सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
*श्रीमहालक्ष्मी व्रत कथा*
*यह_व्रत_भाद्रपदमास_के_शुक्लपक्ष_की_अष्टमी_को_आरंभ_करके_आश्विनमास_की_कृष्णपक्ष_अष्टमी_को_समाप्त_किया_जाता_है*
एक समय महर्षि द्वैपायन व्यास जी हस्तिनापुर आये।
उनका आगमन सुन समस्त राजकुल के कर्मचारी महाराज धृतराष्ट्र तथा भीष्म सहित उनका सम्मान आदर कर राजमहल में स्वर्ण के सिंहासन पर विराजमान कर अर्घ्य पाद्य आचमन से उनका पूजन किया।
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व्यास जी के स्वस्थचित्त होने पर राजरानी गंधारी ने महर्षि व्यास जी से हाथ जोड़कर प्रश्न किया ?
*गांधारी बोली* हे महाराज !
आप त्रिकालज्ञ, तत्वदर्शी हैं, आपसे हमारी प्रार्थना है कि हम स्त्रियों को कोई ऐसा व्रत व सरल पूजन बताइए जिससे हमारी राजलक्ष्मी, सुख, पुत्र-पौत्र, परिवार सदा सुखी रहे।
इतना सुनकर व्यास जी ने कहा
*व्यास जी बोले* – हम ऐसे व्रत - पूजन का उल्लेख कर रहे हैं, जिससे सदा लक्ष्मी जी स्थिर होकर सुख प्रदान करेंगी।
वह श्री महालक्ष्मी व्रत है।
जिसका पूजन प्रतिवर्ष आश्विन मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को माना जाता है।
*तब राजरानी गंधारी ने कहा* –
हे महात्मन !
यह व्रत कैसे आरंभ होता है किस विधि से पूजन होता है ?
यह विस्तार से बताने का कष्ट करें तब महर्षि जी ने कहा –
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन सुबह व्रत का मन में संकल्प कर किसी जलाशय में जाकर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहने।
तत्पश्चात ताजी दूर्वा से महालक्ष्मी जी को जल का तर्पण करके प्रणाम करना चाहिए, और फिर आकर शुद्ध 16 धागों का एक गण्डा बनाकर प्रतिदिन एक गांठ लगानी चाहिए,
इस प्रकार 16 दिनों का 16 गाँठ का एक गण्डा तैयार कर अश्वनी मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी को व्रत रखकर, मंडप बनाकर चँदोवा तानकर उसके नीचे माटी के हाथी पर महालक्ष्मी की मूर्ति स्थापित कर तरह - तरह की पुष्प मालाओं सर श्री लक्ष्मी जी व हाथी का पूजन करके कई पकवान सुवासित पदार्थों का नैवेद्य समर्पण करें ।
तत्पश्चात श्रद्धा सहित महालक्ष्मी व्रत करने से आप लोगों की राजलक्ष्मी सदा स्थिर रहेगी, ऐसा विधान बताकर व्यास जी अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए।
इधर समय अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से समस्त राजघरानों की नारियों ने व नगर – स्त्रियों ने श्री महालक्ष्मी व्रत का आरंभ कर दिया बहुत सी नारीयाँ गांधारी के साथ प्रतिष्ठा मान हेतु व्रत का साथ देने लगी !
कुछ नारीयाँ माता कुंती के साथ भी व्रत का आरंभ करने लगी परंतु गांधारी जी द्वारा कुछ द्वेष भाव होने लगा, ऐसा होते होते 15 दिन व्रत के समाप्त होने लगे, होकर सोलहवाँ दिन आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी का आ गया उस दिन प्रातः काल से नगर नारियों ने उत्सव मनाना आरंभ कर दिया और समस्त नर-नारी राज महल में गांधारी जी के यहां उपस्थित हो तरह - तरह से महालक्ष्मी जी के मंडप व माटी के हाथी बनाने सजाने की बड़ी तैयारियां होने लगी।
गांधारी जी अपने नगर की सभी प्रतिष्ठित नारियों को बुलाने को सेवक भेजें पर माता कुंती को नहीं बुलाया गया और ना कोई सूचना भेजी उत्सव वाद्य की धुन गुँजारने लगी जिससे सारे हस्तिनापुर में खुशी की लहर दौड़ गई माता कुंती ने इस अवसर पर अपना अपमान समझकर बड़ा रंज मनाया और व्रत की कोई तैयारी न की इतने में महाराज युधिष्ठिर, अर्जुन, भीमसेन, नकुल, सहदेव पांचो पांडव उपस्थित हो गए।
तब अपनी माता को गंभीर देख अर्जुन ने प्रार्थना की हे माता !
आप इतनी दुखी क्यों हो ?
क्या हम भी आपके दुख का कारण जान सकते हैं और दुख दूर करने में भी सहायक हो सकते हैं ।
आप बताएं तब माता कुंती ने कहा बेटा जाति अपमान से बढ़कर कोई दुख नहीं होता है ।
आज नगर में श्री महालक्ष्मी व्रत उत्सव में रानी गंधारी ने सारे नगर की सारी औरतों पर मान देकर बुलवाया हैं परंतु तुमसे ईर्ष्यावश मेरा अपमान कर उत्सव में नहीं बुलाया।
तो पार्थ ने कहा हे माता !
क्या वह पूजा का विधान सिर्फ दुर्योधन के महल में ही हो सकता है आप अपने घर नहीं कर सकती ?
तब कुंती ने कहा बेटा कर सकती हूँ पर वह साज समान इतनी जल्दी नहीं उपलब्ध हो सकता क्योंकि गांधारी के सौ पुत्र पुत्रों ने माटी का विशाल हाथी तैयार करके पूजन का साज सजाया है , वह ऐसा विधान तुमसे नहीं बन सकेगा और उनके उत्सव की तैयारी आज दिन भर से हो रही है तब पार्थ ने कहा हे माता !
आप पूजा की तैयारी कर नगर में बुलावा फिरावेन, मैं ऐसे हाथी पूजन को बुला रहा हूं जो आज तक हस्तिनापुर वासियों ने ना देखा ना पूजन किया होगा।
मैं आज ही इंद्रलोक से इंद्र का हाथी *ऐरावत* जो पूजनीय है उसे बुलाकर तुम्हारी पूजा में उपस्थित कर दूंगा, आप अपनी तैयारी करें।
इधर माता कुंती ने सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया और आज पूजा की विशाल तैयारी होने लगी तब अर्जुन ने सुरपति इंद्र को ऐरावत भेजने को पत्र लिखा और एक दिव्य बाण में बांधकर धनुष पर रखकर देवलोक इंद्रसभा में इंद्र की सभा में फेंका।
इंद्र ने बाण से निकालकर पत्र खोलकर खोला और पढ़ा तो आश्चर्य से अर्जुन को लिखा–
हे पांडु कुमार !
ऐरावत भेज तो दूंगा पर इतनी जल्दी स्वर्ग से कैसे उतर सकता है, तुम इसका उत्तर शीघ्र ही लिखो।
पत्र पाकर अर्जुन ने पत्र में बाणों का रास्ता बना के हाथी उतारने की प्रार्थना की प्रार्थना लिख पत्र वापस कर दिया ।
इंद्र ने मतील सारथी को आज्ञा दी कि हाथी को पूर्ण रूप से सजाकर हस्तिनापुर में उतारने का प्रबंध करों।
महावत ने तरह - तरह के साज समान ऐेरावत को सजाया, देवलोक की अंबर जून डाली गई, स्वर्ण की पालकी रत्नोंजड़ित कलशों से बांधी गई माथे पर रत्नजड़ित जाली सजाई गई, पैरों में घुंघरू स्वर्ण मणियों की बांधी गई, जिसकी चकाचौंध पर मानव जाति की आंखें नहीं ठहर सकती थीं।
इधर सारे नगर में धुम हुई की कुंती माता के घर सजीव इंद्र का ऐरावत बाणों के रास्ते पर स्वर्ग से उतर कर पूजा जाएगा।
सारे नगर के नर - नारी बालक और वृद्धों की भीड़ ऐरावत को देखने एकत्र होने लगी।
गंधारी के राज महल में भी इस बात की चर्चा की बढ़ी चहल - पहल मच गई, नगर की नारियाँ पूजन थाली ले ले कर भागने लगी और माता कुंती के महल में उपस्थित होने लगी, देखते - देखते सारा महल पूजन करने वाली नारियों के ठसा - ठस भर गया, सारे नगरवासी ऐरावत के दर्शन को गली, सड़क, महल, अटरिया पर एकत्र हो गये।
माता कुंती ने रावत को खड़ा करने हेतु रंग - बिरंगे चौक को पूर्वाकर नवीन रेशमी वस्त्र बिछावा दिया।
हस्तिनापुर वासी तरह - तरह की स्वागत तयारी में फूल माला अबीर केसर हाथो में लेकर पंक्तिबद्ध खड़े थे, इधर इंद्र की आज्ञा पाकर ऐरावत स्वर्ग से बाणों के बनाए रास्ते पर धीरे - धीरे आकाश मार्ग से उतरने लगा, जिसके आभूषणों की आवाज नगरवासियों को आने लगी ऐरावत के दर्शन होते ही नर - नारियों ने जय जयकार के नारे लगाकर लगाना आरंभ किया।
ठीक सायंकाल ऐरावत माता कुंती के चौक में उतर आया तब समस्त नर - नारियों ने पुष्प माला अबीर केसर को चढ़ा कर स्वागत किया।
महाराजा धौम्य पुरोहित द्वारा ऐरावत पर महालक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित कराकर वेद मंत्रों द्वारा पूजन की गई।
नगर वासियों ने भी लक्ष्मी पूजा का स्वागत करके ऐरावत की पूजा की फिर तरह - तरह के मेवा पकवान लेकर ऐरावत को खिलाएं गए, ऊपर से जमुना जल पिलाया गया फिर तरह - तरह के पुष्पों की ऐरावत पर वर्षा की गई।
पुरोहितों द्वारा *स्वस्ति पुण्याहवाचन* कर व्रती नारियों द्वारा लक्ष्मी जी का पूजन विधान से कराया गया।
कुंती ने व्रत के डोरे के गण्डे में सौलहवीं गाँठ लगाकर लक्ष्मी जी के सामने समर्पण किया।
ब्राह्मणों को पकवान मेवा मिठाई देकर भोजन की व्यवस्था की गई तब वस्त्र, द्रव्य, स्वर्ण - आभूषण देकर ब्राह्मणों को संतुष्ट किया गया तत्पश्चात सभी व्रती नर - नारियों ने श्री महालक्ष्मी जी की दीपक जलाकर प्रेम से संपूर्ण पूजन कर आरती आरंभ की।
*इति श्री महालक्ष्मी व्रत कथा समाप्त*
!!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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