सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। सुंदर अच्छी कहानी ।।
🙏मानस चिंतन🙏
ब्रम्हाजी सप्तऋषियो को भेजें कहा भेजे हिमालय जी के पास सप्तऋषि गए लग्न मुहूर्त निकाल कर लाए ब्रम्हाजी को दिए ब्रम्हाजी जोर जोर से पढ़ कर सुनाये।
शिवपुराण के अनुसार शिवजी का विवाह की तिथि वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि दिन गुरुवार, लोक व्याहार में हम और आप शिवरात्रि के दिन मनाते हैं परंतु स्कंदपूराण और शिवपुराण में तिथि वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि है।
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तिथि आ गई विवाह का दिन भी आ गया तीन बज गए शाम के शिवजी कैलाश में बैठे अपने दो गणों के साथ कैलाश में शिवजी और उनके दो ही गण बैठे हैं नंदी,भृंगी ।
और देवता लोग अपने अपने लोक में क्या कर रहे हैं, बाबा कहते हैं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,दो॰ लगे संवारन सकल सुर वाहन बिबिध बिमान।
होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान।
देवता अपने अपने लोक में अपने अपने वाहन को नहाला रहे हैं किसको नहाला रहे हैं, भगवान विष्णु आज गरूड़जी को नहाला रहे हैं कहे बहुत गंदे हो गए हो आओ तुमको साफ करूं क्यो तुम पर ही बैठकर बराती बन के जाना है।
इंद्र अपने ऐरावत को नहाला रहे हैं, कुबेरजी अपने पुष्पक विमान में फूल माला लगने लगे, यमराज अपने काले भैंसें को नहाला रहे हैं आ तुमको गोरा बना के छोड़े।
सब अपने अपने वाहन को सजा रहे हैं परंतु कोई ये नहीं विचार कर रहा है कि दूल्हा को भी कोई सजाएगा कि नहीं सजाएगा।
गणों ने कहा तीन बजने के बाद प्रभु एक भी देवता नहीं आए आज आपको बरात में दूल्हा बनना है,, शिवजी बोले बनना क्या है मैं दूल्हा बना बनाया हूं।
गणों ने कहा नहीं प्रभु यहां कैलाश में तो केवल हम ही लोग रहते हैं, दूसरे के नगर जाना है यदि आप बूरा ना मानो तो आज हम आपको सजा दे ।
गणों का मन रखने के लिए शिवजी ने अनुमति दे दी।
अब देखिए हम जैसा रहेंगे वैसा ही सिंगार धारण करेंगे शिवजी का सिंगार कौन कर रहा है एक बैल शिवजी बैठ गए हैं, और शिवजी के गणों ने सजाना प्रारंभ किया आईये गोस्वामीजी पंक्ति में,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा।
जटा मुकुट अहि मौरु संवारा।
जटाओं का मुकुट बनाया इतना ही नहीं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, कुंडल कंकन पहिरे ब्याला।
तन बिभूति पट केहरि छाला।
पूरे स्वारूप में दो ही सुन्दर है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ससि ललाट सुंदर सिर गंगा।
नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।।।।।गरल कंठ उर नर सिर माला।
असिव बेष सिवधाम कृपाला।।।।कर त्रिशूल अरू डमरू बिराजा।
चले बसहं चढि बाजहिं बाजा।
गणों ने सिंगार किया कैसे किया काम दहन के समय जो शिवजी की जटाएं बिखर गई थी नंदी ने उन्हीं जटाओं को समेट के सर पर मुकुट बना दिया कहा मुकुट बन गया।
भृंगी ने कहा नंदीजी जो दूल्हा होता है ओ मौर पहन के जाता है मौर कहे तो सहेरा , नंदी ने पूछा ये मौर कैसा होता है,, भृंगी ने कहा चेहरे के सामने लम्बी लम्बी लड़ियां लटकी होती है बस यही है।
नंदी ने कहा अभी लाया मौर गया पच्चीस तीस पतले पतले सार्पो को पकड़ा सब के सर को उपर किया बांधा और लकर सार्पो का मौर शिवजी के जटाओं के मुकुट में पहना दिया।
सार्पो का मूख ऊपर और उसके पूंछ शिवजी के सामने झुलने लगे कहा देखो मौर बन गया ।
सार्पो का कुंडल छोटे छोटे सुंदर सुंदर रंग बिरंगी सार्पो को लेकर कान में जो मन किया लगा दिया।
हाथों में और वासुकी महाराज को यज्ञोपवीत करके सीने में जनेऊ बना कर लगा दिया।
एक ने कहा दूल्हा तनिक बरात में जाता है तो पावडर लगाते हैं, गणों ने कहा अभी पावडर लाया दौड़ के चला शमशान ताजे ताजे राख को ला के शिवजी के ऊपर शरीर में लगा दिया।
पहले से शिवजी गोरा है कपूर देखें है कपूर जितना गोरा होता है उतने गोरे शिवजी है।
कर्पूर गौरं करूणा, कपूर के समान श्वेत वर्ण है शिवजी।
एक ने कहा दूल्हा माला नहीं पहना है अब माला कहा मिले कैलाश में गण ने कहा रूको रूको माला भी लाता हूं...!
गया शमशान फिर नर मूड लेकर आया और पतले सांप में गूंथ के पहना दिया शिवजी को ।
अब कल्पना करें दृश्य की जैसे जैसे सांप लहरें ले रहा है शिवजी के गले की माला भी लहरें ले रही होगी।
नर मूड की माला त्रिनेत्र,गले में विष है, ललाट पर दूज का चंद्रमा,सिर पर गंगा है....!
एक गण ने कहा शिवजी यहां पर तो हमें लोग हैं केवल आप दिगंबर बन के रहते हैं कोई बात नहीं,आज मेरी मानो तो कुछ पहन लिजिए...!
शिवजी ने कहा क्या पहनाएंगे गण ने कहा कोई बात नहीं आप खड़े हो जाइए आप जिस बाघम्बर पर बैठे हैं इसी को पहना देता हूं।
शिवजी खड़े हुए गणों ने बाघाम्बर को कमर में लपेट के सांप से बांध दिया एक हाथ में त्रिशूल एक हाथ में डमरू ले के शिवजी स्वयं बजाने लगे क्यो शिवजी ने अपने सिंगार को देखा तो सोचने लगे इतना सुंदर तो मैं कभी नहीं लगा।
गणों ने क्या सिंगार किया है, शिवजी लगे डमरू बजाने ,,,,,,,,,,,,,,, कर त्रिशूल अरू डमरू बिराजा।
चले बसहं चढि बाजहिं बाजा।
शिवजी और कैलाश में सिर्फ दो ही गण थे और दोनों शिवजी के साथ नाचने लगे,,,,,🙏
🌹जय श्री राम शिवजी,श्री गुरुदेव हनुमान जी🙏🙏🌹 जय श्री कृष्ण🌹
बलेदवदास जी महाराज :
वृन्दावन में बलेदवदास जी महाराज हो गये।
वे बहुत अच्छी सूझबूझ के धनी थे।
वे सुबह तीन बजे उठते और वृन्दावन की प्रदक्षिणा करने के लिए निकल जाते तथा सूरज उगते - उगते वापस आते।
एक दिन उन्होंने देखा कि कुछ लोग भंडारा कर रहे हैं।
बलदेवदास जी बोलेः अरे !
इतनी जल्दी, अँधेरे में भंडारा, अभी तो सूरज भी नहीं उगा और इधर भंडारा हो रहा है, क्या बात है ?
वे लोग बोलेः-
महाराज ! आओ, आप भी पराँठा खा लो।
मैं सूरज उगने के बाद, नियम आदि करके प्रसाद लेता हूँ।
सुबह- सुबह खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।
सुबह- सुबह मैं तुम्हारा पराँठा क्यों खाऊँगा, पराँठा तुम्हारा है लेकिन पेट तो हमारा है।
महाराज खा लो, खा लो, बहुत बढ़िया है।
उन लोगों ने बहुत हाथ - जोड़ी की, तो महाराज ने कंधे पर जो अँगोछा था, उसे आगे करके कहा इसमें बाँधकर दे दो।
पत्तल आदि में पराँठा डालकर अँगोछे में बाँधकर महाराज को दे दिया कि ले जाओ, उधर खाना।
पराँठा लेकर बलदेवदास जी महाराज पहुँच गये अपनी कुटिया पर, सूर्यनारायण उदय हुए।
अपना नियम किया, तुलसी के पत्ते खाये, सूर्य की धूप में सूर्यस्नान किया, फिर वह अँगोछा उठाया, खोला तो पराँठा तो था लेकन पराँठे के अंदर माँस था।
उनकी तो चीख निकल गयीः
‘बाप रे !
माँस का पराँठा !
ऐ ! छीः ! छीः !!
जैसे अंदर आलू डालकर पराँठा या विशेषप्रकार की मीठी रोटी बनाते हैं, ऐसे मांसपूड़ी बनायी गयी थी।
सोचने लगे, भंडारा और मांस !
यह सब क्या है ?
वे कौन हैं ?
मैं उनसे पूछूँगा।
दूसरे दिन सुबह जल्दी उठे और उसी रास्ते से प्रदक्षिणा करते उधऱ पहुँचे।
देखा तो उनका भंडारा चालू था।
बोलेः-
तुम तो कोई साधु जैसे, कोई पुजारी जैसे कपड़े पहनते हो लेकिन कल भंडारा किया तो हमको मांसवाली रोटी दी !
मैंने तो अँगोछा भी फेंक दिया।सच बताओ, तुम लोग कौन हो ?
हिन्दू धर्म को भ्रष्ट करने के लिए ऐसा करने वाले तुम कोई विदेशी लोग हो कि कोई और हो ?
आजकल कई विदेशी लोग हिन्दू साधुओं जैसे कपड़े पहन कर घूमते हैं।
बोलो, तुम कौन हो ?
मुसलमान में से हिन्दू बने हो कि क्रिश्चियन में से हिन्दू बने हो? बोलेः-
हम साधु नहीं हैं।
हमने इस वृन्दावन जैसी जगह पर जरा साधु जैसे कपड़े धारण कर लिये हैं।
हम तो भूत हैं भूत !
महाराज ने कहाः-
इतने सारे?
बोले हाँ, हम वृन्दावन में, भगवान के धाम में तो रहते थे लेकिन हमने तीर्थ में न करने जैसा काम किया - मांस आदि न खाने जैसा खाया, दान का माल हड़प किया, व्यभिचार किया, गड़बड़ी की, धर्म के नाम पर लोगों से धोखा किया, इस लिए हम प्रेत होकर भटक रहे हैं।
सात महापुण्य क्षेत्रों में मरने पर यमदूत जीवात्मा को नरक में ले जाने के लिए नहीं आते, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन और द्वारिका।
तो बाबा !
हमने पापकर्म तो नरक में जाने जैसे किये थे लेकिन स्थान के प्रभाव से यमदूत हमको नरक में नहीं ले जा सके, इस लिए हम प्रेत होकर इधर ही भटक रहे हैं।
यह हम प्रेतों का भंडारा है।
अन्यक्षेत्रे कृतं पापं तीर्थक्षेत्रे विनश्यति।
तीर्थक्षेत्रे कृतं पाप वज्रलेपो भशुविष्यति।।
और जगह किया हुआ पाप तीर्थक्षेत्र में जाओ तो मिट जाता है परंतु तीर्थक्षेत्र में किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है।
मनुष्य न करने जैसे कर्म तो कर डालता है लेकिन जब कर्म फल देने को आता है तब दुःखी होता है, घबराता है,रोता है और तरह - तरह की नारकीय यातनाओं का शिकार बनता है।
इस लिए कर्म करने में सदैव सावधान रहना चाहिए।
|| वृंदावन बिहारी लाल की जय हो ||
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , Nr. V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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