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जय द्वारकाधीश
।। श्री हरसिध्दि माता कहानी ।।
राजा विक्रमादित्य की कुल देवी हरसिद्धि माता की कथा
उज्जयिन्यां कूर्परं व मांगल्य कपिलाम्बरः।
भैरवः सिद्धिदः साक्षात् देवी मंगल चण्डिका।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माता सती के पिता दक्षराज ने विराट यज्ञ का भव्य आयोजन किया था जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवता व गणमान्य लोगों को आमंत्रित किया ।
परन्तु उन्होंने माता सती व भगवान शिवजी को नहीं बुलाया ।
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Visit the Sehaz Artworks Store https://amzn.to/3WJrtJ5फिर भी माता सती उस यज्ञ उत्सव में उपस्थित हुईं ।
वहां माता सती ने देखा कि दक्षराज उनके पति देवाधिदेव महादेव का अपमान कर रहे थे ।
यह देख वे क्रोधित हो अग्निकुंड में कूद पड़ीं ।
यह जानकर शिव शंभू अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने माता सती का शव लेकर सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण शुरू कर दिया ।
शिवजी की ऐसी दशा देखकर सम्पूर्ण विश्व में हाहाकार मच गया ।
देवी-देवता व्याकुल होकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे और संकट के निवारण हेतु प्रार्थना करने लगे ।
तब शिवजी का सती के शव से मोहभंग करने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाया था ।
चक्र से माँ सती के शव के कई टुकड़े हो गए ।
उनमें से १३वा टुकड़ा माँ सती की कोहनी के रूप में उज्जैन के इस स्थान पर गिरा ।
तब से माँ यहां हरसिद्धि मंदिर के रूप में स्थापित हुईं ।
इतिहास के पन्नों से यह ज्ञात होता है कि माँ हरसिद्धेश्वरी सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी थी जिन्हें प्राचीन काल में ‘मांगलचाण्डिकी’के नाम से जाना जाता था ।
राजा विक्रमादित्य इन्हीं देवी की आराधना करते थे एवं उन्होंने ग्यारह बार अपने शीश को काटकर माँ के चरणों में समर्पित कर दिया पर आश्चर्यवाहिनी माँ पुनः उन्हें जीवित व स्वस्थ कर देती थी ।
यही राजा विक्रमादित्य उज्जैन के सम्राट थे जो अपनी बुद्धि, पराक्रम और उदारता के लिए जाने जाते थे ।
इन्हीं राजा विक्रमादित्य के नाम से विक्रम संवत सन की शुरुआत हुई ।
उज्जैन में हरसिद्धि देवी की आराधना करने से शिव और शक्ति दोनों की पूजा हो जाती है।
ऐसा इसलिए कि यह ऐसा स्थान है, जहां महाकाल और मां हरसिद्धि के दरबार हैं।
कहते हैं कि प्राचीन मंदिर रुद्र सरोवर के तट पर स्थित था तथा सरोवर सदैव कमलपुष्पों से परिपूर्ण रहता था।
इसके पश्चिमी तट पर ‘देवी हरसिद्धि’ का तथा पूर्वी तट पर ‘महाकालेश्वर’ का मंदिर था।
18वींशताब्दी में इन मंदिरों का पुनर्निर्माण हुआ।
वर्तमान हरसिद्धि मंदिर चहार दीवारी से घिरा है।
ऐसा भी कहा जाता है कि सुबह के आरती हर्षद गुजरात में माता रानी करती है साम की आरती उज्जैन के मंदिर पर करती है साम के आरती समय माता रानी के मौजड़ी में बहुत धरती के रज धूल मिट्टी दिखाई देती है ।
देवी प्रतिमा
मंदिर के मुख्य पीठ पर प्रतिमा के स्थान पर ‘श्रीयंत्र’ है।
इस पर सिंदूर चढ़ाया जाता है, अन्य प्रतिमाओं पर नहीं और उसके पीछे भगवती अन्नपूर्णा की प्रतिमा है।
गर्भगृह में हरसिद्धि देवी की प्रतिमा की पूजा होती है।
मंदिर में महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती की प्रतिमाएँ हैं।
मंदिर के पूर्वी द्वार पर बावड़ी है, जिसके बीच में एक स्तंभ है, जिस पर संवत 1447 अंकित है तथा पास ही में सप्तसागर सरोवर है।
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते ही सामने मां हरसिद्धि के वाहन सिंह की विशाल प्रतिमा है।
द्वार के दाईं ओर दो बड़े-बड़े नगाड़े रखे हैं, जो प्रातः सायं आरती के समय बजाए जाते हैं।
मंदिर के सामने दो बड़े दीप स्तंभ हैं।
इनमें से एक का नाम ‘शिव’ है, जिसमें 501 दीपमालाएँ हैं, दूसरे स्तंभ का नाम पार्वती है जिसमें 500 दीपमालाएँ हैं तथा दोनों दीप स्तंभों पर दीपकजलाए जाते हैं।
कुल मिलाकर इन 1001 दीपकों को जलाने में एक समय में लगभग 45 लीटर तेल लग जाता है ।
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श्री हरसिद्धि मंदिर के गर्भगृह के सामने सभाग्रह में श्री यन्त्र निर्मित है ।
कहा जाता है कि यह सिद्ध श्री यन्त्र है और इस महान यन्त्र के दर्शन मात्र से ही पुण्य का लाभ होता है ।
शुभफल प्रदायिनी इस मंदिर के प्रांगण में शिवजी का कर्कोटकेश्वर महादेव मंदिर भी है जो कि चौरासी महादेव में से एक है जहां कालसर्प दोष का निवारण होता है ऐसा लोगों का विश्वास है ।
मंदिर प्रांगण के बीचोंबीच दो अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है जिनका दर्शन भक्तों के लिए शांतिदायक रहता है ।
प्रांगण के चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार है एवं मुख्य प्रवेश द्वार के भीतर हरसिद्धि सभाग्रह के सामने दो दीपमालाएँ बनी हुई है जिनके आकाश की और मुख किये हुए काले स्तम्भ प्रांगण के भीतर रहस्यमयी वैभव का वातावरण स्थापित करते हैं ।
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यह दीपमालिकाएं मराठाकालीन हैं ।
ज्योतिषियों के अनुसार इसका शक्तिपीठ नामकरण किया गया है ।
ये नामकरण इस प्रकार है-
स्थान का नाम 13 उज्जैन, शक्ति का नाम मांगलचाण्डिकी और भैरव का नाम कपिलाम्बर है ।
इस प्राचीन मंदिर के केंद्र में हल्दी और सिन्दूर कि परत चढ़ा हुआ पवित्र पत्थर है जो कि लोगों कि आस्था का केंद्र है ।
जय माताजी
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अनेक देवी-देवताओं की मान्यता क्यों ?
गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्ट, दिव्य स्वरूप और इच्छित फल देने की सामर्थ्य जिसके पास है, उसे देवता कहते हैं।
कहा जाता है कि हिंदू धर्म में अनगिनत देवी-देवता हैं।
बृहदारण्यक उपनिषद् के तीसरे अध्याय में याज्ञवल्क्य ने कहा है कि वास्तव में तो देव 33 ही हैं, जिनमें 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, 1 देवराज इंद्र और 1 प्रजापति सम्मिलित हैं।
अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्यौ, चंद्रमा और नक्षत्र ये 8 वसु हैं, जिन पर सारी सृष्टि टिकी हुई है।
पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेद्रियां और मन (आत्मा) ये 11 रुद्र हैं।
संवत्सर के बारह माहों के सूर्यों को आदित्य कहा जाता है।
मेघ, इंद्र है और प्रकृति रूप यज्ञमय सारा जीवन प्रजापति है।
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वैसे अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य और द्यौ इन 6 देवों में ही सारा विश्व समा जाता है।
किंतु आम लोगों में धारणा है कि 33 कोटि ( करोड़ ) देवता होते हैं।
कोटि शब्द के दो अर्थ श्रेणी और करोड़ लगाए जाते हैं।
इसी वजह से 33 करोड़ की धारणा बनी होगी ऋग्वेद में ऋषि कहते हैं।
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ -ऋग्वेद 1/164/46
अर्थात् एक सत्स्वरूप परमेश्वर को बुद्धिमान् ज्ञानी लोग अनेक प्रकारों से अनेक नामों से पुकारते हैं।
उसी को वे अग्नि, यम, मातरिश्वा, इन्द्र, मित्र, वरुण, दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान इत्यादि नामों से याद करते हैं।
सारा वैदिक वाङ्मय इसी प्रकार की घोषणाओं से भरा है, जिसमें एक ही तत्त्व को मूलतः स्वीकार करके उसी के अनेक रूपों में ईश्वर को मान्यता दी गई है।
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समाज में ब्रह्मा, विष्णु, महेश प्रधान देवता माने जाते हैं और लक्ष्मी सरस्वती तथा दुर्गा प्रधान देवियां हैं।
सब देवों में श्रेष्ठ कौन है, उसके संबंध में एक कथा है-
एक बार ऋषियों में विवाद होने लगा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों में कौन देवता सबसे बड़ा है?
इस के लिए ब्रह्मा के पुत्र भृगुजी को नियुक्त किया गया।
भृगु सबसे पहले ब्रह्माजी के पास ब्रह्मा के लोक में पहुंचे, तो वे पुत्र को देखकर प्रसन्न हुए, लेकिन उसके प्रणाम, स्तुति वंदना न करने से ब्रह्मा क्रोधित होकर बिना कुछ बोले चले गए।
फिर भृगुजी कैलास पर्वत पहुंचे, तो शिवजी ने अपने भाई को बड़ी प्रसन्नता से गले लगाने का प्रयास किया, तो भृगुजी ने उद्दंडता से कहा-
'मैं आपसे नहीं मिलूंगा, क्योंकि आपने लोक एवं वेद मर्यादा का उल्लंघन किया है।'
इस व्यवहार से शिव क्रोधित होकर त्रिशूल उठाकर उन्हें मारने दौड़े।
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फिर भृगुजी बैकुंठ लोक में पहुंचे।
उस समय श्रीहरि विष्णु सोए हुए थे।
भृगु बहुत देर तक खड़े रहे, किंतु जब विष्णु की निद्रा भंग न हुई तो क्रोधित होकर भृगु ने उनके वक्षस्थल पर लात मारी।
विष्णु ने आंखें खोल दीं देखा तो सामने क्रोधित अवस्था में महर्षि भृगु खड़े थे।
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भगवान् ने भृगु के पांव पकड़े लिए और नम्र स्वर में बोले-
"हे ऋषिवर! मेरा वक्ष कठोर है और आपके पांव कोमल।
कहीं आपके पांव में चोट तो नहीं आई ?
भगवान् विष्णु के ऐसे प्रेममय व्यवहार को देखकर भृगु बहुत लज्जित हुए।
भगवान् श्री हरि ने भृगु को ऊंचे आसन पर स्थान दिया और उनके पैर दबाए।
इस व्यवहार से भृगुजी तृप्त हुए। उन्होंने ऋषियों के सम्मुख आकर कहा-
"भगवान् विष्णु ही सब देवों में श्रेष्ठ हैं।"
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एक भक्त थे।
उन्होंने भगवान का नाम जपते हुए जीवन बिता दिया, पर भगवान से कभी कुछ नहीं माँगा।
एक दिन वे भक्त बाँके बिहारी मंदिर गए।
पर यह क्या, वहाँ उन्हें भगवान नहीं दिखे।
वे आसपास के अन्य भक्तों से पूछने लगे कि आज भगवान कहाँ चले गए?
सब उनकी ओर हैरानी से देखते हुए कहने लगे- भगवान तो ये रहे।
सामने ही तो हैं।
तुझे नहीं दिखते?
तूं अंधा है क्या?
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उन भक्त ने सोचा कि सब को दिख रहे हैं, मुझे क्यों नहीं दिख रहे?
मुझे ये सब दिख रहे हैं, भगवान ही क्यों नहीं दिख रहे?
ऐसा विचार कर उनका अंतःकरण ग्लानि से भर गया।
वे सोचने लगे - लगता है कि मेरे सिर पर पाप बहुत चढ़ गया है, इसी लिए मुझे भगवान नहीं दिखते।
मैं इस शरीर का अन्त कर दूंगा।
आखिर ऐसे शरीर का क्या लाभ?
जिससे भगवान ही न दिखते हों।
ऐसा सोच कर वे यमुना में डूबने चले।
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इधर अंतर्यामी भगवान एक ब्राह्मण का वेष बना कर, एक कोढ़ी के पास पहुँचे और कहा कि ऐसे ऐसे एक भक्त यमुना को जा रहे हैं, उनके आशीर्वाद में बहुत बल है।
यदि वे तुझे आशीर्वाद दे दें, तो तेरा कोढ़ तुरंत ठीक हो जाए।
यह सुन कर कोढ़ी यमुना की ओर दौड़ा।
उन भक्त को पहचान कर, उनका रास्ता रोक लिया।
और उनके पैर पकड़कर, उनसे आशीर्वाद माँगने लगा।
भक्त कहने लगे- भाई! मैं तो पापी हूँ, मेरे आशीर्वाद से क्या होगा?
पर जब बार बार समझाने पर भी कोढ़ी ने पैर न छोड़े, तो उन भक्त ने अनमने भाव से कह ही दिया-
भगवान तेरी इच्छा पूरी करें।
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ऐसा कहते ही कोढ़ी बिल्कुल ठीक हो गया।
पर वे भक्त हैरान हो गए कि यह चमत्कार कैसे हो गया?
वे अभी वहीं स्तब्ध खड़े ही थे कि साक्षात भगवान सामने आ खड़े हुए।
उन भक्त ने भगवान को देखा तो अपने को संभाल न सके और रोते हुए, भगवान के चरणों में गिर गए।
भगवान ने उठाया।
वे भगवान से पूछने लगे - भगवान!
यह आपकी कैसी लीला है?
पहले तो आप मंदिर में भी दिखाई न दिए, और अब अनायास आपका दर्शन ही प्राप्त हो रहा है।
भगवान ने कहा -
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भक्तराज!
आपने जीवन भर जप किया, पर कभी कुछ माँगा नहीं।
आपका मुझ पर बहुत ॠण चढ़ गया था, मैं आपका ॠणी हो गया था, इसी लिए पहले मुझे आपके सामने आने में संकोच हो रहा था।
आज आपने उस कोढ़ी को आशीर्वाद देकर, अपने पुण्यपुञ्ज में से कुछ माँग लिया।
जिससे अब मैं कुछ ॠण मुक्त हो सका हूँ।
इसी लिए मैं आपके सामने प्रकट होने की हिम्मत कर पाया हूँ।
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जय हरसिध्दि माता
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जय माताजी 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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