। 

वह अपने पूर्व जन्म को याद करके ब्राह्मण के चरणों में गिर पड़ी। 

उसने कहा हे ब्राह्मण देवता! अब आप मेरा उद्धार करिए। ऐसा कहकर उसने अपने पूर्व जन्म का वृतांत बताना शुरू किया।

उसने कहा कि पूर्व जन्म में मैं सौराष्ट्र में भिक्षु नामक एक वेद पाठी ब्राह्मण की पत्नी 'कलहा' थी। 

मैं पति का कभी भी आदर नहीं करती थी। 

मिठाई बनाऊं तो पहले खा लूँ, खाना बनाऊं तो पहले खा लूँ, और बाद में उन्हें बचा-खुचा अर्पण करूं। 

वह जो भी बोलते मैं सदा उसका उल्टा ही करती थी। 

एक दिन मेरे व्यवहार से दुखी होकर ब्राह्मण ने अपने दोस्तों से इस बात की चर्चा की। 

तब दोस्तों ने यह सलाह दिया कि आप अपना अभीष्ट सिद्ध करने के लिए उससे उल्टा बोलो। 

उल्टा बोलोगे तो वह सीधा करेगी। 

इस तरह से हमारे पति मुझसे उल्टा बोल करके अपना कार्य कराने लगे।

एक दिन उन्होंने बोला कि हमारा यह मित्र बहुत दुष्ट है उसको कभी भी घर नहीं बुलाना। 

मैं जाकर के मित्र को बुला भी आई और खाना भी खिलाई। 

एक दिन पति ने बोला कि इस वर्ष मैं श्राद्धकर्म नहीं करूंगा मैंने कहा नहीं आपको तो करना ही पड़ेगा। 

पति ने कहा फिर किसी ब्राह्मण को भोजन मत कराना, मैंने कहा नहीं वह भी करूंगी। 

और फिर उन्होंने कहा एक ही ब्राह्मण को निमंत्रित करना तो मैंने कहा नहीं 18 को बुलाऊँगी और फिर मैं जाकर के 18 ब्राह्मणों को निमंत्रित कर आई। 

और श्राद्धकर्म शुरू हुआ। 

अचानक श्राद्ध कार्य समाप्त होने के बाद मेरे पतिदेव यह भूल गए कि उल्टा बोलना है, और उन्होंने मुझसे कहा कि अब इस श्राद्ध के जो पिंडे हैं, उनको किसी स्वक्ष सरोवर में ले जाकर के विसर्जित कर दो। मैं ले जाकर के उसको शौचालय के कुंड में डाल दिया। 

पति हाहाकार कर उठे। 

फिर अचानक उनको याद आया कि उन्होंने तो सीधा बोल दिया, तब उन्होंने बोला कि अब ठीक है जो कर दिया अच्छा ही किया लेकिन अब पुनः इसको निकाल कर के सरोवर में मत डालना। मैं जाकर के शौचालय के कुंड में कूद करके उसको निकाल लिया और ले जाकर के पवित्र जल में विसर्जित किया।

इस तरह से मेरे पति काफी दुखी हो गए। फिर उन्होंने मेरे अलावा एक दूसरी शादी कर लिया। 

तब मैंने पति के व्यवहार से दुखी होकर आत्महत्या कर लिया। 

आत्महत्या करने के बाद जब मैं यमलोक पहुंची, तो यमदेव ने चित्रगुप्त को बुला करके कहा, इसको कर्मों के हिसाब से क्या फल दिया जाए यह बताओ। 

तब चित्रगुप्त ने कहा कि यह अपने पति से चोरी से छिपकर खाना खाती थी, इसके लिए इसको बिल्ली की योनि में कुछ समय के लिया डाला जाए। 

यह पति से छुपाकर चुपके से मिठाइयां खा लेती थी, इसके लिए इसको कुछ समय के लिए बगुले की योनि में डाला जाए। 

फिर यह जो कि खुद ही खाना खा लेती थी पति का दुराग्रह करती थी, इसके लिए इसको सूकरी के योनि में भी डाला जाए। 

और चूँकि इसने पति से विद्रोह की वजह से ही आत्महत्या किया था, इसके लिए इसको भयंकर मरुस्थल में ले जाकर प्रेतयोनि में डाल दिया जाए।

फिर क्या था यमदूत मुझे इस मरुस्थल मे लाकर के छोड़ दिए। 

भूख प्यास से तड़पते, निढाल मैं ऐसे ही भ्रमण करती रही। 

कुछ समय के बाद में एक वणिक के शरीर में मैं प्रवेश कर गई और वह हमको कहीं दूसरे तीर्थ स्थान पर ले गया, वहाँ तीर्थ के प्रभाव से मुझे कुछ शांति मिली, लेकिन तभी देव गणों ने मुझे उसके शरीर से अलग कर दिया और फिर मैं यहां पर आ गई। 

इस तरह से मैं बिलखती हुई दुख उठाती भटकती हुई यहां पर पड़ी हूँ। 

ब्राह्मण देवता! 

अब आप मेरी रक्षा के लिए कुछ उपाय करें, ताकि अब मैं अन्य तीन योनियों में जन्म लेने से बच जाऊँ।

तब दयालु ब्राह्मण ने अपने पूरे जीवन भर के कार्तिक मास के अर्जित पुण्य का आधा भाग मुझे संकल्प करके दे दिया। 

जैसे ही उसने पुण्य अर्पित किया, मैं एकदम खूबसूरत औरत बन गई और तत्काल स्वर्ग से एक विमान आ गया। 

उसमें से पुण्यशील और सुशील नामक दो विष्णु गण बैठे हुए थे। 

उन्होंने ब्रह्म दत्त का अभिवादन किया और कहा कि आपने जो कार्तिक मास का आधा पुण्य दान किया है, इससे आपका पुण्य दोगुना हो गया है। 

अब आप कृपा करके अपने धर्म कर्म में रत रहिए। 

और आप जब अपना यह शरीर त्याग करेंगे, तब आप अपनी दोनों पत्नियों के साथ विष्णु लोक को गमन करेंगे। 

ऐसा कहकर विष्णु गण मुझे विमान पर बैठाकर चल दिये।

तत्पश्चात ब्राह्मण ने अपने लौकिक कर्मों को पूरा करते हुए जब देह त्याग किया, तब वह विष्णुलोक को प्रस्थान किया। 

बाद में पुण्य क्षीण होने पर ब्रह्मदत्त अयोध्या के राजा दशरथ हुए और कलहा जो थी, वही पुनर्जन्म लेकर राजा की तीसरी पत्नी कैकेई हुई।

🌺🕉️जय श्री सीताराम🕉️🌺





राजा दिलीप की कथा :

रघुवंश का आरम्भ राजा दिलीप से होता है । 

जिसका बड़ा ही सुन्दर और विशद वर्णन महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य रघुवंशम में किया है । 

कालिदास ने राजा दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम, लव, कुश, अतिथि और बाद के बीस रघुवंशी राजाओं की कथाओं का समायोजन अपने काव्य में किया है। 

राजा दिलीप की कथा भी उन्हीं में से एक है।

राजा दिलीप बड़े ही धर्मपरायण, गुणवान, बुद्धिमान और धनवान थे । 

यदि कोई कमी थी तो वह यह थी कि उनके कोई संतान नहीं थी । 

सभी उपाय करने के बाद भी जब कोई सफलता नहीं मिली तो राजा दिलीप अपनी पत्नी सुदक्षिणा को लेकर महर्षि वशिष्ठ के आश्रम संतान प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचे ।

महर्षि वशिष्ठ ने राजा का आथित्य सत्कार किया और आने का प्रयोजन पूछा तो राजा ने अपने निसंतान होने की बात बताई । 

तब महर्षि वशिष्ठ बोले – 

“ हे राजन ! तुमसे एक अपराध हुआ है, इसलिए तुम्हारी अभी तक कोई संतान नहीं हुई है ।”

तब राजा दिलीप ने आश्चर्य से पूछा – 

“ गुरुदेव ! 

मुझसे ऐसा कोनसा अपराध हुआ है कि मैं अब तक निसंतान हूँ। 

कृपा करके मुझे बताइए ?”

महर्षि वशिष्ठ बोले – 

“ राजन ! 

एक बार की बात है, जब तुम देवताओं की एक युद्ध में सहायता करके लौट रहे थे । 

तब रास्ते में एक विशाल वटवृक्ष के नीचे देवताओं को भोग और मोक्ष देने वाली कामधेनु विश्राम कर रही थी और उनकी सहचरी गौ मातायें निकट ही चर रही थी।

तुम्हारा अपराध यह है कि तुमने शीघ्रतावश अपना विमान रोककर उन्हें प्रणाम नहीं किया । 

जबकि राजन ! 

यदि रास्ते में कहीं भी गौवंश दिखे तो दायीं ओर होकर राह देते हुयें उन्हें प्रणाम करना चाहिए । 

यह बात तुम्हे गुरुजनों द्वारा पूर्वकाल में ही बताई जा चुकी थी । 

लेकिन फिर भी तुमने गौवंश का अपमान और गुरु आज्ञा का उलंघन किया है । 

इसी लिए राजन ! 

तुम्हारे घर में अभी तक कोई संतान नहीं हुई ।” 

महर्षि वशिष्ठ की बात सुनकर राजा दिलीप बड़े दुखी हुए।

आँखों में अश्रु लेकर और विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ से प्रार्थना करने लगे – “ गुरुदेव ! 

मैं मानता हूँ कि मुझसे अपराध हुआ है किन्तु अब इसका कोई तो उपाय होगा ?”

तब महर्षि वशिष्ठ बोले – 

“ एक उपाय है राजन ! 

ये है मेरी गाय नंदिनी है जो कामधेनु की ही पुत्री है। 

इसे ले जाओ और इसके संतुष्ट होने तक दोनों पति – पत्नी इसकी सेवा करो और इसी के दुग्ध का सेवन करो । 

जब यह संतुष्ट होगी तो तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी ।” 

ऐसा आशीर्वाद देकर महर्षि वशिष्ठ ने राजा दिलीप को विदा किया।

अब राजा दिलीप प्राण – प्रण से नंदिनी की सेवा में लग गये । 

जब नंदिनी चलती तो वह भी उसी के साथ – साथ चलते, जब वह रुक जाती तो वह भी रुक जाते । 

दिनभर उसे चराकर संध्या को उसके दुग्ध का सेवन करके उसी पर निर्वाह करते थे।

एक दिन संयोग से एक सिंह ने नंदिनी पर आक्रमण कर दिया और उसे दबोच लिया । 

उस समय राजा दिलीप कोई अस्त्र – शस्त्र चलाने में भी असमर्थ हो गया । 

कोई उपाय न देख राजा दिलीप सिंह से प्रार्थना करने लगे – “ हे वनराज ! कृपा करके नंदिनी को छोड़ दीजिये, यह मेरे गुरु वशिष्ठ की सबसे प्रिय गाय है । 

मैं आपके भोजन की अन्य व्यवस्था कर दूंगा ।”

तो सिंह बोला – 

“नहीं राजन ! 

यह गाय मेरा भोजन है अतः मैं उसे नहीं छोडूंगा । 

इसके बदले तुम अपने गुरु को सहस्त्रो गायें दे सकते हो ।”

बिलकुल निर्बल होते हुए राजा दिलीप बोले – 

“ हे वनराज ! 

आप इसके बदले मुझे खा लो, लेकिन मेरे गुरु की गाय नंदिनी को छोड़ दो ।”

तब सिंह बोला – 

“यदि तुम्हें प्राणों का मोह नहीं है तो इसके बदले स्वयं को प्रस्तुत करो । 

मैं इसे अभी छोड़ दूंगा ।”

कोई उपाय न देख राजा दिलीप ने सिंह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और स्वयं सिंह का आहार बनने के लिए तैयार हो गया । 

सिंह ने नंदिनी गाय को छोड़ दिया और राजा को खाने के लिए उसकी ओर झपटा । 

लेकिन तत्क्षण हवा में गायब हो गया।

तब नंदिनी गाय बोली – 

“ उठो राजन ! 

यह मायाजाल, मैंने ही आपकी परीक्षा लेने के लिए रचा था । 

जाओ राजन ! 

तुम दोनों दम्पति ने मेरे दुग्ध पर निर्वाह किया है अतः तुम्हें एक गुणवान, बलवान और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति होगी ।” 

इतना कहकर नंदिनी अंतर्ध्यान हो गई।

उसके कुछ दिन बाद नंदिनी के आशीर्वाद से महारानी सुदक्षिणा ने एक पुत्र को जन्म दिया, रघु के नाम से विख्यात हुआ और उसके पराक्रम के कारण ही इस वंश को रघुवंश के नाम से जाना जाता है । 

महाकवि कालिदास ने भी इसी रघु के नाम पर अपने महाकाव्य का नाम “रघुवंशम” रखा ।

🙏जय जय श्री राम राम राम..!! वंदन अभिनंदन मित्रों👏

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

*मन की चाल*मन की चाल समझ लें, तो सब समझ लिया।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

*मन की चाल*

मन की चाल समझ लें, तो सब समझ लिया। मन को पहचान लिया, तो कुछ और पहचानने को बचता नहीं। मन की चाल समझते ही चेतना अपने में लीन हो जाती है। जब तक नहीं समझा है, तभी तक मन का अनुसरण चलता है। मन के पीछे चलता है आदमी यही मानकर कि मन गुरु है—जो कहता है, ठीक कहता है; जो बताता है, ठीक बताता है।

एक बार अपने मन पर संदेह आ जाए, तो जीवन में क्रांति की शुरुआत हो जाती है। और मजा यही है कि मन सभी पर संदेह करता है। और तुम कभी मन पर संदेह नहीं करते। मन पर तुम्हारी श्रद्धा अपूर्व है; उसका कोई अंत नहीं। और मन रोज तुम्हें गङ्ढे में डाले, तो भी श्रद्धा नहीं टूटती।

मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, लोगों की श्रद्धा उठ गई है। मैं उनसे कहता हूं कि लोगों की जैसी श्रद्धा मन पर है, उसे देखकर ऐसा नहीं लगता कि लोगों की श्रद्धा उठ गई है। कितना ही भटकाए मन, कितना ही सताए मन, कितना ही भरमाए मन—श्रद्धा नहीं टूटती। श्रद्धा तो भरपूर है—गलत दिशा में है। आज तक मुझे कोई अश्रद्धालु आदमी नहीं मिला। श्रद्धा गलत दिशा में हो सकती है; जिस पर नहीं आनी चाहिए, उस पर हो सकती है—लेकिन अश्रद्धालु कोई भी नहीं है।


और दो ही श्रद्धाएं हैं; या तो मन की श्रद्धा है और या आत्मा की श्रद्धा है। या तो तुम अपने पर भरोसा करते हो—अपने का अर्थ है, जहां मन की कोई भनक भी नहीं, जहां एक विचार भी नहीं तिरता, जहां शुद्ध चेतना है—या तो उस शुद्ध चेतना का तुम्हारा भरोसा है। अगर उसका भरोसा है, तो तुम जीवन में कहीं भी गङ्ढे न पाओगे; तुम्हारा कोई पैर गलत न पड़ेगा। और या फिर आदमी भरोसा करता है मन पर। तब तुम गङ्ढे ही गङ्ढे पाओगे; तब तुम जीवन में जहां भी जाओगे, भटकोगे ही—क्योंकि मन की चाल ही ऐसी है।

मन की चाल को समझ लें।

एक, कि मन तुम्हें देखने नहीं देता। मन तुम्हें अंधा रखता है। मन तुम्हारी आंखों को धुंधला रखता है, धुएं से भरा रखता है। वह धुंआ ही विचार है। इतनी तीव्रता से मन विचारों को चलाता है कि तुम्हें जगह भी नहीं मिलती कि तुम देख पाओ, कि तुम्हारे बाहर क्या हो रहा है, कि तुम्हारे जीवन में क्या घट रहा है। मन तुम्हें विचारों में उलझाए रखता है। जैसे छोटे बच्चे को हम खिलौने दे देते हैं—फिर उसकी मां मर भी रही हो, तो भी वह अपने खिलौने से खेलता रहता है, खिलौनों में उलझा रहता है।

मन तुम्हें विचार देता है; विचार खिलौने हैं। खिलौनों में भी थोड़ा—बहुत सत्य है, विचारों में उतना भी नहीं। लेकिन एक खिलौने से तुम चुक भी नहीं पाते कि मन तत्क्षण दूसरा निर्मित कर देता है। इसके पहले कि तुम जागकर देख पाओ, मन तुम्हें नया खिलौना दे देता है। पुराने से तुम ऊब जाते हो, तो मन नई उलझनें सुझा देता है। एक उपद्रव बंद भी नहीं हो पाया कि मन दस उपद्रवों में रस जगा देता है। और यह इतनी तीव्रता से होता है कि दोनों घटनाओं के बीच खिड़की बनाने लायक भी जगह नहीं मिलती, जहां से तुम देख लो कि जिंदगी में हो क्या रहा है।
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन जब बहुत बूढ़ा हो गया, नब्बे वर्ष का हुआ, तब उसका बड़ा भरा—पूरा परिवार था। उसका बड़ा बेटा ही सत्तर वर्ष पार कर रहा था। उसके बेटों के बेटे पचास पार रहे थे। उसके बेटों के बेटे विवाहित हो गए थे। उनके भी बच्चे हो गए थे। अचानक एक दिन बूढ़े नसरुद्दीन ने कहा कि मैंने फिर से शादी करने का तय कर लिया है। पत्नी मर चुकी थी। पहले तो लड़कों ने मजाक समझी; हंसे कि "अब इस बुढ़ापे में...। हम भी बूढ़े हो गए हैं। अब शादी! पिताजी मजाक कर रहे होंगे।' लेकिन नसरुद्दीन ने जब बार—बार दुहराया, तो उन्होंने गंभीरता से बात ली। और जब नसरुद्दीन ने एक दिन सुबह आकर घोषणा ही कर दी कि "मैंने लड़की भी तय कर ली', तब जरा सोचना पड़ा। सारा परिवार इकट्ठा हुआ। उन्होंने विचार किया कि इससे बड़ी फजीहत होगी, लोग हंसेंगे। ऐसे ही नसरुद्दीन की वजह से लोग जिंदगी भर हंसते रहे; और अब यह बुढ़ापे में आखिरी उपद्रव खड़ा कर रहे हैं। क्या कहेंगे लोग? बड़े लड़के को सबने कहा कि तुम्हीं जाकर कहो। बड़े लड़के ने जो सुना तो चकित हो गया। सुना कि सामने ही एक रंगरेज की लड़की से तय किया है नसरुद्दीन ने। लड़की की उम्र मुश्किल से सोलह साल है। उसने कहा, "यह नहीं हो सकता। पापा, यह बंद करो। यह सोच ही छोड़ दो। यह भी तो सोचो, उस लड़की की उम्र सिर्फ सोलह साल है।' नसरुद्दीन ने कहा, "अरे पागल! सोलह साल ही तो शादी की उम्र है। और जब फिर मैंने तेरी मां से शादी की थी, तब उसकी भी उम्र सोलह साल ही थी। इसमें बुरा क्या हुआ जा रहा है?'

मन तर्क दे रहा है। मन पीछे लौटकर नहीं देखता। मन अपनी तरफ नहीं देखता, मन सिर्फ दूसरे की तरफ देखता है।

लड़के बहुत परेशान हुए और बड़े बूढ़ों से सलाह ली। डॉक्टर से भी पूछा। डॉक्टर ने कहा, "यह बहुत खतरनाक है। इस उम्र में शादी जीवन के लिए खतरा हो सकती है।'

फिर बेटे को समझा—बुझाकर भेजा। बेटे ने कहा कि "हम सब सलाह—मशविरा किए हैं। डॉक्टर कहता है, जीवन के लिए खतरा हो सकता है। जीवन को दांव पर मत लगाओ।' नसरुद्दीन ने कहा, "अरे पागल, यह लड़की मर भी गई तो कोई लड़कियों की कमी है? दूसरी लड़की खोज लेंगे।'

मन कभी पीछे की तरफ देखता नहीं—अपनी तरफ नहीं देखता है। मन सदा दूसरे में खोजता है सुख, दूसरे पर थोपता है दुख; दूसरे से पाना चाहता है शांति, दूसरे से ही पाता है अशांति। सदा ही नजर दूसरे पर लगी है, जबकि नजर अपने पर लगी होनी चाहिए। तो मन के जगत का उपद्रव, मूल आधार दूसरे पर दृष्टि है।

सुनो भई साधो 
जय श्री कृष्ण....!!!
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।। जीवन के प्रेरणा दायक सुंदर कहानी ।।💦💕 *दादा बापू ओर दादी माँ की नोंक-झोंक*

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*दादा बापू ओर दादी माँ की नोंक-झोंक*
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इन 60-65 साल के अंकल आंटी का झगड़ा ही ख़त्म नहीं होता...

एक बार के लिए मैंने सोचा अंकल और आंटी से बात करूं क्यों लड़ते हैं हरवक़्त, आख़िर बात क्या है... 
.
फिर सोचा मुझे क्या, मैं तो यहाँ मात्र दो दिन के लिए ही तो आया हूँ...

मगर थोड़ी देर बाद आंटी की जोर-जोर से बड़बड़ाने की आवाज़ें आयीं तो मुझसे रहा नहीं गया...

ग्राउंड फ्लोर पर गया मैं, तो देखा अंकल हाथ में वाइपर और पोंछा लिए खड़े थे...

मुझे देखकर मुस्कराये और फिर फर्श की सफाई में लग गए...

अंदर किचन से आंटी के बड़बड़ाने की आवाज़ें अब भी रही थीं...!






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कितनी बार मना किया है... फर्श की धुलाई मत करो... पर नहीं मानता बुड्ढा...

मैंने पूछा "अंकल क्यों करते हैं आप फर्श की धुलाई?, 

जब आंटी मना करती हैं तो"...

अंकल बोले " बेटा! फर्श धोने का शौक मुझे नहीं इसे है। 

मैं तो इसीलिए करता हूं ताकि इसे न करना पड़े।"... 

"ये सुबह उठकर ही फर्श धोने लगेगी इसलिए इसके उठने से पहले ही मैं धो देता हूं"
.
क्या!... मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।

अंदर जाकर देखा आंटी किचन में थीं। 

"अब इस उम्र में बुढ़ऊ की हड्डी पसली कुछ हो गई तो क्या होगा? मुझसे नहीं होगी खिदमत।" 

आंटी झुंझला रही थीं।

परांठे बना कर आंटी सिल-बट्टे से चटनी पीसने लगीं...

मैंने पूछा "आंटी मिक्सी है तो फिर..." 

"तेरे अंकल को बड़ी पसंद है सिल-बट्टे की पिसी चटनी। बड़े शौक से खाते हैं। 

दिखाते यही हैं कि उन्हें पसंद नहीं।"

उधर अंकल भी नहा धो कर फ़्री हो गए थे। उनकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी,

"बेटा, इस बुढ़िया से पूछ! रोज़ाना मेरे सैंडल कहां छिपा देती है, मैं ढूंढ़ता हूं और इसको बड़ा मज़ा आता है मुझे ऐसे देखकर।" 

मैंने आंटी को देखा वो कप में चाय उड़ेलते हुए मुस्कुराईं और बोलीं,

"हां! मैं ही छिपाती हूं सैंडल, ताकि सर्दी में ये जूते पहनकर ही बाहर जाएं, देखा नहीं कैसे उंगलियां सूज जाती हैं इनकी।

हम तीनों साथ में नाश्ता करने लगे...

इस नोक झोंक के पीछे छिपे प्यार को देख कर मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था।

नाश्ते के दौरान भी बहस चली दोनों की।
अंकल बोले "थैला दे दो मुझे! सब्ज़ी ले आऊं"... 
"नहीं कोई ज़रूरत नहीं! थैला भर भर कर सड़ी गली सब्ज़ी लाने की।" आंटी गुस्से से बोलीं। 

अब क्या हुआ आंटी!... मैंने आंटी की ओर सवालिया नज़रों से देखा और उनके पीछे-पीछे किचन में आ गया।....




"दो कदम चलने में सांस फूल जाती है इनकी, थैला भर सब्ज़ी लाने की जान है क्या इनमें"...
"बहादुर से कह दिया है वह भेज देगा सब्ज़ी वाले को।"...

" मॉर्निंग वॉक का शौक चर्राया है बुढ़‌ऊ को"... "तू पूछ उनसे! क्यों नहीं ले जाते मुझे भी साथ में।"... 

"चुपके से चोरों की तरह क्यों निकल जाते हैं?"... आंटी ने जोर से मुझसे कहा।

"मुझे मज़ा आता है इसीलिए जाता हूं अकेले।"... अंकल ने भी जोर से जवाब दिया।

अब मैं ड्राइंग रूम में था, अंकल धीरे से बोले, "रात में नींद नहीं आती तेरी आंटी को, सुबह ही आंख लगतीं हैं, कैसे जगा दूं चैन की गहरी नींद से इसे। 

इसीलिए चला जाता हूं, गेट बाहर से बंद कर के।"

इस नोक-झोंक पर मुस्कराता, में वापिस फर्स्ट फ्लोर पर आ गया... 

कुछ देर बाद बालकनी से देखा अंकल आंटी के पीछे दौड़ रहे हैं।... 

"अरे कहां भागी जा रही हो, मेरे स्कूटर की चाबी ले कर... इधर दो चाबी।"

"हां! नज़र आता नहीं पर स्कूटर चलाएंगे। 

कोई ज़रूरत नहीं। 

ओला कैब कर लेंगे हम।" 

आंटी चिल्ला रही थीं।

"ओला कैब वाला किडनैप कर लेगा तुझे बुढ़िया।"

"हां कर ले! तुम्हें तो सुकून हो ही जाएगा।"

अंकल और आंटी की ये बेहिसाब नोंक-झोंक तो कभी ख़त्म नहीं होने वाली थी...

मगर मैंने आज समझा कि इस तकरार के पीछे छिपी थी इनकी एक दूसरे के लिए बेशुमार मोहब्बत और फ़िक्र...

मैंने आज समझा था कि *प्यार वो नहीं जो कोई "कर" रहा है..., प्यार वो है जो कोई "निभा" रहा है..*

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*दिल छू गयी कहानी।काश बुढापे की यह नोक झोंक हर किसी की किस्मत में लिखी  होती ईश्वर ने।* 
🤝जय श्री कृष्ण🤝

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science
सेल नंबर: . ‪‪+ 91- 7010668409‬‬ / ‪‪+ 91- 7598240825‬‬ ( तमिलनाडु )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोप...