सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
श्रीमद्भागवत महापुराण प्रवचन - जड़भरत की कथा
श्रीमद्भागवत महापुराण प्रवचन - जड़भरत की कथा।
जड़भरत की कथा — पिता उन्हें पण्डित बनाना चाहते थे, परन्तु जड़भरत ने ज्ञान को क्यों छिपाया ?
जड़भरत के पिता उन्हें पंडित बनाना चाहते थे, किंतु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे एक भी श्लोक याद न कर सके।
उनके पिता ने उन्हें जड़ समझ लिया।
पिता की मृत्यु के पश्चात मां भी चल बसी।
कुटुंब में रह गये भाई और भाभियां, जड़भरत के साथ बहुत बुरा व्यवहार करती थीं।
जड़भरत इधर - उधर मजदूरी करते थे।
जो कुछ मिल जाता था, खा लिया करते थे और जहां जगह मिलती थी, सो जाया करते थे।
सुख - दुख और मान - सम्मान को एक समान समझते थे।
भाईयों ने जब देखा कि उनके छोटे भाई के कारण उनकी अप्रतिष्ठा हो रही है...!
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श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कन्ध में महाराज भरत के पूर्वजन्म, उनके मृग - शरीर और उसके बाद ब्राह्मण - कुल में जड़भरत के रूप में जन्म लेने का अत्यन्त गूढ़ प्रसंग आता है।
यह कथा केवल बाहरी रूप से “जड़” दिखाई देने वाले व्यक्ति की कथा नहीं है, बल्कि आत्मज्ञान, वैराग्य, पूर्वसंस्कार, आसक्ति और वास्तविक विद्या के भेद को समझाने वाला शास्त्रीय प्रसंग है।
तो उन्होंने उन्हें खेती के काम में लगा दिया।
जड़भरत रात - दिन खेतों की मेड़ों पर बैठकर खेतों की रखवाली करने लगे।
वे शरीर से बड़े स्वस्थ और हट्टे - कट्टे थे ।
एक दिन राजा रहूगण पालकी पर बैठकर, आत्मज्ञान की शिक्षा लेने के लिए कपिल मुनि के पास जा रहे थे।
मार्ग में पालकी के एक कहार की मृत्यु हो गई।
राजा रहूगण ने अपने सेवकों से कहा कि वे कोई दूसरा कहार खोजकर लाएं।
रहूगण के सेवक किसी दूसरे कहार की खोज में निकल पड़े।
उनकी दृष्टि खेत की मेड़ पर बैठे हुए जड़भरत पर पड़ी।
सेवक उन्हें पकड़कर ले गए।
जड़भरत ने बिना कुछ आपत्ति किए हुए, कहारों के साथ पालकी कंधे पर रख ली और बहुत संभल - संभल कर चलने लगे।
उनके पैरों के नीचे कोई जीव दब न जाए इस लिए उनके पैर डगमगा उठते थे।
इस से राजा रहूगण को झटका लगता था, उन्हें कष्ट होता था।
राजा रहूगण ने कहारों से कहा, ‘क्यों जी, तुम लोग किस तरह चल रहे हो ?
संभलकर, सावधानी के साथ क्यों नहीं चलते?’
कहारों ने उत्तर दिया, ‘महाराज हम तो सावधानी के साथ चल रहे हैं, किंतु यह नया कहार हमारे चलने में विघ्न पैदा करता है।
इस के पैर रह - रह कर डगमगा उठते हैं।’
राजा रहूगण ने जड़भरत को सावधान करते हुए कहा, ‘क्यों भाई, तुम ठीक से क्यों नहीं चलते?
देखने में तो हट्टे - कट्टे मालूम होते हो।
क्या पालकी लेकर ठीक से चला नहीं जाता?
सावधानी से मेरी आज्ञा का पालन करो, नहीं तो दंड दूंगा।’
रहूगण का कथन सुनकर जड़भरत मुस्करा उठे।
उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘आप शरीर को दंड दे सकते हैं, पर मुझे नहीं दे सकते, मैं शरीर नहीं आत्मा हूं।
मैं दंड और पुरस्कार दोनों से परे हूं।
दंड देने की तो बात ही क्या, आप तो मुझे छू भी नहीं सकते।’
जड़भरत की ज्ञान भरी वाणी सुनकर रहूगण विस्मय की लहरों में डूब गए।
उन्होंने आज्ञा देकर पालकी नीचे रखवा दी ।
वे पालकी से उतरकर जड़भरत के पैरों में गिर पड़े और कहा, ‘महात्मन, मुझे क्षमा कीजिए।
कृपया बताइए आप कौन हैं ?
कहीं आप वे कपिल मुनि ही तो नहीं हैं जिनके पास मैं आत्मज्ञान की शिक्षा लेने जा रहा था?’
जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन! मैं न तो कपिल मुनि हूं और न कोई ॠषि हूं।
मैं पूर्वजन्म में एक राजा था।
मेरा नाम भरत था।
मैंने भगवान श्रीहरि के प्रेम और भक्ति में घर - द्वार छोड़ दिया था।
मैं हरिहर क्षेत्र में जाकर रहने लगा था।
किंतु एक मृग शिशु के मोह में फंसकर मैं भगवान को भी भूल गया।
मृगशिशु का ध्यान करते हुए जब शरीर त्याग किया, तो मृग का शरीर प्राप्त हुआ।
मृग का शरीर प्राप्त होने पर भी भगवान की अनुकंपा से मेरा पूर्व - जन्म का ज्ञान बना रहा।
मैं यह सोचकर बड़ा दुखी हुआ कि मैंने कितनी अज्ञानता की थी!
एक मृगी के बच्चे के मोह में फंसकर मैंने भगवान श्रीहरि को भुला दिया था।
राजन, जब मैंने मृग शरीर का त्याग किया, तो मुझे यह ब्राह्मण शरीर प्राप्त हुआ।
ब्राह्मण का शरीर प्राप्त होने पर भी मेरा पूर्व - जन्म का ज्ञान बना रहा।
मैं यह सोचकर कि मेरा यह जन्म व्यर्थ न चला जाए, अपने को छिपाए हूं।
मैं दिन - रात परमात्मारूपी आत्मा में लीन रहता हूं, मुझे शरीर का ध्यान बिलकुल नहीं रहता।
राजन, इस जगत में न कोई राजा है।
न प्रजा, न कोई अमीर है, न कोई ग़रीब, न कोई कृषकाय है, न कोई स्थूलकाय, न कोई मनुष्य है, न कोई पशु।
सब आत्मा ही आत्मा हैं।
ब्रह्म ही ब्रह्म हैं।
‘राजन, मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए।
यही मानव - जीवन की सार्थकता है।
यही श्रेष्ठ ज्ञान है, और यही श्रेष्ठ धर्म है।’
जड़भरत वास्तव में पूर्वजन्म के वही महाराज भरत थे, जिनके नाम से भारतवर्ष का नाम प्रसिद्ध हुआ।
श्रीमद्भागवत के अनुसार महाराज भरत ने राज्य का त्याग करके भगवान की भक्ति और साधना का आश्रय लिया था।
किंतु एक मृग के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण मृत्यु के समय उनका मन उसी में लगा और उन्हें मृग - योनि प्राप्त हुई।
मृग - शरीर में भी उन्हें अपने पूर्वजन्म का स्मरण रहा।
उस जीवन को पूर्ण करने के बाद उन्होंने एक श्रेष्ठ ब्राह्मण - कुल में जन्म लिया।
उनके पिता साधारण अर्थ में अज्ञानी नहीं थे।
श्रीमद्भागवत उन्हें अंगिरा - वंश में उत्पन्न, मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले, वेद - वेदांग के अध्ययन में निपुण, दानशील, संतोषी, क्षमाशील, विनम्र और आत्मज्ञान में स्थित ब्राह्मण के रूप में वर्णित करता है।
उनके परिवार में जड़भरत का जन्म उनके दूसरे विवाह से हुए जुड़वाँ संतानों में पुत्र के रूप में हुआ।
पिता की इच्छा — पुत्र विद्वान बने
जड़भरत के पिता अपने पुत्र से अत्यन्त स्नेह करते थे।
वे चाहते थे कि उनका पुत्र विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करे, शास्त्रों का अध्ययन करे, शौचाचार जाने, व्रत और नियमों का पालन करे, गुरु - सेवा करे तथा वैदिक ज्ञान प्राप्त करे।
श्रीमद्भागवत स्पष्ट कहता है कि पिता ने पुत्र के प्रति प्रेमवश उसकी शिक्षा में कोई कमी नहीं रखी।
पुत्र उन शिक्षाओं में रुचि नहीं दिखाता था, फिर भी पिता उसे बार - बार शिक्षा देते रहे।
उनका भाव था कि पुत्र को पिता से शिक्षा प्राप्त करनी ही चाहिए।
यहीं से इस प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण रहस्य प्रारम्भ होता है।
जड़भरत सामान्य बालक की तरह पढ़ने में असमर्थ नहीं थे।
श्रीमद्भागवत बताता है कि वे अपने पिता के सामने इस प्रकार व्यवहार करते थे, मानो उन्हें कुछ समझ में ही नहीं आता।
पिता उन्हें वैदिक मन्त्रों का अध्ययन कराना चाहते थे।
विशेष रूप से ओंकार, व्याहृतियों और सावित्री अर्थात् गायत्री - मन्त्र का अध्ययन कराने का प्रयत्न किया गया।
परन्तु जड़भरत ने ऐसा व्यवहार किया कि पिता को लगा कि उनका पुत्र मन्त्र को ठीक प्रकार ग्रहण नहीं कर रहा है।
रहूगण जड़भरत से अमृत ज्ञान पाकर तृप्त हो गए।
उन्होंने जड़भरत से निवेदन किया, ‘महात्मन!
मुझे अपने चरणों में रहने दीजिए, अपना शिष्य बना लीजिए।’
जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन जो मैं हूं, वही आप हैं।
न कोई गुरु है, न कोई शिष्य।
सब आत्मा है, ब्रह्म हैं।’
जड़भरत जब तक संसार में रहे, अपने आचरण और व्यवहार से अपने ज्ञान को प्रकट करते रहे।
जब अंतिम समय आया, तो चिरनिद्रा में सो गए, ब्रह्म में समा गए।
यह सारा जगत ब्रह्म से निकला है और ब्रह्म में ही समा जाता है।
ब्रह्म की इस लीला को जो समझ पाता है, उसी को जगत में सुख और शांति प्राप्त होती है।
*माना कि आप*
*किसी का भाग्य नहीं*
*बदल सकते,*
*लेकिन अच्छी प्रेरणा देकर किसी का मार्ग-दर्शन तो कर सकते हैं।*
*भगवान कहते हैं जीवन में कभी मौका मिले तो-----*
*"सारथी" बनना,*
*स्वार्थी नही।।*
इस लिए लोकदृष्टि में वे धीरे - धीरे “जड़” अर्थात् बुद्धिहीन दिखाई देने लगे और उनका नाम ही जड़भरत प्रसिद्ध हो गया।
क्या वास्तव में जड़भरत को कुछ आता ही नहीं था?
यहाँ शास्त्र के शब्दों को ठीक प्रकार समझना आवश्यक है।
भागवत का वर्णन यह नहीं कहता कि जड़भरत में वास्तविक बुद्धि का अभाव था।
इस के विपरीत, आगे चलकर वही जड़भरत राजा रहूगण को ऐसा आत्मज्ञान प्रदान करते हैं कि राजा का अहंकार और देहाभिमान टूट जाता है।
पंचम स्कन्ध के ग्यारहवें अध्याय में उनके उपदेश में शरीर, मन, इन्द्रियाँ, अहंकार, आत्मा और परम सत्य का अत्यन्त गम्भीर विवेचन मिलता है।
अतः “जड़” शब्द को केवल मूर्खता का पर्याय मान लेना इस कथा के मूल रहस्य को समझना नहीं है।
जड़भरत ने संसार की दृष्टि में अपनी विद्वत्ता प्रकट नहीं की।
वे अपने वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप को छिपाकर रहते थे।
उनका उद्देश्य प्रतिष्ठा, सम्मान, पाण्डित्य अथवा सांसारिक पहचान प्राप्त करना नहीं था।
पिता का प्रयत्न
श्रीमद्भागवत के अनुसार पिता ने अपने पुत्र को केवल पढ़ाने का प्रयास ही नहीं किया, बल्कि ब्रह्मचर्याश्रम के अनेक नियमों में प्रशिक्षित करना चाहा।
शौच, आचमन, वैदिक अध्ययन, व्रत, नियम, गुरु की सेवा और अग्नि - सेवा आदि का उपदेश दिया गया।
पुत्र की अरुचि के बावजूद पिता ने शिक्षा देना नहीं छोड़ा।
वे अपने पुत्र को पण्डित और संस्कारित ब्राह्मण बनते देखना चाहते थे।
उनका स्नेह इतना अधिक था कि पुत्र की शिक्षा पूरी न हो पाने से उनकी अपनी इच्छा भी पूर्ण नहीं हुई।
यहाँ भागवत एक गहरा जीवन-सत्य रखता है—
स्नेह मनुष्य को कर्तव्य में लगाता भी है और कभी - कभी आसक्ति में भी बाँध देता है।
पिता का पुत्र के प्रति प्रेम पवित्र था, परन्तु उनके मन में यह इच्छा भी थी कि पुत्र वैदिक शिक्षा प्राप्त करके योग्य बने।
समय बीतता गया और उनकी यह इच्छा पूर्ण नहीं हो सकी।
अन्ततः काल ने उन्हें अपने शरीर से अलग कर दिया।
श्रीमद्भागवत इस प्रसंग के माध्यम से यह भी बताता है कि मृत्यु को मनुष्य भूल सकता है, लेकिन मृत्यु मनुष्य को नहीं भूलती।
पिता के बाद क्या हुआ?
पिता के देहावसान के बाद जड़भरत के नौ सौतेले भाइयों ने उन्हें वास्तविक रूप से नहीं पहचाना।
वे तीनों वेदों के कर्मकाण्डीय ज्ञान में स्थित थे, लेकिन जड़भरत की आध्यात्मिक स्थिति को समझ नहीं सके।
उन्होंने अपने भाई को “जड़बुद्धि” मानकर उसकी शिक्षा का प्रयत्न छोड़ दिया।
यहीं भागवत का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त सामने आता है—
बाहरी पाण्डित्य और आत्मज्ञान एक ही वस्तु नहीं हैं।
किसी व्यक्ति को वेदों के मन्त्र याद हो सकते हैं, कर्मकाण्ड का ज्ञान हो सकता है, शास्त्रों के शब्दों का अध्ययन हो सकता है; फिर भी आत्मतत्त्व का साक्षात्कार अलग विषय है।
इसके विपरीत कोई व्यक्ति बाहरी रूप से मौन, सरल या अल्पज्ञ दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके भीतर आत्मतत्त्व का गम्भीर ज्ञान हो सकता है।
जड़भरत इसी सत्य के प्रतीक हैं।
जड़भरत ने “जड़” बनकर रहना क्यों स्वीकार किया?
इसका सम्बन्ध उनके पूर्वजन्म के अनुभव से है।
महाराज भरत ने पहले ही राजपाट, वैभव और सांसारिक जीवन का त्याग किया था।
लेकिन मृग के प्रति मोह ने उनके मन को बाँध दिया।
इस लिए अगले जन्म में जड़भरत अत्यन्त सावधान रहे कि किसी प्रकार की सांसारिक प्रतिष्ठा, संबंध, सम्मान या आसक्ति उन्हें पुनः आध्यात्मिक मार्ग से विचलित न कर दे।
इसलिए उन्होंने संसार के सामने अपनी वास्तविक योग्यता प्रदर्शित नहीं की।
वे न पण्डित कहलाना चाहते थे, न प्रतिष्ठित होना, न सम्मान प्राप्त करना।
उनका लक्ष्य आत्म - स्मृति और भगवान की ओर चित्त को स्थिर रखना था।
भागवत के अनुसार वे बाहरी लोगों के सामने उन्मत्त, जड़ या अंधे के समान व्यवहार करते हुए भीतर से भगवान के चरणों का चिन्तन करते थे।
यहाँ “जड़भरत” नाम में ही कथा का रहस्य छिपा है—
जिसे संसार जड़ समझ रहा था, उसके भीतर आत्मज्ञान जागृत था।
वास्तविक विद्या क्या है?
जड़भरत की आगे की कथा इसका उत्तर देती है।
जब उन्हें राजा रहूगण की पालकी उठाने के लिए लगाया गया, तब राजा ने उनके असामान्य व्यवहार को देखकर उन्हें डाँटा। जड़भरत ने तब मौन नहीं रखा।
उन्होंने राजा को शरीर और आत्मा के भेद का उपदेश दिया।
श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध, ग्यारहवें अध्याय में उनका उपदेश मन की प्रकृति, इन्द्रियों के विषय, अहंकार, शरीर की उपाधि, कर्म और आत्मतत्त्व का विश्लेषण करता है।
वे बताते हैं कि मनुष्य जब देह और मन को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है, तब वह भौतिक बन्धन में फँसता रहता है।
वे यह भी बताते हैं कि अनियंत्रित मन जीव का अत्यन्त शक्तिशाली शत्रु बन जाता है और गुरु तथा भगवान के चरणों की सेवा द्वारा मन को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए।
अर्थात् जिस व्यक्ति को संसार ने “एक श्लोक भी याद न कर पाने वाला” समझ लिया था, वही आगे चलकर राजा को आत्मा और शरीर के भेद का उपदेश देने वाला महान आत्मज्ञानी सिद्ध हुआ।
जड़भरत की कथा का शास्त्रीय निष्कर्ष
इस कथा को केवल स्मरणशक्ति की कहानी समझना उचित नहीं है।
श्रीमद्भागवत का उद्देश्य यह बताना है कि ज्ञान का मूल्य केवल इस बात से नहीं निर्धारित होता कि व्यक्ति कितने श्लोक बोल सकता है।
वैदिक अध्ययन महत्वपूर्ण है, संस्कार महत्वपूर्ण हैं, गुरु - सेवा महत्वपूर्ण है और शास्त्र - अध्ययन भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है; लेकिन इन सबका अंतिम प्रयोजन आत्मतत्त्व की ओर बढ़ना है।
जड़भरत के पिता ने अपने धर्म के अनुसार पुत्र को शिक्षित करने का पूरा प्रयास किया।
जड़भरत ने बाहरी शिक्षा में रुचि न दिखाकर संसार की दृष्टि में स्वयं को अज्ञानी बना लिया।
उनके पिता उनके आन्तरिक उद्देश्य को समझ नहीं सके और अपनी इच्छा पूर्ण किए बिना देह त्याग दिया।
उनके भाइयों ने भी जड़भरत की वास्तविक आध्यात्मिक स्थिति को नहीं पहचाना।
लेकिन बाद में राजा रहूगण के सामने वही जड़भरत आत्मज्ञान का ऐसा प्रकाश प्रकट करते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि उनकी “जड़ता” अज्ञान की नहीं, बल्कि सांसारिक प्रदर्शन से विरक्ति की अवस्था थी।
इस लिए जड़भरत की कथा का सार यह नहीं कि पढ़ाई व्यर्थ है या शास्त्र याद करना आवश्यक नहीं है।
सार यह है कि शास्त्र का बाहरी ज्ञान और आत्मज्ञान में भेद समझना चाहिए।
शास्त्र पढ़ना साधन है; अहंकार बढ़ाना उसका उद्देश्य नहीं।
पाण्डित्य यदि विनय, विवेक, आत्मचिन्तन और भगवान के प्रति भक्ति की ओर ले जाए तो वह साधना का अंग है।
लेकिन केवल यह अहंकार कि “मुझे बहुत श्लोक आते हैं” आत्मज्ञान का प्रमाण नहीं।
जड़भरत ने संसार को यह दिखाया कि कभी - कभी परम ज्ञान अपने को प्रदर्शन से नहीं, बल्कि मौन, वैराग्य और आत्मस्थित जीवन से प्रकट करता है।
इसीलिए श्रीमद्भागवत की जड़भरत कथा का मूल संदेश है—
बाहरी दृष्टि से जड़ दिखाई देना और वास्तव में अज्ञानी होना एक बात नहीं है।
शास्त्र का पाठ और शास्त्र का तत्त्व समझना एक बात नहीं है।
पाण्डित्य और आत्मज्ञान एक बात नहीं है।
और संसार से सम्मान प्राप्त करना तथा भगवान के चरणों में स्थित होना भी एक बात नहीं है।
जड़भरत ने अपने जीवन से यही रहस्य प्रकट किया—
जिस मनुष्य का लक्ष्य आत्मतत्त्व और भगवान की प्राप्ति हो, उसके लिए संसार की प्रशंसा, पाण्डित्य की प्रतिष्ठा और बाहरी पहचान गौण हो जाती है।
यही श्रीमद्भागवत में जड़भरत के “जड़” रूप के पीछे छिपा हुआ गम्भीर आध्यात्मिक रहस्य है।
🙏🙏 हर हर महादेव हर🙏🙏।।
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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