🍁 *विचार संजीवनी* 🍁

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

🍁 *विचार संजीवनी* 🍁


*ऐसा माने कि ठाकुर जी का संसार है, ठाकुर जी का परिवार है, ठाकुर जी के रुपए हैं, ठाकुर जी का घर है।*

*हम तो ठाकुर जी का काम करते हैं। 

मुनीम की तरह रहें। 

मालिक न बनें।* 

जो काम करें उसका अहसान ठाकुर जी पर रखें कि महाराज ! 

हम आपका काम करते हैं। 

हमारा यहाँ क्या है ? 

परिवार आपका, घर आपका, धन आपका, जमीन आपकी।  






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यह ही सच्ची बात है, क्योंकि जब जन्मे थे, नंग - धड़ंग आए थे।  

एक धागा भी पास में नहीं था और मरेंगे तो यह लाश भी यहीं पड़ी रहेगी।  

लाश को भी साथ नहीं ले जा सकते, तो धन - संपत्ति, वैभव - परिवार साथ में ले जा सकेंगे क्या ?  

*साथ में लाए नहीं, साथ में ले जा सकते नहीं और यहॉं रहते हुए भी इन सबको अपने मन-मुताबिक बना सकते नहीं।*  

आपका प्रत्यक्ष अनुभव है कि आपके लड़के-लड़की आपका कहना नहीं मानते, स्त्रियाँ नहीं मानतीं, कुटुम्बी-जन नहीं मानते। 

तो सिद्ध हुआ कि आप इनको अपने मन - मुताबिक नहीं बना सकते और जितने दिन चाहे साथ में रख नहीं सकते, बदल नहीं सकते। 

स्वभाव बदल दें या रंग बदल दें-- यह आपके हाथ की बात नहीं। 

फिर भी इनको कहते हैं--'मेरी चीजें' । 

ये  'मेरे' कैसे हुए बताइए ? 

अतः मानना ही होगा कि यह सब मेरे नहीं हैं; भगवान के दिए हुए हैं और भगवान के हैं।

राम !             राम !!            राम !!!





|| सुमन्त्रजी का अयोध्या लौटना :-||


श्रीरामको पहुँचाकर जब निषादराज वापस लौटे तो देखा सुमन्त्रजी वहीं व्याकुल पड़े हैं। 

वे 'हा राम ! हा राम!' 

कहते हुए लम्बी साँसें ले रहे हैं। 

रथके घोड़े भी घास चरना छोड़ दिये हैं और श्रीराम जिधर गये थे, उधर ही मुड़ - मुड़कर देख रहे हैं।

निषादराज उनकी दशा देखकर अत्यन्त दुःखी हुए। 

उन्होंने सुमन्त्रसे कहा— 'सुमन्त्रजी ! 

आप अब विषादका त्याग कर दें। 

आप परम विद्वान् एवं परमार्थके सच्चे ज्ञाता हैं। 

आप विधाताको ही वाम जानकर रथपर बैठकर अयोध्या जायँ। 

जब आप ही अपना धैर्य खो देंगे तो महाराज दशरथ और महारानी कौसल्याको सान्त्वना कौन देगा ? 

उनका तो श्रीराम - वनवाससे संसार ही लुट गया है। 

मेरी आपसे विनती है कि आप रथको लेकर शीघ्र अयोध्या पहुँचें।' 

ऐसा कहकर निषादराजने बरबस सुमन्त्रजी को रथ में बैठा दिया।

भगवान् श्रीराम के वियोग से सुमन्त्रजी का शरीर अत्यन्त शिथिल हो गया था। 

वे चाहकर भी रथको नहीं चला पा रहे थे। 

घोड़े भी पीछे देखकर बार - बार हिनहिना रहे थे, मानो वे श्रीरामको लिये बिना जाना ही नहीं चाहते हैं। 
किसी तरह सायंकाल सुमन्त्रजी अयोध्या पहुँचे।

उनकी अवस्था उस व्यापारी - जैसी थी, जो व्यापार के लिये घरसे गया हो और मूल भी हारकर घर वापस आ गया हो। 

सारी अयोध्यापुरी सूनी हो गयी थी। 

कहीं एक शब्द भी नहीं सुनायी देता था।

अयोध्याकी ऐसी दशा देखकर सुमन्त्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ। 

वे सोचने लगे - कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि श्रीराम के विरह जनित संताप से महाराज सहित सभी लोग शोकाग्नि में दग्ध हो गये हों ?'

चिन्तित सुमन्त्र जब नगर के द्वार पर पहुँचे, तब हजारों लोगों ने दौड़ते हुए रथ को घेर लिया और 'श्रीराम कहाँ हैं ?' 

यह पूछते हुए वे रथ के साथ दौड़ने लगे।

उस समय सुमन्त्र ने उन लोगों से कहा- 'सज्जनो ! 

मैं गङ्गाजी के किनारे तक ही रघुनाथ के साथ गया था। 

वहाँ से उन्होंने मुझे लौट जानेकी आज्ञा दी। 

मेरे काफी अनुनय - विनय के बाद भी उन्होंने अयोध्या लौटना स्वीकार नहीं किया। 

अतः मैं उनसे विदा लेकर लौट आया हूँ। 

वे तीनों लोग वहाँसे गङ्गाके उस पार चले गये।' 

यह जानकर सब लोगोंकी आँखोंसे आँसुओंकी धाराएँ बहने लगीं। 

वे सब 'हमें धिक्कार है' ऐसा कहकर लम्बी साँसें खींचने लगे और करुण क्रन्दन करने लगे।

बाजार के बीच से निकलते हुए सुमन्त्रजी को स्त्रियों के रोने की आवाज सुनायी दी। 

वे महलों की खिड़कियों पर बैठकर श्रीरामके वियोग से संतप्त होकर विलाप कर रही थीं। 

राजमार्ग पर पहुँचकर सुमन्त्र ने अपना मुख ढँक लिया। 

वे रथ लेकर सीधे महाराज दशरथ के भवन की ओर गये। 

उन्होंने देखा कि महाराज पुत्र - शोक में मलिन और आतुर हो रहे हैं। 

सुमन्त्रजी महाराज के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये। 

महाराज दशरथने कहा -'सुमन्त्र ! 

तुम श्रीरामका सन्देश बताओ। 

क्या वे तुम्हारे विनय करने पर भी नहीं माने और वन चले गये ? 

क्या तुम सुकुमारी सीता को भी नहीं लौटा पाये ? 

मेरा भाग्य ही खोटा है। 

किसी का कोई दोष नहीं है।'

सुमन्त्रने कहा-'महाराज ! 

धर्मात्मा श्रीराम ने आपके चरणों में प्रणाम कहा है। 

उन्होंने कहा है कि मैं वनवास की अवधि पूरी करके महाराजका दर्शन करूँगा। 

वे मेरी चिन्ता न करें।'

श्रीरामका संदेश सुनकर महाराज दशरथ ने कहा— 'सुमन्त्र ! 

मुझे राम के पास ले चलो, नहीं तो मेरे प्राण निकलना ही चाहते हैं।' 

इस तरह श्रीरामके वियोग में 'हा राम! हा राम!' कहते हुए महाराज दशरथने अपना प्राण त्याग दिया।

        || जय सियाराम जय हनुमान ||

श्री लिंग महापुराण🌷🌷

पंचाक्षर महात्म्य वर्णन....! 
    
इस मन्त्र का वामदेव ऋषि पंक्ति छन्द, देवता साक्षात् मैं ही शिव हूँ, नकारादि पाँच बीज पंच भूतात्मक हैं। 

सर्वव्यापी अव्यय ( ॐ ) प्रणव उसकी आत्मा में हैं। 

हे देवि ! तुम इसकी शक्ति हो।

इस मन्त्र के द्वारा बताये गए विधि पूर्वक न्यास आदि भी करने चाहिए। 

हे शुभे ! 

इसके बाद मैं तुमसे मन्त्र का ग्रहण करना कहता हूँ।

सत्य परायण, ध्यान परायण गुरु को प्राप्त करके शुद्ध भाव से मन, वाणी और कर्म के द्वारा तथा अनेकों द्रव्यों द्वारा आचार्य ( गुरु ) को सन्तुष्ट करके विधि पूर्वक गुरु मुख से मन्त्र ग्रहण करना चाहिए। 

शुचि स्थान में, अच्छे ग्रह में, अच्छे काल में तथा नक्षत्र में तथा श्रेष्ठ योग में मन्त्र ग्रहण करना चाहिए। 

गृह में मन्त्र जपना समान जानना चाहिए। 
गौ के खिरक में सौ गुना और शिवजी के पास में अनन्त गुना मन्त्र का फल होता है।

जप यज्ञ से सौ गुना उपाँशु जप का होता है। 

जो मन्त्र वाणी से उच्चारण किया जाता है वह वाचिक कहा जाता है। 

जो धीरे - धीरे ओठों को कुछ हिलाते हुए जप किया जाता है उसे उपाँशु कहते हैं। 

केवल मन बुद्धि के द्वारा जप किया जाए और शब्दार्थ का, चिन्तन किया जाए वह मानसिक जप होता है। 

तीनों उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। 

जप यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं। 

वे विपुल भोगों को तथा मोक्ष को देते हैं, जप से जन्मान्तरों के पाप क्षय होते हैं, मृत्यु को भी जीत लिया जाता है। 

जप से सिद्धि प्राप्त होती है परन्तु सदाचारी पुरुष को सब सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं दुराचारी को नहीं, क्योंकि उसका साधन निष्फल है। 

अतः आचार ही परम धर्म है। 

आचार ही परम तप है तथा आचार ही परम विद्या है। 

आचार से ही परम गति है। 

आचारवान पुरुष ही सब फलों को पाता है तथा आचारहीन पुरुष संसार में निन्दित होता है। 

इस लिये सिद्धि की इच्छा वाले पुरुष को सब प्रकार से आचारवान होना चाहिए।

संन्ध्योपासना करने वाले पुरुष को सब कार्य तथा फल प्राप्त होते हैं। 

अतः काम, क्रोध, लोभ, मोह किसी प्रकार से भी संध्या को नहीं त्यागना चाहिए। 

संध्या न करने से ब्राह्मण ब्राह्मणत्व से नष्ट होता है। 

असत्य भाषण नहीं करना चाहिये। 

पर दारा, पर द्रव्य, पर हिंसा मन वाणी से भी नहीं करनी चाहिए। 

शूद्रान्न, बासा अन्न, गणान्न तथा राजान्न का सदा त्याग करना चाहिए। 

अन्न का परिशोधन अवश्य चाहिए।

बिना स्नान किये, बिना जप किये हुए, अग्नि कार्य न किए हुए भोजन न करें। 

रात्रि में तथा बिना दीपक के तथा पर्णपृष्ठ पर फूटे पात्र में तथा गली में, पतितों के पास भोजन नहीं करना चाहिए। 

शूद्र का शेष तथा बालकों के साथ भोजन न करे। 

शुद्धान्न तथा सुसंस्कृत भोजन का एकाग्र चित्त से भोजन करना चाहिए। 

शिव इसके भोक्ता हैं ऐसा ध्यान करना चाहिए। 

मुंह से, खड़ा होकर, बायें हाथ से, दूसरे के हाथ से जल नहीं पीना चाहिए। 

अकेला मार्ग में न चले, बाहुओं से नदी को पार न करे, कुआं को न लांघे, पीठ पीछे गुरु या देवता अथवा सूर्य को करके जप आदिक न करे।

अग्नि में पैरों को न तपावे, अग्नि में मल का त्याग न करे। 

जल में पैरों को न पीटे, जल में नाक, थूक आदि मल का त्याग न करे।

अज, स्वान, खर, ऊँट, मार्जार तथा तुष की धूलि का स्पर्श न करे। 

जिसके घर में बिल्ली रहती है वह अन्त्यज के घर के समान है। 

उस घर में ब्राह्मणों को भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि वह चाण्डाल के समान है।

पाद की हवा, सूप की हवा, प्राण और मुख की हवा मनुष्य के सुकृत का हरण करती है अतः इनसे सदा बचना चाहिए। 

पाग बाँध करके, कंचुकी बाँधकर, केश खोलकर, नंगे होकर, अपवित्र हाथों से, मैल धारण किये हुए जप नहीं करना चाहिए। 

क्रोध, मद, जंभाई लेना, थूकना, प्रलाप, कुत्ता का या नीच का दर्शन, नींद आना ये जप के द्वेषी हैं। 

इनके हो जाने पर सूर्य का दर्शन करना चाहिए तथा आचमन, प्राणायाम करके शेष जप करना चाहिए। 

बिना आसन पर बैठकर, सोकर, खाट पर बैठकर जप न करना चाहिए।

आसन पर बैठकर, रेशमी वस्त्र या बाघ चर्म या लकड़ी का या ताल पर्ण का आसन पर बैठकर मंत्रार्थ का विचार करते हुए जप करना चाहिए। 

त्रिकाल गुरु की पूजा करनी चाहिए। गुरु और शिव एक ही हैं। 

शिव विद्या और गुरु भक्ति के अनुसार फल मिलता है। 

श्री की इच्छा वाले पुरुष को गुरु की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। 

गुरु के सम्पर्क से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं। 

गुरु के सन्तुष्ट होने पर सब पाप नष्ट होते हैं। 

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभी देव गुरु की कृपा से ही उस पर सन्तुष्ट होते हैं। 

अतः कर्म, मन, वाणी से गुरु को क्रोध नहीं करना चाहिए। 

गुरु के क्रोध से आयु, ज्ञान, क्रिया सब नष्ट होते हैं। 

उसके यज्ञ निष्फल होते हैं।

शिवजी कहते हैं जो इन्द्रियों का दमन करके पंचाक्षर मन्त्र का जप करता है वह पंच भूतों से विजय को प्राप्त करता है। 

मन का संयम करके जो चार लाख जप करता है वह सभी इन्द्रियों को विजय कर लेता है। 

जो पच्चीस लाख जप करता है वह पच्चीस तत्वों को जीत लेता है। 

बीज सहित संपुट सहित सौ लाख जप करने वाला पवित्र आत्मा परम गति को प्राप्त होकर मुझे पाता है। 

जो इस पंचाक्षर विधि को देव या पितृ कार्य में ब्राह्मणों से सुनेगा या सुनायेगा वह परम गति को प्राप्त होगा।

क्रमशः शेष अगले अंक में...



संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण 

श्रीअयोध्या - माहात्म्य

सम्भेदतीर्थ, सीताकुण्ड, गुप्तहरि और चक्रहरि तीर्थ की महिमा......! 
  
भगवान् शिव बोले - जो संसारसमुद्रसे तारने और गरुड़जीको सुख देनेवाले हैं, घनीभूत मोहान्धकारका निवारण करनेके लिये चन्द्रस्वरूप हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। 

जहाँ ज्ञानमयी मणिकी प्रज्वलित शिखा प्रकाशित होती है तथा जो चित्तमें भगवत्संगरूपी सुधाकी वर्षा करनेवाली चन्द्रिकाके तुल्य है, मानसके उद्यानमें जो प्रवाहित होती है, उस भगवद्भक्तिरूपी मन्दाकिनीकी मैं शरण लेता हूँ। 

वह लीलापूर्वक उत्साहशक्तिको जाग्रत् करनेवाली तथा सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त है। 

सात्त्विक भावोंकी पूर्वकोटि है। 

उसे ही वैष्णवी शक्ति कहते हैं। 

हवासे हिलते हुए कमलदलके पर्वके भीतर रहनेवाले पतनशील जन्तुओंकी भाँति पतनके गर्तमें गिरनेवाले प्राणियोंको स्थिरता देनेवाली एकमात्र श्रीहरिकी स्मृति ही है। 

हृदयकमलकी कलिकाको विकसित करनेवाली ज्ञानरूपी किरणमालाओंसे मण्डित सूर्यस्वरूप आप भगवान्‌को नमस्कार है। 

योगियोंकी एकमात्र गति आप संयमशील श्रीहरिको नमस्कार है। 

तेज और अन्धकार दोनोंसे परे विराजमान आप परमेश्वरको नमस्कार है। 

आप यज्ञस्वरूप, हविष्यके उपभोक्ता तथा ऋक्, यजु एवं सामवेदस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। 

भगवती सरस्वतीके द्वारा गाये जानेवाले दिव्य सद्‌गुणोंसे विभूषित आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। 

आप शान्तस्वरूप, धर्मके निधि, क्षेत्रज्ञ एवं अमृतात्मा हैं, आपको नमस्कार है। 

आप साधकके योगकी प्रतिष्ठा तथा जीवके एकमात्र हेतु हैं, आपको नमस्कार है। 

आप घोरस्वरूप, मायाकी विधि तथा सहस्रों मस्तकवाले हैं, आपको नमस्कार है। 

आप योगनिद्रास्वरूप होकर शयन करते और अपने नाभिकमलसे उत्पन्न संसारकी सृष्टि रचते हैं, आपको नमस्कार है। 

आप जलस्वरूप एवं संसारकी स्थितिके कारण हैं, आपको नमस्कार है। 

आपके कार्योद्वारा आपकी शक्तिका अनुमान होता है। 

आप महाबली, सबके जीवन और परमात्मा हैं, आपको नमस्कार है। 

समस्त भूतोंके रक्षक और प्राण आप ही हैं, आप ही विश्व तथा उसके स्रष्टा ब्रह्मा हैं, आपको नमस्कार है। 

आप नृसिंहशरीर धारण करके दर्पयुक्त हो दैत्यका संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही सबके पराक्रम हैं। 

आपका हृदय अनन्त है। 

आप सम्पूर्ण संसारके भावको ग्रहण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। 

आप संसारके कारणभूत अज्ञानरूपी घोर अन्धकारका नाश करनेवाले हैं। 

आपका धाम अचिन्त्य है, आपको नमस्कार है। 

आप गूढ़रूपसे स्थित तथा अत्यन्त उद्वेगकारक रुद्र हैं, आपको नमस्कार है। 

आप शान्त हैं, जहाँ समस्त ऊर्मियाँ शान्त हो जाती हैं ऐसे कैवल्यपदको देनेवाले हैं। 

सम्पूर्ण भावपदार्थोंसे परे तथा सर्वमय हैं, आपको नमस्कार है। 

जो नील कमलके समान श्याम हैं और चमकते हुए केसरके समान सुशोभित कौस्तुभमणि धारण करते हैं तथा नेत्रोंके लिये रसायनरूप हैं, ऐसे आप भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ।

क्रमशः...
शेष अगले अंक में जारी




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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोप...