।। श्रीमद देवीभागवत प्रवचन ।।दुर्गा सप्तशती के अगियार में अध्याय के मंगला चरण में ही श्री भगवती भुवनेश्वरी का ध्यान इस प्रकार वर्णित है ।' में भुवनेश्वरी देविका ध्यान करता हु ।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीमद देवीभागवत प्रवचन ।।

दुर्गा सप्तशती के अगियार में अध्याय के मंगला चरण में ही श्री भगवती भुवनेश्वरी का ध्यान इस प्रकार वर्णित है ।

' में भुवनेश्वरी देविका ध्यान करता हु ।

उनके अंगों की शोभा प्रातःकालके सूर्यदेवके समान अरुणाभ है ।

उनके मस्तक पर चंद्रमा काम अकूत है ।

तीन नेत्रों से युक्त देवी के मुख पर मुस्कान की छटा छाई रहती है ।

उनके हाथों में पाश , अंकुश , वरद  एवं अभय मुंद्रा शोभा पाते है ।'

श्रीमद देवी भागवत में वर्णित मणिद्वीप की अधिष्ठात्री देवी हल्लेखा ( ह्रीं ) मंत्र की स्वरूप शक्ति और सृष्टिक्रम में महालक्ष्मी स्वरूपा----

आदिशक्ति भगवती भुवनेश्वरी भगवान शिवजी के समस्त लीला-विलास की सहचरी है ।

जगदम्बा भुवनेश्वरी का स्वरूप सौम्य और अंगकान्ति अरुण है ।

भक्तों का अभय और समस्त सिद्धियां प्रदान करना इनका स्वभाविक गुण है ।

दशमहाविद्याओं में ये पांचवे स्थान पर परिगणित है ।

श्रीश्रीमद देवीभागवत पुराण के अनुसार मूल प्रकृतिका दुशरा नाम ही श्री भुवनेश्वरी है ।

ईश्वररात्री में जब ईश्वर के झदुप व्यवहार का लोप हो जाता है , उस समय केवल ब्रह्म अपनी अव्यक्त प्रकृति के साथ शेष रहता है , तब ईश्वररात्री की अधिष्ठात्री देवी श्री भुवनेश्वरी कहलाती है ।

अंकुश और पांश इनके आयुध है ।

अंकुश नियंत्रण का प्रतीक है और पांश राग अथवा आशक्तिका प्रतीक है ।

इस प्रकार सर्वरूपा मूल प्रकृति ही श्री भुवनेश्वरी है , जो विश्वव को वमन करनेके वमा, शिवमयी होने से ज्येष्ठा तथा कर्म - नियंत्रण , फलदान और जीवोंको दण्डित करनेके कारण रौद्री कही जाती है ।

श्री भगवान शिवजी के वाम भाग ही श्री भुवनेश्वरी कहलाता है ।

श्री भुवनेश्वरी के संग से ही भुवनेश्वर सदा शिवजी को सर्वेश होने की योग्यता प्राप्त होती है ।

महानिर्वाणतंत्र के अनुसार सम्पूर्ण महाविधाए श्री भगवती भुवनेश्वरी की सेवामे सदा संलग्न रहती है । 

सात करोड़ महामंत्र इनकी सदा आराधना करते है ।
दशमहाविधाए ही दस सोपान है ।

काली तत्व से निर्गत होकर कमला तत्वतक्की दस स्थितियां है , जिनसे अव्यक्त श्री भुवनेश्वरी व्यक्त होकर ब्रह्माण्ड का रूप धारण कर शक्ति है , तथा प्रलय में कमलासे अर्थात व्यक्त जगत से क्रमशः लय होकर कालीरूप में मूल प्रकृति बन जाती है ।

इस लिए इन्हें कालकी जन्मदात्री भी कहा जाता है ।

इस प्रकार बृहन्नीलतन्त्र की यह धारण पुराणों के विवरणों में भी पुष्ट होती है कि प्रकारान्तरसे काली और भुवनेशी दोनों में अभेद है ।

अव्यक्त प्रकृति श्री भुवनेश्वरी ही रक्तवर्णा काली है ।
श्रीश्रीमददेवी भागवत के अनुसार दुर्गम नामक दैत्य के अत्याचार से सन्तप्त होकर देवताओं और ब्राह्मणों ने हिमालय पर सर्वकारणस्वरूपा श्री भुवनेश्वरी की ही आराधना की थी ।

उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवती श्री भुवनेश्वरी तत्काल प्रकट हो गयी ।

वे अपने हाथों में बाण , कमल -पुष्प तथा शाक - मूल लिए हुए थे ।

उन्हों ने अपने नेत्रों से अश्रुजलकी सहस्त्रो धराए प्रकट की ।

इस जल से भूमण्डल के सभी प्राणी तृप्त हो गए ।

समुन्द्र तथा सरिताओं में अगाध जल भर गया और समस्त औषधिया सींच गयी ।

अपने हाथों में लिए गए शांको और फूल-मूल से प्राणियों का पौषण करनेके कारण श्री भगवती भुवनेश्वरी ही ' शताक्षी ' तथा ' शाकम्भरी ' नाम से विख्यात हुई ।

इन्हों ने ही दुर्गमासुरो को युद्ध मे मारकर उसके द्वारा अपहृत वेदोंको देवताओं को पुनः सोपा था ।

उसके बाद भगवती भुवनेश्वरी का एक नाम दुर्गा प्रसिद्ध हुवा ।

श्री भगवती भुवनेश्वरी की उपासना पुत्र - प्राप्ति , घर मे सुख शांति , शत्रुओं के रक्षण हेतु विशेष फलप्रदा है ।

रुद्रयामल में इनका स्तोत्र, कवच, नीलसरस्वती तन्त्र में हृदय सहस्त्र पाठ तथा  महातन्त्रणार्णव में सहस्त्र नाम संकलित है ।

श्री भुवनेश्वरी शक्तिपीठ कांचीपुरम तमिलनाडु और गोंडल गुजरात मे स्थित है ।
🌹जय माँ अंबे 🌹
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

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