।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........

जय द्वारकाधीश


।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।


*"मैं न होता तो क्या होता”*


अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्हों ने देखा मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर वे गदगद हो गये। 


वे सोचने लगे। 





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यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो सीता जी को कौन बचाता???


बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है,  मै न होता तो क्या होता ? 


परन्तु ये क्या हुआ सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं।


आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है की उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है। 


अब उन्हें क्या करना चाहिए? 



जो प्रभु इच्छा।


जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है।


आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...

 *मै न होता तो क्या होता*🙏🙏🙏जय श्री राम!!💐💐💐


बहू ने बुजुर्ग को पेंशन न मिलने पर घर से निकाला!


अगले ही दिन बुर्जुग ने जो किया...!

सर्दियों की हल्की ठंड थी। 

सुबह का उजाला अभी - अभी फैलना शुरू हुआ था। 

शहर के किनारे बसे एक पुराने मोहल्ले में एक छोटा सा घर था, जिसमें रहते थे 78 वर्षीय राम प्रसाद शर्मा, उनका बेटा मनोज और बहू सीमा। 

साथ में दो छोटे-छोटे पोते भी थे। राम प्रसाद का चेहरा झुर्रियों से भरा था, पर उनकी आंखों में एक गहरी शांति और गरिमा थी। 

उनकी चाल धीमी थी, मगर हर कदम में एक सलीका था। 

वे अपने छोटे से पेंशन पर ही गुजारा करते थे।


महीने की शुरुआत में जो रकम आती, उसका एक हिस्सा बच्चों के लिए चॉकलेट या छोटी-छोटी चीजें खरीदने में खर्च हो जाता और बाकी घर के खर्च में दे देते। 

खुद के लिए बस जरूरत भर का। 

पर इस बार किस्मत ने अजीब मोड़ लिया। 

पेंशन आने की तारीख बीत गई, लेकिन रकम खाते में नहीं आई। 

राम प्रसाद ने सोचा शायद एक-दो दिन में आ जाएगी, इसलिए किसी को बताया नहीं।


लेकिन जब सीमा को बैंक से पैसे ना मिलने की बात पता चली तो उसके लहजे में बदलाव आने लगा। 

वह दिन भर चाय का कप जोर से मेज पर रखती, मनोज जो पास ही अखबार पढ़ रहा था, चुप रहता। 

उसने न पिता का साथ दिया, न पत्नी को रोका। 

शाम तक ताने और कड़वे शब्द बढ़ते गए। सीमा ने पोते-पोतियों के सामने कहा, अब तो इनके आने का भी कोई मतलब नहीं।

महीने की पेंशन भी नहीं आ रही। 

बस घर में बोझ बनकर बैठे हैं।

राम प्रसाद चुपचाप सुनते रहे। 

उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बस एक गहरी चुप्पी थी, जैसे मन में कुछ तय कर लिया हो।


एक रात की चुप्पी और एक फैसला-


रात को जब सब सो चुके थे, राम प्रसाद ने अपनी पुरानी कपड़े की थैली निकाली, जिसमें बस दो-तीन जोड़ी कपड़े, एक पुराना रजाई का कवर और एक छोटा फोटो एलबम था। 

पोते की पुरानी ड्राइंग कॉपी भी उसमें रखी थी, जिसमें बच्चे ने लिखा था, मैं तुमसे प्यार करता हूं, दादा जी। 

उन्होंने थैली कंधे पर डाली, दरवाजा खोला और बाहर निकल गए।ठंडी हवा चली, पर उनके कदम स्थिर थे। 

सुबह तक किसी ने ध्यान नहीं दिया। 

जब सीमा ने देखा कि राम प्रसाद बिस्तर पर नहीं हैं तो उसने मनोज से कहा, कहीं अपने किसी रिश्तेदार के यहां चले गए होंगे। 

अच्छा ही है, थोड़ी राहत मिल जाएगी।” 

मनोज बस चुपचाप सिर झुका कर बैठा रहा।


सुबह की अफरातफरी-


अगली सुबह मोहल्ले की गली में अचानक अफरातफरी मच गई। 

दूर से गाड़ियों के हॉर्न सुनाई देने लगे। 

पड़ोसी खिड़कियों से झांकने लगे। 

देखते ही देखते गली में एक लंबा सरकारी काफिला दाखिल हुआ। 

काले रंग की ऐसी हुई, दो पुलिस जीप और पीछे मीडिया वैन। 

गाड़ियां घर के सामने आकर रुकीं। पुलिस अफसरों ने चारों तरफ घेरा बना लिया। 

दरवाजा खुला और पहले बाहर उतरे दो सफेद शर्ट और काले कोट पहने अधिकारी। 

उनके पीछे राम प्रसाद शर्मा थे। 

मगर यह वही साधारण कपड़ों में झुके कंधों वाले बुजुर्ग नहीं थे। 

आज उन्होंने ग्रे रंग का सिलवाया हुआ सूट पहना था। 

गले में नेशनल सर्विस का बैज चमक रहा था। 

जूतों में चमक थी और चाल सीधी, आत्मविश्वास से भरी हुई।


सीमा के हाथ से चाय का कप गिर गया। 

मनोज दरवाजे पर जम सा गया। 

पड़ोसी काफूसी करने लगे, अरे यह तो कोई बड़े अफसर लग रहे हैं। 

क्या यह वही शर्मा जी हैं जो यहां चुपचाप रहते थे?

राम प्रसाद ने ऊपर देखा। 

घर की बालकनी में सीमा खड़ी थी, चेहरा पीला पड़ चुका था। 

मनोज ने नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं की। 

भीड़ की फुसफुसाहट और कैमरों की फ्लैश के बीच राम प्रसाद ने गहरी सांस ली। 

अब उनकी कहानी, उनका सच और उनकी चुप्पी टूटने वाली थी।


सच का पर्दाफाश-


गली में हलचल बढ़ चुकी थी। 

पत्रकार माइक्रोफोन लेकर आगे बढ़े। 

कैमरे चालू हो गए। 

लोग अपने-अपने घरों से निकल कर देखने लगे। 

आखिर यह माजरा क्या है?राम प्रसाद ने बिना किसी जल्दबाजी के घर के दरवाजे की ओर कदम बढ़ाए। 

उनके पीछे एक सीनियर पुलिस अफसर चल रहा था जो बार-बार झुककर उनसे कुछ कह रहा था। 

सीमा दरवाजे पर खड़ी थी, हाथ कांप रहे थे।

राम प्रसाद ने चुप्पी तोड़ी, मनोज, पता है मैं कल रात कहां था?मनोज ने धीमे स्वर में कहा, नहीं, बाबूजी।

मैं गया था जिला कलेक्टर के दफ्तर। 

पेंशन रुकी क्यों?

यह देखने। 

वहां पता चला कि विभाग में रिश्वतखोरी हो रही है। 

पैसे देने वालों की फाइलें पहले पास होती हैं, बाकियों को महीनों लटकाया जाता है।

उनकी आवाज स्थिर थी, लेकिन हर शब्द में एक ठंडा गुस्सा था। 

भीड़ खामोश होकर सुन रही थी।


मैंने खुद जाकर सबूत इकट्ठा किए और फिर आज सुबह मुख्य सचिव और मीडिया को बुलाकर यहां लाया ताकि उन्हें दिखा सकूं कि जो इंसान पेंशन के लिए भटक रहा था, वह कोई मजबूर बुजुर्ग नहीं बल्कि वही अफसर है जिसने इस राज्य की कई योजनाएं शुरू की थीं।

सीमा के पैर कांप गए। वह सोचने लगी कि वह कितनी गलत थी।

परिवार की टूटती दीवारें राम प्रसाद ने सीमा की तरफ देखा और कहा, लेकिन जो सबसे बड़ा घाव दिया वह यह था कि तुमने मुझे बच्चों की नजरों में गिरा दिया।

उनके शब्द तीर की तरह चुभे। 

पत्रकारों ने सवाल करने शुरू किए, सर, क्या आप कार्यवाही करवाएंगे? 

क्या आप भ्रष्ट अफसरों को सस्पेंड कराएंगे?राम प्रसाद ने कहा, न्याय जरूर होगा और शुरुआत मैं अपने ही घर से करूंगा। 

क्योंकि सम्मान की शिक्षा घर से मिलती है। 

अगर घर में ही बुजुर्गों का अपमान हो तो समाज में क्या उम्मीद करेंगे?

भीड़ में हलचल मच गई। 

सीमा के आंसू निकल पड़े, लेकिन इस बार राम प्रसाद का चेहरा कठोर था।


उन्होंने पुलिस अफसर की ओर इशारा किया, “चलो अब दफ्तर चलते हैं। 

रिपोर्ट दर्ज करनी है।

राम प्रसाद खड़े हुए और जैसे ही बाहर निकले, कैमरों की फ्लैश फिर से चमक उठी। 

गली में हर कोई सोच रहा था, इस आदमी ने कल तक चुपचाप अपमान सहा और आज पूरे सिस्टम को हिला दिया।

असली सच का खुलासा हुआ दफ्तर पहुंचते ही मीडिया और अफसर पीछे हट गए। 

अब कमरे में बस राम प्रसाद, कलेक्टर और कुछ भरोसेमंद अधिकारी बैठे थे।कलेक्टर ने धीरे से कहा, सर, आप चाहे तो इन मामलों को सीधा मंत्रालय भेज सकते हैं।

आपके पास सबूत भी हैं और अधिकार भी।

राम प्रसाद ने कुर्सी पर टिकते हुए गहरी सांस ली, मुझे पता है, लेकिन यह सिर्फ कागज का मामला नहीं है। 

यह इंसानियत का मामला है। 

जिस विभाग का काम बुजुर्गों की सेवा करना है, वहीं अगर उनका शोषण हो, तो यह मेरी आत्मा को चोट पहुंचाता है।


कलेक्टर चुप हो गए। 

थोड़ी देर की खामोशी के बाद उनके एक पुराने साथी शर्मा जी जो विशेष रूप से मिलने आए थे, धीरे से बोले, राम प्रसाद जी, अब तो आप रिटायर हो चुके हैं। 

इतनी मेहनत, इतनी गुप्त जांच, आखिर क्यों?

राम प्रसाद ने उनकी ओर देखा और आवाज धीमी कर दी, क्योंकि मैंने अपनी मां को इसी सिस्टम के हाथों मरते देखा है।

कमरे का माहौल ठंडा पड़ गया। 

मेरी मां विधवा थी। 

पेंशन उनका हक थी। 

लेकिन महीनों तक उन्हें सिर्फ टालमटोल और बेइज्जती मिली। 

उन्होंने कभी रिश्वत नहीं दी और एक दिन लाइनों में खड़े- खड़े धूप में गिर पड़ी। 

फिर कभी उठी ही नहीं। 

उसी दिन मैंने कसम खाई थी कि अपने पद का इस्तेमाल सिर्फ कागजी आदेशों के लिए नहीं करूंगा बल्कि इस सिस्टम को इंसानियत सिखाने के लिए करूंगा।


कलेक्टर की आंखें भर आईं। 

शर्मा जी ने धीमे स्वर में कहा, तो इस लिए आप रिटायर होने के बाद भी साधारण कपड़ों में छोटे से घर में चुपचाप रह रहे थे।

राम प्रसाद ने सिर हिलाया, हां। 

असली चेहरा तभी दिखता है जब सामने वाला सोचता है कि तुम बेबस हो। 

मैं जानबूझकर साधारण जीवन जीता रहा ताकि देख सकूं आज भी इस देश में इंसानियत बची है या नहीं।

इसी दौरान बाहर से एक कांस्टेबल आया, सर, घर से मैडम और उनके पति आए हैं। 

मिलने की इजाजत चाहिए।

राम प्रसाद ने गहरी सांस ली, बुला लो।

दरवाजा खुला और सीमा अंदर आई। 

पीछे-पीछे मनोज। 

दोनों के चेहरे पर शर्म और पछतावा साफ था।

सीमा ने आते ही पैरों में गिरते हुए कहा,बाबूजी, मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। 

मुझे माफ कर दीजिए। 

उस वक्त बस गुस्से में मैं नहीं समझ पाई कि आपने हमारे लिए कितनी कुर्बानियां दी हैं।


राम प्रसाद ने उसे उठाया, लेकिन चेहरे पर सख्ती बरकरार थी, गलती इंसान से होती है, लेकिन बुजुर्ग का अपमान गलती नहीं, चरित्र का आईना होता है। 

मैंने जो सिखाना था, वह आज तुम्हें और इस पूरे मोहल्ले को सिखा दिया है।

मनोज की आंखें झुकी थीं। 

उसने धीमे स्वर में कहा, बाबूजी, मैं आपका बेटा होकर भी आपके साथ खड़ा नहीं हुआ। 

आज जिंदगी भर उस शर्म के साथ जीना पड़ेगा।राम प्रसाद ने बस इतना कहा, अगर सच में शर्म है तो इसे बदल दो। 

अपने घर से,अपने बच्चों से शुरू करो ताकि अगली पीढ़ी सीख सके। 

बुजुर्ग बोझ नहीं होते, वरदान होते हैं।


सीमा और मनोज चुपचाप सिर हिलाते रहे। 

जाते-जाते राम प्रसाद ने कलेक्टर से कहा, इन अफसरों पर सख्त कार्रवाई करो। 

और हां, पेंशन विभाग में एक नया नियम लागू करना। 

जो भी बुजुर्ग पेंशन के लिए आए, उसे बैठाकर चाय पिलाओ। 

यह कानून से बड़ा आदेश होगा। 

इंसानियत का आदेश।

कमरे में सन्नाटा था, लेकिन उस सन्नाटे में एक अजीब सी गरिमा थी।

अंत में राम प्रसाद उठकर बाहर निकले। 

बाहर बारिश रुक चुकी थी और गली के लोग उनके लिए ताली बजा रहे थे। 

लेकिन उनके कदम भारी थे क्योंकि वह जानते थे असली लड़ाई अभी भी जारी थी।


      || जय श्री राम!! ||


पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 

-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )

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जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏 

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