।। श्री हरसिध्दि माताजी की कहानी ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री हरसिध्दि माताजी की कहानी ।।

राजा विक्रमादित्य की कुल देवी हरसिद्धि माताजी की  कथा

उज्जयिन्यां कूर्परं व मांगल्य कपिलाम्बरः।
भैरवः सिद्धिदः साक्षात् देवी मंगल चण्डिका।

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माता सती के पिता दक्षराज ने विराट यज्ञ का भव्य आयोजन किया था जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवता व गणमान्य लोगों को आमंत्रित किया । 

परन्तु उन्होंने माता सती व भगवान शिवजी को नहीं बुलाया । 







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फिर भी माता सती उस यज्ञ उत्सव में उपस्थित हुईं । 

वहां माता सती ने देखा कि दक्षराज उनके पति देवाधिदेव महादेव का अपमान कर रहे थे । 

यह देख वे क्रोधित हो अग्निकुंड में कूद पड़ीं । 

यह जानकर शिव शंभू अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने माता सती का शव लेकर सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण शुरू कर दिया । 

शिवजी की ऐसी दशा देखकर सम्पूर्ण विश्व में हाहाकार मच गया । 

देवी-देवता व्याकुल होकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे और संकट के निवारण हेतु प्रार्थना करने लगे । 

तब शिवजी का सती के शव से मोहभंग करने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाया था । 

चक्र से माँ सती के शव के कई टुकड़े हो गए । 

उनमें से १३वा टुकड़ा माँ सती की कोहनी के रूप में उज्जैन के इस स्थान पर गिरा । 

तब से माँ यहां हरसिद्धि मंदिर के रूप में स्थापित हुईं ।

इतिहास के पन्नों से यह ज्ञात होता है कि माँ हरसिद्धेश्वरी सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी थी जिन्हें प्राचीन काल में ‘मांगलचाण्डिकी’के नाम से जाना जाता था । 

राजा विक्रमादित्य इन्हीं देवी की आराधना करते थे एवं उन्होंने ग्यारह बार अपने शीश को काटकर माँ के चरणों में समर्पित कर दिया पर आश्चर्यवाहिनी माँ पुनः उन्हें जीवित व स्वस्थ कर देती थी । 

यही राजा विक्रमादित्य उज्जैन के सम्राट थे जो अपनी बुद्धि, पराक्रम और उदारता के लिए जाने जाते थे । 

इन्हीं राजा विक्रमादित्य के नाम से विक्रम संवत सन की शुरुआत हुई ।

उज्जैन में हरसिद्धि देवी की आराधना करने से शिव और शक्ति दोनों की पूजा हो जाती है। 

ऐसा इसलिए कि यह ऐसा स्थान है, जहां महाकाल और मां हरसिद्धि के दरबार हैं।

कहते हैं कि प्राचीन मंदिर रुद्र सरोवर के तट पर स्थित था तथा सरोवर सदैव कमलपुष्पों से परिपूर्ण रहता था। 

इसके पश्चिमी तट पर ‘देवी हरसिद्धि’ का तथा पूर्वी तट पर ‘महाकालेश्वर’ का मंदिर था। 

18वींशताब्दी में इन मंदिरों का पुनर्निर्माण हुआ। 

वर्तमान हरसिद्धि मंदिर चहार दीवारी से घिरा है।

ऐसा भी कहा जाता है कि सुबह के आरती हर्षद गुजरात में माता रानी करती है साम की आरती उज्जैन के मंदिर पर करती है साम के आरती समय माता रानी के मौजड़ी में बहुत धरती के रज धूल मिट्टी दिखाई देती है ।

देवी प्रतिमा 

मंदिर के मुख्य पीठ पर प्रतिमा के स्थान पर ‘श्रीयंत्र’ है। 

इस पर सिंदूर चढ़ाया जाता है, अन्य प्रतिमाओं पर नहीं और उसके पीछे भगवती अन्नपूर्णा की प्रतिमा है। 

गर्भगृह में हरसिद्धि देवी की प्रतिमा की पूजा होती है। 

मंदिर में महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती की प्रतिमाएँ हैं। 

मंदिर के पूर्वी द्वार पर बावड़ी है, जिसके बीच में एक स्तंभ है, जिस पर संवत 1447 अंकित है तथा पास ही में सप्तसागर सरोवर है।





मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते ही सामने मां हरसिद्धि के वाहन सिंह की विशाल प्रतिमा है। 

द्वार के दाईं ओर दो बड़े-बड़े नगाड़े रखे हैं, जो प्रातः सायं आरती के समय बजाए जाते हैं। 

मंदिर के सामने दो बड़े दीप स्तंभ हैं। 

इनमें से एक का नाम ‘शिव’ है, जिसमें 501 दीपमालाएँ हैं, दूसरे स्तंभ का नाम पार्वती है जिसमें 500 दीपमालाएँ हैं तथा दोनों दीप स्तंभों पर दीपकजलाए जाते हैं।

कुल मिलाकर इन 1001 दीपकों को जलाने में एक समय में लगभग 45 लीटर तेल लग जाता है ।
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श्री हरसिद्धि मंदिर के गर्भगृह के सामने सभाग्रह में श्री यन्त्र निर्मित है । 

कहा जाता है कि यह सिद्ध श्री यन्त्र है और इस महान यन्त्र के दर्शन मात्र से ही पुण्य का लाभ होता है । 
शुभफल प्रदायिनी इस मंदिर के प्रांगण में शिवजी का कर्कोटकेश्वर महादेव मंदिर भी है जो कि चौरासी महादेव में से एक है जहां कालसर्प दोष का निवारण होता है ऐसा लोगों का विश्वास है ।

मंदिर प्रांगण के बीचोंबीच दो अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है जिनका दर्शन भक्तों के लिए शांतिदायक रहता है । 

प्रांगण के चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार है एवं मुख्य प्रवेश द्वार के भीतर हरसिद्धि सभाग्रह के सामने दो दीपमालाएँ बनी हुई है जिनके आकाश की और मुख किये हुए काले स्तम्भ प्रांगण के भीतर रहस्यमयी वैभव का वातावरण स्थापित करते हैं । 
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यह दीपमालिकाएं मराठाकालीन हैं ।

ज्योतिषियों के अनुसार इसका शक्तिपीठ नामकरण किया गया है । 

ये नामकरण इस प्रकार है- 

स्थान का नाम 13 उज्जैन, शक्ति का नाम मांगलचाण्डिकी और भैरव का नाम कपिलाम्बर है ।

इस प्राचीन मंदिर के केंद्र में हल्दी और सिन्दूर कि परत चढ़ा हुआ पवित्र पत्थर है जो कि लोगों कि आस्था का केंद्र है ।
जय माताजी 

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अनेक देवी-देवताओं की मान्यता क्यों ?

गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्ट, दिव्य स्वरूप और इच्छित फल देने की सामर्थ्य जिसके पास है, उसे देवता कहते हैं। 

कहा जाता है कि हिंदू धर्म में अनगिनत देवी-देवता हैं। 

बृहदारण्यक उपनिषद् के तीसरे अध्याय में याज्ञवल्क्य ने कहा है कि वास्तव में तो देव 33 ही हैं, जिनमें 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, 1 देवराज इंद्र और 1 प्रजापति सम्मिलित हैं। 

अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्यौ, चंद्रमा और नक्षत्र ये 8 वसु हैं, जिन पर सारी सृष्टि टिकी हुई है। 
पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेद्रियां और मन (आत्मा) ये 11 रुद्र हैं। 

संवत्सर के बारह माहों के सूर्यों को आदित्य कहा जाता है। 

मेघ, इंद्र है और प्रकृति रूप यज्ञमय सारा जीवन प्रजापति है।
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वैसे अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य और द्यौ इन 6 देवों में ही सारा विश्व समा जाता है। 

किंतु आम लोगों में धारणा है कि 33 कोटि ( करोड़ ) देवता होते हैं। 

कोटि शब्द के दो अर्थ श्रेणी और करोड़ लगाए जाते हैं। 

इसी वजह से 33 करोड़ की धारणा बनी होगी ऋग्वेद में ऋषि कहते हैं।

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । 
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ -ऋग्वेद 1/164/46

अर्थात् एक सत्स्वरूप परमेश्वर को बुद्धिमान् ज्ञानी लोग अनेक प्रकारों से अनेक नामों से पुकारते हैं। 

उसी को वे अग्नि, यम, मातरिश्वा, इन्द्र, मित्र, वरुण, दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान इत्यादि नामों से याद करते हैं। 

सारा वैदिक वाङ्मय इसी प्रकार की घोषणाओं से भरा है, जिसमें एक ही तत्त्व को मूलतः स्वीकार करके उसी के अनेक रूपों में ईश्वर को मान्यता दी गई है।
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समाज में ब्रह्मा, विष्णु, महेश प्रधान देवता माने जाते हैं और लक्ष्मी सरस्वती तथा दुर्गा प्रधान देवियां हैं। 

सब देवों में श्रेष्ठ कौन है, उसके संबंध में एक कथा है-

एक बार ऋषियों में विवाद होने लगा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों में कौन देवता सबसे बड़ा है? 

इस के लिए ब्रह्मा के पुत्र भृगुजी को नियुक्त किया गया। 

भृगु सबसे पहले ब्रह्माजी के पास ब्रह्मा के लोक में पहुंचे, तो वे पुत्र को देखकर प्रसन्न हुए, लेकिन उसके प्रणाम, स्तुति वंदना न करने से ब्रह्मा क्रोधित होकर बिना कुछ बोले चले गए। 

फिर भृगुजी कैलास पर्वत पहुंचे, तो शिवजी ने अपने भाई को बड़ी प्रसन्नता से गले लगाने का प्रयास किया, तो भृगुजी ने उद्दंडता से कहा-

'मैं आपसे नहीं मिलूंगा, क्योंकि आपने लोक एवं वेद मर्यादा का उल्लंघन किया है।' 

इस व्यवहार से शिव क्रोधित होकर त्रिशूल उठाकर उन्हें मारने दौड़े। 
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फिर भृगुजी बैकुंठ लोक में पहुंचे। 

उस समय श्रीहरि विष्णु सोए हुए थे। 

भृगु बहुत देर तक खड़े रहे, किंतु जब विष्णु की निद्रा भंग न हुई तो क्रोधित होकर भृगु ने उनके वक्षस्थल पर लात मारी। 

विष्णु ने आंखें खोल दीं देखा तो सामने क्रोधित अवस्था में महर्षि भृगु खड़े थे। 
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भगवान् ने भृगु के पांव पकड़े लिए और नम्र स्वर में बोले-

"हे ऋषिवर! मेरा वक्ष कठोर है और आपके पांव कोमल। 

कहीं आपके पांव में चोट तो नहीं आई ? 

भगवान् विष्णु के ऐसे प्रेममय व्यवहार को देखकर भृगु बहुत लज्जित हुए। 

भगवान् श्री हरि ने भृगु को ऊंचे आसन पर स्थान दिया और उनके पैर दबाए। 

इस व्यवहार से भृगुजी तृप्त हुए। उन्होंने ऋषियों के सम्मुख आकर कहा-

"भगवान् विष्णु ही सब देवों में श्रेष्ठ हैं।"

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एक भक्त थे। 

उन्होंने भगवान का नाम जपते हुए जीवन बिता दिया, पर भगवान से कभी कुछ नहीं माँगा।

एक दिन वे भक्त बाँके बिहारी मंदिर गए। 

पर यह क्या, वहाँ उन्हें भगवान नहीं दिखे। 

वे आसपास के अन्य भक्तों से पूछने लगे कि आज भगवान कहाँ चले गए?

सब उनकी ओर हैरानी से देखते हुए कहने लगे- भगवान तो ये रहे। 

सामने ही तो हैं। 

तुझे नहीं दिखते? 

तूं अंधा है क्या?
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उन भक्त ने सोचा कि सब को दिख रहे हैं, मुझे क्यों नहीं दिख रहे? 

मुझे ये सब दिख रहे हैं, भगवान ही क्यों नहीं दिख रहे?

ऐसा विचार कर उनका अंतःकरण ग्लानि से भर गया। 

वे सोचने लगे - लगता है कि मेरे सिर पर पाप बहुत चढ़ गया है, इसी लिए मुझे भगवान नहीं दिखते। 

मैं इस शरीर का अन्त कर दूंगा। 

आखिर ऐसे शरीर का क्या लाभ? 

जिससे भगवान ही न दिखते हों।

ऐसा सोच कर वे यमुना में डूबने चले।
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इधर अंतर्यामी भगवान एक ब्राह्मण का वेष बना कर, एक कोढ़ी के पास पहुँचे और कहा कि ऐसे ऐसे एक भक्त यमुना को जा रहे हैं, उनके आशीर्वाद में बहुत बल है। 

यदि वे तुझे आशीर्वाद दे दें, तो तेरा कोढ़ तुरंत ठीक हो जाए।

यह सुन कर कोढ़ी यमुना की ओर दौड़ा। 

उन भक्त को पहचान कर, उनका रास्ता रोक लिया। 

और उनके पैर पकड़कर, उनसे आशीर्वाद माँगने लगा।

भक्त कहने लगे- भाई! मैं तो पापी हूँ, मेरे आशीर्वाद से क्या होगा?

पर जब बार बार समझाने पर भी कोढ़ी ने पैर न छोड़े, तो उन भक्त ने अनमने भाव से कह ही दिया- 

भगवान तेरी इच्छा पूरी करें।
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ऐसा कहते ही कोढ़ी बिल्कुल ठीक हो गया। 

पर वे भक्त हैरान हो गए कि यह चमत्कार कैसे हो गया? 

वे अभी वहीं स्तब्ध खड़े ही थे कि साक्षात भगवान सामने आ खड़े हुए।

उन भक्त ने भगवान को देखा तो अपने को संभाल न सके और रोते हुए, भगवान के चरणों में गिर गए। 

भगवान ने उठाया।

वे भगवान से पूछने लगे - भगवान! 

यह आपकी कैसी लीला है? 

पहले तो आप मंदिर में भी दिखाई न दिए, और अब अनायास आपका दर्शन ही प्राप्त हो रहा है।

भगवान ने कहा - 
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भक्तराज! 

आपने जीवन भर जप किया, पर कभी कुछ माँगा नहीं। 

आपका मुझ पर बहुत ॠण चढ़ गया था, मैं आपका ॠणी हो गया था, इसी लिए पहले मुझे आपके सामने आने में संकोच हो रहा था। 

आज आपने उस कोढ़ी को आशीर्वाद देकर, अपने पुण्यपुञ्ज में से कुछ माँग लिया। 

जिससे अब मैं कुछ ॠण मुक्त हो सका हूँ। 

इसी लिए मैं आपके सामने प्रकट होने की हिम्मत कर पाया हूँ।

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जय हरसिध्दि माता
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।। प्राचीन अर्वाचीन विश्व हिन्दू सनातन संस्कृतिक कृतिओ 3. ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।।  प्राचीन अर्वाचीन विश्व हिन्दू सनातन संस्कृतिक कृतिओ 3. ।।1


प्राचीन अर्वाचीन विश्व हिन्दू सनातन संस्कृतिक कृतिओ 3 / श्री हनुमान जन्मोत्सव : 




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🚩हनुमान जन्मोत्सव 

श्री हनुमान जन्मोत्सव है।🚩

धर्म ग्रंथों में हनुमानजी के 12 नाम बताए गए हैं,   मान्यता है कि हनुमानजी के इन 12 नामों का जो रात में सोने से पहले व सुबह उठने पर पाठ करता है, उसके सभी भय दूर हो जाते हैं और उसे अपने जीवन में सभी सुख प्राप्त होते हैं। 

वह अपने जीवन में अनेक उपलब्धियां प्राप्त करता है। 

हनुमानजी की 12 नामों वाली स्तुति इस प्रकार है-


प्राचीन अर्वाचीन विश्व हिन्दू सनातन संस्कृतिक कृतिओ 3



⚜️ स्तुति

हनुमानअंजनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबल:।
रामेष्ट: फाल्गुनसख: पिंगाक्षोअमितविक्रम:।।
उदधिक्रमणश्चेव सीताशोकविनाशन:।
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।।
एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मन:।
स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च य: पठेत्।।
तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्।
राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन।।

🙏🏻 हमेशा याद रखिये शब्द ही ब्रह्म है,  इसको अपरोक्ष रूप से इस्लाम ने  भी माना है इस लिये ही उनके पवित्र धर्म ग्रंथों में खुदा के 99 नामों का उल्लेख मिलता है l  

इन 12 नामो से हनुमानजी की स्तुति की जाती है , इस स्तुति को  पढ़ने से  हनुमानजी की महिमा का ज्ञान होता है और यह शुभ एवं  मंगलकारी है l 

🙏🏻 🌷 हनुमान 🌷🙏

🌷 हनुमानजी का यह नाम इसलिए पड़ा क्योकि एक बार क्रोधित होकर देवराज इंद्र ने इनके ऊपर अपने वज्र का प्रहार किया था यह वज्र सीधे इनकी ठोड़ी ( हनु ) पर लगा। 
हनु पर वज्र का प्रहार होने के कारण ही इनका नाम हनुमान पड़ा ।

🙏🏻 🌷 लक्ष्मणप्राणदाता🌷🙏

जब रावण के पुत्र इंद्रजीत ने शक्ति का उपयोग कर लक्ष्मण को बेहोश कर दिया था, तब हनुमानजी  संजीवनी बूटी लेकर आए थे। 
उसी बूटी के प्रभाव से  लक्ष्मण को होश आया था।
इस लिए  हनुमानजी को लक्ष्मणप्राणदाता भी कहा जाता है । 

परामर्श:: 

जब आपके प्राण संकट में हो तो सच्चे मन से इस नाम का स्मरण और हनुमानजी का ध्यान एवं स्मरण आपके प्राणों की रक्षा कर सकता है l 
इस स्तुति का पूरा लाभ प्राप्त करने के लिये दूसरे प्राणियों के प्राणों की रक्षा का पुण्य अपने प्रारब्ध में संचित कीजिये अर्थात जीव हिंसा मत कीजिये बल्कि उनकी सेवा और रक्षा कीजिये , यही अर्जित पुण्य आपके प्राणों की रक्षा की स्तुति को बल प्रदान करेंगे और सभी अनिष्ट समाप्त हो जायेंगे l 

🙏🏻 🌷 दशग्रीवदर्पहा🌷🙏

दशग्रीव यानी रावण और दर्पहा यानी धमंड तोड़ने वाला । 
हनुमानजी ने लंका जाकर सीता माता का पता लगाया, रावण के पुत्र अक्षयकुमार का वध किया साथ ही लंका में आग भी लगा दी ।
इस प्रकार हनुमानजी ने कई बार रावण का धमंड तोड़ा था । 
इस लिए इनका एक नाम ये भी प्रसिद्ध है ।

🙏🏻 🌷 रामेष्ट🌷🙏

हनुमान भगवान श्रीराम के परम भक्त हैं । 
धर्म ग्रंथों में अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है कि श्रीराम ने हनुमान को अपना प्रिय माना है । 
भगवान श्रीराम को प्रिय होने के कारण ही इनका एक नाम रामेष्ट भी है ।

🙏🏻🌷 फाल्गुनसुख🌷🙏

महाभारत के अनुसार, पांडु पुत्र अर्जुन का एक नाम फाल्गुन भी है । 
युद्ध के समय हनुमानजी अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजित थे । 
इस प्रकार उन्होंने अर्जुन की सहायता की । 
सहायता करने के कारण ही उन्हें अर्जुन का मित्र कहा गया है । 
फाल्गुन सुख का अर्थ है अर्जुन का मित्र ।

🙏🏻🌷  पिंगाक्ष🌷🙏

पिंगाक्ष का अर्थ है भूरी आंखों वाला ।
अनेक धर्म ग्रंथों में हनुमानजी का वर्णन किया गया है । 
उसमें हनुमानजी को भूरी आंखों वाला बताया है । 
इस लिए इनका एक नाम  पिंगाक्ष भी है ।

🙏🏻  🌷अमितविक्रम🌷🙏

विक्रम का अर्थ है पराक्रमी और अमित का अर्थ है बहुत अधिक । 
हनुमानजी ने अपने पराक्रम के बल पर ऐसे बहुत से कार्य किए, जिन्हें करना देवताओं के लिए भी कठिन था । 
इस लिए इन्हें अमितविक्रम भी कहा जाता हैं ।

🙏🏻 🌷 उदधिक्रमण🌷🙏

उदधिक्रमण का अर्थ है समुद्र का अतिक्रमण करने वाले यानी लांधने वाला । 
सीता माता की खोज करते समय हनुमानजी ने समुद्र को लांधा था। 
इस लिए इनका एक नाम ये भी है ।

🙏🏻🌷  अंजनीसुत🌷🙏

माता अंजनी के पुत्र होने के कारण ही हनुमानजी का एक नाम अंजनीसुत भी प्रसिद्ध है ।

🙏🏻 🌷 वायुपुत्र🌷🙏

हनुमानजी का एक नाम वायुपुत्र भी है । 
पवनदेव के  पुत्र होने के कारण ही इन्हें वायुपुत्र भी कहा जाता है ।

🙏🏻🌷  महाबल 🌷🙏

हनुमानजी के बल की कोई सीमा नहीं हैं । 
इसलिए इनका एक नाम महाबल भी है ।

🙏🏻  🌷सीताशोकविनाशन🌷🙏

🚩माता सीता के शोक का निवारण करने के कारण हनुमानजी का ये नाम पड़ा ।🚩
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मूर्त्तं तमोऽसुरमयं तद्विधो विनिहन्ति य: 
रात्रिजं  सूर्यरूपी  च  तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्।

यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम्
पश्यत: कर्म सततं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्।।

यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्वं सत्यमेतन्मयोदितम् 
नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाव्ययम्।।
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जो सूर्यरूपी उपेन्द्र असुरमय रात्रि से उत्पन्न तमका विनाश करते हैं, मैं उनको प्रणाम करता हूं। 
जिनकी सूर्य तथा चन्द्रमा - रूप दोनों आंखें समस्त लोकों के शुभाशुभ कर्मों को सतत् देखती रहती हैं, उन उपेन्द्र को मैं नमस्कार करता हूं। 
जिन सर्वेश्वर के विषय में मेरा यह समस्त उद्गार सत्य है - असत्य नहीं है, उन अजन्मा, अव्यय एवं स्त्रष्टा विष्णु को मैं नमस्कार करता हूं।'
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त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या 
विश्वस्य  बीजं   परमासि माया।

सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्
त्वं  वै  प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतु:।।

तुम अनन्त बल समपन्न वैष्णवी शक्ति हो‌ इस विश्व की कारण भूता परा माया हो। 
देवि! तुमने इस जगत को मोहित कर रखा है। 
तुम्हीं प्रसन्न होने पर इस पृथ्वी पर मोक्ष की प्राप्ति कराती हो।
              
      || लक्ष्मी नारायण की जय हो ||
+++ +++=
शांतकारं रूप प्रभु,
  शेष शयन सुख पाय..!

शंख चक्र कर में धरे,
    मन का तिमिर मिटाय..... ॥
+++ +++
1- शांतकारं रूप प्रभु, 
         शेष शयन सुख पाय।

शांतकारं:-

इस का अर्थ है 'शांति की मूर्ति' या जिनका स्वरूप अत्यंत शांत और सौम्य है। 
भगवान विष्णु का व्यक्तित्व हमें यह सिखाता है कि संसार की उथल - पुथल के बीच भी मन को स्थिर और शांत कैसे रखा जाए।

शेष शयन सुख पाय:- 

भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग' ( अनंत ) की शय्या पर विश्राम करते हैं। 
यह इस बात का प्रतीक है कि भयानक परिस्थितियों ( सांपों के बीच ) में भी वे सुखपूर्वक और अविचलित रहते हैं।
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2. शंख चक्र कर में धरे, 
       मन का तिमिर मिटाय ॥

शंख चक्र कर में धरे: उनके हाथों ( 'कर' ) में 'शंख' और 'चक्र' सुशोभित हैं। 
शंख 'नाद' ( ध्वनि ) और विजय का प्रतीक है, जबकि चक्र धर्म की रक्षा और बुराई के विनाश का।

मन का तिमिर मिटाय:- 'तिमिर' का अर्थ होता है अंधकार या अज्ञान। 
इस पंक्ति का भाव यह है कि जब हम भगवान के इस दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हैं, तो हमारे मन के भीतर छाया हुआ अज्ञान और दुखों का अंधकार मिट जाता है और ज्ञान का प्रकाश फैलता है।

    || लक्ष्मी नारायण भगवान की जय ||
!!!!! शुभमस्तु !!!
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। प्राचीन अर्वाचीन विश्व हिन्दू सनातन संस्कृतिक कृतिओ 2. ।।

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।।  प्राचीन अर्वाचीन विश्व हिन्दू सनातन संस्कृतिक कृतिओ 2. ।।





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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत - श्रीरामचरित्रमानस - श्री तुलसी कृत रामायण - महाराज दशरथ के कितने मंत्री और पुरोहित थे ? ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत - श्रीरामचरित्रमानस - श्री तुलसी कृत रामायण - महाराज दशरथ के कितने मंत्री और पुरोहित थे ?।।

श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत  - श्रीरामचरित्रमानस  -  श्री तुलसी कृत रामायण - महाराज दशरथ के कितने मंत्री और पुरोहित थे ?

महाराज दशरथ के कितने मंत्री और पुरोहित थे? रहस्य कथा शास्त्रोक्त, सच्चोंट और प्रमाण-आधारित आध्यात्मिक विवेचन !

मंगलाचरण ;

श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों में प्रणाम करके, श्री सीतारामजी, श्री तुलसीदासजी तथा गुरुजनों का स्मरण करते हुए इस प्रवचन का आरम्भ करते हैं।






श्रीरामचरितमानस केवल भगवान श्रीराम के जीवन का काव्य नहीं है। 

इसमें धर्म, नीति, मर्यादा, गुरु - सेवा, राजधर्म और मनुष्य के कर्तव्य का गहन उपदेश भी प्राप्त होता है। 

अयोध्या के महाराज दशरथ का राज्य इसी मर्यादा और धर्मव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

आज का विषय है—

महाराज दशरथ के कितने मंत्री और पुरोहित थे? 

इस प्रश्न का उत्तर केवल संख्या जानने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए भी आवश्यक है कि प्राचीन राजव्यवस्था में राजा के साथ मंत्री और गुरु किस प्रकार धर्म का संरक्षण करते थे।

अयोध्या और महाराज दशरथ का राजधर्म ;


श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में अयोध्या का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी ने महाराज दशरथ के राज्य की समृद्धि, धर्मनिष्ठा और प्रजा के सुख का वर्णन किया है। 

अयोध्या में राजा दशरथ का शासन था और उनके राज्य में धर्म, सत्य, मर्यादा तथा प्रजा - पालन को प्रधानता प्राप्त थी।

राजा का कर्तव्य केवल सिंहासन पर बैठना नहीं था। 

उसे प्रजा की रक्षा करनी थी, न्याय करना था, योग्य व्यक्तियों से परामर्श लेना था और धर्म के अनुसार शासन चलाना था। 

इसी लिए राजदरबार में मंत्री और पुरोहितों का विशेष महत्व था।

श्रीरामचरितमानस में महाराज दशरथ के संदर्भ में गुरु वशिष्ठ और गुरु वामदेव का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। 

ये दोनों राजपुरोहित थे। 

इन के अतिरिक्त राजकार्य में सहायता करने वाले मंत्रियों का भी वर्णन प्राप्त होता है।

महाराज दशरथ के आठ मंत्री ;


श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में विश्वामित्रजी के अयोध्या आगमन और महाराज दशरथ के दरबार में उनके स्वागत के प्रसंग में राजसभा का वर्णन मिलता है। 

उस प्रसंग में महाराज दशरथ के आठ मंत्रियों का उल्लेख किया गया है।

शास्त्रीय संख्या ;


८ मंत्री

महाराज दशरथ की राजसभा में आठ मंत्रियों का उल्लेख।

मंत्री राजा के राजकीय कार्यों में सहायता करते थे। 

वे राज्य की व्यवस्था, नीति, प्रजा - पालन और अन्य आवश्यक विषयों पर राजा को परामर्श देते थे। 

राजा के लिए मंत्रियों का होना इस लिए आवश्यक था कि वह समस्त राज्यकार्य अकेले नहीं कर सकता।

मंत्रियों की संख्या आठ बताई गई है, परंतु श्रीरामचरितमानस के उस प्रसंग में सभी आठ मंत्रियों के नामों की सूची नहीं दी गई है। 

अतः इस विषय पर शास्त्रोक्त विवेचन करते समय आठ मंत्रियों की संख्या को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना चाहिए, लेकिन बिना प्रमाण के उनके नामों की कल्पना नहीं करनी चाहिए।

महाराज दशरथ के दो राजपुरोहित ;


महाराज दशरथ के दो प्रमुख राजपुरोहित थे—

महर्षि वशिष्ठ।

महर्षि वामदेव।

गुरु वशिष्ठ महाराज दशरथ के कुलगुरु थे। 

श्रीरामचरितमानस में उनका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। 

वे रघुकुल के गुरु, धर्म के ज्ञाता और श्रीराम सहित चारों भाइयों के मार्गदर्शक थे।

गुरु वामदेव भी राजपुरोहित के रूप में प्रतिष्ठित थे। 

राजपुरोहित का कार्य केवल पूजा - पाठ करना नहीं था। 

वे राजा को धर्म, यज्ञ, संस्कार, शुभ कार्य और धार्मिक विधि के विषय में मार्गदर्शन देते थे।

इस प्रकार महाराज दशरथ की राजव्यवस्था में आठ मंत्री और दो प्रमुख राजपुरोहितों का उल्लेख प्राप्त होता है।

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महाराज दशरथ के कितने मंत्री और पुरोहित थे?

हमारे धर्मग्रंथों में ऐसा लिखा गया है कि मंत्री ही किसी राजा के राज्य का आधार होते हैं। 

मंत्री वे कहलाते हैं जिससे "मंत्रणा", अर्थात सलाह लेकर कोई राजा अपनी प्रजा के हित में कोई निर्णय लेता है। 

किसी राजा के कई मंत्री हो सकते थे और उनमें से जो मुख्य होता था उन्हें "महामंत्री" के नाम से जाना जाता था। 

आगे चल कर आधुनिक काल में इन्ही मंत्रियों को आमात्य या सचिव कहा जाने लगा।

महाराज विक्रमादित्य के नौ मंत्री, जिन्हे "नवरत्न" कहा जाता था, समस्त विश्व में विख्यात हैं। 

इसी प्रकार त्रेतायुग में श्रीराम के पिता महाराज दशरथ के भी कई मंत्री बताये गए हैं। 

हालाँकि इनका वर्णन रामचरितमानस में नहीं दिया गया है किन्तु मूल वाल्मीकि रामायण में इनके बारे में बताया गया है। 

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के सप्तम सर्ग में हमें इनका वर्णन मिलता है।

गुरु वशिष्ठ का महत्व ;


श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में गुरु वशिष्ठजी का स्थान अत्यंत उच्च है। 

जब महाराज दशरथ के जीवन में पुत्रप्राप्ति की इच्छा उत्पन्न हुई, तब गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन से पुत्रेष्टि यज्ञ का प्रसंग आया। 

ऋष्यशृंगजी के द्वारा यज्ञ संपन्न हुआ और भगवान श्रीराम सहित चारों पुत्रों का प्राकट्य हुआ।

इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि राजा भी धर्माचार्य और गुरु के मार्गदर्शन को स्वीकार करता था। 
राजसत्ता से बड़ा धर्म था और धर्म के मार्गदर्शक गुरु का स्थान राजदरबार में सर्वोपरि था।

गुरु वशिष्ठ का संबंध केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं था। 

वे रघुवंश की मर्यादा, राजधर्म और पारिवारिक संस्कारों के संरक्षक थे। 

श्रीराम के जीवन में गुरु की आज्ञा का महत्व इसी परंपरा से समझ में आता है।


प्राचीन अर्वाचीन विश्व हिन्दू सनातन संस्कृतिक कृतिओ 1



मंत्रियों और पुरोहितों में क्या अंतर था?


राजा के मंत्री और राजपुरोहित दोनों राज्य के लिए आवश्यक थे, लेकिन उनके कार्यों में अंतर था।

मंत्री: राजकीय नीति, प्रशासन, प्रजा के कार्य, राज्य की सुरक्षा और शासन व्यवस्था में राजा की सहायता करते थे।

राजपुरोहित: धर्म, यज्ञ, संस्कार, शास्त्रीय विधि और राजधर्म के विषय में राजा का मार्गदर्शन करते थे।

राजा को दोनों प्रकार के मार्गदर्शन की आवश्यकता थी। 

केवल प्रशासनिक बुद्धि से राज्य नहीं चलता और केवल धार्मिक अनुष्ठानों से भी राज्य की समस्त व्यवस्था नहीं चल सकती। 

धर्म और नीति का समन्वय ही उत्तम शासन का आधार था।

रामायण के बालकाण्ड के सप्तम सर्ग के श्लोक 1, 2 एवं 3 में ये बताया गया है कि महाराज दशरथ के कुल 8 मुख्य मंत्री थे। 

इनका नाम था - 


धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्र। 

इन में से सुमन्त्र सभी मंत्रियों के प्रधान थे। 

सभी मंत्री अलग- अलग विषयों में दक्ष थे। 

सुमन्त्र अर्थशास्त्र के प्रकाण्ड ज्ञाता थे। 

ऐसा कहा गया कि महाराज दशरथ अपने सात मंत्रियों से मंत्रणा कर फिर आमात्य सुमन्त्र के साथ अंतिम मंत्रणा करते थे और फिर निर्णय लेते थे। 

राजा दशरथ और गुरु वशिष्ठ का संबंध ;


श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में जब महाराज दशरथ श्रीराम का राज्याभिषेक करने का विचार करते हैं, तब गुरु वशिष्ठ और मंत्रियों के साथ परामर्श का प्रसंग आता है।

राजा दशरथ श्रीराम को युवराज बनाने का निर्णय लेते हैं। 

यह निर्णय केवल राजा की इच्छा नहीं था, बल्कि राजपरंपरा, योग्य उत्तराधिकारी और धर्मसम्मत शासन की दृष्टि से लिया गया था।

श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी होने लगी। 

अयोध्या में उत्सव का वातावरण था। 

श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर प्रजा प्रसन्न हुई। 

लेकिन आगे चलकर कैकेयी के वरदानों के कारण राज्याभिषेक रुक गया और श्रीराम को वनवास जाना पड़ा।

यह प्रसंग बताता है कि मनुष्य शुभ कार्य की तैयारी कर  सकता है, परंतु जीवन में परिस्थितियाँ बदल सकती हैं।  

धर्मनिष्ठ व्यक्ति को ऐसी स्थिति में भी मर्यादा का त्याग नहीं करना चाहिए।

आइये रामायण के इन तीनों श्लोकों को देख लेते हैं -


प्राचीन अर्वाचीन विश्व हिन्दू सनातन संस्कृतिक कृतिओ 1



तस्यामात्या गुणैरासन्निक्ष्वाकोः सुमहात्मनः।
 मन्त्रज्ञाश्चेङ्गितज्ञाश्च नित्यं प्रियहिते रताः॥1॥

अर्थात: 

इक्ष्वाकुवंशी वीर महामना महाराज दशरथ के मन्त्रिजनोचित गुणों से सम्पन्न आठ मन्त्री थे, जो मन्त्र के तत्त्व को जानने वाले और बाहरी चेष्टा देखकर ही मनके भावको समझ लेनेवाले थे। 

वे सदा ही राजाके प्रिय एवं हितमें लगे रहते थे।

शुभ मुहूर्त और विधि का विधान ;


शुभ मुहूर्त का महत्व वैदिक परंपरा में स्वीकार किया गया है। 

विवाह, यज्ञ, राज्याभिषेक और अन्य धार्मिक कार्यों के लिए उचित समय का विचार किया जाता है। 

ज्योतिषशास्त्र में तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण और लग्न का विचार करके मुहूर्त निर्धारित करने की परंपरा है।

लेकिन शुभ मुहूर्त का अर्थ यह नहीं कि उस समय किया गया प्रत्येक कार्य मनुष्य की इच्छा के अनुसार ही पूर्ण होगा। 

मुहूर्त कर्म के लिए अनुकूल समय प्रदान करता है। कर्म का फल धर्म, परिस्थिति, प्रारब्ध और अन्य कारणों से संबंधित होता है।

श्रीरामचरितमानस के अनुसार श्रीराम का राज्याभिषेक शुभ समय में करने की तैयारी हुई थी, लेकिन कैकेयी के वरदानों के कारण वह नहीं हो सका। 

इस प्रसंग को देखकर यह नहीं कहना चाहिए कि शुभ मुहूर्त व्यर्थ है। 

बल्कि यह समझना चाहिए कि मनुष्य को शुभ कर्म करना चाहिए और परिणाम को धर्म के अनुसार स्वीकार करना चाहिए।

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अष्टौ बभूवुर्वीरस्य तस्यामात्या यशस्विनः।
  शुचयश्चानुरक्ताश्च राजकृत्येषु नित्यशः॥2॥

अर्थात: 

इसी लिये उनका यश बहुत फैला हुआ था। 

वे सभी शुद्ध आचार विचार से युक्त थे और राजकीय कार्यों में निरन्तर संलग्न रहते थे।

श्रीराम का वनवास और राजधर्म ;


श्रीराम को वनवास की आज्ञा मिली। वे चाहते तो अपनी शक्ति से इस निर्णय का विरोध कर सकते थे, 

लेकिन उन्होंने पिता की आज्ञा और रघुकुल की मर्यादा को प्रधानता दी।

महाराज दशरथ के लिए यह अत्यंत दुःखद घटना थी। राजा अपने प्रिय पुत्र को वन भेजना नहीं चाहते थे। 

लेकिन श्रीराम ने पिता के वचन की रक्षा की।

श्रीरामचरितमानस में श्रीराम का वनगमन धर्म, सत्य और त्याग का महान उदाहरण है। 

यहाँ राजकुमार का कर्तव्य राजसिंहासन प्राप्त करना नहीं, बल्कि पिता के सत्यवचन की रक्षा करना बन जाता है।

यह प्रसंग राजधर्म का सर्वोच्च स्वरूप दिखाता है। 

राजा का पुत्र होने पर भी श्रीराम ने अपने निजी सुख को धर्म से ऊपर नहीं रखा।

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धृष्टिर्जयन्तो विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धनः ।
अकोपो धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चाष्टमोऽर्थवित्॥3॥

अर्थात: 

उनके नाम इस प्रकार हैं- 

धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और आठवें सुमन्त्र, जो अर्थशास्त्र के ज्ञाता थे।

इस के बाद अगले, अर्थात चौथे श्लोक में महाराज दशरथ के दो ऋत्विजों, अर्थात पुरोहितों के बारे में बताया गया है। 

रामायण के अनुसार महाराज दशरथ के दो पुरोहित थे ब्रह्मा पुत्र एवं सप्तर्षियों में से एक, महर्षि वशिष्ठ एवं महर्षि गौतम के पुत्र वामदेव। 

इन दोनों में महर्षि वशिष्ठ महाराज दशरथ के इक्षवाकु कुल के कुलगुरु भी थे और सूर्यकुल का कोई भी सम्राट बिना इनकी मंत्रणा के कोई निर्णय नहीं लेता था।

भरत और राज्य की मर्यादा ;


श्रीराम के वनवास के बाद भरत अयोध्या लौटे। 

उन्हें जब वनवास का समाचार मिला तो वे अत्यंत दुःखी हुए। 

उन्होंने राज्य को अपना अधिकार मानकर स्वीकार नहीं किया, बल्कि श्रीराम को वापस लाने के लिए वन की ओर प्रस्थान किया।

भरतजी ने श्रीराम से अयोध्या लौटने का आग्रह किया। 

श्रीराम ने पिता की आज्ञा और चौदह वर्ष के वनवास की प्रतिज्ञा का स्मरण कराया। 

तब भरतजी ने श्रीराम की पादुकाएँ लेकर उन्हें सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया।

इस प्रसंग में मंत्री और गुरु की भूमिका भी दिखाई देती है। 

राज्य के निर्णयों में गुरुजनों का मार्गदर्शन और राजपरिवार की मर्यादा महत्वपूर्ण थी। 

भरतजी का आचरण बताता है कि राजसत्ता का वास्तविक उद्देश्य व्यक्तिगत अधिकार नहीं, बल्कि धर्म और प्रजा का कल्याण है।

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ऋत्विजौ द्वावभिमतौ तस्यास्तामृषिसत्तमौ।
वसिष्ठो वामदेवश्च मन्त्रिणश्च तथापरे॥4॥

अर्थात: 

ऋषियों में श्रेष्ठतम वसिष्ठ और वामदेव - ये दो महर्षि राजा के माननीय ऋत्विज् ( पुरोहित ) थे।

इस के अगले श्लोक में छः ऐसे महान ऋषियों के बारे में बताया गया है जो महर्षि वशिष्ठ एवं वामदेव के अतिरिक्त उनके ऋत्विज एवं मंत्री पद पर आसीन थे। 

ये छः ऋषि थे - सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, मार्कण्डेय और कात्यायन।

राजपुरोहित का वास्तविक कार्य ;


राजपुरोहित राजा को धर्म के मार्ग पर बनाए रखने वाला होता है। 

वह राजा के कार्यों का धार्मिक और नैतिक परीक्षण करता है। 

यदि राजा किसी निर्णय में भ्रमित हो, तो पुरोहित शास्त्रसम्मत मार्गदर्शन देता है।

गुरु वशिष्ठ का स्थान इसी कारण महाराज दशरथ के राज्य में विशेष था। 

वे रघुकुल की परंपरा और धर्म के ज्ञाता थे। 

श्रीराम के जीवन में गुरु वशिष्ठ का सम्मान, गुरु - सेवा और गुरु की आज्ञा का पालन इसी परंपरा की देन है।

राजपुरोहित का महत्व केवल राज्याभिषेक या यज्ञ के समय नहीं होता। 

राज्य के समस्त महत्वपूर्ण धार्मिक और नैतिक निर्णयों में उसका मार्गदर्शन आवश्यक माना जाता था।

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आठ मंत्रियों का रहस्य ;


महाराज दशरथ के आठ मंत्रियों का उल्लेख यह दर्शाता है कि अयोध्या की राजव्यवस्था व्यवस्थित थी। 

राजा के पास राजकार्य में सहायता करने वाले योग्य व्यक्ति थे।

मंत्रियों की संख्या आठ होने से यह भी संकेत मिलता है कि शासन केवल राजा की व्यक्तिगत इच्छा पर आधारित नहीं था। 

राज्य के कार्यों में विचार - विमर्श और परामर्श की व्यवस्था थी।

हालाँकि श्रीरामचरितमानस में सभी मंत्रियों के नामों का विस्तृत परिचय नहीं दिया गया है, इस लिए उनके नामों की कल्पना करना शास्त्रोक्त नहीं होगा। 

जहाँ ग्रंथ संख्या बताता है, वहाँ संख्या को स्वीकार करना चाहिए और जहाँ नाम नहीं दिए गए हैं, वहाँ अनावश्यक नाम नहीं जोड़ने चाहिए।

सुयज्ञोऽप्यथ जाबालिः काश्यपोऽप्यथ गौतमः।
मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुस्तथा कात्यायनो द्विजः॥5॥

अर्थात: 

इनके सिवा सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, दीर्घायु मार्कण्डेय और विप्रवर कात्यायन भी महाराज के मन्त्री थे।

रामायण में ऐसा स्पष्ट रूप से वर्णित है कि महाराज अपने इन सभी मंत्रियों एवं ऋत्विजों की मंत्रणा के बिना जनता के हित में कोई निर्णय नहीं लिया करते थे। 

हालाँ कि इन सभी ऋषियों में भी महर्षि वशिष्ठ कुलगुरु होने के कारण प्रधान माने जाते थे।

 || इक्ष्वाकुवंशी वीर महामना महाराज दशरथ ||
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वाल्मीकि रामायण और श्रीरामचरितमानस

महाराज दशरथ के मंत्रियों और पुरोहितों के विषय में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि वाल्मीकि रामायण और श्रीरामचरितमानस दोनों में राजसभा का वर्णन मिलता है। 

वाल्मीकि रामायण में मंत्रियों की संख्या और उनके नामों का विस्तृत उल्लेख प्राप्त होता है। 

श्रीरामचरितमानस में भी आठ मंत्रियों का वर्णन मिलता है।

इसलिए यदि कोई व्यक्ति केवल श्रीरामचरितमानस के आधार पर प्रश्न पूछता है, तो उत्तर आठ मंत्री और दो प्रमुख राजपुरोहित है। 

यदि कोई वाल्मीकि रामायण के आधार पर विस्तृत नाम पूछता है, तो वहाँ अलग से मंत्रियों के नामों का अध्ययन करना चाहिए।

शास्त्रीय अध्ययन में ग्रंथों के भेद को समझना आवश्यक है। 

एक ग्रंथ में किसी विषय का संक्षिप्त वर्णन हो सकता है और दूसरे में उसी विषय का विस्तृत वर्णन। 

इससे किसी ग्रंथ का महत्व कम नहीं होता।


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इस प्रसंग से प्राप्त शिक्षा ;


महाराज दशरथ के मंत्री और पुरोहितों का प्रसंग हमें अनेक शिक्षाएँ देता है।

पहली शिक्षा है कि राजा को योग्य मंत्रियों और धर्मज्ञ गुरुजनों का मार्गदर्शन स्वीकार करना चाहिए।

दूसरी शिक्षा है कि राजधर्म में सत्य, न्याय और प्रजा-पालन का महत्व है।

तीसरी शिक्षा है कि शुभ मुहूर्त का विचार करना चाहिए, लेकिन परिणाम को लेकर अहंकार नहीं करना चाहिए।

चौथी शिक्षा है कि धर्म का पालन कठिन परिस्थिति में भी करना चाहिए।

पाँचवीं शिक्षा है कि गुरु का स्थान राजसत्ता से ऊपर है, क्योंकि गुरु धर्म का मार्ग दिखाता है।

छठी शिक्षा है कि राजकार्य में परामर्श, संयम और मर्यादा आवश्यक हैं।


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आज के जीवन में इस कथा का महत्व ;


आज भी मनुष्य को अपने जीवन में योग्य सलाहकारों और मार्गदर्शकों की आवश्यकता होती है। 

परिवार, व्यापार, समाज और धार्मिक जीवन में उचित निर्णय लेने के लिए विवेकपूर्ण परामर्श आवश्यक है।

महाराज दशरथ की राजव्यवस्था से यह शिक्षा मिलती है कि निर्णय लेने से पहले योग्य व्यक्तियों की सलाह लेनी चाहिए। 

गुरुजनों का सम्मान करना चाहिए और धर्म के अनुसार कार्य करना चाहिए।

यदि मनुष्य शुभ समय देखकर कोई कार्य करता है, तो उसे अपने कर्म को शुद्ध रखना चाहिए। 

केवल मुहूर्त पर निर्भर होकर कर्म की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। 

श्रीराम का जीवन बताता है कि धर्म, सत्य और मर्यादा ही मनुष्य के जीवन की वास्तविक शक्ति हैं।

निष्कर्ष;


श्रीरामचरितमानस के आधार पर महाराज दशरथ के आठ मंत्री और दो प्रमुख राजपुरोहितों का उल्लेख प्राप्त होता है। 

राजपुरोहितों में गुरु वशिष्ठ और गुरु वामदेव का स्थान विशेष है।

अयोध्या की राजव्यवस्था में मंत्री राजकार्य और प्रशासन में सहायता करते थे, जबकि पुरोहित धर्म, यज्ञ, संस्कार और राजधर्म के मार्गदर्शक थे। 

दोनों की संयुक्त भूमिका से राज्य की व्यवस्था चलती थी।

श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी और उसके बाद वनवास का प्रसंग यह सिखाता है कि शुभ मुहूर्त का विचार आवश्यक है, लेकिन धर्म और सत्य का पालन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। 

मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए और परिणाम को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करना चाहिए।

श्रीरामचरितमानस का संदेश यही है कि राजसत्ता, धन, सुख और अधिकार सब नश्वर हैं; धर्म, सत्य, मर्यादा और भगवान के चरणों की भक्ति ही जीवन का वास्तविक आधार है।
श्री सीतारामचन्द्रजी महाराज की जय। जय श्री तुलसीकृत रामायण।
!!!! शुभमस्तु !!!

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