सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्रीमद्भागवत प्रवचन ।।
श्रीमद्भागवत पुराण से ली गयी,कालियदमन कथा!!!!!!
भगवान श्रीकृष्ण एक दिन अपने सखा ग्वालबालों के साथ यमुना तट पर गये।
सारी गौ और ग्वालबालों का गर्मी के कारण प्यास से गला सूख रहा था, इस लिये उन्होनें यमुना जी का विषैला जल पी लिया।
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उस विषैले जल को पीते ही सब गोएँ और ग्वालबालों का शरीर शांत हो गया।
उन्हें ऐसी अवस्था में देखकर उनके सर्वस्व श्रीकृष्ण ने अपनी अमृत बरसाने वाली दृष्टि से उन्हें जीवित कर दिया।
चेतना आने पर वे सब यमुना जी के तट पर उठ खड़े हुए और आश्चर्यचकित होकर एक-दूसरे को देखने लगे।
अन्त में उन्होनें यही निश्चय किया कि हम लोग विषैला जल पी लेने के कारण मर चुके थे, परंतु हमारे श्रीकृष्ण ने अपनी अनुग्रह भरी दृष्टि से देखकर हमें फिर से जिन्दा कर दिया है।
भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि महाविषधर कालियनाग ने यमुना जी का जल विषैला कर दिया है।
तब यमुना जी को शुद्ध करने के विचार से उन्होनें वहाँ से उस सर्प को निकालने का निश्चय किया।
यमुना जी में कालियनाग का एक कुंड था।
उसका जल विष की गर्मी से खौलता रहता था।
यहाँ तक कि उसके ऊपर उड़ने वाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे।
उसके विषैले जल का स्पर्श पाकर जब वायु किसी पेड़, पौधे और तट की घास या किसी पशु-पक्षी का स्पर्श करती तब वे उसी समय मर जाते थे।
भगवान का अवतार तो दुष्टों का दमन करने के लिये ही होता है।
जब भगवान ने देखा उस साँप के विष का वेग बड़ा भंयकर है और उससे यमुना जी भी दूषित हो गयी हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण अपनी कमर का फेंटा कसकर एक बहुत बड़े ऊँचे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गये और वहाँ से उस विषैले जल में कूद पड़े।
भगवान कालियदह में कूदकर अत्यंत बलशाली मतवाले गजराज के समान जल उछालने लगे।
इस प्रकार जल में खेलने पर उनकी भुजाओं की टक्कर से जल में बड़े ज़ोर का शब्द होने लगा, जिसे सुनकर कलियनाग चिढ़कर भगवान श्रीकृष्ण के सामने आ गया।
उसने देखा कि सामने एक साँवला सलोना बालक है।
उसका अत्यंत सुकुमार शरीर है।
उसकी मंद-मंद मुस्कान से आँखे हटती ही नहीं है।
इतना आकर्षक रूप होने पर भी जब कालियनाग ने देखा कि बालक तनिक भी न डरकर इस विषैले जल में मौज से खेल रहा है तब उसका क्रोध और भी बढ़ गया।
उसने श्रीकृष्ण को अपने बंधन में ज़ोर से पकड़ लिया।
भगवान श्रीकृष्ण नागपाश में बँधकर चेतनाहीन हो गये।
उनके प्यारे सखा ग्वालबाल उनको ऐसी हालत में देखकर दुख से बेहोश हो गये।
गाय, बैल, बछिया दुख से उकराने लगे, व्याकुल होकर रोने लगे।
जब गोपियों ने देखा हमारे प्रियतम श्यामसुंदर को काले साँप ने जकड़ रखा है तब तो उनके हृदय में बड़ा ही दुख और बड़ी ही जलन हुई।
माता यशोदा तो अपने लाड़ले लाला के पीछे कालीयदह में कूदने ही जा रही थी, परन्तु गोपियों ने उन्हें पकड़ लिया।
नन्दबाबा भी कालीयदह में घुसने लगे पर बलराम जी ने सभी को समझा-बुझा कर रोक लिया।
साँप के शरीर से बँध जाना तो श्री कृष्ण की मनुष्यों जैसी एक लीला थी।
जब उन्होंने देखा कि ब्रज के सभी लोग अत्यन्त दुखी हो रहे हैं तो भगवान ने अपने शरीर को फुलाकर मोटा कर लिया और नाग पाश के बंधन से मुक्त हो गये।
अब तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया और अपना फन ऊँचा करके फुफकारने लगा।
उसके नथुनो से विष की फुहारें निकल रही थीं और मुँह से आग की लपटें।
भगवान श्रीकृष्ण ने उसके बड़े-बड़े सिरों को दबा लिया, उछलकर उन पर सवार हो गये और कलापूर्ण नृत्य करने लगे।
कालियनाग के 100 सिर थे।
वह अपने जिस सिर को नहीं झुकाता था, उसी को भगवान अपने पैरों की चोट से कुचल डालते।
इससे कालियनाग की जीवन शक्ति क्षीण हो गई, व मुँह और नथुनो से खून उगलने लगा।
भगवान के रस अद्भुत तांडव नृत्य से कालियनाग का एक-एक अंग चूर-चूर हो गया और मुँह से खून की उल्टी होने लगी।
नारायण की स्मृति हुई और मन ही मन भगवान की शरण में गया।
पति कालियनाग की दुर्दशा देखकर उसकी पत्नियाँ भगवान की शरण में आयीं। नागपत्नियाँ बोली- प्रभो!
इस अपराधी को दंड देना सर्वथा उचित है।
आप किसी को दंड देते हो, वह उसके पापों का प्रायश्चित कराने और उसका परम कल्याण करने के लिए ही है।
यह इसकी किस साधना का फल है, जो यह आपके चरण कमलों की धूल का स्पर्श पाने का अधिकारी हुआ है।
आपके चरणों की रज पाने के लिये तो लक्ष्मी जी को बहुत तपस्या करनी पड़ी थी।
जिसको आपकी पवित्र चरण रज प्राप्त हो गई उसे संसार के वैभव-संपत्ति तो क्या- मोक्ष की भी प्राप्ति हो जाती है।
ये कालियनाग मूढ़ है, आपको पहचानता नहीं है, इसलिये इसे क्षमा कर दीजिए।
हमारे प्राणस्वरूप पातिदेव को हमें वापिस लौटा दीजिए।
जब नागपत्नियों ने इस प्रकार भगवान की स्तुति की, तब उन्होंने दया करके उसे छोड़ दिया।
भगवान के चरणों की ठोकर से कालियनाग के फण छिन्न-भिन्न हो गये थे।
धीरे-धीरे उसके प्राणों में चेतना आयी और वह दीनता से हाथ जोड़कर भगवान श्री कृष्ण से बोला-
“नाथ हम तो जन्म से ही दुष्ट, तमोगुणी और क्रोधी स्वभाव के हैं।
हमारा ऐसा स्वभाव भी आपने ही बनाया है।
इसी स्वभाव के कारण हम किसी को डस लेते हैं तो हमारा क्या दोष?
आप ही बताओ- सब कुछ बनाने वाले, सब करने वाले तो आप ही हो।
आपने ही साँप के शरीर में विष भरा, आप चाहते तो अमृत भी भर सकते थे।
अब आप अपनी इच्छा से जैसा उचित समझें- आप कृपा कीजिये या दंड दीजिए।
” भगवान श्रीकृष्ण ने कालियनाग से कहा–
सर्प!
अब तुझे यहाँ नहीं रहना चाहिये।
अपने वंश- परिवार के साथ यहाँ से चले जाओ।
जो तुम्हारी-हमारी लीला का संकीर्तन करेगा, उसको तुम्हारा भय नहीं होगा।
जो यहाँ यमुना-जल में स्नान करके तर्पण करेगा, उपवास करके हमारी पूजा करेगा वह पाप से मुक्त हो जायेगा।
अब चले जाओ गरुड़ तुमको नहीं मारेगा।
अब तुम्हारा शरीर मेरे चरण-चिन्हों से अंकित हो गया है।
इसलिये जा, अब गरुड़ तुझे खायेगा नहीं।
भगवान श्री कृष्ण की ऐसी आज्ञा पाकर-कालियनाग और उसकी पत्नियों ने दिव्य वस्त्र, पुष्पमाला बहुमूल्य आभूषण, दिव्य गंध और अति उत्तम कमलों की माला से जगत् के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण का पूजन किया।
उनकी अनुमति लेकर “रमणक द्वीप” (जो समुंद्र में सर्पों के रहने का एकमात्र स्थान है।) की ओर चले गये।
श्रीकृष्ण की कृपा से यमुना का जल केवल विषहीन ही नहीं बल्कि उसी समय अमृत के समान मधुर हो गया।
संकलित – श्रीमद्भागवत-महापुराण। लेखक – महर्षि वेदव्यास जी।
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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