।। श्रीमद्भागवत प्रवचन - आत्मगुंजन ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीमद्भागवत प्रवचन - आत्मगुंजन ।।

श्रीमद्भागवत प्रवचन — आत्म गुंजन रहस्य कथा !

आत्मगुंजन !

मंगलाचरण ;


श्रीहरि को नमन, श्रीमद्भागवत महापुराण को नमन, समस्त संतों और ऋषियों को नमन। 

जिस परमात्मा से यह समस्त जगत उत्पन्न होता है, जिसमें यह स्थित रहता है और जिसमें अंततः विलीन हो जाता है, उस परम सत्य को प्रणाम।

जे लोक की परलोक की नहीं कामनायें त्यागते ।
संसार के हैं श्वान जे संसार में अनुरागते ।।

कंचन जिन्हें प्यारा लगे जे मूढ़ किंकर काम के ।
नहीं शान्ति वे पाते कभी नहीं भक्त होते राम के ।।

लोग बुराई करें और आप दुखी हो जाओ, लोग तारीफ करें और आप सुखी हो जाओ...! 

मतलब आपके सुख - दुख का स्विच लोगों के हाथ में,  कोशिश करें की  यह स्विच आपके हाथ में हो
आत्म गुंजन का रहस्य यही है कि जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचाने। 

संसार के सुख-दुख, लाभ - हानि, मान - अपमान, जन्म - मरण और लोक-परलोक के भोगों से परे जो आत्मतत्त्व है, उसका ज्ञान प्राप्त करे। 

जब मनुष्य अपने भीतर भगवान के नाम का स्मरण करता है और सांसारिक तथा स्वर्गीय भोगों की कामना को छोड़कर परमात्मा की शरण ग्रहण करता है, तब उसके जीवन में भक्ति का वास्तविक प्रकाश प्रकट होता है।

श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कन्ध, उन्नीसवें अध्याय में राजा ययाति का प्रसंग आता है। 

इस प्रसंग में विषयभोगों की अनित्यता और कामना के त्याग का गहन उपदेश है। 

उसी शास्त्रीय भाव को आत्म गुंजन के रहस्य से जोड़कर समझना इस प्रवचन का उद्देश्य है।





लोक और परलोक के भोगों की अनित्यता ;


श्रीमद्भागवत नवम स्कन्ध, उन्नीसवें अध्याय के श्लोक २० में ययाति के उपदेश का भाव मिलता है कि लोक और परलोक दोनों के भोग अनित्य हैं। 

मनुष्य को उनके निरंतर चिंतन और भोग में आसक्त नहीं होना चाहिए, क्योंकि विषयों की कामना जन्म - मरण के बंधन को बढ़ाती है। 

यह शिक्षा संसार का निषेध नहीं करती, बल्कि संसार के प्रति अंधी आसक्ति का त्याग सिखाती है। 

शरीर के लिए भोजन आवश्यक है, परिवार के लिए कर्तव्य आवश्यक हैं, समाज के लिए सेवा आवश्यक है और जीवन के लिए धर्म आवश्यक है। 

लेकिन इन सबका उद्देश्य केवल इन्द्रियों के सुख की प्राप्ति नहीं होना चाहिए।

लोक की कामना का अर्थ है इस संसार में सुख, धन, मान, यश, पद, अधिकार, प्रतिष्ठा और भोगों की इच्छा। 

परलोक की कामना का अर्थ है स्वर्ग, देवताओं के लोक, दिव्य भोग और मृत्यु के बाद सुख प्राप्त करने की इच्छा। 

शास्त्रीय दृष्टि से ये सभी इच्छाएँ अनित्य हैं, क्योंकि इनके फल भी समय के अधीन हैं।

मनुष्य को यह समझना चाहिए कि संसार का सुख स्थायी नहीं है और परलोक के भोग भी अंतिम परम लक्ष्य नहीं हैं। 

परम लक्ष्य भगवान की भक्ति और आत्मतत्त्व का ज्ञान है।

आत्म गुंजन का रहस्य ;


आत्म गुंजन का अर्थ है आत्मा के वास्तविक स्वरूप का जागरण। 

जब मनुष्य अपने भीतर भगवान के नाम का स्मरण करता है, तब वह अपने चित्त को संसार की चंचलता से हटाकर परमात्मा की ओर ले जाता है।

श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध, द्वितीय अध्याय में भगवान की कथा के श्रवण और कीर्तन से हृदय की शुद्धि का वर्णन है। 

भक्ति के द्वारा मनुष्य अपने भीतर स्थित भगवान के प्रति प्रेम विकसित करता है। 

आत्म गुंजन केवल किसी सूक्ष्म ध्वनि का अनुभव करना नहीं है। 

यह आत्मचिंतन, भगवान के नाम का स्मरण और अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान है। 

जब मनुष्य समझता है कि मैं केवल शरीर नहीं हूँ, बल्कि चेतन आत्मा हूँ, तब उसके भीतर आत्मबोध की शुरुआत होती है।

शरीर परिवर्तनशील है, मन चंचल है और इन्द्रियाँ विषयों की ओर दौड़ती हैं। 

लेकिन आत्मा इन सबका साक्षी है। 

आत्म गुंजन का रहस्य इसी साक्षीभाव में है। 

मनुष्य अपने भीतर के विचारों को पहचानता है और भगवान की ओर लौटने का प्रयास करता है।

श्रीमद्भागवत में ययाति प्रसंग के माध्यम से विषयभोगों की असंतुष्टि और कामनाओं की अनित्यता का वर्णन किया गया है। 

नवम स्कन्ध, उन्नीसवें अध्याय में ययाति का उपदेश है कि विषयों का भोग करने से कामना समाप्त नहीं होती, बल्कि और अधिक बढ़ती जाती है। 

यह शिक्षा मनुष्य को अपनी इच्छाओं के स्वरूप को समझने के लिए प्रेरित करती है। 

इच्छा पूरी होती है तो कुछ समय के लिए सुख मिलता है, लेकिन फिर दूसरी इच्छा उत्पन्न होती है। 

धन प्राप्त होता है तो अधिक धन की इच्छा होती है। 

मान मिलता है तो अधिक प्रतिष्ठा की कामना होती है। 

सांसारिक सुख प्राप्त होते हैं तो उन्हें बनाए रखने का भय उत्पन्न होता है।

इस प्रकार मनुष्य इच्छा और भय के बीच घूमता रहता है। 

विषयों का भोग करके मनुष्य स्थायी शांति प्राप्त नहीं कर सकता। 

शास्त्रों का संदेश यह है कि कामनाओं के पीछे भागने के स्थान पर भगवान की भक्ति और आत्मज्ञान की ओर बढ़ना चाहिए।

आत्म गुंजन का अर्थ इसी चंचल प्रवाह से अपने मन को वापस लाना है। 

जब मनुष्य भगवान के नाम का स्मरण करता है, तब वह अपनी इच्छाओं का निरीक्षण कर सकता है और समझ सकता है कि कौन - सी इच्छा उसे धर्म तथा भक्ति की ओर ले जाती है और कौन - सी उसे बंधन में डालती है।

भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय, छठे श्लोक में कहा है कि यज्ञ, दान और तप जैसे कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फल की अपेक्षा छोड़कर करना चाहिए। 

इस का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अपने सभी कर्तव्य छोड़ दे। 

गृहस्थ जीवन, सेवा, आजीविका, परिवार का पालन और धर्मपूर्ण कर्म आवश्यक हैं। 

लेकिन इन कर्मों के पीछे केवल स्वार्थपूर्ण भोग की इच्छा नहीं होनी चाहिए।

निष्काम भक्ति का अर्थ है भगवान की सेवा भगवान के प्रेम के लिए करना। 

यदि कोई व्यक्ति पूजा इसलिए करता है कि उसे धन मिले, मान मिले, स्वर्ग मिले या संसार के सभी सुख प्राप्त हों, तो उसकी भक्ति अभी कामना से जुड़ी हुई है।

जब वह भगवान की पूजा इस लिए करता है कि भगवान उसके आराध्य हैं, तब उसकी भक्ति निष्काम होने की दिशा में बढ़ती है। 

वह भगवान से केवल वस्तुएँ नहीं माँगता, बल्कि भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना विकसित करता है।

आत्म गुंजन का रहस्य यह है कि मनुष्य की भक्ति धीरे - धीरे कामना से प्रेम की ओर बढ़े। 

वह भगवान को साधन नहीं, बल्कि जीवन का परम लक्ष्य माने।


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अधिक पुरुषोत्तम - मास ;


संक्रान्तिरहितो मासो यो वा संक्रान्तियुग्मयुक्।
पूर्व: संसर्पसंज्ञ: स्यादंहस्पति तथापरः।।

भावार्थ ;

जिस मासमें सूर्यसंक्रान्तिका अभाव हो और द्विसंक्रान्तियुक्त – संयुक्त क्षयमासके पूर्वमें  अपरमें होवे तो दोनों मलमास क्रमशः "संसर्प" तथा "अहंस्पति" के नामसे जाने जाते हैं।

लोक की कामनाओं का त्याग ;


लोक की कामनाएँ मनुष्य को संसार के सुखों में बाँधती हैं। 

धन, यश, प्रतिष्ठा, अधिकार और इन्द्रियभोग की इच्छाएँ मनुष्य के मन को निरंतर बाहरी विषयों की ओर ले जाती हैं।

श्रीमद्भागवत के अनुसार विषयों के प्रति आसक्ति से मनुष्य का चित्त अशांत होता है। 

जब वह भक्ति और ज्ञान के द्वारा अपने मन को शुद्ध करता है, तब उसके भीतर वैराग्य का विकास होता है। 

लोक की कामनाओं का त्याग करने का अर्थ संसार छोड़ना नहीं है। 

इस का अर्थ है संसार में रहते हुए भी संसार को अपना अंतिम आश्रय न मानना। 

धन हो तो उसका उपयोग धर्म और सेवा में हो। 

मान मिले तो अहंकार न हो। 

परिवार हो तो उसमें प्रेम और कर्तव्य हो। कर्म हो तो उसमें ईश्वर का स्मरण हो।

मनुष्य को यह समझना चाहिए कि संसार की वस्तुएँ भगवान की देन हैं। 

उनका उपयोग धर्मपूर्वक करना चाहिए, लेकिन उनमें स्थायी सुख की खोज नहीं करनी चाहिए।

परलोक की कामनाओं का त्याग ;


परलोक की कामना भी मनुष्य को भोग की ओर ले जा सकती है। 

यदि कोई व्यक्ति स्वर्ग या किसी दिव्य लोक की प्राप्ति के लिए कर्म करता है, तो उसका उद्देश्य अभी भी किसी फल की प्राप्ति है।

श्रीमद्भागवत नवम स्कन्ध, उन्नीसवें अध्याय में लोक और परलोक के भोगों को अनित्य बताया गया है। 

वहाँ यह शिक्षा है कि इन भोगों का चिंतन और आसक्ति जन्म - मरण के बंधन को बढ़ा सकती है। 

इसका अर्थ यह नहीं है कि शास्त्रों में वर्णित स्वर्ग या परलोक का निषेध किया गया है। 

बल्कि यह समझाया गया है कि स्वर्गीय भोग भी अंतिम परम लक्ष्य नहीं हैं। 

भगवान की भक्ति और आत्मज्ञान का मार्ग इन भोगों से परे है।

निष्काम भक्त भगवान से स्वर्ग नहीं माँगता। 

वह भगवान की शरण चाहता है। 

उसके लिए भगवान का नाम, भगवान की कथा और भगवान की सेवा ही जीवन का वास्तविक धन है।
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आत्म गुंजन और मन की शुद्धि ;


मनुष्य का मन इच्छाओं, विचारों और संस्कारों से बना हुआ अनुभव करता है। 

जब मन संसार की कामनाओं में उलझता है, तब आत्मतत्त्व का ज्ञान ढक जाता है।

श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध, द्वितीय अध्याय में भगवान की कथा के श्रवण से हृदय की शुद्धि का वर्णन है। 

भक्ति के द्वारा मनुष्य अपने भीतर के विकारों को पहचानता है और भगवान के प्रति प्रेम विकसित करता है। 

आत्म गुंजन का अभ्यास मन को भगवान की ओर लौटाने का साधन हो सकता है। 

जब मनुष्य शांत होकर भगवान के नाम का स्मरण करता है, तब वह अपने भीतर उठने वाले विचारों को देख सकता है। 

वह समझता है कि इच्छाएँ आती - जाती हैं, लेकिन आत्मा का वास्तविक स्वरूप इन इच्छाओं से परे है।

मन की शुद्धि का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य को कभी कोई इच्छा नहीं होगी। 

इस का अर्थ है कि वह इच्छाओं का दास न बने। 

वह विवेक से निर्णय करे कि कौन - सी इच्छा धर्मपूर्ण है और कौन - सी उसे बंधन में डालती है।

भगवान के प्रति प्रेम ही परम धन ;


श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान की भक्ति मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराती है। 

प्रथम स्कन्ध, द्वितीय अध्याय में भगवान की कथा और भक्ति से हृदय की शुद्धि का वर्णन है। 

जब मनुष्य भगवान के प्रति प्रेम विकसित करता है, तब उसका जीवन बदलने लगता है। 

वह संसार की वस्तुओं को भगवान की देन समझकर उनका उपयोग करता है। 

वह अपने कर्मों को भगवान के चरणों में समर्पित करता है। 

वह दूसरों के प्रति दया, करुणा और मैत्री का व्यवहार करने का प्रयास करता है।

भगवान के प्रति प्रेम का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने कर्तव्य छोड़ दे। 

बल्कि वह अपने कर्तव्यों को अधिक शुद्ध भाव से निभाता है। 

परिवार की सेवा भगवान की सेवा समझकर करता है। 

समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को धर्म समझकर निभाता है।

आत्म गुंजन का रहस्य यही है कि मनुष्य अपने भीतर भगवान के नाम का स्मरण रखे और बाहर धर्मपूर्ण जीवन जिए।
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शास्त्रसम्मत आत्म गुंजन की साधना ;


आत्म गुंजन के लिए निम्न साधनों को अपनाया जा सकता है। 

ये साधन भगवान की भक्ति, आत्मविचार और निष्काम कर्म की दिशा में ले जाते हैं।

१. श्रीमद्भागवत का श्रवण ;

प्रतिदिन भगवान की कथा सुनना या पढ़ना। 

कथा के भाव को समझकर अपने जीवन में धर्म और भक्ति का विकास करना।

२. नामस्मरण ;


भगवान के नाम का श्रद्धापूर्वक स्मरण करना। 

नाम को केवल इच्छा पूरी करने का साधन न मानकर भगवान के प्रति प्रेम का माध्यम बनाना।

३. निष्काम सेवा ;


धर्मपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करना। 

सेवा, दान और सदाचार को फल की अपेक्षा से मुक्त करने का प्रयास करना।

४. आत्मविचार ;


अपने मन की इच्छाओं को देखना और समझना कि कौन - सी कामना अनित्य है। 

भगवान की भक्ति में मन को स्थिर करने का अभ्यास करना।

आत्म गुंजन का अंतिम रहस्य ;


श्रीमद्भागवत महापुराण में आत्मतत्त्व, भक्ति और वैराग्य का उपदेश मनुष्य को परमात्मा की ओर ले जाता है। 

लोक और परलोक के भोग अनित्य हैं। 

उनकी कामनाओं का त्याग करके भगवान की भक्ति में स्थिर होना आत्म गुंजन का सच्चा रहस्य है।

मनुष्य संसार में रहते हुए भी संसार का दास न बने। धन हो तो धर्म के लिए उपयोग करे। 

मान मिले तो अहंकार न करे। 

सुख मिले तो भगवान को धन्यवाद दे। 

दुख आए तो भगवान की शरण ग्रहण करे। 

कर्म करते हुए फल की आसक्ति छोड़ने का प्रयास करे।

आत्म गुंजन का अर्थ है भीतर भगवान का स्मरण और बाहर धर्मपूर्ण आचरण। 

यह आत्मबोध की दिशा में चलने वाला मार्ग है। 

जब मनुष्य अपने भीतर स्थित परमात्मा को पहचानने का प्रयास करता है, तब उसके जीवन में भक्ति का प्रकाश बढ़ता है।

शास्त्रीय आधार ;


श्रीमद्भागवत महापुराण — नवम स्कन्ध, उन्नीसवाँ अध्याय: ययाति प्रसंग और लोक-परलोक के भोगों की अनित्यता। 

श्रीमद्भागवत — प्रथम स्कन्ध, द्वितीय अध्याय: भगवान की कथा, श्रवण और हृदय की शुद्धि। 

श्रीमद्भगवद्गीता — अठारहवाँ अध्याय, श्लोक ६: आसक्ति और फल की अपेक्षा छोड़कर कर्तव्यकर्म करना। 

मूल संदर्भ: आत्म गुंजन ग्रंथ  तथा श्रीमद्भागवत नवम स्कन्ध, उन्नीसवाँ अध्याय ।

निष्कर्ष ;


श्रीमद्भागवत का संदेश है कि लोक और परलोक के भोगों की कामनाएँ अनित्य हैं। 

मनुष्य को उनके पीछे अपना जीवन नहीं लगाना चाहिए। 

भगवान की भक्ति, आत्मज्ञान, वैराग्य और निष्काम कर्म के द्वारा वह अपने वास्तविक स्वरूप की ओर बढ़ सकता है।

आत्म गुंजन का सच्चा रहस्य: भगवान के नाम का स्मरण करो, अपनी कामनाओं को पहचानो, अनित्य भोगों से आसक्ति घटाओ और परमात्मा की भक्ति में जीवन समर्पित करो। यही श्रीमद्भागवत की शास्त्रोक्त शिक्षा है। 🙏🚩हरी वन्दन🚩🙏
!!!!! शुभमस्तु !!!
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