*जगत का पालनहार*किसी नगर में *एक सेठ जी* रहते थे,

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

*जगत का पालनहार*

किसी नगर में *एक सेठ जी* रहते थे, उनके घर के नजदीक ही एक *मंदिर* था। 

एक रात्रि को *पुजारी* के *कीर्तन की ध्वनि* के कारण उन्हें ठीक से *नींद* नहीं आयी....! 

सुबह उन्होंने *पुजारी जी* को खूब *डाँटा* कि ~ यह सब क्या है ?

*पुजारी* ~ एकादशी का जागरण कीर्तन चल रहा था...!! 

*सेठजी* ~ जागरण कीर्तन करते हो, तो क्या हमारी नींद हराम करोगे ? 

अच्छी नींद के बाद ही व्यक्ति काम करने के लिए तैयार हो पाता है, फिर कमाता है, तब खाता है।

*पुजारी* ~ सेठजी ! खिलाता तो वह खिलाने वाला ही है,






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*सेठजी* ~ कौन खिलाता है ? क्या तुम्हारा भगवान खिलाने आयेगा ?

*पुजारी* ~ वही तो खिलाता है, 

*सेठजी* ~ क्या भगवान खिलाता है ? हम कमाते हैं, तब खाते हैं...

*पुजारी* ~ निमित्त होता है तुम्हारा कमाना, और पत्नी का रोटी बनाना, बाकी सब को खिलाने वाला, सब का पालनहार तो वह जगन्नाथ ही है, 

*सेठजी* ~ क्या पालनहार-पालनहार लगा रखा है ! बाबा आदम के जमाने की बातें करते हो, क्या तुम्हारा पालने वाला एक - एक को आकर खिलाता है ? हम कमाते हैं, तभी तो खाते हैं, 

*पुजारी* ~ सभी को वही खिलाता है, 

*सेठजी* ~ हम नहीं खाते उसका दिया...

*पुजारी* ~ नहीं खाओ तो मारकर भी खिलाता है, 

*सेठ* ~ पुजारी जी ! अगर तुम्हारा भगवान मुझे चौबीस घंटों में नहीं खिला पाया तो फिर तुम्हें अपना यह भजन कीर्तन सदा के लिए बंद करना होगा, 

*पुजारी* ~मैं जानता हूँ कि तुम्हारी पहुँच बहुत ऊपर तक है, लेकिन उसके हाथ बड़े लम्बे हैं, जब तक वह नहीं चाहता, तब तक किसी का बाल भी बाँका नहीं हो सकता, आजमाकर देख लेना....

*पुजारी की निष्ठा परखने के लिये सेठ जी घोर जंगल में चले गये और एक विशालकाय वृक्ष की ऊँची डाल पर ये सोचकर बैठ गये कि अब देखता हूँ, इधर कौन खिलाने आता है ? चौबीस घंटे बीत जायेंगे और पुजारी की हार हो जायेगी। सदा के लिए कीर्तन की झंझट मिट जायेगी...*

तभी एक *अजनबी आदमी* वहाँ आया... उसने उसी वृक्ष के नीचे *आराम* किया, फिर अपना *सामान* उठाकर चल दिया, लेकिन अपना *एक थैला* वहीं भूल गया। *भूल गया या छोड़ गया,* ये ईश्वर ही जाने....

थोड़ी देर बाद *पाँच डकैत* वहाँ पहुँचे, उनमें से एक ने अपने *सरदार* से कहा, ~ उस्ताद ! यहाँ कोई *थैला* पड़ा है, 

*क्या है ? जरा देखो ! खोल कर देखा, तो उसमें गरमा-गरम भोजन से भरा टिफिन था !* उस्ताद *भूख* लगी है, लगता है यह भोजन *भगवान* ने हमारे लिए ही भेजा है...

अरे ! तेरा भगवान यहाँ कैसे भोजन भेजेगा ? हम को *पकड़ने या फँसाने* के लिए किसी *शत्रु* ने ही *जहर-वहर* डालकर यह टिफिन यहाँ रखा होगा, अथवा *पुलिस* का कोई *षडयंत्र* होगा, इधर - उधर देखो जरा, कौन रखकर गया है... उन्होंने इधर-उधर देखा, लेकिन कोई भी *आदमी* नहीं दिखा, तब *डाकुओं के मुखिया* ने जोर से आवाज लगायी, कोई हो तो बताये कि यह *थैला* यहाँ कौन छोड़ गया है ?




*सेठजी* ऊपर बैठे-बैठे सोचने लगे कि अगर मैं कुछ *बोलूँगा* तो ये मेरे ही *गले* पड़ जायेंगे... वे तो चुप रहे,लेकिन *जो सबके हृदय की धड़कनें चलाता है, भक्तवत्सल है, वह अपने भक्त का वचन पूरा किये बिना शान्त नहीं रह सकता...*

उसने उन *डकैतों* को प्रेरित किया उनके मन में *प्रेरणा* दी कि .. *'ऊपर भी देखो,* उन्होंने ऊपर देखा तो *वृक्ष की डाल* पर एक आदमी बैठा हुआ दिखा, *डकैत* चिल्लाये ~ अरे ! नीचे उतर!

*सेठजी* बोले ~ मैं नहीं उतरता, 

*डकैत* ~ क्यों नहीं उतरता, यह भोजन तूने ही रखा होगा.

*सेठजी* ~ मैंने नहीं रखा, कोई यात्री अभी यहाँ आया था, वही इसे यहाँ भूलकर चला गया,

*डकैत* ~ नीचे उतर! तूने ही रखा होगा *जहर मिलाकर,* और अब बचने के लिए *बहाने* बना रहा है, अब तुझे ही यह *भोजन* खाना पड़ेगा.... 

*सेठजी* ~ मैं नीचे नहीं उतरूँगा और खाना तो मैं कतई नहीं खाऊँगा, 

*डकैत* ~ पक्का तूने खाने में जहर मिलाया है, अब नीचे उतर और ये तो तुझे खाना ही होगा, 

*सेठजी* ~ मैं नहीं खाऊँगा, नीचे भी नहीं उतरूँगा, 

अरे कैसे नहीं उतरेगा, *सरदार* ने एक आदमी को *हुक्म* दिया इसको *जबरदस्ती* नीचे उतारो... *डकैत* ने सेठ को *पकड़कर* नीचे उतारा... 

*डकैत* ~ ले खाना खा!

*सेठ जी* ~ मैं नहीं खाऊँगा, 

*उस्ताद* ने चटाक से उसके मुँह पर *तमाचा* जड़ दिया... *सेठ* को *पुजारी जी* की बात याद आ गयी कि ~ *नहीं खाओगे तो, मारकर भी खिलायेगा....*

*सेठ* फिर भी बोला ~ मैं नहीं खाऊँगा... 

*डकैत* ~ अरे कैसे नहीं खायेगा ! इसकी नाक दबाओ और मुँह खोलो, *डकैतों* ने सेठ की नाक दबायी, मुँह खुलवाया और *जबरदस्ती खिलाने* लगे, वे नहीं खा रहे थे, तो डकैत उन्हें *पीटने* लगे... 

तब *सेठ जी* ने सोचा कि ये *पाँच हैं और मैं अकेला हूँ,* नहीं खाऊँगा तो ये मेरी *हड्डी पसली* एक कर देंगे, इसलिए *चुपचाप* खाने लगे और मन-ही-मन कहा ~ *मान गये मेरे बाप ! मार कर भी खिलाता है!*

*डकैतों* के रूप में आकर खिला, चाहे *भक्तों* के रूप में आकर खिला लेकिन *खिलाने वाला* तो तू ही है, आपने *पुजारी* की बात *सत्य साबित* कर दिखायी.... 

*सेठजी* के मन में *भक्ति की धारा* फूट पड़ी...उनको मार-पीट कर ... *डकैत* वहाँ से चले गये, तो *सेठजी* भागे और *पुजारी* जी के पास आकर बोले ~

*पुजारी जी ! मान गये आपकी बात... कि नहीं खायें तो वह मार कर भी खिलाता है....!!!*

सार ~ *सत्य यही है कि परमात्मा  ही जगत की व्यवस्था का कुशल संचालन करते हैं । अतः परमात्मा पर विश्वास ही नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास होना चाहिए।*

*_🙏🏻हरि-हरि हरि हरि 🕉️🙏🏻_*

संसार का असली मालिक राजा केवल एक है। 

वह ईश्वर है। 

ईश्वर का मुख्य और निज नाम ओ३म् है।

कुछ लोग श्री राम जी श्री कृष्ण जी आदि महापुरुषों का नाम लेकर बड़े खुश हो जाते हैं। 

वे समझते हैं, कि हम संसार के मालिक राजा ईश्वर का नाम ले रहे हैं।

जबकि श्री राम जी श्री कृष्ण जी आदि लोग ईश्वर नहीं हैं। 

वे तो महापुरुष हैं। 

उनको महापुरुष बनाया ही ईश्वर ने है। 

ईश्वर की कृपा से पुरुषार्थ करके वे लोग महापुरुष बने।

अब जब लोग महापुरुषों का नाम लेकर भी इतने प्रसन्न हो जाते हैं, कि फूले नहीं समाते। 

तो जो ईश्वर दुनियां का असली मालिक है, उसका नाम लेकर तो उससे लाखों गुना अधिक खुशी होनी चाहिए।

क्योंकि जो असली ईश्वर है, उसकी योग्यता इन महापुरुषों से लाखों करोड़ों गुना अधिक है। 

और उस असली ईश्वर ने ही इन श्री रामचंद्र जी श्री कृष्ण जी आदि लोगों को महापुरुष बनाया है।

अतः यदि आप असली ईश्वर का ओ३म् नाम लेंगे और व्यवहार में सदा उसके आदेश का पालन करेंगे, तो आप सदा सुखी रहेंगे।

            || ॐ नमः शिवाय ||

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

श्री रामचरित्रमानस प्रवचन - भगवान राम की बड़ी बहन की यहां होती है पूजा ;

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

श्री रामचरित्रमानस प्रवचन - भगवान राम की बड़ी बहन की यहां होती है पूजा;

श्री रामचरित्रमानस प्रवचन - भगवान राम की बड़ी बहन की यहां होती है पूजा ;

भगवान श्रीराम की बड़ी बहन शांता की कथा: जन्म, राजा दशरथ से वियोग, ऋष्यशृंग से विवाह और उनकी पूजा का धार्मिक महत्व ;

भगवान श्रीराम की कथा भारतीय सनातन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। 

रामायण में भगवान श्रीराम के जन्म, उनके भ्राताओं, माता सीता, माता कौशल्या, राजा दशरथ, महर्षि वशिष्ठ, हनुमानजी और रावण सहित अनेक पात्रों का विस्तार से वर्णन मिलता है। 

लेकिन भगवान श्रीराम की बड़ी बहन शांता का उल्लेख सामान्य रामकथाओं में बहुत कम सुनने को मिलता है।

हम लोग कई सालों से रामायण की कहानी सुनते, देखते आ रहे हैं। 

जिसमें हमने राम से जुड़े हर व्यक्ति के बारे में जाना लेकिन हमने कभी राम की बहन शांता का जिक्र कहीं होते ना तो देखा, ना सुना और ना ही पढ़ा है।


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लेकिन श्री राम की एक बड़ी बहन भी थी जिसका नाम शांता था। 

आज हम आपको बताएंगे राम की बहन शांता के बारे में और कहां होती है शांता की पूजा।

परंपरागत कथाओं के अनुसार, शांता राजा दशरथ और माता कौशल्या की पुत्री थीं। 

आगे चलकर उनका पालन - पोषण अंगदेश के राजा रोमपाद के यहां हुआ और उनका विवाह महर्षि ऋष्यशृंग से हुआ। 

महर्षि ऋष्यशृंग का संबंध भी रामायण की उस महत्वपूर्ण घटना से जुड़ता है, जिसमें राजा दशरथ के यहां पुत्रेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ और भगवान श्रीराम सहित चारों राजकुमारों का जन्म हुआ। 

लेकिन इस विषय पर लिखते समय एक बात का ध्यान रखना आवश्यक है। 

शांता की कथा से जुड़ी सभी बातें प्रत्येक रामायण में समान रूप से नहीं मिलतीं। 

वाल्मीकि रामायण, रामकथा की अन्य परंपराओं और बाद में प्रचलित लोककथाओं में कुछ विवरणों का अंतर है। 

इस लिए शास्त्रीय प्रमाण, परंपरागत मान्यता और स्थानीय जनश्रुति को अलग - अलग समझना ही उचित होगा।

इस लेख में हम शांता के जन्म, उनके जीवन, ऋष्यशृंग से विवाह, श्रीराम के जन्म से उनके संबंध तथा उस स्थान की धार्मिक परंपरा का विवेचन उपलब्ध रामायण - परंपराओं और पुराण - साहित्य के संदर्भ में करेंगे।

कौन थी राम की बहन शांता ;


देवी शांता महाराज दशरथ और रानी कौशल्या की पुत्री थी। 

महाराद दशरथ की दो अन्य रानियां भी थी जिनके नाम कैकयी और समित्रा थे, सभी की जानकारी के अनुसार इनके चार पुत्र थे राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न। 

लेकिन इनसे बड़ी एक बहन भी थी, जिसका उल्लेख कहीं नहीं किया गया। 

कौन थीं भगवान श्रीराम की बड़ी बहन शांता ? 


रामायण की प्रचलित परंपरा के अनुसार, शांता अयोध्या के राजा दशरथ और महारानी कौशल्या की पुत्री थीं। 

उन्हें भगवान श्रीराम की बड़ी बहन माना जाता है। 

शांता का विवाह महर्षि ऋष्यशृंग से हुआ, जो वैदिक यज्ञों के ज्ञाता और तपस्वी ऋषि थे।

इस कथा का एक महत्वपूर्ण आधार महर्षि वाल्मीकि की रामायण का बालकाण्ड, सर्ग 9 और 11 है। इन सर्गों में राजा दशरथ को उनके मंत्री सुमंत्र द्वारा महर्षि ऋष्यशृंग और शांता से संबंधित प्रसंग सुनाया जाता है। 

बालकाण्ड के नवम सर्ग में सुमंत्र राजा दशरथ को बताते हैं कि महर्षि सनत्कुमार ने पूर्व में ऋषियों को इक्ष्वाकु वंश, राजा दशरथ और अंगदेश के राजा रोमपाद से संबंधित भविष्यवाणी सुनाई थी। 

उसी प्रसंग में शांता का उल्लेख आता है।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि शांता का उल्लेख केवल आधुनिक लोककथा तक सीमित नहीं है। 
उनका नाम वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में भी मिलता है। 

हालांकि, उनकी जीवन - कथा के सभी लोकप्रिय विवरणों को मूल रामायण के प्रत्येक पाठ में समान रूप से वर्णित मानना सही नहीं होगा।

शांता बहुत होनहार कन्या थी, हर क्षेत्र में परिपूर्ण थी उसे हर क्षेत्र में अनूठा ज्ञान था। 

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार देवी शांता को राजा दशरथ ने अंगदेश के राजा रोमपद को गोद दे दिया था। 

एक बार जब अंगदेश के राजा रोमपद राजा दशरथ से मिलने अयोध्या अपनी पत्नी के साथ आये तो उन्हे ज्ञात हुआ के राजारोमपद की कोई संतान नहीं है। 

संतान ना होने का क्या दुःख होता है यह समझते हुए राजा दशरथ ने अपनी बेटी शांता को उन्हें दे दिया। 

उसके बाद राजा रोमपद शांता को लेकर अंगदेश लौट आये।

शांता का पालन - पोषण राजा रोमपाद के यहां कैसे हुआ ?


शांता की कथा का एक प्रमुख भाग अंगदेश के राजा रोमपाद से जुड़ा है।

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड, सर्ग 9 में शांता के संबंध में जो प्रसंग आता है, उसकी व्याख्या में उन्हें राजा दशरथ की पुत्री और राजा रोमपाद की दत्तक पुत्री बताया जाता है। 

इस प्रकार शांता का संबंध दो राजपरिवारों से जुड़ता है।

राजा रोमपाद अंगदेश के राजा थे और राजा दशरथ के मित्र थे। 

रामायण के इस प्रसंग के अनुसार, शांता का विवाह महर्षि ऋष्यशृंग से हुआ और वे अंगदेश में अपने पति के साथ रहती थीं। 

बाद में राजा दशरथ ने उन्हें और उनके पति को अयोध्या आने का निमंत्रण दिया।

यह प्रसंग उस समय की राजपरंपरा और पारिवारिक संबंधों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। 

राजपरिवारों में दत्तक संबंधों के माध्यम से दो परिवारों के बीच आत्मीयता और संबंध स्थापित होते थे। 
शांता की कथा में भी जन्म और पालन - पोषण के दो अलग - अलग संबंध सामने आते हैं। 

इस लिए शांता के विषय में यह कहना अधिक सटीक होगा कि वे रामायण की एक ऐसी राजकुमारी थीं, जिन्हें परंपरा राजा दशरथ की पुत्री तथा राजा रोमपाद की पालिता या दत्तक पुत्री के रूप में पहचानती है।



shanta devi
शांता देवी 


महर्षि ऋष्यशृंग कौन थे ? 


महर्षि ऋष्यशृंग शांता के पति थे। 

रामायण में उनका उल्लेख एक तपस्वी, ब्राह्मण ऋषि और वैदिक अनुष्ठानों में निपुण महापुरुष के रूप में मिलता है।

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में ऋष्यशृंग को महर्षि विभाण्डक का पुत्र बताया गया है। 

उनके तप, ब्रह्मचर्य और धार्मिक प्रभाव का वर्णन शांता की कथा से पहले आता है।

अंगदेश के राजा रोमपाद के साथ ऋष्यशृंग का संबंध विशेष रूप से प्रसिद्ध है। 

रामायण के इस प्रसंग में राजा रोमपाद ऋष्यशृंग का सम्मान करते हैं और उन्हें अपनी पुत्री शांता का पति स्वीकार करते हैं।

ऋष्यशृंग का महत्व केवल शांता के पति होने तक सीमित नहीं है। 

आगे चलकर वे राजा दशरथ के वंश में पुत्र - प्राप्ति के उद्देश्य से किए गए वैदिक यज्ञ से भी जुड़ते हैं। 

यही वह कारण है, जिससे शांता की कथा भगवान श्रीराम के जन्म के प्रसंग के साथ जुड़ जाती है।

इस प्रकार शांता और ऋष्यशृंग का विवाह रामायण की मुख्य कथा से अलग कोई असंबद्ध घटना नहीं है, बल्कि राजा दशरथ के जीवन और श्रीराम के जन्म की भूमिका से संबंधित प्रसंग है।

राजा दशरथ ने शांता और ऋष्यशृंग को अयोध्या क्यों बुलाया ?


राजा दशरथ के जीवन में संतान - प्राप्ति का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण था। 

वे इक्ष्वाकु वंश के राजा थे और अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र की कामना करते थे।

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड, सर्ग 9 में सुमंत्र राजा दशरथ को बताते हैं कि महर्षि ऋष्यशृंग के द्वारा यज्ञ संपन्न कराने से उन्हें पुत्र - प्राप्ति का मार्ग प्राप्त हो सकता है। 

इस सलाह के बाद दशरथ ऋष्यशृंग को अयोध्या लाने की योजना बनाते हैं।

इस के लिए राजा दशरथ अंगदेश जाते हैं और राजा रोमपाद से मिलते हैं। 

बालकाण्ड के सर्ग 11 में दशरथ और रोमपाद की भेंट तथा शांता और उनके पति को अयोध्या भेजने का प्रसंग मिलता है।

राजा दशरथ रोमपाद से अनुरोध करते हैं कि शांता अपने पति ऋष्यशृंग के साथ अयोध्या आएं, क्योंकि उन्हें एक महत्वपूर्ण वैदिक अनुष्ठान संपन्न कराना है। 

रोमपाद इस अनुरोध को स्वीकार करते हैं और ऋष्यशृंग अपनी पत्नी के साथ अयोध्या जाने के लिए तैयार होते हैं।  

इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि शांता का अपने जन्मदाता परिवार से संबंध बना हुआ था। 

विवाह के बाद भी वे अपने पिता राजा दशरथ के धार्मिक और पारिवारिक कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ऋष्यशृंग के साथ अयोध्या आईं।

यहां होती है शांता देवी की पूजा ;


हिमाचल के कुल्लू में शृंग ऋषि के मंदिर में भगवान राम की बड़ी बहन शांता की पूजा होती है। 

यह मंदिर कुल्लू से 50 कि.मी दूर बना हुआ है। 

यहां देवी शांता की प्रतिमा भी स्थापित है, इस मंदिर में देवी शांता और उनके पति शृंग ऋषि की साथ में पूजा होती है। 

दोनों की पूजा के लिए कई जगहों से भक्त दर्शन के लिए आते हैं। 

शांता देवी के इस मंदिर में जो भी भक्त देवी शांता और शृंग ऋषि की सच्चे मन से पूजा करता है उसे भगवान राम का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 

आपको बता दें की देवी शांता के मंदिर में दशहरा बड़ी धूम - धाम से मनाया जाता है।

भगवान श्रीराम के जन्म में शांता की कथा का क्या संबंध है ? 


भगवान श्रीराम के जन्म से जुड़ा प्रमुख प्रसंग राजा दशरथ के पुत्रकामेष्टि यज्ञ का है। 

इस यज्ञ के पीछे राजा दशरथ की संतान - प्राप्ति की इच्छा थी।

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में ऋष्यशृंग के अयोध्या आने और राजा दशरथ के यज्ञ से संबंधित प्रसंगों का वर्णन मिलता है। 

राजा दशरथ ने वैदिक विधि के अनुसार अनुष्ठान संपन्न कराया। 

रामायण की कथा के अनुसार, इसके बाद उनकी तीनों रानियों से चार पुत्र उत्पन्न हुए—

श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न।

यहां एक आवश्यक शास्त्रीय अंतर समझना चाहिए। 

शांता के पति ऋष्यशृंग का राजा दशरथ के यज्ञ से संबंध रामायण में वर्णित है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक रामायण - परंपरा शांता को यज्ञ की अकेली कारणभूत शक्ति बताती है। 

उनका संबंध मुख्यतः उस पारिवारिक और धार्मिक परिस्थिति से है, जिसके माध्यम से ऋष्यशृंग अयोध्या पहुंचे।

इस प्रसंग को शांता के जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ कहा जा सकता है। 

विवाह के बाद अंगदेश में रहने वाली शांता अपने पति के साथ अयोध्या आईं और उनके पति ने राजा दशरथ के वंश की संतान - प्राप्ति के लिए किए गए यज्ञ में भूमिका निभाई। 

इसी कारण जब हम रामायण के पात्रों की पूरी परंपरा को समझते हैं, तो शांता का नाम भी महत्वपूर्ण हो जाता है। 

वे श्रीराम के जीवन की प्रत्यक्ष घटनाओं में भले ही प्रमुख भूमिका में दिखाई नहीं देतीं, लेकिन उनके परिवार का संबंध श्रीराम के जन्म से जुड़ी महत्वपूर्ण घटना से है।

भगवान श्रीराम की बहन शांता की पूजा कहां होती है ? 


भगवान श्रीराम की बड़ी बहन शांता की पूजा के संदर्भ में हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले का उल्लेख मिलता है। 

यहां बंजार क्षेत्र के निकट शृंगी ऋषि मंदिर विशेष धार्मिक महत्व रखता है। 

स्थानीय धार्मिक परंपरा में महर्षि शृंगी ऋषि को क्षेत्र के प्रमुख देवता के रूप में पूजा जाता है।

कुल्लू क्षेत्र से संबंधित मंदिर - विवरणों में शांता देवी और उनके पति शृंगी ऋषि की पूजा का उल्लेख मिलता है। 

कुछ प्रकाशित विवरणों के अनुसार, मंदिर में शांता और शृंगी ऋषि की प्रतिमाएं साथ विराजमान हैं और श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए आते हैं। 

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की आधिकारिक पर्यटन - संबंधी जानकारी में भी बंजार क्षेत्र के शृंगी ऋषि मंदिर का उल्लेख है। 

जिला प्रशासन की ऐतिहासिक जानकारी में स्थानीय मान्यता बताई गई है कि रामायण काल में शृंगी ऋषि बंजार के आसपास रहते थे और राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ में सम्मिलित हुए थे। 

इस लिए शांता की पूजा के विषय में कुल्लू - बंजार क्षेत्र का उल्लेख करना उचित है। 

हालांकि, किसी एक मंदिर को पूरे भारत में शांता का एकमात्र मंदिर बताने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

यह भी समझना आवश्यक है कि शांता देवी की पूजा से संबंधित स्थानीय परंपराएं और मान्यताएं उस क्षेत्र की धार्मिक संस्कृति का हिस्सा हैं। 

किसी विशेष फल की प्राप्ति या मनोकामना पूर्ण होने का दावा स्थानीय आस्था के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि सभी शास्त्रों द्वारा प्रमाणित सार्वभौमिक तथ्य के रूप में।


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क्या वेदों और पुराणों में शांता की पूजा का विधान मिलता है ?


इस प्रश्न का उत्तर देते समय शास्त्रीय प्रमाण और लोकपरंपरा में अंतर करना आवश्यक है।

वेदों में यज्ञ, देवताओं की उपासना, प्रार्थना और धार्मिक कर्तव्यों का व्यापक वर्णन है। 

लेकिन शांता देवी की पूजा के लिए कोई विशिष्ट वैदिक मंत्र, व्रत या पूजा - विधान बताने के लिए स्पष्ट मूल संदर्भ आवश्यक है। 

उपलब्ध रामायण - संदर्भों के आधार पर ऐसा कोई विशेष विधान निश्चित रूप से बताना उचित नहीं होगा।

इसी प्रकार, शांता का नाम वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में आता है, परंतु केवल इस आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि सभी प्रमुख पुराणों में उनकी विस्तृत जीवनी या स्वतंत्र पूजा - विधि वर्णित है। 

शांता के संबंध में प्रमाणित रूप से चर्चा करने के लिए निम्नलिखित संदर्भ महत्वपूर्ण हैं:

वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 9: शांता, राजा दशरथ और ऋष्यशृंग से संबंधित पूर्ववृत्त।

वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 11: राजा दशरथ का अंगदेश जाना तथा शांता और ऋष्यशृंग को अयोध्या लाने का प्रसंग।

वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड के यज्ञ-संबंधी सर्ग: राजा दशरथ के पुत्र - प्राप्ति के लिए किए गए अनुष्ठान का वर्णन।

कुल्लू - बंजार की स्थानीय धार्मिक परंपरा: शृंगी ऋषि की आराधना तथा शांता से जुड़ी मान्यताएं।

इन संदर्भों को एक साथ देखने पर शांता की कथा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व समझ में आता है। 

साथ ही यह सावधानी भी बनी रहती है कि जहां मूल ग्रंथ मौन हैं, वहां बाद की परंपरा को मूल शास्त्र का सीधा कथन न कहा जाए।
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शांता की कथा से हमें क्या सीख मिलती है ?


शांता की कथा केवल भगवान श्रीराम की बड़ी बहन के बारे में जानकारी देने वाली कथा नहीं है। 

इस में परिवार, संबंध, कर्तव्य और धार्मिक परंपरा के कई पक्ष सामने आते हैं।

पहली सीख यह है कि किसी व्यक्ति का महत्व केवल इस बात से निर्धारित नहीं होता कि वह मुख्य कथा में कितनी बार दिखाई देता है। 

रामायण में अनेक पात्र ऐसे हैं जिनकी भूमिका सीमित दिखाई देती है, लेकिन जिनसे जुड़ी घटनाएं आगे चलकर बड़े परिणामों से संबंध रखती हैं।

दूसरी सीख परिवार के प्रति कर्तव्य और आत्मीयता की है। 

शांता विवाह के बाद अंगदेश में रहती थीं, फिर भी उनके पति का संबंध राजा दशरथ के महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ा रहा। 

यह प्रसंग दो राजपरिवारों के संबंधों और परस्पर सहयोग को दर्शाता है।

तीसरी सीख धार्मिक साहित्य को प्रमाणों के आधार पर पढ़ने की है। 

रामायण की अलग - अलग परंपराओं में कथाओं का विस्तार भिन्न हो सकता है। 

किसी लोकप्रिय कथा को अस्वीकार करना आवश्यक नहीं, लेकिन उसे किस ग्रंथ से समर्थन मिलता है और कौन - सा भाग लोकमान्यता है, यह बताना भी उतना ही आवश्यक है। 

चौथी सीख यह है कि सनातन परंपरा में प्रचलित स्थानीय पूजा - पद्धतियों का सम्मान करते हुए उनके इतिहास और शास्त्रीय आधार को अलग - अलग समझना चाहिए। 

हिमाचल प्रदेश में शृंगी ऋषि की आराधना इसका एक उदाहरण है।
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निष्कर्ष ;


भगवान श्रीराम की बड़ी बहन शांता का उल्लेख सामान्य रामकथाओं में भले ही कम सुनाई देता हो, लेकिन उनका संबंध वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के महत्वपूर्ण प्रसंगों से है। 

परंपरा के अनुसार वे राजा दशरथ की पुत्री, राजा रोमपाद की पालिता और महर्षि ऋष्यशृंग की पत्नी थीं।

उनके पति ऋष्यशृंग ने राजा दशरथ के पुत्र - प्राप्ति संबंधी यज्ञ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

इसी कारण शांता की कथा भगवान श्रीराम के जन्म से जुड़ी रामायण - परंपरा का एक उल्लेखनीय भाग बन जाती है।

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू - बंजार क्षेत्र में शृंगी ऋषि की आराधना प्रचलित है और स्थानीय धार्मिक परंपरा में शांता देवी का भी उल्लेख मिलता है। 

यह परंपरा रामायण की कथा और क्षेत्रीय धार्मिक संस्कृति के बीच एक रोचक संबंध प्रस्तुत करती है।

अतः शांता की कथा को पढ़ते समय मूल रामायण के प्रमाण, बाद की रामकथा - परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं—

तीनों को उचित स्थान देना चाहिए। 

यही शास्त्रोक्त विषयों के प्रति सम्मान और सत्यनिष्ठ लेखन का मार्ग है।
जय श्रीराम। जय माता सीता। हर हर महादेव। 🙏🌹जय श्री राम राम राम...!!!!
!!!!! शुभमस्तु !!!
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