सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
*‼️राम कृपा ही केवलम्‼️*
*❗संतों से जाना❗*
अपनी विचार - दृष्टि से देखो कि अपने लिए क्या चाहते हो, अर्थात् किसके प्राप्त करने पर किसी प्रकार की कमी नहीं रहेगी यानी पूर्णता प्राप्त होगी।
इसका भलीभाँति निश्चय करना ही जीवन का परम लक्ष्य कहा जाता है।
जो चाहते हो, जब तक वह प्राप्त न हो, तब तक प्राप्त न होने का दुःख लगातार बढ़ते रहना चाहिए।
यहाँ तक कि फिर किसी प्रकार से भी सहन न हो।
ऐसा होने पर जो चाहते हो वह अवश्य प्राप्त होगा।
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इस में कुछ भी सन्देह नहीं है, परन्तु चाह सच्ची होनी चाहिए।
सच्ची चाह होने पर ही उसके पूरे न होने का दुःख इस प्रकार होता है कि वह सहन नहीं होता।
जीवन की सारी क्रियाएँ एक ही लक्ष्य के लिए होनी चाहिए, क्योंकि यही सच्चाई है।
क्रियाएँ स्वरूप से देखने में भिन्न - भिन्न प्रकार की भले ही हों, परन्तु उन सबका लक्ष्य एक होना चाहिए, यह भली - भाँति समझने की बात है।
ऐसा होने पर सारा जीवन लक्ष्य की पूर्ति का साधन बन जाता है, जिससे जीवन - यात्रा सुलभ तथा सरल हो जाती है और लक्ष्य की पूर्ति अवश्य होती है।
लक्ष्य एक ही सच्चा होता है।
क्रियाओं में अनेकता होती है, लक्ष्य में नहीं।
इस लिए क्रियाओं को लक्ष्य कभी मत समझो, बल्कि क्रियाओं के अन्त होने पर लक्ष्य पर सदैव दृष्टि रक्खो और जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो, चैन से न रहो।
शारीरिक दशा कहने में नहीं आती, क्योंकि कथन उसका हो सकता है, जो एकसा रहे।
इस सराय में रोग - रूपी मुसाफिर तो ठहरे ही रहते हैं।
वास्तव में तो जीवन की आशा ही परम रोग और निराशा ही आरोग्यता है।
देह - भाव का त्याग ही सच्ची औषधि है।
*🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹*
समुद्र लाँघने का परामर्श :
जाम्बवन्त का हनुमान्जी को बल याद दिलाकर उत्साहित करना।
जो नाघइ सत जोजन सागर।
करइ सो राम काज मति आगर॥
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा।
राम कृपाँ कस भयउ सरीरा॥
जो सौ योजन ( चार सौ कोस ) समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा, वही श्री रामजी का कार्य कर सकेगा।
( निराश होकर घबराओ मत ) मुझे देखकर मन में धीरज धरो।
युवराज अंगद निराश हो कर बोले, सीता जी को खोज पाने में हम लोग सर्वथा निष्फल रहे हैं।
अब हम लौट कर राजा सुग्रीव और रामचनद्र जी को कैसे मुख दिखायेंगे।
निष्फल हो कर लौटने से तो अच्छा है कि हम यहाँ अपने प्राण त्याग दें।
इस पर बुद्धिमान हनुमान जी ने कहा, तारानन्दन! तुम युद्ध में अपने पिता के समान ही अत्यन्त शक्तिशाली हो।
अत्यन्त बुद्धिमान होते हुए भी तुम इस तरह से निराशा की बातें कर रहे हो यह तुम्हें शोभा नहीं देता।
इस प्रकार से उनका विचार विमर्ष चल ही रहा था कि वहाँ पर गृध्रराज सम्पाति आ पहुँचा।
वानरों को देख कर वह बोला, आज दीर्घकाल के पश्चात् मुझे मेरे कर्मों के फल के रूप में यह भोजन प्राप्त हुआ है।
मैं एक एक कर के वानरों का भक्षण करता जाउँगा।
सम्पाति के वचन सुनकर दुःखी हुए अंगद ने हनुमान जी से कहा, एक तो हम लोग जानकी जी को खोज नहीं पाये, उस पर यह दूसरी विपत्ति आ गई।
हम से तो अच्छा गृधराज जटायु ही था जिसने श्री रामचन्द्र जी के कार्य को करते हुये अपने प्राण न्यौछावर कर दिया था।
अंगद के मुख से जटायु का नाम सुनकर सम्पाति ने आश्चर्य से कहा, जटायु तो मेरा छोटा भाई है।
तुम उसके विषय में मुझे पूरा पूरा हाल कहो।
अंगद से जटायु के विषय में पूरा हाल सुनकर सम्पाति बोला, बन्धुओं!
तुम सीता जी की खोज करने जा रहे हो।
मैं इस विषय में जो भी जानता हूँ वह तुम्हें बताता हूँ क्योंकि रावण से मैं अपने छोटे भाई जटायु का प्रतिशोध लेना चाहता हूँ।
परन्तु मैं वृद्ध और दुर्बल होने के कारण रावण का वध नहीं कर सकता।
इस लिये मैं तुम्हें उसका पता बताता हूँ।
सीता जी का हरण करने वाला रावण लंका का राजा है और उसने सीता जी को लंकापुरी में ही रखा है जो यहाँ से सौ योजन ( चार सौ कोस ) की दूरी पर है और इस समुद्र के उस पार है।
लंकापुरी में बड़े भयंकर, सुभट, पराक्रमी राक्षस रहते हैं।
लंकापुरी एक पर्वत के ऊपर स्वर्ण निर्मित नगरी है जिसका निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया है।
उसमें बड़ी सुन्दर ऊँची - ऊँची मनोरम स्वर्ण निर्मित अट्टालिकाएँ हैं।
वहीं पर स्वर्णकोट से घिरी अशोकवाटिका है जिसमें रावण ने सीता को राक्षसनियों के पहरे में छिपा कर रखा है।
इस समुद्र को पार करने का उपाय करो तभी तुम सीता तक पहुँच सकोगे। यह कह कर वह गृद्ध मौन हो गया।
विशाल सागर की अपार विस्तार देख कर सभी वानर चिन्तित होकर एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।
अंगद, नल, नील आदि किसी भी सेनापति को समुद्र पार कर के जाने का साहस नहीं हुआ।
उन सबको निराश और दुःखी देख कर वृद्ध जाम्बन्त ने कहा, हे पवनसुत! तुम इस समय चुपचाप क्यों बैठे हो ?
तुम तो वानरराज सुग्रीव के समान पराक्रमी हो।
तेज और बल में तो राम और लक्ष्मण की भी बराबरी कर सकते हो।
तुम्हारा वेग और विक्रम पक्षिराज गरुड़ से किसी भी भाँति कम नहीं है जो समुद्र में से बड़े - बड़े सर्पों को निकाल लाता है।
इतना अतुल बल और साहस रखते हुये भी तुम समुद्र लाँघ कर जानकी जी तक पहुँचने के लिये तैयार क्यों नहीं होते ?
तुम्हें तो समुद्र या लंका में मृत्यु का भी भय नहीं है क्योंकि तुम्हें देवराज इन्द्र से इच्छामृत्यु का वर प्राप्त है।
जब तुम चाहोगे, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी अन्यथा नहीं।
तुम केशरी के क्षेत्रज्ञ और वायुदेव के औरस पुत्र हो, इसी लिये उन्हीं के सदृश तेजस्वी और अबाध गति वाले हो।
हम लोगों में तुम ही सबसे अधिक साहसी और शक्तिशाली हो।
इस लिये उठो और इस महासागर को लाँघ जाओ।
तुम्हीं इन निराश वानरों की चिन्ता को दूर कर सकते हो।
मैं जानता हूँ, इस कार्य को केवल तुम और अंगद दो ही व्यक्ति कर सकते हो, पर अंगद अभी बालक है।
यदि वह चूक गया और उसकी मृत्यु हो गई तो सब लोग सुग्रीव पर कलंक लगायेंगे और कहेंगे कि अपने राज्य को निष्कंटक बनाने के लिये उसने अपने भतीजे को मरवा डाला।
यदि मैं वृद्धावस्था के कारण दुर्बल न हो गया होता तो सबसे पहले मैं समुद्र लाँघता।
इस लिये हे वीर!
अपनी शक्ति को समझो और समुद्र लाँघने को तत्पर हो जाओ।
जाम्बवन्त के प्रेरक वचनों को सुन कर हनुमान को अपनी क्षमता और बल पर पूरा विश्वास हो गया।
अपनी भुजाओं को तान कर हनुमान ने अपने सशक्त रूप का प्रदर्शन किया और गुरुजनों से बोले, आपके आशीर्वाद से मैं मेघ से उत्पन्न हुई बिजली की भाँति पलक मारते निराधार आकाश में उड़ जाउँगा।
मुझे विश्वास हो गया है कि मैं लंका में जा कर अवश्य विदेहकुमारी के दर्शन करूँगा।
यह कह कर उन्होंने घोर गर्जना की जिससे समस्त वानरों के हृदय हर्ष से प्रफुल्लित हो गये।
सबसे विदा ले कर हनुमान महेन्द्र पर्वत पर चढ़ गये और मन ही मन समुद्र की गहराई का अनुमान लगाने लगे।
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!!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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