*घर की नीव बहुएं*।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

*घर की नीव बहुएं*

*दीपा और नीता दोनों जेठानी - देवरानी। 

दीपा नौकरी करती थी और नीता घर संभालती थी। 

भरा - पूरा परिवार था, सास - ससुर, दोनों के दो बच्चे कुल १० लोगों का परिवार। 

कई सालों बाद दोनों की बुआ सास कुछ दिन अपने भाई के पास रहने आई। 

सुबह उठते ही बुआ जी ने देखा दीपा जल्दी - जल्दी अपने काम निपटा रही थी। 






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नीता ने सब का नाश्ता, टिफिन बनाया जिसे दीपा ने सब को परोसा, टिफिन पैक किया और चली गई ऑफिस। 

नीता ने फिर दोपहर का खाना बनाया और बैठ गयी थोड़ा सास और बुआ सास के पास।*

*बुआ जी से रहा नहीं गया बोली "छोटी बहू तेरी जेठानी तो अच्छा हुकुम चलाती है तुझ पर, सुबह से देख रही हूं रसोई घर में तू लगी है और वो महारानी दिखावा करने के लिए सबको नाश्ता परोस रही थी जैसे उसी ने बनाया हो।"*

*नीता और सास ने एक दूसरे को देखा, नीता बोली "नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है बुआ जी।"*

*बुआ जी बोली "तू भोली है, पर मैं सब समझती हूं।"*

*नीता से अब रहा नहीं गया और बोली "बुआ जी आपको दीपा दीदी का बाकी सबको नाश्ता परोसना दिखा, शायद ये नहीं दिखा कि उन्होंने मुझे भी सबके साथ नाश्ता करवाया। 

मुझे डांट कर पहले चाय पिलाई, नहीं तो सबको खिलाकर और टिफिन पैक करने में मेरा नाश्ता तो ठंडा हो चुका रहता या मैं खाती ही नहीं। 

दीदी सुबह उठकर मंदिर की सफाई करके फूल सजाकर रखती हैं तो मम्मी जी का पूजा करने में अच्छा लगता है। 

मैं तो नहा कर आते ही रसोई में घुस जाती हूं। 

शाम को आते हुए दीदी सब्जियां भी लेकर आती हैं क्योंकि आपके भतीजों को रात लेट हो जाती है, तब ताजी सब्जियां नहीं मिलती। 

ऑफिस में कितनी मेहनत करनी पड़ती है, फिर ऑफिस में काम करके आकर रात को खाना बनाने में मेरी मदद करती हैं। 

वो मेरी जेठानी नहीं मेरी बड़ी बहन हैं, मैं नहीं समझूंगी तो कौन समझेगा?"*

*बुआ जी चुप हो गई। 

शाम को दीपा सब्जी की थैली नीता को पकड़ाते हुए बोली "इसमें तुम्हारी फेवरेट लेखक की किताब है निकाल लेना।"*

*नीता खुश हो गई और बोली "थैंक्स दीदी।" 

नीता सब्जी की थैली किचन में रखी और किताब रखने अपने कमरे में चली गई। 

बुआ जी ने दीपा को आवाज दी "बड़ी बहू, यहां आना।"*




*दीपा बोली "जी बुआ जी?"*

*बुआ जी बोली "तुम इतनी मेहनत करके कमाती हो और ऐसे फालतू किताबों में पैसे व्यर्थ करती हो, वो भी अपनी देवरानी के लिए। 

वो तो वैसे भी घर में करती ही क्या है ? 

तुम दिन भर मेहनत करती हो और वो घर पर आराम।"*

*दीपा मुस्कुराई बोली "आराम ? 

नीता को तो जबरदस्ती आराम करवाना पड़ता है।

सुबह से बेचारी लगी रहती है किचन में सबकी अलग - अलग पसंद, चार बच्चों का टिफिन, सब बनाती है वो भी प्यार से। 

सुबह की चाय पीने का भी सुध नहीं रहता उसे, दोपहर को जब बच्चे आते हैं फिर उनका खाना, उनकी पढ़ाई सब वही देखती है। 

वो है इस लिए मुझे ऑफिस में बच्चों की चिंता नहीं रहती। 

मैं अपना पूरा ध्यान ऑफिस में लगा पाती हूं। 

कुछ दिन पहले ही प्रमोशन मिला है।*

*मम्मी पापा की दवाई कब खत्म हुई, कब लानी है उसे पता होता है। 

रिश्तेदारों के यहां कब फंक्शन है क्या देना है सब ध्यान रहता है उसे। 

घर संभालना कोई छोटी बात नहीं है। 

मेहमानों की आवभगत बिना किसी शिकायत के करती है। 

उसे बस पढ़ने का शौक है, फिर मैं अपनी छोटी बहन की छोटी सी इच्छा पूरी नहीं करुंगी तो कौन करेगा ?" 

बुआ जी की बोलती फिर बंद हो गई।*

*दीपा वहां से उठ कर चली गई। 

ये सारी बात सास पूजा करते हुए सुन रही थी। 

बुआ जी के पास आकर बोली "जीजी ये दोनों देवरानी जेठानी सगी बहन जैसी हैं और एक दूसरे का अधूरापन पूरा करती हैं। 

मेरे घर की मजबूत नींव है ये दोनों जिसे हिलाना नामुमकिन है। 

ऐसी बातें तो कई लोगों ने दोनों को पढ़ाना चाही, पर मजाल है दोनों ने सामने वाले की बोलती बंद ना की हो ?" 

और सास मुस्कुरा दी। 

बुआ जी की बोलती अब पूरी तरह बंद हैं।

घर को स्वर्ग बनाने के लिये आवश्यक है आपस में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, एक दूसरे को समझने की भावना,कर्तव्य परायणता ये सब आत्म गुणो से घर का गुलदस्ता सजा रहेंगा तो दुनियाँ की कोई ताकत नहीं हमारे घर को नर्क बना दे..*

  *जय श्री कृष्ण*

|| सुमन्त्रजी का अयोध्या लौटना :-||


श्रीरामको पहुँचाकर जब निषादराज वापस लौटे तो देखा सुमन्त्रजी वहीं व्याकुल पड़े हैं। 

वे 'हा राम ! 

हा राम!' कहते हुए लम्बी साँसें ले रहे हैं। 

रथके घोड़े भी घास चरना छोड़ दिये हैं और श्रीराम जिधर गये थे, उधर ही मुड़ - मुड़कर देख रहे हैं।

निषादराज उनकी दशा देखकर अत्यन्त दुःखी हुए। 

उन्होंने सुमन्त्रसे कहा— 'सुमन्त्रजी ! 

आप अब विषादका त्याग कर दें। 

आप परम विद्वान् एवं परमार्थके सच्चे ज्ञाता हैं। 

आप विधाताको ही वाम जानकर रथपर बैठकर अयोध्या जायँ। 

जब आप ही अपना धैर्य खो देंगे तो महाराज दशरथ और महारानी कौसल्याको सान्त्वना कौन देगा ? 

उनका तो श्रीराम - वनवास से संसार ही लुट गया है। 

मेरी आपसे विनती है कि आप रथको लेकर शीघ्र अयोध्या पहुँचें।' 

ऐसा कहकर निषादराजने बरबस सुमन्त्रजी को रथ में बैठा दिया।

भगवान् श्रीराम के वियोग से सुमन्त्रजी का शरीर अत्यन्त शिथिल हो गया था। 

वे चाहकर भी रथको नहीं चला पा रहे थे। 

घोड़े भी पीछे देखकर बार - बार हिनहिना रहे थे, मानो वे श्रीरामको लिये बिना जाना ही नहीं चाहते हैं। 

किसी तरह सायंकाल सुमन्त्रजी अयोध्या पहुँचे।

उनकी अवस्था उस व्यापारी - जैसी थी, जो व्यापार के लिये घरसे गया हो और मूल भी हारकर घर वापस आ गया हो। 

सारी अयोध्यापुरी सूनी हो गयी थी। 

कहीं एक शब्द भी नहीं सुनायी देता था।

अयोध्याकी ऐसी दशा देखकर सुमन्त्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ। 

वे सोचने लगे - कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि श्रीराम के विरह जनित संताप से महाराज सहित सभी लोग शोकाग्नि में दग्ध हो गये हों ?'

चिन्तित सुमन्त्र जब नगर के द्वार पर पहुँचे, तब हजारों लोगों ने दौड़ते हुए रथ को घेर लिया और 'श्रीराम कहाँ हैं ?' 

यह पूछते हुए वे रथ के साथ दौड़ने लगे।

उस समय सुमन्त्र ने उन लोगों से कहा - 'सज्जनो ! 

मैं गङ्गाजी के किनारे तक ही रघुनाथ के साथ गया था। 

वहाँ से उन्होंने मुझे लौट जानेकी आज्ञा दी। 

मेरे काफी अनुनय - विनय के बाद भी उन्होंने अयोध्या लौटना स्वीकार नहीं किया। 

अतः मैं उनसे विदा लेकर लौट आया हूँ। 

वे तीनों लोग वहाँसे गङ्गाके उस पार चले गये।' 

यह जानकर सब लोगोंकी आँखोंसे आँसुओंकी धाराएँ बहने लगीं। 

वे सब 'हमें धिक्कार है' ऐसा कहकर लम्बी साँसें खींचने लगे और करुण क्रन्दन करने लगे।

बाजार के बीच से निकलते हुए सुमन्त्रजी को स्त्रियों के रोने की आवाज सुनायी दी। 

वे महलों की खिड़कियों पर बैठकर श्रीरामके वियोग से संतप्त होकर विलाप कर रही थीं। 

राजमार्ग पर पहुँचकर सुमन्त्र ने अपना मुख ढँक लिया। 

वे रथ लेकर सीधे महाराज दशरथ के भवन की ओर गये। 

उन्होंने देखा कि महाराज पुत्र - शोक में मलिन और आतुर हो रहे हैं। 

सुमन्त्रजी महाराज के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये। 

महाराज दशरथने कहा - 'सुमन्त्र ! 

तुम श्रीरामका सन्देश बताओ। 

क्या वे तुम्हारे विनय करने पर भी नहीं माने और वन चले गये ? 

क्या तुम सुकुमारी सीता को भी नहीं लौटा पाये ? 

मेरा भाग्य ही खोटा है। 

किसी का कोई दोष नहीं है।'

सुमन्त्रने कहा-'महाराज ! 

धर्मात्मा श्रीराम ने आपके चरणों में प्रणाम कहा है। 

उन्होंने कहा है कि मैं वनवास की अवधि पूरी करके महाराजका दर्शन करूँगा। 

वे मेरी चिन्ता न करें।'

श्रीरामका संदेश सुनकर महाराज दशरथ ने कहा— 'सुमन्त्र ! 

मुझे राम के पास ले चलो, नहीं तो मेरे प्राण निकलना ही चाहते हैं।' 

इस तरह श्रीरामके वियोग में 'हा राम! हा राम!' 

कहते हुए महाराज दशरथने अपना प्राण त्याग दिया।

        || जय सियाराम जय हनुमान ||

      *स्नेह वंदन*

         *प्रणाम*

!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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