सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्रीमद्भागवत प्रवचन - सुंदर कहानी मेरा काडिया ठाकर की दर्पण सेवा ।।
श्रीमद्भागवत प्रवचन "ठाकुर जी की दर्पण सेवा"
शास्त्राधारित आध्यात्मिक प्रवचन • श्रीमद्भागवत के भक्ति, सेवा और आत्मदर्शन के सिद्धांत ;
इस में श्रीमद्भागवत के मूल प्रसंगों, भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और शास्त्रीय उपदेशों के आधार पर दर्पण सेवा का आध्यात्मिक रहस्य प्रस्तुत किया गया है।
दर्पण सेवा का वास्तविक अर्थ ;
एक मैया अपने श्याम सुन्दर की बड़ी सेवा करती थी।
वह प्रातः उठकर अपने ठाकुर जी को बड़े प्यार दुलार और मनुहार से उठाती और स्नान श्रृंगार के बाद उनको आइना दिखाती।
उसके बाद भोग लगाती थी।
एक बार उसको एक मास की लंबी यात्रा पर जाना पड़ा।
जाने से पूर्व उसने ठाकुर जी की सेवा अपनी पुत्रवधू को सौंपते हुई समझा रही थी।
ठाकुर जी की सेवा में कोई कमी न करना।
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| { Size | 32L x 25W cm |
| Product Dimensions | 32L x 25W Centimeters |
| Item Weight | 280 g |
| Number of Items | 1 |
| Orientation | Portrait |
| Shape | Rectangular |
| Theme | Religious |
| Frame Type | Framed |
| Material | Synthetic |
| Colour | Bal Gopal 01 } |
{ About this item
- Item dimension(size): 9.25X12.75 Inches, Made to be used as one of Pooja Room decoration items or as a living room decoration items and big enough to fill a standard size wall.
- Color: Our Bhagwan Photos are Multi color, & with Wooden Wall Frame in gold color.
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भगवान के सामने दर्पण रखना केवल बाहरी रूप देखने की सेवा नहीं है। भक्ति में दर्पण का गहरा अर्थ है—
अपने मन को भगवान के सामने रखना और उसमें अपने भीतर के अहंकार, लोभ, क्रोध, मोह तथा भक्ति के प्रकाश को पहचानना।
श्रीमद्भागवत का संदेश है कि भगवान की भक्ति से चित्त शुद्ध होता है और जीव अपने वास्तविक स्वरूप की ओर जागृत होता है।
उनको श्रृंगार के बाद आइना दिखाना इतना अच्छा श्रृंगार करना कि ठाकुर जी मुस्करा दें।
दूसरे दिन बहू ने सास की आज्ञानुसार ठाकुर जी की सेवा की।
उनको श्रृंगार के बाद दर्पण दिखाया और उसी दर्पण में धीरे से देखने लगी कि ठाकुर जी मुस्कराए या नहीं।
ठाकुर जी को जब मुस्कराता न देखा तो सोचा श्रृंगार में कमी हो गई होगी।
पगड़ी बंसी पोशाक सब ठीक करके फिर दर्पण दिखा कर झुक कर देखा ठाकुर जी पहले जैसे खड़े थे।
एक बार पुनः पोशाक श्रृंगार ठीक किया, फिर से दर्पण दिखाया ठाकुर जी नहीं मुस्कराए।
अब बेचारी डर गई सोचा शायद ठीक से नहीं नहलाया है।
फिर से कपडे उतार कर ठाकुर जी को स्नान कराया, पोशाक और श्रृंगार पधराया।
पुनः दर्पण दिखाया, किंतु ठाकुर जी की मुस्कान न देख सकी।
एक बार फिर पोशाक उतार कर पूरा क्रम दुहराया।
ठाकुर जी की मुस्कान तो नहीं मिली।
श्रीमद्भागवत में दर्पण सेवा का भाव;
श्रीमद्भागवत में दर्पण सेवा के नाम से कोई स्वतंत्र, प्रमाणित कथा या किसी विशेष ठाकोरजी की दर्पण सेवा का निश्चित प्रसंग नहीं मिलता।
इस लिए इसे किसी पुराण में वर्णित घटना कहकर प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
प्रस्तुत कथा दर्पण सेवा के भाव को श्रीमद्भागवत के प्रमाणित प्रसंगों से समझाने वाला आध्यात्मिक प्रवचन है।
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान की भक्ति, उनके नाम का श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन और दास्यभाव जैसे भक्ति मार्गों का वर्णन मिलता है।
दर्पण सेवा को इसी अर्चन और सेवा - भाव के अंतर्गत समझा जा सकता है।
इस प्रकार उसने 12 बार यही उपक्रम किया।
सुबह से दोपहर हो चुकी थी।
घर का सब काम बाकी पड़ा था।
न कुछ खाया था न पानी पिया था।
बहुत जोर की भूख प्यास लगी थी, किंतु सास के आदेश की अवहेलना करने की उसकी हिम्मत नहीं थी।
तेरहवीं बार उसने ठाकुर जी के वस्त्र उतारे।
पुनः जल से स्नान कराया।
ठाकुर जी सुबह से सर्दी के मौसम में स्नान कर कर के तंग हो चुके थे।
उन्हें भी जोर की भूख प्यास लगी थी, इस बार फिर से वस्त्र आभूषण पहन रहे थे, किन्तु उनके मन में भी बड़ी दुविधा थी क्या करूँ ?
श्रृंगार होने के बाद आसन पर विराज चुके थे।
बहू ने दर्पण उठाया, ठाकुर जी ने निश्चय कर लिया था मुस्कराने का।
जैसे ही उसने दर्पण दिखाया और झुक कर बगल से देखने की चेष्टा की श्याम सुन्दर मुस्करा रहे थे।
भगवान के सामने दर्पण क्यों रखा जाता है ?
दर्पण में भगवान का स्वरूप दिखाई देता है, लेकिन भक्त के लिए यह केवल सुंदरता देखने का साधन नहीं है।
जब भक्त ठाकोरजी का श्रृंगार करता है, उनके सामने दर्पण रखता है और भगवान के दर्शन करता है, तब उसका मन भगवान की ओर एकाग्र होता है।
दर्पण सेवा का पहला रहस्य है कि भगवान के स्वरूप का दर्शन करते हुए भक्त अपने भीतर की अशुद्धियों को भी पहचानने लगे।
श्रीमद्भागवत में राजा परीक्षित ने मृत्यु का समय निकट जानकर सांसारिक विषयों से मन हटाया और श्रीशुकदेवजी से भगवान की कथा सुनी।
यही दर्पण सेवा का अंतरंग भाव है—
बाहरी वस्तु के माध्यम से मन को भगवान की ओर मोड़ना।
भागवत का यह उपदेश है कि भगवान की कथा सुनने से चित्त में भक्ति का जागरण होता है।
दर्पण सेवा भी तभी सार्थक है जब वह भगवान की स्मृति, विनय और आत्मशुद्धि की ओर ले जाए।
उनकी भुवन मोहिनी हंसी देख कर बहू विस्मित हो गई।
सारी दुनिया को भूल गई।
थोड़ी देर में होश में आने के बाद उसको लगा।
शायद मेरा भ्रम हो, ठाकुर जी तो हँसे नहीं।
काडिया ठाकोर की दर्पण सेवा का रहस्य ;
काडिया ठाकोर के नाम से किसी विशिष्ट दर्पण सेवा - विधि का प्रमाणित उल्लेख मेरे पास उपलब्ध नहीं है।
इस नाम को स्थानीय ठाकोरजी की परंपरा के रूप में मानकर भी किसी अप्रमाणित विधि या कथा को श्रीमद्भागवत का शास्त्रीय विधान नहीं कहना चाहिए।
यदि किसी मंदिर में ठाकोरजी के सामने दर्पण रखा जाता है, तो उस सेवा का भाव इस प्रकार समझा जा सकता है:
भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन करना।
भगवान को अपना स्वामी और स्वयं को सेवक मानना।
अपने मन की अशुद्धियों को पहचानना।
अहंकार, क्रोध और लोभ को त्यागने का संकल्प करना।
भगवान के नाम, गुण और लीला का स्मरण करना।
दर्पण भगवान को सुंदर बनाने के लिए नहीं, बल्कि भक्त के भीतर सुंदर भाव जगाने के लिए भी एक साधन बन सकता है।
भगवान तो स्वयं पूर्ण हैं; सेवा से पूर्णता भक्त के हृदय में आती है।
उसने पुनः दर्पण दिखाया।
ठाकुर जी ने सोचा प्यारे अगर भोजन पाना है तो हँसना पड़ेगा।
वे मध्यम-मध्यम हँसने लगे, ऐसी हँसी उसने पहले नहीं देखी थी।
वह मन्द हास उसके ह्रदय में बस गया था।
उस छवि को देखने का उसका बार - बार मन हुआ।
एक बार फिर उसने दर्पण दिखाया और ठाकुर जी को मुस्कराना पड़ा।
अब तो मारे ख़ुशी के वह फूली न समाई बड़े प्रेम से उनको भोग लगाया और आरती की।
दिन की शेष सेवाएं भी की और रात्रि को शयन कराया।
अगले दिन पुनः उसने पहली बार ही जैसे ठाकुर जी को स्नान करा के और वस्त्राभूषणों को पहना कर सुन्दर श्रृंगार करके आसन पर विराजमान किया और दर्पण दिखाया ठाकुर जी कल की घटनाओं और भूख को याद किया।
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श्रीमद्भागवत का नवधा भक्ति उपदेश ;
श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कंध में प्रह्लाद महाराज ने भगवान की भक्ति के नौ अंग बताए हैं।
उनका प्रसिद्ध श्लोक है:
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
अर्थात भगवान विष्णु के नाम, गुण और लीला का श्रवण करना, उनका कीर्तन करना, स्मरण करना, चरणों की सेवा करना, अर्चन करना, वंदन करना, दास्यभाव रखना, सख्यभाव रखना और
आत्मनिवेदन करना—
ये भक्ति के नौ अंग हैं।
दर्पण सेवा मुख्य रूप से अर्चन, वंदन और दास्यभाव से जुड़ी हुई मानी जा सकती है।
जब भक्त भगवान का श्रृंगार करता है और दर्पण अर्पित करता है, तब वह मन में कहता है कि हे प्रभु, यह सेवा आपकी कृपा से ही संभव है।
मेरे भीतर जो भी सुंदरता, बुद्धि और सामर्थ्य है, वह आपकी ही देन है।
यही भाव सेवा को अहंकार से बचाता है।
ठन्डे जल से 13 बार का स्नान याद करके ठाकुर जी ने मुस्कराने में ही अपनी भलाई समझी।
उसने तीन बार ठाकुर जी को दर्पण दिखाया और उनकी मनमोहक हँसी का दर्शन किया।
आगे की सेवा भी क्रमानुसार पूरी की।
अब तो ठाकुर जी रोज ही यही करने लगे दर्पण देखते ही मुस्करा देते।
बहू ने सोचा शायद उसको ठीक से श्रृंगार करना आ गया है, वह इस सेवा में निपुण हो गई है।
एक मास बाद जब मैया यात्रा से वापस आई आते ही उसने बहू से सेवा के बारे में पूछताछ की।
बहू बोली मैया मुझे एक दिन तो सेवा मुश्किल लगी, किन्तु अब मैं निपुण हो गई हूँ।
अगले दिन मैया ने स्वयं अपने हाथों से सारी सेवा की श्रृंगार कराया अब दर्पण लेने के लिए हाथ उठाया ठाकुर जी स्वयं प्रकट हो गए।
मैया का हाथ पकड़ लिया बोले, "मैया !
मैं तेरी सेवा से प्रसन्न तो हूँ, पर दर्पण दिखाने की सेवा तो मैं तेरी बहूरानी से ही करवाऊंगा, तू तो रहने दे।"
श्रीकृष्ण की बाललीला और आत्मदर्शन ;
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का वर्णन मिलता है।
यशोदा मैया ने जब श्रीकृष्ण के मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड का दर्शन किया, तब उन्हें यह अनुभव हुआ कि बालक के रूप में दिखाई देने वाले श्रीकृष्ण साधारण जीव नहीं हैं।
इस प्रसंग से दर्पण सेवा का एक महत्वपूर्ण अर्थ समझ में आता है।
साधारण दर्पण बाहरी रूप दिखाता है, लेकिन भगवान की भक्ति का दर्पण जीव को यह समझाता है कि संसार में जो कुछ दिखाई देता है, वह परम सत्य नहीं है। भगवान ही परम सत्य हैं।
श्रीमद्भागवत का संदेश है कि भगवान के स्वरूप, नाम और लीला का चिंतन करने से जीव का मन संसार की अस्थिरता से हटकर परमात्मा की ओर जाता है।
इस प्रकार ठाकोरजी के सामने दर्पण रखना भक्त के लिए भगवान के दिव्य स्वरूप का स्मरण कराने वाला साधन बन सकता है।
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मैया बोली - "लाला !
क्या मुझसे कोई भूल हुई।
ठाकुर जी ने कहा- "नहीं मैया !
भूल तो नहीं हुई, पर मेरा मुस्कराने का मन करता है, और मैं तो तेरी बहूरानी के हाथ से दर्पण देखकर मुस्कराने की आदत डाल चुका हूँ, अब ये सेवा तू उसी को करने दे।"
मैया ने बहूरानी को आवाज लगाई और उससे सारी बात पूँछी, बहू ने बड़े सहज भाव से बता दिया हाँ ऐसा रोज मुस्कराते हैं ये केवल पहले दिन समय लगा था।
मैया बहू रानी की श्रद्धा और उसकी लगन और ठाकुर जी दर्शन से अति प्रसन्न हो गई।
उसे पता चल गया कि उसकी बहू ने ठाकुर जी को अपने प्रेम से पा लिया है।
मैया अपनी बहू रानी को ठाकुर जी की सेवा सौप कर निश्चिन्त हो गई।
दर्पण में दिखाई देने वाला अहंकार ;
मनुष्य जब दर्पण में अपना चेहरा देखता है, तो उसे अपने रूप का ज्ञान होता है।
लेकिन आत्मिक दर्पण में उसे अपने मन का रूप देखना चाहिए।
क्या मेरे भीतर भगवान के प्रति प्रेम है ?
क्या मैं सेवा करते समय दूसरों से सम्मान की इच्छा रखता हूँ?
क्या मैं अपने ज्ञान, धन, पूजा या धार्मिक कार्यों पर गर्व करता हूँ?
क्या मैं भगवान की सेवा को केवल इच्छा पूरी करने का साधन मानता हूँ?
श्रीमद्भागवत में प्रह्लाद महाराज का चरित्र भक्तिभाव का आदर्श है।
उन्होंने भगवान की भक्ति को किसी सांसारिक लाभ के लिए नहीं अपनाया।
उनके लिए भगवान का स्मरण ही जीवन का आधार था।
इस लिए दर्पण सेवा का वास्तविक फल तब है जब भक्त अपने भीतर से अभिमान को हटाने का प्रयास करे।७. भक्ति का नशा और आध्यात्मिक संगत
श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत का अर्थ किसी भौतिक नशे से नहीं है।
यह भगवान के नाम, गुण, कथा और भक्तों की संगत में मन को आनंदित करने का भाव है।
श्रीमद्भागवत में भगवान की कथा सुनने और भक्तों की संगत का महत्त्व बार - बार बताया गया है।
राजा परीक्षित ने सांसारिक राज्य, धन और भोग से मन हटाकर भगवान की कथा का आश्रय लिया।
श्रीशुकदेवजी ने उन्हें भगवान की लीलाओं का अमृत सुनाया।
भक्तों की संगत में दर्पण सेवा का अर्थ यह बनता है कि हम दूसरों में दोष देखने के बजाय अपने भीतर भगवान की भक्ति को बढ़ाएँ।
यदि कोई व्यक्ति सेवा करता है, लेकिन उसके मन में ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार बढ़ता जाता है, तो उसे अपनी सेवा के भाव पर विचार करना चाहिए।
भगवान की भक्ति मन को शांत, विनम्र और करुणामय बनाती है।
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{ Material composition
Kanjivaram Soft Silk
Weave type
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Occasion type
Festival, Party, Wedding, Ceremony
Care instructions
Dry Clean Only
Country of Origin
India }
{ About this item
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भक्ति का नशा और आध्यात्मिक संगत ;
श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत का अर्थ किसी भौतिक नशे से नहीं है।
यह भगवान के नाम, गुण, कथा और भक्तों की संगत में मन को आनंदित करने का भाव है।
श्रीमद्भागवत में भगवान की कथा सुनने और भक्तों की संगत का महत्त्व बार-बार बताया गया है।
राजा परीक्षित ने सांसारिक राज्य, धन और भोग से मन हटाकर भगवान की कथा का आश्रय लिया।
श्रीशुकदेवजी ने उन्हें भगवान की लीलाओं का अमृत सुनाया।
भक्तों की संगत में दर्पण सेवा का अर्थ यह बनता है कि हम दूसरों में दोष देखने के बजाय अपने भीतर भगवान की भक्ति को बढ़ाएँ।
यदि कोई व्यक्ति सेवा करता है, लेकिन उसके मन में ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार बढ़ता जाता है, तो उसे अपनी सेवा के भाव पर विचार करना चाहिए।
भगवान की भक्ति मन को शांत, विनम्र और करुणामय बनाती है।
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दर्पण सेवा और निष्काम भक्ति ;
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
अर्थात जो भक्त प्रेम और भक्ति से पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, भगवान उस प्रेमपूर्वक अर्पित वस्तु को स्वीकार करते हैं।
इस श्लोक का भाव दर्पण सेवा पर भी लागू होता है। दर्पण की कीमत, उसका आकार या उसकी सुंदरता मुख्य नहीं है।
मुख्य है भक्त का प्रेम और शुद्ध भावना।
यदि दर्पण सेवा केवल दिखावे, प्रतिष्ठा या दूसरों से प्रशंसा पाने के लिए की जाती है, तो उसका आध्यात्मिक भाव कमजोर हो जाता है।
लेकिन यदि भक्त भगवान को प्रेम से दर्पण अर्पित करता है, तो वह सेवा भक्ति का अंग बन जाती है।
भगवान का श्रृंगार और भक्त का मन ;
ठाकोरजी का श्रृंगार करते समय भक्त भगवान के चरण, मुख, नेत्र, मुकुट, वस्त्र और आभूषणों का दर्शन करता है।
यह दर्शन मन को भगवान के स्वरूप में स्थिर करने का अवसर देता है।
दर्पण सेवा का भाव यह है कि भक्त भगवान के स्वरूप को अपने हृदय में धारण करे।
जैसे दर्पण में भगवान का प्रतिबिंब दिखाई देता है, वैसे ही भक्त के मन में भगवान का नाम और रूप प्रतिबिंबित होना चाहिए।
श्रीमद्भागवत में भगवान के नाम, गुण और रूप का स्मरण भक्ति का प्रमुख साधन है।
इस लिए दर्पण सेवा को केवल श्रृंगार की बाहरी प्रक्रिया न मानकर भगवान के ध्यान और स्मरण का साधन माना जा सकता है।
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दर्पण सेवा में सावधानी ;
शास्त्राधारित सेवा में सबसे आवश्यक बात है कि हम प्रमाणित विधि और स्थानीय परंपरा में अंतर समझें।
यदि किसी मंदिर में दर्पण सेवा की विशेष परंपरा है, तो उस मंदिर के आचार्य या सेवायत से उसकी विधि और परंपरा की जानकारी लेनी चाहिए।
सामान्य रूप से भगवान की पूजा में स्वच्छता, श्रद्धा, विनय और भक्ति का भाव रखना उचित है।
दर्पण अर्पित करते समय भगवान का नाम स्मरण किया जा सकता है और अपने मन को शांत रखा जा सकता है।
किसी विशेष दर्पण सेवा से धन, संतान, रोगमुक्ति या अन्य निश्चित सांसारिक फल मिलने का दावा श्रीमद्भागवत के आधार पर नहीं करना चाहिए।
भगवान की भक्ति का सर्वोच्च फल भगवान के प्रति प्रेम और आत्मिक शुद्धि है।
ॐ नमो भगवते तस्मै केशवाय महात्मने
यन्नामकीर्तनात् सद्यो नरकाग्नि: प्रशाम्यति।
भक्तिप्रियाय देवाय रक्षाय हरये नम:
लोकनाथाय शान्ताय यज्ञेशायादिमूर्तये।
अनन्तायाप्रमेयाय नरसिंहाय ते नमः
नारायणाय गुरवे शंखचक्रगदाभृते ।।
ॐ जिनका नाम कीर्तन करने से नरक की ज्वाला तत्काल शान्त हो जाती है,उन महात्मा केशव को नमस्कार है।
जो यज्ञों के ईश्वर,आदिमूर्ति, शान्तस्वरूप और संसारके स्वामी हैं, उन भक्तप्रिय,विश्वपालक भगवान् विष्णु को नमस्कार है।
अनन्त,अप्रमेय नरसिंह स्वरूप, शंख - चक्र - गदा धारण करने वाले,लोकगुरु आप श्री नारायण को नमस्कार है।
|| विष्णु भगवान की जय हो ||
"जय जय श्री राधे जय काडिया ठाकर जय द्वारकाधीश
!!!!! शुभमस्तु !!!
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