।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

श्री रामचरित्रमानस प्रवचन 

खुद  पर  भरोसे  का  अचूक  मंत्र......

जामवंत जी ने हनुमान जी से ऐसा क्या कहा था जो आज के युवाओं के लिए सबसे बड़ा 'आत्मविश्वास का मंत्र' है?

रात के 2 बजे हैं। 

कमरे में सन्नाटा है, बस घड़ी की टिक-टिक गूंज रही है। 

नींद कोसों दूर है और सीने में एक अजीब सी धक-धक महसूस हो रही है। 

सामने एक ऐसा पहाड़ खड़ा है—

चाहे वह कोई बेहद अहम परीक्षा हो, जीवन का कोई बड़ा संकट हो, कोई टूटता हुआ रिश्ता हो, या ज़िंदगी का कोई ऐसा मोड़ जहाँ आगे के सारे रास्ते धुंधले नज़र आ रहे हों।

उस पल, अंदर से एक ही चीख उठती है...!


श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।। https://sarswatijyotish.com


Ram Darbar Murti, 8 cm Height, Black, 3D Printed, UV Resin, Ayodhya Mandir Ramdarbar Rama Sita Laxman Hanuman Idol for Home, Car Dashboard, Office, and Gift

Visit the MurtiHome Store  https://amzn.to/4bkLeyW  


"यार, ये मुझसे नहीं होगा।"

हम सबने इस पल को जिया है। 

उस घुटन को महसूस किया है जब लगता है कि हम अपनी ही उम्मीदों के बोझ तले दब गए हैं।

बचपन में जब हम अंधेरे से डरते थे या किसी बात से घबराते थे, तो घर के बड़े - बुज़ुर्ग हमें जीवन - सुधार की कोई 500 पन्नों की भारी - भरकम किताब नहीं थमाते थे। 
+++ +++
वे बस प्यार से सिर पर हाथ फेरते और कहते, "हनुमान जी का नाम ले लो, सब ठीक हो जाएगा।" 

बड़े हुए, तो विज्ञान पढ़ा। 

हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर कसना शुरू किया। 

युवा मन सोचने लगा कि भला कुछ शब्द दोहराने से क्या पहाड़ कट जाएंगे? 

या समंदर पार हो जाएंगे?
+++ +++
लेकिन जैसे - जैसे ज़िंदगी के असली समंदर सामने आए और लहरों ने थपेड़े मारे, तब समझ में आया कि हमारे पूर्वजों ने धर्म और कथाओं के आवरण में मानव मन का कितना गहरा विज्ञान छिपा कर रखा था।

वे केवल कहानियां नहीं कह रहे थे; वे हमारे अवचेतन मन को भीतर से मज़बूत कर रहे थे।

आज, 'भारतीय विरासत' की इस यात्रा में, हम किसी अंधविश्वास की नहीं, बल्कि उस गहरे दर्शन की बात करेंगे जो रामचरितमानस की एक चौपाई में छिपा है। 

एक ऐसी चौपाई जो दुनिया का सबसे बड़ा '"आत्मविश्वास का मंत्र"' और निराशा को चीरने वाली 'संजीवनी' है।
+++ +++
▪️वह शाम, जब हनुमान जी को उनका 'ईश्वरीय' रूप याद आया

एक दृश्य की कल्पना कीजिए।

भारत का दक्षिणी छोर। 

सामने मीलों तक फैला, गर्जना करता हुआ अनंत समुद्र। 

लहरें इतनी ऊँची मानो आसमान को निगल जाना चाहती हों। 

तट पर वानर सेना हताश और निराश बैठी है। 

सीता जी की खोज का समय  धीरे - धीरे समाप्त हो रहा है और लंका तक पहुँचने का कोई मार्ग नहीं है।
+++ +++
सेना के सबसे वीर योद्धा—

अंगद, नल, नील—

सब अपनी - अपनी क्षमताओं का आकलन कर रहे हैं। 

कोई कहता है "मैं जा तो सकता हूँ, पर वापस आने की ऊर्जा नहीं बचेगी।" 

हर किसी के मन में गहरा संदेह है।

और इन सबके बीच, शोर से दूर, एक चट्टान पर चुपचाप हनुमान जी बैठे हैं। 

सिर झुका हुआ है वे बिल्कुल मौन हैं अपनी ही शक्तियों से अनजान।

उन्हें अपनी क्षमताओं का कोई अंदाज़ा नहीं है। 
+++ +++
बचपन के एक श्राप के कारण वे भूल चुके हैं कि वे पवनपुत्र हैं। 

तब पूरी सेना के सबसे वयोवृद्ध और अनुभवी जामवंत जी उनके पास जाते हैं। 

जामवंत जी उन्हें कोई जादुई जड़ी - बूटी नहीं देते। 

वे उन्हें कोई नया अस्त्र - शस्त्र नहीं थमाते। 

वे बस उनके पास जाते हैं और एक ऐसा वाक्य कहते हैं, जो इतिहास का सबसे शक्तिशाली मार्गदर्शन बन जाता है:
+++ +++
▪️"कवन सो काज कठिन जग माहीं।

जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥"

(अर्थ: हे तात! इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन काम है, जो तुमसे न हो सके? 

तुम तो राम के कार्य के लिए ही अवतरित हुए हो।)

ज़रा ठहर कर सोचिए... 

क्या जामवंत जी ने हनुमान जी को कुछ नया दिया था? 

नहीं न। 

उन्होंने सिर्फ वह याद दिलाया जो पहले से उनके भीतर था।

हम अपनी शक्तियां क्यों भूल जाते हैं?


श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।। https://sarswatijyotish.com



TIED RIBBONS Ram Lala Idol Murti (3.8 Inch, Small) for Home Pooja Room Mandir Temple Car Dashboard Office Table Decorative Ayodhya Ram Lalla Statue Gift Items


Visit the TIED RIBBONS Store  https://amzn.to/4lAEIr3


हनुमान जी को बचपन में ऋषियों ने श्राप दिया था कि वे अपनी शक्तियां भूल जाएंगे, और जब कोई उन्हें याद दिलाएगा, तभी वे वापस आएंगी।

अगर हम इस कथा को आज के तर्क के चश्मे से देखें, तो क्या यह श्राप हम सब पर नहीं लगा है?

हम सबका श्राप है— अपनी सोई हुई शक्तियों को भूल जाना। 

जब हम बच्चे होते हैं, तो हमें लगता है कि हम दुनिया बदल सकते हैं। 

फिर हम धीरे - धीरे बड़े होते हैं। 
+++ +++
बार - बार मिलने वाली असफलताओं पर दूसरों की टिप्पणियां और हमारा अपना डर ही हमारे दिमाग पर एक पर्दा डाल देता है। 

हम मान लेते हैं कि हम बस 'साधारण' हैं। 

हम अपनी ही बनाई हुई सीमाओं के जाल में फँस जाते हैं।

मानव स्वभाव में उस स्थिति को "'मान ली गई हार"' कहते हैं। 

जब इंसान बार-बार हारता है तो वह मान लेता है कि जीतना असंभव है, भले ही परिस्थिति पूरी तरह बदल चुकी हो। 

हनुमान जी तट पर उसी लाचारी का शिकार होकर बैठे थे।

जामवंत: मन को साधने वाले पहले गुरु
+++ +++
जब जामवंत जी ने हनुमान जी से कहा—

"कवन सो काज कठिन जग माहीं", तो वे मस्तिष्क को साधने की सबसे प्राचीन विद्या का प्रयोग कर रहे थे।

जब आप घबराहट में होते हैं और कहते हैं "मुझसे नहीं होगा", तो आपका मस्तिष्क गूगल  की  तरह तुरंत उन कारणों की पूरी सूची खोल देता है कि आप क्यों असफल होंगे। 

लेकिन जब आप खुद से या कोई सच्चा गुरु आपसे कहता है, "ऐसा क्या है जो तुम नहीं कर सकते?", 

तो मस्तिष्क का ध्यान तुरंत 'समस्या' से हटकर 'समाधान' पर चला जाता है।
+++ +++
▪️इस चौपाई का एक-एक शब्द विज्ञान है:

* कवन सो काज : यह आपके मस्तिष्क को चुनौती देता है।

* कठिन जग माहीं : यह स्वीकार करता है कि दुनिया में चुनौतियां हैं, लेकिन वे असंभव नहीं हैं।

* जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं : यह सीधे आपके मन की गहराइयों में असीम आत्मविश्वास का बीज बो देता है।

जैसे ही हनुमान जी ने ये शब्द सुने, उनका आत्म-संशय टूट गया। 

उनके भीतर का वह पर्वत जाग उठा जो सो रहा था। 

और जब वे जागे, तो उनका स्वरूप कुछ ऐसा था।


श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।। https://sarswatijyotish.com



big size Poster of Ram Darbar with Frame (48 x 34 cm)| GOD PHOTO FRAMES | Hindu god photo | bhagwan photo Religious Frame

Visit the Suninow Store  https://amzn.to/4d2jZuh  

🚩"मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।"

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

(अर्थ: जो मन के समान तेज़ हैं, वायु के समान वेगवान हैं, जिन्होंने अपनी इंद्रियों को जीत लिया है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं... मैं उन श्रीरामदूत की शरण में हूँ।)
+++ +++
यह श्लोक बताता है कि जब आप अपने भीतर के संदेह को मिटा देते हैं, तो आपका वेग 'मन' के समान तेज़ हो जाता है। आप जो सोचते हैं, उसे यथार्थ में बदल सकते हैं।

▪️आज की पीढ़ी इसका उपयोग कैसे करे?

आज हमारे सामने लंका जाने का समुद्र नहीं है। 

हमारे नए समुद्र हैं जैसे —

बेरोजगारी का डर, नए व्यापार के डूबने की चिंता, गहरी उदासी और रिश्तों की उलझनें आदि।
+++ +++
जब भी आपको लगे कि आप हार रहे हैं, जब बेचैनी आपको घेर ले और पसीने छूटने लगें, तो फोन पर दूसरों के प्रेरक विचार खोजने के बजाय, एक पल के लिए अपनी आँखें बंद करें...!

लंबी सांस लें। 

और खुद के लिए 'जामवंत' बन जाएं। 

खुद से कहें—

"कवन सो काज कठिन जग माहीं। 
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥" 

इसे सिर्फ एक धार्मिक मंत्र की तरह नहीं, बल्कि मन को साधने वाले एक अचूक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करें। 

यह खुद को आदेश देने की सबसे शक्तिशाली तकनीक है। 

जब आप इसे बार - बार दोहराते हैं, तो आपका मस्तिष्क डर के पुराने रास्तों को छोड़कर, जीत और आत्मविश्वास की नई दिशाएँ तय करने लगता है।
+++ +++
आप देखेंगे कि समस्या  का जो पहाड़ कल तक अजेय लग रहा था, आज वह बस एक सीढ़ी नज़र आ रहा है।

हमारे पूर्वज  मनोविज्ञान  की  इस  युक्ति  को  बखूबी जानते थे कि मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन बाहर नहीं, उसके अपने दिमाग के भीतर बैठा डर है। 

और उस डर को हराने के लिए उन्होंने हमें ये मंत्र, ये चौपाइयां एक धरोहर के रूप में दीं।

वह समुद्र जो हनुमान जी के सामने था, वह केवल खारे पानी का विस्तार नहीं था; वह हमारे और आपके भीतर बैठे 'संदेह' का समुद्र था। 

और उसे पार करने के लिए किसी बाहरी पुल की आवश्यकता नहीं थी, वह पुल हमारे अपने आत्मविश्वास का था।
+++ +++
अगली बार जब दुनिया आपसे कहे या आपका अपना मन आपसे कहे कि "तुमसे नहीं होगा", तो मुस्कुराइयेगा। 

क्योंकि आप उस संस्कृति के वारिस हैं, जहाँ हनुमान जी ने सिर्फ एक वाक्य सुनकर सूरज को फल समझ लिया था और समंदर को एक छलांग में लांघ दिया था।

आपके भीतर भी वही राम - काज करने वाली ऊर्जा सो रही है। 

बस उसे जगाने की देर है! 
+++ +++
जब ईश्वर ही टूटी हुई चीज से बहुत सुन्दरता से काम लेता है! 

बादल टूटते हैं तो बारिश होती है ! 

मिट्टी टूटती है तो "खेत" बनते हैं ! 

फसल टूटती है तो अनाज " बीज" बनता है ! 

बीज टूटता है तो नया "पौधा" बनता है ! 



इस लिए जब भी अपने को टूटा हुआ महसूस करें तो समझ लीजिए ईश्वर हमारा उपयोग "बेहतर" करना चाहता है !!------ 

कुछ हंस कर बोल दो, कुछ हंस कर टाल दो, परेशानियां तो बहुत ही है , कुछ वक्त पर डाल दो !!---
+++ +++
समुद्र मंथन सा लग रहा है यह साल ! 

इतना विष निकल रहा है तो " अमृत" भी जरूर निकलेगा !!------ 

परिवार इंसान की वह सुरक्षा "कवच"है जिसमें रहकर व्यक्ति "सुख-शांति" का अनुभव करता है !!---

इस बार बहुत ठंड पड़ेगी कारण "पैसों" की गरमी सबकी निकल गई है !!----- 

दीर्घ आयु के लिए " खुराक" आधी करें , पानी "दुगुना"करें, व्यायाम "तीगुना" करें, हंसना "चौगुना " करें और भगवान का ध्यान " सौगुना " करें  !! -----

जिनके " रब " से रिश्ते गहरे होते हैं , उनके आज और कल "सुनहरे " होते हैं !!-

प्रदाने हि मुनिश्रेष्ठ कुलं निरवशेषतः।
 वक्तव्यं कुलजातेन त नन्निबोध महामते।।

श्रीमद्वालमीकी रामायण प्रथम खंड
   बालकांड, सर्ग - 71 श्लोक -2
+++ +++
राजा जनक जी महर्षि वशिष्ठ जी द्वारा महाराज दशरथ के कुल का परिचय दिए जाने पर अपने कुल का परिचय देते हुए महाराज दशरथ से अपने कुल का परिचय सुनने का अनुरोध करते हुए कहते है कि कन्या दान से पूर्व दोनो पक्षों के वंश कुल और जाति का पूर्ण रूपेण परिचय  देना और प्राप्त करना दोनो पक्षों ( वर पक्ष और कन्या पक्ष ) के लिए आवश्यक है दोनो कुलों के आचार विचार गुण दुर्गुण और कृत्य कुकृत्य व्यवसाय यश अपयश कीर्ति अपकीर्ति पद तथा सामाजिक स्थिति और प्रतिष्ठा का पूर्ण रूपेण ज्ञान होने के बाद ही वैवाहिक संबंध करना चाहिए।
+++ +++
जो लोग जल्दबाजी में पुत्र या पुत्री के विवाह के समय  एक दूसरे के कुल परंपरा का भलीभाती विचार किए बिना और केवल संबंधी वर या कन्या पक्ष द्वारा दी गई आधी अधूरी जानकारी से संतुष्ट होकर तथा वर और कन्या पक्ष के द्वारा प्राप्त जानकारी का अन्य माध्यमों यथा मित्रों शत्रुओं स्थानीय व्यक्तियों और संबंधियों से पुष्टि किए बिना ही वैवाहिक संबंध कर लेते है ऐसे व्यक्तियों के अधिकांशतः वैवाहिक संबंध कलह कारी होते है जो वर और वधू के जीवन को कष्टकारी बना देते है। 

मनुष्य को वैवाहिक संबंध करते समय वर या वधू का रूप रंग और आर्थिक स्थिति ही नहीं बल्कि उनका स्वभाव आचार विचार कुल परंपरा तथा यश अपयश और कीर्ति अपकीर्ति का भी भली भांति विचार कर और उसका भलीभाती परीक्षण और पुष्टि करने के बाद ही वैवाहिक संबंध स्थापित करना  चाहिए।

          || महर्षि वसिष्ठ जी की जय हो ||
!!!!! शुभमस्तु !!!
+++ +++
+++ +++

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

‼️राम कृपा ही केवलम्‼️

❗संतों से समझा❗

हर्ष शोक से, भोग रोग से, संयोग वियोग से रहित नहीं है। 
अतएव धीरज धारण कर विचार - पूर्वक यथाशक्ति कर्त्तव्य पालन करने का प्रयत्न करना चाहिए मोहवश मृतक मनुष्य का स्मरण कर दुःखी होने से मृतक के सूक्ष्म शरीर को दुःख अधिक होता है, क्योंकि जब तक सम्बन्ध शेष रहता है, 







Vivo V60 5G (Mist Gray, 8GB RAM, 256GB Storage) with No Cost EMI/Additional Exchange Offers

Visit the vivo Store   https://amzn.to/49QWVgd



तब तक उसे दूसरी योनि धारण करने में विलम्ब होता है।

यदि सद्भाव से, प्रसन्नतापूर्वक मृतक मनुष्य से सम्बन्ध विछेच्छ कर दिया जाए, तो फिर वह अपने कर्मों के अनुसार शीघ्र, सुगमता से दूसरी योनि धारण कर लेता है। 

इस लिए हृदय से सम्बन्ध तोड़ना परम आवश्यक है।

 



यदि हो सके तो सर्वान्तर्यामी आनन्दघन - भगवान् से थोड़े - थोड़े समय बाद, बार - बार प्रार्थना करो कि वह मृतक पुरुष की आत्मा को शान्ति प्रदान करें। 

इस प्रकार का चिन्तन 24 घण्टे में कई बार करना चाहिए जब - जब मोह के आवेश के कारण उनका स्मरण हो, तब - तब हृदय में यह भावना करो कि आपका हमसे कुछ सम्बन्ध नहीं है।

दुःख में धैर्य धारण करना विचारवान का कर्तव्य है।

*🌹🙏जय श्री सीताराम राम राम राम🙏🌹*

यहां सच्चे झूठ आरोप सदा लगते ही रहते हैं। 


जब भी कोई आप पर आरोप लगाए, तो सबसे पहले यह देखें कि "आप पर आरोप लगाने वाला व्यक्ति कौन है? 

वह सच्चा है यह झूठा है? 

यदि कोई झूठा व्यक्ति आप पर आरोप लगाए, तो उसकी चिंता ना करें।" 

"क्योंकि आपकी परिस्थितियां आप ही जानते हैं। 

आप किस परिस्थिति में कौन सा कार्य करते हैं, क्यों करते हैं, उसके पीछे कितने कारण होते हैं, इन बातों को आप तो जानते हैं। 

दूसरे राग द्वेष करने वाले अज्ञानी लोग नहीं जानते। न ही वे इस बात की पूरी परीक्षा करते। 

यूं ही किसी पर भी कुछ भी झूठा आरोप लगा देते हैं। 

इस लिए उनकी चिंता नहीं करनी चाहिए।"

और यदि कोई सच्चा ईमानदार व्यक्ति आपके विषय में कोई दोष लगाता है, तो उसकी बात पर अवश्य ही पूरा ध्यान देना चाहिए। 

तब निष्पक्ष भाव से यह देखना चाहिए कि "वह दोष आपके अंदर है या नहीं? 

यदि है, तो कितनी मात्रा में है। 

यदि वह दोष आपके अंदर हो, तो उसे दूर करें।

क्योंकि किसी विद्वान ने कहा है कि "दोष सदा दुख ही देते हैं, और गुण सदा सुख देते हैं।"

कभी - कभी सच्चे लोग भी भ्रांति वश कोई बात कह सकते हैं। 

"और परीक्षा करने पर यदि पता चले, कि वह दोष आपके अंदर नहीं है। 

तो फिर उसकी भी चिंता ना करें।" 

हां, उस सच्चे बुद्धिमान व्यक्ति को अपना स्पष्टीकरण अवश्य बता दें, कि "आपने जो दोष मेरे विषय में बताया है, वास्तव में वह दोष मुझमें नहीं है। 

हो सकता है, कि आपको इस विषय में कुछ भ्रांति हो गई हो।" 

"तब वह बुद्धिमान व्यक्ति फिर से आप की परीक्षा करेगा। 

और आपकी बात यदि सत्य होगी, तो वह स्वीकार कर लेगा। 

तब आप की वह चिंता भी दूर हो जाएगी।"

"यदि आप इतना कार्य करेंगे, तभी आप दुखों तनाव तथा चिन्ताओं से बच पाएंगे, और सुख से जीवन जी सकेंगे, अन्यथा नहीं।"

!! फूटा घड़ा !!


बहुत समय पहले की बात है। 

किसी गाँव में एक किसान रहता था। 

वह रोज़ भोर में उठकर दूर झरनों से स्वच्छ पानी लेने जाया करता था। 

इस काम के लिए वह अपने साथ दो बड़े घड़े ले जाता था, जिन्हें वो डंडे में बाँध कर अपने कंधे पर दोनों ओर लटका लेता था।

उनमें से एक घड़ा कहीं से फूटा हुआ था और दूसरा एक दम सही था। 

इस वजह से रोज़ घर पहुँचते - पहुचते किसान के पास डेढ़ घड़ा पानी ही बच पाता था। 

ऐसा दो सालों से चल रहा था।

सही घड़े को इस बात का घमंड था कि वो पूरा का पूरा पानी घर पहुंचता है और उसके अन्दर कोई कमी नहीं है। 

वहीं दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा रहता था कि वो आधा पानी ही घर तक पंहुचा पाता है और किसान की मेहनत बेकार चली जाती है। 

फूटा घड़ा ये सब सोच कर बहुत परेशान रहने लगा और एक दिन उससे रहा नहीं गया, उसने किसान से कहा- “मैं  खुद पर शर्मिंदा हूँ और आपसे क्षमा मांगना चाहता हूँ ?”

“क्यों, किसान ने पूछा तुम किस बात से शर्मिंदा हो ?

“शायद आप नहीं जानते पर मैं एक जगह से फूटा हुआ हूँ और पिछले दो सालों से मुझे जितना पानी घर पहुँचाना चाहिए था बस उसका आधा ही पहुंचा पाया हूँ। 

मेरे अन्दर ये बहुत बड़ी कमी है और इस वजह से आपकी मेहनत बर्बाद होती रही है, फूटे घड़े ने दुखी होते हुए कहा।

किसान को घड़े की बात सुनकर थोड़ा दुःख हुआ और वह बोला- 

“कोई बात  नहीं, मैं चाहता हूँ कि आज लौटते  वक़्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को देखो।”

घड़े ने वैसा ही किया, वह रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखता आया, ऐसा करने से उसकी उदासी कुछ दूर हुई। 

पर घर पहुँचते - पहुँचते फिर उसके अन्दर से आधा पानी गिर चुका था, वो मायूस हो गया और किसान से क्षमा मांगने लगा।

किसान बोला- शायद तुमने ध्यान नहीं दिया। 
+++ +++
पूरे रास्ते में जितने भी फूल थे वो बस तुम्हारी तरफ ही थे, सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं था। 

ऐसा इस लिए क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था और मैंने उसका लाभ उठाया। 

मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर रंग - बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे, तुम रोज़ थोडा़ - थोडा़ कर के उन्हें सींचते रहे और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत बना  दिया। 

आज तुम्हारी वजह से ही मैं इन फूलों को भगवान को अर्पित कर पाता  हूँ और अपना घर सुन्दर बना पाता हूँ। 

तुम्हीं सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं  होते तो भला क्या मैं ये सब कुछ कर पाता?”

हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी होती है, पर यही कमियां हमें अनोखा बनाती हैं। 

उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को वो जैसा है वैसे ही स्वीकारना चाहिए और उसकी अच्छाई की तरफ ध्यान देना चाहिए और जब हम ऐसा करेंगे तब “फूटा घड़ा” भी “अच्छे घड़े” से मूल्यवान हो जायेगा।
+++ +++
तुम ब्राह्मण नहीं बन सकते ||
       ऋषि मांतक की कथा 
( महाभारत के अनुशासन पर्व )

धर्मराज युधिष्ठिर भीष्म पितामह से प्रश्न करते हैं :-

  स्थाने मतङ्गे ब्राह्माण्यं नालाभेद्। 
चाण्डालयोनौ जातो हि कथं ब्राह्मणमाप्तवान्।

हे भरत श्रेष्ठ!  चाण्डाल योनि में उत्पन्न हुये मतङ्ग ऋषि ने कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं किया ?
( इस प्रश्न को लेकर ही कुछ लोग शंका करते हैं कि उन्होंने तपस्या करके चाण्डाल से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया, परन्तु कथा प्रसङ्ग से यह बात सिद्ध नहीं होती।)

धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा भीष्म पितामह से पूछे गये उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में भीष्म पितामह कहते हैं, मतङ्ग ऋषि ने श्वपच से ब्राह्मण होने के लिये इंद्र की तपस्या की, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर इंद्र ने वर मांगने को कहा। 
+++ +++
उसने चाण्डाल से ब्राह्मण होने का वर मांगा। 
उत्तर में इंद्र ने कहा कि कई जन्मों की तपस्या से "ब्राह्मणत्व" प्राप्त होता है।
महाभारत के अनुशासन पर्व के अट्ठाइसवें अध्याय के छठवें से बाहरवें श्लोक तक कहा गया है कि अनेक जन्मों में पशु - पक्षी की योनि के पश्चात् चाण्डाल का जन्म होता है।  

हजार चाण्डाल का जन्म पाने के अनन्तर एक शूद्र,तीस जन्म शूद्र के बाद वैश्य, साठ जन्म वैश्य के बाद क्षत्रिय, साठ जन्म क्षत्रिय के बाद ब्राह्मण का जन्म होता है।
अतः तुम इसी जन्म में ब्राह्मण नहीं हो सकते। 
जिसका मन भगवान् के अतिरिक्त शरीर, धन, स्त्री पुत्रादि की चिन्ता न करके दिन - रात जो श्रीहरि का चिंतन करता है, उसे अनन्य भक्त कहते हैं,ऐसे हरि का अनन्य भक्त चाण्डाल भी शरीर छोड़कर दूसरे जन्म में ब्राह्मण होता है, उसी जन्म में नहीं।
+++ +++
ब्राह्मण्यं दुर्लभं तात प्रार्थमानो न लप्स्यसे।
वृणीष्व काममन्यं त्वं ब्राह्मण्यं हि सुदुर्लभम्।।

चाण्डालयोनौ जातेन नावाप्यवं वै कथंचन।
अन्य कामं वृणीष्व त्वं मा वृथा तेऽस्त्वयंश्रम:।।

मतङ्ग ऋषि के प्रार्थना करने पर इंद्र ने कहा:- 
'हे तात ! तुम्हारे प्रार्थना करने पर भी ब्राह्मण शरीर के प्राप्ति की इच्छा पूर्ण नहीं होगी, अतः तुम सुदुर्लभ ब्राह्मणत्व को छोड़कर दूसरा कोई वर मांगों।
चाण्डाल शरीर की योनि में जन्म लेकर तुम किसी भी प्रकार ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं करोगे, अतः तुम ब्राह्मणत्व के वर के अतिरिक्त दूसरा वर मांगो, जिससे तुम्हारा श्रम, तपस्या व्यर्थ न जाये।हे तात !  
+++ +++
ब्राह्मणत्व का वर इस लोक के विरुद्ध है। 
जीव अनेक योनियों में बार-बार जन्म लेने पर बड़ी कठिनाई से कोई एक को "ब्राह्मण" का जन्म प्राप्त होता है। 
अकृतात्म द्वारा पूर्व शरीर त्यागे बिना ब्राह्मण का जन्म अत्यंत कठिन है, अतः तुम इस दुर्लभ वर को छोड़कर दूसरा वर मांगों।
भीष्म पितामह इंद्र और मतङ्ग के संवाद का उपसंहार करते हुये धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं कि :- "हे भारत! ब्राह्मण का जन्म अत्यंत कठिनता से प्राप्त होता है, इंद्र के इस वचन से यह सिद्ध हुआ। 
"क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि तीनों वर्णों के लिये ब्राह्मणत्व अत्यंत दुर्लभ है। 
इस प्रमाण से सिद्ध होता है कि द्वापर युग के चाण्डाल मतङ्ग ऋषि ने इस जन्म में ब्राह्मणत्व की प्राप्ति नहीं की।
+++ +++
इस उपर्युक्त प्रकरण से यह सिद्ध नहीं होता कि जीव ब्राह्मण शरीर को पाकर दुरुपयोग करते हुये अपने वर्णाश्रम का कर्म त्याग करके मनमाना आचरण करते हुये मांस,मदिरा का सेवन करने लग जाये, वेश्यागमन करने लग जाये।
ऐसा ब्राह्मण मरने के बाद कई कल्पों तथा मन्वन्तरों तक नरकों की यातनाएं भोगने के अनन्तर चौरासी लाख योनियों में भटकता है।
इसके विपरीत शूद्र अथवा अन्त्यज यदि मनुष्य शरीर पाकर स्वधर्म का पालन करते हुये भगवान की आज्ञा को मानकर भजन करता है; तो वह शरीर छोड़ने के बाद अपने इष्टदेव के लोक को प्राप्त करता है।

              || नमो ब्रह्मण देवाय ||
+++ +++
एक व्यक्ति था जो नियमित मंदिर जाता था... परंतु एकांत मे तो चुपचाप रहता कोई भजन कीर्तन ना करता और जैसे ही भीड़ बढ़ने लगती खूब ज़ोर ज़ोर से जयकारा लगाके कीर्तन आदि करने लगता। 
सभी लोग उसे बहुत भगत मानते थे और भगत जी का संबोधन करते थे इससे उस व्यक्ति को बहुत आत्म संतुष्टि मिलती। 

आम जीवन मे भी उसका ज़ोर इसी बात पर रहता की उसे मान कैसे मिले और इसलिए हमेशा ही दूसरों मे कमियाँ निकालता रहता। 
यहाँ तक की मंदिर मे भी जाता तो सबको उपदेश दिया करता और खुद भूले से भी भगवान को याद नही करता। 
आरती भी करता तो उसका ज़ोर दूसरों को दिखाके चिल्लाने पर रहता परंतु ये भाव उसे नही आता कि भगवान सामने खड़े हैं। 
इसी तरह कई दिन बीत गये और वहाँ एक संत और भी आने लगे। 
कभी कभी उस व्यक्ति की उनसे भेंट भी हो जाती लेकिन वो उनसे कुछ भी ज्ञान की बात नही पूछता क्यूंकी उसे लगता की लोग समझेंगे की उसे कुछ मालूम नही तभी तो वो इन संत से पूछ रहा है।
+++ +++
बल्कि वो व्यक्ति संत महाराज को ही बताने लगता की आप अकेले मे तो इतना भजन करते हैं लोगों के सामने चुप क्यूँ हो जाते हैं, अरे! भगवान का भजन तो सबके साथ मिलके ही किया जाता है। 
वो संत मुस्कुराते और आँखें बंद कर लेते।उस व्यक्ति को लगता कि कदाचित् संत महाराज भी मेरी बात से सहमत है। 
एक दिन उस आदमी ने एक नयी चप्पल खरीदी और मंदिर के बाहर हमेशा की तरह उतार कर अंदर आ गया ।
परंतु उसका मन बार बार चप्पल पर जाए की कहीं कोई चोरी ना कर ले।
ये सब देखकर भगवान को बहुत दुख हुआ।
रात उस व्यक्ति ने स्वप्न देखा की कोई अलौकिक पुरुष उसी मंदिर के बाहर उसकी चप्पल के पास खड़ा है, तुरंत ही उसकी नींद टूट गयी वो घबराके बैठ गया।
+++ +++
उसने विचार किया की इसका अर्थ किससे पूछा जाए क्यूंकी उसने कभी कोई प्रश्न किसी से पूछा नही की लोग उसे अज्ञानी ना समझे।
बहुत सोच विचार कर उसने सोचा एकांत मे उसी संत से पूछूँगा जो मंदिर आते हैं क्यूंकी वो धीरे बोलते हैं और अधिक लोगों से बातचीत भी नही करते। 
उस दिन वो मंदिर गया और उसने अपनी बात संत के सामने रखी।
उसकी बात सुनते ही संत की आखों मे आँसू आ गये और वो भाव समाधि मे चले गये। 

कुछ देर बाद जब उनकी आखें खुली तो उस व्यक्ति ने फिर अपना प्रश्न दोहराया की इस स्वप्न का क्या अर्थ है? 
+++ +++
संत बोले, वो महापुरुष जो आपकी चप्पल के पास खड़े थे स्वयं प्रभु थे जिनकी मूर्ति इस मंदिर मे विराजमान है और वो आपको ऐसा करके यही संकेत दे रहे थे की तुम मंदिर मे रहके भी मुझे स्मरण नही करते और मैं मंदिर मे होते हुए भी तुम्हारे चप्पल की रखवाली करता हूँ।

ये सुनते ही उस व्यक्ति की भी आँखें भीग गयीं उसने संत के चरण पकड़ लिए और बोला महाराज अब मैं समझा की आप एकांत मे इतने भाव से क्यूँ भजन गाते और भीड़ के साथ क्यूँ चुप हो जाते क्यूंकी आप हमेशा प्रभु प्रेम मे रहते हैं और प्रभु भक्ति दिखावे का नही भाव का विषय है।
+++ +++
कृपया करके मुझे क्षमा कर दें जो मैने अज्ञान वश आपको कभी अपमानित किया हो ये कहकर वो व्यक्ति भाव विभोर हो  गया, संत ने आगे बढ़के उसे गले से लगा लिया। 

उस दिन भी उस व्यक्ति ने भीड़ के साथ हमेशा की तरह ज़ोर ज़ोर से भजन किया परंतु उसकी आखें बंद थीं और उनसे अश्रु निकल रहे थे।
         राधे राधे जी
+++ +++
+++ +++

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।। किसी भक्त ने एक बार तुलसीदास जी......

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........

जय द्वारकाधीश

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

*।।श्री राम: शरणं मम।।* 

किसी भक्त ने एक बार तुलसीदास जी महाराजश्री से पूछा कि अंत:करण चतुष्टय में भगवान की उपस्थिति कैसे संभव है ?

सहज रूप से तुलसीदास जी महाराजश्री ने उत्तर देते हुए कहा देखो.......!

*मन* जब बार-बार भगवान की लीलाओं का चिंतन करने की इच्छा करे और संसार की अनिच्छा करे तो समझो मन में भगवान है।

*बुद्धि* जब भगवान के कार्यों की सुसमीक्षा में लगकर सुख लेने लगे और उन्हीं का समर्थन करने लगे तो समझ लो बुद्धि भगवदाकार हो चुकी है।

*चित्त* रूपी घर साफ सुथरा होकर भगवान का आश्रय बन जाये अर्थात भगवान को चित्त से निकलने की इच्छा ही ना हो तो समझ लो कि भगवान चित्त में निवास कर चुके हैं। 


श्री रामचरित्रमानस प्रवचन  Sarswatijyotish.com


खासकर तब जब हमारे चित्त में दूसरे के रहने की जगह ही ना हो। 

चित्त के स्वामी भगवान अंदर रहे और दुर्गुण दुर्विचार रूपी अनाधिकारी प्रवेश न करने पाये, तब चित्त में भगवान के होने का प्रमाण बनता है।

*अहंकार* का आधार जब केवल यह रह जाये कि मैं अपने प्रभु का सेवक हूं और मेरे ठाकुर जी मेरे स्वामी है तो यह अहं भक्त को विकृत नहीं होने देता है।

और इसको संक्षेप में ऐसे समझ लो कि यदि अंत:करण के इन चार कमरों में से एक में भी  साधक इमानदारी से सच्चा हो जाये, तो फिर चारों में भगवान अपने आप कब्जा कर लेते हैं और साधक धन्य हो जाता है।

जय श्री राम राम राम....!!!

+++ +++

अग्नि की उत्पत्ति कथा तथा वेद एवं पुराणों में माहात्म्य :


एक समय पार्वती ने शिवजी से पूछा कि हे देव! आप जिस अग्नि देव की उपासना करते हैं उस देव के बारे में कुछ परिचय दीजिये। 

शिवजी ने उत्तर देना स्वीकार किया। 

तब पार्वती ने पूछा कि यह अग्नि किस महिने, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र त तथा लग्न में उत्पन्न हुई है।

+++ +++

श्री महादेवजी ने कहा-आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की आध्धी रात्रि में मीन लग्न की चतुर्दशी तिथि में शनिवार तथा रोहिणी नक्षत्र में ऊपर मुख किये हुए सर्वप्रथम पाताल से दृष्ट होती हुई अगोचर नाम्धारी यह अग्नि प्रगट हुई। 

उस महान अग्नि के माता-पिता कौन है? गौत्र क्या है? 

तथा कितनी जिह्वा से प्रगट होती है?

+++ +++

श्री महादेवजी ने कहा-वन से उत्पन्न हुई सूखी आम्रादि की समिधा लकड़ी ही इस अग्नि देव की माता है क्योंकि लकड़ी में स्वाभाविक रूप से अग्नि रहती है , जलाने पर अग्नि के संयोग से अग्नि प्रगट होती है,  अग्निदेव अरणस के गर्भ से ही प्रगट होती है इसलिये लकड़ी ही माता है तथा वन को उत्पन्न करने वाला जल होता है इसलिये जल ही इसका पिता है। 

शाण्डिल्य ही जिसका गोत्र है। 

ऐसे गोत्र तथा विशेषणों वाली वनस्पति की पुत्री यह अग्नि देव इस धरती पर प्रगट हुई जो तेजोमय होकर सभी को प्रकाशित करती हुई उष्णता प्रदान करती है।

+++ +++

इस प्रत्यक्ष अग्नि देव के अग्निष्टोमादि चार प्रधान  यज्ञ जो चारों वेदों में वर्णित है वही शृंग अर्थात् श्रेष्ठता है। 

इस महादेव अग्नि के भूत, भविष्य वर्तमान ये तीन चरण हैं। 

इन तीनों कालों में यह विद्यमान रहती है। 

इह लौकिक पार लौकिक इन दो तरह की ऊंचाइयों को छूनेवाली यह परम अग्नि सात वारों में सामान्य रूप से हवन करने योग्य है क्योंकि ग्रह नक्षत्रों से यह उपर है...! 

इस लिये इन सातों हाथों से यह आहुति ग्रहण कर लेती है तथा मृत्युलोक, स्वर्ग लोक पाताल लोक इन तीनों लोकों में ही बराबर बनी रहती है अर्थात् तीनों लोक इस अग्नि से ही बंध्धे हुऐ स्थिर है। 

जिस प्रकार से मदमस्त वृषभ ध्वनि करता है उसी प्रकार से जब यह घृतादि आहुति से जब यह अग्नि प्रसन्न हो जाती है तो यह भी दिव्य ध्वनि करती है। 

इन विशेषणों से युक्त अग्नि देवता महान कल्याणकारी रूप धारण करके हमारे मृत्यु लोकस्थ प्राणियों में प्रवेश करे जिससे हम तेजस्वी हो सकें और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। 

+++ +++

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जिस अग्नि ने उदर में समाहित कर रखा है, वह विश्वरूपा अग्नि देवी है जिसके उदर में प्रलयकालीन में सभी जीव शयन करते हैं तथा उत्पत्ति काल में भी सभी ओर से अग्नि वेष्टित है। 

उसकी ही परछाया से जगत आच्छादित है तथा जैसा गीता में कहा है अहं वैश्वानरो भूत्वा‘‘ अर्थात् यह अग्नि ही सर्वोपरि देव है। 

जिस अग्नि के बारह आदित्य यानि सूर्य ही बारह नेत्र है। 

उसके द्वारा सम्पूर्ण जगत को देखती है। 

सात इनकी जिह्वाएं जैसे काली,  कराली, मनोजवा, सुलोहिता , सुध्धूम्रवर्णा,  स्फुलिंगिनी , विश्वरूपी  इन सातों जिह्वाओं द्वारा ही सम्पूर्ण आहुति को ग्रहण करती है। 

+++ +++

इस महान अग्नि देव के ये सात प्रिय भोजन सामग्री है। 

जिसमें सर्व प्रथम घी, , दूसरा यव , तीसरा तिल, चौथा दही, पांचवां खीर, छठा श्री खंड, सातवीं मिठाई यही हवनीय सामग्री है जिसे अग्नि देव अति आनन्द से सातों जिह्वाओं द्वारा ग्रहण करते है।

+++ +++

भजन करने वाले ऋत्विक जन की यह अग्नि चाहे ऊध्ध्र्वमुखी हो चाहे अध्धोमुखी हो अथवा सामने मुख वाली हो हर स्थिति में सहायता ही करती है तथा इस अग्निदेव में प्रेम पूर्वक ‘‘स्वाहा‘‘ कहकर दी हुई मिष्ठान्नादि आहुति महा विष्णु के मुख में प्रवेश करती है अर्थात् महा विष्णु प्रेम पूर्वक ग्रहण करते हैं जिससे सम्पूर्ण देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीनों देवता तृप्त हो जाते हैं। 

इन्हीं देवों को प्रसन्न करने का एक मात्र साधन यही है।


श्री रामचरित्रमानस प्रवचन  Sarswatijyotish.com


पुराणों में अग्नि का महात्म्य :


अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं। 

ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। 

सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।

+++ +++

वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है। 

अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व - साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है। 

ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार - बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है।

+++ +++

आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे - आगे चलते हैं। 

युद्ध में सेनापति का काम करते हैं इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था।

+++ +++

पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। 

ये सब देवताओं के मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हीं के द्वारा देवताओं तक पहुँचती है। 

केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं।

इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती हैं। 

ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में अग्नि की प्रार्थना करते हुए विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अग्निदेवता की स्तुति करता हूँ, जो सभी यज्ञों के पुरोहित कहे गये हैं। 

पुरोहित राजा का सर्वप्रथम आचार्य होता है और वह उसके समस्त अभीष्ट को सिद्ध करता है। 

उसी प्रकार अग्निदेव भी यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं।

+++ +++

अग्निदेव की सात जिह्वाएँ बतायी गयी हैं। 

उन जिह्वाओं के नाम : - काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णी, स्फुलिंगी तथा विश्वरुचि हैं।

पुराणों के अनुसार अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। 

इनके पुत्र-पौत्रों की संख्या उनंचास है। 

भगवान कार्तिकेय को अग्निदेवता का भी पुत्र माना गया है। 

स्वारोचिष नामक द्वितीय स्थान पर परिगणित हैं। 

ये आग्नेय कोण के अधिपति हैं। 

अग्नि नामक प्रसिद्ध पुराण के ये ही वक्ता हैं। 

प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर इनका मुख्य तीर्थ है। 

इन्हीं के समीप भगवान कार्तिकेय, श्राद्धदेव तथा गौओं के भी तीर्थ हैं।

+++ +++

अग्निदेव की कृपा के पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। 

उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। 

महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा माँगने का निवेदन किया। 

गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुण्डल माँगा। 

उत्तंक ने महाराज के पास पहुँचकर उनकी आज्ञा से महारानी से कुण्डल प्राप्त किया। 

रानी ने कुण्डल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुण्डलों को सावधानी से ले जाइयेगा, नहीं तो तक्षक नाग कुण्डल आप से छीन लेगा। 

मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुण्डलों को लेकर पाताल में चला गया। 

+++ +++

अग्निदेव की कृपा से ही उत्तंक दुबारा कुण्डल प्राप्त करके गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। 

अग्निदेव ने ही अपनी ब्रह्मचारी भक्त उपकोशल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था।

अग्नि की प्रार्थना उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त करता है। 

उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है।

+++ +++

अग्निदेव का बीजमन्त्र रं तथा मुख्य मन्त्र रं वह्निचैतन्याय नम: है।

ऋग्वेद के अनुसार,अग्निदेव अपने यजमान पर वैसे ही कृपा करते हैं, जैसे राजा सर्वगुणसम्पन्न वीर पुरुष का सम्मान करता है। 

एक बार अग्नि अपने हाथों में अन्न धारण करके गुफा में बैठ गए। 

अत: सब देवता बहुत भयभीत हुए। 

अमर देवताओं ने अग्नि का महत्व ठीक से नहीं पहचाना था। 

+++ +++

वे थके पैरों से चलते हुए ध्यान में लगे हुए अग्नि के पास पहुँचे। 

मरुतों ने तीन वर्षों तक अग्नि की स्तुति की। 

अंगिरा ने मंत्रों द्वारा अग्नि की स्तुति तथा पणि नामक असुर को नाद से ही नष्ट कर डाला। 

देवताओं ने जांघ के बल बैठकर अग्निदेव की पूजा की। 

अंगिरा ने यज्ञाग्नि धारण करके अग्नि को ही साधना का लक्ष्य बनाया।

+++ +++

तदनन्तर आकाश में ज्योतिस्वरूप सूर्य और ध्वजस्वरूप किरणों की प्राप्ति हुई। 

देवताओं ने अग्नि में अवस्थित इक्कीस गूढ़ पद प्राप्त कर अपनी रक्षा की। 

अग्नि और सोम ने युद्ध में बृसय की सन्तान नष्ट कर डाली तथा पणि की गौएं हर लीं। 

अग्नि के अश्वों का नाम रोहित तथा रथ का नाम धूमकेतु है।

!!!!! शुभमस्तु !!!

+++ +++

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 

-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )

सेल नंबर: . ‪+ 91- 7010668409‬ / ‪+ 91- 7598240825‬ ( तमिलनाडु )

Skype : astrologer85 Web: Sarswatijyotish.com

Email: prabhurajyguru@gmail.com

आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 

नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

+++ +++

।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोप...