।। श्रीरामचरितमानस प्रवर्चन ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीरामचरितमानस प्रवर्चन ।।

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥

जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी। 

हे रामजी! आप निरंतर मुझे प्रिय लगिए॥







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लोभी कही भी लोभ से तृप्त नही होता, इसी प्रकार बार - बार प्रभु की झांकी का लोभ चाहिये...! 

सुमिरन का मीठा - मीठा दर्द चाहिये...! 

हर समय उसी का ध्यान, इसी को जागृति कहा है...! 

अगर जागोगे तो हर कार्य आपका ध्यान हो जायेगा...! 

ध्यान और धंधा ये कोई अलग - अलग नहीं है, जागकर किया गया हर कार्य ध्यान बन जाता हैं।

हम पाठ भी सोते - सोते करते है...! 

बोलते कहीं है देखते कहीं हैं....! 

सोचते कुछ और है होश भी नहीं रहता कि क्या बोला था? 

क्या गाया था? 

इस लिये सोये हुये किया गया भजन भी प्रकाश नहीं दे पा रहा है...! 

जीवन लग गया भजन करते - करते क्योंकि सोते - सोते हो रहा है...! 

सोते में तो स्वपन देखे जाते हैं...! 

अगर हम सब कार्य जागकर करेंगे तो अलग से फिर कोई ध्यान करने की आवश्यकता ही नही है।

ध्यान तो उसका किया जाता है जो हम से दूर हैं, जो हमारे भीतर बैठा है वो तो ध्यान में रहता ही है...! 

अभी भगवान भीतर नहीं है इस लिये ध्यान करना पड़ता है...! 

ध्यान करना और ध्यान में रहना ये दोनों अलग - अलग बाते है...! 

काम करना और काम में रहना ये दोनों अलग - अलग बाते है, जैसे हम शरीर से मंदिर मे है पर ध्यान मे घर बैठा हैं।

जब जीव प्रभु में डूब जाता है तो अलग से ध्यान करने की जरूरत नही होती...! 

इस लिये गोपियो को भीतर से ध्यान से निकालने के लिये ध्यान करना पड़ता था,गोपियाँ ध्यान करती है कि भगवान भीतर से बाहर निकले ताकि घर का काम - काज कुछ हम कर पायें, ये जागृति अवस्था है...! 

यह घटना आपने सुनी होगी, एक शिष्य गुरु के पास आया दीक्षा लेने के लिये...! 

भगवत - साक्षात्कार करने के लिये।

गुरु ने कहा बारह वर्ष तक धान कूटो, उठते, बैठते, सोते जागते बस धान कूटो, बस चौबीसों घंटे धान कूटते कूटते ध्यान में आ गया, ध्यान अलग से करने की आवश्यकता नहीं...! 

हरि व्यासजी बहुत बड़े संत हुये है, उनके गुरूदेव ने हरि व्यासजी को बोला जाओ बारह वर्ष तक गिरिराजजी की परिक्रमा लगाओ।

अब जो बारह वर्ष गिरिराजजी में डूबेगा उसे अलग से ध्यान करने की आवश्यकता पडेगी क्या? 

जागृत अवस्था ही ध्यान है, शास्त्र पढकर सत्य के बारे मे जाना तो जा सकता है पर सत्य का अनुभव तो जागृत जीव ही कर पायेगा....! 

इस के लिये साधना करनी पड़ती है, साधना बड़ा मूल्यवान शब्द है...! 

जो मन हमारा बिना इच्छा के इधर उधर गड्ढे में गिर रहा है, वो सध जाये, ये साधना है।

साधु का अर्थ क्या है? 

जो सध गया है, साधक का अर्थ है जो सधने का प्रयत्न कर रहा है, मन हमारे अनुसार रहे साधना का बस इतना ही अर्थ हैं...! 

हम लोग कहते है न कि रास्ते में बहुत फिसलन है जरा सध के चलो, इधर - उधर पैर पड जायेगा तो पैर फिसल जायेगा...! 

इस लिये सत्य को जाना नहीं जाता, सत्य को जिया जाता है।

पंडित जानता है, साधक अनुभव करता है, विद्वान सत्य की व्याख्या करता है और साधु सत्य का पान करता हैं...! 

इस लिये जागने से मन के विचार मिट जाते हैं...! 

स्वपन तो निद्रा में आते हैं, कुछ लोग जरूर बैठे - बैठे सपने देखते है उन्हे शेखचिल्ली कहा जाता है...! 

वो घटना आपने सुनी होगी, सिर पर दही की मटकी लिये जा रहा था।

सोच रहा था बच्चा होगा, पापा-पापा बोलेगा, पैसे माँगेगा, मैं थप्पड़ लगाऊँगा और सोचते - सोचते मटकी को ही थप्पड़ मार दिया और मटकी धड़ाम से नीचे गिर गई...! 

सज्जनों! जो जागृत में स्वप्न देखते हैं उनकी मटकी बीच रास्ते में फूट जाया करती है इस लिये भागो मत, जागो, जहा भी हो वहीं जागिये।

जनकजी की घटना आपने सुनी होगी, साधु को ले गये स्नान कराने के लिये और सेवक ने आकर कहा कि महल में आग लगी है...! 

जनकजी चैन से स्नान करते रहे और साधु दौड़ा, जनकजी ने पूछा बाबा कहाँ दौड़कर गये थे? 

बोले तुमने सुना नही, तुम्हारे महल में आग लग गई थी, महल तो मेरा था आग लगी तो तुम क्यों दौड़े? 

साधु बोले! मेरी लंगोटी उसमें सूख रही थी, आग लग रही थी इसलिये लंगोट को लेने गया था, बाँधने के लिये महल नहीं चाहिये...! 

बाँधने के लिये लंगोटी ही काफी है, योगियों ने महल छोड दिया हम भिक्षापात्र नही छोड पाते, इस लिये पशु सोये हुये हैं...! 

ये बंधन में रहते है, पाश का अर्थ है बंधन! हम सब किसी न किसी पाश में बंधे हैं।





कोई धन से भाग रहा है तो कोई धन की ओर भाग रहा है, भागने का कारण ही धन है, एक धन की और तो दूसरा धन से दूर, एक पैर के बल खड़ा है एक सिर के बल खड़ा है...! 

व्यक्ति तो वहीं रहता है बदलता कुछ भी नही, इस लिये सज्जनों!  

स्थान बदलने से कई बार लोग सोचते है कि बदल जायेंगे, किसी तीर्थ में चलते हैं, स्थान बदलने से जीव नही बदलता, स्थिति बदलने से जीवन बदलता है। 

साधु-बैरागी हो गये पर वृत्ति तो वही की वहीं रही, घर छोड़कर तीर्थ - आश्रम में आ गये. जो वृत्ति घर मे थी वही बाहर घेर लेगी, स्वभाव नही बदलता, भाई - बहनों! 

कपड़े बदलने से कोई परिवर्तन नहीं आ सकता, इसी लिये भेद के लिये तो भीतर से बदलना होगा।

जय श्री राम राम राम...!!!

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanathan Swami Covil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। आज का भगवद चिन्तन ॥ 🙏पुरुषोत्तम मास की मंगल बधाई🙏

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। आज का भगवद चिन्तन ॥

पुरुषोत्तम मास की मंगल बधाई...!
       
दुःख में सुख खोज लेना, हानि में लाभ खोज लेना, प्रतिकूलताओं में भी अवसर खोज लेना....!

इन सबको सकारात्मक दृष्टिकोण कहा जाता है। 

जीवन का ऐसा कोई बड़े से बड़ा दुःख नहीं जिसमे सुख की परछाईयों को ना देखा जा सके। 

जिन्दगी की ऐसी कोई बाधा नहीं जिससे कुछ प्रेरणा ना ली जा सके।





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🐂 रास्ते में पड़े हुए पत्थर को आप मार्ग की बाधा भी मान सकते हैं और चाहें तो उस पत्थर को सीढ़ी बनाकर ऊपर भी चढ़ सकते हैं। 

जीवन का आनन्द वही लोग उठा पाते हैं जिनका सोचने का ढंग सकारात्मक होता है।



🐂 इस दुनिया में ज्यादा लोग इसलिए दुखी नहीं कि उन्हें किसी चीज की कमीं है अपितु इसलिए दुखी हैं कि उनके सोचने का ढंग नकारात्मक है। 

सकारात्मक सोचो, सकारात्मक देखो। 

इस से आपको अभाव में भी जीने का आनन्द आ जायेगा।

जय श्री राधे कृष्ण !!
🌹🙏🌹🙏🌹

ध्वान्तस्यैवान्तहेतुर्न भवति मलिनै-
कात्मन: पाप्मनोsपि,
प्राक्पादोपान्तभाजां जनयति न परं
पंकजानां प्रबोधम्।
कर्ता निःश्रेयसानामपि न तु खलु यः
केवलं वासराणाम्,
सोsव्यादेकोद्यमेच्छाविहितबहुवृहद्-
विश्वकार्योsर्यमा व:।।

( सूर्यशतक )

अर्थात : संसार मे अपनी इच्छा से तथा एकमात्र अपने ही प्रयत्नों से अनेक तथा महत्वपूर्ण कार्य करनेवाले, केवल मलिन आत्मा वाले अंधकार के विनाशक नही, अपितु पाप के भी विनाशक, केवल कमलों को ही विकसित करनेवाले नही, अपितु चरणों ( किरणों ) के समीप रहनेवालों को भी परम प्रबोध करनेवाले एवं केवल दिवस के कर्ता नही, अपितु मोक्ष के भी कर्ता - सूर्यदेव आपकी रक्षा करें।

।। जय श्री राम।।

जब भगवान शिव ने माता पार्वती को अपनी चोरी की कथा सुनाई, तो उस कथा को सुनकर माता पार्वती व्यंग्य भरी मुद्रा में हंसने लगी।

भगवान शिव ने कहा, हमने इतने यत्न करके, राम जी के बाल रूप के दर्शन किए, और तुम्हें हंसी आ रही है।

पार्वती जी बोली मैं मानती हूं आपने भेष बदलकर राम जी के दर्शन किए होंगे।

मैं कब अस्वीकार कर रही हूं। 

शिव जी बोले अस्वीकार नहीं कर रही हो तो फिर आप हंसी क्यों? इसमें हंसने वाली क्या बात है?

यह बात अलग है कि हमें अपना भेष बदलना पड़ा। 

मैं मदारी बना, ज्यौतिषि बना, लेकिन फिर भी हम सफल तो हो ही गए।

आप तो यह बताओ तुम्हें हंसी क्यों आईं।?

पार्वती जी ने मुस्कुराते हुए कहा। मुझे तो सहज ही हंसी आ गई। 

भगवान शिव समझ गये, कुछ न कुछ बात अवश्य है।

वह पीछे ही पड़ गए कि मुझे तो तुम्हारे हंसने का कारण बताओ।

पार्वती जी ने मुस्कुराते हुए कहा। 

है मेरे भोलेनाथ,यदि तुम्हें वह दासी न मिलती तो क्या करते ? 

क्या राम जी के दर्शन सम्भव थे ? 

शिव जी ने कहा, वह बात अलग है। 

वह एक संयोग था। 

पार्वती जी ने कहा, उस दासी को जानते हो ? 

वह कौन थी ?।

जब शिव जी ने पार्वती जी से यह सुना तो, एकदम मौन हो गए।

पार्वती जी बोली , उस दासी को अभी भी नहीं पहचान पा रहे हो। 

वह दासी मैं ही थी। 

मानस प्रसंग पढ़ने वाले पाठकों को लगता होगा, कि यह कैसे संभव है कि पार्वती जी की महिमा को शिवजी नहीं जान पाए। 

लेकिन यह सत्य है। 

श्रीमद् देवी भागवत पुराण में ऐसे कितने ही रहस्य हैं, जिन्हें समझने में ब्रह्मा विष्णु महेश सक्षम नहीं है। 

देवी जगदंबा ने उन रहस्यों को स्वयं समझाया है।

माता पार्वती को जगत जननी भवानी कहते हैं। 

भगवान शिव ने यह बात स्वीकार कर ली कि अवश्य आप दासी का रूप बनाकर गई होंगी। 

लेकिन आप वहां गई किस लिए ? 

पार्वती जी ने कहा आप किस लिए गए थे।?

शिवजी ने कहा भगवान श्री रामजी मेरे इष्ट देव हैं, मैं तो उनके दर्शन के लिए गया था। 

पार्वती जी ने कहा मेरे इष्ट भी वही है। 

शिवजी ने कहा आपने दासी का रूप क्यों बनाया?। 

पार्वती जी ने कहा मुझसे तुम्हारा दुख देखा नहीं गया। 

आपको और काग भूसुंडी जी को जब राजमहल के सामने से मदारी का खेल दिखाते हुए भगा दिया गया। 

आपका सामान और डमरू फेंक दिया गया, यह देखकर मुझे अच्छा नहीं लगा। 

आप लोगों ने ज्योतिषी का रूप बनाया तब भी मुझे लग रहा था कि इस तरह यह राम जी के दर्शन कर नहीं पाएंगे,। 

इस लिए मैंने राजमहल की दासी का रूप बनाया,और तुम्हें माता कौशल्या के कक्ष तक पहुंचने का मार्ग सुगम कराया 

माता पार्वती की बातें सुनकर भगवान शिव, आनंदित हुए। 

उस अविनाशी सच्चिदानंद घन परमात्मा की भक्ति में शिवजी और पार्वती जी मग्न हो गए।

वही परमात्मा जिसके लिए महाराज दशरथ जी कहते हैं। 

जाकर नाम सुनत शुभ होई।
मोरे गृह आवा प्रभु सोई।।

इस प्रकार कुछ दिन बीत गए, दिन और रात जाते हुए मालूम नहीं पढ़ते हैं। 

नामकरण संस्कार का समय जानकर, महाराज दशरथ जी ने, अपने गुरुदेव वसिष्ठ जी को बुलवाया, और चारों भाइयों का नामकरण कराया। 

जो आनंद के समुद्र और सुख की राशि महाराज दशरथ जी के सबसे बड़े पुत्र जिनका जन्म माता कौशल्या से हुआ उनका नाम राम ,रखा। 

जो संसार का भरण पोषण करते हैं , जिनका जन्म माता  कैकेई से हुआ , उनका नाम भरत रखा। 

जिनके स्मरण से शत्रु का नाश होता है उनका नाम शत्रुघ्न , रखा।

और जो शुभ लक्षणों के धाम है, श्री राम जी के प्यारे और जगत के आधार हैं, उनका नाम लक्ष्मण रखा।  

लच्छन धाम राम प्रिय
सकल जगत आधार 
गुरु वशिष्ठ तेहि राखा
लक्ष्मण नाम उदार

लक्ष्मण जी और शत्रुघ्न जी का जन्म माता सुमित्रा से हुआ।

धरे नाम गुरु हृदय बिचारी 
वेद तत्व नृप तव सुत चारी 

गुरु वशिष्ट जी ने कहा राजा, तुम्हारे यह चारों पुत्र वेद के तत्व हैं, साक्षात भगवान है, तुम्हारे प्रेम के कारण यह तुम्हारे यहां आए हैं।

अपनी बाल लीलाओं द्वारा, चारों भाई...!

अयोध्यापुरी के नगर निवासियों को सुख प्रदान करते हैं। 

माता कौशल्या जी उन्हें कभी गोद में खिलाती हैं, कभी पालने में झुलाती है।

लै उछंग कबहुंक हलरावै 
कबहुं पालने घालि झुलावै 

एक बार माता कौशल्या ने, श्री राम जी को स्नान कराया और श्रृंगार करके पालने में सुला दिया, फिर अपने कुल के इष्ट देव को स्नान कराकर उन्हें नैवेद्य चढ़ाया।

नैवेद्य चढ़ाकर जब माता कौशल्या लौटकर रसोई में आई, तब क्या दृश्य देखती हैं, यह प्रसंग अगली पोस्ट में। जय श्री राम।।

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

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🙏हर हर महादेव हर...!!
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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भगवान की डायरी" बहुत समय पहले की बात है, एक संत हुआ करते थे। उनकी भक्ति ऐसी थी कि वो अपनी धुन में इतने मस्त हो जाते थे और उनको कुछ होश नहीं रहता था।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

.                           "भगवान की डायरी"

         बहुत समय पहले की बात है, एक संत हुआ करते थे। उनकी भक्ति ऐसी थी कि वो अपनी धुन में इतने मस्त हो जाते थे और उनको कुछ होश नहीं रहता था।

 उनकी अदा और चाल इतनी मस्तानी हो जाती थी। वो जहाँ जाते, देखने वालों की भीड़ लग जाती थी। और उनके दर्शन के लिए लोग जगह-जगह से  पहुँच आते थे। उनके चेहरे पर चमक साफ दिखाई देती थी वो संत रोज सुबह चार बजे उठकर ईश्वर का नाम लेते हुए घूमने निकल जाते थे।

          एक दिन वो रोज की तरह अपने मस्ती  में मस्त होकर झूमते हुए जा रहे थे। रास्ते में उनकी नज़र एक भगवान के दूत पर पड़ी उस दूत के हाथ में एक डायरी थी।

          संत ने दूत को रोककर पूछा आप यहाँ क्या कर रहे हैं, और ये डायरी में क्या है ?

 भगवान के दूत ने जवाब दिया कि इसमें उन लोगों के नाम है जो उन्हें को याद करते हैं।

 यह सुनकर संत की इच्छा हुई कि उसमें उनका नाम है या नहीं, उन्होंने पुछ ही लिया कि, क्या मेरा नाम है इस डायरी में ? 

          दूत  ने कहा आप ही देख लो और डायरी संत को दे दी। संत ने डायरी खोलकर देखी तो उनका नाम कही नहीं था। इस पर संत थोड़ा मुस्कराये और फिर वह अपनी मस्त चाल से भगवान को याद करते हुए चले गये। 

          दूसरे दिन फिर वही दूत वापस दिखाई दिये पर इस बार संत ने ध्यान नहीं दिया और अपनी मस्ती में चलते रहे। दूत ने उनसे  ने कहा आज नहीं देखोगे डायरी। तो संत मुस्कुरा दिए और कहा, दिखा दो। 
         जैसे ही डायरी खोलकर देखा तो, सबसे ऊपर उन्ही संत का नाम था। इस पर संत हँस कर बोले क्या भगवान के यहाँ पर भी दो-दो डायरी हैं क्या ? मेरा नाम कल तो था नहीं और आज सबसे ऊपर है। 

         इस पर दूत ने कहा की आप ने जो कल डायरी देखी थी, वो उनकी थी जो लोग ईश्वर से प्यार करते हैं। आज ये डायरी में उन लोगों के नाम है, जिनसे ईश्वर खुद प्यार करते हैं। 

         बस इतना सुनना था कि वो संत दहाड़ मारकर रोने लगे, और रोते हुए ये कहते रहे हे ईश्वर यदि मैं कल तुझ पर जरा सा भी निराश हो जाता तो मेरा नाम कही नहीं होता। पर मेरे जरा से सब्र पर तुमने मुझे इतना बड़ा ईनाम दे दिया। तुम सच में बहुत दयालु हो तुमसे बड़ा प्यार करने वाला कोई नहीं और बार-बार रोते रहे।

      "केवल संयम रखने से ही फल की प्राप्ति संभव है।"
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                            "जय जय श्री राधे"
******************जय श्री कृष्ण***********
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

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जड़भरत की कथा।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
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जड़भरत की कथा


🌹🍃🌹🍃🌹🍃🌹

जड़भरत के पिता उन्हें पंडित बनाना चाहते थे, किंतु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे एक भी श्लोक याद न कर सके। 

उनके पिता ने उन्हें जड़ समझ लिया। 

पिता की मृत्यु के पश्चात मां भी चल बसी। 

कुटुंब में रह गये भाई और भाभियां, जड़भरत के साथ बहुत बुरा व्यवहार करती थीं। 

जड़भरत इधर - उधर मजदूरी करते थे। 

जो कुछ मिल जाता था, खा लिया करते थे और जहां जगह मिलती थी, सो जाया करते थे। 

सुख - दुख और मान - सम्मान को एक समान समझते थे। 

भाईयों ने जब देखा कि उनके छोटे भाई के कारण उनकी अप्रतिष्ठा हो रही है...! 





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तो उन्होंने उन्हें खेती के काम में लगा दिया। 

जड़भरत रात - दिन खेतों की मेड़ों पर बैठकर खेतों की रखवाली करने लगे। 

वे शरीर से बड़े स्वस्थ और हट्टे - कट्टे थे । 

एक दिन राजा रहूगण पालकी पर बैठकर, आत्मज्ञान की शिक्षा लेने के लिए कपिल मुनि के पास जा रहे थे। 

मार्ग में पालकी के एक कहार की मृत्यु हो गई। 

राजा रहूगण ने अपने सेवकों से कहा कि वे कोई दूसरा कहार खोजकर लाएं।

रहूगण के सेवक किसी दूसरे कहार की खोज में निकल पड़े। 

उनकी दृष्टि खेत की मेड़ पर बैठे हुए जड़भरत पर पड़ी।

सेवक उन्हें पकड़कर ले गए। 

जड़भरत ने बिना कुछ आपत्ति किए हुए, कहारों के साथ पालकी कंधे पर रख ली और बहुत संभल - संभल कर चलने लगे।

उनके पैरों के नीचे कोई जीव दब न जाए इस लिए उनके पैर डगमगा उठते थे। 

इस से राजा रहूगण को झटका लगता था, उन्हें कष्ट होता था। 

राजा रहूगण ने कहारों से कहा, ‘क्यों जी, तुम लोग किस तरह चल रहे हो ? 

संभलकर, सावधानी के साथ क्यों नहीं चलते?’ 

कहारों ने उत्तर दिया, ‘महाराज हम तो सावधानी के साथ चल रहे हैं, किंतु यह नया कहार हमारे चलने में विघ्न पैदा करता है। 

इस के पैर रह - रह कर डगमगा उठते हैं।’ 

राजा रहूगण ने जड़भरत को सावधान करते हुए कहा, ‘क्यों भाई, तुम ठीक से क्यों नहीं चलते? 

देखने में तो हट्टे - कट्टे मालूम होते हो। 

क्या पालकी लेकर ठीक से चला नहीं जाता? 

सावधानी से मेरी आज्ञा का पालन करो, नहीं तो दंड दूंगा।’ 

रहूगण का कथन सुनकर जड़भरत मुस्करा उठे। 

उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘आप शरीर को दंड दे सकते हैं, पर मुझे नहीं दे सकते, मैं शरीर नहीं आत्मा हूं। 

मैं दंड और पुरस्कार दोनों से परे हूं। 

दंड देने की तो बात ही क्या, आप तो मुझे छू भी नहीं सकते।’ 

जड़भरत की ज्ञान भरी वाणी सुनकर रहूगण विस्मय की लहरों में डूब गए। 

उन्होंने आज्ञा देकर पालकी नीचे रखवा दी ।

वे पालकी से उतरकर जड़भरत के पैरों में गिर पड़े और कहा, ‘महात्मन, मुझे क्षमा कीजिए।

कृपया बताइए आप कौन हैं ? 

कहीं आप वे कपिल मुनि ही तो नहीं हैं जिनके पास मैं आत्मज्ञान की शिक्षा लेने जा रहा था?’ 

जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन! मैं न तो कपिल मुनि हूं और न कोई ॠषि हूं। 

मैं पूर्वजन्म में एक राजा था। 

मेरा नाम भरत था। 

मैंने भगवान श्रीहरि के प्रेम और भक्ति में घर - द्वार छोड़ दिया था। 

मैं हरिहर क्षेत्र में जाकर रहने लगा था। 

किंतु एक मृग शिशु के मोह में फंसकर मैं भगवान को भी भूल गया। 

मृगशिशु का ध्यान करते हुए जब शरीर त्याग किया, तो मृग का शरीर प्राप्त हुआ। 

मृग का शरीर प्राप्त होने पर भी भगवान की अनुकंपा से मेरा पूर्व - जन्म का ज्ञान बना रहा। 

मैं यह सोचकर बड़ा दुखी हुआ कि मैंने कितनी अज्ञानता की थी! 

एक मृगी के बच्चे के मोह में फंसकर मैंने भगवान श्रीहरि को भुला दिया था। 

राजन, जब मैंने मृग शरीर का त्याग किया, तो मुझे यह ब्राह्मण शरीर प्राप्त हुआ। 

ब्राह्मण का शरीर प्राप्त होने पर भी मेरा पूर्व - जन्म का ज्ञान बना रहा। 

मैं यह सोचकर कि मेरा यह जन्म व्यर्थ न चला जाए, अपने को छिपाए हूं। 

मैं दिन - रात परमात्मारूपी आत्मा में लीन रहता हूं, मुझे शरीर का ध्यान बिलकुल नहीं रहता। 

राजन, इस जगत में न कोई राजा है। 

न प्रजा, न कोई अमीर है, न कोई ग़रीब, न कोई कृषकाय है, न कोई स्थूलकाय, न कोई मनुष्य है, न कोई पशु। 

सब आत्मा ही आत्मा हैं। 

ब्रह्म ही ब्रह्म हैं। 

‘राजन, मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए। 

यही मानव - जीवन की सार्थकता है। 

यही श्रेष्ठ ज्ञान है, और यही श्रेष्ठ धर्म है।’ 






रहूगण जड़भरत से अमृत ज्ञान पाकर तृप्त हो गए। 

उन्होंने जड़भरत से निवेदन किया, ‘महात्मन! 

मुझे अपने चरणों में रहने दीजिए, अपना शिष्य बना लीजिए।’ 

जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन जो मैं हूं, वही आप हैं। 

न कोई गुरु है, न कोई शिष्य। 

सब आत्मा है, ब्रह्म हैं।’ 

जड़भरत जब तक संसार में रहे, अपने आचरण और व्यवहार से अपने ज्ञान को प्रकट करते रहे। 

जब अंतिम समय आया, तो चिरनिद्रा में सो गए, ब्रह्म में समा गए। 

यह सारा जगत ब्रह्म से निकला है और ब्रह्म में ही समा जाता है। 

ब्रह्म की इस लीला को जो समझ पाता है, उसी को जगत में सुख और शांति प्राप्त होती है।

*माना कि आप*
*किसी का भाग्य नहीं*
*बदल सकते,*

        *लेकिन अच्छी प्रेरणा देकर किसी का मार्ग-दर्शन तो कर सकते हैं।*

*भगवान कहते हैं जीवन में कभी मौका मिले तो-----*
*"सारथी" बनना,* 

          *स्वार्थी नही।।*

🙏🙏 हर हर महादेव हर🙏🙏।।

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

. "वेश्या गुरु" एक बहुत प्रसिद्ध सन्त थे। दूर दूर से लोग उनसे मिलने और ज्ञान प्राप्त करने आते थे। उनके गुणों से प्रभावित हो एक वेश्या भी उनसे मिलने आई। उसने उस सन्त से अकेले मे मिलने की विनती की। लेकिन लोकापवाद की खातिर सन्त ने हमेशा उसकी विनती को ठुकराया।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

.                               "वेश्या गुरु"

          एक बहुत प्रसिद्ध सन्त थे। दूर दूर से लोग उनसे मिलने और ज्ञान प्राप्त करने आते थे। उनके गुणों से प्रभावित हो एक वेश्या भी उनसे मिलने आई। उसने उस सन्त से अकेले मे मिलने की विनती की। लेकिन लोकापवाद की खातिर सन्त ने हमेशा उसकी विनती को ठुकराया।

          अनगिनत बार विनती ठुकराये जाने के बाद भी वो वेश्या उस सन्त के पास अपनी विनती लेकर रोजाना आती रही। यह क्रम लगातार कई दिनों तक चलता रहा। एक दिन उस सन्त ने झल्लाकर उस वेश्या से कहा की तुम हमेशा अधर्म के कार्य में लिप्त रही हो। मैं तुम्हारा गुरु बनना स्वीकार नहीं कर सकता।
          सन्त की पूरी बात सुनने के बाद वेश्या ने कहा मैं आपको अपने मेहनत से कमाया एक रुपया समर्पित करना चाहती थी। जो मैंने अपने पिता के साथ मजदूरी कर कमाया।

 ये एक रुपया ही है जो मेरे धर्म की कमाई है। आपके शिष्य आपको लाखों रुपये समर्पित कर रहे उनके सामने मुझे ये एक रुपया देंते हुए शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। इसलिए मैंने आपसे अकेले मिलने की विनती की।

          वेश्या की बातों को सुन कर सन्त आश्चर्यचकित रह गए। वेश्या का धैर्य और धर्म के प्रति सम्मान देख के सन्त ने उसे अपना गुरु बना लिया। सन्त ने कहा तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ गुण तुम्हारा धैर्य है। जिसने तुम्हे तुम्हारे मार्ग से डिगने नही दिया। 
                       ----------:::×:::-----------

                          "जय जय श्री राधे"
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

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*‼️राम कृपा ही केवलम्‼️*

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जय द्वारकाधीश

*‼️राम कृपा ही केवलम्‼️*

*❗संतों से जाना❗*

अपनी विचार - दृष्टि से देखो कि अपने लिए क्या चाहते हो, अर्थात् किसके प्राप्त करने पर किसी प्रकार की कमी नहीं रहेगी यानी पूर्णता प्राप्त होगी। 

इसका भलीभाँति निश्चय करना ही जीवन का परम लक्ष्य कहा जाता है। 

जो चाहते हो, जब तक वह प्राप्त न हो, तब तक प्राप्त न होने का दुःख लगातार बढ़ते रहना चाहिए। 

यहाँ तक कि फिर किसी प्रकार से भी सहन न हो। 

ऐसा होने पर जो चाहते हो वह अवश्य प्राप्त होगा। 







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इस में कुछ भी सन्देह नहीं है, परन्तु चाह सच्ची होनी चाहिए। 

सच्ची चाह होने पर ही उसके पूरे न होने का दुःख इस प्रकार होता है कि वह सहन नहीं होता। 

जीवन की सारी क्रियाएँ एक ही लक्ष्य के लिए होनी चाहिए, क्योंकि यही सच्चाई है। 

क्रियाएँ स्वरूप से देखने में भिन्न - भिन्न प्रकार की भले ही हों, परन्तु उन सबका लक्ष्य एक होना चाहिए, यह भली - भाँति समझने की बात है। 

ऐसा होने पर सारा जीवन लक्ष्य की पूर्ति का साधन बन जाता है, जिससे जीवन - यात्रा सुलभ तथा सरल हो जाती है और लक्ष्य की पूर्ति अवश्य होती है।


            

लक्ष्य एक ही सच्चा होता है। 

क्रियाओं में अनेकता होती है, लक्ष्य में नहीं। 

इस लिए क्रियाओं को लक्ष्य कभी मत समझो, बल्कि क्रियाओं के अन्त होने पर लक्ष्य पर सदैव दृष्टि रक्खो और जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो, चैन से न रहो।
            
शारीरिक दशा कहने में नहीं आती, क्योंकि कथन उसका हो सकता है, जो एकसा रहे। 

इस सराय में रोग - रूपी मुसाफिर तो ठहरे ही रहते हैं।

वास्तव में तो जीवन की आशा ही परम रोग और निराशा ही आरोग्यता है। 

देह - भाव का त्याग ही सच्ची औषधि है।

*🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹*

समुद्र लाँघने का परामर्श :


जाम्बवन्त का हनुमान्‌जी को बल याद दिलाकर उत्साहित करना।

जो नाघइ सत जोजन सागर। 
करइ सो राम काज मति आगर॥

मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। 
राम कृपाँ कस भयउ सरीरा॥

जो सौ योजन ( चार सौ कोस ) समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा, वही श्री रामजी का कार्य कर सकेगा। 

( निराश होकर घबराओ मत ) मुझे देखकर मन में धीरज धरो।  

युवराज अंगद निराश हो कर बोले, सीता जी को खोज पाने में हम लोग सर्वथा निष्फल रहे हैं। 

अब हम लौट कर राजा सुग्रीव और रामचनद्र जी को कैसे मुख दिखायेंगे। 

निष्फल हो कर लौटने से तो अच्छा है कि हम यहाँ अपने प्राण त्याग दें। 

इस पर बुद्धिमान हनुमान जी ने कहा, तारानन्दन! तुम युद्ध में अपने पिता के समान ही अत्यन्त शक्तिशाली हो। 

अत्यन्त बुद्धिमान होते हुए भी तुम इस तरह से निराशा की बातें कर रहे हो यह तुम्हें शोभा नहीं देता। 

इस प्रकार से उनका विचार विमर्ष चल ही रहा था कि वहाँ पर गृध्रराज सम्पाति आ पहुँचा। 

वानरों को देख कर वह बोला, आज दीर्घकाल के पश्चात् मुझे मेरे कर्मों के फल के रूप में यह भोजन प्राप्त हुआ है। 

मैं एक एक कर के वानरों का भक्षण करता जाउँगा। 

सम्पाति के वचन सुनकर दुःखी हुए अंगद ने हनुमान जी से कहा, एक तो हम लोग जानकी जी को खोज नहीं पाये, उस पर यह दूसरी विपत्ति आ गई। 

हम से तो अच्छा गृधराज जटायु ही था जिसने श्री रामचन्द्र जी के कार्य को करते हुये अपने प्राण न्यौछावर कर दिया था। 

अंगद के मुख से जटायु का नाम सुनकर सम्पाति ने आश्चर्य से कहा, जटायु तो मेरा छोटा भाई है। 

तुम उसके विषय में मुझे पूरा पूरा हाल कहो। 

अंगद से जटायु के विषय में पूरा हाल सुनकर सम्पाति बोला, बन्धुओं! 

तुम सीता जी की खोज करने जा रहे हो। 

मैं इस विषय में जो भी जानता हूँ वह तुम्हें बताता हूँ क्योंकि रावण से मैं अपने छोटे भाई जटायु का प्रतिशोध लेना चाहता हूँ। 

परन्तु मैं वृद्ध और दुर्बल होने के कारण रावण का वध नहीं कर सकता। 

इस लिये मैं तुम्हें उसका पता बताता हूँ।

सीता जी का हरण करने वाला रावण लंका का राजा है और उसने सीता जी को लंकापुरी में ही रखा है जो यहाँ से सौ योजन ( चार सौ कोस ) की दूरी पर है और इस समुद्र के उस पार है। 

लंकापुरी में बड़े भयंकर, सुभट, पराक्रमी राक्षस रहते हैं।

 लंकापुरी एक पर्वत के ऊपर स्वर्ण निर्मित नगरी है जिसका निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया है। 

उसमें बड़ी सुन्दर ऊँची - ऊँची मनोरम स्वर्ण निर्मित अट्टालिकाएँ हैं। 

वहीं पर स्वर्णकोट से घिरी अशोकवाटिका है जिसमें रावण ने सीता को राक्षसनियों के पहरे में छिपा कर रखा है। 

इस समुद्र को पार करने का उपाय करो तभी तुम सीता तक पहुँच सकोगे। यह कह कर वह गृद्ध मौन हो गया। 

विशाल सागर की अपार विस्तार देख कर सभी वानर चिन्तित होकर एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। 

अंगद, नल, नील आदि किसी भी सेनापति को समुद्र पार कर के जाने का साहस नहीं हुआ। 

उन सबको निराश और दुःखी देख कर वृद्ध जाम्बन्त ने कहा, हे पवनसुत! तुम इस समय चुपचाप क्यों बैठे हो ? 

तुम तो वानरराज सुग्रीव के समान पराक्रमी हो। 

तेज और बल में तो राम और लक्ष्मण की भी बराबरी कर सकते हो। 

तुम्हारा वेग और विक्रम पक्षिराज गरुड़ से किसी भी भाँति कम नहीं है जो समुद्र में से बड़े - बड़े सर्पों को निकाल लाता है।

इतना अतुल बल और साहस रखते हुये भी तुम समुद्र लाँघ कर जानकी जी तक पहुँचने के लिये तैयार क्यों नहीं होते ? 

तुम्हें तो समुद्र या लंका में मृत्यु का भी भय नहीं है क्योंकि तुम्हें देवराज इन्द्र से इच्छामृत्यु का वर प्राप्त है। 

जब तुम चाहोगे, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी अन्यथा नहीं।

तुम केशरी के क्षेत्रज्ञ और वायुदेव के औरस पुत्र हो, इसी लिये उन्हीं के सदृश तेजस्वी और अबाध गति वाले हो। 

हम लोगों में तुम ही सबसे अधिक साहसी और शक्तिशाली हो। 

इस लिये उठो और इस महासागर को लाँघ जाओ। 

तुम्हीं इन निराश वानरों की चिन्ता को दूर कर सकते हो। 

मैं जानता हूँ, इस कार्य को केवल तुम और अंगद दो ही व्यक्ति कर सकते हो, पर अंगद अभी बालक है। 

यदि वह चूक गया और उसकी मृत्यु हो गई तो सब लोग सुग्रीव पर कलंक लगायेंगे और कहेंगे कि अपने राज्य को निष्कंटक बनाने के लिये उसने अपने भतीजे को मरवा डाला। 

यदि मैं वृद्धावस्था के कारण दुर्बल न हो गया होता तो सबसे पहले मैं समुद्र लाँघता। 

इस लिये हे वीर! 

अपनी शक्ति को समझो और समुद्र लाँघने को तत्पर हो जाओ।

जाम्बवन्त के प्रेरक वचनों को सुन कर हनुमान को अपनी क्षमता और बल पर पूरा विश्वास हो गया। 

अपनी भुजाओं को तान कर हनुमान ने अपने सशक्त रूप का प्रदर्शन किया और गुरुजनों से बोले, आपके आशीर्वाद से मैं मेघ से उत्पन्न हुई बिजली की भाँति पलक मारते निराधार आकाश में उड़ जाउँगा। 

मुझे विश्वास हो गया है कि मैं लंका में जा कर अवश्य विदेहकुमारी के दर्शन करूँगा।

यह कह कर उन्होंने घोर गर्जना की जिससे समस्त वानरों के हृदय हर्ष से प्रफुल्लित हो गये। 

सबसे विदा ले कर हनुमान महेन्द्र पर्वत पर चढ़ गये और मन ही मन समुद्र की गहराई का अनुमान लगाने लगे।

〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

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अधिक मास/मलमास ( पुरुषोत्तम मास )

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अधिक मास/मलमास ( पुरुषोत्तम मास ) 


अधिकमास शुरू होंगे। अधिकमास...! 


16 अक्टूबर तक चलेगा। 

इसके बाद 17 अक्टूबर से नवरात्रि मनाई जाएगी। 

हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल आश्विन मास में अधिकमास है।

 


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जिसका अर्थ है कि इस साल दो आश्विन मास होंगे। 

पितृ पक्ष समाप्त होते ही नवरात्र प्रारंभ हो जाते हैं । 

परंतु इस वर्ष अधिक मास के चलते 17 अक्टूबर से नवरात्र प्रारम्भ हो गें ।




हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है, जिसे अधिकमास, मल मास या पुरूषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। 




सनातन धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। संपूर्ण भारत की सनातन धर्मपरायण जनता इस पूरे मास में पूजा - पाठ, भगवद् भक्ति, व्रत - उपवास, जप और योग आदि धार्मिक कार्यों में संलग्न रहती है।

अधिकमास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा -पाठ से 10 गुना अधिक फल मिलता है।

यही वजह है कि श्रद्धालु जन अपनी पूरी श्रद्धा और शक्ति के साथ इस मास में भगवान को प्रसन्न कर अपना इहलोक तथा परलोक सुधारने में जुट जाते हैं।

जय श्री कृष्ण.....!!!

|| कल उत्पन्ना एकादशी है ||

एकादशी व्रत में विधि - विधान से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। 

मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है। 

हिंदू धर्म में एकादशी को सबसे पवित्र व्रत माना जाता है। 

एकादशी व्रत में विधि - विधान से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा - अर्चना की जाती है ।

एकादशी व्रत कथा- 

सूतजी कहने लगे- हे ऋषियों! 

इस व्रत का वृत्तांत और उत्पत्ति प्राचीनकाल में भगवान कृष्ण ने अपने परम भक्त युधिष्ठिर से कही थी। 
वही मैं तुमसे कहता हूँ। 

एक समय यु‍धिष्ठिर ने भगवान से पूछा था ‍कि एकादशी व्रत किस विधि से किया जाता है और उसका क्या फल प्राप्त होता है। 

उपवास के दिन जो क्रिया की जाती है आप कृपा करके मुझसे कहिए। 

यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण कहने लगे- हे युधिष्ठिर! 

मैं तुमसे एकादशी के व्रत का माहात्म्य कहता हूँ। सुनो ।

सर्व प्रथम हेमंत ऋ‍तु में मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी से इस व्रत को प्रारंभ किया जाता है। 

दशमी को सायंकाल भोजन के बाद अच्छी प्रकार से दातुन करें ताकि अन्न का अंश मुँह में रह न जाए। 

रात्रि को भोजन कदापि न करें, न अधिक बोलें। 

एकादशी के दिन प्रात: 4 बजे उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। 

इस के पश्चात शौच आदि से निवृत्त होकर शुद्ध जल से स्नान करें। 

व्रत करने वाला चोर, पाखंडी, परस्त्रीगामी, निंदक, मिथ्याभाषी तथा किसी भी प्रकार के पापी से बात न करे।

स्नान के पश्चात धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह चीजों से भगवान का पूजन करें और रात को दीपदान करें। 

रात्रि में सोना या प्रसंग नहीं करना चाहिए। 

सारी रात भजन - कीर्तन आदि करना चाहिए। 

जो कुछ पहले जाने - अनजाने में पाप हो गए हों, उनकी क्षमा माँगनी चाहिए। 

धर्मात्मा पुरुषों को कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए ।

जो मनुष्य ऊपर लिखी विधि के अनुसार एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें शंखोद्धार तीर्थ में स्नान करके भगवान के दर्शन करने से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी व्रत के सोलहवें भाग के भी समान नहीं है। 

व्यतिपात के दिन दान देने का लाख गुना फल होता है। 

संक्रांति से चार लाख गुना तथा सूर्य - चंद्र ग्रहण में स्नान - दान से जो पुण्य प्राप्त होता है वही पुण्य एकादशी के दिन व्रत करने से मिलता है।

अश्वमेध यज्ञ करने से सौ गुना तथा एक लाख तपस्वियों को साठ वर्ष तक भोजन कराने से दस गुना, दस ब्राह्मणों अथवा सौ ब्रह्मचारियों को भोजन कराने से हजार गुना पुण्य भूमिदान करने से होता है। 

उससे हजार गुना पुण्य कन्यादान से प्राप्त होता है। 

इस से भी दस गुना पुण्य विद्यादान करने से होता है। 

विद्यादान से दस गुना पुण्य भूखे को भोजन कराने से होता है। 

अन्नदान के समान इस संसार में कोई ऐसा कार्य नहीं जिससे देवता और पितर दोनों तृप्त होते हों परंतु एकादशी के व्रत का पुण्य सबसे अधिक होता है।

हजार यज्ञों से भी ‍अधिक इसका फल होता है। 

इस व्रत का प्रभाव देवताओं को भी दुर्लभ है। 

रात्रि को भोजन करने वाले को उपवास का आधा फल मिलता है और दिन में एक बार भोजन करने वाले को भी आधा ही फल प्राप्त होता है। 

जबकि निर्जल व्रत रखने वाले का माहात्म्य तो देवता भी वर्णन नहीं कर सकते।

युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन! आपने हजारों यज्ञ और लाख गौदान को भी एकादशी व्रत के बराबर नहीं बताया। 

सो यह तिथि सब तिथियों से उत्तम कैसे हुई, बताइए ।

भगवन कहने लगे- हे युधिष्ठिर! 

सतयुग में मुर नाम का दैत्य उत्पन्न हुआ। 

वह बड़ा बलवान और भयानक था। 

उस प्रचंड दैत्य ने इंद्र, आदित्य, वसु, वायु, अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित करके भगा दिया। 

तब इंद्र सहित सभी देवताओं ने भयभीत होकर भगवान शिव से सारा वृत्तांत कहा और बोले हे कैलाशपति! 

मुर दैत्य से भयभीत होकर सब देवता मृत्यु लोक में फिर रहे हैं। 

तब भगवान शिव ने कहा- 

हे देवताओं! तीनों लोकों के स्वामी, भक्तों के दु:खों का नाश करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ।

वे ही तुम्हारे दु:खों को दूर कर सकते हैं। 

शिवजी के ऐसे वचन सुनकर सभी देवता क्षीरसागर में पहुँचे। 

वहाँ भगवान को शयन करते देख हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे‍कि हे देवताओं द्वारा स्तुति करने योग्य प्रभो! 

आपको बारम्बार नमस्कार है, देवताओं की रक्षा करने वाले मधुसूदन! आपको नमस्कार है। 

आप हमारी रक्षा करें। 

दैत्यों से भयभीत होकर हम सब आपकी शरण में आए हैं।

आप इस संसार के कर्ता, माता-पिता, उत्पत्ति और पालनकर्ता और संहार करने वाले हैं। 

सब को शांति प्रदान करने वाले हैं। 

आकाश और पाताल भी आप ही हैं।

सबके पितामह ब्रह्मा, सूर्य, चंद्र, अग्नि, सामग्री, होम, आहुति, मंत्र, तंत्र, जप, यजमान, यज्ञ, कर्म, कर्ता, भोक्ता भी आप ही हैं। 

आप सर्वव्यापक हैं। 

आपके सिवा तीनों लोकों में चर तथा अचर कुछ भी नहीं है। 

हे भगवन्! 

दैत्यों ने हमको जीतकर स्वर्ग से भ्रष्ट कर दिया है और हम सब देवता इधर - उधर भागे - भागे फिर रहे हैं, आप उन दैत्यों से हम सबकी रक्षा करें।

इंद्र के ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु कहने लगे कि हे इंद्र! ऐसा मायावी दैत्य कौन है जिसने सब देवताअओं को जीत लिया है, उसका नाम क्या है, उसमें कितना बल है और किसके आश्रय में है तथा उसका स्थान कहाँ है? 

यह सब मुझसे कहो ।

भगवान के ऐसे वचन सुनकर इंद्र बोले- भगवन! 

प्राचीन समय में एक नाड़ीजंघ नामक राक्षस थ उसके महा पराक्रमी और लोकविख्यात मुर नाम का एक पुत्र हुआ। 

उसकी चंद्रावती नाम की नगरी है। 

उसी ने सब देवताअओं को स्वर्ग से निकालकर वहाँ अपना अधिकार जमा लिया है। 

उस ने इंद्र, अग्नि, वरुण, यम, वायु, ईश, चंद्रमा, नैऋत आदि सबके स्थान पर अधिकार कर लिया है। 

सूर्य बनकर स्वयं ही प्रकाश करता है। 

स्वयं ही मेघ बन बैठा है और सबसे अजेय है। 

हे असुर निकंदन! उस दुष्ट को मारकर देवताओं को अजेय बनाइए।

यह वचन सुनकर भगवान ने कहा- 

हे देवताओं, मैं शीघ्र ही उसका संहार करूँगा। 

तुम चंद्रावती नगरी जाओ। 

इस प्रकार कहकर भगवान सहित सभी देवताओं ने चंद्रावती नगरी की ओर प्रस्थान किया। 

उस समय दैत्य मुर सेना ‍सहित युद्धभूमि में गरज रहा था। 

उसकी भयानक गर्जना सुनकर सभी देवता भय के मारे चारों दिशाओं में भागने लगे। 

जब स्वयं भगवान रणभूमि में आए तो दैत्य उन पर भी अस्त्र, शस्त्र, आयुध लेकर दौड़े।

भगवान ने उन्हें सर्प के समान अपने बाणों से उन्हें बींध डाला। 

बहुत - से दैत्य मारे गए। 

केवल मुर बचा रहा। 

वह अविचल भाव से भगवान के साथ युद्ध करता रहा।

भगवान जो भी तीक्ष्ण बाण चलाते वह उसके लिए पुष्प सिद्ध होता। 

उसका शरीर छिन्न‍भिन्न हो गया किंतु वह लगातार युद्ध करता रहा। 

दोनों के बीच मल्लयुद्ध भी हुआ ।

दस हजार वर्ष तक उनका युद्ध चलता रहा किंतु मुर नहीं हारा। 

थककर भगवान बद्रिकाश्रम चले गए। 

वहाँ हेमवती नामक सुंदर गुफा थी, उसमें विश्राम करने के लिए भगवान उसके अंदर प्रवेश कर गए। 

यह गुफा बारह योजन लंबी थी और उसका एक ही द्वार था। 

विष्णु भगवान वहाँ योगनिद्रा की गोद में सो गए।

मुर भी पीछे - पीछे आ गया और भगवान को सोया देखकर मारने को उद्यत हुआ तभी भगवान के शरीर से उज्ज्व ल, कांतिमय रूप वाली देवी प्रकट हुई। 

देवी ने राक्षस मुर को ललकारा, युद्ध किया और उसे तत्काल मौत के घाट उतार दिया। 

श्री हरि जब योगनिद्रा की गोद से उठे तो सब बातों को जानकर उस देवी से कहा कि आपका जन्म एकादशी के दिन हुआ है अत: आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजित होंगी। 

आपके भक्त वही होंगे जो मेरे भक्त हैं।

           || विष्णु भगवान की जय हो ||

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