भगवान विष्णु के श्रीमुख से सुने कौन है।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

भगवान विष्णु के श्रीमुख से सुने कौन है उन्हें सबसे अधिक प्रिय!!!!!!!


एक बार की बात है भगवान नारायण वैकुण्ठलोक में सोये हुए थे। 

उन्होंने स्वप्न में देखा कि करोड़ों चन्द्रमाओं की कांतिवाले, त्रिशूल - डमरू - धारी त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनंदित होकर उनके सामने नृत्य कर रहे हैं। 

उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष से गद्‍गद्‍ हो उठे और अचानक उठकर बैठ गए, और कुछ देर मग्न हो गए। 

उन्हें इस प्रकार बैठे देखकर श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगीं, भगवन! आपके इस प्रकार अचानक निद्रा से जापने का क्या कारण है?'' 







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भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रशन का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में निमग्न हुए चुप चाप बैठे रहे, कुछ देर बाद हर्षित होते हुए बोले, ``देवी, मैंने अभी स्वप्न में भगवान शंकर के दर्शन किए। 

उनकी छवि ऐसी आनंदमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी। 

मुझे एेसा लग रहा है कि, भोलेनाथ ने मुझे स्मरण किया है। 

चलो, कैलाश में चलकर हम लोग महादेव के दर्शन करते हैं।''

ऐसा विचार कर दोनों कैलाश की ओर चल दिए। 

भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलाश मार्ग के आधे दूर गए कि देखते हैं भगवान शंकर स्वयं पार्वती माता के साथ उनकी ओर चले आ रहे हैं। 

अब भगवान के आनंद का तो ठिकाना ही नहीं रहा। 

पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले। 

ऐसा लगा, मानों प्रेम और आनंद का समुद्र चारों ओर उमड़ पड़ा हो। 

एक - दूसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आनन्दाश्रु बहने लगे। 

दोनों ही एक - दूसरे से लिपटे हुए कुछ देर खड़े रहे। 

जब विष्णु भगवान ने शिव शंकर से पूछा तो मालूम हुआ कि शंकर जी को भी रात्रि में इसी प्रकार का स्वप्न हुआ कि मानों विष्णु भगवान को वे उसी रूप में देख रहे हैं, जिस रूप में अब उनके सामने खड़े थे।

दोनों के स्वप्न के वृत्तान्त से अवगत होने के बाद दोनों एक - दूसरे को अपने निवास ले जाने का आग्रह करने लगे। 

नारायण ने कहा कि वैकुण्ठ चलो और भोलेनाथ कहने लगे कि कैलाश की ओर प्रस्थान किया जाए। 

दोनों के आग्रह में इतना अलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहां चला जाए?

इतने में ही क्या देखते हैं कि वीणा बजाते, हरिगुण गाते नारद जी कहीं से आ निकले। 

बस, फिर क्या था? 

लगे दोनों उनसे निर्णय कराने कि कहां चला जाए ? 

बेचारे नारदजी तो स्वयं परेशान थे, उस अलौकिक - मिलन को देखकर। 

वे तो स्वयं अपनी सुध - बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनों का गुणगान करने। 

अब निर्णय कौन करे ? 

अंत में यह तय हुआ कि भगवती उमा जो कह दें, वही ठीक है। 

भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रहीं। 

अंत में वे दोनों की ओर मुख करते हुए बोलीं, "हे नाथ, हे नारायण, आप लोगों के निश्चल, अनन्य एवं अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ में आता है कि आपके निवास अलग - अलग नहीं हैं, जो कैलाश है, वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है, वही कैलाश है, केवल नाम में ही भेद है। 

यहीं नहीं, मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल शरीर देखने में दो हैं।"

मुझे तो स्पष्ट लग रहा है कि आपकी पत्नियां भी एक ही हैं। 

जो मैं हूं, वही लक्ष्मी हैं और जो लक्ष्मी हैं, वही मैं हूं। 

केवल इतना ही नहीं, मेरी तो अब यह दृढ़ धारणा हो गई है कि आप लोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है, वह मानों दूसरे के प्रति ही करता है। 

एक की जो पूजा करता है, वह मानों दूसरे की भी पूजा करता है। 

मैं तो तय समझती हूं कि आप दोनों में जो भेद मानता है, उसका चिरकाल तक घोर पतन होता है। 

मैं देखती हूं कि आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्रवंचना कर रहे हैं, मुझे असमंजस में डाल रहे हैं, मुझे भुला रहे हैं। 

अब मेरी यह प्रार्थना है कि आप लोग दोनों ही अपने - अपने लोक की ओर पधारिये। 

श्री विष्णु यह समझें कि हम शिव रूप में वैकुण्ठ जा रहे हैं और महेश्वर यह मानें कि हम विष्णु रूप में कैलाश-गमन कर रहे हैं।

इस उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा की प्रशंसा करते हुए, दोनों ने एक - दूसरे को प्रणाम किया और अत्यंत हर्षित होकर अपने - अपने लोक को प्रस्थान किया। 

लौटकर जब श्री विष्णु वैकुण्ठ पहुंचे तो श्रीलक्ष्मी जी ने उनसे प्रशन किया, "हे प्रभु, आपको सबसे अधिक प्रिय कौन है?'' 





भगवन बोले, "प्रिये, मेरे प्रियतम केवल श्रीशंकर हैं। 

देहधारियों को अपने देह की भांति वे मुझे अकारण ही प्रिय हैं। 

एक बार मैं और श्री शंकर दोनों पृथ्वी पर घूमने निकले। 

मैं अपने प्रियतम की खोज में इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज में देश - देशांतर में भटक रहा होगा, वही मुझे अकारण प्रिय होगा। 

थोड़ी देर के बाद मेरी श्री शंकर जी से भेंट हो गई। 

वास्तव में मैं ही जनार्दन हूं और मैं ही महादेव हूं। 

अलग - अलग दो घड़ों में रखे हुए जल की भांति मुझमें और उनमें कोई अंतर नहीं है। 

शंकरजी के अतिरिक्त शिव की चर्चा करने वाला शिवभक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है। 

इसके विपरीत जो शिव की पूजा नहीं करते, वे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते।''

इस तरह जो शिव की पूजा करता है वह वैकुंठवासी विष्णु को भी स्वीकार है और जो श्री विष्णु की वंदना करता है, वह त्रिपुरारी को भी मना लेता है।
जय श्री कृष्ण....!!!!

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

मानस चिंतन/ ब्रम्हाजी सप्तऋषियो को भेजें कहा भेजे ।

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जय द्वारकाधीश

।। सुंदर अच्छी कहानी ।।

🙏मानस चिंतन🙏 


ब्रम्हाजी सप्तऋषियो को भेजें कहा भेजे हिमालय जी के पास सप्तऋषि गए लग्न मुहूर्त निकाल कर लाए ब्रम्हाजी को दिए ब्रम्हाजी जोर जोर से पढ़ कर सुनाये।


 शिवपुराण के अनुसार शिवजी का विवाह की तिथि वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि दिन गुरुवार, लोक व्याहार में हम और आप शिवरात्रि के दिन मनाते हैं  परंतु स्कंदपूराण और शिवपुराण में तिथि वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि है। 




   

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तिथि आ गई विवाह का दिन भी आ गया तीन बज गए शाम के शिवजी कैलाश में बैठे अपने दो गणों के साथ कैलाश में शिवजी और उनके दो ही गण बैठे हैं नंदी,भृंगी । 

और देवता लोग अपने अपने लोक में क्या कर रहे हैं, बाबा कहते हैं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,दो॰ लगे संवारन सकल सुर वाहन बिबिध बिमान। 

होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान। 

देवता अपने अपने लोक में अपने अपने वाहन को नहाला रहे हैं किसको नहाला रहे हैं, भगवान विष्णु आज गरूड़जी को नहाला रहे हैं कहे बहुत गंदे हो गए हो आओ तुमको साफ करूं क्यो तुम पर ही बैठकर बराती बन के जाना है। 

इंद्र अपने ऐरावत को नहाला रहे हैं, कुबेरजी अपने पुष्पक विमान में फूल माला लगने लगे, यमराज अपने काले भैंसें को नहाला रहे हैं आ तुमको गोरा बना के छोड़े। 

सब अपने अपने वाहन को सजा रहे हैं परंतु कोई ये नहीं विचार कर रहा है कि दूल्हा को भी कोई सजाएगा कि नहीं सजाएगा। 

गणों ने कहा तीन बजने के बाद प्रभु एक भी देवता नहीं आए आज आपको बरात में दूल्हा बनना है,, शिवजी बोले बनना क्या है मैं दूल्हा बना बनाया हूं। 

गणों ने कहा नहीं प्रभु यहां कैलाश में तो केवल हम ही लोग रहते हैं, दूसरे के नगर जाना है यदि आप बूरा ना मानो तो आज हम आपको सजा दे ।           

गणों का मन रखने के लिए शिवजी ने अनुमति दे दी। 

अब देखिए हम जैसा रहेंगे वैसा ही सिंगार धारण करेंगे शिवजी का सिंगार कौन कर रहा है एक बैल शिवजी बैठ गए हैं, और शिवजी के गणों ने सजाना प्रारंभ किया आईये गोस्वामीजी पंक्ति में,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। 

जटा मुकुट अहि मौरु संवारा।‌

जटाओं का मुकुट बनाया इतना ही नहीं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। 

तन बिभूति पट केहरि छाला।

पूरे स्वारूप में दो ही सुन्दर है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। 

नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।।।।।गरल कंठ उर नर सिर माला। 

असिव बेष सिवधाम कृपाला।।।।कर त्रिशूल अरू डमरू बिराजा। 

चले बसहं चढि बाजहिं बाजा।

गणों ने सिंगार किया कैसे किया काम दहन के समय जो शिवजी की जटाएं बिखर गई थी नंदी ने उन्हीं जटाओं को समेट के सर पर मुकुट बना दिया कहा मुकुट बन गया।

भृंगी ने कहा नंदीजी जो दूल्हा होता है ओ मौर पहन के जाता है मौर कहे तो सहेरा , नंदी ने पूछा ये मौर कैसा होता है,, भृंगी ने कहा चेहरे के सामने लम्बी लम्बी लड़ियां लटकी होती है बस यही है।       

नंदी ने कहा अभी लाया मौर गया पच्चीस तीस पतले पतले सार्पो को पकड़ा सब के सर को उपर किया बांधा और लकर सार्पो का मौर शिवजी के जटाओं के मुकुट में पहना दिया। 

सार्पो का मूख ऊपर और उसके पूंछ शिवजी के सामने झुलने लगे कहा देखो मौर बन गया ‌। 

सार्पो का कुंडल छोटे छोटे सुंदर सुंदर रंग बिरंगी सार्पो को लेकर कान में जो मन किया लगा दिया। 

हाथों में और वासुकी महाराज को यज्ञोपवीत करके सीने में जनेऊ बना कर लगा दिया।

एक ने कहा दूल्हा तनिक बरात में जाता है तो पावडर लगाते हैं, गणों ने कहा अभी पावडर लाया दौड़ के चला शमशान ताजे ताजे राख को ला के शिवजी के ऊपर शरीर में लगा दिया। 

पहले से शिवजी गोरा है कपूर देखें है कपूर जितना गोरा होता है उतने गोरे शिवजी है। 

कर्पूर गौरं करूणा, कपूर के समान श्वेत वर्ण है शिवजी। 

एक ने कहा दूल्हा माला नहीं पहना है अब माला कहा मिले कैलाश में गण ने कहा रूको रूको माला भी लाता हूं...! 

गया शमशान फिर नर मूड लेकर आया और पतले सांप में गूंथ के पहना दिया शिवजी को । 

अब कल्पना करें दृश्य की जैसे जैसे सांप लहरें ले रहा है शिवजी के गले की माला भी लहरें ले रही होगी।  

     


नर मूड की माला त्रिनेत्र,गले में विष है, ललाट पर दूज का चंद्रमा,सिर पर गंगा है....!     

एक गण ने कहा शिवजी यहां पर तो हमें लोग हैं केवल आप दिगंबर बन के रहते हैं कोई बात नहीं,आज मेरी मानो तो कुछ पहन लिजिए...!         

शिवजी ने कहा क्या पहनाएंगे गण ने कहा कोई बात नहीं आप खड़े हो जाइए आप जिस बाघम्बर पर बैठे हैं इसी को पहना देता हूं।            

शिवजी खड़े हुए गणों ने बाघाम्बर को कमर में लपेट के सांप से बांध दिया एक हाथ में त्रिशूल एक हाथ में डमरू ले के शिवजी स्वयं बजाने लगे क्यो शिवजी ने अपने सिंगार को देखा तो सोचने लगे इतना सुंदर तो मैं कभी नहीं लगा।           

गणों ने क्या सिंगार किया है, शिवजी लगे डमरू बजाने ,,,,,,,,,,,,,,, कर त्रिशूल अरू डमरू बिराजा। 

चले बसहं चढि बाजहिं बाजा।

शिवजी और कैलाश में सिर्फ दो ही गण थे और दोनों शिवजी के साथ नाचने लगे,,,,,🙏

🌹जय श्री राम शिवजी,श्री गुरुदेव हनुमान जी🙏🙏🌹 जय श्री कृष्ण🌹

बलेदवदास जी महाराज : 


वृन्दावन में बलेदवदास जी महाराज हो गये। 

वे बहुत अच्छी सूझबूझ के धनी थे। 

वे सुबह तीन बजे उठते और वृन्दावन की प्रदक्षिणा करने के लिए निकल जाते तथा सूरज उगते - उगते वापस आते। 

एक दिन उन्होंने देखा कि कुछ लोग भंडारा कर रहे हैं। 

बलदेवदास जी बोलेः अरे ! 

इतनी जल्दी, अँधेरे में भंडारा, अभी तो सूरज भी नहीं उगा और इधर भंडारा हो रहा है, क्या बात है ? 

वे लोग बोलेः- 

महाराज ! आओ, आप भी पराँठा खा लो। 

मैं सूरज उगने के बाद, नियम आदि करके प्रसाद लेता हूँ।

सुबह- सुबह खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।

सुबह- सुबह मैं तुम्हारा पराँठा क्यों खाऊँगा, पराँठा तुम्हारा है लेकिन पेट तो हमारा है। 

महाराज खा लो, खा लो, बहुत बढ़िया है। 

उन लोगों ने बहुत हाथ - जोड़ी की, तो महाराज ने कंधे पर जो अँगोछा था, उसे आगे करके कहा इसमें बाँधकर दे दो। 

पत्तल आदि में पराँठा डालकर अँगोछे में बाँधकर महाराज को दे दिया कि ले जाओ, उधर खाना। 

पराँठा लेकर बलदेवदास जी महाराज पहुँच गये अपनी कुटिया पर, सूर्यनारायण उदय हुए। 

अपना नियम किया, तुलसी के पत्ते खाये, सूर्य की धूप में सूर्यस्नान किया, फिर वह अँगोछा उठाया, खोला तो पराँठा तो था लेकन पराँठे के अंदर माँस था। 

उनकी तो चीख निकल गयीः 

‘बाप रे ! 

माँस का पराँठा ! 

ऐ ! छीः ! छीः !! 

जैसे अंदर आलू डालकर पराँठा या विशेषप्रकार की मीठी रोटी बनाते हैं, ऐसे मांसपूड़ी बनायी गयी थी। 

सोचने लगे, भंडारा और मांस ! 

यह सब क्या है ? 

वे कौन हैं ? 

मैं उनसे पूछूँगा। 

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठे और उसी रास्ते से प्रदक्षिणा करते उधऱ पहुँचे। 

देखा तो उनका भंडारा चालू था। 

बोलेः- 

तुम तो कोई साधु जैसे, कोई पुजारी जैसे कपड़े पहनते हो लेकिन कल भंडारा किया तो हमको मांसवाली रोटी दी ! 

मैंने तो अँगोछा भी फेंक दिया।सच बताओ, तुम लोग कौन हो ? 

हिन्दू धर्म को भ्रष्ट करने के लिए ऐसा करने वाले तुम कोई विदेशी लोग हो कि कोई और हो ?

आजकल कई विदेशी लोग हिन्दू साधुओं जैसे कपड़े पहन कर घूमते हैं।

बोलो, तुम कौन हो ?

मुसलमान में से हिन्दू बने हो कि क्रिश्चियन में से हिन्दू बने हो? बोलेः-  

हम साधु नहीं हैं। 

हमने इस वृन्दावन जैसी जगह पर जरा साधु जैसे कपड़े धारण कर लिये हैं। 

हम तो भूत हैं भूत ! 

महाराज ने कहाः- 

इतने सारे? 

बोले हाँ, हम वृन्दावन में, भगवान के धाम में तो रहते थे लेकिन हमने तीर्थ में न करने जैसा काम किया - मांस आदि न खाने जैसा खाया, दान का माल हड़प किया, व्यभिचार किया, गड़बड़ी की, धर्म के नाम पर लोगों से धोखा किया, इस लिए हम प्रेत होकर भटक रहे हैं। 

सात महापुण्य क्षेत्रों में मरने पर यमदूत जीवात्मा को नरक में ले जाने के लिए नहीं आते, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन और द्वारिका। 

तो बाबा ! 

हमने पापकर्म तो नरक में जाने जैसे किये थे लेकिन स्थान के प्रभाव से यमदूत हमको नरक में नहीं ले जा सके, इस लिए हम प्रेत होकर इधर ही भटक रहे हैं। 

यह हम प्रेतों का भंडारा है।

अन्यक्षेत्रे कृतं पापं तीर्थक्षेत्रे विनश्यति।
  तीर्थक्षेत्रे कृतं पाप वज्रलेपो भशुविष्यति।।

और जगह किया हुआ पाप तीर्थक्षेत्र में जाओ तो मिट जाता है परंतु तीर्थक्षेत्र में किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है। 

मनुष्य न करने जैसे कर्म तो कर डालता है लेकिन जब कर्म फल देने को आता है तब दुःखी होता है, घबराता है,रोता है और तरह - तरह की नारकीय यातनाओं का शिकार बनता है। 

इस लिए कर्म करने में सदैव सावधान रहना चाहिए। 

         || वृंदावन बिहारी लाल की जय हो ||

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*परमात्मा ने जो दिया है*

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*परमात्मा ने जो दिया है*


*एक बहुत अरबपति महिला ने एक गरीब चित्रकार से अपना चित्र बनवाया, पोट्रट बनवाया।* 

चित्र बन गया, तो वह अमीर महिला अपना चित्र लेने आयी। 

वह बहुत खुश थी। 

चित्रकार से उसने कहा, कि क्या उसका पुरस्कार दूं?





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चित्रकार गरीब आदमी था।

 *गरीब आदमी वासना भी करे तो कितनी बड़ी करे, मांगे भी तो कितना मांगे?* 

हमारी मांग, सब गरीब आदमी की मांग है परमात्मा से। 

हम जो मांग रहे हैं, वहक्षुद्र है। 

जिससे मांग रहे हैं, उससे यह बात मांगनी नहीं चाहिए।

तो उसने सोचा मन में कि सौ डालर मांगूं, दो सौ डालर मांगूं, पांच सौ डालर मांगूं। 

*फिर उसकी हिम्मत डिगने लगी। 

इतना देगी, नहीं देगी!* 




फिर उसने सोचा कि बेहतर यह हो कि इसी पर छोड़ दूं, शायद ज्यादा दे। 

डर तो लगा मन में कि इस पर छोड़ दूं, पता नहीं दे या न दे, या कहीं कम दे और एक दफा छोड़ दिया तो फिर! 

*तो उसने फिर भी हिम्मत की। उसने कहा कि आपकी जो मर्जी। 

तो उसके हाथ में जो उसका बैग था, पर्स था, उसने कहा, तो अच्छा तो यह पर्स तुम रख लो। 

यह बडा कीमती पर्स है।* 

*पर्स तो कीमती था, लेकिन चित्रकार की छाती बैठ गयी कि पर्स को रखकर करूंगा भी क्या?* 

माना कि कीमती है और सुंदर है, पर इससे कुछ आता-जाता नहीं। 

इस से तो बेहतर था कुछ सौ डालर ही मांग लेते। 

तो उसने कहा, नहीं - नहीं, मैं पर्स का क्या करूंगा, आप कोई सौ डालर दे दें। 

*उस महिला ने कहा, तुम्हारी मर्जी। 

उसने पर्स खोला, उसमें एक लाख डालर थे, उसने सौ डालर निकाल कर चित्रकार को दे दिये* 

और पर्स लेकर वह चली गयी। 

सुना है कि चित्रकार अब तक छातीपीट रहा है और रो रहा है – मर गये, मारे गये, अपने से ही मारे गये! 

*आदमी करीब-करीब इस हालत में है। 

परमात्मा ने जो दिया है, वह बंद है, छिपा है।*

और हम मांगे जा रहे हैं – दो - दो पैसे, दो - दो कौड़ी की बात। 

और वह जीवन की जो संपदा उसने हमें दी है, उस पर्स को हमने खोल कर भी नहीं देखा है। 

*जो मिला है, वह जो आप मांग सकते हैं, उससे अनंत गुना ज्यादा है।* 

लेकिन मांग से फुरसत हो, तो दिखायी पड़े, वह जो मिला है।

जय श्री कृष्ण.......!!!



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चिड़िया की सीख :


एक समय की बात है. एक राज्य में एक राजा राज करता था। 

उसके महल में बहुत ख़ूबसूरत बगीचा था। 

बगीचे की देखरेख की ज़िम्मेदारी एक माली के कंधों पर थी. माली पूरा दिन बगीचे में रहता और पेड़ - पौधों की अच्छे से देखभाल किया करता था। 

राजा माली के काम से बहुत ख़ुश था।

बगीचे में एक अंगूर की एक बेल लगी हुई थी, जिसमें ढेर सारे अंगूर फले हुए थे। 

एक दिन एक चिड़िया बगीचे में आई।उनसे अंगूर की बेल पर फले अंगूर चखे । 

अंगूर स्वाद में मीठे थे. उस दिन के बाद से वह रोज़ बाग़ में आने लगी।

चिड़िया अंगूर की बेल पर बैठती और चुन - चुनकर सारे मीठे अंगूर खा लेती. खट्टे और अधपके अंगूर वह नीचे गिरा देती. चिड़िया की इस हरक़त पर माली को बड़ा क्रोध आता। 

वह उसे भगाने का प्रयास करता, लेकिन सफ़ल नहीं हो पाता।

बहुत प्रयासों के बाद भी जब माली चिड़िया को भगा पाने में सफ़ल नहीं हो पाया, तो राजा के पास चला गया। 

उसने राजा को चिड़िया की पूरी कारिस्तानी बता दी और बोला, “महाराज! चिड़िया में मुझे तंग कर दिया है।

उसे काबू में करना मेरे बस के बाहर है. अब आप ही कुछ करें।
 
राजा ने ख़ुद ही चिड़िया से निपटने का निर्णय किया।

अगले दिन वह बाग़ में गया और अंगूर की घनी बेल की आड़ में छुपकर बैठ गया।

रोज़ की तरह चिड़िया आई और अंगूर की बेल पर बैठकर अंगूर खाने लगी. अवसर पाकर राजा ने उसे पकड़ लिया।

चिड़िया ने राजा की पकड़ से आज़ाद होने का बहुत प्रयास किया, किंतु सब व्यर्थ रहा।

अंत में वह राजा से याचना करने लगी कि वो उसे छोड़ दें. राजा इसके लिए तैयार नहीं हुआ. तब चिड़िया बोली, “राजन, यदि तुम मुझे छोड़ दोगे, तो मैं तुम्हें ज्ञान की ४ बातें बताऊंगी।

राजा चिड़िया पर क्रोधित था. किंतु इसके बाद भी उसने यह बात मान ली और बोला, “ठीक है, पहले तुम मुझे ज्ञान की वो ४ बातें बताओ. उन्हें सुनने के बाद ही मैं तय करूंगा कि तुम्हें छोड़ना ठीक रहेगा या नहीं.”

चिड़िया बोली, “ठीक है राजन. तो सुनो. पहली बात, कभी किसी हाथ आये शत्रु को जाने मत दो।”

“ठीक है और दूसरी बात?” राजा बोला।

“दूसरी ये है कि कभी किसी असंभव बात पर यकीन मत करो.” चिड़िया बोली।

“तीसरी बात?”

“बीती बात पर पछतावा मत करो.”

“और चौथी बात।

“राजन! चौथी बात बड़ी गहरी है. मैं तुम्हें वो बताना तो चाहती हूँ, किंतु तुमनें मुझे इतनी जोर से जकड़ रखा है कि मेरा दम घुट रहा है. तुम अपनी पकड़ थोड़ी ढीली करो, तो मैं तुम्हें चौथी बात बताऊं.” चिड़िया बोली,

राजा ने चिड़िया की बात मान ली और अपनी पकड़ ढीली कर दी। 

पकड़ ढ़ीली होने पर चिड़िया राजा एक हाथ छूट गई और उड़कर पेड़ की ऊँची डाल पर बैठ गई. राजा उसे ठगा सा देखता रह गया।

पेड़ की ऊँची डाल पर बैठी चिड़िया बोली, “राजन! चौथी बात ये कि ज्ञान की बात सुनने भर से कुछ नहीं होता. उस पर अमल भी करना पड़ता है। 

अभी कुछ देर पहले मैंने तुम्हें ज्ञान की ३ बातें बताई, जिन्हें सुनकर भी आपने उन्हें अनसुना कर दिया। 

पहली बात मैंने आपसे ये कही थी कि हाथ में आये शत्रु को कभी मत छोड़ना. लेकिन आपने अपने हाथ में आये शत्रु अर्थात् मुझे छोड़ दिया। 

दूसरी बात ये थी कि असंभव बात पर यकीन मत करें. लेकिन जब मैंने कहा कि चौथी बात बड़ी गहरी है, तो आप मेरी बातों में आ गए। 

तीसरी बात मैंने आपको बताई थी कि बीती बात पर पछतावा न करें और देखिये, मेरे आपके चंगुल से छूट जाने पर आप पछता रहे हैं।

इतना कहकर चिड़िया वहाँ से उड़ गई और राजा हाथ मलता रह गया.

शिक्षा:-

मात्र ज्ञान अर्जित करने से कोई ज्ञानी नहीं बन जाता. ज्ञानी वो होता है, जो अर्जित ज्ञान पर अमल करता है।

जीवन में जो बीत गया,उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं, किंतु वर्तमान हमारे हाथों में हैं।

आज का वर्तमान कल के भविष्य कल का निर्माण करेगा।

इस लिए वर्तमान में रहकर कर्म करें और अपना भविष्य बनायें..!!

!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . ‪‪+ 91- 7010668409‬‬ / ‪‪+ 91- 7598240825‬‬ ( तमिलनाडु )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

कलियुग का लक्ष्मण " ? "

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

कलियुग का लक्ष्मण :


" भैया, परसों नये मकान पे हवन है। 

छुट्टी ( इतवार ) का दिन है। 

आप सभी को आना है, मैं गाड़ी भेज दूँगा।" 

छोटे भाई लक्ष्मण ने बड़े भाई भरत से मोबाईल पर बात करते हुए कहा।






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" क्या छोटे, किराये के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो ?"

" नहीं भैया, ये अपना मकान है, किराये का नहीं ।"

" अपना मकान", भरपूर आश्चर्य के साथ भरत के मुँह से निकला।

"छोटे तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।"

" बस भैया ", कहते हुए लक्ष्मण ने फोन काट दिया।

" अपना मकान" , " बस भैया " ये शब्द भरत के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रहे थे।

भरत और लक्ष्मण दो सगे भाई और उन दोनों में उम्र का अंतर था करीब पन्द्रह साल। 

लक्ष्मण जब करीब सात साल का था तभी उनके माँ - बाप की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। 

अब लक्ष्मण के पालन - पोषण की सारी जिम्मेदारी भरत पर थी। 

इस चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली कि जिससे लक्ष्मण की देख - रेख ठीक से हो जाये।

प्राईवेट कम्पनी में क्लर्क का काम करते भरत की तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराये के मकान और लक्ष्मण की पढ़ाई व रहन - सहन में खर्च हो जाता। 

इस चक्कर में शादी के कई साल बाद तक भी भरत ने बच्चे पैदा नहीं किये। 

जितना बड़ा परिवार उतना ज्यादा खर्चा। 

पढ़ाई पूरी होते ही लक्ष्मण की नौकरी एक अच्छी कम्पनी में लग गयी और फिर जल्द शादी भी हो गयी। 

बड़े भाई के साथ रहने की जगह कम पड़ने के कारण उसने एक दूसरा किराये का मकान ले लिया। 

वैसे भी अब भरत के पास भी दो बच्चे थे, लड़की बड़ी और लड़का छोटा।

मकान लेने की बात जब भरत ने अपनी बीबी को बताई तो उसकी आँखों में आँसू आ गये। 

वो बोली, " देवर जी के लिये हमने क्या नहीं किया। 

कभी अपने बच्चों को बढ़िया नहीं पहनाया। 

कभी घर में महँगी सब्जी या महँगे फल नहीं आये। 

दुःख इस बात का नहीं कि उन्होंने अपना मकान ले लिया, दुःख इस बात का है कि ये बात उन्होंने हम से छिपा के रखी।"

इतवार की सुबह लक्ष्मण द्वारा भेजी गाड़ी, भरत के परिवार को लेकर एक सुन्दर से मकान के आगे खड़ी हो गयी। 

मकान को देखकर भरत के मन में एक हूक सी उठी। 

मकान बाहर से जितना सुन्दर था अन्दर उससे भी ज्यादा सुन्दर। 

हर तरह की सुख - सुविधा का पूरा इन्तजाम। 

उस मकान के दो एक जैसे हिस्से देखकर भरत ने मन ही मन कहा, " देखो छोटे को अपने दोनों लड़कों की कितनी चिन्ता है। 

दोनों के लिये अभी से एक जैसे दो हिस्से ( portion ) तैयार कराये हैं। 

पूरा मकान सवा - डेढ़ करोड़ रूपयों से कम नहीं होगा। 

और एक मैं हूँ, जिसके पास जवान बेटी की शादी के लिये लाख - दो लाख रूपयों का इन्तजाम भी नहीं है।"





मकान देखते समय भरत की आँखों में आँसू थे जिन्हें उन्होंने बड़ी मुश्किल से बाहर आने से रोका। 

तभी पण्डित जी ने आवाज लगाई, " हवन का समय हो रहा है, मकान के स्वामी हवन के लिये अग्नि - कुण्ड के सामने बैठें।"

लक्ष्मण के दोस्तों ने कहा,

 " पण्डित जी तुम्हें बुला रहे हैं।" 

यह सुन लक्ष्मण बोले, " इस मकान का स्वामी मैं अकेला नहीं, मेरे बड़े भाई भरत भी हैं। 

आज मैं जो भी हूँ सिर्फ और सिर्फ इनकी बदौलत। 

इस मकान के दो हिस्से हैं, एक उनका और एक मेरा।"

हवन कुण्ड के सामने बैठते समय लक्ष्मण ने भरत के कान में फुसफुसाते हुए कहा, 

" भैया, बिटिया की शादी की चिन्ता बिल्कुल न करना। उसकी शादी हम दोनों मिलकर करेंगे ।"

पूरे हवन के दौरान भरत अपनी आँखों से बहते पानी को पोंछ रहे थे, जबकि हवन की अग्नि में धुँए का नामोनिशान न था ।

भरत जैसे आज भी मिल जाते हैं इन्सान पर लक्ष्मण जैसे बिरले ही मिलते इस जहान...!

जय श्री कृष्ण.....!

||श्रीमद् आद्य शंकराचार्यविरचितम् ||

            गुर्वाष्टकम्

शरीरं सुरुपं तथा वा कलत्रं
यशश्चारू चित्रं धनं मेरुतुल्यम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।1।।

यदि शरीर रुपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तरित हो, मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ ।

कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं
गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।2।।

सुन्दरी पत्नी, धन, पुत्र - पौत्र, घर एवं स्वजन आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हो किंतु गुरु के श्रीचरणों में मन की आसक्ति न हो तो इस प्रारब्ध - सुख से क्या लाभ?

षडंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या
कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।3।।

वेद एवं षटवेदांगादि शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, जिनमें सुन्दर काव्य - निर्माण की प्रतिभा हो, किंतु उसका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ?

विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः
सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।4।।

जिन्हें विदेशों में समादर मिलता हो, अपने देश में जिनका नित्य जय - जयकार से स्वागत किया जाता हो और जो सदाचार - पालन में भी अनन्य स्थान रखता हो, यदि उसका भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति अनासक्त हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ?

क्षमामण्डले भूपभूपालवृन्दैः
सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।5।।

जिन महानुभाव के चरणकमल पृथ्वीमण्डल के राजा - महाराजाओं से नित्य पूजित रहा करते हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्री चरणों में आसक्त न हो तो इसे सदभाग्य से क्या लाभ?

यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्
जगद्वस्तु सर्वं करे सत्प्रसादात्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।6।।

दानवृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति दिगदिगान्तरों में व्याप्त हो, अति उदार गुरु की सहज कृपादृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख - ऐश्वर्य हस्तगत हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों में आसक्तिभाव न रखता हो तो इन सारे ऐश्वर्यों से क्या लाभ?

न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ
न कान्तासुखे नैव वित्तेषु चित्तम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।7।।

जिनका मन भोग, योग, अश्व, राज्य, धनोपभोग और स्त्रीसुख से कभी विचलित न हुआ हो, फिर भी गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाया हो तो इस मन की अटलता से क्या लाभ?

अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये
न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्घ्ये।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।8।।

जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में, अपने कार्य या शरीर में तथा अमूल्य भंडार में आसक्त न हो, पर गुरु के श्रीचरणों में भी यदि वह मन आसक्त न हो पाये तो उसकी सारी अनासक्तियों का क्या लाभ?

अनर्घ्याणि रत्नादि मुक्तानि सम्यक्
समालिंगिता कामिनी यामिनीषु।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्।।9।।

अमूल्य मणि - मुक्तादि रत्न उपलब्ध हो, रात्रि में समलिंगिता विलासिनी पत्नी भी प्राप्त हो, फिर भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाये तो इन सारे ऐश्वर्य - भोगादि सुखों से क्या लाभ?

गुरोरष्टकं यः पठेत्पुण्यदेही
यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही।
लभेत् वांछितार्थ पदं ब्रह्मसंज्ञं
गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम्।।10।।
   
जो यती, राजा, ब्रह्मचारी एवं गृहस्थ इस गुरु - अष्टक का पठन-पाठन करता है और जिसका मन गुरु के वचन में आसक्त है, वह पुण्यशाली शरीरधारी अपने इच्छितार्थ एवं ब्रह्मपद इन दोनों को सम्प्राप्त कर लेता है यह निश्चित है।

      || ॐ श्री गुरू चरण कमलेभ्यो नम ||

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

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-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
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।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

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