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।। श्रीरामचरितमानस प्रवचन - दशरथजीकी मुक्ति क्यों नहीं हुई ? ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीरामचरितमानस प्रवचन - दशरथजीकी मुक्ति क्यों नहीं हुई ? ।। 

।। श्रीरामचरितमानस प्रवचन - दशरथजीकी मुक्ति क्यों नहीं हुई ? ।। 

दशरथजीकी मुक्ति क्यों नहीं हुई ?

जिनके यहाँ भक्तिप्रेमवश साक्षात् सच्चिदानन्द प्रभु श्रीराम पुत्ररूपसे अवतीर्ण हुए, उन परमभाग्यवान् महाराज श्रीदशरथकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है ? 

महाराज दशरथजी मनुके अवतार थे, जो भगवान्‌को पुत्ररूपसे प्राप्तकर अपरिमित आनन्दका अनुभव करनेके लिये ही धरा - धाममें पधारे थे और जिन्होंने अपने जीवनका परित्याग और मोक्षतकका संन्यास करके श्रीराम - प्रेम का आदर्श स्थापित कर दिया।

जिनके महल में स्वयं परब्रह्म परमात्मा बालरूप में विचरण करते हैं, जिनकी गोद में जगत् के स्वामी बैठते हैं, जिनके मुख से निकली हुई आज्ञा को भगवान् श्रीराम अपने जीवन का धर्म मानकर स्वीकार करते हैं—

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{ About this item

  • Material: Brass
  • Colour : Golden
  • Dimensions : Length: 4 inches Width: 6 inches X Height: 9.5 inches Weight 1.980 Kg
  • Included Component : 1 Brass Ram Darbar
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ऐसे दशरथजी को साधारण जीव की दृष्टि से देखना ही उनके चरित्र का अपमान करना है।

यद्यपि राजाको चारों ही पुत्र परमप्रिय थे, परंतु इन सबमें श्रीरामपर राजाका विशेष प्रेम था। 

होना ही चाहिये; क्योंकि इन्हींके लिये तो जन्म - धारणकर सहस्त्रों वर्ष प्रतीक्षा की गयी थी।

फिर प्रश्न उठता है—

जब स्वयं भगवान् श्रीराम उनके पुत्र थे, तब दशरथजी को मोक्ष क्यों नहीं मिला ?

इस प्रश्न का उत्तर श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक सिद्धान्त के रूप में मिलता है। 

तुलसीदासजी कहते हैं—





“रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना।
चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना॥

ताते उमा मोच्छ नहिं पायो।
दसरथ भेद भगति मन लायो॥

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं।
तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥”

अर्थ यह है कि श्रीरघुनाथजी ने अपने पिता दशरथजी के पूर्वकालीन प्रेम को देखकर उनकी ओर कृपा दृष्टि की और उन्हें अपने स्वरूप का दृढ़ ज्ञान दिया। 

फिर शिवजी पार्वतीजी से कहते हैं कि दशरथजी ने अपने मन को भेद - भक्ति में लगाया था, इसलिए उन्होंने कैवल्य - मोक्ष को ग्रहण नहीं किया। 

सगुण भगवान् के उपासक भक्तों को भगवान् अपनी भक्ति प्रदान करते हैं।

वे रामका अपनी आँखोंसे क्षणभरके लिये भी ओझल होना नहीं सह सकते थे। 

जब विश्वामित्रजी यज्ञरक्षार्थ श्रीरामलक्ष्मणको माँगने आये, उस समय श्रीराम की उम्र पन्द्रह वर्ष से अधिक थी, परंतु दशरथने उनको अपने पाससे हटाकर विश्वामित्रके साथ भेजनेमें बड़ी आनाकानी की। 

आखिर वसिष्ठके बहुत समझानेपर वे तैयार हुए। 

यहाँ “मोक्ष नहीं पाया” वाक्य को ठीक प्रकार से समझना अत्यन्त आवश्यक है।

मोक्ष और भगवान् की भक्ति में क्या अन्तर है ?


मोक्ष का सामान्य अर्थ बन्धन से मुक्ति है। 

जीव संसार के जन्म - मरण, कर्मबन्धन और अविद्या से ऊपर उठकर परम तत्त्व में स्थित हो—

यह मोक्ष का दार्शनिक स्वरूप है।

परन्तु भक्ति का मार्ग केवल इतना नहीं चाहता कि जीव संसार से मुक्त हो जाए। 

भक्त की इच्छा है कि भगवान् से उसका प्रेम - संबंध बना रहे।

इसी लिए भक्त के लिए भगवान् केवल निर्गुण ब्रह्म का दार्शनिक तत्त्व नहीं रहते। 

वे उसके आराध्य, स्वामी, पिता, माता, सखा, पुत्र या प्रियतम बन जाते हैं।

दशरथजी का सम्बन्ध श्रीराम से किस रूप में था ?


वे श्रीराम को केवल परमब्रह्म मानकर ध्यान नहीं करते थे। 

वे उन्हें अपने पुत्र के रूप में प्रेम करते थे।

उनके लिए श्रीराम की बाललीला, उनका मुखचन्द्र, उनका चलना, बोलना, पिता को प्रणाम करना और पुत्र के रूप में सेवा करना—

यही परम आनन्द था।

इस लिए दशरथजी का प्रेम संबंधात्मक भक्ति था।

उनकी साधना का चरम यह नहीं था कि “मैं ब्रह्म में लीन हो जाऊँ”; उनके हृदय की आकांक्षा यह थी कि “मेरा राम मेरे सामने रहे।”

यही कारण है कि तुलसीदासजी दशरथजी के चरित्र को मोक्ष से भी आगे भक्ति की दृष्टि से दिखाते हैं।

श्रीराम पर अत्यन्त प्रेम होनेका परिचय तो इसी से मिलता है कि जबतक श्रीराम सामने रहे, तब तक प्राणोंको रखा और अपने वचन सत्य करनेके लिये, रामके बिछुड़ते ही राम - प्रेमानलमें अपने प्राणोंकी आहुति दे डाली !

जो कुछ भी हो, महाराज दशरथने तो श्रीराम का वियोग होते ही जीवन लीला समाप्तकर प्रेमकी टेक रख ली।

दशरथजी का जीवन ही उनकी साधना था ;


दशरथजी ने भगवान् को पुत्ररूप में प्राप्त किया। 

यह कोई सामान्य प्राप्ति नहीं थी।

श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में देवताओं की प्रार्थना के प्रसंग में भगवान् श्रीराम के अवतार का कारण बताया गया है। 

वहाँ दशरथ और कौसल्या को पूर्वजन्म के तप तथा भगवान् के वरदान से सम्बद्ध किया गया है।

इस प्रकार दशरथजी का श्रीराम से सम्बन्ध केवल सांसारिक पिता - पुत्र का सम्बन्ध नहीं था। 

उसके भीतर भगवान् के साथ पूर्वसंचित प्रेम और दिव्य संबंध की परम्परा थी।

इसी लिए जब श्रीराम वन जाने लगे, तब दशरथजी की अवस्था साधारण शोक जैसी नहीं रही।

वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में भी दशरथजी का श्रीराम - वियोग में अत्यन्त करुण अवस्था में पहुँचना वर्णित है। 

वे श्रीराम को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय मानते हैं और उनके वनगमन की कल्पना से टूट जाते हैं।

लेकिन यहाँ भी दशरथजी का चरित्र केवल मोह का चरित्र नहीं है।

जिअन मरन फलु दसरथ पावा। 
अंड अनेक अमल जसु छावा ॥ 

जिअत राम बिधु बदनु निहारा। 
राम बिरह करि मरनु सँवारा ।।

श्रीदशरथजीकी मृत्यु सुधर गयी, रामके विरहमें प्राण देकर उन्होंने आदर्श स्थापित कर दिया। 

दशरथ के समान भाग्यवान् कौन होगा, जिसने श्रीराम - दर्शन - लालसा में अनन्य भाव से राम - परायण हो, रामके लिये, 'राम - राम' पुकारते हुए प्राणोंका त्याग किया।

सत्य के लिए अपने प्राणों का त्याग ;


दशरथजी के जीवन की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने कैकेयी को दिए हुए वरदान को निभाने के लिए अपने प्रियतम पुत्र श्रीराम को वन भेजना स्वीकार किया।

यहाँ उनका हृदय श्रीराम के प्रेम से फट रहा है, फिर भी वे सत्यप्रतिज्ञा से पीछे नहीं हटते।

वाल्मीकि रामायण में भी कैकेयी दशरथजी को उनके पूर्व प्रदत्त वरदान की याद दिलाती है और सत्यपालन को धर्म का आधार बताती है। 

दशरथजी अत्यन्त पीड़ा में होते हुए भी उस धर्मसंकट से बच नहीं पाते।

यही दशरथजी के जीवन का महान् विरोधाभास है—

हृदय कहता है— राम को रोक लो।

धर्म कहता है— दिया हुआ वचन निभाओ।

दशरथजी ने अपने व्यक्तिगत सुख को नहीं चुना।

उन्होंने सत्य को चुना।

और परिणाम यह हुआ कि जिस पुत्र को देखकर उनका जीवन आनन्दित होता था, उसी पुत्र के वनगमन के बाद उनका शरीर जीवित नहीं रह सका।

श्रीरामायणमें लंका - विजयके बाद पुनः रामको ;


दशरथके दर्शन होते हैं। 

श्रीमहादेवजी भगवान् श्रीरामको विमानपर बैठे हुए दशरथजीके दर्शन कराते हैं। 

फिर तो दशरथ सामने आकर श्रीरामको गोदमें बैठा लेते हैं और आलिंगन करते हुए उनसे प्रेमालाप करते हैं। 

यहाँ लक्ष्मणको उपदेश करते हुए महाराज दशरथ स्पष्ट कहते हैं कि 'हे सुमित्रा सुख - वर्धन लक्ष्मण! 

श्रीरामकी सेवामें लगे रहना, तेरा इससे बड़ा कल्याण होगा। 

इन्द्र सहित तीनों लोक, सिद्ध पुरुष और सभी महान् ऋषि-मुनि पुरुषोत्तम श्रीरामका अभिवन्दनकर उनकी पूजा करते हैं। 

वेदोंमें जिन अव्यक्त अक्षर ब्रह्मको देवताओंका हृदय और गुप्त तत्त्व कहा है, ये परम तपस्वी राम वही हैं।' (वा० रा० ६।११९। २७-३०)

यहाँ पर शंका होती है कि जब शुद्ध सच्चिदानन्दघन श्रीराममें मन लगाकर 'राम - राम' कीर्तन करते हुए दशरथने प्राणोंका त्याग किया था, तब फिर उनकी मुक्ति कैसे नहीं हुई? 

यदि श्रीरामनामके प्रतापसे मुक्ति नहीं होती, तो फिर यह कैसे कहा जाता है कि अन्तकालमें श्रीरामनाम लेनेसे समस्त बन्धन कट जाते हैं और नाम लेनेवाला परमात्माको प्राप्त होता है? 

और यदि राम में  मन लगाकर मरनेपर भी मुक्ति नहीं होती, तो फिर गीताके उस भगवद्वचनकी व्यर्थता होती है, जिसमें भगवान्ने यह कहा है कि-

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। 
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥

'जो पुरुष अन्तकालमें मुझको स्मरण करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, वह निःसन्देह ही मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है।'

इन प्रश्नोंका उत्तर तो गीताके इससे अगले श्लोकमें ही मिल जाता है। 

जिस प्रकारकी भावना करता हुआ मनुष्य प्राण छोड़ता है, उसी प्रकारकी गतिको प्राप्त होता है। 

ज्ञानमार्गी साधक अद्वैत अक्षर परब्रह्ममें चित्तकी वृत्तियोंको विलीनकर देहत्याग करता है, तो उसकी अवश्य ही 'सायुज्य' मुक्ति होती है; 

परंतु ऐसा हुए बिना केवल श्रीरामनामके जपसे 'सायुज्य' मुक्ति नहीं होती। 

इस में कोई सन्देह नहीं कि श्रीराममें मन लगाकर 'राम - राम' कीर्तन करते हुए प्राण - त्याग कर ने वाला मुक्त हो जाता है। 

सच तो यह है कि बिना मन लगाये भी श्रीराम नाम का अन्तकालमें उच्चारण हो जानेसे ही जीव मुक्तिका अधिकारी हो जाता है, इसीसे सन्तोंने अन्तमें श्रीरामनामको दुर्लभ बताया है-

जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। 
अंत राम कहि आवत नाहीं ॥ 

परंतु मुक्ति होती वैसी ही है, जैसी वह चाहता है। 

'तो क्या मुक्ति भी कई प्रकारकी है? 

यदि कई प्रकारकी मुक्ति है, तो फिर मुक्तिका महत्त्व ही क्या रह गया?'

इस प्रश्नका उत्तर यह है कि 'तत्त्वबोधरूप' मुक्ति तो एक ही है, परंतु केवल तत्त्वबोध होकर 'सायुज्य' मुक्ति भी हो सकती है, जिसमें जीवकी भिन्न सत्ता यथार्थ स्व - स्वरूप परमात्मसत्तामें अभिन्नरूपसे विलीन हो जाती है और तत्त्वका पूरा बोध होनेके साथ - ही - साथ सगुण, साकार, सौन्दर्य और माधुर्यकी पराकाष्ठा अनूपरूप भगवत्स्वरूपमें परम प्रेम होने के कारण वह मुक्त पुरुष ( सायुज्य मुक्तिरूपी धनका स्वामी होनेपर भी ) भगवान्‌की सामीप्य, सालोक्य, साष्टि और सारूप्य मुक्तिका रसमय सुख भोगता है। 

श्रीराम - वियोग में मृत्यु ;


श्रीरामचरितमानस में दशरथजी के अन्तिम क्षण अत्यन्त मार्मिक रूप में आते हैं—

“राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥”

अर्थात् राम-राम कहते हुए, राम का स्मरण करते हुए, श्रीरघुवर के विरह में राजा दशरथजी ने शरीर त्याग दिया और सुरधाम को चले गए।

यहाँ तुलसीदासजी ने “मोक्ष” शब्द का प्रयोग नहीं किया।

उन्होंने कहा—“गयउ सुरधाम”।

अर्थात् दशरथजी के देहत्याग को सुरलोक-गमन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इसके बाद तुलसीदासजी कहते हैं—

“जिअन मरन फलु दसरथ पावा।
अंड अनेक अमल जसु छावा॥

जिअत राम बिधु बदनु निहारा।
राम बिरह करि मरनु सँवारा॥”

यह चौपाई दशरथजी की महिमा का अत्यन्त गम्भीर प्रमाण है।

तुलसीदासजी कहते हैं कि दशरथजी ने जीवन और मरण—

दोनों का फल पा लिया। 

जीवित रहते हुए उन्होंने श्रीराम के चन्द्रमा के समान मुख का दर्शन किया और श्रीराम - विरह में मृत्यु को भी सुशोभित कर दिया।

अर्थात् दशरथजी की मृत्यु को कवि केवल मृत्यु नहीं मानते। 

राम - विरह ने उनकी मृत्यु को भी साधना बना दिया।

फिर “मोक्ष नहीं पाया” क्यों कहा गया ?


यहीं मानस का अत्यन्त सूक्ष्म रहस्य है।

उत्तरकाण्ड में जब श्रीराम लंका - विजय के बाद पुनः अपने पिता से मिलते हैं, तब दशरथजी स्वर्ग से आते हैं। 

वे श्रीराम को देखकर प्रेम से भर जाते हैं। 

उनके नेत्रों में प्रेमाश्रु आते हैं और उनका पुराना वात्सल्य जाग उठता है।

श्रीराम अपने पिता के उस प्रेम को पहचानते हैं।

तुलसीदासजी कहते हैं—

“रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना।
चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना॥”

श्रीराम ने पिता के पूर्व प्रेम को पहचानकर अपनी कृपा दृष्टि से उन्हें दृढ़ ज्ञान प्रदान किया।

अब सामान्य दृष्टि से देखा जाए तो ज्ञान प्राप्त होने के बाद मोक्ष होना चाहिए।

लेकिन यहाँ भगवान् स्वयं निर्णय करते हैं कि दशरथजी के लिए क्या श्रेष्ठ है।

तुलसीदासजी आगे कहते हैं—

“ताते उमा मोच्छ नहिं पायो।
दसरथ भेद भगति मन लायो॥”

अर्थात् हे उमा! दशरथजी ने अपने मन को भेद - भक्ति में लगाया था, इस लिए उन्होंने कैवल्य - मोक्ष नहीं पाया।

यहाँ “भेद” का अर्थ यह समझना चाहिए कि भक्त और भगवान् के बीच प्रेमपूर्ण संबंध बना रहे।

दशरथजी के लिए श्रीराम केवल “मैं ही ब्रह्म हूँ” के अनुभव का विषय नहीं थे।

वे उनके राम थे।

वे उनके पुत्र थे।

वे उनके प्राण थे।

उनका हृदय भगवान् में लीन होकर अपने प्रेम-संबंध को समाप्त नहीं करना चाहता था।

तुलसीदासजी का अगला वचन इसी रहस्य को स्पष्ट करता है—

“सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं।
तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥”

अर्थात् सगुण भगवान् के उपासक केवल कैवल्य-मोक्ष को ही अपना लक्ष्य नहीं बनाते; श्रीराम उन्हें अपनी भक्ति प्रदान करते हैं।

इस लिए दशरथजी को “वंचित” या “अभागा” समझना इस प्रसंग का गलत अर्थ होगा।

दशरथजी को क्या मिला?


उन्हें क्या नहीं मिला—यह प्रश्न करने की अपेक्षा यह देखना चाहिए कि उन्हें क्या मिला।

उन्हें भगवान् श्रीराम पुत्ररूप में मिले।

उन्हें भगवान् की बाललीला देखने का अवसर मिला।

उन्हें श्रीराम को गोद में लेने का सौभाग्य मिला।

उन्हें श्रीराम का पिता कहलाने का सौभाग्य मिला।

उन्हें श्रीराम से पुत्रवत् प्रेम मिला।

उन्हें श्रीराम के मुखचन्द्र का दर्शन मिला।

उन्हें श्रीराम-विरह में “राम-राम” कहते हुए शरीर छोड़ने का अवसर मिला।

और जब श्रीराम ने पुनः उनका दर्शन किया, तब भगवान् ने उन्हें दृढ़ ज्ञान प्रदान किया।

अन्त में दशरथजी भगवान् को प्रणाम करके हर्षपूर्वक सुरधाम चले गए।

अतः “मोक्ष नहीं पाया” का अर्थ भगवान् से दूर होना नहीं, बल्कि तुलसीदासजी के द्वारा भक्ति को कैवल्य से भी अधिक प्रिय दिखाना है।

दशरथजी का वियोग भी भक्ति है ;


सामान्यतः संसार में वियोग दुःख का कारण है।

लेकिन भगवान् के भक्त के लिए भगवान् का वियोग भी भगवान् से सम्बन्ध बनाए रखता है।

दशरथजी श्रीराम के वियोग में रोते हैं।

उनके मुख से बार-बार श्रीराम का नाम निकलता है।

और अन्तिम क्षण में भी उनका चित्त श्रीराम से हटता नहीं।

इस लिए उनका वियोग भी भगवान् से जुड़ा हुआ है।

इसी कारण तुलसीदासजी कहते हैं—

“राम बिरह करि मरनु सँवारा।”

राम-विरह ने मृत्यु को सँवार दिया।

यह पंक्ति अत्यन्त गम्भीर है।

मृत्यु सामान्यतः जीवन का अन्त मानी जाती है, लेकिन जब अन्तिम स्मरण भगवान् का हो जाए, तब वही मृत्यु आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यन्त मंगलकारी बन जाती है।

नाम - स्मरण की महिमा ;


दशरथजी के अन्तिम समय में “राम” नाम का उच्चारण होना भी मानस के भक्ति - सिद्धान्त का महत्त्वपूर्ण संकेत है।

तुलसीदासजी अन्यत्र रामनाम की महिमा बताते हुए यह भाव रखते हैं कि भगवान् का नाम स्वयं अत्यन्त पवित्र और पापहरण करने वाला है।

बालकाण्ड में शिवजी रामनाम की महिमा बताते हुए कहते हैं कि वही राम उनके आराध्य हैं जिनके नाम के बल से वे काशी में मरने वाले जीव को शोक से मुक्त करते हैं।

इसलिए दशरथजी के मुख से अन्तिम समय में “राम” का निकलना केवल पुत्र को पुकारना नहीं है।

यह नाम और नामी के अभेद प्रेम का चरम क्षण है।

दशरथजी की मुक्ति का वास्तविक रहस्य ;


अब पूरे प्रसंग का निष्कर्ष समझिए।

यदि “मुक्ति” से अर्थ केवल संसार के बन्धन से छुटकारा है, तो दशरथजी को दुखी या आध्यात्मिक रूप से असफल मानना उचित नहीं है।

लेकिन यदि रामचरितमानस के उस विशेष प्रसंग में “मोक्ष” से कैवल्य-मोक्ष का अर्थ लिया जाए, तो तुलसीदासजी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि दशरथजी ने उसे ग्रहण नहीं किया।

क्यों?

क्योंकि उनके हृदय में भेद-भक्ति थी।

वे भगवान् को खोना नहीं चाहते थे।

वे भगवान् में केवल निराकार तत्त्व के रूप में विलीन होना नहीं चाहते थे।

वे श्रीराम के प्रेम-संबंध में रहना चाहते थे।

इसलिए भगवान् ने उन्हें वही दिया जो उनके हृदय को सबसे प्रिय था—

अपनी भक्ति।

यही भक्तिमार्ग की अद्भुत विशेषता है।

दशरथजी का चरित्र हमें क्या सिखाता है ?


दशरथजी का चरित्र केवल यह शिक्षा नहीं देता कि भगवान् के दर्शन हो जाएँ।

यह उससे भी गहरी शिक्षा देता है कि भगवान् से हमारा सम्बन्ध कैसा हो।

दशरथजी ने भगवान् को पुत्र मानकर प्रेम किया।

परन्तु जब धर्म की परीक्षा आई, तब उन्होंने अपने व्यक्तिगत प्रेम से ऊपर सत्य को रखा।

राम उनके प्राण थे, फिर भी वे सत्यवचन से विमुख नहीं हुए।

इस लिए उनका जीवन प्रेम और धर्म—दोनों का संगम है।

भक्त भगवान् से क्या चाहता है ?


ज्ञानमार्ग में साधक परम तत्त्व को जानना चाहता है।

योगमार्ग में साधक चित्तवृत्तियों का निरोध चाहता है।

मोक्षमार्ग में साधक जन्म - मरण के बन्धन से मुक्त होना चाहता है।

लेकिन प्रेमभक्ति में भक्त की स्थिति अलग होती है।

वह भगवान् को पाकर भगवान् से अलग नहीं होना चाहता।

दशरथजी के जीवन में यही भाव दिखाई देता है।

उन्होंने श्रीराम को पुत्र के रूप में पाया।

इसलिए उनके लिए श्रीराम का बालरूप ही परम धन था।

उनका वात्सल्य ही उनकी उपासना था।

उनका राम-वियोग ही उनकी तपस्या था।

उनका “राम-राम” कहते हुए प्राण त्यागना ही उनकी अन्तिम साधना थी।

और भगवान् ने उन्हें केवल मुक्ति नहीं दी—अपनी भक्ति दी।

केवल तत्त्वबोधद्वारा प्राणोंका उत्क्रमण न होकर परमात्मामें मिल जाना यह अभेद मुक्ति और अभेद ज्ञानपूर्वक साकार ईश्वरके सेवार्थ व्यवहारमें भेद रहना, यह चतुर्विध भेदमुक्ति, ये दोनों वास्तवमें एक ही मुक्तिके दो स्वरूप हैं। 

परंतु शुद्ध प्रेमी भक्त इन दोनों प्रकारकी मुक्तियोंसे भी अलग रहकर केवल भगवत्सेवामें लगा रहता है और जैसे भगवान् नित्य, मुक्त, अज, अविनाशी होते हुए भी लीलासे अवतार - शरीर धारण करके विविध कर्म करते हैं, ऐसे ही वह भक्त भी उन्हींका अनुसरण करता हुआ उन्हींकी भाँति भगवान्‌की पवित्र लीलामें लीलासे ही लगा रहता है। 

वह मुक्ति नहीं चाहता। 

अतएव जब उसे भगवदिच्छासे, भगवदर्थ, भगवदाज्ञानुसार निर्लेपभावसे एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाना पड़ता है, तब वह भगवत्स्मरण और भगवन्नाम - गुण - कीर्तन करता हुआ ही जाता है। 

दूसरा काम तो उसको कोई रहता ही नहीं; क्योंकि उसकी स्थिति दृढ़ अनन्य विशुद्ध प्रेमभावसे प्रेममय परमात्मामें ही रहती है। 

इतना होने पर भी उपर्युक्त कारणसे ऐसे भक्तकी अभेद मुक्ति नहीं होती। 

इसी लिये भगवान् शिवजी जगज्जननी उमासे दशरथजीके सम्बन्धमें कहते हैं-

ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। 
दसरथ भेद भगति मन लायो ।। 

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। 
तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं।।

अतएव यह नहीं समझना चाहिये कि अन्तमें श्रीरामनामका जप - कीर्तन करनेसे और श्रीराममें मन लगा ने से मुक्ति नहीं होती और इसी कारण दशरथजीकी भी मुक्ति नहीं हुई। 

समझना यह चाहिये कि दशरथजीको इस मुक्तिकी कोई परवाह नहीं थी। 

वे तो रामरसके रसिक थे, इसी लिये उस रसके सामने उन्होंने मोक्षका भी जान - बूझकर ही। 

संन्यास कर दिया। 

ऐसे मोक्ष - संन्यासी प्रेमी भक्तोंकी चरण - सेवाके लिये मुक्ति तो पीछे - पीछे घूमा करती है।

उनकी मृत्यु भगवान् के विरह में हुई, पर उनके मुख से भगवान् का नाम निकला।

और मृत्यु के बाद जब उन्हें भगवान् का दर्शन मिला, तब भगवान् ने उनके प्रेम को पहचानकर उन्हें दृढ़ ज्ञान दिया।

फिर भी दशरथजी ने कैवल्य-मोक्ष की अपेक्षा भगवान् की भक्ति को स्वीकार किया।

यही कारण है कि उनका चरित्र भक्तिमार्ग में अत्यन्त ऊँचा स्थान रखता है।

अन्तिम संदेश ;


इसलिए प्रश्न को केवल इतना नहीं पूछना चाहिए—

“दशरथजी को मोक्ष क्यों नहीं मिला?”

बल्कि प्रश्न यह होना चाहिए—

“दशरथजी को मोक्ष से भी अधिक प्रिय क्या मिला?”

उत्तर है—

श्रीराम की भक्ति।

जिस भक्त के सामने स्वयं भगवान् उपस्थित हों, उस भक्त के लिए केवल मुक्ति की माँग छोटी हो सकती है।

भक्त कह सकता है—

मुझे ऐसा मोक्ष नहीं चाहिए जिसमें मेरा राम से प्रेम-संबंध ही समाप्त हो जाए।

मुझे ऐसा ज्ञान नहीं चाहिए जिसमें मेरा प्रभु मेरे लिए केवल एक निरपेक्ष तत्त्व रह जाए।

मुझे तो वह अवस्था चाहिए जिसमें मेरा हृदय श्रीराम के चरणों में प्रेम से लगा रहे।

दशरथजी का जीवन इसी भाव का दिव्य उदाहरण है।

उन्होंने जीवन में राम को देखा।

राम को पुत्ररूप में प्रेम किया।

राम-वियोग में प्राण छोड़े।

मृत्यु के समय रामनाम लिया।

मृत्यु के पश्चात् श्रीराम का पुनः दर्शन पाया।

और भगवान् से कैवल्य के स्थान पर भगवान् की भक्ति प्राप्त की।

इसलिए दशरथजी की कथा को “मोक्ष से वंचित होने” की कथा कहना उचित नहीं।

यह तो मोक्ष से भी अधिक भगवान्-भक्ति को महत्त्व देने वाली कथा है।

तुलसीदासजी ने जिस रहस्य को अत्यन्त संक्षेप में कह दिया—

“ताते उमा मोच्छ नहिं पायो।
दसरथ भेद भगति मन लायो॥

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं।
तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥”

उसका सार यही है कि भगवान् के भक्त के लिए भगवान् से प्रेम ही परम पुरुषार्थ बन सकता है।

और दशरथजी के जीवन की पूर्णता इसी में है कि उन्हें भगवान् श्रीराम केवल दर्शन देने वाले परमात्मा के रूप में नहीं, बल्कि अपने प्राणप्रिय पुत्र के रूप में प्राप्त हुए।

इसीलिए अयोध्याकाण्ड में तुलसीदासजी उनके जीवन और मरण दोनों को सफल बताते हैं—

“जिअन मरन फलु दसरथ पावा।”

जीवन में राम का दर्शन और मृत्यु में राम का स्मरण—

दशरथजी ने दोनों प्राप्त किए।

और यही उनके जीवन का सबसे बड़ा आध्यात्मिक फल है।

श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु।

श्रीमद् देवी भागवत - वृंदावन के इस देवी मंदिर में दर्शन पूजन से बन जाते हैं शादी के संयोग,

श्रीमद् देवी भागवत  - वृंदावन के इस देवी मंदिर में दर्शन पूजन से बन जाते हैं शादी के संयोग, श्रीमद् देवी भागवत  - वृंदावन के इस देवी मंदिर म...