!! જીવનની સત્ય ઘટના ની વાત !!જિંદગી માં સૌથી મુશ્કિલ સમય શુ હોઈ શકે ??... બેઇજ્જતી.. તો શું થયું ભાઈ.. મૃત્યુ થી બેઇજ્જતી ધોવાઈ જતી નથી.. મહેણાં નો ડર છે..

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

!! જીવનની સત્ય ઘટના ની વાત !!

જિંદગી માં સૌથી મુશ્કિલ સમય શુ હોઈ શકે ??... બેઇજ્જતી.. તો શું થયું ભાઈ.. મૃત્યુ થી બેઇજ્જતી ધોવાઈ જતી નથી.. મહેણાં નો ડર છે.. માથું ઊંચું રાખીને ચાલવું મુશ્કેલ છે.. સામે વાળા ના પ્રશ્નો નો જવાબ નથી.. એની આંખો સામે જોવાની હિંમત નથી.. ઘર ની બહાર નીકળવું.. ચાર લોકો ની વચ્ચે બેસવું મુશ્કેલ છે.. તો પણ મૃત્યુ ઉપાય તો નથી જ. .. 

ઘર છોડી દો.. મહોલ્લો ગલી..ગામ શહેર..સમાજ..કુટુંબ.. અરે બધું જ છોડી ને દૂર ચાલ્યા જવાનું પણ જીવવાનું.. કારણ કે મૃત્યુ કોઈ ઉપાય નથી.. 

જીવન અનેક તક આપે છે ગુમાવેલું પાછું મેળવવાની.. ખોવાયેલું જડી શકે છે.. છુટેલું મળી શકે છે.. સમય નું ઔષધ શ્રેષ્ઠ છે એ ગમે તેવા દર્દ દુઃખ ને મટાડી શકે છે પણ શરત એ છે  કે એના માટે જીવવું જરૂરી છે કારણ કે મૃત્યુ પછી કોઈ તક. નથી.. કોઈ ઓપ્શન નથી.. 
અભાવ છે.. શેનો.. પૈસા નો.. તો સાદું જીવન સ્વીકારી લ્યો.. વ્યવહાર નથી સાચવતા તો સમાજ થી ભૌગોલિક દુરી બનાવી લ્યો..હરિશ્ચંદ્ર રાજા વેચાઈ ને પણ જીવતા રહ્યા તો ભગવાન મળ્યા.. વનવાસ ના દુઃખો વેઠીને પણ રામે મુશ્કેલ સમય ને પાર કરી દીધો.. અરે વિશ્વ ના શ્રેષ્ઠ ધનુર્ધારી અર્જુને સ્ત્રી વેશ ધારણ કરી લીધો.. પરિણામ ઇતિહાસ સાક્ષી છે.. બધું જ છીનવાઈ ગયા પછી પણ મહારાણા જંગલો માં ઘાસ ની રોટી ખાઈને જીવતા રહ્યા.. કારણ કે તક માત્ર જીવન જ આપી શકે છે મૃત્યુ નહીં.. ત્યાં ઓપ્શન નથી હોતો.. 

દોસ્તો નો અભાવ છે.. એકલતા ની સાથે મિત્રતા કરી લ્યો.. તનહાઈ ને મહેફિલ બનાવી લ્યો.. વનરાઈ ને કુટુંબ બનાવી લ્યો.. પહાડો ની નિષ્ઠુરતા સમાજ થી જરીકેય ઓછી નથી જ હોતી..  પણ એના માટે જીવન જરૂરી છે.. સતત વહેતા રહેવું.. નદી ના માર્ગ માં ખાડા પણ આવે છે ને ટેકરા પણ.. તોય અટકી નથી જતી.. માર્ગ કરીને વહેતી રહે છે.. જીવન નું પણ એવું છે.. એ વહેવાના માર્ગ શોધી જ આપે છે..મૃત્યુ સ્થિર કરી દે છે અને જીવન વહેતા રાખે છે.. માટે વહેતા રહેવું હોય તો જીવન જરૂરી છે.. 

પ્રેમ માં દગો થયો..તો શું થયું.. યાર લૈલા ના મૃત્યુ પછી મજનું પણ જીવતો રહ્યો જ છે ને.. પ્રેમ માં દગો થાય ને ત્યારે જ જીવન ની સામે અન્ય લક્ષ્ય ઉભું હોય છે બસ એને ઓળખી લેવાની જરૂર હોય છે અને ઓળખી જવાય ને તો કૃષ્ણ ની જેમ ગોકુળ ની અછત ક્યારેય નહીં વર્તાય.. પણ એના માટે જીવવું જરૂરી છે... સતત ચાલતા રહેવું જરૂરી છે.. અટકી જવાથી ઓપ્શન બંદ થઈ જાય છે.. સમય થંભી જાય છે.. રસ્તાઓ પુરાઈ જાય છે.. 

Survival of fittest ..કોઈપણ સંજોગો માં જીવતા રહેવું જરૂરી છે..નૈતિકતા..આદર્શો.. ની પેલે પાર એક જીવન હોય છે અને એ હંમેશા રહેવું જોઈએ જ્યાં સુધી એનો સ્વયમ અંત ના આવે..

જય દ્વારકાધીશ...!!!
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

*करतूत*!

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

*करतूत*

आज फिर से साहब का दिमाग उचट गया था ऑफिस में ! 

बाहर बारिश हो रही थी,मन किया कि पास वाले ढाबे पर चलकर कुछ खाया जाए ! 

सो ऑफिस का काम फटाफट निपटा कर पहुँच गए साहब ढाबे में !

रामू दौड़त हुआ आया, हाथ  में पानी का गिलास मेज पर रखते हुए साहब को नमस्ते की और बोला "क्या बात है साहब काफी दिनों बाद आये हैं आज आप ?"

"हाँ  रामू , मैं शहर से बाहर गया था !" 

साहब ने जबाब दिया !

"आप बैठो साहब, मैं आपके लिए कुछ खाने को लाता हूँ !"

वो एक साधारण सा ढाबा था, मगर पता नहीं इतने बड़े साहब को वंहा आना बड़ा ही अच्छा लगता था ! 





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साहब को कुछ भी आर्डर देने की जरुरत नहीं पड़ती थी, बल्कि उनका मनपसंद भोजन अपने आप ही रामू ले आता था ! 

स्वाद भी बहुत भाता था साहब को यहां के खाने का ! 

पता नहीं रामू को कैसे पता लग जाता था की साहब को कब क्या अच्छा लगेगा ! 

और पैसे भी काफी कम लगते थे यहां पर !

साहब बैठे सोच ही रहे थे की चिर - परिचित पकोड़ों की खुशबु से साहब हर्षित हो गए !

"अरे रामू, तू बड़ा जादूगर है रे ! 

इस मौसम में इससे  अच्छा और कुछ हो ही नहीं सकता है !" 

साहब पकोड़े खाते हुए बोले !

"अरे साहब, पेट भर के खाईयेगा, इसके बाद अदरक वाली चाय भी लाता हूँ !" 

रामू बोला !

साहब का मूड एकदम फ्रेश हो गया था !

देखो आज मैं तुम्हारे ढाबे के कुक से मिलकर ही जाऊँगा, बड़ा ही अच्छा खाना बनाता है वो !" 

साहब ने फिर से अपनी पुरानी जिद्द दोहरा दी !

हर बार रामू टाल देता था, मगर आज साहब ने भी जिद्द पकड़ ली थी कि रसोइये से मिलकर ही रहूँगा, उसका शुक्रिया अदा करूँगा !

साहब जबरदस्ती रसोई में घुस गए ! 

आज रामू की एक ना चल पायी !

अंदर का नजारा साहब ने  देखा की एक बूढी सी औरत चाय बना रही थी, वो बहुत खुश थी !

*"माँ"* साहब के मुंह से निकला,

"मैने तो आपको वृद्धाश्रम में डाल दिया था !"

"हाँ बेटा, मगर जो सुख मेरे को यहाँ तुझे खाना खिला कर मिलता है वो वहां नहीं है !"

आज साहब को पता लग गया कि रामू को उसकी पसंद की डिशेज कैसे पता है और वहां पर पैसे कम क्यों लगते हैं !

जय श्री कृष्ण...!!!






|| श्रीमद् भागवत रहस्य-||


इस तरह दशम स्कंध में गोस्वामी,सनातन गोस्वामी, महाप्रभुजी,श्रीधर स्वामी जैसे महापुरुष  भगवान की लीला में  पागल बने है। 

सनातन गोस्वामी,जो कभी किसी राजा के दीवान थे,कृष्ण - प्रेम में पागल होकर लंगोटी पहनकर घूमने लगे थे।

वे बंगाल के जमीनदार थे।घर में खूब संपत्ति थी। 

एक दिन किसी पवित्री ब्राह्मण के मुख से  दशम स्कंध की कथा सुनी और वे  कृष्ण - प्रेम में पागल हो गए। सर्व संपत्ति का दान किया और ताड़पत्र की लंगोटी पहन कर लीला - निकुंज में राधेकृष्ण -  राधेकृष्ण करते हुए घूमने लगे। 

पूतना वासना है और वासना आँख से अंदर आती है आँख संसार के सुन्दर विषयों को, देख उसके पीछे दौड़ती है। 

उसे पता है कि यह मेरा नहीं है,मुझे नहीं मिलने वाला फिर भी पाप करती है। 

वासना अंदर - ना आए ऐसी इच्छा हो तो आँख बंद कर उपासना करो। 

वासनाका नाश उपासना से होता है। 

जगत को बोध देने कन्हैया ने आँखे बंद की है। 

प्रभु हमे बोध देते है कि आँखे बंद कर उसे संभालो। 

आँखों को सँभालने से मन पवित्र बनेगा।

पूतनाका स्तनपान करते करते कन्हैया उसके प्राण चूसने लगा। 

पूतना अति व्याकुल हुई। 

उसने राक्षसी का रूप धारण किया और आकाश मार्गसे कन्हैया को ले जाने लगी। 

व्रजवासी उसके पीछे दौड़ते है। 

पर थोड़ी ही देर में कनैयाने उसे जमीं पर गिराया और बड़ा धमाका हुआ। 

पूतनाका उद्धार हुआ है.और पूतना राक्षसी के वक्षःस्थल पर कन्हैया विराजमान था। 

धमाका सुनकर गोपियाँ दौड़ती हुई आई और यशोदा को कोसने लगी। 

कनैया पूतनाको क्यों दिया ?

हमने  कितनी मन्नतें मानी थी,तब कहीं तुम्हे पुत्र हुआ और तुम्हे इसकी कोई कीमत नहीं है।

यशोदा ने गोपियों का उलाहना सुनकर आँखे नीची कर ली। 

उन्होंने कहा - यह मेरा पहला बालक है। 

मुझे बालक के लालन - पालन का अनुभव नहीं है। 

अब तुम जो बताओगे वह करुँगी।

गोपियों ने कहा - छोटा सा कन्हैया राक्षसी को क्या मार सकता है ? 

राक्षसी तो अपने पाप से मरी है। 

हमारा कन्हैया तो नारायण की कृपा से बच गया। 

माँ,लाला को राक्षसी ने स्पर्श किया है, इस लिए उसकी नज़र उतारनी चाहिए। 

यशोदाजी कहती है - मुझे नज़र उतारना नहीं आता। 

एक गोपी बोली - मै लालाकी नज़र उतारूंगी। 

और गोपियाँ लाला की नज़र उतारने गौशाला में ले गई।

लाला को गाये बहुत प्यारी है। 

एक गंगी नाम की गाय तो लाला की झाँकी पाए बिना कभी पानी तक नहीं पीती थी। 

जब गोपाल उसे मनाते हुए थक जाते तो यशोदा के पास जाते और कहते थे,माँ गौशाला में लाला को ले चलो। 

लाला के दर्शन होते ही गंगी घास खाती थी। 

मनुष्य को भी कोई नियम रखना चाहिए। 

शास्त्र में ऐसा वर्णन है कि जिसके जीवन में कोई नियम नहीं है,वे पशु समान है। 

प्रभु भजन बिना भोजन भी पाप है। 

पेट से पहले प्रभु पूजा करो। 

पेट में कुछ ने होने से सात्विक भाव जागते है। 

अनशन करने से शरीर हल्का होता है और पाप जलते है।
 
बड़े - बड़े ऋषि - मुनि जब हजारों वर्ष तपश्चर्या करने के बाद भी प्रभु के दर्शन पा नहीं सके तो गायों का जन्म लेकर गोकुल में आये। 

उनकी हजारो वर्ष के तपश्चर्या भी उनका अभिमान और वासना जला नहीं पाई थी। 

सो उन्होंने सोचा कि गोकुल में गायों का अवतार लेकर,अपना काम, निष्काम कृष्ण को अर्पित कर देंगे और हम निष्काम हो जायेंगे।

     || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम ||







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||🙏राधा रानी की शक्ति-🙏||


गोवर्धन लीला के बाद समस्त ब्रजमंडल के कृष्ण के नाम की चर्चा होने लगी, सभी ब्रजवासी कृष्ण की जय - जयकार कर रहे थे और उनकी महिमा का गान कर रहे थे।

ब्रज के गोप - गोपियों के मध्य कृष्ण की ही चर्चा थी।

एक स्थान पर कुछ गोप और गोपियाँ एकत्रित थी और यही चर्चा चल रही थी तभी एक गोप मधुमंगल बोला इसमें कृष्ण की क्या विशेषता है, यह कार्य तो हम लोग भी कर सकते है। 

वहां राधा रानी की सखी ललीता भी उपस्थित थी वह तुरंत बोल उठी ...।

हां हां देखी है तुम्हारी योग्यता, जब कृष्ण ने पर्वत उठाया था तो तुम सभी ने अपनी - अपनी लाठियां पर्वत के नीचे लगा थी ।

और कान्हा से हाथ हठा लेने के लिए कहा था, हाथ हठाना तो दूर कान्हा ने थोड़ी से अंगुली टेढ़ी की और तुम सब की लाठियां चटाचट टूट गई थी,तब तुम सब मिलकर यही यही बोले थे कान्हा तुम्ही संभालो, तब कान्हा ने ही पर्वत संभाला था।

यह सुनकर मधुमंगल बोला "हाँ हाँ मान लिया की कान्हा ने ही संभाला, किन्तु हम ने प्रयास तो किया तुमने क्या किया ।

यह सुनकर ललिता बोली  हां हां देखी है तुम्हारे कान्हा की भी शक्ति, माना हमने कुछ नहीं किया किन्तु हमारी सखी राधारानी ने तो किया।

मधुमंगल बोला अच्छा जी राधा रानी ने क्या करा तनिक यह तो बताओ ललीता ने उत्तर दिया "पर्वत तो हमारी राधारानी ने ही उठाया था, कृष्ण का तो बस नाम हो गया।

यह सुनकर सभी गोप सखा हंसने लगे और बोले लो जी अब यह राधा रानी कहाँ से आ गई, पर्वत उठाया कान्हा ने, हाथ दुखे कान्हा के....।

पूरे सात दिन एक स्थान पर खड़े रहे कान्हा, ना भूंख की चिंता ना प्यास की, ना थकान का कोई भाव, ना कोई दर्द, सब कुछ किया कान्हा ने और बीच में आ गई राधारानी तब ललीता बोली लगता है जिस समय कान्हा ने पर्वत उठाया था उस समय तुम लोग कही और थे, अन्यथा तुमको भी पता चल जाता कि पर्वत तो हमारी राधारानी ने ही उठाया था।

या सुनकर सभी गोपसखा बोले ऐसी प्रलयकारी स्थिति में कही और जा कर हमको क्या मरना था, एक कृष्ण ही तो हम सबका आश्रय थे, जिन्होंने सबके प्राणों की रक्षा की।

ललीता बोली तब भी तुमको यह नहीं पता चला कि पर्वत हमारी राधारानी ने उठाया था।सभी गोपसखा बोले हमने तो ऐसा कुछ भी नहीं देखा।

तब ललीता बोली अच्छा यह बताओ कि कान्हा ने पर्वत किस हाथ से उठाया था।

मधुमंगल बोला "कान्हा ने तो पर्वत अपने बायें हाथ से ही उठा दिया था, दायें हाथ की तो आवश्यकता ही नहीं पड़ी।

तब ललीता बोली तभी तो में कहती हूँ की पर्वत हमारी राधारानी ने उठाया, कृष्ण ने नहीं, यदि कृष्ण अपनी शक्ति से पर्वत उठाते तो वह दायें हाथ से उठाते।

किन्तु उन्होंने पर्वत बायें हाथ से उठाया, क्योकि किसी भी पुरुष का दायां भाग उसका स्वयं का तथा बायाँ भाग स्त्री का प्रतीक होता है।

जब कान्हा ने पर्वत उठाया तब उन्होंने श्री राधारानी का स्मरण किया।

और तब पर्वत उठाया, इसी कारण उन्होंने पर्वत बाएं हाथ से उठाया, कृष्ण के स्मरण करने पर श्री राधा रानी ने उनकी शक्ति बन कर पर्वत को धारण किया।

अब किसी भी बाल गोपाल के पास ललीता के इस तर्क का कोई उत्तर नहीं था, सभी निरुत्तर हो गए और ललीता राधे - राधे गुनगुनाती वहां से चली गई।

यह सत्य है कि राधे रानी ही भगवान श्री कृष्ण की आद्यशक्ति है, जब भी भगवान कृष्ण ने कोई विशेष कार्य किया पहले अपनी शक्ति का स्मरण किया श्री राधा रानी कृष्ण की शक्ति के रूप में सदा कृष्ण के साथ रही, इस लिए कहा जाता है, कि श्री कृष्ण को प्राप्त करना है तो श्रीराधा रानी को प्रसन्न करना चाहिए।

जहाँ राधा रानी होंगी वहां श्री कृष्ण स्वयं ही चले आते हैं। 

यही कारण है कि भक्त लोग कृष्ण से पहले राधा का नाम लेते है।

चन्दा से मुख पे, बड़ी बड़ी अखियाँ, लट लटके घुँघराली, गुलाम तेरो बनवारी।

बड़ी बड़ी अखियों मैं, श्याम रंग कजरा, घायल कुंज बिहारी, गुलाम तेरो बनवारी।

सुन बरसाने वारी ,गुलाम तेरो बनवारी...!

   ||  राधे राधे जय जय श्री राधे  ||

!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science
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सेल नंबर: . ‪‪+ 91- 7010668409‬‬ / ‪‪+ 91- 7598240825‬‬ ( तमिलनाडु )
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

🚩🔱 प्रणाम का रहस्य 🔱🚩#प्रणाम परिणाम बदल देता है।वन्दे सन्तं हनुमन्तं।राम भक्तं बलवन्तं॥ज्ञान पण्डित,अन्जनतन्यं।पावना पुत्र,भकरतेजं॥वायुदेवं वानरवीरं।सचिदनदं प्रानदेवं॥रामभक्तं बलवन्तं।वन्दे सन्तं हनुमन्तं॥

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

🚩🔱 प्रणाम का रहस्य 🔱🚩

#प्रणाम परिणाम बदल देता है।

वन्दे सन्तं हनुमन्तं।
राम भक्तं बलवन्तं॥
ज्ञान पण्डित,अन्जनतन्यं।
पावना पुत्र,भकरतेजं॥
वायुदेवं वानरवीरं।
सचिदनदं प्रानदेवं॥
रामभक्तं बलवन्तं।
वन्दे सन्तं हनुमन्तं॥

=========

प्रणाम, नमस्ते या नमस्कार मुख्यतः हिन्दुओं और भारतियों द्वारा एक दूसरे
से मिलने पर अभिवादन और विनम्रता प्रदर्शित करने हेतु प्रयुक्त शब्द है।

इस भाव का अर्थ है कि सभी मनुष्यों के हृदय में एक दैवीय चेतना और प्रकाश है, जो अनाहत चक्र (हृदय चक्र) में स्थित है। 

यह शब्द संस्कृत के
नमस शब्द से निकला है।💐

प्रणाम करने की परंपरा विश्व के हर कोने में है,लेकिन यह भारतीय संस्कृति का आधार है।

शास्त्रों में जितने भी मन्त्रों का उल्लेख किया गया है, अधिकांश में नम: शब्द 
अवश्य आया है।

यह नम: शब्द ही नमस्कार अथवा प्रणाम का सूचक है। 

जिस देवता का मन्त्र होता है,
उसमें उसी देव को प्रणाम किया जाता है। 

ऐसी मान्यता है कि जब हम किसी को प्रणाम करते हैं, तो हम अवश्य ही आशीर्वाद
प्राप्त करते हैं और पुण्य अर्जित करते हैं।

मनु ने तो प्रणाम करने के कई लाभ गिनाए हैं :-

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपि सेविन:, 
तस्य चत्वारि वर्धन्ते,आयु: विद्या यशो बलं।

अर्थात-प्रणाम करने वाले और बुजुर्गों की सेवा करने वाले व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल चार चीजें अपने आप बढ़ जाती हैं।

हालांकि प्रणाम को एक मर्यादा में बांधा गया है कि लोग अपने से श्रेष्ठ को अवश्य
प्रणाम करें, लेकिन देखने में आता है कि प्रणाम भी स्वार्थ के मकड़जाल में उलझ
कर रह गया है।

जिसका समय अच्छा होता है, उसे प्रणाम करने वालों की कतार लग जाती है और
समाज में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो श्रेष्ठ तो हैं, लेकिन यदि उनसे स्वार्थ न
सधता हो, तो उन्हें प्रणाम कम ही लोग करते हैं।

इस सन्दर्भ में गोस्वामी तुलसीदास ने तो अद्भुत आदर्श ही प्रस्तुत किया है।
सिया राममय सब जग जानी।
करउं प्रणाम जोरि जुग पानी।।
बन्दउं सन्त असज्जन चरना।
दुखप्रद उभय बीच कछु बरना।।

अर्थात वह सभी को प्रणाम करने का सन्देश देते हैं। 
उनके अनुसार सम्पूर्ण संसार में भगवान व्याप्त है, इसलिए सभी को प्रणाम किया जाना चाहिए। 

उन्होंने तो सन्त और असज्जन सभी की वन्दना की है।

यही नहीं, श्रीरामचरित मानस में तो शत्रु एवं
दुर्जनों को भी प्रणाम करने का उदाहरण मिलता है। 

हनुमान जी को सुरसा निगल जाना चाहती है, फिर भी हनुमान जी ने उसे प्रणाम किया। 

चौपाई है-
बदन पैठि पुनि बाहर आवा।
मांगी बिदा ताहि सिर नावा।।

किसी को प्रणाम न करने से अनजाने में ही सही, उसका अपमान हो जाता है।

शकुन्तला ने दुर्बासा ऋषि को प्रणाम नहीं किया, तो उन्होंने क्रोधित होकर शकुन्तला को श्राप दे डाला।

प्रणाम कोई साधारण आचार या व्यवहार नहीं है। इसमें बहुत बड़ा विज्ञान छिपा है। 

साधारण तौर पर उसका अर्थ है - हृदय से प्रस्तुत हूं। 

प्रणाम करने में प्राय: भगवान के नाम का उच्चारण किया जाता है, जिसका
अलग ही पुण्य होता है।

कई बार तो प्रणाम भी बाहरी तौर पर किया जाता है और हृदय को उससे दूर ही रखा जाता है।

शायद इसी सन्दर्भ में कहावत
प्रचलित हुई-मुख पर राम बगल में छूरी।

इस तरह का प्रणाम करने से अच्छा है न ही किया जाए।

प्रणाम एक ऐसी व्यवस्था है, जो समाज को प्रेम के सूत्र में बांध कर रखती है।

इसके महत्व को समझा जाए, तो समाज से कटुता अवश्य दूर होगी।

ऐसी मान्यता है कि यदि आप किसी साधक को प्रणाम करते हैं, तो उसकी साधना का फल आपको भी अनायास ही बिना कोई साधना किए मिल जाता है।

प्रणाम करने से अहंकार भी
तिरोहित होता है। 

अहंकार के तिरोहित होने से परमार्थ की दिशा में कदम आगे बढ़ता है।

प्रणाम को निष्काम कर्म के
रूप में लिया जाना चाहिए।

वेदों में ईश्वर को प्रणाम करने की व्यवस्था है, जिसे प्रार्थना कहा गया है।

यह कोई याचना नहीं, निष्काम कर्म ही है, जो परमार्थ के लिए प्रमुख साधन है।

श्रीरामचरित मानस में कहा गया है:-
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम ते प्रकट होइ मैं जाना।।

ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, जो प्रेम के वशीभूत होकर प्रकट हो जाता है।

इसलिए चेतन ही नहीं, जड़ वस्तुओं को भी प्रणाम किया जाए, तो वह ईश्वर को ही प्रणाम है, क्योंकि कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां ईश्वर नहीं है।

प्रणाम सद्भाव से ही किया जाना चाहिए, भले ही वह मानसिक क्यों न हो।

शास्त्रों में इसके भी उदाहरण मिलते हैं। श्रीरामचरित मानस का सन्दर्भ लें, तो 
स्वयंवर के अवसर पर श्रीराम ने अपने गुरु को मन में ही प्रणाम किया था।

गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा।
अति लाघव उठाइ धनु लीन्हा।।

अर्थात-उन्होंने मन-ही-मन गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुश उठा लिया। 

इस प्रकार प्रणाम के रहस्य को समझ कर उसे जीवन में लागू किया जाए, तो अनेक
रहस्यपूर्ण अनुभव प्राप्त होंगे,
इसमें कोई सन्देह नहीं।

इस भावमुद्रा का अर्थ है एक आत्मा का दूसरी आत्मा से आभार प्रकट करना।

दैनन्दिन जीवन में प्रणाम या नमस्ते शब्द का प्रयोग किसी से मिलने हैं या विदा लेते
समय, शुभकामनाएं प्रदर्शित करने या अभिवादन करने हेतु किया जाता है।

प्रणाम के अतिरिक्त नमस्कार और नमस्ते शब्द का प्रयोग करते हैं।

यह समाज की विडंबना ही है कि बहुत से लोग प्रणाम करने की बात तो दूर, 
प्रणाम का जवाब देने से भी कतराते हैं।

इस बात को एक शेर में बहुत ही अच्छे ढंग से कहा गया है।

कोई हाथ भी न मिलाएगा
जो गले मिलोगे तपाक से।
यह नए मिजाज का शहर है,
जरा फासले से मिला करो।

समस्त स्नेही जनों को सादर प्रणाम,,,,

श्री राम चंद्र कृपालु भजमन
हरण भव भय दारुणम्।
नवकंज लोचन कंज मुखकर,
कंज पद कन्जारुणम।।

कंदर्प अगणित अमित छवी
नव नील नीरज सुन्दरम।
पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम।।

भजु दीन बंधू दिनेश दानव
दैत्य वंश निकंदनम।
रघुनंद आनंद कंद कौशल
चंद दशरथ नन्दनम।।

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभुषणं।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जीत खर - दूषणं।।

इति वदति तुलसीदास शंकर
शेष मुनि मन रंजनम।
मम हृदय कुंज निवास कुरु
कामादी खल दल गंजनम।।

मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो
बरु सहज सुंदर सावरों।
करुना निधान सुजान सिलू
सनेहू जानत रावरो।।

राम से बड़ा राम का नाम💐

*_त्वं सोम पितृभिः संविदानो ऽनु द्यावा-पृथिवीऽ आ ततन्थ। तस्मै तऽ इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥६॥_*

*_श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि | बरनौ रघुवर बिमल जसु , जो दायक फल चारि | बुद्धिहीन तनु जानि के , सुमिरौ पवन कुमार | बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार || _*

*_बोलो द्वारकाधीश की जय_*🚩⛳
*_बोलो बजरंगबली की जय_*
_*⛳⚜️शुभ रात्रि जय श्री कृष्ण 🙏 वंदन अभिनंदन मित्रों👏⚜⛳
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

*घर की नीव बहुएं*।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

*घर की नीव बहुएं*

*दीपा और नीता दोनों जेठानी - देवरानी। 

दीपा नौकरी करती थी और नीता घर संभालती थी। 

भरा - पूरा परिवार था, सास - ससुर, दोनों के दो बच्चे कुल १० लोगों का परिवार। 

कई सालों बाद दोनों की बुआ सास कुछ दिन अपने भाई के पास रहने आई। 

सुबह उठते ही बुआ जी ने देखा दीपा जल्दी - जल्दी अपने काम निपटा रही थी। 






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नीता ने सब का नाश्ता, टिफिन बनाया जिसे दीपा ने सब को परोसा, टिफिन पैक किया और चली गई ऑफिस। 

नीता ने फिर दोपहर का खाना बनाया और बैठ गयी थोड़ा सास और बुआ सास के पास।*

*बुआ जी से रहा नहीं गया बोली "छोटी बहू तेरी जेठानी तो अच्छा हुकुम चलाती है तुझ पर, सुबह से देख रही हूं रसोई घर में तू लगी है और वो महारानी दिखावा करने के लिए सबको नाश्ता परोस रही थी जैसे उसी ने बनाया हो।"*

*नीता और सास ने एक दूसरे को देखा, नीता बोली "नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है बुआ जी।"*

*बुआ जी बोली "तू भोली है, पर मैं सब समझती हूं।"*

*नीता से अब रहा नहीं गया और बोली "बुआ जी आपको दीपा दीदी का बाकी सबको नाश्ता परोसना दिखा, शायद ये नहीं दिखा कि उन्होंने मुझे भी सबके साथ नाश्ता करवाया। 

मुझे डांट कर पहले चाय पिलाई, नहीं तो सबको खिलाकर और टिफिन पैक करने में मेरा नाश्ता तो ठंडा हो चुका रहता या मैं खाती ही नहीं। 

दीदी सुबह उठकर मंदिर की सफाई करके फूल सजाकर रखती हैं तो मम्मी जी का पूजा करने में अच्छा लगता है। 

मैं तो नहा कर आते ही रसोई में घुस जाती हूं। 

शाम को आते हुए दीदी सब्जियां भी लेकर आती हैं क्योंकि आपके भतीजों को रात लेट हो जाती है, तब ताजी सब्जियां नहीं मिलती। 

ऑफिस में कितनी मेहनत करनी पड़ती है, फिर ऑफिस में काम करके आकर रात को खाना बनाने में मेरी मदद करती हैं। 

वो मेरी जेठानी नहीं मेरी बड़ी बहन हैं, मैं नहीं समझूंगी तो कौन समझेगा?"*

*बुआ जी चुप हो गई। 

शाम को दीपा सब्जी की थैली नीता को पकड़ाते हुए बोली "इसमें तुम्हारी फेवरेट लेखक की किताब है निकाल लेना।"*

*नीता खुश हो गई और बोली "थैंक्स दीदी।" 

नीता सब्जी की थैली किचन में रखी और किताब रखने अपने कमरे में चली गई। 

बुआ जी ने दीपा को आवाज दी "बड़ी बहू, यहां आना।"*




*दीपा बोली "जी बुआ जी?"*

*बुआ जी बोली "तुम इतनी मेहनत करके कमाती हो और ऐसे फालतू किताबों में पैसे व्यर्थ करती हो, वो भी अपनी देवरानी के लिए। 

वो तो वैसे भी घर में करती ही क्या है ? 

तुम दिन भर मेहनत करती हो और वो घर पर आराम।"*

*दीपा मुस्कुराई बोली "आराम ? 

नीता को तो जबरदस्ती आराम करवाना पड़ता है।

सुबह से बेचारी लगी रहती है किचन में सबकी अलग - अलग पसंद, चार बच्चों का टिफिन, सब बनाती है वो भी प्यार से। 

सुबह की चाय पीने का भी सुध नहीं रहता उसे, दोपहर को जब बच्चे आते हैं फिर उनका खाना, उनकी पढ़ाई सब वही देखती है। 

वो है इस लिए मुझे ऑफिस में बच्चों की चिंता नहीं रहती। 

मैं अपना पूरा ध्यान ऑफिस में लगा पाती हूं। 

कुछ दिन पहले ही प्रमोशन मिला है।*

*मम्मी पापा की दवाई कब खत्म हुई, कब लानी है उसे पता होता है। 

रिश्तेदारों के यहां कब फंक्शन है क्या देना है सब ध्यान रहता है उसे। 

घर संभालना कोई छोटी बात नहीं है। 

मेहमानों की आवभगत बिना किसी शिकायत के करती है। 

उसे बस पढ़ने का शौक है, फिर मैं अपनी छोटी बहन की छोटी सी इच्छा पूरी नहीं करुंगी तो कौन करेगा ?" 

बुआ जी की बोलती फिर बंद हो गई।*

*दीपा वहां से उठ कर चली गई। 

ये सारी बात सास पूजा करते हुए सुन रही थी। 

बुआ जी के पास आकर बोली "जीजी ये दोनों देवरानी जेठानी सगी बहन जैसी हैं और एक दूसरे का अधूरापन पूरा करती हैं। 

मेरे घर की मजबूत नींव है ये दोनों जिसे हिलाना नामुमकिन है। 

ऐसी बातें तो कई लोगों ने दोनों को पढ़ाना चाही, पर मजाल है दोनों ने सामने वाले की बोलती बंद ना की हो ?" 

और सास मुस्कुरा दी। 

बुआ जी की बोलती अब पूरी तरह बंद हैं।

घर को स्वर्ग बनाने के लिये आवश्यक है आपस में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, एक दूसरे को समझने की भावना,कर्तव्य परायणता ये सब आत्म गुणो से घर का गुलदस्ता सजा रहेंगा तो दुनियाँ की कोई ताकत नहीं हमारे घर को नर्क बना दे..*

  *जय श्री कृष्ण*

|| सुमन्त्रजी का अयोध्या लौटना :-||


श्रीरामको पहुँचाकर जब निषादराज वापस लौटे तो देखा सुमन्त्रजी वहीं व्याकुल पड़े हैं। 

वे 'हा राम ! 

हा राम!' कहते हुए लम्बी साँसें ले रहे हैं। 

रथके घोड़े भी घास चरना छोड़ दिये हैं और श्रीराम जिधर गये थे, उधर ही मुड़ - मुड़कर देख रहे हैं।

निषादराज उनकी दशा देखकर अत्यन्त दुःखी हुए। 

उन्होंने सुमन्त्रसे कहा— 'सुमन्त्रजी ! 

आप अब विषादका त्याग कर दें। 

आप परम विद्वान् एवं परमार्थके सच्चे ज्ञाता हैं। 

आप विधाताको ही वाम जानकर रथपर बैठकर अयोध्या जायँ। 

जब आप ही अपना धैर्य खो देंगे तो महाराज दशरथ और महारानी कौसल्याको सान्त्वना कौन देगा ? 

उनका तो श्रीराम - वनवास से संसार ही लुट गया है। 

मेरी आपसे विनती है कि आप रथको लेकर शीघ्र अयोध्या पहुँचें।' 

ऐसा कहकर निषादराजने बरबस सुमन्त्रजी को रथ में बैठा दिया।

भगवान् श्रीराम के वियोग से सुमन्त्रजी का शरीर अत्यन्त शिथिल हो गया था। 

वे चाहकर भी रथको नहीं चला पा रहे थे। 

घोड़े भी पीछे देखकर बार - बार हिनहिना रहे थे, मानो वे श्रीरामको लिये बिना जाना ही नहीं चाहते हैं। 

किसी तरह सायंकाल सुमन्त्रजी अयोध्या पहुँचे।

उनकी अवस्था उस व्यापारी - जैसी थी, जो व्यापार के लिये घरसे गया हो और मूल भी हारकर घर वापस आ गया हो। 

सारी अयोध्यापुरी सूनी हो गयी थी। 

कहीं एक शब्द भी नहीं सुनायी देता था।

अयोध्याकी ऐसी दशा देखकर सुमन्त्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ। 

वे सोचने लगे - कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि श्रीराम के विरह जनित संताप से महाराज सहित सभी लोग शोकाग्नि में दग्ध हो गये हों ?'

चिन्तित सुमन्त्र जब नगर के द्वार पर पहुँचे, तब हजारों लोगों ने दौड़ते हुए रथ को घेर लिया और 'श्रीराम कहाँ हैं ?' 

यह पूछते हुए वे रथ के साथ दौड़ने लगे।

उस समय सुमन्त्र ने उन लोगों से कहा - 'सज्जनो ! 

मैं गङ्गाजी के किनारे तक ही रघुनाथ के साथ गया था। 

वहाँ से उन्होंने मुझे लौट जानेकी आज्ञा दी। 

मेरे काफी अनुनय - विनय के बाद भी उन्होंने अयोध्या लौटना स्वीकार नहीं किया। 

अतः मैं उनसे विदा लेकर लौट आया हूँ। 

वे तीनों लोग वहाँसे गङ्गाके उस पार चले गये।' 

यह जानकर सब लोगोंकी आँखोंसे आँसुओंकी धाराएँ बहने लगीं। 

वे सब 'हमें धिक्कार है' ऐसा कहकर लम्बी साँसें खींचने लगे और करुण क्रन्दन करने लगे।

बाजार के बीच से निकलते हुए सुमन्त्रजी को स्त्रियों के रोने की आवाज सुनायी दी। 

वे महलों की खिड़कियों पर बैठकर श्रीरामके वियोग से संतप्त होकर विलाप कर रही थीं। 

राजमार्ग पर पहुँचकर सुमन्त्र ने अपना मुख ढँक लिया। 

वे रथ लेकर सीधे महाराज दशरथ के भवन की ओर गये। 

उन्होंने देखा कि महाराज पुत्र - शोक में मलिन और आतुर हो रहे हैं। 

सुमन्त्रजी महाराज के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये। 

महाराज दशरथने कहा - 'सुमन्त्र ! 

तुम श्रीरामका सन्देश बताओ। 

क्या वे तुम्हारे विनय करने पर भी नहीं माने और वन चले गये ? 

क्या तुम सुकुमारी सीता को भी नहीं लौटा पाये ? 

मेरा भाग्य ही खोटा है। 

किसी का कोई दोष नहीं है।'

सुमन्त्रने कहा-'महाराज ! 

धर्मात्मा श्रीराम ने आपके चरणों में प्रणाम कहा है। 

उन्होंने कहा है कि मैं वनवास की अवधि पूरी करके महाराजका दर्शन करूँगा। 

वे मेरी चिन्ता न करें।'

श्रीरामका संदेश सुनकर महाराज दशरथ ने कहा— 'सुमन्त्र ! 

मुझे राम के पास ले चलो, नहीं तो मेरे प्राण निकलना ही चाहते हैं।' 

इस तरह श्रीरामके वियोग में 'हा राम! हा राम!' 

कहते हुए महाराज दशरथने अपना प्राण त्याग दिया।

        || जय सियाराम जय हनुमान ||

      *स्नेह वंदन*

         *प्रणाम*

!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

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एक शहर में एक अमीर सेठ रहता था। उसके पास बहुत पैसा था। वह बहुत फैक्ट्रियों का मालिक था ।

एक शाम अचानक उसे बहुत बैचेनी होने लगी । डॉक्टर को बुलाया गया सारे जाँच करवा लिये गये । पर कुछ भी नहीं निकला । लेकिन उसकी बैचेनी बढ़ती गयी । उसके समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है । रात हुई, नींद की गोलियां भी खा ली पर न नींद आने को तैयार और ना ही बैचेनी कम होने का नाम ले ।

वो रात को उठकर तीन बजे घर के बगीचे में घूमने लगा । घुमते -घुमते उसे लगा कि बाहर थोड़ा सा सुकून है तो वह बाहर सड़क पर पैदल निकल पड़ा ।

चलते- चलते हजारों विचार मन में चल रहे थे । अब वो घर से बहुत दूर निकल आया था । और थकान की वजह से वो एक चबूतरे पर बैठ गया ।उसे थोड़ी शान्ति मिली तो वह आराम से बैठ गया ।

इतने में एक कुत्ता वहाँ आया और उसकी चप्पल उठाकर ले गया । सेठ ने देखा तो वह दूसरी चप्पल उठाकर उस कुत्ते के पीछे भागा । कुत्ता पास ही बनी जुग्गी-झोपड़ीयों में घुस गया । सेठ भी उसके पीछे था ,सेठ को करीब आता देखकर कुत्ते ने चप्पल वहीं छोड़ दी और चला गया । सेठ ने राहत की सांस ली और अपनी चप्पल पहनने लगा । इतने में उसे किसी के रोने की आवाज सुनाई दी ।

वह और करीब गया तो एक झोपड़ी में से आवाज आ रहीं थीं । 

उसने झोपड़ी के फटे हुए बोरे में झाँक कर देखा तो वहाँ एक औरत फटेहाल मैली सी चादर पर दीवार से सटकर रो रही हैं । और ये बोल रही है ---हे भगवान मेरी मदद कर ओर रोती जा रहीं है ।
सेठ के मन में आया कि यहाँ से चले जाओ, कहीं कोई गलत ना सोच लें । 

वो थोड़ा आगे बढ़ा तो उसके दिल में ख़्याल आया कि आखिर वो औरत क्यों रो रहीं हैं, उसको तकलीफ क्या है ? और उसने अपने दिल की सुनी और वहाँ जाकर दरवाजा खटखटाया ।

उस औरत ने दरवाजा खोला और सेठ को देखकर घबरा गयी । तो सेठ ने हाथ जोड़कर कहा तुम घबराओं मत ,मुझे तो बस इतना जानना है कि तुम रो क्यों रही हो ।

वह औरत के आखों में से आँसू टपकने लगें । और उसने पास ही गोदड़ी में लिपटी हुई उसकी 7-8 साल की बच्ची की ओर इशारा किया । और रोते -रोते कहने लगी कि मेरी बच्ची बहुत बीमार है उसके इलाज में बहुत खर्चा आएगा । और में तो घरों में जाकर झाड़-ूपोछा करके जैसे-तैसे हमारा पेट पालती हूँ । में कैसे इलाज कराउ इसका ?
सेठ ने कहा--- तो किसी से माँग लो । 
इस पर औरत बोली मैने सबसे माँग कर देख लिया खर्चा बहुत है कोई भी देने को तैयार नहीं । 

तो सेठ ने कहा तो ऐसे रात को रोने से मिल जायेगा क्या ?
तो औरत ने कहा कल एक संत यहाँ से गुजर रहे थे तो मैने उनको मेरी समस्या बताई तो उन्होंने कहा बेटा---तुम सुबह 4 बजे उठकर अपने ईश्वर से माँगो ।बोरी बिछाकर बैठ जाओ और रो -गिड़गिगिड़ाके उससे मदद माँगो वो सबकी सुनता है तो तुम्हारी भी सुनेगा ।

मेरे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था । इसलिए में उससे माँग रही थीं और वो बहुत जोर से रोने लगी ।

ये सब सुनकर सेठ का दिल पिघल गया और उसने तुरन्त फोन लगाकर एम्बुलेंस बुलवायी और उस लड़की को एडमिट करवा दिया । 

डॉक्टर ने डेढ़ लाख का खर्चा बताया तो सेठ ने उसकी जवाबदारी अपने ऊपर ले ली ,और उसका इलाज कराया । और उस औरत को अपने यहाँ नौकरी देकर अपने बंगले के सर्वेन्ट क्वाटर में जगह दी । और उस लड़की की पढ़ाई का जिम्मा भी ले लिया ।

वो सेठ कर्म प्रधान तो था पर नास्तिक था । अब उसके मन में सैकड़ो सवाल चल रहे थे ।

क्योंकि उसकी बैचेनी तो उस वक्त ही खत्म हो गयी थी जब उसने एम्बुलेंस को बुलवाया था । वह यह सोच रहा था कि आखिर कौन सी ताकत है जो मुझे वहाँ तक खींच ले गयीं ?क्या यहीं ईश्वर हैं ? और यदि ये ईश्वर है तो सारा संसार आपस में धर्म ,जात -पात के लिये क्यों लड़ रहा है । क्योंकि ना मैने उस औरत की जात पूछी और ना ही ईश्वर ने जात -पात देखी । बस ईश्वर ने तो उसका दर्द देखा और मुझे इतना घुमाकर उस तक पहुंचा दिया । अब सेठ समझ चुका था कि कर्म के साथ सेवा भी कितनी जरूरी है क्योंकि इतना सुकून उसे जीवन में कभी भी नहीं मिला था ।

तो दोस्तों मानव और प्राणी सेवा का धर्म ही असली इबादत या भक्ति हैं । यदि ईश्वर की कृपा या रहमत पाना चाहते हो तो इंसानियत अपना लो और समय-समय पर उन सबकी मदद करो जो लाचार या बेबस है । क्योंकि ईश्वर इन्हीं के आस -पास रहता हैं ।
🙏🌹🙏जय श्री कृष्ण🙏🌹🙏
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