‼️श्रीरामचरितमानस - संतों से जाना‼️

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

‼️श्रीरामचरितमानस - संतों से जाना‼️

❗राम कृपा ही केवलम्❗

अपनी विचार - दृष्टि से देखो कि अपने लिए क्या चाहते हो, अर्थात् किसके प्राप्त करने पर किसी प्रकार की कमी नहीं रहेगी यानी पूर्णता प्राप्त होगी। 

इसका भलीभाँति निश्चय करना ही जीवन का परम लक्ष्य कहा जाता है। 

श्री तुलसीकृत रामायण एवं दक्षिण भारतीय रामायण ;

जो चाहते हो, जब तक वह प्राप्त न हो, तब तक प्राप्त न होने का दुःख लगातार बढ़ते रहना चाहिए। 

मनुष्य अपने जीवन में अनेक वस्तुओं की इच्छा करता है। 

धन चाहिए, प्रतिष्ठा चाहिए, परिवार में सुख चाहिए, शरीर में आरोग्य चाहिए, कार्य में सफलता चाहिए, मन में शांति चाहिए और भविष्य में सुरक्षा चाहिए। 

यहाँ तक कि फिर किसी प्रकार से भी सहन न हो। 

ऐसा होने पर जो चाहते हो वह अवश्य प्राप्त होगा। 







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संतों से जाना — अपनी विचार - दृष्टि से देखो कि अपने लिए क्या चाहते हो?

अर्थात् किसकी प्राप्ति होने पर किसी प्रकार की कमी नहीं रहेगी और पूर्णता प्राप्त होगी ?

मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रकार की प्राप्तियाँ चाहता है। 

धन हो, सुख हो, सम्मान हो, परिवार में शांति हो, शरीर स्वस्थ रहे, कार्य सफल हो और भविष्य सुरक्षित रहे—

ये सभी इच्छाएँ जीवन के व्यवहारिक स्तर पर स्वाभाविक हैं। 

लेकिन संतों की दृष्टि इससे आगे का प्रश्न पूछती है—

यदि यह सब मिल भी जाए, तो क्या मनुष्य के भीतर की सारी कमी समाप्त हो जाएगी ?

यहीं से श्रीरामकथा का आध्यात्मिक रहस्य आरम्भ होता है।

गोस्वामी तुलसीदासजी के श्रीरामचरितमानस में संत - संग, विवेक और श्रीरामभक्ति को जीवन की अत्यंत ऊँची उपलब्धि के रूप में रखा गया है। 

बालकाण्ड में स्पष्ट कहा गया है—

“बिनु सतसंग बिबेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सतसंगत मुद मंगल मूला।
सोइ फल सिधि सब साधन फूला॥”

अर्थात् सत्संग के बिना विवेक उत्पन्न नहीं होता और श्रीराम की कृपा के बिना सत्संग सहज नहीं मिलता। 

सत्संग आनंद और मंगल का मूल है तथा अन्य साधन उसके फूल के समान हैं।

यहाँ “विचार - दृष्टि” का वास्तविक अर्थ सामने आता है। 

संत मनुष्य को केवल यह नहीं बताते कि क्या प्राप्त करना है; 

वे यह भी सिखाते हैं कि प्राप्ति की इच्छा करने से पहले यह पहचानो कि वास्तव में प्राप्त करने योग्य क्या है।

अपने लिए क्या चाहते हो—यह प्रश्न ही साधना का आरम्भ है ;


यदि मनुष्य से पूछा जाए—

“तुम्हें क्या चाहिए?” 

तो सामान्य उत्तर होगा—

सुख चाहिए।

लेकिन सुख किसमें है ?

धन में ?

सम्मान में ?

इच्छा की पूर्ति में ?

सुविधा में ?

या उस अवस्था में जिसमें प्राप्ति और अप्राप्ति दोनों के बीच मन का परम आश्रय स्थिर रहे?

तुलसीदासजी के मानस में संतों की शिक्षा मनुष्य को इसी विवेक तक ले जाती है।

उत्तरकाण्ड में कहा गया है—

“भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥”

भक्ति स्वतंत्र है और सब सुखों की खान है; परन्तु सत्संग के बिना प्राणी उसे प्राप्त नहीं कर पाते। 

आगे सत्संगति को संसार-चक्र के अंत का साधन बताया गया है।

यहाँ “सुख की खान” का अर्थ सांसारिक सुविधा की गारंटी नहीं है। 

इस का अर्थ आध्यात्मिक दृष्टि से यह है कि भक्ति मनुष्य के जीवन को उस परम आश्रय से जोड़ती है जहाँ उसकी अंतिम शांति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहती।

सामने एक और अधिक मूल प्रश्न खड़ा होता है—

इन सबकी प्राप्ति के बाद भी क्या मनुष्य की चाह समाप्त हो जाती है?

इस में कुछ भी सन्देह नहीं है, परन्तु चाह सच्ची होनी चाहिए। 

सच्ची चाह होने पर ही उसके पूरे न होने का दुःख इस प्रकार होता है कि वह सहन नहीं होता। 

यदि कोई प्राप्ति ऐसी है जिसके बाद भी दूसरी वस्तु की इच्छा बनी रहती है, तो वह अंतिम पूर्णता नहीं है। 

श्रीरामचरितमानस का संत - विचार मनुष्य की दृष्टि को बाहरी प्राप्तियों से हटाकर उस परम प्राप्ति की ओर ले जाता है, जिसमें मन को स्थायी आश्रय, विवेक, भक्ति और परमात्मा का स्मरण प्राप्त हो।

जीवन की सारी क्रियाएँ एक ही लक्ष्य के लिए होनी चाहिए, क्योंकि यही सच्चाई है। 

क्रियाएँ स्वरूप से देखने में भिन्न - भिन्न प्रकार की भले ही हों, परन्तु उन सबका लक्ष्य एक होना चाहिए, यह भली - भाँति समझने की बात है। 

ऐसा होने पर सारा जीवन लक्ष्य की पूर्ति का साधन बन जाता है, जिससे जीवन - यात्रा सुलभ तथा सरल हो जाती है और लक्ष्य की पूर्ति अवश्य होती है।


            


गोस्वामी तुलसीदासजी ने उत्तरकाण्ड में संत - स्वभाव बताते हुए संतों को परहितकारी, सहनशील और सुखद कहा है। 

वहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “संत मिलन सम सुख जग नाहीं”—

संसार में संत - मिलन के समान कोई सुख नहीं। 

इसी प्रसंग में संत का सहज स्वभाव “पर उपकार बचन मन काया” बताया गया है।

इस लिए “अपने लिए क्या चाहते हो ?” 

इस प्रश्न का मानसगत उत्तर केवल भौतिक इच्छा की सूची बनाना नहीं है। 

संतों से पूछकर इसका अर्थ है—

ऐसी कौन - सी प्राप्ति चाहनी चाहिए जिससे मन की मूल दरिद्रता समाप्त हो, विवेक जागे और जीवन का परम प्रयोजन सिद्ध हो?

लक्ष्य एक ही सच्चा होता है। 

क्रियाओं में अनेकता होती है, लक्ष्य में नहीं। 

संत मनुष्य की इच्छा को समाप्त नहीं करते, उसकी दिशा बदलते हैं ;


संतों का उपदेश यह नहीं कि जीवन में कोई इच्छा ही न रखो।

बल्कि संत - विचार यह सिखाता है कि इच्छा का विषय पहचानो।

यदि इच्छा केवल इन्द्रिय - सुख तक सीमित है तो उसकी सीमा होती है।

यदि इच्छा धन तक सीमित है तो धन की भी सीमा है।

यदि इच्छा प्रतिष्ठा तक सीमित है तो प्रतिष्ठा भी परिवर्तनशील है।

यदि इच्छा स्वर्ग तक सीमित है तो मानस के भक्तिपरक विवेचन में स्वर्ग भी अंतिम लक्ष्य नहीं माना गया।

उत्तरकाण्ड में संत - संग से उत्पन्न भक्ति के प्रसंग में कहा गया है—

“प्रीति सदा सज्जन संसर्गा।
तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा॥”

अर्थात् जिस हृदय में सज्जनों के संग की प्रीति है, उसके लिए विषय, स्वर्ग और अपवर्ग तक तृण के समान हो जाते हैं—

भक्ति की तुलना में उनकी अंतिम महत्ता नहीं रहती।

इसका सीधा आध्यात्मिक संकेत है—

जो प्राप्ति भगवान के प्रेम से नीचे है, उसे अंतिम पूर्णता मानना मानस की दृष्टि नहीं है।

पहले यह पहचानना आवश्यक है कि कमी कहाँ है ;


मनुष्य सामान्यतः कमी को बाहरी वस्तुओं में खोजता है। 

उसे लगता है कि अमुक वस्तु मिल जाए तो संतोष होगा। 

परंतु एक वस्तु मिलने के बाद दूसरी आवश्यकता सामने आती है। 

श्रीरामचरितमानस इस अंतहीन मानसिक दौड़ के पीछे स्थित मूल रोगों की ओर संकेत करता है।

उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि द्वारा बताए गए मानस - रोगों में मोह, काम, क्रोध, लोभ, ममता, ईर्ष्या, अहंकार, दंभ, कपट, मद, मान, तृष्णा और अविवेक आदि का वर्णन मिलता है। 

वहाँ मोह को अनेक व्याधियों का मूल बताया गया है।

अर्थात् केवल बाहरी परिस्थितियाँ बदल जाने से भीतर की कमी समाप्त नहीं होती।

धन बढ़ सकता है, लेकिन लोभ समाप्त होना अलग बात है।

मान - सम्मान बढ़ सकता है, लेकिन अहंकार समाप्त होना अलग बात है।

सुखद परिस्थितियाँ आ सकती हैं, लेकिन मोह और भय से मुक्ति अलग बात है।

ज्ञान की पुस्तकें पढ़ी जा सकती हैं, लेकिन विवेक का जागना अलग बात है।

यहीं से संतों की दृष्टि प्रारम्भ होती है।

इस लिए क्रियाओं को लक्ष्य कभी मत समझो, बल्कि क्रियाओं के अन्त होने पर लक्ष्य पर सदैव दृष्टि रक्खो और जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो, चैन से न रहो।

शारीरिक दशा कहने में नहीं आती, क्योंकि कथन उसका हो सकता है, जो एकसा रहे।

संत मनुष्य को उसकी वास्तविक आवश्यकता बताते हैं ;


बालकाण्ड में तुलसीदासजी संत और असंत के स्वभाव का अंतर बताते हैं। 

संतों की संगति को ऐसा साधन माना गया है जो मनुष्य की दिशा बदल देता है। 

संत - वंदना के प्रसंग में संतों को अमृत के समान और असंत - संग को मोह एवं पतनकारी प्रभाव से जोड़ा गया है।

यहाँ “संत” शब्द केवल बाहरी वेश का संकेत नहीं है। 

मानस के उत्तरकाण्ड में संत का लक्षण उसके आचरण से प्रकट होता है—

वह परहित करता है, दूसरों के दुःख में सहानुभूति रखता है, निंदा और स्तुति में समभाव रखता है और भगवान के चरणों में प्रेम रखता है। 

तुलसीदासजी संतों को “गुण मंदिर” और “सुख पुंज” कहते हैं।

इससे अपनी विचार - दृष्टि के लिए एक स्पष्ट कसौटी मिलती है—

जिस प्राप्ति से अहंकार बढ़े, वह पूर्णता नहीं।

जिस प्राप्ति से लोभ बढ़े, वह पूर्णता नहीं।

जिस प्राप्ति से दूसरों के प्रति द्वेष बढ़े, वह पूर्णता नहीं।

जिस प्राप्ति से भगवान का स्मरण, विवेक, करुणा और संतोष बढ़े, वही जीवन को उच्च दिशा देती है।

तुलसीकृत रामायण में संत-संग का स्थान ;


बालकाण्ड में तुलसीदासजी संत - संग की महिमा का विस्तार करते हुए कहते हैं—

“मति कीरति गति भूति भलाई।
जब जेहि जतन जहाँ जेहि पाई॥
सो जानब सतसंग प्रभाऊ।
लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥”

अर्थात् बुद्धि, कीर्ति, गति, ऐश्वर्य और भलाई आदि जब किसी को प्राप्त होते हैं तो उन्हें सत्संग के प्रभाव के रूप में समझना चाहिए। इसके बाद—

“बिनु सतसंग बिबेक न होई।”

यहाँ संत - संग का सबसे बड़ा फल विवेक बताया गया है।

विवेक जागने पर मनुष्य यह समझने लगता है कि—

जो बदलता है, वह अंतिम आश्रय नहीं।

जो नष्ट होता है, वह परम प्राप्ति नहीं।

जो प्राप्त होकर भी दूसरी इच्छा उत्पन्न करता है, वह पूर्णता का अंतिम रूप नहीं।

और जो मनुष्य को भगवान की ओर ले जाए, उसके भीतर संतोष, भक्ति, विनय और परहित जगाए—

उसकी आध्यात्मिक महत्ता अधिक है।

सत्संग क्यों आवश्यक है ?


श्रीरामचरितमानस का अत्यंत प्रसिद्ध सिद्धान्त है—

“बिनु सतसंग बिबेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥”

अर्थात् सत्संग के बिना विवेक सहज नहीं होता और राम - कृपा के बिना सत्संग की प्राप्ति भी सहज नहीं होती। 

आगे सत्संगति को आनंद और मंगल का मूल कहा गया है।

यहाँ “विवेक” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विवेक का अर्थ केवल पढ़ा - लिखा होना नहीं है। विवेक का अर्थ है—

क्या स्थायी है और क्या अस्थायी; क्या साधन है और क्या साध्य; क्या शरीर की आवश्यकता है और क्या आत्मिक आवश्यकता; क्या इच्छा है और क्या वास्तविक कल्याण—

इनमें भेद कर सकना।

जब विवेक जागता है तब मनुष्य अपने आप से पूछता है—

मैं जिस वस्तु के पीछे दौड़ रहा हूँ, क्या वह स्थायी है ?

यदि वह मिल गई तो क्या मेरी सभी इच्छाएँ समाप्त होंगी ?

क्या मेरी शांति किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर है ?

क्या मैं सुख चाहता हूँ या सुख का स्थायी आधार ?

यहीं संतों की शिक्षा जीवन की दिशा बदलती है।

इस सराय में रोग - रूपी मुसाफिर तो ठहरे ही रहते हैं।

वास्तव में तो जीवन की आशा ही परम रोग और निराशा ही आरोग्यता है। 

देह - भाव का त्याग ही सच्ची औषधि है।

दक्षिण भारतीय रामायण - परंपरा में यही भाव किस प्रकार दिखाई देता है ?


दक्षिण भारतीय रामायण परंपरा एकरूप नहीं है। 

तमिल की प्रमुख रामकथा कंबरामायणम्, जिसे इरामावतारम् भी कहा जाता है, रामकथा का अत्यंत महत्वपूर्ण तमिल काव्यरूप है। 

इस में कंबर ने रामकथा को तमिल काव्य-परंपरा के अनुरूप पुनः अभिव्यक्त किया। 

इस की संरचना और कई प्रसंग वाल्मीकि रामायण से भिन्न हैं; 

उदाहरणतः 

इसमें छह काण्ड हैं और उत्तरकाण्ड सम्मिलित नहीं है।

इस लिए “दक्षिण भारती रामायण” को एक ही निश्चित ग्रंथ मानकर उसमें ऐसे श्लोक खोज देना उचित नहीं होगा जो वास्तव में किसी दूसरे रामायण-पाठ के हों।

लेकिन कंबरामायणम् में राम के प्रति दास्य, सेवा, समर्पण और भक्ति की भावना अत्यंत स्पष्ट है।

सुन्दरकाण्ड के एक प्रसंग में हनुमान अपने को राम के सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। 

वहाँ उनका भाव है कि वे राम के सेवकों में एक हैं और उनका कार्य सेवा करना है। 

उपलब्ध कंबरामायण पाठ में यह भाव स्पष्ट रूप से दर्ज है।

यहाँ संत - दृष्टि का एक महत्वपूर्ण सूत्र मिलता है—

पूर्णता केवल “मैं क्या प्राप्त करूँ?” 

में नहीं; “मैं किसके चरणों में अपना जीवन समर्पित करूँ?” 

में भी है।

“पूर्णता” का अर्थ क्या है?


पूर्णता का अर्थ यह नहीं कि संसार में कोई कठिनाई कभी नहीं आएगी। 

श्रीरामचरितमानस का आध्यात्मिक आदर्श संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए परम आश्रय को पहचानना है।

मानस में भगवान की भक्ति को अत्यंत ऊँचा स्थान दिया गया है। 

लंकाकाण्ड के प्रसंग में कहा गया है—

“राम भगति मनि उर बस जाकें।
दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥”

अर्थात् जिसके हृदय में रामभक्ति रूपी मणि स्थित है, उसके लिए दुःख का अनुभव उस अर्थ में नहीं रहता कि संसार के परिवर्तन उसकी अंतिम शांति को नष्ट नहीं कर सकते। 

उसी प्रसंग में आगे कहा गया है—

“सब कर फल हरि भगति सुहाई।
सो बिनु संत न काहूँ पाई॥”

अर्थात् सभी साधनों का सुंदर फल हरि-भक्ति है और संत-संग के बिना उसकी प्राप्ति कठिन कही गई है।

यहाँ “सब कर फल” का अर्थ यह समझना चाहिए कि साधना, ज्ञान, वैराग्य और धार्मिक आचरण का अंतिम उद्देश्य केवल बाहरी उपलब्धि नहीं, बल्कि भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति की स्थापना है।

तुलसी और कंबर—दोनों में राम केवल इच्छा-पूर्ति का साधन नहीं ;


रामकथा को केवल वरदान और सांसारिक सफलता प्राप्त करने की कथा मानना उसके भक्तिपरक अर्थ को सीमित कर देता है।

तुलसीदासजी के मानस में राम परम आश्रय हैं।

कंबर की रामकथा में भी राम के प्रति सेवक-भाव, धर्म और समर्पण का महत्त्व दिखाई देता है।

इस लिए संतों से पूछा गया “अपने लिए क्या चाहते हो?” का उत्तर केवल—

“राम मुझे यह दे दें”

तक सीमित नहीं रहता।

भक्ति की गहराई में प्रश्न बदलता है—

“राम! मुझे ऐसा हृदय दीजिए जो आपको भूलकर किसी प्राप्ति को अंतिम न माने।”

यही इच्छा को भक्ति में बदलने वाली दृष्टि है।

संत हमें इच्छा से प्राप्ति की ओर नहीं, प्राप्ति से तृप्ति की ओर ले जाते हैं ;


संसार में इच्छा का स्वभाव है—

एक प्राप्ति के बाद दूसरी इच्छा।

परंतु संतों का मार्ग मनुष्य को पूछना सिखाता है कि जिसे पाने के बाद भी कुछ और पाने की आवश्यकता बनी रहे, उसे अंतिम लक्ष्य क्यों माना जाए?

श्रीरामचरितमानस में मानव शरीर को भी अत्यंत दुर्लभ बताया गया है और उसे स्वर्ग, नरक तथा मोक्ष की सीढ़ी के समान कहा गया है। 

उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि गरुड़जी के प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि मनुष्य शरीर के समान कोई दूसरा शरीर नहीं; यह ज्ञान, वैराग्य और भक्ति देने वाला तथा परम गति का साधन है।

इस लिए मनुष्य - जन्म की पूर्णता केवल भोग में नहीं है।

धन जीवन का साधन हो सकता है—

परंतु अंतिम आश्रय नहीं।

परिवार जीवन का धर्म हो सकता है—

परंतु परम सत्य का स्थान नहीं।

प्रतिष्ठा सामाजिक उपयोगिता दे सकती है—

परंतु आत्मिक तृप्ति की गारंटी नहीं।

विद्या बुद्धि को विकसित कर सकती है—

परंतु अहंकार भी बढ़ा सकती है, यदि विवेक न हो।

इन सबको उचित स्थान देकर अंततः मनुष्य को अपने जीवन के परम आश्रय की खोज करनी है।

संतों से मिली सबसे बड़ी संपत्ति—विवेक ;


तुलसीकृत मानस में सत्संग का फल विवेक बताया गया है। 

इस का अर्थ यह है कि संत मनुष्य की बुद्धि को ऐसी दृष्टि देते हैं जिससे वह वस्तुओं का सही मूल्य समझ सके।

धन आवश्यक हो सकता है, पर धन ही जीवन का परम अर्थ नहीं।

परिवार आवश्यक हो सकता है, पर परिवार को परम सत्य मानना भी उचित नहीं।

शरीर की रक्षा आवश्यक है, पर शरीर ही आत्मा नहीं।

ज्ञान आवश्यक है, पर केवल शास्त्र पढ़ लेना आत्मज्ञान का अंतिम प्रमाण नहीं।

धर्म आवश्यक है, पर धर्म का बाहरी रूप ही उसकी संपूर्णता नहीं।

इन सबको उचित स्थान पर रखकर मनुष्य को अपने जीवन का परम आश्रय पहचानना है।

इसी लिए मानस में आगे कहा गया—

“बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।
गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥”

अर्थात् गुरु के बिना ज्ञान और वैराग्य के बिना ज्ञान की पूर्णता पर प्रश्न किया गया है तथा वेद - पुराणों के अनुसार हरिभक्ति के बिना परम सुख की प्राप्ति को अधूरा माना गया है।

संतों से मिलने वाला सबसे बड़ा उपदेश—दृष्टि बदलो ;


मानस में संत - संग का महत्त्व इस लिए है कि संत बाहर की दुनिया बदलने से पहले मनुष्य की दृष्टि बदलते हैं।

जिस मन में लोभ है, वह संसार में अवसर खोजता है।

जिस मन में ईर्ष्या है, वह दूसरों की उन्नति में अपना दुःख खोजता है।

जिस मन में अहंकार है, वह हर संबंध में अपना महत्व चाहता है।

जिस मन में मोह है, वह परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाता।

परंतु जिस मन में भक्ति और विवेक जागते हैं, वह संसार को भगवान की व्यवस्था में देखना प्रारम्भ करता है।

इसी लिए मानस में संत - संग को केवल धार्मिक सभा में बैठना नहीं माना जा सकता। 

वास्तविक सत्संग वह है जिसमें विचार शुद्ध हों, भगवान का स्मरण बढ़े, विवेक जागे, अहंकार घटे और परहित की प्रवृत्ति बढ़े।

भक्ति और संतोष का संबंध ;


मनुष्य जितना बाहर खोजता है, उतनी ही नई इच्छाएँ पैदा हो सकती हैं।

मानस में इसी कारण संतोष को भी अत्यंत महत्त्व दिया गया है। 

उत्तरकाण्ड में कहा गया—

“कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।”

अर्थात् सहज संतोष के बिना विश्राम कैसे मिल सकता है?

यहाँ संतोष का अर्थ प्रगति छोड़ देना नहीं है।

संतोष का अर्थ है—

प्रयत्न करो, लेकिन अपनी आत्मिक शांति को केवल परिणाम से मत बाँधो।

कर्तव्य करो, लेकिन फल को अपना अंतिम स्वामी मत बनाओ।

धन कमाओ, लेकिन धन को अपना परम आश्रय मत बनाओ।

परिवार निभाओ, लेकिन भगवान को विस्मृत मत करो।

सम्मान मिले तो अहंकार मत बढ़ाओ।

अपमान मिले तो धर्म मत छोड़ो।

यही संतों की विचार-दृष्टि है।

संत का लक्षण—अपने लिए नहीं, परहित के लिए जीना ;


उत्तरकाण्ड में संत का सहज स्वभाव बताते हुए कहा गया है—

“पर उपकार बचन मन काया।
संत सहज सुभाउ खगराया॥”

अर्थात् वचन, मन और शरीर से परोपकार करना संत का सहज स्वभाव है। 

आगे संतों के विषय में कहा गया है कि वे परहित के लिए दुःख सहते हैं।

इस का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है।

मनुष्य यदि पूछे—

“मुझे क्या मिलेगा?” 

तो उसकी दृष्टि अपने ऊपर रहती है।

संत-दृष्टि पूछती है—

“मेरे द्वारा क्या कल्याण हो सकता है ?”

यही दृष्टि परिवर्तन मन की संकीर्णता को तोड़ता है।

इसलिए पूर्णता केवल “मेरे पास कितना है” से निर्धारित नहीं होती। 

पूर्णता का एक महत्वपूर्ण लक्षण यह भी है कि मनुष्य के भीतर देने की क्षमता, क्षमा की क्षमता, सहने की क्षमता, प्रेम की क्षमता और भगवान का स्मरण बढ़े।

“किसकी प्राप्ति पर कमी नहीं रहेगी?”—रामभक्ति का उत्तर ;


मानस में अत्यंत स्पष्ट वचन आता है—

“सब कर फल हरि भगति सुहाई।
सो बिनु संत न काहूँ पाई॥”

अर्थात् सभी साधनों का सुंदर फल हरिभक्ति है और संतों के बिना उसकी प्राप्ति नहीं होती।

यहाँ “सब कर फल” को समझना आवश्यक है।

मनुष्य पूजा करता है—क्यों?

मनुष्य जप करता है—क्यों?

मनुष्य तप करता है—क्यों?

मनुष्य तीर्थ, व्रत, दान और शास्त्र-अध्ययन करता है—क्यों?

यदि इन सबका अंतिम परिणाम केवल बाहरी उपलब्धि हो तो साधना का लक्ष्य अधूरा रह जाता है।

मानस की भक्तिपरंपरा कहती है कि इन साधनों का सुंदर फल भगवान के चरणों में प्रेम है।

इस लिए पूर्णता का अर्थ है—

भगवान की प्राप्ति की दिशा में हृदय का स्थिर होना।

रामभक्ति को पूर्णता का आधार क्यों माना गया ?


मानस में श्रीराम केवल सांसारिक सफलता देने वाले देवता के रूप में नहीं आते। 

वे धर्म, मर्यादा, सत्य, करुणा, शरणागतवत्सलता और भक्तवत्सलता के आदर्श रूप में प्रतिष्ठित हैं।

इस लिए रामभक्ति का अर्थ केवल नामोच्चार नहीं है।

रामभक्ति का अर्थ है—

राम के गुणों का स्मरण,

राम के चरित्र से धर्मबुद्धि ग्रहण करना,

रामनाम में श्रद्धा,

संतों का सम्मान,

गुरु के प्रति श्रद्धा,

परहित,

अहंकार का क्षय,

और अपने कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित करने की भावना।

अरण्यकाण्ड में नवधा भक्ति के प्रसंग में संतों के चरणों में प्रेम, मन - वचन - कर्म से भजन का दृढ़ नियम तथा भगवान को गुरु, पिता, माता, बंधु और देवता के रूप में स्वीकार करने की भावना बताई गई है।

इस से स्पष्ट होता है कि भक्ति केवल भावना नहीं; वह जीवन - पद्धति भी है।

संत का प्रमाण—वाणी नहीं, आचरण ;


संतों से जाना का अर्थ यह नहीं कि हर धार्मिक वाणी बोलने वाले को स्वतः संत मान लिया जाए।

मानस संतों के लक्षण बताता है।

संत परहितकारी हैं।

उनका मन समभाव वाला है।

वे भगवान के प्रति प्रेम रखते हैं।

वे विनम्र हैं।

उनका जीवन केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं है।

बालकाण्ड में तुलसीदासजी संतों की महिमा बताते हुए संत को ऐसे भाव से देखते हैं जिसमें हित - अहित के प्रति समता और दूसरों के लिए मंगल की भावना प्रमुख है।

इस लिए किसी संत - विचार को परखने की शास्त्रीय कसौटी यह हो सकती है कि उसके संपर्क से—

विवेक बढ़ता है या भ्रम?
विनय बढ़ती है या अहंकार?
भक्ति बढ़ती है या केवल प्रदर्शन?
परहित बढ़ता है या स्वार्थ?
संतोष बढ़ता है या लोभ?

यह संत - संग की वास्तविक परीक्षा है।

अपने लिए क्या चाहना चाहिए—मानस की कसौटी ;


यदि अपनी विचार-दृष्टि से इस पूरे उपदेश को संक्षेप में देखा जाए तो प्रश्न यह नहीं रह जाता कि “मुझे दुनिया से और क्या चाहिए?”

प्रश्न बदल जाता है—

“मेरे भीतर ऐसा क्या जागे जिससे बाहरी प्राप्तियों पर मेरी शांति निर्भर न रहे?”

उत्तर है—विवेक।

फिर प्रश्न—

“विवेक को स्थिर करने का साधन क्या है?”

उत्तर—सत्संग।

फिर प्रश्न—

“सत्संग से जीवन किस ओर जाना चाहिए?”

उत्तर—रामभक्ति।

फिर प्रश्न—

“रामभक्ति का जीवन में प्रमाण क्या है?”

उत्तर—परहित, विनय, समता, संयम, सेवा, भगवान का स्मरण और संतों के प्रति प्रेम।

इस प्रकार मानस की शिक्षा क्रमबद्ध दिखाई देती है—

सत्संग → विवेक → भक्ति → अंतःशुद्धि → संतोष → परम आश्रय।

श्रीराम की प्राप्ति का अर्थ क्या है ?


“राम को पाना” केवल किसी बाहरी दर्शन तक सीमित नहीं है।

तुलसीदासजी के मानस में राम का स्मरण, रामनाम, रामभक्ति, संत - संग, गुरु - सेवा, धर्म और परहित—

ये सब परस्पर जुड़े हुए हैं।

राम की प्राप्ति का अर्थ है—

मन का राम में आश्रय।

बुद्धि का रामधर्म में स्थिर होना।

वाणी में रामनाम।

कर्म में धर्म।

हृदय में भक्ति।

व्यवहार में करुणा।

और जीवन में अहंकार की जगह सेवाभाव।

दक्षिण भारतीय कंबरामायणम् में हनुमान का सेवक - भाव इसी सत्य को काव्यात्मक रूप देता है—

राम के प्रति दास्य और सेवा स्वयं में गौरवपूर्ण आध्यात्मिक अवस्था बन जाती है।

सबसे बड़ी दरिद्रता और सबसे बड़ा धन ;


उत्तरकाण्ड में एक अत्यंत महत्वपूर्ण वचन मिलता है—

“नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं।
संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥”

यहाँ दरिद्रता को केवल धन की कमी समझना मानस के भाव को छोटा कर देना होगा।

मनुष्य के पास धन हो सकता है और फिर भी भीतर से दरिद्र हो सकता है—

यदि उसके पास संतोष नहीं।

बहुत ज्ञान हो सकता है और फिर भी विवेक की कमी हो सकती है।

बहुत संबंध हो सकते हैं और फिर भी हृदय में प्रेम का अभाव हो सकता है।

बहुत साधन हो सकते हैं और फिर भी मन में शांति न हो सकती है।

इस के विपरीत संत-संग मनुष्य को ऐसी संपदा देता है जो भीतर की दिशा बदलती है।

इस लिए “संत मिलन” को मानस संसार का महान सुख कहता है।

शबरी का प्रसंग— संत - सेवा और गुरु - वचन की शक्ति ;


वाल्मीकि रामायण का शबरी-प्रसंग इस विषय का अत्यंत महत्वपूर्ण शास्त्रीय आधार है। 

अरण्यकाण्ड में शबरी अपने गुरुजनों की सेवा और उनके निर्देश के अनुसार प्रतीक्षा करती है। 

राम के आगमन पर वह अपने गुरु-संबंध और तपस्या को सफल मानती है।

वाल्मीकि रामायण 3.74.12 में शबरी कहती हैं—

“अद्य मे सफलं जन्म...”

अर्थात् श्रीराम के पूजित होने से आज मेरा जन्म सफल हुआ।

अंत में 3.74.35 में उसके आध्यात्मिक साधना द्वारा उस पवित्र स्थान की प्राप्ति का वर्णन है जहाँ उसके महर्षि-गुरु स्थित थे।

यहाँ “सफल जन्म” का अर्थ केवल सांसारिक सफलता नहीं है।

जीवन तब सफल माना गया जब साधना का संबंध परम पुरुष से जुड़ा।

यही प्रश्न हमारे विषय का केंद्र है।

संत की पहचान— वाणी से अधिक आचरण ;


यहाँ एक सावधानी भी आवश्यक है। 

केवल किसी को संत कह देने से वह मानस के संत-लक्षणों वाला संत सिद्ध नहीं हो जाता।

मानस स्वयं संत और असंत के सहज स्वभाव का विवेचन करता है। 

संत के लक्षणों में परहित, समता, भगवान के चरणों में प्रेम और निंदा-स्तुति में समभाव जैसी बातें आती हैं।

अतः किसी भी आध्यात्मिक मार्गदर्शक को समझने की कसौटी बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि चरित्र, वाणी, आचरण, विनय, परहित और भगवान-भक्ति होनी चाहिए।

यह भी संतों से मिली हुई विचार-दृष्टि का ही भाग है।

संतों की दृष्टि से वास्तविक पूर्णता ;


अब अपनी विचार-दृष्टि से प्रश्न को बिल्कुल सीधा रखें—

यदि धन मिल जाए और मन अशांत रहे तो क्या पूर्णता है?

नहीं।

यदि सम्मान मिल जाए और अहंकार बढ़ जाए तो क्या पूर्णता है?

नहीं।

यदि ज्ञान मिल जाए लेकिन भगवान से प्रेम न हो तो क्या पूर्णता है?

मानस की दृष्टि से वह अधूरा है।

यदि संसार की अनेक वस्तुएँ मिल जाएँ लेकिन मन में संतोष न आए तो क्या पूर्णता है?

नहीं।

तो फिर क्या चाहिए ?

विवेक।

विवेक से क्या चाहिए?

सत्संग।

सत्संग से क्या जागना चाहिए ?

रामभक्ति।

रामभक्ति का फल क्या होना चाहिए?

संतोष, विनय, सेवा, परहित, धर्म और परम आश्रय।

यही संतों से जाना हुआ जीवन-दर्शन है।

“पूर्णता” बाहर मिलने वाली वस्तु नहीं, भीतर स्थापित होने वाला आश्रय है ;


मनुष्य सोच सकता है—“जब मेरा काम पूरा हो जाएगा तब मैं सुखी होऊँगा।”

लेकिन जीवन में एक काम पूरा होने पर दूसरा काम आता है।

एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी इच्छा आती है।

एक समस्या समाप्त होने पर दूसरी परिस्थिति सामने आती है।

इस लिए यदि सुख को केवल परिस्थितियों की पूर्णता से बाँध दिया जाए तो स्थायी पूर्णता प्राप्त करना कठिन है।

मानस का भक्ति-विचार इससे भिन्न आधार देता है। 

जब हृदय में रामभक्ति स्थापित होती है तो मनुष्य का संबंध परम आश्रय से जुड़ता है। 

लंकाकाण्ड में रामभक्ति को “मणि” के रूप में प्रस्तुत करना इसी आंतरिक संपदा का संकेत है।

इसलिए पूर्णता का अर्थ यह नहीं कि संसार में कोई कमी दिखाई ही न दे।

पूर्णता का अर्थ है—

कमी के बीच भी परम आश्रय का बोध बना रहे; प्राप्ति में अहंकार न हो और अप्राप्ति में मनुष्य टूटे नहीं।

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तुलसीकृत मानस और दक्षिण भारतीय रामायण से संयुक्त संदेश;


दोनों परंपराओं को अपने-अपने ग्रंथगत स्वरूप में रखते हुए एक केंद्रीय आध्यात्मिक सूत्र स्पष्ट दिखाई देता है—

रामकथा का उद्देश्य केवल राम के जीवन की घटनाएँ सुनाना नहीं; राम के प्रति मनुष्य की अपनी दृष्टि को बदलना भी है।

तुलसीदासजी सत्संग से विवेक और विवेक से भक्ति की दिशा स्पष्ट करते हैं।

कंबरामायणम् राम के प्रति सेवा, समर्पण और भक्तिभाव को काव्यात्मक शक्ति देता है। 

हनुमान का सेवकत्व इसका स्पष्ट उदाहरण है।

वाल्मीकि रामायण में शबरी का गुरु - वचन, साधना और राम - दर्शन जीवन की सफलता से जोड़ा गया है।

इस प्रकार रामायण - परंपरा की भक्तिपरक दृष्टि मनुष्य को एक गहरे प्रश्न तक ले जाती है—

“मुझे क्या चाहिए?”

और फिर उससे भी गहरा प्रश्न—

“जिसे मैं चाहता हूँ, क्या उसके मिलने के बाद भी मेरी चाह समाप्त होगी?”

यदि उत्तर नहीं है तो उस वस्तु को अंतिम पूर्णता नहीं कहा जा सकता।

अपनी विचार - दृष्टि से अंतिम प्रश्न ;


अब प्रत्येक साधक स्वयं से पूछ सकता है—

मैं वास्तव में क्या चाहता हूँ?

क्या केवल धन?

क्या केवल सम्मान?

क्या केवल सुख?

क्या केवल शरीर की सुविधा?

क्या केवल दूसरों से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना?

या ऐसी अवस्था जिसमें मन को शांति मिले, बुद्धि को विवेक मिले, कर्म को धर्म मिले, हृदय में भक्ति हो और जीवन परहित में लगे?

यदि उत्तर अंतिम दिशा की ओर जाता है तो मानस का संत-विचार मार्ग दिखाता है।

सत्संग करो—विवेक जागेगा।

विवेक से असार और सार का भेद करो।

असार के पीछे अंधी दौड़ घटाओ।

सार को भगवान की भक्ति में खोजो।

भक्ति को केवल शब्द न रहने दो; उसे मन, वचन और कर्म में उतारो।

संतों के लक्षण अपने जीवन में उतारो।

और तब “मेरे लिए क्या चाहिए?” 

का उत्तर धीरे-धीरे बदलकर यह हो जाता है—

“मुझे वह चाहिए जो मेरे भीतर से मोह, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या और अविवेक को घटाए; भगवान के प्रति प्रेम बढ़ाए; परहित की भावना जगाए और जीवन को परम आश्रय से जोड़ दे।”

यही श्रीरामचरितमानस की संत-दृष्टि से पूर्णता की ओर जाने वाला मार्ग है।

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निष्कर्ष — अपने लिए क्या माँगना चाहिए ?


संतों से जाना हुआ सार यह नहीं कि संसार की सभी आवश्यकताओं को छोड़ दिया जाए।

सार यह है कि संसार की आवश्यकताओं को साधन और परमात्मा को परम आश्रय माना जाए।

जीवन में धन हो—पर धन मन का स्वामी न बने।

परिवार हो—पर भगवान का विस्मरण न हो।

कर्तव्य हो—पर अहंकार न हो।

ज्ञान हो—पर विनय भी हो।

साधना हो—पर दिखावा न हो।

भक्ति हो—पर दूसरों के प्रति द्वेष न हो।

संत-संग हो—पर विवेक के साथ।

और सबसे बढ़कर—

रामभक्ति ऐसी हो कि मनुष्य की अंतिम शांति किसी अस्थायी वस्तु पर निर्भर न रहे।

श्रीरामचरितमानस का वचन—

“सब कर फल हरि भगति सुहाई।
सो बिनु संत न काहूँ पाई॥”

इस पूरे विषय का अत्यंत संक्षिप्त उत्तर है।

श्रीरामचरितमानस के संत-विचार को एक वाक्य में बाँधना हो तो बात यह बनती है—

जिस प्राप्ति के बाद भी मनुष्य की तृष्णा समाप्त न हो, वह अंतिम प्राप्ति नहीं; जिस प्राप्ति से भगवान के प्रति प्रेम, विवेक, संतोष, विनय और परहित जागे, वही जीवन को परम अर्थ की ओर ले जाती है।

मानस में सत्संग को विवेक का कारण, संतों को सुख और परहित का स्वरूप तथा रामभक्ति को सभी साधनों का सुंदर फल कहा गया है।

अतः अपनी विचार-दृष्टि से अपने लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि “मेरे पास क्या नहीं है?”

बल्कि यह है—

“मेरे हृदय में श्रीराम के प्रति कितना प्रेम है, मेरे जीवन में कितना विवेक है, मेरे आचरण में कितना परहित है और मेरी शांति कितनी परमात्मा पर आधारित है?”

जिस दिन यह प्रश्न भीतर से उठता है, उसी दिन संतों की शिक्षा केवल पढ़ी हुई बात नहीं रहती—

वह जीवन की दिशा बनना प्रारम्भ करती है।

और यदि “किसकी प्राप्ति पर किसी प्रकार की कमी नहीं रहेगी?” 

का उत्तर मानस की भक्ति - दृष्टि से दिया जाए, तो वह किसी सांसारिक वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि श्रीराम के चरणों में दृढ़ भक्ति, संत - संग और उससे उत्पन्न विवेकपूर्ण, विनम्र तथा परहितमय जीवन है।

यही वह संपदा है जिसे बाहर से जोड़ना नहीं, भीतर जागृत करना है।

इसलिए अपनी विचार-दृष्टि से अपने लिए यह पूछना चाहिए—

मैं ऐसी कौन-सी वस्तु चाहता हूँ जिसके मिलते ही मेरी दूसरी इच्छाएँ समाप्त हो जाएँ?

यदि विचार को मानस की संत-दृष्टि तक ले जाएँ तो उत्तर किसी सांसारिक वस्तु का नाम नहीं है।

उत्तर है—

सत्संग से उत्पन्न विवेक, विवेक से दृढ़ हुई रामभक्ति, रामभक्ति से उत्पन्न संतोष, और उस संतोष से परहित, सेवा, विनय तथा धर्ममय जीवन।

यही वह दिशा है जहाँ “मेरे पास क्या नहीं है?” का प्रश्न धीरे-धीरे बदलकर—

“मेरे हृदय में श्रीराम का कितना स्थान है?”

हो जाता है।

और जब यही प्रश्न जीवन का केंद्र बनता है, तब पूर्णता बाहर से कोई वस्तु जोड़ने का नाम नहीं रहती; वह परम आश्रय को पहचानने और उसी में प्रेमपूर्वक स्थिर होने की आध्यात्मिक अवस्था बन जाती है।

यही संतों से जाना हुआ रामायण का सार है।
🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹
!!!!! शुभमस्तु !!!
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