सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।।श्रीरामचरित्रमानस प्रर्वचन - संतों से सुना।।
श्रीरामचरित्रमानस प्रर्वचन - संतों से सुना..!
‼️राम कृपा ही केवलम्‼️❗संतों से सुना❗
संतों से सुना — संतों की वाणी में श्रीरामचरितमानस का अमृत संदेश !
आप जिस साधन को करते हैं, उसको स्थायी रूप से जीवन का अंग बनाइये, अर्थात् चलते - फिरते, उठते - बैठते, हर घण्टे में कम-से-कम कुछ मिनट उसे जरूर करना चाहिए।
परन्तु साधन करते हुए लक्ष्य पर ( जिसको प्राप्त करना है ) दृष्टि ( हार्दिक भाव ) रखनी चाहिए।
श्रीरामचरितमानस केवल भगवान श्रीराम की कथा नहीं है।
यह मनुष्य के जीवन को धर्म, मर्यादा, भक्ति, प्रेम, त्याग, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलाने वाला दिव्य ग्रंथ है।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस में भगवान श्रीराम के चरित्र के माध्यम से यह समझाया है कि मनुष्य संसार में रहते हुए भी अपने जीवन को प्रभु की भक्ति और सदाचार से कैसे पवित्र कर सकता है।
संतों से जब श्रीरामचरितमानस की कथा सुनी जाती है, तब केवल कानों को कथा सुनाई नहीं देती, बल्कि यदि श्रद्धा हो तो वही कथा धीरे - धीरे मन के भीतर उतरती है।
मानस का उद्देश्य केवल रामजन्म, वनवास, सीता हरण, लंका विजय और श्रीराम के अयोध्या लौटने का वर्णन करना नहीं है।
इन सभी प्रसंगों के भीतर जीवन के गहरे सिद्धांत छिपे हैं।
मानस के आरंभ में ही गोस्वामी तुलसीदासजी संतों की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं—
“बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोउ।”
अर्थात संत समान चित्त वाले होते हैं।
उनके लिए हित और अहित करने वाले में भी द्वेष का भाव नहीं रहता।
संत का हृदय किसी के प्रति वैर रखने के लिए नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति और जीव के कल्याण के लिए होता है।
इसी लिए संतों से सुनी हुई रामकथा मनुष्य के जीवन में परिवर्तन का कारण बन सकती है।
संत हमें केवल यह नहीं बताते कि श्रीराम ने क्या किया; वे यह भी समझाते हैं कि श्रीराम के आचरण से हमें अपने जीवन में क्या सीखना चाहिए।
श्रीराम — मर्यादा और सत्य के आदर्श ;
श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम का चरित्र सत्य, मर्यादा और धर्म का प्रतीक है।
राजा दशरथ ने कैकेयी को दो वरदान दिए थे।
उन्हीं वरदानों के कारण श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करना पड़ा।
यहाँ सबसे बड़ी बात यह है कि श्रीराम ने परिस्थिति के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया।
उन्होंने पिता के वचन को अपना धर्म माना।
श्रीराम जानते थे कि वनवास उनके लिए सुखद नहीं होगा।
राजसिंहासन सामने था, अयोध्या का प्रेम सामने था, माता - पिता का स्नेह सामने था; फिर भी उन्होंने धर्म को सबसे ऊपर रखा।
मानस में श्रीराम का यही चरित्र मनुष्य को सिखाता है कि जीवन में हर समय अपनी इच्छा के अनुसार परिस्थिति नहीं मिलती।
कभी - कभी धर्म और कर्तव्य का मार्ग कठिन होता है, लेकिन वही मार्ग अंततः मनुष्य को महान बनाता है।
आज मनुष्य छोटी - सी असुविधा आने पर दुखी हो जाता है।
अपनी इच्छा पूरी न होने पर क्रोध करता है।
परिवार में कोई बात अपने अनुसार न हो तो संबंधों में दूरी आने लगती है।
ऐसे समय श्रीराम का वनगमन हमें याद दिलाता है कि सुख ही जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं है; धर्मपूर्वक जीवन जीना उससे बड़ा उद्देश्य है।
श्रीराम का वनगमन — त्याग की शिक्षा ;
श्रीराम जब वन जाने लगे तो सीताजी ने भी उनके साथ जाने का निश्चय किया और लक्ष्मणजी ने भी उनका साथ स्वीकार किया।
यह प्रसंग केवल पति - पत्नी या भाई के प्रेम का वर्णन नहीं है।
इस में त्याग और समर्पण का आदर्श दिखाई देता है।
लक्ष्मणजी ने राजमहल का सुख छोड़कर श्रीराम की सेवा को अपना जीवन बना लिया।
सीताजी ने भी वन के कठिन जीवन को स्वीकार किया।
यहाँ संतों की शिक्षा यह है कि भक्ति केवल मंदिर में बैठकर भगवान का नाम लेने का नाम नहीं है।
भक्ति का वास्तविक स्वरूप सेवा, समर्पण और त्याग में दिखाई देता है।
जिसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम होता है, वह अपने स्वार्थ से ऊपर उठना सीखता है।
निषादराज और श्रीराम का प्रेम ;
श्रीराम के वनगमन के प्रसंग में निषादराज गुह का प्रसंग अत्यंत भावपूर्ण है।
सामाजिक भेदभाव की दृष्टि से नहीं, बल्कि प्रेम की दृष्टि से देखें तो यह प्रसंग बहुत बड़ा संदेश देता है।
श्रीराम ने निषादराज के प्रेम को स्वीकार किया।
यहाँ मानस हमें बताता है कि भगवान के लिए बाहरी पद, धन या प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण प्रेम और भक्ति है।
इसी भाव को आगे शबरी के प्रसंग में और भी स्पष्ट रूप मिलता है।
जिस प्रकार भोजन करते समय हृदय में यह भावना होती है कि भूख अवश्य दूर हो जावेगी और भूख दूर होने पर भोजन की क्रिया समाप्त भी हो जाती है, इसी प्रकार हृदय में सद्भाव से यह भावना हो कि साधन करने से लक्ष्य अवश्य प्राप्त होगा।
शबरी की भक्ति — प्रेम की सरलता ;
शबरी वर्षों से प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा कर रही थीं।
जब श्रीराम उनके आश्रम में पहुँचे तो उन्होंने अत्यंत प्रेम और श्रद्धा से भगवान का स्वागत किया।
श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया।
मानस में यह प्रसंग भक्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार है।
श्रीराम कहते हैं—
“प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।”
पहली भक्ति संतों का संग है।
इसके बाद भगवान ने भक्ति के अनेक स्वरूप बताए—
भगवान की कथा में प्रेम, गुरु के चरणों में सेवा, कपट छोड़कर भगवान के गुणों का गान, मंत्र और विश्वास के साथ नामस्मरण, इंद्रियों पर संयम, संतों में भगवान का दर्शन, संतोष, सरलता और भगवान पर पूर्ण भरोसा।
इससे स्पष्ट होता है कि भक्ति केवल बाहरी कर्मकांड नहीं है।
भक्ति मन के संस्कारों को बदलने की साधना है।
संतों का संग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संत मनुष्य को संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपने मन को भगवान से जोड़ना सिखाते हैं।
हनुमानजी — भक्ति और सेवा का सर्वोच्च आदर्श ;
श्रीरामचरितमानस में हनुमानजी का चरित्र भक्ति, बुद्धि, शक्ति, विनय और सेवा का अद्भुत संगम है।
श्रीराम और हनुमानजी की पहली भेंट के बाद उनका संबंध केवल सेवक और स्वामी का संबंध नहीं रहता, बल्कि उसमें पूर्ण आत्मसमर्पण दिखाई देता है।
सीताजी की खोज के समय हनुमानजी समुद्र पार करके लंका जाते हैं।
मार्ग में अनेक बाधाएँ आती हैं, लेकिन वे अपने उद्देश्य से विचलित नहीं होते।
लंका पहुँचकर वे सीताजी को श्रीराम का संदेश देते हैं और फिर लौटकर श्रीराम को समाचार देते हैं।
हनुमानजी के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके प्रत्येक कार्य के केंद्र में “रामकाज” है।
मानस में आता है—
“राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम।”
अर्थात राम का कार्य किए बिना विश्राम कहाँ?
यह केवल हनुमानजी का कथन नहीं, बल्कि प्रत्येक भक्त के लिए साधना का संदेश है।
जब जीवन का उद्देश्य केवल अपना सुख, अपना धन, अपना सम्मान और अपनी इच्छा बन जाता है, तब मनुष्य भीतर से अशांत रहता है।
लेकिन जब जीवन में सेवा का भाव आता है, तब वही जीवन अर्थपूर्ण होने लगता है।
विभीषण — सत्य का पक्ष चुनने की शिक्षा ;
लंका में विभीषणजी ने रावण को बार - बार समझाया कि माता सीता को श्रीराम को लौटा देना ही उचित है।
विभीषण जानते थे कि रावण उनका भाई है, लंका का राजा है और अत्यंत शक्तिशाली है।
फिर भी उन्होंने अधर्म का समर्थन नहीं किया।
जब रावण ने उन्हें अपमानित करके लंका से निकाल दिया, तब विभीषण श्रीराम की शरण में आए।
श्रीराम ने विभीषण को शरण दी।
मानस में श्रीराम की शरणागतवत्सलता का अत्यंत प्रसिद्ध भाव है—
“शरणागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।”
अर्थात जो व्यक्ति शरण में आए, उसे केवल अपने अहित की आशंका से छोड़ देना उचित नहीं।
यहाँ श्रीराम का चरित्र हमें बताता है कि सच्चा धर्म केवल अपने लोगों का पक्ष लेना नहीं है; धर्म का पक्ष लेना है।
रावण — ज्ञान होते हुए भी अहंकार का पतन
रावण विद्वान था, शक्तिशाली था और अनेक प्रकार की विद्या का ज्ञाता था।
लेकिन उसका अहंकार उसके ज्ञान पर भारी पड़ गया।
यही मानस का बहुत गहरा संदेश है।
केवल ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है।
यदि ज्ञान से विनय उत्पन्न नहीं हुई, यदि विद्या से विवेक उत्पन्न नहीं हुआ, यदि शक्ति से मर्यादा नहीं आई, तो वही ज्ञान और शक्ति विनाश का कारण बन सकते हैं।
रावण के जीवन में अहंकार इतना बढ़ गया कि वह सत्य सुनना ही नहीं चाहता था।
विभीषण ने समझाया, मंदोदरी ने समझाया और अनेक लोगों ने उसे उचित मार्ग दिखाया, लेकिन अहंकार ने उसकी बुद्धि को ढक दिया।
इस लिए संतों की वाणी बार - बार मनुष्य को चेताती है कि अहंकार से बड़ा शत्रु दूसरा नहीं।
राम - रावण युद्ध — बाहर से अधिक भीतर का युद्ध ;
श्रीराम और रावण का युद्ध केवल अयोध्या और लंका के बीच का युद्ध नहीं है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह मनुष्य के भीतर चलने वाले धर्म और अधर्म के संघर्ष का भी प्रतीक है।
रावण के दस सिर को केवल बाहरी रूप में देखने के बजाय मनुष्य के भीतर के अनेक विकारों के रूप में समझा जा सकता है—
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार आदि।
श्रीराम का पक्ष सत्य, धर्म, संयम और मर्यादा का पक्ष है।
इस लिए प्रत्येक मनुष्य के भीतर प्रतिदिन एक युद्ध चलता है।
जब क्रोध सत्य पर विजय पा लेता है, तब भीतर का रावण मजबूत होता है।
जब लोभ संतोष को हरा देता है, तब भीतर का रावण मजबूत होता है।
जब अहंकार विनय को समाप्त कर देता है, तब भीतर का रावण मजबूत होता है।
और जब भक्ति, विवेक, सत्य तथा मर्यादा जीवन में स्थापित होते हैं, तब भीतर का राम जागृत होता है।
रामराज्य का संदेश ;
लंका विजय के बाद श्रीराम अयोध्या लौटते हैं और रामराज्य की स्थापना होती है।
रामराज्य केवल एक राजनीतिक व्यवस्था का नाम नहीं है।
इसका मूल भाव है—
धर्म, न्याय, करुणा, सुरक्षा, संतोष और लोककल्याण।
गोस्वामी तुलसीदासजी रामराज्य का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वहाँ लोग धर्म के मार्ग पर चलते हैं और परस्पर प्रेम रखते हैं।
यह प्रसंग आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।
यदि परिवार में प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकार से पहले अपना कर्तव्य समझे, तो परिवार में रामराज्य जैसा वातावरण बन सकता है।
यदि समाज में व्यक्ति दूसरों के सम्मान और अधिकार का ध्यान रखे, तो समाज में रामराज्य जैसा वातावरण बन सकता है।
यदि शासक न्याय करे और प्रजा धर्मपूर्वक जीवन जिए, तो राज्य में रामराज्य के आदर्श की स्थापना हो सकती है।
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संतों से सुना — मानस का सबसे सरल मार्ग ;
संतों ने रामकथा के माध्यम से जिस सरल मार्ग को बार - बार बताया है, वह है—
भगवान का नाम, संतों का संग, सत्संग, सेवा, संयम और सत्य।
कलियुग में मनुष्य के पास समय कम है, मन चंचल है और संसार के आकर्षण बहुत हैं।
ऐसे समय भगवान के नाम का आश्रय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
श्रीरामचरितमानस में नाम की महिमा अनेक स्थानों पर आती है।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने स्वयं रामनाम को अत्यंत महत्त्व दिया।
उनके लिए रामनाम ऐसा आधार है जो साधक को कठिन समय में भी प्रभु से जोड़ सकता है।
लेकिन नाम केवल मुख से बोलना ही नहीं है।
नाम के साथ भाव भी चाहिए।
यदि मुख से “राम” कहा जाए और मन में छल, कपट, द्वेष और अहंकार भरा रहे, तो साधना अधूरी है।
रामनाम का वास्तविक प्रभाव तब प्रकट होता है जब राम का नाम धीरे - धीरे राम के गुणों को जीवन में उतारने लगता है।
राम का नाम लें तो सत्य की ओर बढ़ें।
राम का नाम लें तो मर्यादा रखें।
राम का नाम लें तो माता - पिता का सम्मान करें।
राम का नाम लें तो सेवा करें।
राम का नाम लें तो किसी के प्रति अनावश्यक द्वेष न रखें।
यही संतों से सुनी हुई रामकथा का सार है।
संतों की संगति क्यों आवश्यक है ?
श्रीराम ने स्वयं नवधा भक्ति में प्रथम स्थान संत - संग को दिया—
“प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।”
संत - संग का अर्थ केवल किसी साधु के पास बैठना नहीं है।
जहाँ भगवान की कथा से मन निर्मल हो, जहाँ सत्य की चर्चा हो, जहाँ लोभ और अहंकार कम हों, जहाँ सेवा और करुणा बढ़े—
वही सत्संग है।
मनुष्य जैसा सुनता है, वैसा सोचने लगता है और जैसा सोचता है, वैसा बनने लगता है।
इस लिए मानस का संदेश है कि अपने मन को किस संगति में रखना है, यह मनुष्य के जीवन की दिशा निर्धारित करता है।
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आज के जीवन में श्रीरामचरितमानस ;
आज मनुष्य के पास साधन बहुत हैं, लेकिन शांति कम है। जानकारी बहुत है, लेकिन विवेक की कमी हो सकती है। धन कमाने की इच्छा बहुत है, लेकिन संतोष कम होता जा रहा है।
ऐसे समय श्रीरामचरितमानस हमें वापस मूल जीवन - मूल्यों की ओर ले जाता है।
श्रीराम हमें मर्यादा सिखाते हैं।
सीताजी धैर्य और पवित्रता का आदर्श देती हैं।
लक्ष्मण सेवा और समर्पण सिखाते हैं।
भरत त्याग और भाई - प्रेम का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
हनुमानजी निष्काम भक्ति और प्रभु - सेवा सिखाते हैं।
विभीषण सत्य का पक्ष लेने की शिक्षा देते हैं।
और रावण यह चेतावनी देता है कि कितना भी ज्ञान और वैभव क्यों न हो, यदि अहंकार और अधर्म बढ़ जाएँ तो पतन निश्चित है।
उपसंहार ;
संतों से सुनी हुई श्रीरामचरितमानस की कथा का सार यही है कि भगवान श्रीराम केवल मंदिर में पूजे जाने वाले देवता नहीं, बल्कि जीवन जीने की मर्यादा के आदर्श हैं।
रामकथा सुनने का फल तभी है जब कथा हमारे व्यवहार में दिखाई दे।
यदि रामकथा सुनकर हमारा क्रोध थोड़ा कम हो जाए—
तो कथा सफल है।
यदि किसी दुखी व्यक्ति की सहायता करने की प्रेरणा मिले—
तो कथा सफल है।
यदि माता-पिता के प्रति सम्मान बढ़े—
तो कथा सफल है।
यदि किसी के प्रति द्वेष कम हो—
तो कथा सफल है।
यदि अहंकार घटे और विनय बढ़े—
तो कथा सफल है।
यदि मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सेवा करना सीख जाए—
तो यही रामकथा की वास्तविक साधना है।
इस लिए संतों से सुना हुआ यह अमृत संदेश अपने हृदय में धारण करें—
राम को केवल मंदिर में मत खोजिए, राम की मर्यादा अपने आचरण में खोजिए।
राम का नाम केवल जिह्वा पर मत रखिए, राम के गुण अपने जीवन में उतारिए।
संतों की कथा केवल सुनिए मत, उस कथा से अपने मन को बदलने का प्रयास कीजिए।
श्रीरामचरितमानस हमें अंततः उसी परम सत्य की ओर ले जाता है जहाँ भक्ति में अहंकार नहीं रहता, सेवा में स्वार्थ नहीं रहता और प्रेम में भेदभाव नहीं रहता।
भगवान श्रीराम के चरणों में यही प्रार्थना है—
हे रघुनाथ! हमारे मन से अहंकार, क्रोध, लोभ और कपट को दूर कीजिए। हमें संतों का संग दीजिए, सत्संग में श्रद्धा दीजिए, आपके नाम में प्रेम दीजिए और ऐसा जीवन दीजिए जिसमें हमारे कर्मों से किसी का अहित न हो।
॥ श्रीसीतारामचंद्र भगवान की जय ॥ ॥ पवनसुत हनुमानजी महाराज की जय ॥ ॥ संत समाज की जय ॥
लक्ष्य पूरा होने से साधन अपने आप समाप्त हो जाता है।
*🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹*
पंडारामा प्रभु राज्यगुरु !!!!! शुभमस्तु !!!
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 ( तमिलनाडु )
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
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