।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन - संतों से समझा ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।।श्री रामचरित्रमानस प्रवचन - संतों से समझा ।।

श्री रामचरित्रमानस प्रवचन - संतों से समझा 

‼️राम कृपा ही केवलम्‼️❗संतों से समझा❗

श्रीरामचरितमानस का मूल संदेश: संतों की संगति से मनुष्य को भगवान के नाम, भक्ति, सदाचार और आत्मज्ञान का मार्ग मिलता है। 

संतों से समझना केवल प्रवचन सुनना नहीं, बल्कि उनके बताए हुए सत्य को अपने जीवन में उतारना है।

हर्ष शोक से, भोग रोग से, संयोग वियोग से रहित नहीं है। 

अतएव धीरज धारण कर विचार - पूर्वक यथाशक्ति कर्त्तव्य पालन करने का प्रयत्न करना चाहिए मोहवश मृतक मनुष्य का स्मरण कर दुःखी होने से मृतक के सूक्ष्म शरीर को दुःख अधिक होता है, क्योंकि जब तक सम्बन्ध शेष रहता है, 







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यह प्रवचन श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के प्रसंगों, चौपाइयों और भक्तिमार्ग के आधार पर प्रस्तुत है। 

इस में कोई काल्पनिक व्यक्ति, देश, राज्य या गांव की कहानी नहीं है।

तब तक उसे दूसरी योनि धारण करने में विलम्ब होता है।

यदि सद्भाव से, प्रसन्नतापूर्वक मृतक मनुष्य से सम्बन्ध विछेच्छ कर दिया जाए, तो फिर वह अपने कर्मों के अनुसार शीघ्र, सुगमता से दूसरी योनि धारण कर लेता है। 

इस लिए हृदय से सम्बन्ध तोड़ना परम आवश्यक है।

मंगलाचरण ;


श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन - कुमार।
बल बुधि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

श्री सीतारामचन्द्राभ्यां नमः।

 



संतों से समझने का वास्तविक अर्थ ;


श्रीरामचरितमानस का आरंभ ही गुरु और संतों की वंदना से होता है। 

गोस्वामी तुलसीदासजी अपने मन को निर्मल करने के लिए गुरुचरणों की धूलि का स्मरण करते हैं। 

इसका तात्पर्य है कि भगवान की कथा सुनने से पहले मन में विनय, श्रद्धा और सीखने की भावना होनी चाहिए।

संतों से समझना केवल किसी कथा - वाचक के पास बैठना नहीं है। 

संत वह है जिसके आचरण में भगवान के प्रति प्रेम, सत्य, दया, संयम और परहित की भावना हो। 

ऐसे संतों की संगति से मनुष्य को अपने दोष दिखाई देने लगते हैं और सुधार का मार्ग खुलता है।

बालकाण्ड में संत समाज की महिमा बताते हुए तुलसीदासजी कहते हैं—


सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥

अर्थात् संतों का समाज प्रयाग के पवित्र तीर्थ के समान है। 

जो मनुष्य प्रेम और प्रसन्नता से उसे सुनते और समझते हैं, वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चारों पुरुषार्थों का फल प्राप्त कर सकते हैं। 

यह मानस का अपना उपदेश है, कोई काल्पनिक कथा नहीं। 

यहाँ संत - संगति को तीर्थ के समान कहा गया है। 

तीर्थ में केवल स्नान करने से नहीं, श्रद्धा और शुद्ध भाव से जाने से लाभ होता है। 

उसी प्रकार सत्संग में केवल बैठने से नहीं, संतवाणी को जीवन में उतारने से मनुष्य का कल्याण होता है।

यदि हो सके तो सर्वान्तर्यामी आनन्दघन - भगवान् से थोड़े - थोड़े समय बाद, बार - बार प्रार्थना करो कि वह मृतक पुरुष की आत्मा को शान्ति प्रदान करें। 

इस प्रकार का चिन्तन 24 घण्टे में कई बार करना चाहिए जब - जब मोह के आवेश के कारण उनका स्मरण हो, तब - तब हृदय में यह भावना करो कि आपका हमसे कुछ सम्बन्ध नहीं है।

दुःख में धैर्य धारण करना विचारवान का कर्तव्य है।

संत - संगति से विवेक का उदय ;


मानस में सत्संगति की महिमा का एक अत्यंत प्रसिद्ध वर्णन है—

सतसंगति महिमा नहिं गोई।

अर्थात् सत्संगति की महिमा का पूरा वर्णन करना कठिन है। 

तुलसीदासजी कहते हैं कि सत्संग से दुष्ट स्वभाव भी सुधर सकता है, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है। 

इस के विपरीत, सज्जन भी यदि कुसंगति में पड़ें, तो उन्हें सावधान रहना चाहिए। 

इस का गहरा रहस्य यह है कि मनुष्य जिस संगति में रहता है, उसके विचार, भाषा और आचरण से प्रभावित होता है। 

यदि संगति भगवान के नाम, धर्म, सत्य और सेवा की है, तो मन में भी वही संस्कार बढ़ते हैं। 

यदि संगति लोभ, क्रोध, निंदा और अधर्म की है, तो मनुष्य धीरे - धीरे उसी दिशा में जाने लगता है।

इस लिए संतों से समझने का पहला फल विवेक है। 

विवेक का अर्थ है— 

क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसका सही निर्णय।

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संतों के लक्षण श्रीराम के मुख से ;


उत्तरकाण्ड में श्रीरामजी और काकभुशुण्डिजी के संवाद के माध्यम से संतों के लक्षण बताए गए हैं। 

श्रीरामजी कहते हैं—

सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं।
परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं॥

अर्थात् संतजन मन का संयम रखते हैं, इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हैं, नियम और नीति से विचलित नहीं होते तथा कठोर वचन नहीं बोलते। 

आगे संत के गुणों का वर्णन आता है—

पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी॥

अर्थात् संत दूसरों के दुःख से दुःखी और दूसरों के सुख से सुखी होते हैं। 

उनमें समता, विनय और वैराग्य होता है। 

वे लोभ, क्रोध, भय और अहंकार से मुक्त रहने का प्रयास करते हैं। 

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए। 

संत का अर्थ केवल विशेष वस्त्र पहनने वाला या बड़ी सभा में प्रवचन देने वाला नहीं है। 

मानस संत के बाहरी रूप से अधिक उनके आचरण को महत्व देता है। 

जो दूसरों के दुःख में सहायता करे, सत्य बोले, अपने मन को संयमित रखे और भगवान की भक्ति करे, उसके भीतर संतत्व के गुण प्रकट होते हैं।

पूरे रास्ते में जितने भी फूल थे वो बस तुम्हारी तरफ ही थे, सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं था। 

ऐसा इस लिए क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था और मैंने उसका लाभ उठाया। 

मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर रंग - बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे, तुम रोज़ थोडा़ - थोडा़ कर के उन्हें सींचते रहे और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत बना  दिया। 

आज तुम्हारी वजह से ही मैं इन फूलों को भगवान को अर्पित कर पाता  हूँ और अपना घर सुन्दर बना पाता हूँ। 

तुम्हीं सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं  होते तो भला क्या मैं ये सब कुछ कर पाता?”

हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी होती है, पर यही कमियां हमें अनोखा बनाती हैं। 

उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को वो जैसा है वैसे ही स्वीकारना चाहिए और उसकी अच्छाई की तरफ ध्यान देना चाहिए और जब हम ऐसा करेंगे तब “फूटा घड़ा” भी “अच्छे घड़े” से मूल्यवान हो जायेगा।

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संतों से सुनी हुई रामकथा का प्रभाव ;


श्रीरामचरितमानस की कथा स्वयं संत - परंपरा से जुड़ी हुई है। 

बालकाण्ड के मंगलाचरण में तुलसीदासजी गुरु, संत, शिवजी, पार्वतीजी और श्रीरामजी का स्मरण करते हैं। 

वे अपनी बुद्धि को सीमित मानकर सज्जनों से प्रार्थना करते हैं कि वे प्रेमपूर्वक कथा सुनें और यदि कोई त्रुटि हो तो सुधार दें। 

इससे यह शिक्षा मिलती है कि शास्त्र का अध्ययन अहंकार से नहीं, विनय से करना चाहिए। 

कोई भी मनुष्य यह न माने कि उसे सब कुछ ज्ञात हो गया है। 

संतों से समझने का भाव वही है जिसमें जिज्ञासा हो, प्रश्न करने की क्षमता हो और सत्य स्वीकार करने का साहस हो।

अयोध्याकाण्ड में श्रीरामजी के वनगमन के समय निषादराज की सेवा, गंगाजी के प्रति श्रद्धा और भरद्वाज मुनि के आश्रम का प्रसंग आता है। 

श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मणजी मुनि के आश्रम में पहुँचते हैं और उनके प्रति आदर प्रकट करते हैं। यह प्रसंग दिखाता है कि श्रीराम स्वयं ऋषियों और संतों का सम्मान करते हैं। 

श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि ज्ञान और सामर्थ्य होने पर भी गुरुजनों के प्रति विनय नहीं छोड़ना चाहिए।

तुम ब्राह्मण नहीं बन सकते ||
       ऋषि मांतक की कथा 
( महाभारत के अनुशासन पर्व )

धर्मराज युधिष्ठिर भीष्म पितामह से प्रश्न करते हैं :-

  स्थाने मतङ्गे ब्राह्माण्यं नालाभेद्। 
चाण्डालयोनौ जातो हि कथं ब्राह्मणमाप्तवान्।

हे भरत श्रेष्ठ!  चाण्डाल योनि में उत्पन्न हुये मतङ्ग ऋषि ने कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं किया ?

( इस प्रश्न को लेकर ही कुछ लोग शंका करते हैं कि उन्होंने तपस्या करके चाण्डाल से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया, परन्तु कथा प्रसङ्ग से यह बात सिद्ध नहीं होती। )

धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा भीष्म पितामह से पूछे गये उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में भीष्म पितामह कहते हैं, मतङ्ग ऋषि ने श्वपच से ब्राह्मण होने के लिये इंद्र की तपस्या की, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर इंद्र ने वर मांगने को कहा। 

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उसने चाण्डाल से ब्राह्मण होने का वर मांगा। 

उत्तर में इंद्र ने कहा कि कई जन्मों की तपस्या से "ब्राह्मणत्व" प्राप्त होता है।

महाभारत के अनुशासन पर्व के अट्ठाइसवें अध्याय के छठवें से बाहरवें श्लोक तक कहा गया है कि अनेक जन्मों में पशु - पक्षी की योनि के पश्चात् चाण्डाल का जन्म होता है।  

हजार चाण्डाल का जन्म पाने के अनन्तर एक शूद्र,तीस जन्म शूद्र के बाद वैश्य, साठ जन्म वैश्य के बाद क्षत्रिय, साठ जन्म क्षत्रिय के बाद ब्राह्मण का जन्म होता है।

अतः तुम इसी जन्म में ब्राह्मण नहीं हो सकते। 

जिसका मन भगवान् के अतिरिक्त शरीर, धन, स्त्री पुत्रादि की चिन्ता न करके दिन - रात जो श्रीहरि का चिंतन करता है, उसे अनन्य भक्त कहते हैं,ऐसे हरि का अनन्य भक्त चाण्डाल भी शरीर छोड़कर दूसरे जन्म में ब्राह्मण होता है, उसी जन्म में नहीं।

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5. श्रीराम के वनगमन से संतों की शिक्षा
अयोध्याकाण्ड में श्रीरामजी को वनवास मिलता है। वे पिता की आज्ञा और सत्य की मर्यादा का पालन करते हैं। सीताजी और लक्ष्मणजी भी उनके साथ वन जाते हैं। यह प्रसंग मानस के सबसे महत्वपूर्ण धर्मोपदेशों में से एक है।
संतों से समझने वाला मनुष्य इस प्रसंग से सीखता है कि जीवन में कठिन परिस्थितियाँ आने पर सत्य और धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। मनुष्य को अपने कर्तव्य का विचार करना चाहिए और परिस्थिति के अनुसार धैर्य रखना चाहिए।
श्रीराम का वनगमन यह नहीं सिखाता कि प्रत्येक व्यक्ति अन्याय को सहन करता रहे। इसका मूल संदेश है कि धर्म, सत्य, कर्तव्य और मर्यादा को जीवन में स्थान देना चाहिए। जहाँ अपने कर्तव्य का पालन करना आवश्यक हो, वहाँ क्रोध और स्वार्थ से ऊपर उठकर विवेकपूर्ण निर्णय करना चाहिए।

6. संतों की संगति और भगवान का नाम ;

श्रीरामचरितमानस में भगवान के नाम की महिमा बार-बार आती है। 

बालकाण्ड में तुलसीदासजी कहते हैं—

राम नाम मनि दीप धरु, जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जो चाहसि उजिआर॥

अर्थात् जो मनुष्य अपने भीतर और बाहर प्रकाश चाहता है, वह अपनी जिह्वा रूपी द्वार पर रामनाम रूपी मणि का दीपक रखे। 

इस चौपाई का रहस्य यह है कि नाम - स्मरण मन को भगवान की ओर लगाता है। 

संतों से समझने पर मनुष्य को यह अनुभव होता है कि केवल संसार की चिंता में डूबे रहना जीवन का उद्देश्य नहीं है। 

भगवान का नाम मन को स्थिर करने, अच्छे विचारों को बढ़ाने और आत्मचिंतन करने का सहारा बन सकता है।

रामनाम का स्मरण श्रद्धा से करना चाहिए। 

यह किसी दिखावे, व्यापार या दूसरों को छोटा दिखाने का साधन नहीं है। 

संतवाणी का उद्देश्य मनुष्य को सरल, विनम्र और भक्तिमय बनाना है।

ब्राह्मण्यं दुर्लभं तात प्रार्थमानो न लप्स्यसे।
वृणीष्व काममन्यं त्वं ब्राह्मण्यं हि सुदुर्लभम्।।

चाण्डालयोनौ जातेन नावाप्यवं वै कथंचन।
अन्य कामं वृणीष्व त्वं मा वृथा तेऽस्त्वयंश्रम:।।

मतङ्ग ऋषि के प्रार्थना करने पर इंद्र ने कहा:- 
'हे तात ! तुम्हारे प्रार्थना करने पर भी ब्राह्मण शरीर के प्राप्ति की इच्छा पूर्ण नहीं होगी, अतः तुम सुदुर्लभ ब्राह्मणत्व को छोड़कर दूसरा कोई वर मांगों।
चाण्डाल शरीर की योनि में जन्म लेकर तुम किसी भी प्रकार ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं करोगे, अतः तुम ब्राह्मणत्व के वर के अतिरिक्त दूसरा वर मांगो, जिससे तुम्हारा श्रम, तपस्या व्यर्थ न जाये।हे तात !  
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7. संतों से समझा हुआ धर्म और परहित
अरण्यकाण्ड में श्रीरामजी संतों के गुणों का वर्णन करते हुए परहित की भावना बताते हैं। संतजन दूसरों के हित में लगे रहते हैं और भगवान की लीलाओं का गान करते हैं। उनके गुणों का पूरा वर्णन करना कठिन बताया गया है। 
इससे यह समझना चाहिए कि संतों का धर्म केवल स्वयं का कल्याण नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति दया और सद्भाव भी है। जो मनुष्य केवल अपने लाभ की चिंता करता है, वह संतवाणी का पूरा अर्थ नहीं समझता।
परहित का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने परिवार, कर्तव्य या शरीर की उपेक्षा करे। इसका अर्थ है कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों की सहायता करे, किसी को अनावश्यक दुःख न दे और अपने व्यवहार में करुणा रखे।
मानस में भगवान की भक्ति और परहित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। भक्ति से मन में दया आती है और दया से सेवा की भावना उत्पन्न होती है।

ब्राह्मणत्व का वर इस लोक के विरुद्ध है। 
जीव अनेक योनियों में बार-बार जन्म लेने पर बड़ी कठिनाई से कोई एक को "ब्राह्मण" का जन्म प्राप्त होता है। 
अकृतात्म द्वारा पूर्व शरीर त्यागे बिना ब्राह्मण का जन्म अत्यंत कठिन है, अतः तुम इस दुर्लभ वर को छोड़कर दूसरा वर मांगों।
भीष्म पितामह इंद्र और मतङ्ग के संवाद का उपसंहार करते हुये धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं कि :- "हे भारत! ब्राह्मण का जन्म अत्यंत कठिनता से प्राप्त होता है, इंद्र के इस वचन से यह सिद्ध हुआ। 
"क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि तीनों वर्णों के लिये ब्राह्मणत्व अत्यंत दुर्लभ है। 
इस प्रमाण से सिद्ध होता है कि द्वापर युग के चाण्डाल मतङ्ग ऋषि ने इस जन्म में ब्राह्मणत्व की प्राप्ति नहीं की।

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8. संत और असंत का भेद
उत्तरकाण्ड में श्रीरामजी संत और असंत के स्वभाव का अंतर बताते हैं। एक प्रसिद्ध चौपाई में कहा गया है—
संत असंतन्हि कै असि करनी।
जिमि कुठार चंदन आचरनी॥
काटइ परसु मलय सुनु भाई।
निज गुन देइ सुगंध बसाई॥
अर्थात् संत और असंत का आचरण कुल्हाड़ी और चंदन के समान है। कुल्हाड़ी चंदन को काटती है, लेकिन चंदन अपने स्वभाव से कुल्हाड़ी को भी सुगंधित कर देता है। 
इस उपदेश का अर्थ है कि संत अपने सद्गुणों को छोड़कर दूसरों की बुराई का अनुकरण नहीं करते। वे अपने स्वभाव में दया, सत्य और शांति बनाए रखने का प्रयास करते हैं।
यहाँ यह भी समझना चाहिए कि संत का अर्थ दुर्बल या अन्याय के सामने विवेकहीन होना नहीं है। संतत्व में धैर्य के साथ धर्म की रक्षा का विवेक भी है। श्रीराम स्वयं धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए कार्य करते हैं। इसलिए संतवाणी का अर्थ है—मन में द्वेष न रखते हुए सत्य और धर्म का पालन करना।

इस उपर्युक्त प्रकरण से यह सिद्ध नहीं होता कि जीव ब्राह्मण शरीर को पाकर दुरुपयोग करते हुये अपने वर्णाश्रम का कर्म त्याग करके मनमाना आचरण करते हुये मांस,मदिरा का सेवन करने लग जाये, वेश्यागमन करने लग जाये।
ऐसा ब्राह्मण मरने के बाद कई कल्पों तथा मन्वन्तरों तक नरकों की यातनाएं भोगने के अनन्तर चौरासी लाख योनियों में भटकता है।
इसके विपरीत शूद्र अथवा अन्त्यज यदि मनुष्य शरीर पाकर स्वधर्म का पालन करते हुये भगवान की आज्ञा को मानकर भजन करता है; तो वह शरीर छोड़ने के बाद अपने इष्टदेव के लोक को प्राप्त करता है।
          
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9. संतों की वाणी सुनकर अपने दोष देखना
संतों से समझने का सबसे बड़ा फल आत्मचिंतन है। जब मनुष्य श्रीरामचरितमानस सुनता है, तो उसे अपने जीवन के अनेक दोष दिखाई दे सकते हैं—क्रोध, लोभ, अहंकार, निंदा, असत्य, आलस्य और स्वार्थ।
लेकिन आत्मचिंतन का अर्थ स्वयं को निराश करना नहीं है। संतवाणी मनुष्य को सुधार का मार्ग दिखाती है। यदि कोई दोष दिखाई दे, तो उसे धीरे-धीरे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
श्रीरामचरितमानस में बार-बार विनय, दया, भक्ति और सदाचार की शिक्षा मिलती है। इसका उद्देश्य केवल कथा का आनंद लेना नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाना है।
संतों से समझने वाला व्यक्ति दूसरों के दोष गिनाने से पहले अपने आचरण को देखता है। वह यह विचार करता है कि क्या उसकी वाणी से किसी को दुःख तो नहीं होता, क्या वह अपने कर्तव्य का पालन करता है और क्या उसके मन में भगवान के प्रति श्रद्धा बढ़ रही है।

एक व्यक्ति था जो नियमित मंदिर जाता था... परंतु एकांत मे तो चुपचाप रहता कोई भजन कीर्तन ना करता और जैसे ही भीड़ बढ़ने लगती खूब ज़ोर ज़ोर से जयकारा लगाके कीर्तन आदि करने लगता। 
सभी लोग उसे बहुत भगत मानते थे और भगत जी का संबोधन करते थे इससे उस व्यक्ति को बहुत आत्म संतुष्टि मिलती। 

आम जीवन मे भी उसका ज़ोर इसी बात पर रहता की उसे मान कैसे मिले और इसलिए हमेशा ही दूसरों मे कमियाँ निकालता रहता। 
यहाँ तक की मंदिर मे भी जाता तो सबको उपदेश दिया करता और खुद भूले से भी भगवान को याद नही करता। 
आरती भी करता तो उसका ज़ोर दूसरों को दिखाके चिल्लाने पर रहता परंतु ये भाव उसे नही आता कि भगवान सामने खड़े हैं। 
इसी तरह कई दिन बीत गये और वहाँ एक संत और भी आने लगे। 
कभी कभी उस व्यक्ति की उनसे भेंट भी हो जाती लेकिन वो उनसे कुछ भी ज्ञान की बात नही पूछता क्यूंकी उसे लगता की लोग समझेंगे की उसे कुछ मालूम नही तभी तो वो इन संत से पूछ रहा है।

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10. सत्संगति और कुसंगति का प्रभाव
बालकाण्ड में सत्संगति और कुसंगति की तुलना करते हुए तुलसीदासजी बताते हैं कि संगति मनुष्य के स्वभाव को प्रभावित करती है। सज्जन संगति से सुधार होता है, जबकि कुसंगति मनुष्य को गलत दिशा में ले जा सकती है। 
इसलिए संतों से समझने का अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने संग-साथ का विचार करे। जिन लोगों के साथ रहने से सत्य, संयम, भक्ति और सेवा की भावना बढ़ती है, उनकी संगति लाभकारी है। जिनसे लगातार निंदा, द्वेष, छल या अधर्म की प्रेरणा मिलती है, उनसे सावधान रहना चाहिए।
कुसंगति से बचना केवल दूसरों से दूरी बनाना नहीं है। अपने मन में आने वाले गलत विचारों को पहचानना भी आवश्यक है। कभी-कभी मनुष्य बाहरी संगति से अधिक अपने ही विचारों के कारण अशांत होता है। इसलिए सत्संग के साथ नामस्मरण, स्वाध्याय और आत्मचिंतन भी आवश्यक हैं।

बल्कि वो व्यक्ति संत महाराज को ही बताने लगता की आप अकेले मे तो इतना भजन करते हैं लोगों के सामने चुप क्यूँ हो जाते हैं, अरे! भगवान का भजन तो सबके साथ मिलके ही किया जाता है। 
वो संत मुस्कुराते और आँखें बंद कर लेते।उस व्यक्ति को लगता कि कदाचित् संत महाराज भी मेरी बात से सहमत है। 
एक दिन उस आदमी ने एक नयी चप्पल खरीदी और मंदिर के बाहर हमेशा की तरह उतार कर अंदर आ गया ।
परंतु उसका मन बार बार चप्पल पर जाए की कहीं कोई चोरी ना कर ले।
ये सब देखकर भगवान को बहुत दुख हुआ।
रात उस व्यक्ति ने स्वप्न देखा की कोई अलौकिक पुरुष उसी मंदिर के बाहर उसकी चप्पल के पास खड़ा है, तुरंत ही उसकी नींद टूट गयी वो घबराके बैठ गया।
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11. संतों की सेवा और गुरु का सम्मान
श्रीरामचरितमानस में गुरु के प्रति श्रद्धा और सेवा का महत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। श्रीरामजी गुरुजनों के प्रति आदर रखते हैं और उनकी आज्ञा का सम्मान करते हैं। अयोध्याकाण्ड में गुरु वशिष्ठजी की भूमिका और उनके प्रति आदर का वर्णन मिलता है। 
गुरु का अर्थ केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि ऐसा मार्गदर्शक है जो मनुष्य को सत्य और धर्म की ओर ले जाए। गुरु के प्रति सम्मान का अर्थ अंधानुकरण नहीं है। शास्त्रसम्मत विवेक, विनय और प्रश्न करने की भावना के साथ मार्गदर्शन ग्रहण करना चाहिए।
संतों की सेवा का अर्थ है उनके अच्छे उपदेशों को सुनना, उनका सम्मान करना और समाज में सदाचार का पालन करना। यदि कोई व्यक्ति संतवाणी सुनकर भी दूसरों के प्रति घृणा, अहंकार या छल करता है, तो उसने उस वाणी का वास्तविक अर्थ नहीं समझा।

उसने विचार किया की इसका अर्थ किससे पूछा जाए क्यूंकी उसने कभी कोई प्रश्न किसी से पूछा नही की लोग उसे अज्ञानी ना समझे।
बहुत सोच विचार कर उसने सोचा एकांत मे उसी संत से पूछूँगा जो मंदिर आते हैं क्यूंकी वो धीरे बोलते हैं और अधिक लोगों से बातचीत भी नही करते। 
उस दिन वो मंदिर गया और उसने अपनी बात संत के सामने रखी।
उसकी बात सुनते ही संत की आखों मे आँसू आ गये और वो भाव समाधि मे चले गये। 

कुछ देर बाद जब उनकी आखें खुली तो उस व्यक्ति ने फिर अपना प्रश्न दोहराया की इस स्वप्न का क्या अर्थ है? 
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12. संतों से समझा हुआ रामराज्य का आदर्श
श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में श्रीरामराज्य का वर्णन आता है। वहाँ धर्म, सत्य, सदाचार, परस्पर प्रेम और लोककल्याण का आदर्श प्रस्तुत किया गया है। मानस के अनुसार आदर्श समाज में मनुष्य अपने कर्तव्य का पालन करता है और दूसरों के प्रति सद्भाव रखता है।
संतों की संगति से मनुष्य केवल व्यक्तिगत शांति ही नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी समझता है। परिवार में प्रेम, समाज में सत्य, व्यवहार में न्याय और जीवन में भगवान की भक्ति—ये सभी संतवाणी के व्यावहारिक फल हैं।
रामराज्य का आदर्श हमें बताता है कि धर्म का प्रभाव मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन से आगे बढ़कर समाज के जीवन में भी दिखाई देना चाहिए। संतों से समझा हुआ धर्म मनुष्य को जिम्मेदार, संयमी और परोपकारी बनाता है।

संत बोले, वो महापुरुष जो आपकी चप्पल के पास खड़े थे स्वयं प्रभु थे जिनकी मूर्ति इस मंदिर मे विराजमान है और वो आपको ऐसा करके यही संकेत दे रहे थे की तुम मंदिर मे रहके भी मुझे स्मरण नही करते और मैं मंदिर मे होते हुए भी तुम्हारे चप्पल की रखवाली करता हूँ।

ये सुनते ही उस व्यक्ति की भी आँखें भीग गयीं उसने संत के चरण पकड़ लिए और बोला महाराज अब मैं समझा की आप एकांत मे इतने भाव से क्यूँ भजन गाते और भीड़ के साथ क्यूँ चुप हो जाते क्यूंकी आप हमेशा प्रभु प्रेम मे रहते हैं और प्रभु भक्ति दिखावे का नही भाव का विषय है।

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13. संतों की संगति से मिलने वाला अंतिम संदेश
श्रीरामचरितमानस के अंत में रामकथा और संत-संगति की महिमा का वर्णन है। उत्तरकाण्ड में सत्संग को दुर्लभ बताया गया है। यह बताता है कि भगवान की कथा सुनने और संतों की संगति पाने का अवसर अत्यंत मूल्यवान है। 
संतों से समझने का अर्थ है—
भगवान श्रीराम के नाम का श्रद्धापूर्वक स्मरण करना।
गुरु और संतों के प्रति विनय रखना।
सत्य, दया, संयम और परहित को जीवन में स्थान देना।
कुसंगति से सावधान रहना।
अपने दोषों को पहचानकर सुधार का प्रयास करना।
दूसरों के सुख-दुःख में सहभागी होना।
धर्म और कर्तव्य का पालन करना।
संतवाणी का सार यही है कि मनुष्य का जीवन केवल भौतिक सुखों के लिए नहीं है। जीवन का वास्तविक सौंदर्य तब प्रकट होता है, जब मनुष्य भगवान के प्रति प्रेम, सदाचार और परहित की भावना से जीता है।

कृपया करके मुझे क्षमा कर दें जो मैने अज्ञान वश आपको कभी अपमानित किया हो ये कहकर वो व्यक्ति भाव विभोर हो  गया, संत ने आगे बढ़के उसे गले से लगा लिया। 

उस दिन भी उस व्यक्ति ने भीड़ के साथ हमेशा की तरह ज़ोर ज़ोर से भजन किया परंतु उसकी आखें बंद थीं और उनसे अश्रु निकल रहे थे।

उपसंहार
श्रीरामचरितमानस हमें संतों के माध्यम से भगवान श्रीराम का मार्ग समझाता है। संतों से सुना हुआ ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह हमारे व्यवहार में दिखाई दे। यदि रामकथा सुनने से हमारी वाणी मधुर होती है, मन में दया बढ़ती है, अहंकार कम होता है और सत्य के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, तो यह संत-संगति का वास्तविक फल है।
अंत में श्रीरामचरितमानस की भावना के अनुरूप यही प्रार्थना है—
श्रीरामचन्द्रजी हमारे हृदय में भक्ति, विवेक, सत्य और सदाचार का प्रकाश उत्पन्न करें। गुरुजनों और संतों के चरणों में श्रद्धा बनी रहे। हमारे जीवन में भगवान के नाम का स्मरण, परहित की भावना और धर्म का पालन निरंतर बढ़ता रहे।
जय श्री सीताराम।

शास्त्रीय आधार
यह प्रवचन मुख्यतः श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी के श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड और उत्तरकाण्ड के संत-संगति, गुरु-महिमा, श्रीराम के चरित्र और भक्ति-संबंधी प्रसंगों पर आधारित है। मूल पाठ और प्रसंगानुसार संदर्भ के लिए श्रीरामचरितमानस का मूल पाठ  देखा जा सकता है।

         राधे राधे जी 

*🌹🙏जय श्री सीताराम राम राम राम🙏🌹*

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