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जय द्वारकाधीश
।। श्रीरामचरितमानस — श्रीरामका विशेष विशेषण ।।
।। श्रीरामचरितमानस — श्रीरामका विशेष विशेषण ।।
श्रीरामचरितमानस — श्रीरामका विशेष विशेषण ;
“रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥”
श्रीराम के स्वरूप का वर्णन करते समय केवल “राम” नाम ही पर्याप्त नहीं रह जाता।
सनातन शास्त्र-परम्परा में भगवान श्रीराम के लिए अनेक ऐसे पदों का प्रयोग हुआ है, जिनमें उनके वंश, माता - पिता, दाम्पत्य - संबंध, रूप, स्वभाव, धर्मनिष्ठा, पराक्रम, करुणा तथा लोकमंगलकारी स्वरूप का संकेत मिलता है।
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| Theme | Religious |
| Brand | eCraftIndia |
| Colour | Golden (Ram Darbar) |
| Style | classical |
| Material | Brass |
| Occasion | Religious |
| Product Dimensions | 6L x 6W x 4H Centimeters |
| Number of Pieces | 1 |
| Finish Type | Metallic |
| Item Weight | 30 g |
{ About this item
- Size - 6cm x 6cm x 4cm / 2.36" x 2.36" x 1.57"
- Material - Brass, Colour - Golden
- Package Content - 1 Golden Brass Ram Darbar Statue
- Golden Brass Ram Darbar Statue for Home Mandir, Pooja Room, and temple decor
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श्रीरामके- 'रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय' इस रामरक्षास्तोत्र मन्त्र ( श्लोक २७ ) की प्रामाणिकताके आधारपर तीन नाम संज्ञाएँ हैं, शेष प्रायः कुल, पिता - माता, स्वरूप - सौन्दर्य, सीतापतित्व और स्वभाव प्रभावके द्योतक विशेषण हैं।
श्रीरामचरितमानसमें भी इन सभी प्रकारके विशेषणोंका प्रभूत प्रयोग हुआ है।
कुलसे सम्बद्ध जैसे- 'रघुपति', 'रघुनाथ', 'रघुनन्दन' ;
आदि। पिता - मातासे सम्बद्ध यथा - 'दशरथनन्दन', 'कोसलानन्दन' आदि, श्रीजानकीसे सम्बन्धित 'सीतापति', 'सीतानाथ' प्रभृति।
इसी प्रकार रूप सौन्दर्य, शील स्वभाव और पराक्रमवाचक बहुत से विशेषण यथावसर प्रयुक्त हुए हैं।
इस लिए श्रीराम के नामों और विशेषणों का अध्ययन केवल नामावली का अध्ययन नहीं है, बल्कि उनके चरित्र और धर्मस्वरूप को समझने का एक शास्त्रीय मार्ग है।
श्रीरामरक्षास्तोत्र के छब्बीसवें श्लोक में श्रीराम के लिए अनेक पद एक साथ आते हैं—
“रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् ।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥”
और अगले श्लोक में कहा गया है—
“रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥”
इस प्रकार इन पदों को ध्यानपूर्वक देखने पर पता चलता है कि श्रीराम के लिए प्रयुक्त प्रत्येक संबोधन उनके व्यक्तित्व के किसी विशेष पक्ष को प्रकट करता है।
राम — मंगल और आनन्द का मूल नाम ;
“राम” श्रीराम की मूल नाम - संज्ञा है।
संस्कृत परम्परा में “राम” नाम को अत्यन्त पवित्र माना गया है।
श्रीरामरक्षास्तोत्र में भी आगे “रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्” कहा गया है।
अर्थात् राम, रामभद्र अथवा रामचन्द्र— इन नामों के स्मरण की विशेष महिमा बताई गई है।
“राम” नाम केवल किसी ऐतिहासिक पुरुष की पहचान भर नहीं है।
भक्तिपरम्परा में यह भगवान के स्मरण, शरणागति और धर्ममय जीवन का आधार बन जाता है।
इसी कारण श्रीरामरक्षास्तोत्र के प्रारम्भ से अन्त तक रामनाम अनेक रूपों में दिखाई देता है।
रामभद्र — मंगलकारी श्रीराम ;
“रामभद्र” में “भद्र” शब्द मंगल, कल्याण और शुभता का बोध कराता है।
इस लिए रामभद्र का अर्थ उस राम से है जिनका स्मरण कल्याणकारी माना गया है।
यहाँ “राम” के साथ “भद्र” जुड़ने से नाम में एक विशेष भाव आता है—
राम केवल अपने स्वरूप से पूज्य नहीं, बल्कि उनके स्मरण और आश्रय को भी मंगलकारी माना गया है।
श्रीरामरक्षास्तोत्र के श्लोक २७ में “रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय” तीनों पदों का एक साथ प्रयोग हुआ है।
इस से स्पष्ट है कि उपासना में श्रीराम के नाम के विभिन्न अर्थपूर्ण रूपों को स्वीकार किया गया है।
रामचन्द्र — चन्द्रमा के समान शीतल और मनोहर ;
“रामचन्द्र” में “चन्द्र” उपमा श्रीराम के सौम्य, शीतल और मनोहर स्वरूप की ओर संकेत करती है।
श्रीरामरक्षास्तोत्र के ध्यान-वर्णन में श्रीराम के प्रसन्न मुख और कमल-सदृश नेत्रों का वर्णन मिलता है।
इसी स्तोत्र में आगे “रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्” कहकर उनके श्याम स्वरूप, कमलनयन और पीतवस्त्र का स्मरण किया गया है।
अर्थात् रामचन्द्र नाम में केवल चन्द्रमा जैसा रूप नहीं, बल्कि भक्त के मन को शान्त करने वाला सौम्य भाव भी निहित है।
भगवान्की कृपालुताके भी सूचक विशेषणपद, जैसे 'कृपासिन्धु', 'कृपालु', 'कृपानिधान' आदि हैं।
कृपाके पर्याय करुणा शब्दसे जुड़े भी बहुत से विशेषण 'करुणामय', 'करुणायतन' आदि यथास्थान देखे जा सकते हैं, किंतु 'करुणानिधान!
यह' करुणा' शब्दके साथ 'निधान' शब्दसे बना समस्त पद हमारे अनुशीलनके अनुसार चार स्थलोंमें ही प्रयुक्त हुआ है, यद्यपि निधान शब्द 'करुणा' के अतिरिक्त 'कृपा' एवं 'सुख' शब्दोंसे समस्त होकर ( समास विधि से ) भी मानसमें प्रयुक्त हुआ है।
विश्वामित्रजी जनकपुर देखनेके सन्दर्भमें राम - लक्ष्मण दोनोंके लिये कहते हैं-
जाइ देखि आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाड़। (रा०च०मा० १।२१८)
तथा-प्रभु बियोग लवलेस समाना ।
सब मिलि होहिं न कृपानिधाना ।।
(रा०च०मा० २।६६।६) यह श्रीजनकनन्दिनीका श्रीरामके प्रति सम्बोधन है।
यह शब्द करुणानिधानका निकटवर्ती तो है, किंतु वही नहीं है, इस का रहस्य आगे व्यक्त होगा।
इसी प्रकार शिवधनुषभंगके प्रसंगमें भी जानकीजीका ;
ऐसा ही वचन है-
प्रभु तन चितड़ प्रेम तन ठाना ।
कृपानिधान राम सबु जाना। (रा०च०मा० १।२५८।७)
चौपाई।
रघुनाथ — रघुवंश के नाथ ;
“रघुनाथ” दो पदों से बना है—
रघु + नाथ।
श्रीराम रघुवंश में उत्पन्न हुए, इसलिए “राघव”, “रघुनन्दन”, “रघुवर”, “रघूत्तम”, “रघुकुलतिलक” और “रघुनाथ” जैसे संबोधन उनके वंश-संबंध को प्रकट करते हैं।
वाल्मीकि रामायण में श्रीराम को “काकुत्स्थ” और “राघव” कहकर संबोधित किए जाने के अनेक प्रमाण मिलते हैं।
उदाहरणतः विश्वामित्र श्रीराम को “काकुत्स्थ” और “राघव” कहकर संबोधित करते हैं।
इस लिए “रघुनाथ” केवल प्रशंसात्मक शब्द नहीं है; यह श्रीराम के रघुवंशीय संबंध और उस वंश में उनके सर्वोच्च स्थान का द्योतक है।
नाथ — आश्रयदाता ;
“नाथ” का सामान्य अर्थ स्वामी, रक्षक अथवा आश्रयदाता होता है।
“रघुनाथाय नाथाय” में श्रीराम को नाथ कहकर उनके शरणदाता स्वरूप का स्मरण किया गया है।
श्रीरामचरितमानस की सम्पूर्ण भक्ति - परम्परा में शरणागति अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
श्रीराम के चरित्र में शरणागत की रक्षा का भाव बार-बार सामने आता है।
इस लिए “नाथ” शब्द श्रीराम के केवल राजकीय अधिकार को नहीं, बल्कि भक्त के प्रति आश्रयदाता स्वरूप को भी प्रकट करता है।
सीतापति — मर्यादा और दाम्पत्य धर्म का स्वरूप ;
“सीतायाः पतये नमः”—अर्थात् सीता के पति श्रीराम को नमस्कार।
“सीतापति”, “जानकीवल्लभ” और “सीतायाः पतिः” जैसे पद श्रीराम के वैवाहिक संबंध को प्रकट करते हैं। श्रीराम के चरित्र में पति के रूप में मर्यादा, निष्ठा और धर्मपालन का विशेष स्थान है।
श्रीरामरक्षास्तोत्र में “जानकीवल्लभः श्रीमान्” तथा “सीतापतिं सुन्दरम्” दोनों प्रकार के संबोधन मिलते हैं।
इस लिए सीतापति कहना केवल संबंध बताना नहीं है; यह श्रीराम के गृहस्थ-धर्म और मर्यादापूर्ण जीवन की ओर भी संकेत करता है।
लक्ष्मणपूर्वज — भ्रातृसंबंध का विशेषण ;
श्रीरामरक्षास्तोत्र में “रामं लक्ष्मणपूर्वजम्” कहा गया है।
“पूर्वज” का अर्थ है—
जो पहले जन्मे हों।
इस लिए लक्ष्मणपूर्वज का अर्थ है लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम।
यह संबोधन श्रीराम के पारिवारिक स्वरूप को सामने लाता है।
श्रीराम केवल राजा या भगवान के रूप में ही नहीं, बल्कि भाई के रूप में भी मर्यादा के आदर्श हैं।
इसी प्रकार स्तोत्र में “भरताग्रज” भी आता है—
अर्थात् भरत के अग्रज।
इस प्रकार एक ही श्रीराम के व्यक्तित्व में ज्येष्ठ भ्राता, पुत्र, पति और राजा के अनेक धर्म एक साथ दिखाई देते हैं।
दशरथतनय और दाशरथि — पिता से संबंध ;
श्रीरामरक्षास्तोत्र में “दशरथतनयम्” तथा “रामो दाशरथिः” दोनों पद मिलते हैं।
“दशरथतनय” अर्थात् दशरथ के पुत्र और “दाशरथि” अर्थात् दशरथ से संबंध रखने वाले श्रीराम।
यहाँ विशेष बात यह है कि श्रीराम का पुत्रधर्म उनके चरित्र में अत्यन्त प्रमुख है।
पिता की आज्ञा को धर्म मानकर वनगमन स्वीकार करना रामचरित्र की मूल घटनाओं में से एक है।
इस लिए “दशरथतनय” केवल वंश की पहचान नहीं, बल्कि पितृवचन - पालन की स्मृति भी बन जाता है।
एवं किष्किन्धाकाण्ड दोहा २३ के अन्तर्गत १२वीं ;
अतः अब मुख्य विषयपर चर्चा करनी उचित होगी।
आरम्भमें गोस्वामीजीने भगवती सीताको प्रणाम करते हुए इस पदका प्रयोग किया है-
जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की ।।
(रा०च०गा० १।१८।७) गोस्वामीजी लीला - रहस्य - वेत्ता भगवद्भक्त हैं, उन्हें ज्ञात है कि श्रीकिशोरीजी श्रीरामभद्रको एकान्तमें 'करुणानिधान' कहकर ही सम्बोधित करती हैं, यह उनका व्यक्तिगत एवं प्रिय सम्बोधन है।
इसी लिये पूर्वोक्त उदाहरणोंमें थोड़ा - सा आवरण डालकर इसको इंगितमात्र किया गया है।
वस्तुतः यह शब्द श्रीपार्वतीजीद्वारा वरदानप्राप्त मन्त्र है, गुरुमन्त्रकी भाँति श्रीजनकनन्दिनीने इसे स्वीकार किया-
मनु जाहिं राखेड मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुनानिधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हिय हरषी अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥
(रा०च०मा० १।२३६ छन्द) तृतीय स्थल सुतीक्ष्ण-प्रसंगका है।
मानसके अरण्यकाण्डमें नौवें दोहेसे लेकर दसवें दोहेके बीच चौबीस चौपाइयों और ग्यारहवें दोहेतक अगस्त्य ऋषिके शिष्य सुतीक्ष्णजीका विवरण प्राप्त होता है।
दसवें दोहेकी ८वीं चौपाईमें 'करुणानिधान' शब्द इस प्रकार प्राप्त होता है -
एक बानि करुनानिधान की।
सो प्रिय जाकें गति न आन की ।।
(रा०च०मा० ३।१०।८) सुतीक्ष्णमुनि कहते हैं कि जिसकी कहीं अन्यत्र पहुँच नहीं- अवलम्बन नहीं, ऐसा निर्भर भक्त करुणानिधान श्रीरामको प्यारा होता है।
यहाँ प्रश्न होता है कि यदि यह श्रीजानकीजीद्वारा प्रयोगमें लिया जानेवाला विशेष सम्बोधन है, तो जो सीता - राम से इसके पूर्व पूर्व आजतक मिले ही नहीं, ऐसे सुतीक्ष्णजीको यह कैसे केसे ज्ञात है ?
इस का उत्तर है कि श्रीर श्रीसुतीक्ष्णमुनि मुनि जनक नकात्मजाभाव-
भावित प्रेमलक्षणा-भक्ति - सम्पन्न अनन्य रसिक भक्त हैं।
इस प्रसंगकी कतिपय चौपाइयाँ इसका प्रमाण हैं-
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना।
नाम सुतीछन रति भगवाना ॥
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी।
कहि न जाइ सो दसा भवानी ॥
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई।
प्रभु देखें तरु ओट लुकाई अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा।
प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा ॥ ॥
और इस अनन्य रसिकताकी यह फलश्रुति है -
भुज बिसाल गहि लिए उठाई।
परम प्रीति राखे उर लाई ॥
(रा०च०मा० ३।१०।२२)
ध्यातव्य है कि प्रिया श्रीविदेहनन्दिनीके अतिरिक्त यह प्रभुका सर्वस्वभूत परिरम्भण - सुख (हृदय लगाकर आलिंगन करना) उन्होंने निषादराज, श्रीभरत, श्रीलक्ष्मण प्रभृति परमप्रिय भक्तों और स्वजनोंके साथ सुतीक्ष्णजीको दिया, बादमें लंकादहनके बाद श्रीसीताजीका समाचार लेकर आये श्रीहनुमान्जीको प्रदान किया-
पवनतनय के चरित सुहाए।
जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए।
पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ।
(रा०च०मा० ५।३०।६-७)
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा।
कर गहि परम निकट बैठावा ॥
(रा०च०मा० ५।३३।४)
करता है-
एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः ।
मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः ।।
इत्युक्त्वा प्रीतिहृष्टाङ्गो रामस्तं परिषस्वजे ।
(वा०रा० युद्धकाण्ड १।१३-१४)
अर्थात् 'इस समय इन महात्मा हनुमान्को मैं केवल अपना प्रगाढ़ आलिंगन प्रदान करता हूँ; क्योंकि यही मेरा सर्वस्व है।'
ऐसा कहते - कहते रघुनाथजीके अंग-प्रत्यंग प्रेमसे पुलकित हो गये और उन्होंने हनुमान्जीको हृदयसे लगा लिया।
कौसल्येय — माता से प्राप्त पहचान ;
श्रीरामरक्षास्तोत्र में “कौसल्येयो” शब्द भी आता है। इसका अर्थ है—कौसल्या के पुत्र।
एक ही श्रीराम को कभी “दशरथतनय” और कभी “कौसल्येय” कहा जाता है।
इस से स्पष्ट होता है कि शास्त्रीय नामावली में माता-पिता से जुड़े संबोधन भी श्रीराम के चरित्र का अभिन्न अंग हैं।
ये पद बताते हैं कि भगवान का अवतार होने पर भी श्रीराम ने पुत्रधर्म को अपने चरित्र से अलग नहीं किया।
राघव — रघुवंश में जन्म लेने वाले ;
“राघव” का संबंध रघु से है।
रघुवंशीय होने के कारण श्रीराम को राघव कहा जाता है।
वाल्मीकि रामायण में “राघव” संबोधन बार - बार आता है।
विश्वामित्र के संवादों में भी श्रीराम को “राघव” कहा गया है और वाल्मीकि रामायण के विभिन्न प्रसंगों में यह संबोधन व्यापक रूप से मिलता है।
इस लिए “राघव” श्रीराम के वंशगत परिचय का शास्त्रीय विशेषण है।
काकुत्स्थ — प्राचीन वंशपरम्परा का संकेत ;
“काकुत्स्थ” श्रीराम का अत्यन्त प्रसिद्ध विशेषण है।
वाल्मीकि रामायण में श्रीराम को अनेक अवसरों पर “काकुत्स्थ” कहकर संबोधित किया गया है।
पम्पा के प्रसंग में भी उन्हें “काकुत्स्थ” कहा गया है।
श्रीरामरक्षास्तोत्र में भी “काकुत्स्थं” पद आता है।
अतः “काकुत्स्थ” श्रीराम के वंशगत परिचय का महत्वपूर्ण संबोधन है और इसे केवल अलंकारिक प्रशंसा समझना उचित नहीं होगा।
रघुवर और रघूत्तम — रघुकुल में श्रेष्ठ ;
“रघुवर” का अर्थ है रघुवंश में श्रेष्ठ और “रघूत्तम” का अर्थ रघुवंश में उत्तम।
इसी प्रकार “रघुकुलतिलक” का अर्थ है—
रघुकुल का तिलक, अर्थात् उस वंश की शोभा और गौरव को बढ़ाने वाला।
ये तीनों पद—
रघुवर, रघूत्तम और रघुकुलतिलक—
श्रीराम के वंशीय गौरव को व्यक्त करते हैं।
तीसरा प्रसंग इन्हीं श्रीहनुमान्जीका है।
सीताजीका अन्वेषण करते हुए लंकाकी अशोकवाटिकामें जब श्रीहनुमान्जी अशोकवृक्षसे नीचे मुद्रिका डालकर श्रीरामकथाका गायन करके जानकीजीको विश्वास दिलाना चाहते हैं, तब श्रीसीताजी उनको प्रकट होनेको कहती हैं।
हनुमान्जी वृक्षसे उतरकर उनके समीप आने लगते हैं, सीताजीको फिर भी आश्चर्य तो होता है, पर पूर्ण विश्वास नहीं होता-
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ।
फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ।॥
(रा०च०मा० ५।१३।१८)
तब उन्हें पूर्ण विश्वास दिलानेहेतु श्रीहनुमान्जी श्रीरामके इसी विशेषणका प्रयोगकर शपथ लेते हैं-
राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य सपथ करुनानिधान की।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी ।।
(रा०च०मा० ५।१३।९-१०
वाल्मीकिरामायणमें जानकीजीको विश्वास दिलानेहे मारुति जयन्तका प्रसंग और श्रीरामके शरीरके सभलक्षण सुनाते हैं, किंतु मानसकार औरोंसे प्रायः अप्रक 'करुणानिधान' इस विशेष विशेषणद्वारा श्रीजानकीव हनुमान्जीका सम्प्रत्यय करा देते हैं।
कल्पभेदसे दोनों सत्य हैं।
किंतु मानसकी कथा आधिभौतिक जगत्की तो ही, भगवान् सदाशिवकी रचना और गोस्वामीज जैसे निर्भर - भक्तकी ऐसी अनुरचना है, जिसमें श्रीगौरीज द्वारा प्रदत्त सम्बोधन मन्त्रकी महिमाका प्रकाश वि श्रीवाल्मीकीय रामायण भी इस तथ्यको प्रमाणित आनन्दप्रद है।
करुणार्णव — करुणा का समुद्र ;
“करुणार्णव” अत्यन्त अर्थपूर्ण विशेषण है।
“करुणा” अर्थात् दया और “अर्णव” अर्थात् समुद्र।
इस लिए करुणार्णव का भाव है—करुणा का अथाह समुद्र।
श्रीरामरक्षास्तोत्र में “करुणार्णवं गुणनिधिं” कहा गया है।
यहाँ श्रीराम के बाहरी पराक्रम के साथ उनकी आन्तरिक करुणा को भी समान महत्व दिया गया है।
रामचरित्र की विशेषता यही है कि पराक्रम और करुणा दोनों एक साथ दिखाई देते हैं।
गुणनिधि — गुणों का भंडार ;
“गुणनिधि” का अर्थ है गुणों की निधि या भंडार।
यह पद श्रीराम के चरित्र में सत्य, धर्म, दया, विनय, शौर्य, संयम, कर्तव्यनिष्ठा और मर्यादा जैसे गुणों के समन्वय को व्यक्त करता है।
यह केवल सामान्य प्रशंसा नहीं है;
श्रीरामरक्षास्तोत्र में गुणनिधि को करुणार्णव और धार्मिक जैसे अन्य विशेषणों के साथ रखा गया है।
इस से गुण और धर्म उनके चरित्र की परस्पर जुड़ी हुई विशेषताएँ बन जाते हैं।
विप्रप्रिय — ब्राह्मणों के प्रिय ;
श्रीरामरक्षास्तोत्र में “विप्रप्रियं धार्मिकम्” कहा गया है।
“विप्रप्रिय” का अर्थ ब्राह्मणों अथवा विद्वान् विप्रों के प्रति आदर और अनुराग रखने वाला।
श्रीराम के चरित्र में ऋषियों, मुनियों और धर्माचार्यों के प्रति सम्मान बार-बार दिखाई देता है।
विश्वामित्र के साथ उनका संबंध तथा ऋषियों के यज्ञ की रक्षा का प्रसंग वाल्मीकि रामायण में इसी धर्मसंरक्षक स्वरूप को प्रकट करता है।
धार्मिक — धर्म में स्थित ;
“धार्मिक” श्रीराम के सबसे महत्वपूर्ण विशेषणों में से एक है।
श्रीराम का चरित्र केवल शक्ति का चरित्र नहीं है।
उनका प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय धर्म के संदर्भ में प्रस्तुत होता है।
वनगमन, पितृवचन-पालन, ऋषियों की रक्षा, प्रजाधर्म और राजधर्म—
इन सभी प्रसंगों में धर्म उनके निर्णय का आधार बनता है।
इसी लिए “धार्मिक” शब्द रामनाम के साथ जुड़कर उनके सम्पूर्ण चरित्र की दिशा स्पष्ट करता है।
राजेन्द्र — राजाओं में श्रेष्ठ ;
“राजेन्द्र” का अर्थ राजाओं में श्रेष्ठ अथवा राजा का सर्वोच्च स्वरूप है।
श्रीराम के चरित्र में राजधर्म अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
राजा के रूप में श्रीराम का वर्णन केवल ऐश्वर्य के कारण नहीं, बल्कि प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व और धर्मपालन के कारण महत्वपूर्ण है।
इस लिए “राजेन्द्र” को उनके राजकीय पद के साथ - साथ आदर्श राजधर्म के संदर्भ में देखना चाहिए।
सत्यसंध — सत्य के प्रति दृढ़ ;
“सत्यसंध” का अर्थ है सत्य के संकल्प में दृढ़ रहने वाला।
श्रीराम के चरित्र का सबसे प्रसिद्ध आधार सत्य और प्रतिज्ञा है।
पिता के वचन की रक्षा के लिए वनगमन स्वीकार करना इसी सत्यसंधता का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
इस लिए “सत्यसंध” श्रीराम के बाहरी पराक्रम से अधिक उनके आन्तरिक संकल्प की शक्ति को व्यक्त करता है।
श्यामल और शान्तमूर्ति ;
श्रीरामरक्षास्तोत्र में “श्यामलं शान्तमूर्तिम्” कहा गया है।
“श्यामल” उनके वर्ण और स्वरूप का संकेत देता है, जबकि “शान्तमूर्ति” उनके मनोभाव और दिव्य स्वरूप की शान्ति को व्यक्त करता है।
यही कारण है कि रामचरित्र में धनुष-बाण धारण करने वाले वीर और करुणामय शान्त स्वरूप—
दोनों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
सुन्दर और लोकाभिराम ;
“सुन्दर” बाहरी रूप-सौन्दर्य का और “लोकाभिराम” ऐसा स्वरूप जिसका दर्शन लोक को प्रिय लगे—
ऐसा भाव प्रकट करता है।
श्रीरामरक्षास्तोत्र में “सीतापतिं सुन्दरम्” तथा “वन्दे लोकाभिरामम्” दोनों पद आते हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि राम का सौन्दर्य केवल शारीरिक आकर्षण नहीं है।
उनके चरित्र की मर्यादा, शील, सत्य, करुणा और धर्मनिष्ठा भी उनके “सुन्दर” स्वरूप का अंग हैं।
रावणारि — अधर्म के विरुद्ध धर्म की विजय ;
“रावणारि” का अर्थ रावण का शत्रु है।
लेकिन इस विशेषण को केवल दो व्यक्तियों के युद्ध तक सीमित करना उचित नहीं।
रामचरित्र में रावण अधर्म, अहंकार और मर्यादाभंग के प्रतीक रूप में उपस्थित होता है, जबकि श्रीराम धर्म और मर्यादा के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
इस लिए “रावणारि” विशेषण धर्म और अधर्म के संघर्ष में धर्म की स्थापना से भी जुड़ जाता है।
श्रीराम के विशेषणों का समग्र अर्थ ;
अब यदि श्रीरामरक्षास्तोत्र के इन विशेषणों को एक साथ देखा जाए तो एक अद्भुत क्रम दिखाई देता है—
राम — मूल नाम।
रामभद्र — मंगलकारी स्वरूप।
रामचन्द्र — सौम्य एवं मनोहर स्वरूप।
रघुनाथ — रघुवंश के नाथ।
नाथ — आश्रयदाता।
सीतापति — दाम्पत्य धर्म के आदर्श।
लक्ष्मणपूर्वज — ज्येष्ठ भ्राता।
दशरथतनय — पुत्रधर्म का स्वरूप।
कौसल्येय — मातृसंबंध का परिचय।
राघव — रघुवंशीय पहचान।
काकुत्स्थ — वंशपरम्परागत संबोधन।
रघुवर और रघूत्तम — रघुवंश में श्रेष्ठ।
करुणार्णव — करुणा का समुद्र।
गुणनिधि — गुणों की निधि।
धार्मिक — धर्म में स्थित।
सत्यसंध — सत्यप्रतिज्ञ।
राजेन्द्र — राजधर्म का आदर्श।
श्यामल — दिव्य स्वरूप का वर्णन।
शान्तमूर्ति — शान्ति का स्वरूप।
लोकाभिराम — लोक को प्रिय।
रघुकुलतिलक — रघुकुल की शोभा।
रावणारि — अधर्म-विनाशक।
इस प्रकार श्रीराम के विशेषणों की यह परम्परा केवल स्तुति के लिए प्रयुक्त शब्दों की सूची नहीं है।
प्रत्येक पद श्रीराम के व्यक्तित्व के एक विशेष आयाम को सामने लाता है।
श्रीरामरक्षास्तोत्र के श्लोक २६ और २७ को साथ पढ़ने पर विशेष रूप से यह बात स्पष्ट होती है कि एक ओर श्रीराम के वंश, रूप, गुण, धर्म, संबंध और पराक्रम का वर्णन है और दूसरी ओर “रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय...” के माध्यम से उनके नाम-स्मरण और प्रणाम का भाव है।
अतः श्रीराम के विशेषणों का वास्तविक उद्देश्य केवल यह बताना नहीं कि श्रीराम कितने महान हैं, बल्कि यह बताना है कि वे किस कारण महान हैं—
वे दशरथ के पुत्र हैं, कौसल्या के पुत्र हैं, लक्ष्मण और भरत के अग्रज हैं, सीता के पति हैं, रघुवंश के गौरव हैं, धर्म में स्थित हैं, सत्य के लिए दृढ़ हैं, करुणा से पूर्ण हैं, गुणों की निधि हैं और अधर्म के विनाशक हैं।
यही श्रीराम के नाम और विशेषणों की शास्त्रीय विशेषता है।
इस लिए जब साधक ;
“रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥”
का उच्चारण करता है, तब वह केवल एक नाम नहीं लेता; वह श्रीराम के अनेक स्वरूपों का एक साथ स्मरण करता है।
राम—नाम है।
रामभद्र—मंगलमयता है।
रामचन्द्र—सौम्यता है।
रघुनाथ—वंश और मर्यादा है।
सीतापति—धर्मपूर्ण दाम्पत्य है।
सत्यसंध—प्रतिज्ञा है।
धार्मिक—धर्मनिष्ठा है।
करुणार्णव—दया है।
गुणनिधि—सद्गुणों का आधार है।
रावणारि—अधर्म के विरुद्ध धर्म का संकल्प है।
इसी समन्वित स्वरूप में श्रीराम का चरित्र भारतीय शास्त्रीय परम्परा में “मर्यादा” का महान आदर्श बनकर सामने आता है।
जय श्री कृष्ण....!!!
!!!!! शुभमस्तु !!!
