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!!श्रीमद् देवी भागवत - नवरात्रि के बाद कलश और नारियल का क्या करें?!!

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

!!श्रीमद् देवी भागवत  -  नवरात्रि के बाद कलश और नारियल का क्या करें ? !!

श्रीमद् देवी भागवत  -  नवरात्रि के बाद कलश और नारियल का क्या करें ?

श्रीमद् देवी भागवत — नवरात्रि के बाद कलश और नारियल का क्या करें ? जानिए शास्त्रोक्त पूजा-विधि, विसर्जन के नियम और धार्मिक महत्त्व ;

सनातन धर्म में नवरात्रि का पर्व आदिशक्ति भगवती दुर्गा की आराधना, उपासना, साधना और आत्मशुद्धि का पवित्र अवसर है।

नवरात्रि के समय अनेक श्रद्धालु अपने घरों में घटस्थापना अथवा कलश स्थापना करते हैं। 

कलश के समीप देवी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करके विधिपूर्वक पूजा - अर्चना की जाती है। 

अनेक परिवारों में कलश के ऊपर आम अथवा अन्य पवित्र पत्ते रखकर नारियल स्थापित करने की परंपरा भी प्रचलित है।


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शारदीय नवरात्रि समाप्त होने के बाद स्थापित किए गए कलश, उसमें रखी वस्तुओं और नारियल को सही विधि व नियम के साथ उपयोग तथा विसर्जित करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। 

मान्यता है कि इनका पूरी श्रद्धा से पालन करने पर पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। 

नवरात्रि की पूजा समाप्त होने पर भक्तों के मन में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि पूजा में स्थापित कलश, उसमें भरे जल, उसके ऊपर रखे नारियल, कलश के नीचे बोए गए जौ तथा दूसरी पूजन - सामग्री का क्या करना चाहिए?

साथ ही, घर का वातावरण शुद्ध होता है। 

तो चलिए विस्तार से जानें कि नवरात्रि के बाद कलश और नारियल का क्या करना चाहिए।

नवरात्रि के पावन अनुष्ठान के बाद जब महानवमी का समापन होता है, तो पूजा घर में स्थापित कलश, नारियल आदि सामग्री को लेकर सभी के मन में कई प्रकार के सवाल उत्पन्न होते हैं। 

ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री के अनुसार, पूजा में स्थापित किए गए कलश और नारियल का विसर्जन या रखरखाव कैसे करें, यह जानना बहुत जरूरी है। 

क्या नारियल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए? 

क्या कलश का जल घर में छिड़कना चाहिए ? 

क्या कलश को नदी में प्रवाहित करना आवश्यक है? 

क्या पूजा में प्रयुक्त नारियल को लंबे समय तक मंदिर में रखना चाहिए?

इन प्रश्नों का उत्तर देते समय एक बात समझना आवश्यक है। 

श्रीमद् देवीभागवत महापुराण में भगवती की महिमा, उपासना और देवी - तत्त्व का वर्णन मिलता है, लेकिन नवरात्रि के बाद प्रत्येक प्रकार के कलश, नारियल और जौ के निस्तारण के लिए कोई एक सार्वभौमिक नियम उसी ग्रंथ का प्रत्यक्ष आदेश बताकर प्रस्तुत करना उचित नहीं है। 

इस लिए यहाँ शास्त्रीय धार्मिक सिद्धांतों और प्रचलित पूजा - परंपराओं के बीच अंतर स्पष्ट रखते हुए विषय का विवेचन किया जा रहा है।

इन दो चीजों में पूरे 9 दिनों की पूरी भक्ति और शक्ति का संचार होता है। 

ऐसे में इनका विसर्जन और रखरखाव सही विधि और नियम के साथ होना अत्यंत आवश्यक है ताकी घर में शांति और समृद्धि बनी रहे। 

तो चलिए विस्तार से जानें की महानवमी के बाद कलश, उसमें डाली गई वस्तुओं और नारियल का क्या करना चाहिए।

श्रीमद् देवीभागवत महापुराण में भगवती की उपासना का महत्त्व ;


श्रीमद् देवीभागवत महापुराण सनातन धर्म के प्रमुख देवी - केंद्रित पुराणों में से एक है। 

इस में आदिशक्ति भगवती को जगत् की मूल शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। 

देवी की महिमा, उनकी उपासना, भक्तिभाव तथा साधक के आध्यात्मिक कल्याण से संबंधित अनेक प्रसंग इस पुराण में मिलते हैं।

देवी की आराधना में श्रद्धा, शुद्धता, संयम और समर्पण का विशेष महत्त्व है। 

नवरात्रि में भक्त देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा करते हैं, दुर्गासप्तशती का पाठ करते हैं, मंत्र - जप करते हैं, व्रत रखते हैं तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान और सेवा करते हैं।

कलश स्थापना भी अनेक परिवारों की नवरात्रि पूजा का महत्त्वपूर्ण अंग है। 

कलश पूजा के लिए निर्धारित स्थान पर रखा जाता है और उसे धार्मिक संकल्प के साथ पूजित किया जाता है।

लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी वस्तु का पूजा में प्रयुक्त होना और उसके विसर्जन की कोई विशिष्ट विधि किसी पुराण में स्पष्ट रूप से निर्धारित होना दो अलग - अलग बातें हैं।

यदि किसी धार्मिक लेख में यह दावा किया जाए कि देवीभागवत के अमुक अध्याय में नवरात्रि के बाद नारियल को इसी प्रकार रखने या कलश का जल इसी स्थान पर डालने का आदेश दिया गया है, तो उस दावे के समर्थन में वास्तविक अध्याय, श्लोक और प्रामाणिक पाठ उपलब्ध होना चाहिए।

बिना प्रमाण के किसी प्रचलित लोकाचार को सीधे देवीभागवत का आदेश कहना उचित नहीं है।





कलश स्थापना का धार्मिक अर्थ क्या है ?


कलश अथवा घट की स्थापना सनातन धर्म की अनेक पूजा - पद्धतियों में की जाती है। 

अलग - अलग देवताओं की पूजा, गृह-पूजन, यज्ञ, व्रत तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में भी कलश का उपयोग होता है।

कलश में स्वच्छ जल भरना, उसके साथ पत्ते, पुष्प, अक्षत, सुपारी या अन्य पूजन - सामग्री रखना अनेक परंपराओं में प्रचलित है। 

सामग्री का चयन पूजा - पद्धति, क्षेत्रीय परंपरा और संकल्प के अनुसार बदल सकता है।

कलश स्थापना का उद्देश्य केवल एक पात्र रख देना नहीं, बल्कि पूजा के लिए एक पवित्र स्थान निर्धारित करना और श्रद्धापूर्वक धार्मिक अनुष्ठान करना है।

कलश के ऊपर नारियल स्थापित करने की परंपरा भी अनेक स्थानों पर प्रचलित है। 

नारियल को पूजा में अर्पित किया जाता है तथा अनेक धार्मिक अवसरों पर इसे मंगलकारी अर्पण के रूप में स्वीकार किया जाता है।

फिर भी यह दावा करना उचित नहीं होगा कि प्रत्येक नवरात्रि पूजा में एक ही प्रकार का कलश, एक ही प्रकार का नारियल और बिल्कुल एक जैसी विधि सभी संप्रदायों में अनिवार्य है।

इस लिए नवरात्रि समाप्त होने पर कलश को हटाने की विधि समझने के लिए सबसे पहले यह देखना चाहिए कि कलश किस प्रकार स्थापित किया गया था और पूजा किस परंपरा के अनुसार की गई थी।

नवरात्रि की पूजा पूरी होने पर कलश का क्या करें ?


नवरात्रि के अंतिम पूजन, देवी की प्रार्थना, आरती और संकल्प की पूर्णता के बाद कलश को सम्मानपूर्वक हटाया जा सकता है। 

कुछ परिवारों में इस के लिए विशेष समापन - विधि अथवा विसर्जन - विधि का पालन किया जाता है।

यदि पूजा किसी योग्य पुरोहित के मार्गदर्शन में हुई हो, तो उन्हीं से निर्धारित विधि पूछना उचित है। 

यदि परिवार में पीढ़ियों से कोई विशेष कुलाचार चलता आ रहा हो, तो उसका भी ध्यान रखना चाहिए।

कलश में भरे जल का क्या करना चाहिए ?


नवरात्रि के दौरान कलश में रखा जल पूजा का हिस्सा होता है। 

पूजा पूरी होने के बाद उस जल के उपयोग का निर्णय उसकी स्थिति, उसमें मिली सामग्री और परिवार की पूजा - पद्धति के अनुसार करना चाहिए।

यदि जल स्वच्छ है, उसमें कोई अनुपयुक्त वस्तु नहीं मिली है और उसे पीने योग्य बनाए रखने की सभी आवश्यक स्वच्छता संबंधी शर्तें पूरी होती हैं, तब भी उसे पीना अनिवार्य नहीं है। 

केवल पूजा में प्रयुक्त होने से कोई जल स्वतः सुरक्षित पेयजल नहीं बन जाता।

सामान्य धार्मिक परंपरा में स्वच्छ पूजित जल को पौधों की जड़ों में अर्पित करना या स्वच्छ भूमि में डालना एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। 

यदि किसी विशेष पूजा - विधि में उस जल का अलग उपयोग निर्धारित है, तो उसी विधि का पालन किया जा सकता है।

ध्यान रखें कि यदि जल कई दिनों से खुला रखा गया हो, उसमें फूल - पत्ते सड़ गए हों, दुर्गंध आ रही हो या वह दूषित हो गया हो, तो उसे पीने या भोजन में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

जल का उपयोग करते समय धार्मिक श्रद्धा के साथ स्वच्छता का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

क्या कलश का जल पूरे घर में छिड़कना अनिवार्य है ?


नहीं। स्वच्छ पूजित जल का छिड़काव कुछ पूजा - परंपराओं में किया जाता है, लेकिन इसे प्रत्येक नवरात्रि पूजा के लिए एक अनिवार्य सार्वभौमिक नियम बताने से बचना चाहिए।

यदि आपके परिवार की पूजा - विधि में ऐसा विधान है, तो उसी के अनुसार करें। 

अन्यथा जल को पौधों में अर्पित करना या स्वच्छ स्थान पर डालना भी व्यावहारिक विकल्प है।

कलश के ऊपर रखे नारियल का क्या करें ?


नवरात्रि की समाप्ति के बाद नारियल के संबंध में सबसे अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं। 

कुछ परिवारों में नारियल को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है, कुछ स्थानों पर उसे पूजा - स्थान में रखा जाता है और कुछ परंपराओं में उसका विसर्जन किया जाता है।

इन विकल्पों में से कौन - सा उचित है, यह नारियल की स्थिति तथा परिवार की पूजा - पद्धति पर निर्भर करता है।

पहला विकल्प — नारियल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करना ;


यदि नारियल स्वच्छ है, उसमें सड़न या दुर्गंध नहीं है और वह खाद्य उपयोग के योग्य है, तो उसे पूजा के बाद श्रद्धापूर्वक उतारकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है।

परिवार के सदस्यों में प्रसाद बाँटना भी प्रचलित परंपरा है। 

इसे देवी के प्रति श्रद्धा और पूजा की पूर्णता से जोड़ा जाता है।

यदि नारियल कई दिनों तक गर्म वातावरण में रहा हो, उसमें फफूँद लग गई हो, अंदर का गूदा खराब हो गया हो या उससे असामान्य गंध आती हो, तो उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण न करें।

धार्मिक श्रद्धा का अर्थ खराब खाद्य पदार्थ खाना नहीं है।

दूसरा विकल्प — नारियल को धार्मिक कार्य में उपयोग करना ;


यदि नारियल सुरक्षित और अच्छी स्थिति में है, तो परिवार की पूजा - पद्धति के अनुसार उसे किसी अन्य धार्मिक कार्य में उपयोग किया जा सकता है।

कुछ परिवारों में नारियल को अगले पूजन तक पूजा - स्थान में रखने की परंपरा है। 

लेकिन ऐसा करना सभी परिवारों के लिए अनिवार्य नहीं है।

यदि आप नारियल को सुरक्षित रखने का निर्णय लेते हैं, तो उसकी स्थिति की जाँच करते रहें। 

लंबे समय तक रखने के कारण वह खराब हो जाए, तो उसे खाने के लिए इस्तेमाल न करें।

तीसरा विकल्प — नारियल का विसर्जन ;


कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में पूजा में प्रयुक्त नारियल का विसर्जन किया जाता है। 

यदि आपके परिवार या संप्रदाय में यह निर्धारित विधि है, तो उसके अनुसार विसर्जन किया जा सकता है।

हालाँकि, पर्यावरण की रक्षा के लिए नारियल, कपड़े, प्लास्टिक, सिंदूर के पैकेट और दूसरी पूजा - सामग्री को नदी या तालाब में बिना विचार के डालना उचित नहीं है।

यदि विसर्जन करना आवश्यक हो, तो स्थानीय धार्मिक व्यवस्था और पर्यावरण संबंधी नियमों के अनुरूप सुरक्षित तरीका अपनाएँ।

नारियल को केवल इस डर से नदी में प्रवाहित करना आवश्यक नहीं है कि घर में रखने या प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से देवी अप्रसन्न हो जाएँगी। 

ऐसी आशंका को प्रमाणित शास्त्रीय आदेश के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।


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कलश के नीचे बोए गए जौ का क्या करें ?


नवरात्रि की कुछ पूजा-पद्धतियों में कलश स्थापना के साथ मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं। 

ये जौ अनुष्ठान के दौरान अंकुरित होते हैं और कई परिवारों में इन्हें धार्मिक महत्त्व दिया जाता है।

नवरात्रि के समापन पर इन अंकुरों के साथ क्या करना है, यह क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार बदल सकता है।

कुछ परिवार श्रद्धापूर्वक जौ के अंकुर अपने पास रखते हैं। 

कुछ उन्हें पौधों या स्वच्छ मिट्टी में अर्पित करते हैं। 

अन्य परिवारों में उन्हें धार्मिक परंपरा के अनुसार विसर्जित किया जाता है।

यदि अंकुर स्वस्थ हैं, तो उन्हें मिट्टी में लगाने या स्वच्छ भूमि में अर्पित करने का विकल्प अपनाया जा सकता है। 

यदि वे सड़ गए हों या उनमें फफूँद लग गई हो, तो उन्हें खाद या जैविक कचरे के उचित निस्तारण की व्यवस्था के अनुसार हटाएँ।

यह दावा नहीं करना चाहिए कि प्रत्येक परिवार के लिए जौ को किसी विशेष पेड़ के नीचे रखना, किसी खास दिशा में डालना या किसी विशिष्ट स्थान पर विसर्जित करना ही अनिवार्य है, जब तक उस नियम का प्रामाणिक आधार प्रस्तुत न किया जा सके।

कलश हटाते समय निम्नलिखित सामान्य सावधानियाँ रखी जा सकती हैं:


1. देवी के सामने श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें और पूजा के समापन की प्रार्थना करें।

2. कलश को जल्दबाजी या उपेक्षा से न हटाएँ।

3. कलश में रखी सामग्री को अलग-अलग करके देखें, ताकि खाद्य सामग्री और दूसरी वस्तुओं का उचित उपयोग किया जा सके।

4. यदि कलश मिट्टी का है और पूजा-विधि में उसका विसर्जन निर्धारित है, तो स्वच्छ तथा पर्यावरण के अनुकूल तरीके से उसका निस्तारण करें।

5. यदि कलश धातु का है और उसे पुनः उपयोग करना परंपरा के अनुसार उचित है, तो उसे साफ करके भविष्य की पूजा के लिए रखा जा सकता है।

6. यहाँ मिट्टी के कलश और धातु के कलश के बीच अंतर समझना आवश्यक है। 

मिट्टी का कलश एक बार उपयोग के बाद विसर्जित किया जा सकता है, जबकि ताँबे, पीतल या अन्य धातु का पात्र सामान्यतः साफ करके दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है।

हर स्थिति में कलश को नदी में फेंकना अनिवार्य है, ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम मान लेना उचित नहीं है।

7. कलश में रखे अक्षत, सुपारी, सिक्के और दूसरी सामग्री का क्या करें?

पूजा में प्रयुक्त सामग्री को अलग - अलग पहचानकर उसका उचित उपयोग करना चाहिए।

अक्षत: यदि चावल स्वच्छ और खाद्य उपयोग के योग्य हैं, तो परिवार की पूजा - परंपरा के अनुसार उनका उपयोग किया जा सकता है। 

दूषित या खराब चावल भोजन में इस्तेमाल न करें।

सुपारी: यदि सुपारी साफ और सुरक्षित है, तो उसे परंपरा के अनुसार भविष्य की पूजा में रखा जा सकता है। यदि वह खराब हो गई है, तो उसे उपयोग में न लें।

सिक्का: पूजा में रखा गया साफ धातु का सिक्का निकालकर साफ किया जा सकता है और भविष्य के धार्मिक कार्य में उपयोग किया जा सकता है।

पत्ते और पुष्प: यदि वे प्राकृतिक सामग्री हैं, तो उन्हें स्वच्छ मिट्टी में डालना या कम्पोस्ट बनाना एक व्यावहारिक विकल्प है।

लाल वस्त्र और मौली: यदि वे साफ और उपयोग योग्य हैं, तो उन्हें परिवार की परंपरा के अनुसार धार्मिक उपयोग के लिए रखा जा सकता है। 

अनुपयोगी सामग्री को सम्मानपूर्वक और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से हटाना चाहिए।

यहाँ भी मुख्य बात यह है कि पूजा की वस्तुओं को उपेक्षा से न फेंका जाए, बल्कि उनकी स्थिति और उपयोगिता के अनुसार उचित निर्णय लिया जाए।
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नवरात्रि के बाद पवित्र नारियल के नियम और उपाय ;


ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री के अनुसार,  कि कलश के मुख पर स्थापित नारियल माता रानी का साक्षात आशीर्वाद माना जाता है। 

ऐसे में इससे जुड़े कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए-

​प्रसाद के रूप में बाटें : 


कई परिवारों की परंपरा के अनुसार, जो लोग इस नारियल को तोड़कर परिवार के सदस्यों में प्रसाद के रूप में बांटना चाहते हैं, वे नारियल को शुभ मुहूर्त में फोड़ें। 

इस के बाद, सभी परिवार के सदस्यों में नारियल के प्रसाद के रूप में बांट दें। 

मान्यता है कि इसे खाने से घर में सकारात्मकता आती है।

नारियल के जटा की धुनी करें : नारियल का प्रसाद खाने के बाद कभी भी नारियल के जटा को फेंकना नहीं चाहिए। 

ऐसा करना उचित नहीं माना जाता है। 

इस की बजाए, शाम के समय इस जटा को कपूर, लौंग और पीली सरसों के साथ मिलाकर जलाएं। 

फिर, इसका धुआं पूरे घर में घुमाकर धुनी करें। 

कहते हैं कि ऐसा करने से वास्तु दोष, नजर दोष और नकारात्मकता कम होने लगती है।

तिजोरी में करें स्थापना : 


आप चाहें तो इस नारियल को कलश से उठाकर एक नए लाल रेशमी वस्त्र में लपेट लें। 

इस के बाद, नारियल पर लाल मौली लपेटकर इसे अपने घर या व्यापार के स्थान पर तिजोरी में रखें। 

मान्यता है कि यह साल भर धन और बरकत को आकर्षित करता है।

नदी में करें विसर्जन : 


यदि आप किसी कारण नारियल को प्रसाद के रूप में ग्रहण नहीं कर सकते हैं, तो उसे आदर के साथ किसी साफ नदी या बहते हुए जल में विसर्जित कर देना चाहिए।
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नवरात्रि में कलश में भरे पानी का क्या करें ?


घर में करें छिड़काव : 


कलश में भरे पानी को एक आम या अशोक के पत्ते से पूरे घर में छिड़काव करें। 

अपने हर कमरे, रसोई और विशेष रूप से मुख्य द्वार पर इस जल को जरूर छिड़कें। 

मान्यता है कि ऐसा करने से घर से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

पौधों में डालें पानी : 


पूरे घर में पानी का छिड़काव करने के बाद बचे हुए जल को तुलसी के गमले में या अन्य किसी साफ पौधे की जड़ में समर्पित कर दें। 

इस दौरान का एक नियम का विशेष ध्यान रखें कि यह पानी किसी के पैरों को स्पर्श नहीं करना चाहिए।

क्या कलश और नारियल को घर में रखने से विशेष फल मिलता है ?


धार्मिक परंपराओं में पूजा की वस्तुओं को श्रद्धा और मंगलभाव से जोड़ा जाता है। 

लेकिन किसी वस्तु को एक निश्चित स्थान पर रखने से धन प्राप्त होगा, विवाह निश्चित हो जाएगा, बीमारी समाप्त हो जाएगी या कोई विशेष मनोकामना अवश्य पूरी होगी—

ऐसे दावों के लिए स्पष्ट और प्रामाणिक आधार आवश्यक है।

केवल नारियल को लाल कपड़े में बाँधकर रखने से निश्चित रूप से धनवृद्धि होती है, अथवा कलश का जल किसी विशेष दिशा में डालने से सभी बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं, ऐसा दावा बिना प्रमाण के नहीं करना चाहिए।

नवरात्रि की आध्यात्मिक भावना में देवी के प्रति श्रद्धा, सदाचार, संयम, सेवा और आत्मशुद्धि का महत्त्व है। 

पूजा की वस्तुओं का सम्मान करना इसी भावना का एक अंग हो सकता है, लेकिन उसे चमत्कार की गारंटी के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

नाली या गलत स्थान पर न डालें जल : 


कलश के पानी को बेहद पवित्र और ऊर्जा से भरपूर माना जाता है। 

ऐसे में भूलकर भी इस जल को कभी नाली या गलत स्थान पर नहीं बहाना चाहिए।

क्या कलश को नदी में विसर्जित करना ही शास्त्रोक्त नियम है ?


यह प्रश्न विशेष ध्यान देने योग्य है।

विसर्जन शब्द का प्रयोग विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में अलग - अलग अर्थों में किया जाता है। 

किसी पूजा में स्थापित प्रतिमा का विसर्जन, किसी संकल्प का समापन और किसी पूजन - सामग्री का निस्तारण एक ही प्रकार की क्रिया नहीं हैं।

इस लिए नवरात्रि के बाद प्रत्येक कलश को नदी में प्रवाहित करना अनिवार्य है, ऐसा सामान्य नियम घोषित करना उचित नहीं है।

यदि किसी विशिष्ट परंपरा में मिट्टी के कलश का विसर्जन निर्धारित है, तो उसका पालन किया जा सकता है। 

यदि धातु का कलश पुनः उपयोग के लिए रखा जाता है, तो उसे साफ करके रखना भी सामान्य धार्मिक व्यवहार के अनुरूप है।

विसर्जन के नाम पर प्लास्टिक, रासायनिक रंग, धातु के अनुपयुक्त पदार्थ या बड़ी मात्रा में गैर - जैविक पूजा - सामग्री जलस्रोतों में डालने से बचना चाहिए।

नदी, तालाब और अन्य जलस्रोत केवल धार्मिक उपयोग के लिए नहीं, बल्कि जीव - जंतुओं और मनुष्यों के जीवन के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं। 

धार्मिक श्रद्धा और पर्यावरण की रक्षा में विरोध नहीं होना चाहिए।

कलश पर लगे कुमकुम अथवा चंदन का प्रयोग ऐसे करें ;


ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री के अनुसार,  कि कलश पर बनाया गया स्वास्तिक और उस पर चढ़ाई गई रोली अथवा चंदन बहुत सकारात्मक होते हैं। 

ऐसे में कलश को साफ करने से पहले उस रोली या चंदन को उंगली से लेकर अपने परिवार के सदस्यों के माथे पर लगाना चाहिए। 

इसे प्रसाद के रूप में माथे पर लगाने से अत्यंत शुभ फल की प्राप्ति हो सकती है। 

साथ ही, जीवन में सकारात्मकता बढ़ सकती है।

नवरात्रि के बाद कलश हटाने की एक सामान्य और व्यावहारिक विधि ;


यदि आपके परिवार में कोई अलग निर्धारित कुलाचार नहीं है और कलश की स्थापना सामान्य घरेलू पूजा के रूप में की गई थी, तो निम्नलिखित क्रम अपनाया जा सकता है:

1. देवी की आरती करें और श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें।

2. पूजा की समाप्ति की प्रार्थना करें तथा अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा माँगें।

3. नारियल को सावधानी से उतारें और उसकी स्थिति देखकर प्रसाद के रूप में उपयोग करने या अन्य उचित विकल्प का निर्णय लें।

4. कलश का जल स्वच्छ होने पर पौधों या स्वच्छ भूमि में अर्पित करें, अथवा अपनी निर्धारित पूजा-विधि का पालन करें।

5. जौ, पुष्प, पत्ते, अक्षत, सुपारी और अन्य सामग्री को अलग-अलग करके उनकी स्थिति के अनुसार उचित उपयोग या निस्तारण करें।

6. मिट्टी के कलश का विसर्जन अपनी परंपरा और स्थानीय पर्यावरणीय नियमों के अनुसार करें। धातु के कलश को साफ करके भविष्य के पूजन के लिए रखा जा सकता है।

7. पूजा-स्थान को स्वच्छ करें और देवी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें।

यह एक सामान्य व्यावहारिक क्रम है, किसी एक पुराण से उद्धृत अनिवार्य मंत्रयुक्त विधि होने का दावा नहीं है। 

यदि आपने विशेष अनुष्ठान, चंडी - पाठ, दुर्गासप्तशती पाठ, विशेष संकल्प या किसी पुरोहित के निर्देश से कलश स्थापित किया था, तो उस अनुष्ठान की समापन - विधि को प्राथमिकता दें।

कलश और उसमें रखे सिक्के व सुपारी का क्या करें ?


​सिक्का और सुपारी : 


नवरात्रि के पहले दिन कलश के पानी में जो सिक्का और सुपारी डाली गई थी, उसे निकालकर साफ कर लेना चाहिए। 

इस के बाद, सिक्के को अपने पर्स या तिजोरी में बरकत की कामना के साथ रखें। 

वहीं, सुपारी को भविष्य में पूजा के लिए मंदिर में ही स्थापित रहने दें।

कलश का क्या करें : 


अगर कलश मिट्टी का हो, तो उसे बाद में मिट्टी में ही मिला देना चाहिए। 

इसके अलावा, आप कलश में कोई शुभ पौधा भी लगा सकते हैं। 

वहीं, यदि कलश तांबे या पीतल का हो, तो उसे साफ करके दोबारा घर में पूजा के कार्यों में उपयोग किया जा सकता है।

श्रीमद् देवीभागवत के संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण बात ;


श्रीमद् देवीभागवत महापुराण का अध्ययन करते समय यह समझना चाहिए कि देवी की उपासना का विषय केवल बाहरी पूजन - सामग्री तक सीमित नहीं है। 

धार्मिक साधना में श्रद्धा, भक्ति, अनुशासन और धर्माचरण का भी महत्त्व है।

नवरात्रि के नौ दिनों में भक्त देवी का स्मरण करते हैं, अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजा करते हैं, व्रत और जप करते हैं तथा मन और आचरण को शुद्ध रखने का प्रयास करते हैं।

कलश और नारियल उस उपासना के अंग हैं। 

पूजा समाप्त होने पर उनका सम्मानपूर्वक उपयोग या निस्तारण करना उचित है। 

लेकिन प्रत्येक वस्तु के संबंध में अलग - अलग चमत्कारिक फल, भय या दोष की कल्पना जोड़ना आवश्यक नहीं है।

किसी व्यक्ति के पास धातु का कलश हो, किसी के पास मिट्टी का पात्र हो, किसी परिवार में नारियल प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता हो और किसी में विसर्जन की परंपरा हो—

इन भिन्नताओं के कारण किसी की श्रद्धा को स्वतः गलत नहीं कहा जा सकता।

जहाँ शास्त्र का स्पष्ट निर्देश उपलब्ध हो, वहाँ उसका सही संदर्भ प्रस्तुत करना चाहिए। 

जहाँ क्षेत्रीय आचार या पारिवारिक परंपरा हो, वहाँ उसे उसी रूप में बताना चाहिए। 

और जहाँ प्रमाण उपलब्ध न हो, वहाँ किसी कथन को देवीभागवत का श्लोक या आदेश बनाकर नहीं लिखना चाहिए।

निष्कर्ष ;


नवरात्रि के बाद कलश और नारियल के संबंध में सबसे व्यावहारिक मार्ग यही है कि पहले अपनी पूजा - पद्धति और पारिवारिक परंपरा को समझें। 

नारियल सुरक्षित हो तो उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। 

कलश का स्वच्छ जल पौधों या स्वच्छ भूमि में अर्पित किया जा सकता है। 

मिट्टी के कलश का उचित विसर्जन किया जा सकता है, जबकि धातु के कलश को साफ करके पुनः उपयोग के लिए रखा जा सकता है। 

जौ, पुष्प, अक्षत और अन्य सामग्री का निर्णय भी उनकी स्थिति तथा परंपरा के अनुसार करना चाहिए।

इन में से किसी एक विकल्प को सभी परिवारों के लिए अनिवार्य बताने से बचना चाहिए, जब तक उसके समर्थन में स्पष्ट शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध न हो।

देवी की उपासना का सार श्रद्धा, सदाचार, सेवा और समर्पण है। 

नवरात्रि की समाप्ति पर भी यही भावना बनी रहनी चाहिए। 

पूजन - सामग्री का सम्मान करें, स्वच्छता का ध्यान रखें, जलस्रोतों को प्रदूषित न करें और किसी अप्रमाणित भय के कारण अनावश्यक चिंता न करें।

माँ भगवती की कृपा से सभी श्रद्धालुओं के जीवन में सद्बुद्धि, शांति, भक्ति और धर्माचरण की भावना बनी रहे।

जय माता दी। 🙏🌹

शास्त्रीय संदर्भ संबंधी टिप्पणी: इस लेख में श्रीमद् देवीभागवत महापुराण की देवी - उपासना संबंधी व्यापक धार्मिक पृष्ठभूमि का उल्लेख किया गया है। 

कलश, नारियल और जौ के निस्तारण संबंधी प्रत्येक प्रचलित विकल्प को देवीभागवत का प्रत्यक्ष आदेश नहीं बताया गया है, क्योंकि उसके लिए विशिष्ट अध्याय और श्लोक का प्रमाण देना आवश्यक होगा। !!!!! शुभमस्तु !!!
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