सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। सुंदर कहानी ।।
इसे गोबर का कीड़ा मनुष्य के संस्कार, कर्म और दृष्टिकोण का अद्भुत रहस्य।
( श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्र, श्री खगोलशास्त्र, श्री ऋग्वेद, श्री यजुर्वेद, श्री विष्णु पुराण तथा अन्य पुराणों की प्रेरणाओं पर आधारित एक नैतिक कथा )
ये कीड़ा सुबह उठकर गोबर की तलाश में निकलता है ।
और दिन भर जहाँ से गोबर मिले उसका गोला बनाता रहता है ।
प्राचीन भारत में एक महान ऋषि अपने आश्रम में शिष्यों को वेद, ज्योतिष, धर्म और जीवन का ज्ञान दिया करते थे।
एक दिन एक शिष्य ने विनम्रता से प्रश्न किया, " गुरुदेव, लोग अक्सर कहते हैं कि अमुक व्यक्ति 'गोबर का कीड़ा' है।
क्या इसका कोई आध्यात्मिक अर्थ भी है? "
शाम होने तक अच्छा ख़ासा गोबर का गोला बना लेता है ।
Vintage Clock Metal Double Side Hand-Crafted Gold analog Wall Clock / 12 Inch (30 CM's) / VC-6509-12(1)
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| { Brand | Vintage Clock |
| Colour | Shiny Gold |
| Display Type | Analog |
| Style | Vintage |
| Special Feature | Double Side |
| Product Dimensions | 10W x 30H Centimeters |
| Power Source | Battery Powered |
| Room Type | Guest Room, Living Room gb, Office |
| Shape | Round |
| Indoor/Outdoor Usage | Indoor } |
{About this item
- Hand-Crafted Clock And Royal Gold Finishing , Design And Rare Royal Touch - Comes And Free Batteries , Stand and Screws for Wall Hanging
- Clock Size : 12 x 12 Inches (30 x 30 CMS) , Dial Size : 12 Inches (30 CMS) , Available in Different Number Options - Both Side English Numbers , Both Side Roman or One Side English Other Side Roman Numbers or World Clock Numericals
- Product and Design created by Vintage Clock under Make in India Direction by Rajasthani Artisans. With every order from Vintage Clock you are supporting Make in India Products crafted from Natural Materials by Indian Artisans and helping them And a sustainable livelihood.
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फिर इस गोबर के गोले को धक्का मारते हुए अपने बिल तक ले जाता है ।
ऋषि मुस्कुराए और बोले, "वत्स, यह केवल अपमान का शब्द नहीं है।
इस के पीछे मनुष्य के स्वभाव और चेतना का एक गहरा संकेत छिपा है।"
बिल पर पहुँचकर उसे अहसास होता है ।
ऋषि शिष्यों को लेकर गौशाला पहुँचे। वहाँ गोबर का एक कीड़ा गोबर में ही आनंद से रह रहा था। उसी समय एक भौंरा सुगंधित पुष्पों पर मंडरा रहा था।
ऋषि ने कहा, "देखो, दोनों जीव हैं। दोनों को ईश्वर ने बनाया है।
किंतु दोनों की रुचि अलग - अलग है।"
कि गोला तो बड़ा बना लिया लेकिन बिल का छेद तो छोटा है ।
बहुत कोशिश के बावजूद वो गोला बिल में नहीं जा सकता।
बहुत लोग गोबर के कीड़े की तरह ही हो गए हैं।
ऋषि बोले, "मनुष्य भी ऐसा ही होता है।
जिसकी बुद्धि सत्संग, ज्ञान, भक्ति और सदाचार में आनंद पाती है, वह भौंरे के समान है।
किंतु जिसे केवल दोष, विवाद, ईर्ष्या, क्रोध, निंदा और स्वार्थ ही प्रिय लगते हैं, वह गोबर के कीड़े की तरह उसी वातावरण में लौटता रहता है।"
सारी ज़िन्दगी.....!
चोरी ।
मक्कारी ।
चालाकी ।
दूसरो को बेबकूफ बनाकर धन जमा करने में लगे रहते हैं ।
उन्होंने समझाया, "गोबर का कीड़ा यदि उसे कमल के फूल पर भी बैठा दो, तो वह कुछ ही देर बाद फिर गोबर में लौट जाएगा, क्योंकि उसका मन उसी में रमता है।
दूसरी ओर भौंरा यदि गलती से गोबर पर बैठ भी जाए, तो तुरंत उड़कर फिर फूलों का रस लेने पहुँच जाता है।"
जब आखिरी वक़्त आता है ।
तब पता चलता है के ये सब तो साथ जा ही नहीं सकता ॥
उन्होंने आगे कहा, "श्री ऋग्वेद में ज्ञान और प्रकाश की महिमा का वर्णन है।
श्री यजुर्वेद मन, वाणी और कर्म की पवित्रता का संदेश देता है।
श्री विष्णु पुराण तथा अन्य पुराणों में भी बार-बार यही शिक्षा मिलती है कि मनुष्य अपने संस्कारों से महान बनता है, जन्म से नहीं।"
जय श्री कृष्ण...!!!
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पैसे घर की इज्जत से बड़े नहीं ||
एक दिन आश्रम में दो व्यक्ति आए।
पहला व्यक्ति निर्धन था, लेकिन विनम्र, सत्यवादी और भगवान का भक्त था।
दूसरा धनी था, किंतु अहंकारी, कटु वचन बोलने वाला और दूसरों की निंदा करने वाला।
सम्मान और नैतिकता सबसे महत्वपूर्ण हैं...!
क्योंकि पैसा खो जाने पर दोबारा कमाया जा सकता है...!
लेकिन एक बार खोई हुई इज़्ज़त वापस पाना मुश्किल होता है।
इज़्ज़त अच्छे व्यवहार, संस्कारों और चरित्र से बनती है...!
जो पैसों से नहीं खरीदी जा सकती।
ऋषि ने दोनों को एक-एक कमल का फूल दिया।
निर्धन व्यक्ति ने उसे भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया।
धनी व्यक्ति ने उसे सूँघकर फेंक दिया और बोला, "इससे मुझे क्या लाभ?"
विजय अखबार पढ़ रहा था कि पड़ोसी आया और आकर बोला "एक खुश खबरी है।"
विजय बोला क्या?
पड़ोसी धीरे से मगर रहस्यमय अंदाज मे बोला तेरा भाई खेत बेच रहा है।
ऋषि ने शिष्यों से पूछा, "बताओ, दोनों को एक ही वस्तु मिली, फिर परिणाम अलग क्यों हुआ?"
शिष्यों ने उत्तर दिया, "गुरुदेव, कारण उनकी सोच और संस्कार हैं।"
विजय ने पूछा क्यों?
ऋषि बोले, "यही गोबर के कीड़े का सार है।
दोष वस्तु में नहीं होता, दोष दृष्टि में होता है।"
ऐसी क्या मुसिबत आन पड़ी ?
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पड़ोसी अखबार बनता हुआ बोला जब तेरी भाभी बीमार पड़ी थी तब तेरे भाई ने साहूकार से खेत गिरवी रख कर दो लाख रुपये उधार लिए थे।
आज ब्याज सहित चार लाख हो गए है।
साहूकार ने आखरी चेतावनी दे रखी है।
खेत ही बेचना पड़ेगा।
अंदर से विजय की पत्नी सब सुन रही थी।
उन्होंने आगे ज्योतिष का रहस्य समझाया—
"जन्मकुंडली केवल भाग्य बताने का साधन नहीं है, बल्कि मनुष्य के स्वभाव, संस्कार और प्रवृत्तियों का भी दर्पण है।
यदि किसी जातक की कुंडली में शुभ ग्रह बलवान हों, गुरु, चंद्र और सूर्य शुभ स्थिति में हों, तथा व्यक्ति सत्कर्म करे, तो उसका विवेक बढ़ता है।
यदि पाप ग्रहों का प्रभाव अधिक हो और व्यक्ति स्वयं भी बुरे कर्मों में लिप्त हो जाए, तो उसका मन बार-बार नकारात्मकता की ओर आकर्षित होने लगता है।"
बाहर आकर बोली हम लोग अभी जिंदा है।
ऐसा नही होने देगें। फिर वह भीतर गई और चार लाख रुपये विजय के सामने रखते हुए बोली मेरे पापा ने मेरे नाम एफ डी करवाई थी ये वो पैसे हैं।
जाकर घर की इज्जत बचाओ।
पैसे भाई से बड़े नही होते।
फिर उन्होंने स्पष्ट किया, "कुंडली किसी को महान या निकृष्ट नहीं बनाती।
वह केवल संभावनाएँ और प्रवृत्तियाँ दिखाती है।
अंतिम निर्णय मनुष्य के कर्म, विवेक और साधना पर निर्भर करता है।"
विजय बोला मगर मै क्यों जाऊँ?
भैया तो मुझसे बात ही नही करते।
और तुम ये कुर्बानी क्यों दे रही हो।
बिकने दो खेत, बिकता है तो।
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हमें क्या ?
पत्नी ने पड़ोसी को धक्का देकर कहा चल निकल यहाँ से चुगलखौर।
इसी बीच एक किसान आश्रम पहुँचा।
उसने कहा, "गुरुदेव, मेरे दोनों पुत्र समान वातावरण में बड़े हुए।
फिर भी एक धर्मपरायण है और दूसरा हमेशा झगड़े करता है।"
तुमने ही दोनों भाईयों के बीच दुश्मनी के बीज बोये है न ?
पड़ोसी पूँछ दबा कर भाग गया।
पत्नी ने पति की आँखों मे देखकर कहा खानदानी औरत हूँ।
मेरे बाप ने यही सिखाया है कि जब परिवार की इज्जत पर बात आये तब सारे मनमुटाव भूल कर एक हो जाना।
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{
| Colour | Gold |
| Material | Metal |
| Brand | Webelkart |
| Product Dimensions | 7.6L x 35.6W x 35.6H Centimeters |
| Finish Type | Lacquered |
| Item Weight | 750 Grams |
| Number of Pieces | 1 |
| Theme | Floral |
| Item Diameter | 14 Inches |
| Mounting Type | Tabletop } |
{About this item
- 👉Package Content: 1 Webelkart Gold Polish Round Flower Decoration Urli Bowl Lotus Tealight Candle Holder For Home Decor
- 👉Metallic Finish: The excellent artefacts come in a metallic finish to brighten up your space with its brilliant details and design. The metallic finish adds to the beauty of the artefact and makes it a luxe addition into your interior.
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जीवन मे कभी अकेली नही रहोगी।
फिर पति के हाथ पर पैसे रखे और हाथ पकड़ कर जेठ के घर ले गई।
दोनों ने देखा बड़ा भाई सिर पकड़े आंगन मे खटिया पर बैठा था।
ऋषि बोले, "बीज एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन यदि एक को समय पर जल, प्रकाश और देखभाल मिले और दूसरे की उपेक्षा हो, तो दोनों का विकास अलग होगा।
उसी प्रकार मनुष्य को सत्संग, संयम, सेवा और स्वाध्याय चाहिए।
इनके बिना वह अपनी श्रेष्ठ संभावनाओं को खो देता है।"
छोटे भाई ने चुपचाप सारे पैसे भाई की गोद मे रख दिये।
फिर बोला इतनी बड़ी परेसानी मे गुजर रहे हो भैया।
मुझे एक बार भी नही पुकारा ?
बड़ा भाई पैसों की तरफ देखते हुए बोला तुमहारे पास इतने पैसे कहाँ से आये ?
छोटा भाई अपनी पत्नी की तरफ इशारा करते हुए बोला आपकी बहु ने दिये है।
ऋषि ने प्रश्नकुंडली का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा, "जब कोई व्यक्ति किसी विशेष समस्या के समय प्रश्न लेकर आता है, तब प्रश्नकुंडली उस समय की मानसिक स्थिति और परिस्थितियों का संकेत देती है।
यदि संकेत संघर्ष के हों, तो घबराना नहीं चाहिए।
उचित कर्म, धैर्य और ईश्वर-स्मरण से कठिन समय भी बदल सकता है।"
शादी के समय इसके पिता ने इसके नाम एफ डी करवाई थी।।
बड़े भाई ने बहु के सामने दोनों हाथ जोड़ दिये।
बोला बेटा, इतनी बड़ी रकम मै लौटा नही पाऊंगा।
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बहु घुंघट मे ही बोली मुझे नही चाहिए भैया।
आप रहन रखा खेत छुड़ा लो।
पैसे घर की इज्जत से बड़े नही होते बड़े भाई की आँखों मे आँसू बह निकले।
बोला तुम जैसी बीरबानी हर घर मे पैदा नही हो सकती।
मै तुम्हारे खानदान को नतमस्तक होकर प्रणाम करता हूँ।
इस के बाद बड़े भाई ने साहूकार का कर्जा भर दिया।
और दोनों भाई फिर से एक हो गए।
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| Color | Blanco |
| Marca | Levoit |
| Dimensiones del producto | 15.6"prof. x 8.5"an. x 19.8"al. pulgadas |
| Fuente de alimentación | AC |
| Peso del artículo | 13.2 libras } |
{ Sobre este artículo
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सीख :--
जो भाई अपने भाई की बदनामी पर हँसता है।
उस से बड़ा कुलद्रोही कोई नही हो सकता है।
जो नारी ससुराल की इज्जत बचाने के लिए खुद आगे खड़ी हो जाए उससे बड़ी संस्कारवान नारी कोई नही हो सकती।
इस लिए भाई के गिरने का इंतजार मत करिये।
एक दिन शिष्यों ने देखा कि वही गोबर का कीड़ा गलती से फूलों की टोकरी में पहुँच गया।
कुछ ही क्षण बाद वह बेचैन होकर वापस गोबर की ओर भागने लगा।
गिरते भाई को बचाने के लिए अपनी फौलादी भुजाएं फैला कर रखिये।
भाई गिरा तो कुल ही गिर जायेगा।
फिर तो तुम भी गिरे हुए कुल के कहलाओगे !!
घमंड का भ्रम और विश्वास की सच्ची शक्ति💐💐
एक व्यक्ति को इस बात का अत्यधिक घमंड था कि उसके बिना उसका परिवार एक दिन भी जीवित नहीं रह सकता।
उसकी एक छोटी-सी किराने की दुकान थी, जिसकी कमाई से पूरे परिवार का पालन-पोषण होता था।
घर में वही एकमात्र कमाने वाला था, इसलिए उसके मन में यह दृढ़ विश्वास बैठ गया था कि यदि वह न रहे तो उसके परिवार के लोग भूखे मर जाएँगे।
एक दिन वह व्यक्ति एक पूर्ण संत के सत्संग में गया।
संत जी ने उसे देखते ही कहा—
“यह सोचना कि तुम्हारे बिना तुम्हारा परिवार जीवित नहीं रह सकता, एक झूठा और व्यर्थ घमंड है।
इस संसार में सबको भोजन कराने वाला कोई मनुष्य नहीं, बल्कि परमात्मा स्वयं है।
वह तो पत्थरों के नीचे रहने वाले छोटे-छोटे जीवों तक को भोजन पहुँचाता है।”
उन्होंने कहा, "जो व्यक्ति दिन-रात केवल दूसरों की आलोचना करता है, शुभ कार्यों का उपहास उड़ाता है, धर्म का मज़ाक बनाता है और हर जगह दोष ही खोजता है, वह स्वयं अपने जीवन को सीमित कर लेता है।"
संत जी की बात सुनकर उस व्यक्ति के मन में कई प्रश्न उठने लगे।
सत्संग समाप्त होने पर उसने कहा—
“मैं दिन-रात मेहनत करके जो धन कमाता हूँ, उसी से मेरे घर का खर्च चलता है।
यदि मैं न रहूँ, तो मेरे परिवार का क्या होगा?”
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संत जी ने स्नेहपूर्वक समझाया—
“बेटा, यह तुम्हारे मन का भ्रम है।
हर प्राणी अपने भाग्य का ही भोजन करता है।”
वह व्यक्ति बोला— “यदि ऐसा है, तो इसे सिद्ध करके दिखाइए।”
संत जी मुस्कराए और बोले—
इसके विपरीत जो व्यक्ति ज्ञान सुनता है, अच्छे लोगों का सम्मान करता है, माता-पिता और गुरु की सेवा करता है, सत्य बोलता है और ईश्वर का स्मरण करता है, उसका जीवन धीरे-धीरे सुगंधित पुष्प की तरह खिल उठता है।
“ठीक है, तुम बिना किसी को बताए एक महीने के लिए अपने घर से चले जाओ।
फिर स्वयं देख लेना।”
ऋषि ने अंतिम उपदेश देते हुए कहा, "मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका दूषित दृष्टिकोण है। यदि दृष्टि बदल जाए, तो संसार बदलता हुआ दिखाई देता है।"
उन्होंने शिष्यों से पूछा, "यदि किसी को गोबर का कीड़ा नहीं बनना है, तो उसे क्या करना चाहिए?"
सभी ने उत्तर दिया—"सत्संग करना चाहिए, अच्छे विचार अपनाने चाहिए, शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए, ईश्वर का स्मरण करना चाहिए और अपने कर्मों को शुद्ध रखना चाहिए।"
ऋषि प्रसन्न हुए और बोले, "यही जीवन का सार है। मनुष्य वही बनता है, जहाँ उसका मन बार-बार जाता है। इसलिए अपने मन को ज्ञान, प्रेम, सेवा और भक्ति में लगाओ।"
वह घबराया और बोला— “मेरे परिवार का ध्यान कौन रखेगा?”
संत जी ने कहा— “परमात्मा स्वयं सबका ध्यान रखता है।”
वह व्यक्ति चुपचाप चला गया।
कुछ ही दिनों में गाँव में यह अफवाह फैल गई कि उसे शेर खा गया है।
परिवार वाले बहुत रोए, खोजबीन की, पर कोई पता न चला।
समय बीतने पर गाँव के भले लोगों ने सहायता का हाथ बढ़ाया।
एक सेठ ने उसके बड़े बेटे को नौकरी दे दी, गाँव वालों ने मिलकर बेटी का विवाह कर दिया और एक सज्जन ने छोटे बेटे की पढ़ाई का पूरा भार उठा लिया।
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एक महीने बाद वह व्यक्ति रात के अंधेरे में छिपते-छिपाते अपने घर लौटा।
पहले तो घर वालों ने उसे भूत समझकर दरवाज़ा नहीं खोला।
बहुत विनती करने पर जब उसने संत जी से हुई पूरी घटना बताई, तब उसकी पत्नी बोली—
“अब हमें तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं है।
हम पहले से अधिक सुखी हैं।”
उसका सारा घमंड पल भर में चूर-चूर हो गया।
वह रोता हुआ संत जी के पास पहुँचा और क्षमा माँगने लगा।
संत जी ने करुणा से कहा—
“अब तुम्हें घर लौटने की क्या आवश्यकता है?
अपना शेष जीवन प्रभु की भक्ति और असहायों की सेवा में लगाओ।”
एक दिन शिष्यों ने देखा कि वही गोबर का कीड़ा गलती से फूलों की टोकरी में पहुँच गया।
कुछ ही क्षण बाद वह बेचैन होकर वापस गोबर की ओर भागने लगा।
वह व्यक्ति संत जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला—
“आज से मैं घमंड नहीं, केवल सेवा और भक्ति का मार्ग अपनाऊँगा।”
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कहानी से शिक्षा :
इस संसार को चलाने वाला कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि परमात्मा है।
अपने धन, शक्ति, ज्ञान या पद का घमंड करना व्यर्थ है।
जब मनुष्य यह मान लेता है कि सब कुछ उसी के कारण चल रहा है, तभी उसका पतन शुरू हो जाता है।
ऋषि बोले, "देखा? आदतें और संस्कार कितने शक्तिशाली होते हैं।
यदि मनुष्य अपने भीतर की अशुद्ध प्रवृत्तियों को नहीं बदलता, तो श्रेष्ठ अवसर मिलने पर भी उनका लाभ नहीं उठा पाता।"
कथा का संदेश
"गोबर का कीड़ा" किसी व्यक्ति का अपमान करने के लिए नहीं, बल्कि यह समझाने के लिए एक प्रतीक है कि मनुष्य जिस प्रकार के विचार, संगति और कर्मों में आनंद खोजता है, वैसा ही उसका जीवन बन जाता है।
ज्योतिषीय दृष्टि से सीख :
- जन्मकुंडली मनुष्य की प्रवृत्तियों का संकेत देती है, परंतु अंतिम परिणाम उसके कर्मों से बनता है।
- प्रश्नकुंडली वर्तमान परिस्थितियों को समझने का माध्यम है, भाग्य का अंतिम निर्णय नहीं।
- शुभ ग्रहों का वास्तविक फल तभी मिलता है जब जीवन में सदाचार, सेवा, संयम और भक्ति हो।
- अशुभ प्रवृत्तियों को सत्संग, स्वाध्याय, दान, प्रार्थना और आत्मचिंतन से बदला जा सकता है।
अंतिम निष्कर्ष :
जिस प्रकार भौंरा फूलों की सुगंध चुनता है और गोबर का कीड़ा गोबर ही खोजता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपने विचारों से अपना संसार बनाता है।
इसलिए अपने मन को सदैव ज्ञान, धर्म, करुणा, सत्य और भगवान की भक्ति में लगाएँ।
यही वेदों, पुराणों और भारतीय ज्ञान परंपरा का शाश्वत संदेश है।
सच्ची समझ यही है कि हम केवल माध्यम हैं, कर्ता नहीं।
घमंड छोड़कर विश्वास, भक्ति और सेवा का मार्ग अपनाने से ही जीवन सार्थक बनता है।
|| जय श्री कृष्ण...!!! ||
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बहुत सुंदर
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