।। श्रीरामचरितमानस प्रवर्चन - उत्तरकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदासजी की यह प्रार्थना।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।।श्रीरामचरितमानस प्रवर्चन - उत्तरकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदासजी की यह प्रार्थना।।

श्रीरामचरितमानस प्रवर्चन - उत्तरकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदासजी की यह प्रार्थना ;

उत्तरकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदासजी की यह प्रार्थना ;

उत्तरकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदासजी की यह प्रार्थना अत्यंत गहरी भक्ति-दृष्टि को प्रकट करती है।


कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥

जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी। 

हे रामजी! आप निरंतर मुझे प्रिय लगिए॥







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श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदासजी की यह प्रार्थना अत्यंत गहरी भक्ति - दृष्टि को प्रकट करती है। 

यह केवल श्रीराम के प्रति प्रेम व्यक्त करने वाला दोहा नहीं है, बल्कि मनुष्य के मन में किसी वस्तु के प्रति उत्पन्न होने वाली तीव्र आसक्ति को भगवान् की भक्ति की दिशा में मोड़ देने का सिद्धान्त प्रस्तुत करता है। 

दोहा है—

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥ १३० (क)
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥ १३० (ख )।।

अर्थ यह है कि—हे रघुनाथ! जैसे कामासक्त मनुष्य को विषय अत्यंत प्रिय लगता है और जैसे लोभी को धन अत्यंत प्रिय लगता है, वैसे ही हे राम! आप मुझे निरंतर प्रिय लगते रहें।

यहाँ तुलसीदासजी संसार के दो अत्यंत प्रबल आकर्षणों—काम और लोभ—को उदाहरण बनाकर भगवान् के प्रति उससे भी अधिक दृढ़, निरंतर और अखंड अनुराग की प्रार्थना करते हैं।


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इस दोहे का वास्तविक रहस्य ;


पहली दृष्टि में प्रश्न उठ सकता है कि भक्ति की प्रार्थना में कामी और लोभी का उदाहरण क्यों दिया गया?

इसका उत्तर इसी दोहे के भीतर है।

तुलसीदासजी काम और लोभ का समर्थन नहीं कर रहे हैं। 

वे यह नहीं कह रहे कि मनुष्य को किसी सांसारिक विषय में उसी प्रकार आसक्त रहना चाहिए। 

वे मनुष्य के मन की आसक्ति की तीव्रता को उदाहरण बनाकर उसे भगवान् की ओर लगाने की प्रार्थना कर रहे हैं।

कामी का मन अपने विषय से हटना नहीं चाहता। 

लोभी का चित्त धन से अलग नहीं होना चाहता। 

उसी प्रकार भक्त का मन श्रीराम से अलग न हो—

यही इस दोहे की मूल आकांक्षा है।

अर्थात्—

विषय में जो आसक्ति बंधन बनाती है, वही मन यदि भगवान् में लग जाए तो भक्ति का साधन बन जाती है।

इसलिए यहाँ मुख्य शब्द “निरंतर” है। 

तुलसीदासजी केवल यह नहीं कहते कि राम कभी-कभी प्रिय लगें। 

वे कहते हैं—

“तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।”

अर्थात् राम के प्रति ऐसी निरंतर प्रीति हो जो परिस्थिति बदलने पर समाप्त न हो।

 “निरंतर” शब्द में पूरी साधना छिपी है ;


भक्ति का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि भगवान् अच्छे लगते हैं या नहीं।

प्रश्न यह है—

क्या भगवान् की स्मृति निरंतर बनी रहती है ?

सुख में राम स्मरण हों और दुःख में संसार—तो अभी चित्त की दिशा पूर्णतः राममय नहीं हुई।

लाभ में राम याद आएँ और हानि में केवल धन की चिंता हो—तो धन अभी मन का अधिक प्रिय विषय है।

सम्मान मिलने पर भगवान् स्मरण हों और अपमान में क्रोध भर जाए—तो अहंकार अभी अधिक प्रभावी है।

इस लिए तुलसीदासजी “प्रिय” के साथ “निरंतर” जोड़ते हैं।

भक्ति का लक्ष्य केवल पूजा के समय भगवान् को याद करना नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक कार्य के भीतर भगवान् की स्मृति को स्थापित करना है।

यही कारण है कि इस दोहे को श्रीरामचरितमानस के अंतिम दोहों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान मिलता है। 

मूल पाठ में इसके बाद मानस-माहात्म्य के श्लोक आते हैं।

लोभी कही भी लोभ से तृप्त नही होता, इसी प्रकार बार - बार प्रभु की झांकी का लोभ चाहिये...! 

सुमिरन का मीठा - मीठा दर्द चाहिये...! 

हर समय उसी का ध्यान, इसी को जागृति कहा है...! 

अगर जागोगे तो हर कार्य आपका ध्यान हो जायेगा...! 

ध्यान और धंधा ये कोई अलग - अलग नहीं है, जागकर किया गया हर कार्य ध्यान बन जाता हैं।

हम पाठ भी सोते - सोते करते है...! 

बोलते कहीं है देखते कहीं हैं....! 

सोचते कुछ और है होश भी नहीं रहता कि क्या बोला था? 

क्या गाया था? 

इस लिये सोये हुये किया गया भजन भी प्रकाश नहीं दे पा रहा है...! 

जीवन लग गया भजन करते - करते क्योंकि सोते - सोते हो रहा है...! 

सोते में तो स्वपन देखे जाते हैं...! 

अगर हम सब कार्य जागकर करेंगे तो अलग से फिर कोई ध्यान करने की आवश्यकता ही नही है।

ध्यान तो उसका किया जाता है जो हम से दूर हैं, जो हमारे भीतर बैठा है वो तो ध्यान में रहता ही है...! 

अभी भगवान भीतर नहीं है इस लिये ध्यान करना पड़ता है...! 

ध्यान करना और ध्यान में रहना ये दोनों अलग - अलग बाते है...! 

काम करना और काम में रहना ये दोनों अलग - अलग बाते है, जैसे हम शरीर से मंदिर मे है पर ध्यान मे घर बैठा हैं।

जब जीव प्रभु में डूब जाता है तो अलग से ध्यान करने की जरूरत नही होती...! 

इस लिये गोपियो को भीतर से ध्यान से निकालने के लिये ध्यान करना पड़ता था,गोपियाँ ध्यान करती है कि भगवान भीतर से बाहर निकले ताकि घर का काम - काज कुछ हम कर पायें, ये जागृति अवस्था है...! 

यह घटना आपने सुनी होगी, एक शिष्य गुरु के पास आया दीक्षा लेने के लिये...! 

भगवत - साक्षात्कार करने के लिये।

गुरु ने कहा बारह वर्ष तक धान कूटो, उठते, बैठते, सोते जागते बस धान कूटो, बस चौबीसों घंटे धान कूटते कूटते ध्यान में आ गया, ध्यान अलग से करने की आवश्यकता नहीं...! 

हरि व्यासजी बहुत बड़े संत हुये है, उनके गुरूदेव ने हरि व्यासजी को बोला जाओ बारह वर्ष तक गिरिराजजी की परिक्रमा लगाओ।

अब जो बारह वर्ष गिरिराजजी में डूबेगा उसे अलग से ध्यान करने की आवश्यकता पडेगी क्या? 

जागृत अवस्था ही ध्यान है, शास्त्र पढकर सत्य के बारे मे जाना तो जा सकता है पर सत्य का अनुभव तो जागृत जीव ही कर पायेगा....! 

इस के लिये साधना करनी पड़ती है, साधना बड़ा मूल्यवान शब्द है...! 

जो मन हमारा बिना इच्छा के इधर उधर गड्ढे में गिर रहा है, वो सध जाये, ये साधना है।

साधु का अर्थ क्या है? 


जो सध गया है, साधक का अर्थ है जो सधने का प्रयत्न कर रहा है, मन हमारे अनुसार रहे साधना का बस इतना ही अर्थ हैं...! 

हम लोग कहते है न कि रास्ते में बहुत फिसलन है जरा सध के चलो, इधर - उधर पैर पड जायेगा तो पैर फिसल जायेगा...! 

इस लिये सत्य को जाना नहीं जाता, सत्य को जिया जाता है।

पंडित जानता है, साधक अनुभव करता है, विद्वान सत्य की व्याख्या करता है और साधु सत्य का पान करता हैं...! 

इस लिये जागने से मन के विचार मिट जाते हैं...! 

स्वपन तो निद्रा में आते हैं, कुछ लोग जरूर बैठे - बैठे सपने देखते है उन्हे शेखचिल्ली कहा जाता है...! 

वो घटना आपने सुनी होगी, सिर पर दही की मटकी लिये जा रहा था।

सोच रहा था बच्चा होगा, पापा - पापा बोलेगा, पैसे माँगेगा, मैं थप्पड़ लगाऊँगा और सोचते - सोचते मटकी को ही थप्पड़ मार दिया और मटकी धड़ाम से नीचे गिर गई...! 

सज्जनों! जो जागृत में स्वप्न देखते हैं उनकी मटकी बीच रास्ते में फूट जाया करती है इस लिये भागो मत, जागो, जहा भी हो वहीं जागिये।

जनकजी की घटना आपने सुनी होगी, साधु को ले गये स्नान कराने के लिये और सेवक ने आकर कहा कि महल में आग लगी है...! 

जनकजी चैन से स्नान करते रहे और साधु दौड़ा, जनकजी ने पूछा बाबा कहाँ दौड़कर गये थे? 

बोले तुमने सुना नही, तुम्हारे महल में आग लग गई थी, महल तो मेरा था आग लगी तो तुम क्यों दौड़े? 

साधु बोले! मेरी लंगोटी उसमें सूख रही थी, आग लग रही थी इसलिये लंगोट को लेने गया था, बाँधने के लिये महल नहीं चाहिये...! 

बाँधने के लिये लंगोटी ही काफी है, योगियों ने महल छोड दिया हम भिक्षापात्र नही छोड पाते, इस लिये पशु सोये हुये हैं...! 

ये बंधन में रहते है, पाश का अर्थ है बंधन! हम सब किसी न किसी पाश में बंधे हैं।





काम की प्रकृति क्या है ?

“काम” का अर्थ केवल सामान्य प्रेम नहीं है। 

शास्त्रीय दृष्टि में काम का संबंध इच्छा और विषयासक्ति से है—

ऐसी इच्छा जिसमें मनुष्य अपने सुख की प्राप्ति के लिए विषय के प्रति अत्यधिक आकर्षित हो जाता है।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि काम मनुष्य के भीतर रजोगुण से उत्पन्न होता है और वह अत्यंत भक्षणशील तथा तृप्ति से परे है—

“काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।”

इसी प्रकार गीता विषयों के चिंतन से आसक्ति, आसक्ति से कामना और कामना में बाधा आने पर क्रोध की क्रमिक प्रक्रिया बताती है।

इस लिए तुलसीदासजी का उद्देश्य काम को आदर्श बनाना नहीं है।

वे केवल यह दिखाते हैं कि जिस मन में किसी विषय के प्रति इतनी प्रबल आसक्ति उत्पन्न हो सकती है, वही मन श्रीराम में क्यों नहीं लग सकता?

यही इस दोहे की साधना है।

लोभ का उदाहरण क्यों?

दूसरा उदाहरण है—

“लोभिहि प्रिय जिमि दाम।”

यहाँ “दाम” का अर्थ धन है।

लोभ की विशेषता यह है कि प्राप्त वस्तु के बाद भी मन की तृप्ति समाप्त नहीं होती। 

धन प्राप्त हुआ तो और धन की इच्छा होती है। 

प्राप्ति के बाद भी संग्रह की प्रवृत्ति बनी रहती है।

तुलसीदासजी इसी निरंतर आकर्षण को भगवान् की ओर मोड़ना चाहते हैं।

अर्थात् भक्त की प्रार्थना यह हो—

जिस प्रकार लोभी का मन धन को छोड़ना नहीं चाहता, उसी प्रकार मेरा मन श्रीराम को छोड़ना न चाहे।

लेकिन दोनों में मूल अंतर समझना आवश्यक है।

धन की आसक्ति मनुष्य को स्वार्थ और बंधन की ओर ले जा सकती है, जबकि भगवान् की भक्ति का लक्ष्य अहंकार, मोह और संसारासक्ति से ऊपर उठना है।

इस लिए तुलसीदासजी तुलना कर रहे हैं, समान फल नहीं बता रहे।

भगवान् में प्रेम का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं ;


इस दोहे का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि श्रीराम में निरंतर प्रेम का अर्थ संसार के आवश्यक कर्तव्यों से भाग जाना नहीं है।

श्रीरामचरितमानस में श्रीराम स्वयं धर्म, मर्यादा, सत्य, सेवा और कर्तव्य के आदर्श हैं।

इस लिए रामभक्ति का वास्तविक अर्थ है—

कर्तव्य करते हुए चित्त श्रीराम में रहे।

परिवार की सेवा हो तो उसे धर्मबुद्धि से किया जाए।

जीविका का कार्य हो तो ईमानदारी से किया जाए।

दान हो तो अहंकार के बिना किया जाए।

पूजा हो तो दिखावे के बिना हो।

ज्ञान प्राप्त हो तो अभिमान न बने।

धन मिले तो धन भगवान् से बड़ा न बन जाए।

दुःख आए तो भगवान् से संबंध न टूटे।

यही “निरंतर प्रिय” होने का व्यावहारिक अर्थ है।

कोई धन से भाग रहा है तो कोई धन की ओर भाग रहा है, भागने का कारण ही धन है, एक धन की और तो दूसरा धन से दूर, एक पैर के बल खड़ा है एक सिर के बल खड़ा है...! 

व्यक्ति तो वहीं रहता है बदलता कुछ भी नही, इस लिये सज्जनों!  


स्थान बदलने से कई बार लोग सोचते है कि बदल जायेंगे, किसी तीर्थ में चलते हैं, स्थान बदलने से जीव नही बदलता, स्थिति बदलने से जीवन बदलता है। 

साधु - बैरागी हो गये पर वृत्ति तो वही की वहीं रही, घर छोड़कर तीर्थ - आश्रम में आ गये. जो वृत्ति घर मे थी वही बाहर घेर लेगी, स्वभाव नही बदलता, भाई - बहनों! 

कपड़े बदलने से कोई परिवर्तन नहीं आ सकता, इसी लिये भेद के लिये तो भीतर से बदलना होगा।


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DIVINITI 24K Gold Plated Double-Sided Religious Pendant with Premium Gift Box, Spiritual Locket for Men & Women, Devotional Jewellery for Gifting & Everyday Wear

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{ Material type
Gold-plated Brass
Collection
All
Metal type
Gold Plated
Metal stamp
24K
Country of Origin
India }








{ About this item

  • PREMIUM 24K GOLD PLATED ELEGANCE: Crafted with Diviniti's refined aesthetic, this 18 mm double-sided pendant features a rich 24K gold plated finish that gives the sacred Panchmukhi Hanuman & Yantra design a sophisticated, luxury-inspired appearance.
  • DOUBLE-SIDED SACRED DESIGN: Thoughtfully created with Panchmukhi Hanuman & Yantra inspired devotional artwork across both sides, making this hindu pendant a meaningful symbol of faith and a graceful spiritual accessory for everyday use.
  • PREMIUM GIFT BOX INCLUDED: Every Diviniti pendant is presented in an elegant gift box, creating a polished, ready-to-gift experience for birthdays, anniversaries, festive celebrations, religious occasions and special milestones.
  • REFINED 18 MM PENDANT: Compact yet distinctive, the carefully proportioned design offers an elegant way to keep a cherished spiritual symbol close. Suitable as premium religious jewellery for men and women.
  • MEANINGFUL HINDU GIFT BY DIVINITI: A sophisticated devotional keepsake for family, friends and loved ones. Ideal for prayer, celebrations and faith-led gifting, combining sacred meaning, premium presentation and timeless appeal. }



प्रेम और स्वार्थ में अंतर ;


भगवान् को प्रेम करने में सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि भक्त भगवान् को भगवान् के लिए चाहता है या केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए।

यदि मन कहे—

“मेरी यह इच्छा पूरी हो जाए तो मैं राम को मानूँगा।”

तो यह पूर्ण भक्ति नहीं, बल्कि इच्छा के साथ जुड़ी हुई धार्मिक प्रवृत्ति है।

लेकिन जब मन कहे—

“हे राम! परिस्थिति जैसी भी हो, मेरे हृदय से आपका प्रेम न हटे।”

तब भक्ति का स्वरूप बदल जाता है।

तुलसीदासजी इसी अवस्था की याचना करते हैं।

उनकी प्रार्थना धन, पद, प्रतिष्ठा, इंद्रियसुख या सांसारिक उपलब्धि के लिए नहीं है।

उनकी मांग केवल यह है—

राम मेरे लिए निरंतर प्रिय रहें।

यहाँ भक्ति स्वयं लक्ष्य बन जाती है।
+++ +++

पहले दोहे से इसका संबंध ;


इसी प्रार्थना के ठीक पहले तुलसीदासजी कहते हैं—

“मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।”

अर्थात् मेरे समान दीन कोई नहीं और आपके समान दीनों का हित करने वाला कोई नहीं। 

फिर वे श्रीराम से संसाररूपी भय को दूर करने की प्रार्थना करते हैं।

इसके बाद आता है—

“कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।”

इस क्रम को समझना बहुत आवश्यक है।

पहले अपनी दीनता स्वीकार की।

फिर भगवान् की शरण स्वीकार की।

फिर संसार के भय से मुक्ति मांगी।

और उसके बाद भगवान् के प्रति निरंतर प्रेम मांगा।

अर्थात् तुलसीदासजी के लिए अंतिम उपलब्धि केवल भय से मुक्ति नहीं है।

अंतिम उपलब्धि राम में अखंड प्रेम है।

मुक्ति से भी अधिक महत्वपूर्ण क्या ?


श्रीरामचरितमानस की भक्ति-दृष्टि में भगवान् के प्रति प्रेम अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मनुष्य सामान्यतः भगवान् से कुछ मांगता है—

धन मिले।

रोग दूर हो।

संतान सुख मिले।

संकट दूर हो।

मान - सम्मान मिले।

भय समाप्त हो।

लेकिन तुलसीदासजी की प्रार्थना इससे आगे जाती है।

वे कहते हैं—

“रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु।”

अर्थात् मुझे ऐसी अवस्था मिले कि भगवान् स्वयं मेरे चित्त का परम प्रिय विषय बन जाएँ।

यही भक्त और भगवान् के संबंध का गहन पक्ष है।
+++ +++

मनुष्य जिसको सबसे प्रिय मानता है, मन उसी का चिंतन करता है ;


मन का स्वभाव है कि वह अपने प्रिय विषय की ओर बार - बार लौटता है।

जिसे धन प्रिय है, उसका मन धन की चिंता में जाता है।

जिसे विषय प्रिय है, उसका मन विषय की ओर जाता है।

जिसे प्रतिष्ठा प्रिय है, उसका मन सम्मान - असम्मान में उलझा रहता है।

जिसे परिवार अत्यंत प्रिय है, उसका मन परिवार की चिंता करता रहता है।

इसी मनोवैज्ञानिक सत्य को तुलसीदासजी भक्ति में बदल देते हैं।

वे कहते हैं—

यदि श्रीराम ही सबसे अधिक प्रिय हो जाएँ, तो मन स्वाभाविक रूप से श्रीराम की ओर लौटेगा।

इस लिए भक्ति केवल बाहरी कर्म नहीं है।

भक्ति का केंद्र है—

चित्त की प्रियता।

भगवान् को “प्रिय” बनाने की साधना ;


श्रीराम को निरंतर प्रिय बनाने के लिए मनुष्य को अपनी दिनचर्या में रामस्मरण स्थापित करना चाहिए।

प्रातः जागते समय रामनाम।

दैनिक कार्य प्रारंभ करते समय रामस्मरण।

भोजन से पहले भगवान् का स्मरण।

कार्य करते समय सत्य और धर्म का पालन।

दुःख में रामनाम।

सुख में रामनाम।

रात्रि में सोने से पहले रामस्मरण।

यह केवल बाहरी नियम नहीं है।

धीरे - धीरे मन में यह संस्कार बनता है कि—

“मेरे जीवन का आधार श्रीराम हैं।”

यही अभ्यास धीरे - धीरे “निरंतर” स्मरण की दिशा में ले जाता है।

नाम और स्मरण का महत्व ;


श्रीरामचरितमानस में रामनाम की महिमा बार-बार आती है। 

उत्तरकाण्ड के मानस - माहात्म्य में भी तुलसीदासजी मानस को पुण्य, पापहर, कल्याणकारी, ज्ञान - भक्ति प्रदान करने वाला और मोह को दूर करने वाला बताते हैं।

इस लिए राम के प्रति प्रेम केवल भावना बनकर न रह जाए, इस के लिए नाम - स्मरण, सत्संग, रामकथा, शास्त्रश्रवण और सदाचार महत्वपूर्ण साधन हैं।

नाम जपने का उद्देश्य केवल संख्या पूरी करना नहीं है।

नाम के साथ भाव जुड़ना चाहिए—

“राम मेरे हैं और मैं राम का हूँ।”

रामप्रियता की परीक्षा कैसे हो ?


इस दोहे को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है। 

इस का परीक्षण अपने जीवन में किया जा सकता है।

अपने मन से पूछें—

जब संकट आता है, सबसे पहले किसका स्मरण होता है?

जब धन का प्रश्न आता है, धर्म पहले आता है या धन?

जब अपमान होता है, रामनाम बचता है या क्रोध?

जब लाभ होता है, अहंकार बढ़ता है या कृतज्ञता?

जब हानि होती है, भगवान् पर विश्वास बना रहता है या टूट जाता है?

जब अकेलापन आता है, मन संसार में भागता है या रामनाम में टिकता है?

इन प्रश्नों के उत्तर मन की वास्तविक दिशा बताते हैं।

“प्रिय” का अर्थ केवल भावना नहीं, जीवन की दिशा है ;


श्रीराम को प्रिय मानना केवल भावुक होकर “राम - राम” कहना नहीं है।

यदि राम प्रिय हैं तो—

सत्य प्रिय होना चाहिए।

क्योंकि श्रीराम मर्यादा और सत्य के आदर्श हैं।

धर्म प्रिय होना चाहिए।

क्योंकि श्रीराम का जीवन धर्ममय है।

सेवा प्रिय होनी चाहिए।

क्योंकि भक्ति केवल अपने लिए मांगने का नाम नहीं।

विनय प्रिय होनी चाहिए।

क्योंकि अहंकार भगवान् - भक्ति के विपरीत दिशा में ले जाता है।

करुणा प्रिय होनी चाहिए।

क्योंकि भगवान् के प्रति प्रेम जीवमात्र के प्रति व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।

इस प्रकार रामभक्ति केवल मंदिर की सीमा में नहीं रहती; वह आचरण में उतरती है।

काम और लोभ से रामप्रेम की ओर ;


इस दोहे का सबसे व्यावहारिक संदेश यही है—

मन को खाली नहीं छोड़ा जा सकता।

यदि मन को केवल संसार में लगा रहने दिया जाए तो विषय, धन, प्रतिष्ठा, इच्छा और अहंकार उसे अपनी ओर खींचते रहेंगे।

इस लिए केवल यह कहना कि “काम छोड़ दो, लोभ छोड़ दो, मोह छोड़ दो” पर्याप्त नहीं है।

उससे आगे आवश्यकता है—

मन को श्रीराम में लगाओ।

तुलसीदासजी का उपाय यही है।

सांसारिक आसक्ति को केवल दबाना नहीं, बल्कि उसकी दिशा बदलना है।

जहाँ अत्यधिक चाह थी, वहाँ भगवान् की चाह हो।

जहाँ निरंतर स्मरण था, वहाँ रामस्मरण हो।

जहाँ मन बार - बार संसार की ओर जाता था, वहाँ रामनाम की ओर लौटे।

यही इस दोहे का साधना - रहस्य है।

यह दोहा भक्त की अंतिम प्रार्थना जैसा क्यों लगता है ?


मानस के उत्तरकाण्ड में तुलसीदासजी अनेक प्रकार से श्रीराम की कृपा, भक्ति और शरणागति का वर्णन करते हैं। 

इसके बाद यह प्रार्थना आती है कि श्रीराम निरंतर प्रिय लगें। 

मूल पाठ में इसके तुरंत बाद मानस - रचना और उसके माहात्म्य से जुड़े श्लोक आते हैं।

इसलिए इसे केवल एक साधारण उपदेश मानना उचित नहीं।

यह भक्त के हृदय की अंतिम दिशा बताता है—

धन नहीं।

विषय नहीं।

प्रतिष्ठा नहीं।

केवल रामप्रेम।

और वह भी क्षणिक नहीं—

“निरंतर।”

“मोहि राम” — इस शब्द में आत्मसमर्पण
अंतिम शब्दों में तुलसीदासजी कहते हैं—

“लागहु मोहि राम।”

यहाँ भक्त भगवान् से अपने मन की दशा बदलने की प्रार्थना करता है।

अर्थात्—

“हे राम! मेरी अपनी शक्ति इतनी नहीं कि मेरा मन सदा आपकी ओर लगा रहे। 

आप ही ऐसी कृपा करें कि आप मुझे निरंतर प्रिय लगें।”

यहीं भक्ति और कृपा का संबंध सामने आता है।

साधक प्रयास करता है—

नाम - स्मरण करता है।

कथा सुनता है।

शास्त्र पढ़ता है।

सत्संग करता है।

धर्म का पालन करता है।

परंतु अंततः हृदय में स्थिर प्रेम को भगवान् की कृपा से ही पुष्ट मानता है।

इस लिए यह दोहा साधना भी है और प्रार्थना भी।

शास्त्रीय दृष्टि से इस दोहे का सार ;


इस पूरे दोहे को कुछ सूत्रों में समझें—

काम की तीव्रता → रामप्रेम की तीव्रता।

लोभ की निरंतरता → रामस्मरण की निरंतरता।

विषय में आकर्षण → भगवान् में अनुराग।

धन की चिंता → रामनाम की चिंता।

सांसारिक प्रियता → भगवत्प्रियता।

लेकिन इसका अर्थ विषयासक्ति को सही ठहराना नहीं है।

तुलसीदासजी ने केवल मनुष्य के अनुभव में उपस्थित तीव्र आसक्ति को उदाहरण बनाकर यह प्रार्थना की है कि वही मनोबल श्रीराम की भक्ति में लगे।

आज के साधक के लिए सीधा संदेश ;


इस दोहे को पढ़ते समय अपने मन में एक सीधा प्रश्न रखें—

“मेरे लिए वास्तव में सबसे अधिक प्रिय क्या है?”


जिसका उत्तर मिलेगा, वहीं आपका मन सबसे अधिक रहता है।

यदि धन सबसे प्रिय है तो धन की चिंता बार-बार आएगी।

यदि प्रतिष्ठा सबसे प्रिय है तो मान-अपमान बार-बार मन में आएगा।

यदि विषय सबसे प्रिय हैं तो मन उन्हीं में घूमता रहेगा।

लेकिन यदि श्रीराम सबसे प्रिय होने लगें तो मन बार - बार रामनाम, रामकथा, रामचरित्र और रामभक्ति की ओर लौटेगा।

यही तुलसीदासजी की प्रार्थना है।

इस लिए यह दोहा किसी काल्पनिक कथा का विषय नहीं है। यह सीधा आत्मपरीक्षण है।

निष्कर्ष ;


“कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥”

श्रीरामचरितमानस का यह दोहा मनुष्य के मन की सबसे बड़ी शक्ति—आसक्ति—को भगवान् की भक्ति में लगाने की प्रार्थना है।

तुलसीदासजी यह नहीं कहते कि काम या लोभ अच्छे हैं। 

वे कहते हैं कि जिस प्रकार सांसारिक आसक्ति मनुष्य के मन को अपने विषय से बांध देती है, उसी प्रकार मेरा मन श्रीराम से कभी अलग न हो।

इस में तीन शब्द सबसे महत्वपूर्ण हैं—

“प्रिय” — राम हृदय को अच्छे लगें।

“निरंतर” — यह प्रेम बीच-बीच में नहीं, लगातार रहे।

“मोहि” — यह केवल सिद्धान्त न रहे, मेरे अपने अंतःकरण की अवस्था बने।

इस लिए इस दोहे की वास्तविक साधना यह है कि मनुष्य भगवान् से केवल संसार की वस्तुएँ न मांगे, बल्कि भगवान् को ही अपने जीवन का परम प्रिय बनाने की प्रार्थना करे।

धन आए तो राम न छूटें।

सुख आए तो राम न छूटें।

दुःख आए तो राम न छूटें।

हानि हो तो राम न छूटें।

लाभ हो तो राम न छूटें।

सम्मान मिले तो राम न छूटें।

अपमान मिले तो राम न छूटें।

और जीवन की अंतिम अवस्था तक हृदय की यही पुकार बनी रहे—

“हे रघुनाथ! जैसे संसारासक्त मनुष्य अपने प्रिय विषय को छोड़ना नहीं चाहता, वैसे ही मेरा मन आपको छोड़ना न चाहे। 

आप मुझे निरंतर प्रिय लगते रहें। मेरे चित्त की सबसे बड़ी चाह, सबसे बड़ा आश्रय और सबसे गहरा प्रेम—

आप ही हों, हे राम।”

यही इस दोहे का सार है और यही तुलसीदासजी की भक्ति-दृष्टि में निरंतर रामप्रेम की परम प्रार्थना है।

जय श्री राम राम राम...!!!
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