सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्रीमद्भागवत प्रवचन ।।
।। श्रीमद्भागवत प्रवचन - कालियदमन कथा।।
श्रीमद्भागवत पुराण से ली गयी,कालियदमन कथा !!!!!!
भगवान श्रीकृष्ण ने क्यों किया कालिय नाग का दमन ?
भगवान श्रीकृष्ण एक दिन अपने सखा ग्वालबालों के साथ यमुना तट पर गये।
सारी गौ और ग्वालबालों का गर्मी के कारण प्यास से गला सूख रहा था, इस लिये उन्होनें यमुना जी का विषैला जल पी लिया।
CRAFTEL Metal Analog Double Sided Vintage Station Wall Clock with Brass in dial (Dial - 8 Inches, Rose Gold)
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| { Brand | CRAFTEL |
| Colour | Both Side English Dial |
| Display Type | Analog |
| Style | Both Side English Dial |
| Special Feature | Large Display |
| Product Dimensions | 21W x 21H Centimeters |
| Power Source | Battery Powered |
| Room Type | Bedroom, Hall, Home, Living Room, Office |
| Shape | Round |
| Indoor/Outdoor Usage } | Indoor |
{ About this item
- ELECTROPLATED ROSE GOLD FINISH ? Multi-layer electroplating bonded directly to the brass body. No paint. No cheap film. A warm, copper-pink metallic tone that is tarnish-resistant. Other brands paint their frames, which chip. Ours is electroplated. A process used in premium jewellery.
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- BOTH SIDES ENGLISH NUMERALS ? English numerals (1-12) on both sides for clear timekeeping. Features an aluminum matte-finish dial within a solid brass body. Two independent quartz movements. Requires 2x AA batteries. Confirm your variant before ordering this 8-inch timepiece.
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श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाएँ केवल मनोरंजन की कथाएँ नहीं हैं, बल्कि उनमें गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा हुआ है।
उन्हीं दिव्य लीलाओं में कालिय दमन की लीला अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह कथा हमें बताती है कि जब अहंकार, विष, क्रोध और अधर्म जीवन में अपना स्थान बना लेते हैं, तब भगवान की शरण ही उनका निवारण करने का मार्ग बनती है।
उस विषैले जल को पीते ही सब गोएँ और ग्वालबालों का शरीर शांत हो गया।
उन्हें ऐसी अवस्था में देखकर उनके सर्वस्व श्रीकृष्ण ने अपनी अमृत बरसाने वाली दृष्टि से उन्हें जीवित कर दिया।
चेतना आने पर वे सब यमुना जी के तट पर उठ खड़े हुए और आश्चर्यचकित होकर एक - दूसरे को देखने लगे।
अन्त में उन्होनें यही निश्चय किया कि हम लोग विषैला जल पी लेने के कारण मर चुके थे, परंतु हमारे श्रीकृष्ण ने अपनी अनुग्रह भरी दृष्टि से देखकर हमें फिर से जिन्दा कर दिया है।
भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि महाविषधर कालियनाग ने यमुना जी का जल विषैला कर दिया है।
तब यमुना जी को शुद्ध करने के विचार से उन्होनें वहाँ से उस सर्प को निकालने का निश्चय किया।
यमुना जी में कालियनाग का एक कुंड था।
उसका जल विष की गर्मी से खौलता रहता था।
यहाँ तक कि उसके ऊपर उड़ने वाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे।
उसके विषैले जल का स्पर्श पाकर जब वायु किसी पेड़, पौधे और तट की घास या किसी पशु-पक्षी का स्पर्श करती तब वे उसी समय मर जाते थे।
भगवान का अवतार तो दुष्टों का दमन करने के लिये ही होता है।
जब भगवान ने देखा उस साँप के विष का वेग बड़ा भंयकर है और उससे यमुना जी भी दूषित हो गयी हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण अपनी कमर का फेंटा कसकर एक बहुत बड़े ऊँचे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गये और वहाँ से उस विषैले जल में कूद पड़े।
भगवान कालियदह में कूदकर अत्यंत बलशाली मतवाले गजराज के समान जल उछालने लगे।
इस प्रकार जल में खेलने पर उनकी भुजाओं की टक्कर से जल में बड़े ज़ोर का शब्द होने लगा, जिसे सुनकर कलियनाग चिढ़कर भगवान श्रीकृष्ण के सामने आ गया।
उसने देखा कि सामने एक साँवला सलोना बालक है।
उसका अत्यंत सुकुमार शरीर है।
उसकी मंद - मंद मुस्कान से आँखे हटती ही नहीं है।
इतना आकर्षक रूप होने पर भी जब कालियनाग ने देखा कि बालक तनिक भी न डरकर इस विषैले जल में मौज से खेल रहा है तब उसका क्रोध और भी बढ़ गया।
उसने श्रीकृष्ण को अपने बंधन में ज़ोर से पकड़ लिया।
भगवान श्रीकृष्ण नागपाश में बँधकर चेतनाहीन हो गये।
उनके प्यारे सखा ग्वालबाल उनको ऐसी हालत में देखकर दुख से बेहोश हो गये।
गाय, बैल, बछिया दुख से उकराने लगे, व्याकुल होकर रोने लगे।
जब गोपियों ने देखा हमारे प्रियतम श्यामसुंदर को काले साँप ने जकड़ रखा है तब तो उनके हृदय में बड़ा ही दुख और बड़ी ही जलन हुई।
माता यशोदा तो अपने लाड़ले लाला के पीछे कालीयदह में कूदने ही जा रही थी, परन्तु गोपियों ने उन्हें पकड़ लिया।
नन्दबाबा भी कालीयदह में घुसने लगे पर बलराम जी ने सभी को समझा - बुझा कर रोक लिया।
साँप के शरीर से बँध जाना तो श्री कृष्ण की मनुष्यों जैसी एक लीला थी।
जब उन्होंने देखा कि ब्रज के सभी लोग अत्यन्त दुखी हो रहे हैं तो भगवान ने अपने शरीर को फुलाकर मोटा कर लिया और नाग पाश के बंधन से मुक्त हो गये।
अब तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया और अपना फन ऊँचा करके फुफकारने लगा।
उसके नथुनो से विष की फुहारें निकल रही थीं और मुँह से आग की लपटें।
भगवान श्रीकृष्ण ने उसके बड़े-बड़े सिरों को दबा लिया, उछलकर उन पर सवार हो गये और कलापूर्ण नृत्य करने लगे।
वृंदावन की पावन भूमि में भगवान श्रीकृष्ण अपने ग्वालबाल मित्रों और गायों के साथ विचरण करते थे।
यमुना नदी का जल उस समय जीवन का आधार था।
लेकिन यमुना के एक भाग में कालिय नामक भयंकर नाग ने अपना निवास बना लिया था।
उसके विष के प्रभाव से उस स्थान का जल विषैला हो गया था।
जल में रहने वाले जीव - जंतु नष्ट होने लगे और उसके आसपास का वातावरण भी दूषित हो गया।
यहाँ कथा हमें एक गहरा संदेश देती है—
जहाँ विषैला अहंकार और नकारात्मकता होती है, वहाँ जीवन की सहजता समाप्त होने लगती है।
कालियनाग के 100 सिर थे।
वह अपने जिस सिर को नहीं झुकाता था, उसी को भगवान अपने पैरों की चोट से कुचल डालते।
इससे कालियनाग की जीवन शक्ति क्षीण हो गई, व मुँह और नथुनो से खून उगलने लगा।
भगवान के रस अद्भुत तांडव नृत्य से कालियनाग का एक-एक अंग चूर-चूर हो गया और मुँह से खून की उल्टी होने लगी।
नारायण की स्मृति हुई और मन ही मन भगवान की शरण में गया।
पति कालियनाग की दुर्दशा देखकर उसकी पत्नियाँ भगवान की शरण में आयीं।
नागपत्नियाँ बोली - प्रभो!
श्रीमद्भागवत की कथा के अनुसार कालिय के विष का प्रभाव इतना भयंकर था कि यमुना के उस भाग के ऊपर उड़ने वाले पक्षी तक विषैली वायु से गिर जाते थे।
वृक्ष सूखने लगे और कोई भी प्राणी उस स्थान के पास जाने का साहस नहीं करता था।
इस अपराधी को दंड देना सर्वथा उचित है।
आप किसी को दंड देते हो, वह उसके पापों का प्रायश्चित कराने और उसका परम कल्याण करने के लिए ही है।
यह इसकी किस साधना का फल है, जो यह आपके चरण कमलों की धूल का स्पर्श पाने का अधिकारी हुआ है।
आपके चरणों की रज पाने के लिये तो लक्ष्मी जी को बहुत तपस्या करनी पड़ी थी।
जिसको आपकी पवित्र चरण रज प्राप्त हो गई उसे संसार के वैभव - संपत्ति तो क्या - मोक्ष की भी प्राप्ति हो जाती है।
🌿 कालिय यमुना में क्यों आया ?
पौराणिक परंपरा में कालिय के यमुना में रहने के पीछे गरुड़ से उसका संघर्ष बताया जाता है।
गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन और महान भक्त हैं।
जिस स्थान पर कालिय पहले रहता था, वहाँ गरुड़ का भय उत्पन्न हुआ।
इस लिए वह अपना निवास छोड़कर यमुना के उस स्थान पर आ गया जहाँ उसे अपेक्षाकृत सुरक्षा मिली।
लेकिन कालिय जहाँ गया, वहाँ भी उसने अपने विष और अहंकार से वातावरण को दूषित कर दिया।
यह प्रसंग हमें बताता है कि केवल स्थान बदलने से समस्या समाप्त नहीं होती।
यदि भीतर का अहंकार और विष बना रहे तो मनुष्य जहाँ भी जाएगा, वहाँ अशांति उत्पन्न कर सकता है।
ये कालियनाग मूढ़ है, आपको पहचानता नहीं है, इस लिये इसे क्षमा कर दीजिए।
हमारे प्राणस्वरूप पातिदेव को हमें वापिस लौटा दीजिए।
जब नागपत्नियों ने इस प्रकार भगवान की स्तुति की, तब उन्होंने दया करके उसे छोड़ दिया।
🌺 श्रीकृष्ण का यमुना तट पर पहुँचना ;
एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपने ग्वालबाल मित्रों के साथ यमुना के तट पर पहुँचे।
बालकों ने उस विषैले जल को देखकर भी उसके प्रभाव को समझे बिना जल पी लिया।
वे मूर्छित होकर गिर पड़े।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य दृष्टि और कृपा से उन सभी को पुनः जीवन प्रदान किया।
गोप - बालकों और वृंदावनवासियों को जब इस घटना का पता चला तो वे भयभीत हो गए।
भगवान श्रीकृष्ण ने निश्चय किया कि अब यमुना को कालिय के विष से मुक्त करना आवश्यक है।
भगवान एक कदंब वृक्ष पर चढ़े और वहाँ से यमुना के जल में छलांग लगा दी।
यमुना का जल चारों ओर उफनने लगा।
कालिय नाग क्रोधित होकर बाहर आया।
उसने भगवान श्रीकृष्ण को अपने विशाल फनों और शरीर से जकड़ लिया।
ग्वालबाल और वृंदावनवासी यह देखकर अत्यंत व्याकुल हो गए।
माता यशोदा, नंद बाबा और गोप - गोपियाँ भगवान की चिंता में रोने लगे।
भगवान के चरणों की ठोकर से कालियनाग के फण छिन्न-भिन्न हो गये थे।
धीरे-धीरे उसके प्राणों में चेतना आयी और वह दीनता से हाथ जोड़कर भगवान श्री कृष्ण से बोला-
“नाथ हम तो जन्म से ही दुष्ट, तमोगुणी और क्रोधी स्वभाव के हैं।
हमारा ऐसा स्वभाव भी आपने ही बनाया है।
इसी स्वभाव के कारण हम किसी को डस लेते हैं तो हमारा क्या दोष?
आप ही बताओ- सब कुछ बनाने वाले, सब करने वाले तो आप ही हो।
आपने ही साँप के शरीर में विष भरा, आप चाहते तो अमृत भी भर सकते थे।
अब आप अपनी इच्छा से जैसा उचित समझें- आप कृपा कीजिये या दंड दीजिए।
” भगवान श्रीकृष्ण ने कालियनाग से कहा–
🐍 कालिय के फनों पर भगवान का नृत्य ;
तभी भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को कालिय के बंधन से मुक्त किया और उसके फनों पर चढ़ गए।
कालिय ने अनेक फन उठाए।
भगवान श्रीकृष्ण एक फन से दूसरे फन पर जाने लगे। फिर भगवान ने उसके फनों पर दिव्य नृत्य किया।
भगवान के चरणों का भार कालिय के अहंकार को तोड़ने लगा। उसके फन झुकने लगे और उसके शरीर से विष का प्रभाव कम होने लगा।
यह दृश्य केवल एक नाग पर भगवान की विजय नहीं था।
यह अहंकार पर भगवान की विजय थी।
कालिय के फन अनेक थे।
प्रतीक रूप से इन्हें मनुष्य के भीतर मौजूद अनेक प्रकार के अहंकार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, मोह और द्वेष के रूप में समझा जा सकता है।
जब भगवान के चरण हृदय में आते हैं, तब ये सभी विषैले भाव धीरे - धीरे शांत होने लगते हैं।
🙏 नाग - पत्नियों की प्रार्थना ;
जब कालिय पर भगवान का प्रभाव बढ़ा तो उसकी पत्नियाँ, जिन्हें नाग - पत्नियाँ कहा गया है, भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आईं।
उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि हमारा पति अपराधी है, अहंकारी है, लेकिन आपके चरणों का स्पर्श पाकर उसका जीवन धन्य हो गया है।
उन्होंने भगवान की महिमा स्वीकार करते हुए क्षमा की प्रार्थना की।
यह प्रसंग भक्ति का अत्यंत सुंदर उदाहरण है।
जब मनुष्य अपनी शक्ति पर नहीं, बल्कि भगवान की कृपा पर विश्वास करता है, तब परिवर्तन का मार्ग खुलता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने कालिय को पूर्ण रूप से नष्ट नहीं किया।
उन्होंने उसे आदेश दिया कि वह यमुना छोड़कर रमणक द्वीप चला जाए।
भगवान ने उसे अभय प्रदान किया और कहा कि मेरे चरणों के चिह्न तुम्हारे फनों पर रहेंगे;
इससे गरुड़ भी तुम्हें हानि नहीं पहुँचाएँगे।
इस प्रकार भगवान ने कालिय का विनाश नहीं, बल्कि उसके विष और अहंकार का दमन किया।
🌼 वेद और पुराणों की दृष्टि से इस लीला का सार ;
वैदिक विचारधारा में जल को जीवन का आधार माना गया है।
ऋग्वैदिक परंपरा में जल को पवित्रता, जीवन और कल्याण से जोड़ा गया है।
जल की शुद्धता केवल बाहरी प्रकृति के लिए नहीं, बल्कि जीवन की सात्त्विकता का भी प्रतीक है।
पुराणों में भगवान विष्णु और उनके अवतारों की कथाएँ बार-बार यह संदेश देती हैं कि जब अधर्म और असंतुलन बढ़ता है, तब ईश्वर धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं।
कालिय दमन में भी यही संदेश दिखाई देता है।
यमुना = जीवन और चेतना
कालिय का विष = अहंकार और नकारात्मकता
कदंब वृक्ष = आश्रय और स्थिरता
श्रीकृष्ण के चरण = ईश्वर की कृपा
कालिय का दमन = अहंकार का शमन
इस लिए इस कथा को केवल नाग-वध की कथा समझना उचित नहीं है।
यह मनुष्य के अंतर्मन की कथा भी है।
सर्प!
अब तुझे यहाँ नहीं रहना चाहिये।
अपने वंश- परिवार के साथ यहाँ से चले जाओ।
जो तुम्हारी-हमारी लीला का संकीर्तन करेगा, उसको तुम्हारा भय नहीं होगा।
जो यहाँ यमुना-जल में स्नान करके तर्पण करेगा, उपवास करके हमारी पूजा करेगा वह पाप से मुक्त हो जायेगा।
अब चले जाओ गरुड़ तुमको नहीं मारेगा।
अब तुम्हारा शरीर मेरे चरण - चिन्हों से अंकित हो गया है।
🌺 आज के जीवन के लिए कालिय दमन का संदेश ;
आज मनुष्य के जीवन में भी अनेक प्रकार के “कालिय” मौजूद हैं—
क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, द्वेष, अहंकार, कटु वाणी और दूसरों को नुकसान पहुँचाने की भावना।
जब ये भाव मन में बढ़ते हैं तो मनुष्य का परिवार, समाज और स्वयं उसका जीवन विषाक्त होने लगता है।
श्रीमद्भागवत हमें सिखाता है कि इन विषैले भावों को केवल दबाना पर्याप्त नहीं है।
उन्हें भगवान के चरणों में समर्पित करके भीतर से परिवर्तित करना आवश्यक है।
जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने कालिय के फनों पर नृत्य करके उसके विष और अहंकार को शांत किया, उसी प्रकार यदि मनुष्य अपने हृदय में श्रीकृष्ण - भक्ति, सत्य, करुणा, संयम और धर्म को स्थान देता है तो जीवन का विष भी धीरे - धीरे समाप्त हो सकता है।
इस लिये जा, अब गरुड़ तुझे खायेगा नहीं।
भगवान श्री कृष्ण की ऐसी आज्ञा पाकर-कालियनाग और उसकी पत्नियों ने दिव्य वस्त्र, पुष्पमाला बहुमूल्य आभूषण, दिव्य गंध और अति उत्तम कमलों की माला से जगत् के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण का पूजन किया।
उनकी अनुमति लेकर “रमणक द्वीप” ( जो समुंद्र में सर्पों के रहने का एकमात्र स्थान है। )
की ओर चले गये।
श्रीकृष्ण की कृपा से यमुना का जल केवल विषहीन ही नहीं बल्कि उसी समय अमृत के समान मधुर हो गया।
🙏 निष्कर्ष ;
भक्तों! कालिय दमन की लीला हमें यह संदेश देती है कि भगवान किसी के अहंकार को स्वीकार नहीं करते, लेकिन शरणागत को छोड़ते भी नहीं हैं।
कालिय अपराधी था, परंतु जब उसके भीतर भगवान के प्रति समर्पण उत्पन्न हुआ तो भगवान ने उसे जीवनदान दिया।
इस लिए मनुष्य को अपने भीतर के कालिय को पहचानना चाहिए।
अपने क्रोध को भगवान के चरणों में रखें, अपने अहंकार को भगवान के चरणों में रखें, अपने लोभ और ईर्ष्या को भगवान के चरणों में रखें।
जब हृदय में श्रीकृष्ण का स्मरण और भक्ति आती है, तब जीवन का विष अमृतमय होने लगता है।
“हे प्रभु श्रीकृष्ण! हमारे भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और द्वेष रूपी कालिय का भी दमन कीजिए और हमारे हृदय को अपनी भक्ति से पवित्र कीजिए।”
संकलित – श्रीमद्भागवत-महापुराण। लेखक – महर्षि वेदव्यास जी।
