।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।। किसी भक्त ने एक बार तुलसीदास जी......

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........

जय द्वारकाधीश

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

*।।श्री राम: शरणं मम।।* 

किसी भक्त ने एक बार तुलसीदास जी महाराजश्री से पूछा कि अंत:करण चतुष्टय में भगवान की उपस्थिति कैसे संभव है ?

सहज रूप से तुलसीदास जी महाराजश्री ने उत्तर देते हुए कहा देखो.......!

*मन* जब बार-बार भगवान की लीलाओं का चिंतन करने की इच्छा करे और संसार की अनिच्छा करे तो समझो मन में भगवान है।

*बुद्धि* जब भगवान के कार्यों की सुसमीक्षा में लगकर सुख लेने लगे और उन्हीं का समर्थन करने लगे तो समझ लो बुद्धि भगवदाकार हो चुकी है।

*चित्त* रूपी घर साफ सुथरा होकर भगवान का आश्रय बन जाये अर्थात भगवान को चित्त से निकलने की इच्छा ही ना हो तो समझ लो कि भगवान चित्त में निवास कर चुके हैं। 


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खासकर तब जब हमारे चित्त में दूसरे के रहने की जगह ही ना हो। 

चित्त के स्वामी भगवान अंदर रहे और दुर्गुण दुर्विचार रूपी अनाधिकारी प्रवेश न करने पाये, तब चित्त में भगवान के होने का प्रमाण बनता है।

*अहंकार* का आधार जब केवल यह रह जाये कि मैं अपने प्रभु का सेवक हूं और मेरे ठाकुर जी मेरे स्वामी है तो यह अहं भक्त को विकृत नहीं होने देता है।

और इसको संक्षेप में ऐसे समझ लो कि यदि अंत:करण के इन चार कमरों में से एक में भी  साधक इमानदारी से सच्चा हो जाये, तो फिर चारों में भगवान अपने आप कब्जा कर लेते हैं और साधक धन्य हो जाता है।

जय श्री राम राम राम....!!!

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अग्नि की उत्पत्ति कथा तथा वेद एवं पुराणों में माहात्म्य :


एक समय पार्वती ने शिवजी से पूछा कि हे देव! आप जिस अग्नि देव की उपासना करते हैं उस देव के बारे में कुछ परिचय दीजिये। 

शिवजी ने उत्तर देना स्वीकार किया। 

तब पार्वती ने पूछा कि यह अग्नि किस महिने, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र त तथा लग्न में उत्पन्न हुई है।

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श्री महादेवजी ने कहा-आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की आध्धी रात्रि में मीन लग्न की चतुर्दशी तिथि में शनिवार तथा रोहिणी नक्षत्र में ऊपर मुख किये हुए सर्वप्रथम पाताल से दृष्ट होती हुई अगोचर नाम्धारी यह अग्नि प्रगट हुई। 

उस महान अग्नि के माता-पिता कौन है? गौत्र क्या है? 

तथा कितनी जिह्वा से प्रगट होती है?

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श्री महादेवजी ने कहा-वन से उत्पन्न हुई सूखी आम्रादि की समिधा लकड़ी ही इस अग्नि देव की माता है क्योंकि लकड़ी में स्वाभाविक रूप से अग्नि रहती है , जलाने पर अग्नि के संयोग से अग्नि प्रगट होती है,  अग्निदेव अरणस के गर्भ से ही प्रगट होती है इसलिये लकड़ी ही माता है तथा वन को उत्पन्न करने वाला जल होता है इसलिये जल ही इसका पिता है। 

शाण्डिल्य ही जिसका गोत्र है। 

ऐसे गोत्र तथा विशेषणों वाली वनस्पति की पुत्री यह अग्नि देव इस धरती पर प्रगट हुई जो तेजोमय होकर सभी को प्रकाशित करती हुई उष्णता प्रदान करती है।

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इस प्रत्यक्ष अग्नि देव के अग्निष्टोमादि चार प्रधान  यज्ञ जो चारों वेदों में वर्णित है वही शृंग अर्थात् श्रेष्ठता है। 

इस महादेव अग्नि के भूत, भविष्य वर्तमान ये तीन चरण हैं। 

इन तीनों कालों में यह विद्यमान रहती है। 

इह लौकिक पार लौकिक इन दो तरह की ऊंचाइयों को छूनेवाली यह परम अग्नि सात वारों में सामान्य रूप से हवन करने योग्य है क्योंकि ग्रह नक्षत्रों से यह उपर है...! 

इस लिये इन सातों हाथों से यह आहुति ग्रहण कर लेती है तथा मृत्युलोक, स्वर्ग लोक पाताल लोक इन तीनों लोकों में ही बराबर बनी रहती है अर्थात् तीनों लोक इस अग्नि से ही बंध्धे हुऐ स्थिर है। 

जिस प्रकार से मदमस्त वृषभ ध्वनि करता है उसी प्रकार से जब यह घृतादि आहुति से जब यह अग्नि प्रसन्न हो जाती है तो यह भी दिव्य ध्वनि करती है। 

इन विशेषणों से युक्त अग्नि देवता महान कल्याणकारी रूप धारण करके हमारे मृत्यु लोकस्थ प्राणियों में प्रवेश करे जिससे हम तेजस्वी हो सकें और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। 

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सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जिस अग्नि ने उदर में समाहित कर रखा है, वह विश्वरूपा अग्नि देवी है जिसके उदर में प्रलयकालीन में सभी जीव शयन करते हैं तथा उत्पत्ति काल में भी सभी ओर से अग्नि वेष्टित है। 

उसकी ही परछाया से जगत आच्छादित है तथा जैसा गीता में कहा है अहं वैश्वानरो भूत्वा‘‘ अर्थात् यह अग्नि ही सर्वोपरि देव है। 

जिस अग्नि के बारह आदित्य यानि सूर्य ही बारह नेत्र है। 

उसके द्वारा सम्पूर्ण जगत को देखती है। 

सात इनकी जिह्वाएं जैसे काली,  कराली, मनोजवा, सुलोहिता , सुध्धूम्रवर्णा,  स्फुलिंगिनी , विश्वरूपी  इन सातों जिह्वाओं द्वारा ही सम्पूर्ण आहुति को ग्रहण करती है। 

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इस महान अग्नि देव के ये सात प्रिय भोजन सामग्री है। 

जिसमें सर्व प्रथम घी, , दूसरा यव , तीसरा तिल, चौथा दही, पांचवां खीर, छठा श्री खंड, सातवीं मिठाई यही हवनीय सामग्री है जिसे अग्नि देव अति आनन्द से सातों जिह्वाओं द्वारा ग्रहण करते है।

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भजन करने वाले ऋत्विक जन की यह अग्नि चाहे ऊध्ध्र्वमुखी हो चाहे अध्धोमुखी हो अथवा सामने मुख वाली हो हर स्थिति में सहायता ही करती है तथा इस अग्निदेव में प्रेम पूर्वक ‘‘स्वाहा‘‘ कहकर दी हुई मिष्ठान्नादि आहुति महा विष्णु के मुख में प्रवेश करती है अर्थात् महा विष्णु प्रेम पूर्वक ग्रहण करते हैं जिससे सम्पूर्ण देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीनों देवता तृप्त हो जाते हैं। 

इन्हीं देवों को प्रसन्न करने का एक मात्र साधन यही है।


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पुराणों में अग्नि का महात्म्य :


अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं। 

ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। 

सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।

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वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है। 

अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व - साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है। 

ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार - बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है।

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आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे - आगे चलते हैं। 

युद्ध में सेनापति का काम करते हैं इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था।

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पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। 

ये सब देवताओं के मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हीं के द्वारा देवताओं तक पहुँचती है। 

केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं।

इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती हैं। 

ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में अग्नि की प्रार्थना करते हुए विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अग्निदेवता की स्तुति करता हूँ, जो सभी यज्ञों के पुरोहित कहे गये हैं। 

पुरोहित राजा का सर्वप्रथम आचार्य होता है और वह उसके समस्त अभीष्ट को सिद्ध करता है। 

उसी प्रकार अग्निदेव भी यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं।

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अग्निदेव की सात जिह्वाएँ बतायी गयी हैं। 

उन जिह्वाओं के नाम : - काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णी, स्फुलिंगी तथा विश्वरुचि हैं।

पुराणों के अनुसार अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। 

इनके पुत्र-पौत्रों की संख्या उनंचास है। 

भगवान कार्तिकेय को अग्निदेवता का भी पुत्र माना गया है। 

स्वारोचिष नामक द्वितीय स्थान पर परिगणित हैं। 

ये आग्नेय कोण के अधिपति हैं। 

अग्नि नामक प्रसिद्ध पुराण के ये ही वक्ता हैं। 

प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर इनका मुख्य तीर्थ है। 

इन्हीं के समीप भगवान कार्तिकेय, श्राद्धदेव तथा गौओं के भी तीर्थ हैं।

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अग्निदेव की कृपा के पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। 

उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। 

महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा माँगने का निवेदन किया। 

गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुण्डल माँगा। 

उत्तंक ने महाराज के पास पहुँचकर उनकी आज्ञा से महारानी से कुण्डल प्राप्त किया। 

रानी ने कुण्डल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुण्डलों को सावधानी से ले जाइयेगा, नहीं तो तक्षक नाग कुण्डल आप से छीन लेगा। 

मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुण्डलों को लेकर पाताल में चला गया। 

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अग्निदेव की कृपा से ही उत्तंक दुबारा कुण्डल प्राप्त करके गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। 

अग्निदेव ने ही अपनी ब्रह्मचारी भक्त उपकोशल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था।

अग्नि की प्रार्थना उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त करता है। 

उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है।

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अग्निदेव का बीजमन्त्र रं तथा मुख्य मन्त्र रं वह्निचैतन्याय नम: है।

ऋग्वेद के अनुसार,अग्निदेव अपने यजमान पर वैसे ही कृपा करते हैं, जैसे राजा सर्वगुणसम्पन्न वीर पुरुष का सम्मान करता है। 

एक बार अग्नि अपने हाथों में अन्न धारण करके गुफा में बैठ गए। 

अत: सब देवता बहुत भयभीत हुए। 

अमर देवताओं ने अग्नि का महत्व ठीक से नहीं पहचाना था। 

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वे थके पैरों से चलते हुए ध्यान में लगे हुए अग्नि के पास पहुँचे। 

मरुतों ने तीन वर्षों तक अग्नि की स्तुति की। 

अंगिरा ने मंत्रों द्वारा अग्नि की स्तुति तथा पणि नामक असुर को नाद से ही नष्ट कर डाला। 

देवताओं ने जांघ के बल बैठकर अग्निदेव की पूजा की। 

अंगिरा ने यज्ञाग्नि धारण करके अग्नि को ही साधना का लक्ष्य बनाया।

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तदनन्तर आकाश में ज्योतिस्वरूप सूर्य और ध्वजस्वरूप किरणों की प्राप्ति हुई। 

देवताओं ने अग्नि में अवस्थित इक्कीस गूढ़ पद प्राप्त कर अपनी रक्षा की। 

अग्नि और सोम ने युद्ध में बृसय की सन्तान नष्ट कर डाली तथा पणि की गौएं हर लीं। 

अग्नि के अश्वों का नाम रोहित तथा रथ का नाम धूमकेतु है।

!!!!! शुभमस्तु !!!

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🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

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-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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