सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। सुंदर कहानी ।।
इसे गोबर का कीड़ा कहते हैं ।
ये कीड़ा सुबह उठकर गोबर की तलाश में निकलता है ।
और दिन भर जहाँ से गोबर मिले उसका गोला बनाता रहता है ।
शाम होने तक अच्छा ख़ासा गोबर का गोला बना लेता है ।
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फिर इस गोबर के गोले को धक्का मारते हुए अपने बिल तक ले जाता है ।
बिल पर पहुँचकर उसे अहसास होता है ।
कि गोला तो बड़ा बना लिया लेकिन बिल का छेद तो छोटा है ।
बहुत कोशिश के बावजूद वो गोला बिल में नहीं जा सकता।
बहुत लोग गोबर के कीड़े की तरह ही हो गए हैं।
सारी ज़िन्दगी.....!
चोरी ।
मक्कारी ।
चालाकी ।
दूसरो को बेबकूफ बनाकर धन जमा करने में लगे रहते हैं ।
जब आखिरी वक़्त आता है ।
तब पता चलता है के ये सब तो साथ जा ही नहीं सकता ॥
जय श्री कृष्ण...!!!
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पैसे घर की इज्जत से बड़े नहीं ||
सम्मान और नैतिकता सबसे महत्वपूर्ण हैं...!
क्योंकि पैसा खो जाने पर दोबारा कमाया जा सकता है...!
लेकिन एक बार खोई हुई इज़्ज़त वापस पाना मुश्किल होता है।
इज़्ज़त अच्छे व्यवहार, संस्कारों और चरित्र से बनती है...!
जो पैसों से नहीं खरीदी जा सकती।
विजय अखबार पढ़ रहा था कि पड़ोसी आया और आकर बोला "एक खुश खबरी है।"
विजय बोला क्या?
पड़ोसी धीरे से मगर रहस्यमय अंदाज मे बोला तेरा भाई खेत बेच रहा है।
विजय ने पूछा क्यों?
ऐसी क्या मुसिबत आन पड़ी ?
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पड़ोसी अखबार बनता हुआ बोला जब तेरी भाभी बीमार पड़ी थी तब तेरे भाई ने साहूकार से खेत गिरवी रख कर दो लाख रुपये उधार लिए थे।
आज ब्याज सहित चार लाख हो गए है।
साहूकार ने आखरी चेतावनी दे रखी है।
खेत ही बेचना पड़ेगा।
अंदर से विजय की पत्नी सब सुन रही थी।
बाहर आकर बोली हम लोग अभी जिंदा है।
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ऐसा नही होने देगें। फिर वह भीतर गई और चार लाख रुपये विजय के सामने रखते हुए बोली मेरे पापा ने मेरे नाम एफ डी करवाई थी ये वो पैसे हैं।
जाकर घर की इज्जत बचाओ।
पैसे भाई से बड़े नही होते।
विजय बोला मगर मै क्यों जाऊँ?
भैया तो मुझसे बात ही नही करते।
और तुम ये कुर्बानी क्यों दे रही हो।
बिकने दो खेत, बिकता है तो।
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हमें क्या ?
पत्नी ने पड़ोसी को धक्का देकर कहा चल निकल यहाँ से चुगलखौर।
तुमने ही दोनों भाईयों के बीच दुश्मनी के बीज बोये है न ?
पड़ोसी पूँछ दबा कर भाग गया।
पत्नी ने पति की आँखों मे देखकर कहा खानदानी औरत हूँ।
मेरे बाप ने यही सिखाया है कि जब परिवार की इज्जत पर बात आये तब सारे मनमुटाव भूल कर एक हो जाना।
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जीवन मे कभी अकेली नही रहोगी।
फिर पति के हाथ पर पैसे रखे और हाथ पकड़ कर जेठ के घर ले गई।
दोनों ने देखा बड़ा भाई सिर पकड़े आंगन मे खटिया पर बैठा था।
छोटे भाई ने चुपचाप सारे पैसे भाई की गोद मे रख दिये।
फिर बोला इतनी बड़ी परेसानी मे गुजर रहे हो भैया।
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मुझे एक बार भी नही पुकारा ?
बड़ा भाई पैसों की तरफ देखते हुए बोला तुमहारे पास इतने पैसे कहाँ से आये ?
छोटा भाई अपनी पत्नी की तरफ इशारा करते हुए बोला आपकी बहु ने दिये है।
शादी के समय इसके पिता ने इसके नाम एफ डी करवाई थी।।
बड़े भाई ने बहु के सामने दोनों हाथ जोड़ दिये।
बोला बेटा, इतनी बड़ी रकम मै लौटा नही पाऊंगा।
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बहु घुंघट मे ही बोली मुझे नही चाहिए भैया।
आप रहन रखा खेत छुड़ा लो।
पैसे घर की इज्जत से बड़े नही होते बड़े भाई की आँखों मे आँसू बह निकले।
बोला तुम जैसी बीरबानी हर घर मे पैदा नही हो सकती।
मै तुम्हारे खानदान को नतमस्तक होकर प्रणाम करता हूँ।
इस के बाद बड़े भाई ने साहूकार का कर्जा भर दिया।
और दोनों भाई फिर से एक हो गए।
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जो भाई अपने भाई की बदनामी पर हँसता है।
उस से बड़ा कुलद्रोही कोई नही हो सकता है।
जो नारी ससुराल की इज्जत बचाने के लिए खुद आगे खड़ी हो जाए उससे बड़ी संस्कारवान नारी कोई नही हो सकती।
इस लिए भाई के गिरने का इंतजार मत करिये।
गिरते भाई को बचाने के लिए अपनी फौलादी भुजाएं फैला कर रखिये।
भाई गिरा तो कुल ही गिर जायेगा।
फिर तो तुम भी गिरे हुए कुल के कहलाओगे !!
घमंड का भ्रम और विश्वास की सच्ची शक्ति💐💐
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एक व्यक्ति को इस बात का अत्यधिक घमंड था कि उसके बिना उसका परिवार एक दिन भी जीवित नहीं रह सकता।
उसकी एक छोटी-सी किराने की दुकान थी, जिसकी कमाई से पूरे परिवार का पालन-पोषण होता था।
घर में वही एकमात्र कमाने वाला था, इसलिए उसके मन में यह दृढ़ विश्वास बैठ गया था कि यदि वह न रहे तो उसके परिवार के लोग भूखे मर जाएँगे।
एक दिन वह व्यक्ति एक पूर्ण संत के सत्संग में गया।
संत जी ने उसे देखते ही कहा—
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“यह सोचना कि तुम्हारे बिना तुम्हारा परिवार जीवित नहीं रह सकता, एक झूठा और व्यर्थ घमंड है।
इस संसार में सबको भोजन कराने वाला कोई मनुष्य नहीं, बल्कि परमात्मा स्वयं है।
वह तो पत्थरों के नीचे रहने वाले छोटे-छोटे जीवों तक को भोजन पहुँचाता है।”
संत जी की बात सुनकर उस व्यक्ति के मन में कई प्रश्न उठने लगे।
सत्संग समाप्त होने पर उसने कहा—
“मैं दिन-रात मेहनत करके जो धन कमाता हूँ, उसी से मेरे घर का खर्च चलता है।
यदि मैं न रहूँ, तो मेरे परिवार का क्या होगा?”
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संत जी ने स्नेहपूर्वक समझाया—
“बेटा, यह तुम्हारे मन का भ्रम है।
हर प्राणी अपने भाग्य का ही भोजन करता है।”
वह व्यक्ति बोला— “यदि ऐसा है, तो इसे सिद्ध करके दिखाइए।”
संत जी मुस्कराए और बोले—
“ठीक है, तुम बिना किसी को बताए एक महीने के लिए अपने घर से चले जाओ।
फिर स्वयं देख लेना।”
वह घबराया और बोला— “मेरे परिवार का ध्यान कौन रखेगा?”
संत जी ने कहा— “परमात्मा स्वयं सबका ध्यान रखता है।”
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वह व्यक्ति चुपचाप चला गया।
कुछ ही दिनों में गाँव में यह अफवाह फैल गई कि उसे शेर खा गया है।
परिवार वाले बहुत रोए, खोजबीन की, पर कोई पता न चला।
समय बीतने पर गाँव के भले लोगों ने सहायता का हाथ बढ़ाया।
एक सेठ ने उसके बड़े बेटे को नौकरी दे दी, गाँव वालों ने मिलकर बेटी का विवाह कर दिया और एक सज्जन ने छोटे बेटे की पढ़ाई का पूरा भार उठा लिया।
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एक महीने बाद वह व्यक्ति रात के अंधेरे में छिपते-छिपाते अपने घर लौटा।
पहले तो घर वालों ने उसे भूत समझकर दरवाज़ा नहीं खोला।
बहुत विनती करने पर जब उसने संत जी से हुई पूरी घटना बताई, तब उसकी पत्नी बोली—
“अब हमें तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं है।
हम पहले से अधिक सुखी हैं।”
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उसका सारा घमंड पल भर में चूर-चूर हो गया।
वह रोता हुआ संत जी के पास पहुँचा और क्षमा माँगने लगा।
संत जी ने करुणा से कहा—
“अब तुम्हें घर लौटने की क्या आवश्यकता है?
अपना शेष जीवन प्रभु की भक्ति और असहायों की सेवा में लगाओ।”
वह व्यक्ति संत जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला—
“आज से मैं घमंड नहीं, केवल सेवा और भक्ति का मार्ग अपनाऊँगा।”
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कहानी से शिक्षा :
इस संसार को चलाने वाला कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि परमात्मा है।
अपने धन, शक्ति, ज्ञान या पद का घमंड करना व्यर्थ है।
जब मनुष्य यह मान लेता है कि सब कुछ उसी के कारण चल रहा है, तभी उसका पतन शुरू हो जाता है।
सच्ची समझ यही है कि हम केवल माध्यम हैं, कर्ता नहीं।
घमंड छोड़कर विश्वास, भक्ति और सेवा का मार्ग अपनाने से ही जीवन सार्थक बनता है।
|| जय श्री कृष्ण...!!! ||
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बहुत सुंदर
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