🚩 प्राचीन वैदिक काल में आज के सभी तरह के आधुनिक अस्त्र-शस्त्र थे.🚩।

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जय द्वारकाधीश

🚩 प्राचीन वैदिक काल में आज के सभी तरह के आधुनिक अस्त्र - शस्त्र थे.🚩


प्राचीन वैदिक काल में आज के सभी तरह के आधुनिक अस्त्र - शस्त्र थे. 


इसका उल्लेख वेदों में मिलता है।

उस काल की तकनीक आज के काल से भिन्न थी लेकिन अस्त्रों की मारक क्षमता उतनी ही थी जितनी कि आज के काल के अस्त्रों की है। 

हालांकि ये किस तकनीक से संचालित होते थे, यह शोध का विषय है। 

उस काल में युद्ध के दौरान शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा का उल्लेख भी मिलता है। 





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उदाहरणार्थ शरीर के लिए चर्म तथा कवच का, सिर के लिए शिरस्त्राण और गले के लिए कंठत्राण इत्यादि का।

🚩 अस्त्र - शस्त्र की परिभाषा : 'अस्त्र' उसे कहते थे, जो किसी मंत्र या किसी यंत्र द्वारा संचालित होते थे और 'शस्त्र' उसे कहते थे, जो हाथों से चलाए जाते थे। 

अस्त्रों को मंत्रों द्वारा दूरी से फेंकते थे, जैसे पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र, गरूड़ास्त्र आदि।> 

अस्त्र के सामान्य भाग।

🚩 1. हाथ से फेंके जाने वाले अस्त्र, जैसे भाला।

🚩 2. वे अस्त्र जो यंत्र द्वारा फेंके जाते हैं, जैसे बाण, गुलेल आदि।

🚩 3.वे अस्त्र जो मंत्र या तंत्र द्वारा फेंके जाते हैं, जैसे नारायाणास्त्र, पा‍शुपत ब्रह्मास्त्र आदि।

शस्त्र : शस्त्रों को हाथों से संचालित किया जाता था। 

ये भी खतरनाक होते थे। 

शस्त्रों को हाथ से भी चलाया जाता था और किसी छोटे से यंत्र से भी, जैसे तलवार, वज्र, खंजर, खप्पर, खड्ग, परशु, बरछा, त्रिशूल आदि।

🚩 शस्त्र के सामान्य भाग: 🚩

🚩 1. काटने वाले शस्त्र, जैसे तलवार, परशु आदि।

🚩 2.भोंकने वाले शस्त्र, जैसे बरछा, त्रिशूल आदि।

🚩 3. कुंद शस्त्र, जैसे गदा, लट्ठ आदि।

वेदों में 18 युद्ध कलाओं के विषयों पर मौलिक ज्ञान अर्जित है। 

उपवेद ‘धनुर्वेद’ पूर्णतया धनुर्विद्या को समर्पित है। 

हालांकि वेदों में अस्त्र - शस्त्रों का वर्णन मिलता है लेकिन धनुर्वेद, धनुष - चन्द्रोदय और धनुष - प्रदीप इन 3 प्राचीन ग्रंथों का अक्सर जिक्र होता है। 

अग्नि पुराण में धनुर्वेद के विषय में उल्लेख किया गया है कि उसमें अस्त्रों के प्रमुख 4 भाग हैं- 

1. अमुक्ता, 2. मुक्ता, 3. मुक्तामुक्त और 4. मुक्तसंनिवृत्ती। 

🚩 अमुक्ता : अमुक्ता को शस्त्रों की श्रेणी में रखा गया है। 

ये वे शस्त्र होते थे, जो फेंके नहीं जा सकते थे।

अमुक्ता के 2 प्रकार हैं- 

1. हस्त-शस्त्र : हाथ में पकड़कर आघात करने वाले हथियार जैसे तलवार, गदा आदि। 

2. बाहू-युद्ध : नि:शस्त्र होकर युद्ध करना।

🚩 मुक्ता : मुक्ता को अस्त्रों की श्रेणी में रखा गया, जो फेंके जा सकते थे।

मुक्ता के 2 प्रकार हैं:- 

1. पाणिमुक्ता : अर्थात हाथ से फेंके जाने वाले अस्त्र जैसे भाला और

 2. यंत्रमुक्ता : अर्थात यंत्र द्वारा फेंके जाने वाले अस्त्र जैसे बाण, जो धनुष से फेंका जाता है।

🚩 मुक्तामुक्त : हाथ में पकड़कर किंतु अस्त्र की तरह प्रहार करने वाले शस्त्र जैसे कि बर्छी, त्रिशूल आदि। 

अर्थात वे शस्त्र जो फेंककर या बिना फेंके दोनों प्रकार से प्रयोग किए जाते थे।

*मुक्तसंनिवृत्ती : वे शस्त्र जो फेंककर लौटाए जा सकते थे, जैसे चक्र आदि।




🚩 अस्त्रों के प्रमुख प्रकार :🚩

▪️1.दिव्यास्त्र और 2. यांत्रिकास्त्र।

🚩 1.दिव्यास्त्र : वे अस्त्र जो मंत्रों से चलाए जाते थे, उन्हें दिव्यास्त्र कहते हैं। 

प्रत्येक अस्त्र पर भिन्न - भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मंत्र - तंत्र द्वारा उसका संचालन होता है।

वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मांत्रिक-अस्त्र कहते हैं।

🚩 दिव्यास्त्रों के नाम 🚩

1.आग्नेयास्त्र, 2. पर्जन्य, 3. वायव्य, 4. पन्नग, 5. गरूड़, 6. नारायणास्त्र, 7. पाशुपत, 8. ब्रह्मशिरा, 9. एकागिन्न 10. अमोघास्त्र और 11. ब्रह्मास्त्र।

इसके अलावा कुछ ऐसे भयानक अस्त्र थे जो यंत्र या तंत्र से संचालित होते थे।

🚩 शस्त्र के प्रमुख 2 प्रकार हैं 🚩

▪️1.यांत्रिक और 2. हस्त।

🚩 1. यांत्रिक : इन शस्त्रों को किसी यंत्र द्वारा चलाया जाता था, जैसे शक्ति, तोमर, पाश, बाण सायक, शण, तीर, परिघ, भिन्दिपाल, नाराच आदि। 

🚩 2. हस्त : ऋष्टि, गदा, चक्र, वज्र, त्रिशूल, असि, खड्ग, चन्द्रहास, फरसा, मुशल, परशु, कुण्टा, शंकु, पट्टिश, वशि, तलवार, बरछी, कुल्हाड़ा, चाकू, भुशुण्डी आदि।


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ना भौंकते हैं कुत्ते, ना गरजते हैं बादल, ना ही कड़कती है बिजली: जानिए बद्रीनाथ धाम की शांति का रहस्य, भगवान विष्णु के लिए यहाँ प्रकृति भी रहती है मौन

उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित बद्रीनाथ धाम भारत के सबसे पवित्र और प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। 

यह धाम चारधाम यात्रा और हिमालयी छोटे चारधाम का भी हिस्सा है। 

यह स्थान भगवान विष्णु को समर्पित है, जो यहाँ ध्यान मुद्रा में विराजमान हैं। 

इस का सम्मान यहाँ के जीव - जंतु भी रखते हैं। 

यहीं वजह है कि यहाँ कभी कुत्तों को भी भौंकते हुए नहीं देखा गया है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने यहाँ बदरी वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या की थी। 

इसी कारण इस स्थान का नाम बद्रीनाथ पड़ा। 

बद्रीनाथ मंदिर की वास्तुकला नागर शैली में बनी हुई है और यह समुद्र तल से लगभग 3,000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की शालिग्राम शिला से बनी काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है, जो पद्मासन में और चार भुजाओं के साथ दिखाई देती है।

बद्रीनाथ की अनोखी विशेषताएँ :

बद्रीनाथ धाम से जुड़ी कुछ ऐसी अद्भुत और रहस्यमयी बातें हैं, जो इसे और भी खास बनाती हैं। 

पहली ये कि यहाँ कभी कुत्ते भौंकते नहीं हैं। 

दूसरी ये कि बिजली चमकती है लेकिन कभी कड़कती नहीं और तीसरी ये कि बादल बरसते हैं लेकिन कभी गरजते नहीं।

इन घटनाओं के पीछे कई मान्यताएँ हैं। 

माना जाता है कि भगवान विष्णु यहाँ ध्यान मुद्रा में हैं और प्रकृति भी उनके ध्यान में बाधा नहीं डालती। 

न बिजली की कड़क, न बादलों की गर्जना, न ही कुत्तों का भौंकना। 

सब कुछ शांत है, ताकि भगवान की तपस्या में कोई विघ्न न आए।

मोटिवेशनल स्पीकर और भागवताचार्य देशमुख वशिष्ठ महाराज भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह बातें बिल्कुल सच हैं। 

बद्रीनाथ में कोई भी कुत्ता भौंकते हुए नहीं देखा गया है।

पौराणिक मान्यताएँ:

एक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने कुत्तों को श्राप दिया था कि वे इस पवित्र स्थान पर कभी नहीं भौंकेंगे। 

वहीं दूसरी मान्यता यह कहती है कि यहाँ के कुत्ते भगवान के सेवक हैं और उन्हें शांति से रहने का आदेश मिला हुआ है।

इस लिए बद्रीनाथ धाम न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि प्राकृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी एक अद्वितीय स्थान है। 

यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वे प्रकृति और वातावरण का पूरा सम्मान करें और इस शांति का हिस्सा बनें। 

स्पष्ट रूप से कहें तो बद्रीनाथ धाम वास्तव में एक ऐसा स्थान है, जहाँ हर जीव और प्रकृति भी भगवान की तपस्या में सहभागी है।

कल्पा, हिमाचल प्रदेश :

कल्पा हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में स्थित एक अत्यंत सुंदर एवं शांत हिमालयी गाँव है.

इस गाँव के आसपास सेब के बाग बहुतायत में हैं, ये बाग यहाँ की भूमि और जलवायु की विशेषता को दर्शाते हैं.

स्थानीय वास्तुकला में लकड़ी, पत्थर और पारंपरिक चित्र - शिल्प का संगम देखने को मिलता है.

कल्पा केवल प्राकृतिक सुंदरता का स्थल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रमाण है, जहाँ हिमालय की शांत वादियाँ, जन-जीवन की साधना और समय का प्रवाह एक साथ मिलते हैं.

महोदधि आरती - समुद्र की आरती 🌊

ओड़िशा के स्वर्गद्वार-तट पर प्रत्येक संध्या में होता है यह दिव्य अनुष्ठान, जिसे कहते हैं महोदधि आरती. 

‘महोदधि’ का अर्थ है विशाल समुद्र, और इस आरती के दौरान भक्त समुद्र को दीप, मंत्र और श्रद्धा समर्पित करते हैं.

सूर्यास्त के बाद मठ - पुजारियों द्वारा उठाया गया घी - दीप, शंखनाद और भजन - मंत्र वहाँ उपस्थित हर हृदय में गूंजते हैं.

इसे कभी ‘सामुद्र आरती’ भी कहा गया है, क्योंकि यह सिर्फ नदी या जलराशि की नहीं, समुद्र के समर्पण की भाव - प्रक्रिया है. 

यह आरती हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति केवल दर्शनीय नहीं, बल्कि पूजनीय भी है. समुद्र, नदियाँ, हवाएँ, सिंधु सब में देवत्व वास करता है.

हर हर महादेव हर...!!!

जय जय परशुरामजी...!!!

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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