सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
*करतूत*
आज फिर से साहब का दिमाग उचट गया था ऑफिस में !
बाहर बारिश हो रही थी,मन किया कि पास वाले ढाबे पर चलकर कुछ खाया जाए !
सो ऑफिस का काम फटाफट निपटा कर पहुँच गए साहब ढाबे में !
रामू दौड़त हुआ आया, हाथ में पानी का गिलास मेज पर रखते हुए साहब को नमस्ते की और बोला "क्या बात है साहब काफी दिनों बाद आये हैं आज आप ?"
"हाँ रामू , मैं शहर से बाहर गया था !"
साहब ने जबाब दिया !
"आप बैठो साहब, मैं आपके लिए कुछ खाने को लाता हूँ !"
वो एक साधारण सा ढाबा था, मगर पता नहीं इतने बड़े साहब को वंहा आना बड़ा ही अच्छा लगता था !
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साहब को कुछ भी आर्डर देने की जरुरत नहीं पड़ती थी, बल्कि उनका मनपसंद भोजन अपने आप ही रामू ले आता था !
स्वाद भी बहुत भाता था साहब को यहां के खाने का !
पता नहीं रामू को कैसे पता लग जाता था की साहब को कब क्या अच्छा लगेगा !
और पैसे भी काफी कम लगते थे यहां पर !
साहब बैठे सोच ही रहे थे की चिर - परिचित पकोड़ों की खुशबु से साहब हर्षित हो गए !
"अरे रामू, तू बड़ा जादूगर है रे !
इस मौसम में इससे अच्छा और कुछ हो ही नहीं सकता है !"
साहब पकोड़े खाते हुए बोले !
"अरे साहब, पेट भर के खाईयेगा, इसके बाद अदरक वाली चाय भी लाता हूँ !"
रामू बोला !
साहब का मूड एकदम फ्रेश हो गया था !
देखो आज मैं तुम्हारे ढाबे के कुक से मिलकर ही जाऊँगा, बड़ा ही अच्छा खाना बनाता है वो !"
साहब ने फिर से अपनी पुरानी जिद्द दोहरा दी !
हर बार रामू टाल देता था, मगर आज साहब ने भी जिद्द पकड़ ली थी कि रसोइये से मिलकर ही रहूँगा, उसका शुक्रिया अदा करूँगा !
साहब जबरदस्ती रसोई में घुस गए !
आज रामू की एक ना चल पायी !
अंदर का नजारा साहब ने देखा की एक बूढी सी औरत चाय बना रही थी, वो बहुत खुश थी !
*"माँ"* साहब के मुंह से निकला,
"मैने तो आपको वृद्धाश्रम में डाल दिया था !"
"हाँ बेटा, मगर जो सुख मेरे को यहाँ तुझे खाना खिला कर मिलता है वो वहां नहीं है !"
आज साहब को पता लग गया कि रामू को उसकी पसंद की डिशेज कैसे पता है और वहां पर पैसे कम क्यों लगते हैं !
जय श्री कृष्ण...!!!
|| श्रीमद् भागवत रहस्य-||
इस तरह दशम स्कंध में गोस्वामी,सनातन गोस्वामी, महाप्रभुजी,श्रीधर स्वामी जैसे महापुरुष भगवान की लीला में पागल बने है।
सनातन गोस्वामी,जो कभी किसी राजा के दीवान थे,कृष्ण - प्रेम में पागल होकर लंगोटी पहनकर घूमने लगे थे।
वे बंगाल के जमीनदार थे।घर में खूब संपत्ति थी।
एक दिन किसी पवित्री ब्राह्मण के मुख से दशम स्कंध की कथा सुनी और वे कृष्ण - प्रेम में पागल हो गए। सर्व संपत्ति का दान किया और ताड़पत्र की लंगोटी पहन कर लीला - निकुंज में राधेकृष्ण - राधेकृष्ण करते हुए घूमने लगे।
पूतना वासना है और वासना आँख से अंदर आती है आँख संसार के सुन्दर विषयों को, देख उसके पीछे दौड़ती है।
उसे पता है कि यह मेरा नहीं है,मुझे नहीं मिलने वाला फिर भी पाप करती है।
वासना अंदर - ना आए ऐसी इच्छा हो तो आँख बंद कर उपासना करो।
वासनाका नाश उपासना से होता है।
जगत को बोध देने कन्हैया ने आँखे बंद की है।
प्रभु हमे बोध देते है कि आँखे बंद कर उसे संभालो।
आँखों को सँभालने से मन पवित्र बनेगा।
पूतनाका स्तनपान करते करते कन्हैया उसके प्राण चूसने लगा।
पूतना अति व्याकुल हुई।
उसने राक्षसी का रूप धारण किया और आकाश मार्गसे कन्हैया को ले जाने लगी।
व्रजवासी उसके पीछे दौड़ते है।
पर थोड़ी ही देर में कनैयाने उसे जमीं पर गिराया और बड़ा धमाका हुआ।
पूतनाका उद्धार हुआ है.और पूतना राक्षसी के वक्षःस्थल पर कन्हैया विराजमान था।
धमाका सुनकर गोपियाँ दौड़ती हुई आई और यशोदा को कोसने लगी।
कनैया पूतनाको क्यों दिया ?
हमने कितनी मन्नतें मानी थी,तब कहीं तुम्हे पुत्र हुआ और तुम्हे इसकी कोई कीमत नहीं है।
यशोदा ने गोपियों का उलाहना सुनकर आँखे नीची कर ली।
उन्होंने कहा - यह मेरा पहला बालक है।
मुझे बालक के लालन - पालन का अनुभव नहीं है।
अब तुम जो बताओगे वह करुँगी।
गोपियों ने कहा - छोटा सा कन्हैया राक्षसी को क्या मार सकता है ?
राक्षसी तो अपने पाप से मरी है।
हमारा कन्हैया तो नारायण की कृपा से बच गया।
माँ,लाला को राक्षसी ने स्पर्श किया है, इस लिए उसकी नज़र उतारनी चाहिए।
यशोदाजी कहती है - मुझे नज़र उतारना नहीं आता।
एक गोपी बोली - मै लालाकी नज़र उतारूंगी।
और गोपियाँ लाला की नज़र उतारने गौशाला में ले गई।
लाला को गाये बहुत प्यारी है।
एक गंगी नाम की गाय तो लाला की झाँकी पाए बिना कभी पानी तक नहीं पीती थी।
जब गोपाल उसे मनाते हुए थक जाते तो यशोदा के पास जाते और कहते थे,माँ गौशाला में लाला को ले चलो।
लाला के दर्शन होते ही गंगी घास खाती थी।
मनुष्य को भी कोई नियम रखना चाहिए।
शास्त्र में ऐसा वर्णन है कि जिसके जीवन में कोई नियम नहीं है,वे पशु समान है।
प्रभु भजन बिना भोजन भी पाप है।
पेट से पहले प्रभु पूजा करो।
पेट में कुछ ने होने से सात्विक भाव जागते है।
अनशन करने से शरीर हल्का होता है और पाप जलते है।
बड़े - बड़े ऋषि - मुनि जब हजारों वर्ष तपश्चर्या करने के बाद भी प्रभु के दर्शन पा नहीं सके तो गायों का जन्म लेकर गोकुल में आये।
उनकी हजारो वर्ष के तपश्चर्या भी उनका अभिमान और वासना जला नहीं पाई थी।
सो उन्होंने सोचा कि गोकुल में गायों का अवतार लेकर,अपना काम, निष्काम कृष्ण को अर्पित कर देंगे और हम निष्काम हो जायेंगे।
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम ||
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||🙏राधा रानी की शक्ति-🙏||
गोवर्धन लीला के बाद समस्त ब्रजमंडल के कृष्ण के नाम की चर्चा होने लगी, सभी ब्रजवासी कृष्ण की जय - जयकार कर रहे थे और उनकी महिमा का गान कर रहे थे।
ब्रज के गोप - गोपियों के मध्य कृष्ण की ही चर्चा थी।
एक स्थान पर कुछ गोप और गोपियाँ एकत्रित थी और यही चर्चा चल रही थी तभी एक गोप मधुमंगल बोला इसमें कृष्ण की क्या विशेषता है, यह कार्य तो हम लोग भी कर सकते है।
वहां राधा रानी की सखी ललीता भी उपस्थित थी वह तुरंत बोल उठी ...।
हां हां देखी है तुम्हारी योग्यता, जब कृष्ण ने पर्वत उठाया था तो तुम सभी ने अपनी - अपनी लाठियां पर्वत के नीचे लगा थी ।
और कान्हा से हाथ हठा लेने के लिए कहा था, हाथ हठाना तो दूर कान्हा ने थोड़ी से अंगुली टेढ़ी की और तुम सब की लाठियां चटाचट टूट गई थी,तब तुम सब मिलकर यही यही बोले थे कान्हा तुम्ही संभालो, तब कान्हा ने ही पर्वत संभाला था।
यह सुनकर मधुमंगल बोला "हाँ हाँ मान लिया की कान्हा ने ही संभाला, किन्तु हम ने प्रयास तो किया तुमने क्या किया ।
यह सुनकर ललिता बोली हां हां देखी है तुम्हारे कान्हा की भी शक्ति, माना हमने कुछ नहीं किया किन्तु हमारी सखी राधारानी ने तो किया।
मधुमंगल बोला अच्छा जी राधा रानी ने क्या करा तनिक यह तो बताओ ललीता ने उत्तर दिया "पर्वत तो हमारी राधारानी ने ही उठाया था, कृष्ण का तो बस नाम हो गया।
यह सुनकर सभी गोप सखा हंसने लगे और बोले लो जी अब यह राधा रानी कहाँ से आ गई, पर्वत उठाया कान्हा ने, हाथ दुखे कान्हा के....।
पूरे सात दिन एक स्थान पर खड़े रहे कान्हा, ना भूंख की चिंता ना प्यास की, ना थकान का कोई भाव, ना कोई दर्द, सब कुछ किया कान्हा ने और बीच में आ गई राधारानी तब ललीता बोली लगता है जिस समय कान्हा ने पर्वत उठाया था उस समय तुम लोग कही और थे, अन्यथा तुमको भी पता चल जाता कि पर्वत तो हमारी राधारानी ने ही उठाया था।
या सुनकर सभी गोपसखा बोले ऐसी प्रलयकारी स्थिति में कही और जा कर हमको क्या मरना था, एक कृष्ण ही तो हम सबका आश्रय थे, जिन्होंने सबके प्राणों की रक्षा की।
ललीता बोली तब भी तुमको यह नहीं पता चला कि पर्वत हमारी राधारानी ने उठाया था।सभी गोपसखा बोले हमने तो ऐसा कुछ भी नहीं देखा।
तब ललीता बोली अच्छा यह बताओ कि कान्हा ने पर्वत किस हाथ से उठाया था।
मधुमंगल बोला "कान्हा ने तो पर्वत अपने बायें हाथ से ही उठा दिया था, दायें हाथ की तो आवश्यकता ही नहीं पड़ी।
तब ललीता बोली तभी तो में कहती हूँ की पर्वत हमारी राधारानी ने उठाया, कृष्ण ने नहीं, यदि कृष्ण अपनी शक्ति से पर्वत उठाते तो वह दायें हाथ से उठाते।
किन्तु उन्होंने पर्वत बायें हाथ से उठाया, क्योकि किसी भी पुरुष का दायां भाग उसका स्वयं का तथा बायाँ भाग स्त्री का प्रतीक होता है।
जब कान्हा ने पर्वत उठाया तब उन्होंने श्री राधारानी का स्मरण किया।
और तब पर्वत उठाया, इसी कारण उन्होंने पर्वत बाएं हाथ से उठाया, कृष्ण के स्मरण करने पर श्री राधा रानी ने उनकी शक्ति बन कर पर्वत को धारण किया।
अब किसी भी बाल गोपाल के पास ललीता के इस तर्क का कोई उत्तर नहीं था, सभी निरुत्तर हो गए और ललीता राधे - राधे गुनगुनाती वहां से चली गई।
यह सत्य है कि राधे रानी ही भगवान श्री कृष्ण की आद्यशक्ति है, जब भी भगवान कृष्ण ने कोई विशेष कार्य किया पहले अपनी शक्ति का स्मरण किया श्री राधा रानी कृष्ण की शक्ति के रूप में सदा कृष्ण के साथ रही, इस लिए कहा जाता है, कि श्री कृष्ण को प्राप्त करना है तो श्रीराधा रानी को प्रसन्न करना चाहिए।
जहाँ राधा रानी होंगी वहां श्री कृष्ण स्वयं ही चले आते हैं।
यही कारण है कि भक्त लोग कृष्ण से पहले राधा का नाम लेते है।
चन्दा से मुख पे, बड़ी बड़ी अखियाँ, लट लटके घुँघराली, गुलाम तेरो बनवारी।
बड़ी बड़ी अखियों मैं, श्याम रंग कजरा, घायल कुंज बिहारी, गुलाम तेरो बनवारी।
सुन बरसाने वारी ,गुलाम तेरो बनवारी...!
|| राधे राधे जय जय श्री राधे ||
!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
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जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏



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