सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।।श्रीमद् देवी महाभागवत — नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि में कन्या पूजन कब करें ?।।
श्रीमद् देवी महाभागवत — नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि में कन्या पूजन कब करें ?
अष्टमी और नवमी तिथि का कन्या पूजन कब करें? दूर करें कंफ्यूजन जानें सही तारीख और मुहूर्त ;
श्रीमद् देवी महाभागवत — नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि में कन्या पूजन कब करें? जानिए शास्त्रीय महत्व, विधि, मंत्र और नियम
हर हर महादेव हर...!! जय माता दी। 🙏
नवरात्रि केवल उपवास रखने, माता रानी के दर्शन करने और नौ दिनों तक पूजा - अर्चना करने का पर्व नहीं है।
यह आदिशक्ति भगवती दुर्गा की उपासना, आत्मसंयम, श्रद्धा, सेवा और नारीशक्ति के सम्मान का पावन अवसर भी है।
नवरात्रि के अंतिम दिनों में महाष्टमी और महानवमी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
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इन दोनों तिथियों पर अनेक भक्त कन्या पूजन करते हैं, कन्याओं को भोजन कराते हैं तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा और उपहार देते हैं।
अष्टमी तिथि का कन्या पूजन और नवमी तिथि के कन्या पूजन की तारीख को लेकर थोड़ा कंफ्यूजन बना हुआ है।
दरअसल, सप्तमी तिथि दो दिन रहने के कारण यह उलझन है।
आइए जानते हैं पंडित जी से की किस दिन अष्टमी और नवमी तिथि का कन्या पूजन करना शुभ रहेगा।
लेकिन भक्तों के मन में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि नवरात्रि में कन्या पूजन अष्टमी को करना चाहिए या नवमी को ?
सुबह किस समय करना उचित है? यदि दोनों तिथियाँ एक ही दिन पड़ जाएँ, तो किस तिथि के अनुसार पूजा करनी चाहिए ?
शारदीय नवरात्रि का कन्या पूजन कब किया जाएगा। इसे लेकर थोड़ा कंफ्यूजन बना हुआ है।
दरअसल, इस बार सप्तमी तिथि दो दिन उदय काल का समय रहने से यह कंफ्यूजन है।
नवरात्रि का व्रत करने वाले अष्टमी और नवमी तिथि के दिन कन्या पूजन करते हैं।
किसी के यहां अष्टमी तिथि को कन्या पूजन किया जाता है और किसी के यहां पर नवमी तिथि में।
जिनके यहां अष्टमी का कन्या पूजन किया जाता है वह सप्तमी का व्रत करते हैं और जिनके यहां नवमी का कन्या पूजन किया जाता है वह अष्टमी तिथि को व्रत करके पारण करते हैं।
अब आपको किस दिन कन्या पूजन करना है आपका यह कंफ्यूजन दूर करेंगे पंडित ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री ।
आइए जानते हैं किस दिन अष्टमी नवमी का कन्या पूजन करना शुभ।
इन प्रश्नों को समझने के लिए देवी उपासना की परंपरा, श्रीमद् देवी भागवत महापुराण में वर्णित नवरात्र - व्रत के विधान तथा तिथि के धार्मिक महत्व को समझना आवश्यक है।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण में नवरात्रि का महत्व ;
सनातन धर्म में भगवती आदिशक्ति को संपूर्ण सृष्टि की मूल शक्ति माना गया है।
वही शक्ति विभिन्न रूपों में जगत का पालन करती है, अधर्म का नाश करती है और भक्तों के हृदय में श्रद्धा, ज्ञान तथा सद्बुद्धि का संचार करती है।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण में देवी की उपासना, नवरात्र - व्रत, पूजन, हवन और कुमारी पूजन का वर्णन मिलता है।
इस पुराण के तृतीय स्कंध के नवरात्र - व्रत संबंधी प्रसंग में बताया गया है कि जो लोग नौ दिनों तक पूर्ण उपवास करने में असमर्थ हों, वे अपनी क्षमता के अनुसार निर्धारित दिनों में भी श्रद्धापूर्वक देवी की उपासना कर सकते हैं।
देवी भागवत महापुराण के तृतीय स्कंध में कहा गया है—
सप्तम्यां च तथाष्टम्यां नवम्यां भक्तिभावतः।
त्रिरात्रकरणात्सर्वं फलं भवति पूजनात्॥
इसके अगले श्लोक में पूजा, हवन, कुमारी पूजन और भोजन आदि के द्वारा नवरात्र-व्रत की पूर्णता का उल्लेख किया गया है।
इस प्रसंग से यह समझ आता है कि नवरात्रि में देवी की उपासना के साथ कुमारी पूजन का भी धार्मिक महत्व है।
हालांकि, किसी विशेष वर्ष में कन्या पूजन का सटीक समय निर्धारित करने के लिए उस वर्ष की तिथि - गणना और स्थानीय पंचांग को भी देखना चाहिए।
नवरात्रि में भक्त माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना करते हैं।
अष्टमी पर मां महागौरी तथा नवमी पर मां सिद्धिदात्री की उपासना की परंपरा प्रचलित है।
कन्या पूजन के माध्यम से भक्त बालिकाओं में देवीशक्ति का सम्मान करते हैं।
कन्या पूजन का वास्तविक अर्थ क्या है ?
कन्या पूजन का अर्थ केवल छोटी बालिकाओं को भोजन कराना या उनके चरणों में दक्षिणा रखना नहीं है।
इसका गहरा भाव है—
नारीशक्ति का आदर करना, बालिकाओं के प्रति स्नेह रखना और उनमें विद्यमान दिव्य शक्ति का सम्मान करना।
सनातन परंपरा में स्त्री को शक्ति का स्वरूप माना गया है।
दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की उपासना इसी व्यापक धार्मिक भावना को व्यक्त करती है।
दुर्गा साहस और संरक्षण की प्रेरणा देती हैं, लक्ष्मी समृद्धि का प्रतीक हैं तथा सरस्वती ज्ञान और विवेक की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं।
जब भक्त कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर अपने घर आमंत्रित करते हैं, उनके चरण धोते हैं, तिलक लगाते हैं, भोजन कराते हैं और सम्मानपूर्वक विदा करते हैं, तब वे अपनी श्रद्धा को व्यवहार में प्रकट करते हैं।
नवरात्रि की अष्टमी तिथि में कन्या पूजन कब करें ?
नवरात्रि के आठवें दिन को महाष्टमी या दुर्गाष्टमी कहा जाता है।
इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा करने की परंपरा है।
अनेक परिवारों में महाष्टमी के दिन कन्या पूजन करके व्रत की महत्वपूर्ण धार्मिक क्रिया पूरी की जाती है।
यदि आपके परिवार में अष्टमी के दिन कन्या पूजन करने की परंपरा है, तो उस दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थान की सफाई करें, मां दुर्गा के सामने दीपक जलाएँ और पुष्प, अक्षत, धूप तथा नैवेद्य से विधिपूर्वक पूजा करें।
इस के बाद अपनी सुविधा और स्थानीय पंचांग में तिथि की स्थिति के अनुसार कन्याओं को आमंत्रित करके पूजन करें।
अष्टमी के दिन कन्या पूजन के लिए क्या ध्यान रखें ?
प्रातःकाल पूजा करना सुविधाजनक और प्रचलित परंपरा है।
पूजा करते समय अष्टमी तिथि का विचार करें।
यदि अष्टमी तिथि सुबह समाप्त हो रही हो, तो पूजा की तैयारी पहले से कर लें।
कन्या पूजन और भोजन को अनावश्यक रूप से देर तक न टालें।
यदि घर की परंपरा में अष्टमी व्रत का विशेष विधान है, तो उसी के अनुसार पूजा करें।
यहाँ एक बात विशेष रूप से समझनी चाहिए कि केवल घड़ी में सुबह का समय देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि अष्टमी तिथि चल रही है।
हिंदू पंचांग में तिथि की गणना चंद्रमा और सूर्य की स्थिति के आधार पर होती है।
इस लिए तिथि का आरंभ और अंत सामान्य अंग्रेजी कैलेंडर की मध्यरात्रि से निर्धारित नहीं होता।
महानवमी तिथि में कन्या पूजन कब करें ?
नवरात्रि के नौवें दिन को महानवमी कहा जाता है।
इस दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की परंपरा है।
अनेक परिवारों में नवमी के दिन कन्या पूजन, कन्या भोज, हवन और व्रत के समापन से संबंधित धार्मिक कार्य किए जाते हैं।
जो भक्त अष्टमी के दिन कन्या पूजन नहीं कर पाते, वे अपने पारिवारिक विधान और स्थानीय पंचांग के अनुसार नवमी पर यह अनुष्ठान कर सकते हैं।
नवमी के दिन प्रातः स्नान करने के बाद मां दुर्गा की पूजा करें।
देवी को पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और अपनी सामर्थ्य के अनुसार नैवेद्य अर्पित करें।
इस के पश्चात कन्याओं का आदरपूर्वक स्वागत करके पूजन और भोजन कराएँ।
कुछ परिवारों में कन्या पूजन के बाद व्रत का पारण किया जाता है, जबकि कुछ परिवारों में हवन तथा अन्य धार्मिक क्रियाओं के बाद पारण करने की परंपरा होती है।
इस लिए अपने व्रत के संकल्प और परिवार में प्रचलित विधि का ध्यान रखना चाहिए।
नवमी के दिन पूजा करते समय यह भी देखना चाहिए कि नवमी तिथि कब तक है।
यदि तिथि दोपहर में समाप्त हो रही हो, तो पूजा और भोजन की व्यवस्था पहले से कर लेना अधिक सुविधाजनक है।
ध्यान रहे कि अष्टमी और नवमी में से किसी एक दिन कन्या पूजन करने वाले भक्तों के लिए अपने परिवार की परंपरा और पंचांग के अनुसार निर्णय लेना उचित है।
दोनों तिथियों पर पूजा करना हर परिवार के लिए अनिवार्य है, ऐसा सामान्य नियम बनाकर नहीं कहना चाहिए।
अष्टमी और नवमी में से कौन-सी तिथि अधिक उचित है ?
यह प्रश्न अनेक भक्तों के मन में रहता है कि यदि अष्टमी और नवमी दोनों में कन्या पूजन किया जा सकता है, तो किस दिन करना अधिक उचित है।
इस का उत्तर समझने के लिए तीन बातों पर ध्यान देना चाहिए।
पहली बात — पारिवारिक परंपरा।
यदि आपके परिवार में कई वर्षों से अष्टमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है, तो उसी परंपरा का पालन किया जा सकता है।
यदि परिवार में नवमी के दिन कन्या भोज और हवन करने की परंपरा है, तो नवमी का विधान अपनाया जा सकता है।
दूसरी बात — तिथि की स्थिति।
किसी वर्ष अष्टमी और नवमी अलग - अलग दिनों में पड़ती हैं, तो भक्त अपनी परंपरा के अनुसार संबंधित तिथि पर पूजन कर सकते हैं।
लेकिन कभी - कभी तिथि की अवधि के कारण दोनों तिथियाँ एक ही अंग्रेजी कैलेंडर दिन में आ सकती हैं।
ऐसे में स्थानीय पंचांग का महत्व बढ़ जाता है।
तीसरी बात — पूजा का संकल्प।
यदि आपने नवरात्रि के आरंभ में किसी विशेष दिन कन्या पूजन करने का संकल्प लिया है, तो उसी के अनुसार व्यवस्था करें।
यदि तिथि संबंधी भ्रम हो, तो विश्वसनीय पंचांग या जानकार आचार्य से परामर्श लें।
यह कहना उचित नहीं होगा कि सभी भक्तों के लिए केवल अष्टमी ही श्रेष्ठ है या केवल नवमी ही श्रेष्ठ है।
दोनों तिथियों पर देवी उपासना की मान्यता है और अलग - अलग क्षेत्रों तथा परिवारों में पूजन की परंपराएँ भिन्न हो सकती हैं।
अष्टमी और नवमी का कन्या पूजन कब करें ?
नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि में कन्या पूजन का सही समय कैसे निर्धारित करें?
नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि में कन्या पूजन करने के लिए केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख देखना पर्याप्त नहीं है।
हिंदू धर्म में तिथि का निर्धारण सूर्य और चंद्रमा की स्थितियों के आधार पर होता है।
इस लिए अष्टमी और नवमी तिथि का आरंभ तथा समाप्ति प्रत्येक वर्ष और स्थान के पंचांग के अनुसार देखना चाहिए।
1. अष्टमी तिथि में कन्या पूजन कब करें ?
जो भक्त महाष्टमी के दिन कन्या पूजन करते हैं, उन्हें स्थानीय पंचांग में अष्टमी तिथि की अवधि देखनी चाहिए।
यदि अष्टमी तिथि प्रातःकाल विद्यमान हो, तो प्रचलित पारिवारिक विधान और स्थानीय पूजा - मुहूर्त के अनुसार कन्या पूजन किया जा सकता है।
यदि अष्टमी तिथि सूर्योदय के बाद आरंभ होती है या सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाती है, तो केवल सामान्य समय देखकर निर्णय नहीं करना चाहिए।
ऐसी स्थिति में स्थानीय पंचांग में दिए गए दुर्गाष्टमी पूजन के मुहूर्त तथा अपने परिवार की परंपरा के अनुसार निर्णय लेना उचित है।
2. नवमी तिथि में कन्या पूजन कब करें ?
जो भक्त महानवमी के दिन कन्या पूजन करते हैं, उन्हें नवमी तिथि की अवधि और स्थानीय पूजा - मुहूर्त देखना चाहिए।
नवमी तिथि में प्रातःकाल पूजा करना सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन इसे हर वर्ष और हर स्थान के लिए एक ही निश्चित समय का नियम नहीं मानना चाहिए।
यदि नवमी तिथि का आरंभ या समापन पूजा के सामान्य समय से पहले या बाद में हो, तो पंचांग के अनुसार पूजा की योजना बनानी चाहिए।
व्रत का पारण करने वाले भक्त अपने संकल्प तथा प्रचलित धार्मिक विधान का भी ध्यान रखें।
3. यदि अष्टमी और नवमी एक ही अंग्रेजी तारीख में पड़ें तो क्या करें ?
कभी - कभी तिथि की अवधि के कारण अष्टमी और नवमी एक ही अंग्रेजी कैलेंडर दिन में आ सकती हैं।
कभी किसी तिथि का क्षय या वृद्धि भी दिखाई दे सकती है।
ऐसी स्थिति में केवल तारीख के आधार पर यह निर्णय नहीं करना चाहिए कि किस दिन कन्या पूजन करना अनिवार्य है।
सबसे पहले स्थानीय पंचांग में महाष्टमी, महानवमी और संबंधित पूजा - मुहूर्त देखें।
इसके बाद अपनी पारिवारिक परंपरा और व्रत के संकल्प के अनुसार निर्णय लें।
यदि तिथि के विषय में भ्रम हो, तो जानकार आचार्य से परामर्श करना उचित है।
4. शास्त्रीय दृष्टि से कौन-सी तिथि श्रेष्ठ है ?
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण में नवरात्र - व्रत, देवी पूजन तथा कुमारी पूजन का महत्व वर्णित है।
अष्टमी और नवमी दोनों देवी उपासना की महत्वपूर्ण तिथियाँ हैं।
विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में कन्या पूजन की परंपरा अलग - अलग हो सकती है।
कन्या पूजन की संपूर्ण विधि ;
कन्या पूजन की विधि को श्रद्धा और सरलता से संपन्न किया जा सकता है।
पूजा के लिए बहुत अधिक खर्च करना आवश्यक नहीं है।
पूजा की तैयारी ;
सबसे पहले घर और पूजा स्थान को स्वच्छ करें।
मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएँ।
रोली, अक्षत, पुष्प, जल, धूप, दीप तथा भोजन की व्यवस्था करें।
इसके बाद कन्याओं को सम्मानपूर्वक घर आमंत्रित करें।
परंपरा के अनुसार नौ कन्याओं और एक बालक को आमंत्रित करने की प्रथा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।
कुछ परिवार अपनी उपलब्धता और स्थानीय रीति के अनुसार कम कन्याओं का पूजन भी करते हैं।
कन्याओं का स्वागत ;
कन्याओं के घर आने पर उनका विनम्रता से स्वागत करें।
परंपरा के अनुसार उनके चरण स्वच्छ जल से धोए जा सकते हैं। इसके बाद तिलक लगाएँ और पुष्प अर्पित करें।
यदि कोई कन्या चरण धुलवाने में असहज हो, तो उसकी इच्छा का सम्मान करें।
धार्मिक अनुष्ठान में किसी प्रकार की असुविधा उत्पन्न करना उचित नहीं है।
देवी का स्मरण और प्रार्थना ;
कन्याओं का पूजन करते समय मां दुर्गा का स्मरण करें।
अपनी भाषा में भी प्रार्थना की जा सकती है। उदाहरण के लिए—
ॐ दुं दुर्गायै नमः।
इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करते हुए मां दुर्गा से सद्बुद्धि, साहस, शांति और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
यह एक प्रचलित देवी मंत्र है।
इसे कन्या पूजन के समय जपने के लिए किसी विशेष कठिन विधि की आवश्यकता नहीं है।
पूजन के पश्चात कन्याओं को स्वच्छ और सात्त्विक भोजन कराएँ।
अनेक परिवारों में पूरी, चना और हलवा बनाने की परंपरा है।
इसके अतिरिक्त स्थानीय परंपरा के अनुसार अन्य शाकाहारी भोजन भी दिया जा सकता है।
भोजन स्वच्छता से तैयार होना चाहिए और कन्याओं की आयु, पसंद तथा आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए।
भोजन को लेकर किसी प्रकार का दबाव नहीं डालना चाहिए।
दक्षिणा और उपहार ;
भोजन के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा, फल, पुस्तक, लेखन सामग्री या उपयोगी उपहार दिया जा सकता है।
किसी विशेष राशि को सभी परिवारों के लिए अनिवार्य बताना उचित नहीं है।
कन्याओं को सम्मानपूर्वक प्रणाम करके आशीर्वाद लें और उन्हें प्रसन्नतापूर्वक विदा करें।
इस पूरे अनुष्ठान में विनम्रता, स्वच्छता और सद्भाव बनाए रखें।
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कन्या पूजन में किन नियमों का ध्यान रखें ?
कन्या पूजन करते समय कुछ सामान्य बातों का ध्यान रखना उपयोगी है।
पूजा के लिए स्वच्छ स्थान और स्वच्छ भोजन की व्यवस्था करें।
कन्याओं को आदरपूर्वक आमंत्रित करें और उनकी सुविधा का ध्यान रखें।
दक्षिणा या उपहार अपनी सामर्थ्य के अनुसार दें।
पूजा में दिखावे, प्रतिस्पर्धा या अनावश्यक खर्च से बचें।
किसी गरीब परिवार की बालिका को भोजन, शिक्षा सामग्री या आवश्यक वस्तु देकर सहायता करना भी सेवा का अच्छा माध्यम हो सकता है।
कन्या पूजन के बाद भी बालिकाओं के सम्मान, सुरक्षा और शिक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएँ।
व्रत के पारण का समय अपने संकल्प और संबंधित परंपरा के अनुसार निर्धारित करें।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कन्या पूजन के दिन बालिकाओं का सम्मान करके बाकी दिनों में उनके प्रति अपमानजनक व्यवहार न किया जाए।
देवी की आराधना तभी सार्थक होती है, जब उसके आदर्श हमारे आचरण में भी दिखाई दें।
इस लिए यह कहना उचित नहीं है कि प्रत्येक भक्त को केवल अष्टमी को ही या केवल नवमी को ही कन्या पूजन करना चाहिए।
सही निर्णय के लिए तिथि, स्थानीय पंचांग, व्रत का संकल्प और पारिवारिक परंपरा को साथ में देखना चाहिए।
विशेष ध्यान रखें: कन्या पूजन का मुहूर्त निर्धारित करने के लिए अपने शहर के पंचांग में दी गई तिथि और पूजा के समय को प्राथमिकता दें।
किसी पुराने लेख में लिखी तारीख या घड़ी के समय को हर वर्ष के लिए लागू न करें।
इस प्रकार भक्त किसी भी वर्ष की चैत्र नवरात्रि या शारदीय नवरात्रि में अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार कन्या पूजन का उचित समय निर्धारित कर सकते हैं।
इस लिए कन्या पूजन करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कन्याओं के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाए।
उन्हें केवल पूजा की सामग्री या किसी धार्मिक अनुष्ठान का साधन न समझा जाए।
उनकी इच्छा, सुविधा और सम्मान का ध्यान रखा जाए।
क्या कन्या पूजन करने से मनोकामना पूरी होती है ?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धापूर्वक देवी की पूजा, दान, सेवा और व्रत करने से भक्त को आध्यात्मिक संतोष तथा देवी के प्रति भक्ति की अनुभूति होती है।
भक्त सुख, समृद्धि, परिवार के कल्याण और बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।
लेकिन किसी विशेष फल की निश्चित गारंटी देना उचित नहीं है।
पूजा को केवल धन प्राप्त करने या किसी मनोकामना की पूर्ति का साधन नहीं समझना चाहिए।
इसका उद्देश्य मन को शुद्ध करना, अनुशासन विकसित करना, दूसरों के प्रति करुणा बढ़ाना और ईश्वर के प्रति श्रद्धा प्रकट करना भी है।
कन्या पूजन के माध्यम से बालिकाओं के प्रति सम्मान, दानशीलता और सेवा का भाव विकसित होता है।
यदि कोई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी बालिका की शिक्षा में सहायता करता है, किसी जरूरतमंद परिवार को भोजन देता है या किसी असहाय व्यक्ति की मदद करता है, तो वह भी धार्मिक मूल्यों को व्यवहार में उतारने का एक सार्थक मार्ग है।
देवी उपासना का वास्तविक संदेश केवल अनुष्ठान तक सीमित नहीं है।
उसमें सत्य, दया, संयम, सेवा और शक्ति के सम्मान का भाव भी समाहित है।
किसी कन्या को भोजन पसंद न हो, वह कोई वस्तु न लेना चाहे या वह पूजा में शामिल न होना चाहे, तो उस पर दबाव नहीं डालना चाहिए।
श्रद्धा का अर्थ किसी पर अपनी इच्छा थोपना नहीं है।
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कन्या पूजन में कितने वर्ष की कन्याओं को बुलाएं ;
शास्त्रों के अनुसार, कन्या पूजन के लिए 2 से 10 वर्ष तक की आयु की कन्याओं को बुलाना चाहिए।
इस वर्ष की कन्याओं को मां दुर्गा का साक्षात स्वरूप माना जाता है।
कन्याओं के साथ साथ एक छोटा बालक जिसे भैरव बाबा या लांगुर भी कहा जाता है उसका भी पूजन करने का विधान है।
कन्या पूजन के लिए सबसे पहले कन्याओं को आदर पूर्वक अपने घर पर आमंत्रित करें।
इसके बाद उनके पैर अच्छे से साफ करें।
माथे पर रोली का तिलक और हाथ में कलावा बांधे।
अब उन्हें लाल रंग की चुनरी भेंट करें।
इस के बाद हलवा, पूरी और चने का भोग लगाएं।
भोजन के बाद अपने सामर्थ्य अनुसार, दक्षिण देकर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें और फिर विदा करें।
अष्टमी और नवमी के कन्या पूजन का आध्यात्मिक संदेश ;
नवरात्रि के अंतिम दिनों में भक्त जब मां महागौरी और मां सिद्धिदात्री की आराधना करते हैं, तब वे अपने जीवन में शुद्धता, ज्ञान, साहस और सद्बुद्धि की कामना करते हैं।
अष्टमी हमें शक्ति और आत्मविश्वास की प्रेरणा देती है।
नवमी हमें साधना की पूर्णता, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति का स्मरण कराती है।
इन दोनों तिथियों पर कन्या पूजन करने का भाव यह है कि हम दिव्य शक्ति का सम्मान केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि अपने घर और समाज में भी करें।
किसी कन्या को भोजन कराना, उसके प्रति स्नेह रखना, उसकी शिक्षा में सहयोग करना और उसे सुरक्षित वातावरण देना—
ये सभी कार्य नारीशक्ति के सम्मान की भावना से जुड़े हैं।
इस लिए अष्टमी हो या नवमी, पूजन का वास्तविक महत्व केवल तिथि में नहीं, बल्कि श्रद्धा और आचरण में भी है।
शास्त्रों की परंपरा का पालन करते समय तिथि, संकल्प और पारिवारिक रीति का ध्यान रखें।
साथ ही यह समझें कि धार्मिक कर्मकांड का उद्देश्य मनुष्य को अधिक संवेदनशील, अनुशासित और सेवाभावी बनाना भी है।
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निष्कर्ष
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के नवरात्र - व्रत संबंधी प्रसंग में देवी पूजन, हवन, कुमारी पूजन और भोजन का महत्व बताया गया है।
नवरात्रि की अष्टमी और नवमी दोनों तिथियों पर कन्या पूजन की परंपरा प्रचलित है।
इस लिए अपने परिवार की रीति, व्रत के संकल्प और स्थानीय पंचांग के अनुसार उचित तिथि का चयन करना चाहिए।
यदि अष्टमी के दिन कन्या पूजन करते हैं, तो अष्टमी तिथि की समाप्ति का ध्यान रखें।
यदि नवमी को पूजन करते हैं, तो नवमी तिथि की स्थिति और पारण के विधान को समझें।
जिस वर्ष दोनों तिथियाँ एक ही अंग्रेजी कैलेंडर दिन में पड़ें, उस वर्ष विशेष रूप से स्थानीय पंचांग की सहायता लें।
मां दुर्गा से यही प्रार्थना है कि सभी भक्तों के जीवन में सद्बुद्धि, शांति, साहस और सेवा का भाव बना रहे।
प्रत्येक घर में सुख - शांति हो तथा समाज में बालिकाओं और महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और आगे बढ़ने के समान अवसर प्राप्त हों।
जय माता दी। 🙏 हर हर महादेव।
जरूरी सूचना ;
इस 2026 के शारदीय नवरात्री की पंचाग नोटिश ;
वर्ष 2026 में अष्टमी और नवमी का कन्या पूजन कब करें ?
वर्ष 2026 की शारदीय नवरात्रि में तिथियों की स्थिति के कारण अष्टमी और नवमी को लेकर कुछ भ्रम दिखाई दे रहा है।
उपलब्ध पंचांग-आधारित विवरणों के अनुसार, अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर 2026 की सुबह लगभग 8:27 बजे आरंभ होकर 19 अक्टूबर को लगभग 10:51 बजे समाप्त होती है।
इस के बाद नवमी तिथि आरंभ होती है और 20 अक्टूबर को दोपहर लगभग 12:50 बजे तक रहती है।
इस गणना के अनुसार:
18 अक्टूबर, रविवार: अष्टमी तिथि सुबह लगभग 8:27 बजे से आरंभ होगी।
19 अक्टूबर, सोमवार: सुबह लगभग 10:51 बजे तक अष्टमी और उसके बाद नवमी तिथि रहेगी।
20 अक्टूबर, मंगलवार: नवमी तिथि दोपहर लगभग 12:50 बजे तक रहने की गणना दी गई है।
इस वर्ष कई पंचांगों में महाष्टमी और महानवमी के पूजन 19 अक्टूबर को पड़ रहे हैं।
इस लिए जो भक्त अष्टमी के अनुसार कन्या पूजन करते हैं, वे स्थानीय पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि के भीतर पूजा करें।
नवमी के अनुसार पूजा करने वाले भक्त नवमी तिथि के समय और अपने पारिवारिक विधान को ध्यान में रखें।
यहाँ दिए गए समय सामान्य पंचांग - आधारित संदर्भ हैं।
स्थान के अनुसार सूर्योदय और तिथि की गणना में अंतर हो सकता है।
इस लिए तमिलनाडु, गुजरात या किसी अन्य स्थान पर पूजन करने से पहले अपने शहर के पंचांग से समय की पुष्टि करना उचित होगा। ( ध्यान रहे कि यह नोटिस नवरात्री समाप्त होने के बाद निकाल दिया जाएगा )
!!!!! शुभमस्तु !!!
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