सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्रीमद्भागवत कथा - चलो आज कीर्तन करने के लिये ।।
श्रीमद्भागवत कथा - राधा कृष्ण प्रेम प्रसंग 🦚❤️
प्रसंग 1
राधा के बिना कृष्ण अधूरे ;
“राधा मेरी आत्मा हैं और मैं उनका शरीर हूँ” ऐसा कोई प्रमाणित संवाद नहीं मिलता।
इसी प्रकार “कृष्ण ने पूछा जाने पर बताया कि नाम राधा - कृष्ण इस लिए है...!
” वाली घटना भी इन ग्रंथों में नहीं है।
इस लिए उसे श्रीकृष्ण का शास्त्रोक्त कथन बनाकर लिखना सही नहीं होगा।
एक बार श्री कृष्ण से पूछा गया:
"आपका नाम 'राधा - कृष्ण' क्यों है, 'कृष्ण - राधा' क्यों नहीं?"
प्रभु ने उत्तर दिया:
"क्योंकि राधा मेरी आत्मा है और मैं उसका शरीर।
बिना आत्मा के शरीर का कोई अस्तित्व नहीं होता, इस लिए नाम हमेशा 'राधा' से शुरू होता है।"
सीख:
> प्रेम में सम्मान और समर्पण सबसे ऊपर होता है।
बाल गोपाल की दी हुई जिंदगी।
नेह अपनत्व पूरित भई बन्दगी।।01।।
मैंनें कीड़े-मकोडों को जाना नहीं-
बाल गोपाल की हो गई बन्दगी।।02।।
बाल गोपाल की नित्य करुणा मिली-
सत्य में दूर मन की गई गंदगी।।03।।
बन गए श्याम जबसे हमारे सखा-
बाल गोपाल बस माँगती जिंदगी।।04।।
मेरा गोपाल मुझको दिखता है पथ-
फँस भँवर में अगर भटकती जिंदगी।।05।।
मित्रवर नंद के बाल गोपाल से-
स्नेह अविराम ही माँगती ज़िन्दगी।।06।।
अष्टपल सत्य में रात दिन बंधुवर-
बाल गोपाल प्रिय सोचती ज़िन्दगी।।07।।
बाल गोपाल से प्रीति जिनको नहीं-
उनकी काहे की कैसी रही ज़िन्दगी।।08।।
जबसे प्रभु में मन को रमाया 'राधिके'-
तबसे ही बन गयी कीर्तन मेरी ज़िन्दगी।।09।।
जय जय श्री कृष्ण
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विशेष रूप से श्रीमद्भागवत 10.30.28 में गोपियाँ उस विशिष्ट गोपी के विषय में कहती हैं—
अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः।
यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद् रहः॥
अर्थात्—“निश्चय ही इस गोपी ने भगवान् गोविन्द की अत्यन्त आराधना की है, जिससे प्रसन्न होकर गोविन्द हमें छोड़कर इन्हें एकान्त में ले गये।”
यहाँ “आराधितः” शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
बाद की वैष्णव व्याख्या - परम्परा में इसी “आराधित” से उस श्रेष्ठ गोपी की पहचान राधा के रूप में की जाती है।
लेकिन मूल श्लोक में “राधा” नाम सीधे नहीं आया है।
और विष्णु पुराण में कृष्ण की गोपियों के साथ रासलीला का वर्णन मिलता है, लेकिन वहाँ भी राधा नाम से किसी एक गोपी का स्पष्ट वर्णन नहीं है।
वहाँ कृष्ण के प्रति गोपियों का प्रेम, कृष्ण की अनुपस्थिति में उनका कृष्ण का अनुकरण करना और रास का प्रसंग मिलता है।
इस लिए आपके लिए लेख का सबसे शुद्ध रूप यह होगा कि “राधा के बिना कृष्ण अधूरे” को कोई काल्पनिक संवाद न बनाकर, “श्रीमद्भागवत में कृष्ण के प्रति सर्वोच्च आराधना और प्रेम” के रूप में समझाया जाए।
ऋग्वेद को भी कृष्ण - राधा की ऐतिहासिक प्रेमकथा का प्रत्यक्ष प्रमाण बताना उचित नहीं होगा।
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राधा के बिना कृष्ण अधूरे —
आराधना और परम प्रेम का शास्त्रोक्त स्वरूप ;
श्रीकृष्ण और श्रीराधा का नाम भारतीय भक्ति - परंपरा में प्रेम, समर्पण और आराधना के सर्वोच्च भाव का स्मरण कराता है।
“राधा-कृष्ण” का उच्चारण होते ही भक्त के सामने ऐसा प्रेम प्रकट होता है जिसमें अधिकार से अधिक समर्पण है, मांगने से अधिक अर्पण है और अपने सुख से अधिक प्रियतम के सुख की भावना है।
किन्तु राधा-कृष्ण के संबंध का वर्णन करते समय यह आवश्यक है कि लोकप्रचलित कथाओं और शास्त्र में प्रमाणित प्रसंगों के बीच अंतर रखा जाए।
लोक में एक प्रसिद्ध कथा कही जाती है कि किसी ने श्रीकृष्ण से पूछा—
“आपका नाम कृष्ण-राधा क्यों नहीं, राधा-कृष्ण क्यों है?”
और उसके उत्तर में यह कहा गया कि “राधा मेरी आत्मा हैं और मैं उनका शरीर हूँ।”
यह कथन भाव की दृष्टि से अत्यंत सुंदर हो सकता है, परंतु श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण अथवा ऋग्वेद में ऐसा संवाद प्रमाणित रूप से उपलब्ध नहीं है।
अतः इसे श्रीकृष्ण का शास्त्रोक्त वचन कहना उचित नहीं होगा।
फिर प्रश्न उठता है—
यदि इस कल्पित संवाद को अलग रख दिया जाए, तो शास्त्रों में राधा-कृष्ण प्रेम का आधार क्या है?
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यहीं से श्रीमद्भागवत का वह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग सामने आता है, जिसमें गोपियाँ श्रीकृष्ण की खोज करती हुई उस विशेष गोपी के चरणचिह्नों को देखती हैं।
श्रीकृष्ण की खोज में गोपियाँ ;
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में रास-प्रसंग आता है।
शरद् ऋतु की रात्रि में भगवान् श्रीकृष्ण की वंशी से आकर्षित होकर गोपियाँ उनके पास आती हैं।
यह प्रसंग केवल सांसारिक आकर्षण की कथा नहीं है।
भागवत इसे भगवान् और उनके प्रति पूर्ण समर्पित भक्तों के संबंध के रूप में प्रस्तुत करता है।
जब श्रीकृष्ण गोपियों के बीच से अंतर्धान होते हैं, तब गोपियों के भीतर उनका विरह अत्यंत तीव्र हो जाता है।
वे श्रीकृष्ण को खोजने के लिए वन में निकल पड़ती हैं।
जिसे अपना सर्वस्व मान लिया हो, उसके दर्शन के बिना मन कैसे शांत रह सकता है—
भागवत इस विरह की गहराई को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने रखता है।
गोपियाँ वृक्षों, लताओं और वनस्पतियों से पूछती हुई श्रीकृष्ण के चरणचिह्न खोजती हैं।
वे उनके पदचिह्नों का अनुसरण करती जाती हैं।
फिर उन्हें श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों के साथ एक स्त्री के चरणचिह्न दिखाई देते हैं।
श्रीमद्भागवत 10.30.27 में गोपियाँ कहती हैं—
“कस्याः पदानि चैतानि याताया नन्दसूनुना...”
अर्थात्—ये किस स्त्री के चरणचिह्न हैं, जो नन्दनन्दन श्रीकृष्ण के साथ जा रही है?
यहाँ से प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
गोपियाँ देखती हैं कि श्रीकृष्ण किसी एक विशेष गोपी के साथ आगे गए हैं।
उनके मन में उस गोपी के प्रति ईर्ष्या नहीं, बल्कि उसके प्रेम की विशेषता का विचार उत्पन्न होता है।
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तब श्रीमद्भागवत का प्रसिद्ध श्लोक आता है—
अनयाराधितो नूनं
भगवान् हरिरीश्वरः।
यन्नो विहाय गोविन्दः
प्रीतो यामनयद् रहः॥
—श्रीमद्भागवत 10.30.28
अर्थ है—
“निश्चय ही इस गोपी ने भगवान् श्रीहरि की विशेष रूप से आराधना की होगी, क्योंकि भगवान् गोविन्द इस से प्रसन्न होकर हम सबको छोड़कर इसे एकान्त स्थान में ले गये हैं।”
यही वह स्थान है जहाँ “आराधितो” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
“आराधना” का अर्थ केवल बाहरी पूजा नहीं है।
आराधना में प्रियतम को प्रसन्न करने की भावना, अपना अहंकार छोड़ने की भावना और स्वयं को पूर्ण रूप से अर्पित करने का भाव निहित है।
इसी लिए वैष्णव आचार्य-परंपरा में इस “आराधितो” शब्द को श्रीराधा के नाम और उनके सर्वोच्च प्रेम से जोड़ा गया है।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस पद की व्याख्या श्रीराधा के संदर्भ में की है।
अर्थात् भागवत में राधा का नाम सीधे इस श्लोक में नहीं आता, लेकिन परंपरागत वैष्णव व्याख्या इस विशेष गोपी को श्रीराधा के रूप में स्वीकार करती है।
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राधा नाम का शास्त्रीय संकेत ;
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए।
यदि कोई कहे कि “श्रीमद्भागवत में राधा नाम सैकड़ों बार आया है”, तो यह सही नहीं होगा।
दशम स्कंध के इस प्रसिद्ध प्रसंग में श्रीशुकदेवजी उस विशेष गोपी का नाम स्पष्ट रूप से नहीं कहते। गोपियाँ भी उसे “यह गोपी” कहकर संबोधित करती हैं।
लेकिन उसी श्लोक में “आराधितो” शब्द आता है।
“आराधितो” अर्थात्—जिसने भगवान् की पूर्ण आराधना की।
इस लिए बाद की वैष्णव आचार्य-परंपरा में इस संकेत को श्रीराधा के साथ जोड़ा गया।
इस प्रकार शास्त्रोक्त दृष्टि से अधिक सावधानी वाला कथन यह होगा—
श्रीमद्भागवत उस विशेष गोपी को सर्वोच्च आराधना करने वाली गोपी के रूप में प्रस्तुत करता है और वैष्णव आचार्य-परंपरा उस गोपी को श्रीराधा के रूप में पहचानती है।
यह बात “कृष्ण ने स्वयं कहा कि राधा मेरी आत्मा हैं” कहने से कहीं अधिक प्रमाण-सम्मत है।
विष्णु पुराण में कृष्ण और गोपियों का प्रेम ;
विष्णु पुराण में भी श्रीकृष्ण की गोपियों के साथ रासलीला और उनके प्रेम का विस्तृत वर्णन मिलता है।
विष्णु पुराण के पंचम अंश के तेरहवें अध्याय में शरद् ऋतु की चन्द्रमा से प्रकाशित रात्रि का वर्णन आता है।
श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रास के लिए उपस्थित होते हैं।
गोपियाँ उनके संगीत से आकर्षित होकर उनके पास आती हैं।
विष्णु पुराण का यह प्रसंग भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वहाँ गोपियों की श्रीकृष्ण के प्रति ऐसी एकाग्रता दिखाई गई है जिसमें उनका मन पूर्णतः कृष्ण में स्थित हो जाता है।
एक गोपी श्रीकृष्ण के गीत के साथ गाती है, दूसरी उनका संगीत सुनती है और दूसरी उनके नाम का उच्चारण करती है।
कुछ गोपियाँ ऐसी स्थिति में भी श्रीकृष्ण का ध्यान करती हैं जब वे उनके पास शारीरिक रूप से नहीं जा पातीं।
यहाँ प्रेम का वास्तविक स्वरूप सामने आता है।
प्रेम केवल निकट बैठने का नाम नहीं है।
प्रेम वह है जिसमें प्रिय का स्मरण ही जीवन का आधार बन जाए।
विष्णु पुराण में आगे गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण की लीलाओं का अनुकरण करने का वर्णन भी आता है।
श्रीकृष्ण के वियोग में वे उनके कार्यों को स्मरण करती हुई स्वयं को उसी भाव में रखती हैं।
यह साधारण प्रेम नहीं है।
यह ऐसा प्रेम है जिसमें प्रिय का रूप, नाम, कार्य और स्मरण—
सब कुछ प्रेमी के अंतःकरण में व्याप्त हो जाता है।
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भागवत में विशेष गोपी का महत्व ;
श्रीमद्भागवत में गोपियाँ श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए उस विशेष गोपी के चरणचिह्नों को देखती हैं।
वे कहती हैं—
“निश्चय ही इसने भगवान् की आराधना की है।”
यह वाक्य अपने आप में प्रेम की सबसे बड़ी कसौटी बता देता है।
किसी को पाने की इच्छा प्रेम का आरंभ हो सकती है, लेकिन प्रिय को प्रसन्न करने की इच्छा प्रेम की परिपक्वता है।
इसीलिए “आराधना” शब्द यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है।
राधा का भाव इसी आराधना से समझा जाता है।
राधा अर्थात् वह प्रेम-भाव जिसमें कृष्ण को प्रसन्न करना स्वयं की प्रसन्नता से बड़ा हो जाता है।
यही कारण है कि वैष्णव परंपरा में श्रीराधा को कृष्ण-प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना गया है।
“राधा के बिना कृष्ण अधूरे” का सही अर्थ ;
अब उस लोकप्रिय वाक्य पर आते हैं—
“राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं।”
इसे यदि शास्त्र के किसी प्रमाणित वाक्य के रूप में लिया जाए तो यह सावधानी के योग्य है।
श्रीमद्भागवत में ऐसा वाक्य नहीं मिलता कि भगवान् श्रीकृष्ण अपने अस्तित्व के लिए किसी दूसरे के सहारे पर निर्भर हैं।
क्योंकि भागवत श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में प्रस्तुत करता है।
इसलिए “कृष्ण अधूरे हैं” का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि भगवान् में कोई कमी है।
भक्ति की भाषा में इसका गहरा अर्थ यह है कि कृष्ण-प्रेम की चर्चा राधा-भाव के बिना पूर्ण नहीं होती।
कृष्ण भगवान् हैं और राधा उनकी परम आराधिका के रूप में भक्ति-परंपरा में प्रतिष्ठित हैं।
अर्थात्—
कृष्ण पूर्णता के स्वरूप हैं और राधा उस पूर्ण भगवान् के प्रति पूर्ण प्रेम की पराकाष्ठा का स्वरूप मानी जाती हैं।
इस अर्थ में “राधा-कृष्ण” एक ऐसा संयुक्त स्मरण बन जाता है जिसमें भगवान् और भगवान् के प्रति परम प्रेम दोनों साथ प्रकट होते हैं।
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ऋग्वेद की दृष्टि से प्रेम और आराधना ;
ऋग्वेद अत्यंत प्राचीन वैदिक संहिता है।
इस लिए उससे सीधे राधा - कृष्ण की वृन्दावन - लीला का वर्णन निकालना उचित नहीं होगा।
ऋग्वेद में “राधा - कृष्ण” की वही कथा नहीं मिलती जो बाद के पुराणों और भक्ति-साहित्य में दिखाई देती है।
इस लिए ऋग्वेद को राधा - कृष्ण की किसी विशिष्ट प्रेमकथा का प्रत्यक्ष प्रमाण बताना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं है।
लेकिन ऋग्वैदिक परंपरा में देवता के प्रति श्रद्धा, स्तुति, यज्ञ, प्रार्थना और समर्पण का जो भाव है, वही आगे भारतीय धार्मिक परंपरा में आराधना के व्यापक भाव को समझने में सहायता करता है।
इसलिए ऋग्वेद से राधा-कृष्ण की कोई काल्पनिक कथा बनाना नहीं चाहिए।
शास्त्र का सम्मान यही है कि जहाँ जो बात है, उसे वहीं तक कहा जाए।
प्रेम में अधिकार नहीं, समर्पण ;
राधा - कृष्ण के इस प्रसंग की सबसे बड़ी शिक्षा यही है कि प्रेम केवल अधिकार का नाम नहीं है।
यदि प्रेम में केवल यह भावना हो कि—
“मुझे क्या मिला?”
तो वह प्रेम अभी स्वार्थ से मुक्त नहीं हुआ।
लेकिन जब भावना यह हो जाए—
“मेरे प्रिय को क्या प्रिय है?”
तब प्रेम अपने उच्च स्वरूप की ओर बढ़ता है।
भागवत की गोपियाँ कृष्ण को खोजती हैं। कृष्ण दिखाई नहीं देते, फिर भी उनका स्मरण समाप्त नहीं होता।
वे वृक्षों से पूछती हैं।
लताओं से पूछती हैं।
वन में उनके चरणचिह्न खोजती हैं।
और जब किसी विशेष गोपी को कृष्ण के साथ देखती हैं, तो उसके प्रेम की प्रशंसा करती हैं—
“अनयाराधितो नूनम्...”
अर्थात्—इसने अवश्य ही भगवान् की विशेष आराधना की होगी।
यही प्रेम की पराकाष्ठा का संकेत है।
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प्रेम में प्रिय का सुख ;
राधा-कृष्ण प्रेम की व्याख्या करते समय सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—समर्पण।
समर्पण का अर्थ स्वयं को मिटा देना नहीं, बल्कि अपने अहंकार को पीछे रखना है।
प्रेम में “मैं” जितना कम होता है, “तुम” उतना अधिक प्रकट होता है।
इसी लिए राधा का नाम कृष्ण से पहले लिया जाना केवल इस आधार पर नहीं समझना चाहिए कि कोई शास्त्र कहता है कि कृष्ण राधा के बिना शरीर मात्र हैं।
ऐसा प्रमाणित शास्त्र-वचन नहीं है।
बल्कि भक्तिपरंपरा में “राधा - कृष्ण” का क्रम उस प्रेम - परंपरा का मंगल स्मरण है जिसमें राधा कृष्ण की परम आराधिका के रूप में स्मरण की जाती हैं।
यह भाव उस भागवत-वचन से जुड़ता है—
“अनयाराधितो नूनं...”
जिसमें गोपियाँ उस विशेष गोपी की कृष्ण-आराधना को पहचानती हैं।
विरह भी प्रेम है ;
राधा-कृष्ण प्रेम को केवल मिलन से समझना अधूरा है।
भागवत के रासप्रसंग में विरह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
श्रीकृष्ण के अदृश्य होने पर गोपियों का मन संसार की अन्य वस्तुओं में नहीं लगता।
उनका मन कृष्ण की खोज में निकल जाता है।
विष्णु पुराण में भी कृष्ण के वियोग में गोपियों द्वारा उनके कार्यों का अनुकरण और उनके प्रति गहन अनुराग का वर्णन मिलता है।
इससे प्रेम का एक बड़ा रहस्य सामने आता है—
सच्चा प्रेम केवल सामने उपस्थित प्रिय में नहीं रहता; अनुपस्थिति में भी उतना ही जीवित रहता है।
जिसे देखने पर प्रेम हो और न देखने पर भूल जाएँ, वह सामान्य आकर्षण हो सकता है।
लेकिन जिसे न देखकर भी स्मरण और बढ़ता जाए, वही विरह-प्रधान प्रेम है।
राधा - कृष्ण नाम का आध्यात्मिक संदेश ;
“राधा-कृष्ण” नाम का स्मरण इसलिए महान है कि इसमें दो पक्ष एक साथ आते हैं—
एक ओर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और दूसरी ओर भगवान् की परम आराधना का भाव है।
कृष्ण भगवान् हैं।
राधा परम प्रेम और आराधना की परंपरा में प्रतिष्ठित हैं।
इस लिए भक्त जब “राधा-कृष्ण” कहता है तो वह केवल दो नाम नहीं बोलता; वह प्रेम और आराध्य, भक्तिभाव और भगवान्, समर्पण और परम आश्रय—
इन दोनों का स्मरण करता है।
यही कारण है कि राधा - कृष्ण का नाम भारतीय भक्ति परंपरा में इतना मधुर और हृदयस्पर्शी बन गया है।
शास्त्रोक्त निष्कर्ष ;
अब पूरे प्रसंग का सार बहुत स्पष्ट है।
पहला— “राधा मेरी आत्मा हैं और मैं उनका शरीर हूँ”—
यह सुंदर लोकप्रचलित भाव है, लेकिन इसे श्रीकृष्ण का प्रमाणित शास्त्रीय संवाद नहीं कहना चाहिए।
दूसरा— श्रीमद्भागवत 10.30.28 में गोपियाँ उस विशेष गोपी के विषय में कहती हैं कि उसने भगवान् की विशेष आराधना की है।
यहाँ “आराधितो” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है।
तीसरा— वैष्णव आचार्य-परंपरा इस विशेष गोपी को श्रीराधा के रूप में पहचानती है।
चौथा— विष्णु पुराण में श्रीकृष्ण और गोपियों की रासलीला, गोपियों का कृष्ण के प्रति अनुराग और उनके वियोग में कृष्ण का स्मरण स्पष्ट रूप से मिलता है।
पाँचवाँ— ऋग्वेद को सीधे राधा-कृष्ण की वृन्दावन-कथा का प्रमाण बनाना उचित नहीं है।
उसका वैदिक आराधना-भाव व्यापक आध्यात्मिक पृष्ठभूमि देता है, लेकिन राधा - कृष्ण की यह विशिष्ट कथा वहाँ नहीं है।
इसलिए “राधा के बिना कृष्ण अधूरे” को यदि शास्त्रोक्त भाव में समझना हो तो इसका श्रेष्ठ अर्थ यह होगा—
कृष्ण पूर्ण भगवान् हैं; परंतु कृष्ण के प्रति जिस परम, निष्काम, पूर्ण समर्पित प्रेम की पराकाष्ठा का स्मरण भक्तिपरंपरा करती है, उसका सर्वोच्च नाम श्रीराधा है।
राधा कृष्ण से कुछ माँगने के लिए नहीं, कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए प्रेम करती हैं—
यही इस भाव की सबसे बड़ी शिक्षा है।
और कृष्ण भी उस प्रेम से प्रसन्न होते हैं।
इसीलिए श्रीमद्भागवत की गोपियाँ उस विशेष गोपी के चरणचिह्न देखकर कह उठती हैं—
“अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः...”
अर्थात्—
“निश्चय ही इसने भगवान् की विशेष आराधना की है।”
यहीं से राधा-तत्त्व का सबसे सुंदर संकेत मिलता है।
प्रेम का सर्वोच्च रूप अधिकार नहीं—आराधना है।
प्रेम का सर्वोच्च रूप प्राप्ति नहीं—समर्पण है।
और भक्ति का सर्वोच्च रूप केवल भगवान् को पाना नहीं—
भगवान् को प्रसन्न करना है।
इसी परम भाव को स्मरण करते हुए भक्त के हृदय से सहज ही निकलता है—
राधे कृष्ण। राधा-कृष्ण। जय श्रीराधे। जय जय श्री राधे
!!!!! शुभमस्तु !!!
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