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जय द्वारकाधीश
।।श्रीमद् देवी भागवत — नवरात्रि व्रत खोलने से पहले रखें इन 7 बातों का ध्यान!।।
श्रीमद् देवी भागवत — नवरात्रि व्रत खोलने से पहले रखें इन 7 बातों का ध्यान!
नवरात्रि व्रत खोलने से पहले रखें इन 7 बातों का ख्याल, पंडित जी ने बताए पारण के नियम !
श्रीमद् देवी भागवत — नवरात्रि व्रत खोलने से पहले रखें इन 7 बातों का ध्यान और जानें पारण के शास्त्रोक्त नियम !
नवरात्रि का व्रत केवल भोजन का त्याग करना नहीं, बल्कि माता भगवती की उपासना, संयम, श्रद्धा और नियमपूर्वक साधना करने का अवसर है।
नवरात्रि में अनेक भक्त नौ दिनों तक उपवास रखते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, देवी के मंत्रों का जप करते हैं तथा अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन और हवन करके व्रत की धार्मिक क्रियाएँ पूर्ण करते हैं।
शारदीय नवरात्रि व्रत का पारण अष्टमी और नवमी तिथि को किया जाता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, कुछ लोग अष्टमी तिथि को व्रत का पारण करते हैं और कुछ लोग नवमी में।
लेकिन, क्या आप जानते हैं नवरात्रि पारण के क्या नियम हैं।
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पारण करते समय किन बातों का ख्याल रखना चाहिए।
जानें नवरात्रि व्रत पारण के नियम।
लेकिन एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि नवरात्रि का व्रत कब खोलना चाहिए? पारण से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
क्या कन्या पूजन, हवन और ब्राह्मण भोजन के बाद ही व्रत खोलना चाहिए?
इन प्रश्नों का उत्तर देते समय श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के नवरात्रि - विधान का अध्ययन करना आवश्यक है।
साथ ही यह समझना भी जरूरी है कि अलग - अलग कुलपरंपराओं और व्रत - पद्धतियों में कुछ अंतर हो सकते हैं।
इस लेख में नवरात्रि व्रत के पारण से संबंधित सात महत्त्वपूर्ण बातें शास्त्रीय संदर्भों के साथ समझते हैं।
व्रत खोलने से पहले देवी की उपासना पूर्ण करें ;
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के पाँचवें स्कन्ध के अध्याय 34 में आश्विन तथा चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में नवरात्रि उपवास करने का विधान बताया गया है।
इस अध्याय में देवी की विधिपूर्वक पूजा, मंत्र - जप, हवन तथा कुमारियों के पूजन का उल्लेख मिलता है।
इससे स्पष्ट होता है कि नवरात्रि व्रत में उपवास के साथ देवी की उपासना भी महत्त्वपूर्ण है।
इस लिए व्रत खोलने से पहले अपनी निर्धारित पूजा - पद्धति के अनुसार माता भगवती की पूजा पूर्ण करें।
यदि आपने नौ दिनों तक दुर्गा सप्तशती का पाठ, देवी - मंत्र का जप या कोई विशेष संकल्प लिया है, तो अपनी सामर्थ्य और निर्धारित विधि के अनुसार उसे पूरा करें।
शास्त्रीय संदर्भ: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 34, विशेषतः श्लोक 13–23 तथा आगे का नवरात्रि-विधान।
ध्यान रखें कि पूजा की प्रत्येक परंपरा में सभी अनुष्ठान अनिवार्य रूप से समान हों, ऐसा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
अपनी व्रत - पद्धति के अनुसार आवश्यक कर्म निर्धारित करें।
शारदीय नवरात्रि में 9 दिन मां दुर्गा की आराधना के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
शास्त्रों के अनुसार, जिस तरह से नवरात्रि व्रत करने के विशेष नियम बताए गए हैं उसी तरह से नवरात्रि व्रत के पारण के भी कुछ विशेष नियम हैं।
नवरात्रि के 9 दिनों तक व्रत करने के बाद व्रत खोलने को ही पारण कहा जाता है।
ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री के अनुसार, नवरात्रि व्रत का पारण सिर्फ खाना खाना नहीं है बल्कि यह पूजा विधि, तिथि समय और स्वास्थ्य का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए।
आइए जानते हैं नवरात्रि व्रत का पारण करने से पहले किन बातों का विशेष ख्याल रखना चाहिए।
अष्टमी, नवमी और दशमी के पारण में अंतर समझें ;
नवरात्रि व्रत के संबंध में सबसे अधिक भ्रम अष्टमी, नवमी और दशमी को लेकर होता है।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के पाँचवें स्कन्ध के अध्याय 34 में देवी - पूजन, कुमारिका - पूजन और हवन का विधान वर्णित है।
उपलब्ध अंग्रेजी अनुवाद में इसी अध्याय के अनुसार अष्टमी या नवमी तिथि को हवन करने और उसके बाद निर्धारित कर्म पूर्ण करके दशमी को प्रथम भोजन अर्थात् पारण करने का वर्णन मिलता है।
इस लिए इस ग्रंथ में वर्णित विधान का उल्लेख करते समय दशमी के पारण का संदर्भ महत्त्वपूर्ण है।
हालाँकि, व्यवहार में नवरात्रि के व्रत कई प्रकार से रखे जाते हैं।
कुछ भक्त अष्टमी को, कुछ नवमी को और कुछ दशमी को पारण करते हैं।
यह अंतर व्रत के संकल्प, संबंधित धर्मशास्त्रीय पद्धति और कुलपरंपरा के कारण हो सकता है।
अतः प्रत्येक भक्त के लिए एक ही दिन का नियम घोषित करना उचित नहीं है।
आपने जिस विधि से व्रत का संकल्प लिया है, उसी के अनुसार पारण का निर्णय करें।
शास्त्रीय संदर्भ: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 34; नवरात्रि-विधान और हवन-पारण संबंधी वर्णन।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के पाँचवें स्कन्ध के चौंतीसवें अध्याय में भगवती की पूजा, नवरात्रि उपवास, कुमारिका पूजन, हवन, ब्राह्मण भोजन, पारण और यथाशक्ति दान का वर्णन मिलता है।
इसी अध्याय के श्लोक 13 से 31 तक नवरात्रि के विधान को समझने के लिए विशेष रूप से उपयोगी हैं।
व्रत खोलने से पहले माता भगवती की पूजा और संकल्प का ध्यान रखें ;
नवरात्रि का व्रत आरम्भ करते समय भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार संकल्प लेते हैं।
कोई पूरे नौ दिनों तक उपवास करता है, कोई फलाहार करता है और कोई विशेष तिथियों पर उपवास रखकर अन्य दिनों में सात्त्विक भोजन करता है।
इस लिए सबसे पहले यह समझना चाहिए कि आपने किस प्रकार का व्रत रखा है और उसका संकल्प क्या है।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 34, श्लोक 13 में कहा गया है—
आश्विने च तथा चैत्रे शुक्ले पक्षे नराधिप।
नवरात्रोपवासो वै कर्तव्यः शुभमिच्छता॥ १३॥
इस का भावार्थ है कि कल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को आश्विन और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में नवरात्रि का उपवास करना चाहिए।
इसी अध्याय में देवी की पूजा, मंत्र - जप और दुर्गा के चरित्रों के पाठ का भी उल्लेख है।
अतः नवरात्रि को केवल भोजन त्यागने का अवसर न मानकर देवी की उपासना का पर्व समझना चाहिए।
व्रत खोलने से पहले अपनी निर्धारित पूजा पूर्ण करें।
यदि आपने कोई विशेष मंत्र - जप, पाठ या अनुष्ठान करने का संकल्प लिया है, तो उसे अपनी निर्धारित पद्धति के अनुसार पूरा करें।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि हर भक्त का संकल्प एक जैसा नहीं होता।
इस लिए दूसरे व्यक्ति की पूजा - पद्धति देखकर अपने व्रत के नियम बदलने के बजाय अपने संकल्प और कुलपरंपरा को महत्त्व दें।
कन्या पूजन और भोजन का कार्य श्रद्धापूर्वक करें ;
नवरात्रि में कन्या पूजन का विशेष धार्मिक महत्त्व माना जाता है।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के पाँचवें स्कन्ध के अध्याय 34 में कुमारियों के पूजन, उन्हें वस्त्र तथा अन्य पूजन - सामग्री अर्पित करने और आदरपूर्वक सत्कार करने का उल्लेख मिलता है।
अष्टमी, नवमी और दशमी के पारण का अंतर समझें ;
नवरात्रि में सबसे अधिक भ्रम इस बात को लेकर होता है कि व्रत अष्टमी को खोलना चाहिए, नवमी को या दशमी को।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के पाँचवें स्कन्ध के चौंतीसवें अध्याय में अष्टमी या नवमी को हवन करने और उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने का वर्णन है।
इस के पश्चात श्लोक 31 में दशमी को पारण करने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
नवरात्रि की अष्टमी या नवमी को अनेक परिवारों में कन्याओं को आमंत्रित करके भोजन कराया जाता है।
कन्याओं का सम्मान, स्वच्छता और श्रद्धापूर्वक सत्कार इस परंपरा के प्रमुख अंग हैं।
मूल संस्कृत श्लोक है—
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्पारणं दशमीदिने।
कर्तव्यं शक्तितो दानं देयं भक्तिपरैर्नृपैः॥ ३१॥
इस का भावार्थ है कि ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद दशमी के दिन पारण करना चाहिए तथा श्रद्धालु व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान दे।
इस प्रकार, श्रीमद् देवी भागवत के इस विशेष नवरात्रि - विधान में दशमी को पारण का स्पष्ट निर्देश मिलता है।
हालाँकि, व्यवहार में अनेक परिवार अष्टमी या नवमी को भी अपने व्रत का समापन करते हैं।
अलग - अलग व्रत - पद्धतियों, संकल्पों और क्षेत्रीय परंपराओं में अंतर हो सकता है।
इस लिए इस एक शास्त्रीय विधान को सभी प्रकार के नवरात्रि व्रतों पर बिना भेद के लागू करना उचित नहीं होगा।
यदि आपने श्रीमद् देवी भागवत में वर्णित इसी विधान के अनुसार नवरात्रि व्रत किया है, तो दशमी - पारण के निर्देश को विशेष महत्त्व दें।
अन्यथा अपने व्रत की निर्धारित परंपरा के अनुसार निर्णय करें।
यदि आपके व्रत - विधान में कन्या पूजन निर्धारित है, तो उसे श्रद्धापूर्वक पूर्ण करें।
भोजन कराने की सामर्थ्य न होने पर अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार पूजा करें; केवल दिखावे या ऋण लेकर खर्च करना आवश्यक नहीं समझें।
यह भी ध्यान रखें कि कन्या पूजन और व्रत - पारण दो संबंधित, लेकिन अलग धार्मिक क्रियाएँ हैं।
इन के क्रम का निर्णय अपनी मान्य व्रत - पद्धति के अनुसार करें।
शास्त्रीय संदर्भ: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 34; कुमारिका - पूजन संबंधी वर्णन।
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नवरात्रि व्रत पारण में रखें इन बातों का ख्याल !
ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री कहते हैं कि, नवरात्रि व्रत का पारण कब करना है यह व्रत के प्रकार, तिथि और परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है।
कई लोग अष्टमी और कई लोग नवमी तिथि पर कन्या पूजन करते हैं।
इस लिए पारण के लिए किसी दिन या समय को सभी के लिए अनिवार्य मानने के बजाय स्थानीय पंचांग और अपनी पूजा परंपरा के अनुसार, निर्णय लेना चाहिए।
कन्या पूजन को श्रद्धा और सम्मान के साथ पूर्ण करें ;
नवरात्रि में कन्या पूजन की विशेष धार्मिक परंपरा है।
अनेक भक्त अष्टमी या नवमी को कन्याओं को घर पर आमंत्रित करते हैं, उनके चरण धोते हैं, तिलक लगाते हैं और भोजन कराकर अपनी श्रद्धा के अनुसार दक्षिणा या उपहार देते हैं।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 34 में कुमारिकाओं के पूजन, वस्त्र, आभूषण, भोजन तथा अन्य सामग्री से सत्कार का उल्लेख मिलता है।
यह देवी की उपासना से जुड़ी महत्त्वपूर्ण धार्मिक क्रिया के रूप में वर्णित है।
कन्या पूजन करते समय स्वच्छता, विनम्रता और सम्मान का ध्यान रखें।
कन्याओं को भोजन कराने का उद्देश्य केवल एक धार्मिक रस्म पूरी करना नहीं, बल्कि श्रद्धा और आदर की भावना व्यक्त करना है।
यदि आपके संकल्प में अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन निर्धारित है, तो उसे अपनी परंपरा के अनुसार पूर्ण करें।
भोजन के लिए स्वच्छ और सात्त्विक सामग्री का प्रबंध करें तथा कन्याओं को उनकी इच्छा और सुविधा के अनुसार भोजन करने दें।
यह भी समझना आवश्यक है कि कन्या पूजन और व्रत - पारण संबंधित होने पर भी अलग - अलग क्रियाएँ हैं।
कन्या पूजन किस दिन करना है और पारण किस दिन करना है, इसका निर्णय संबंधित व्रत - विधान के अनुसार होना चाहिए।
हवन करना हो तो विधिपूर्वक करें ;
नवरात्रि के समापन पर अनेक भक्त हवन करते हैं।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के पाँचवें स्कन्ध के अध्याय 34 में मंत्रों के साथ हवन करने तथा देवी को आहुति अर्पित करने का वर्णन मिलता है।
हवन करने का संकल्प लिया है तो निर्धारित विधि का पालन करें ;
नवरात्रि में हवन का विशेष महत्त्व माना जाता है।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के पाँचवें स्कन्ध के चौंतीसवें अध्याय में देवी की पूजा के बाद मंत्रों के साथ हवन करने का वर्णन मिलता है।
श्लोक 30 में कहा गया है—
एवं सम्पूजनं कृत्वा होमं मन्त्रविधानतः।
अष्टम्यां वा नवम्यां वा कारयेद्विधिपूर्वकम्॥ ३०॥
इस का भावार्थ है कि इस प्रकार देवी की पूजा पूर्ण करके अष्टमी या नवमी को मंत्र-विधान के अनुसार हवन करना चाहिए।
इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि इस विशेष विधान में हवन के लिए अष्टमी और नवमी का उल्लेख किया गया है।
यदि आपने हवन का संकल्प लिया है, तो अपनी परंपरा के अनुसार आवश्यक सामग्री, मंत्र और विधि का पालन करें।
मंत्रों के सही उच्चारण तथा आहुति-विधि के विषय में संदेह हो तो किसी जानकार आचार्य से मार्गदर्शन लें।
यह दावा करना उचित नहीं होगा कि हर भक्त को समान मात्रा में सामग्री, समान संख्या में आहुतियाँ या एक ही प्रकार का विस्तृत हवन करना अनिवार्य है।
अनुष्ठान का स्वरूप संबंधित विधि और साधक की परिस्थिति के अनुसार समझना चाहिए।
यदि आपने नवरात्रि में हवन का संकल्प लिया है, तो अपनी परंपरा के अनुसार योग्य आचार्य से विधि समझकर हवन करें।
मंत्र, आहुति - सामग्री और अनुष्ठान का क्रम निर्धारित पद्धति के अनुसार रखें।
हवन करने में असमर्थ होने पर अपनी परिस्थिति को ध्यान में रखकर व्रत - विधान के बारे में जानकार आचार्य से परामर्श किया जा सकता है।
यह दावा करना सही नहीं होगा कि प्रत्येक भक्त को हर परिस्थिति में एक ही प्रकार का विस्तृत हवन करना अनिवार्य है।
शास्त्रीय संदर्भ: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 34, श्लोक 13–14 तथा आगे का पूजा - विधान।
जिन लोगों के यहां अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन करते हैं और हवन या विशेष पूजा करने की परंपरा है, वहां इन अनुष्ठानों को अपनी निर्धारित विधि के अनुसार ही करें।
ब्राह्मण भोजन, दान और दक्षिणा अपनी सामर्थ्य के अनुसार दें ;
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के नवरात्रि - विधान में पूजा के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, सामग्री और दान देने का उल्लेख मिलता है।
दान का उद्देश्य श्रद्धा, सेवा और सत्कर्म है।
इस लिए किसी व्यक्ति को अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करने के लिए बाध्य नहीं समझना चाहिए।
ब्राह्मण भोजन और दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करें ;
नवरात्रि के समापन पर ब्राह्मण भोजन और दान की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 34, श्लोक 31 में ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद पारण तथा श्रद्धा के साथ यथाशक्ति दान देने का निर्देश है।
यहाँ यथाशक्ति का अर्थ है अपनी सामर्थ्य के अनुसार।
धार्मिक अनुष्ठान करते समय अपनी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए।
यदि आपके व्रत-विधान में ब्राह्मण भोजन या दक्षिणा निर्धारित है, तो उसे अपनी क्षमता के अनुसार पूरा करें।
किसी को दिखाने के लिए कर्ज लेकर दान करना या अपनी आवश्यकताओं की उपेक्षा करना इस श्लोक में दिए गए यथाशक्ति भाव के अनुरूप नहीं है।
दान का उद्देश्य श्रद्धा और सेवा की भावना से सत्कर्म करना है।
इस लिए जो व्यक्ति अधिक खर्च करने में असमर्थ है, वह अपनी स्थिति के अनुसार भोजन, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तु का दान कर सकता है।
यहाँ ध्यान रहे कि शास्त्र में वर्णित किसी विशेष कर्म को सभी परिस्थितियों में अनिवार्य घोषित करने से पहले उसके मूल संदर्भ और संबंधित व्रत - पद्धति को देखना चाहिए।
यदि आपने अपने संकल्प में ब्राह्मण भोजन, दक्षिणा या दान का नियम लिया है, तो उसे अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूरा करें।
किसी जरूरतमंद को भोजन देना अथवा यथाशक्ति सहायता करना भी सेवा की भावना से किया गया कार्य है;
लेकिन किसी विशिष्ट दान को सभी परिस्थितियों में अनिवार्य बताने से पहले उसके स्पष्ट शास्त्रीय आधार को देखना चाहिए।
शास्त्रीय संदर्भ: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, स्कन्ध 3, अध्याय 26 तथा स्कन्ध 5, अध्याय 34।
ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री के अनुसार, व्रत खोलने से पहले मां दुर्गा को प्रणाम करें और इसके बाद अपनी श्रद्धा के अनुसार, पूजा अर्चना करें।
मां दुर्गा को सबसे पहले पुष्प अर्पित करें, फिर फल और प्रसाद आदि अर्पित करें।
पूजा के अंत में आरती करें और परिवार की सुख समृद्धि और स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करें।
पारण में जल्दबाजी न करें और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें ;
व्रत खोलने का अर्थ उपवास की अवधि पूर्ण होने के बाद भोजन ग्रहण करना है।
इस लिए पारण करते समय अपने संकल्प के साथ - साथ अपनी शारीरिक स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए।
यदि आपने कई दिनों तक फलाहार किया है या लंबे समय तक भोजन नहीं किया है, तो एकदम बहुत अधिक भोजन करने के बजाय अपनी सुविधा के अनुसार सामान्य और सुपाच्य भोजन से शुरुआत करना व्यावहारिक रूप से उचित है।
व्रत के दौरान पर्याप्त पानी पीने की अनुमति आपकी व्रत - पद्धति में हो तो उसका पालन करें।
यदि आपने निर्जल व्रत रखा है, तो पारण के समय अपनी शारीरिक स्थिति पर ध्यान दें।
बीमारी, अत्यधिक कमजोरी, नियमित दवाओं या अन्य स्वास्थ्य - संबंधी परिस्थितियों में कठोर उपवास करने से पहले चिकित्सक से सलाह लेना उचित है।
धार्मिक नियमों का पालन करते हुए शरीर की सुरक्षा की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
यहाँ स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि हल्का भोजन लेने और स्वास्थ्य का ध्यान रखने की सलाह व्यावहारिक सावधानी है; इसे श्रीमद् देवी भागवत का शब्दशः निर्देश नहीं बताया जा रहा है।
इसी प्रकार, पारण में कौन - सा भोजन पहले ग्रहण करना है, कौन - सी सामग्री वर्जित है या कौन - सा भोजन अनिवार्य है, इसका निर्णय अपने व्रत के विशिष्ट नियमों और प्रचलित परंपरा के अनुसार करें।
व्रत का पारण करते समय केवल दिन देखकर निर्णय न करें।
यदि आपके व्रत में किसी विशेष तिथि, पूजा या अनुष्ठान की समाप्ति के बाद पारण का नियम है, तो उस क्रम का पालन करें।
पारण के समय हल्का और सुपाच्य भोजन लेना व्यावहारिक रूप से उचित है।
लंबे समय तक उपवास करने के बाद एकदम बहुत अधिक भोजन करना असुविधा पैदा कर सकता है।
निर्जल व्रत या कठोर उपवास प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता।
बीमारी, कमजोरी, नियमित दवाइयों या अन्य स्वास्थ्य - संबंधी परिस्थितियों में कठोर उपवास करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लें।
धार्मिक संकल्प का पालन करते समय शरीर की सुरक्षा की उपेक्षा न करें।
व्रत का स्वरूप अपनी क्षमता और निर्धारित परंपरा के अनुसार रखें।
यह स्वास्थ्य - संबंधी सावधानी है; इसे श्रीमद् देवी भागवत का कोई विशिष्ट श्लोक बताकर प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।
नवरात्रि का व्रत खोलते समय अपनी व्रत परंपरा के अनुसार, सात्विक भोजन करें।
व्रत का पारण करने के लिए हल्का भोजन करें।
नौ दिन का उपवास करने के बाद अचानक से बहुत ज्यादा भोजन न करें।
अधिक मात्रा में भोजन करने से बचें।
शुरुआत थोड़ी मात्रा में हल्के भोजन से करें।
बहुत अधिक तला - भुना और मसालेदार भोजन शुरुआत में असहजता पैदा कर सकता है।
पारण से पहले तिथि और अपने व्रत के संकल्प की पुष्टि करें ;
नवरात्रि के पारण में तिथि का निर्णय महत्त्वपूर्ण है।
केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख देखकर व्रत खोलने का समय निर्धारित करना हमेशा पर्याप्त नहीं होता।
हिंदू पंचांग में तिथि की गणना सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर होती है।
इस लिए अष्टमी, नवमी और दशमी की तिथि का आरंभ तथा समाप्ति हर वर्ष एक ही समय पर नहीं होता।
नवरात्रि के पारण में तिथि का निर्णय महत्त्वपूर्ण है।
अष्टमी, नवमी और दशमी का आरंभ तथा समाप्ति सूर्योदय के साथ हमेशा एक ही प्रकार से नहीं होता।
इस लिए केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख देखकर पारण का निर्णय करना उचित नहीं है।
अपने क्षेत्र के पंचांग में संबंधित तिथि, उसके समाप्त होने का समय और प्रचलित व्रत - विधान देखें।
यदि तिथि के विषय में संदेह हो, तो जानकार आचार्य से परामर्श करें।
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यहाँ दो बातों में अंतर समझना जरूरी है:
- तिथि का निर्णय: स्थानीय पंचांग और संबंधित धार्मिक पद्धति के आधार पर किया जाता है।
- पारण का नियम: आपने कौन - सा व्रत रखा है और उस व्रत की मान्य विधि क्या है, इसके आधार पर निर्धारित किया जाता है।
केवल यह कहना कि सभी भक्तों को नवमी या दशमी को ही पारण करना चाहिए, प्रत्येक व्रत - पद्धति के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं है।
नवरात्रि व्रत का समापन पर अपने सामर्थ्य के अनुसार, जरुरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र, फल आदि का दान जरूर करें।
दान को सेवा और परोपकार से जोड़कर देखा जाता है।
इस बात का ख्याल रखें कि दान करते समय विनम्रता और दूसरों की जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए।
यदि आपका व्रत दशमी - पारण के विधान पर आधारित है, तो स्थानीय पंचांग में दशमी तिथि और अपने क्षेत्र के लिए निर्धारित धार्मिक समय की जाँच करें।
यदि आप अष्टमी या नवमी को पारण करने वाली परंपरा का पालन करते हैं, तो उस पद्धति के नियमों के अनुसार तिथि का निर्णय करें।
यहाँ दो बातों का अंतर स्पष्ट रखना चाहिए—
- पंचांग का कार्य: संबंधित तिथि और स्थानीय समय की जानकारी देना।
- व्रत-विधान का कार्य: यह बताना कि विशेष व्रत में पूजा, हवन, कन्या पूजन और पारण किस क्रम से किए जाएँ।
पंचांग में तिथि की जानकारी मिलना और किसी व्रत के लिए पारण का नियम निर्धारित होना दो अलग बातें हैं।
दोनों को समझकर निर्णय लेना चाहिए।
यदि आपके परिवार में लंबे समय से किसी विशेष व्रत - पद्धति का पालन होता आया है, तो केवल दूसरे व्यक्ति की सलाह पर उसे बदलने के बजाय शास्त्रीय संदर्भ सहित जानकार आचार्य से परामर्श करें।
नवरात्रि व्रत खोलने की संक्षिप्त विधि ;
उपरोक्त शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर व्रत खोलने से पहले इन बातों का ध्यान रखा जा सकता है—
1. अपने व्रत के संकल्प और निर्धारित पूजा-पद्धति की पुष्टि करें।
2. माता भगवती की पूजा तथा निर्धारित जप या पाठ पूर्ण करें।
3. अपने विधान के अनुसार अष्टमी या नवमी को हवन करें, यदि हवन संकल्पित है।
4. निर्धारित परंपरा के अनुसार कन्या पूजन करें।
5. ब्राह्मण भोजन और दान का विधान हो तो उसे अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूरा करें।
6. अपने व्रत के नियम के अनुसार पारण की तिथि निश्चित करें।
7. पारण के बाद भी माता भगवती के प्रति श्रद्धा और सात्त्विक आचरण बनाए रखें।
यह सूची सभी व्रत - पद्धतियों के लिए एक समान अनिवार्य क्रम नहीं है।
यह श्रीमद् देवी भागवत में वर्णित प्रमुख धार्मिक क्रियाओं और पारण से पहले ध्यान रखने योग्य बातों का संक्षिप्त सार है।
ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री के अनुसार, नवरात्रि व्रत का उद्देश्य केवल भोजन से परहेज करना नहीं है बल्कि श्रद्धा, संयम, और साधना से भी जुड़ा है।
व्रत का समापन करते समय भी मन को सकारात्मक रखें।
मां दुर्गा की आराधना के साथ दूसरों के प्रति सम्मान और करुणा का व्यवहार करना भी महत्वपूर्ण है।
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शास्त्रीय प्रमाण: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण में पारण का नियम ;
इस विषय का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रत्यक्ष संदर्भ श्रीमद् देवी भागवत महापुराण का पाँचवाँ स्कन्ध, चौंतीसवाँ अध्याय है।
इस अध्याय में श्लोक 13 में नवरात्रि उपवास, श्लोक 14 में हवन, श्लोक 30 में अष्टमी या नवमी को हवन और श्लोक 31 में ब्राह्मण भोजन के बाद दशमी को पारण तथा यथाशक्ति दान का उल्लेख है।
मूल संस्कृत पाठ के लिए ये संदर्भ देखे जा सकते हैं—
- श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 34: { इसी अध्याय का हिंदी पाठ: }
इन संदर्भों को पढ़ते समय ध्यान रखें कि अलग - अलग संस्करणों में अनुवाद और श्लोकों की प्रस्तुति में अंतर हो सकता है।
इस लिए किसी श्लोक को शब्दशः उद्धृत करते समय मूल संस्कृत पाठ से मिलान करना चाहिए।
निष्कर्ष ;
नवरात्रि व्रत का उद्देश्य माता भगवती की श्रद्धापूर्वक उपासना करना है।
व्रत खोलने से पहले पूजा, संकल्प, हवन, कन्या पूजन, भोजन और दान के नियमों को समझना आवश्यक है।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के पाँचवें स्कन्ध के चौंतीसवें अध्याय में वर्णित विधान के अनुसार अष्टमी या नवमी को हवन, ब्राह्मण भोजन और दशमी को पारण का स्पष्ट संदर्भ मिलता है।
साथ ही यथाशक्ति दान का निर्देश भी दिया गया है।
इस लिए इस ग्रंथ के उक्त विधान का पालन करने वाले भक्तों को दशमी-पारण के संदर्भ को विशेष रूप से समझना चाहिए।
दूसरी व्रत-पद्धतियों में अष्टमी या नवमी को पारण करने की परंपरा हो सकती है; ऐसे में संबंधित संकल्प, धर्मशास्त्रीय नियम और स्थानीय पंचांग का विचार करना चाहिए।
माता भगवती सभी भक्तों को सद्बुद्धि, श्रद्धा और सत्कर्म की प्रेरणा दें।
सभी के जीवन में सुख, शांति और मंगल हो। हर हर महादेव हर...!! जय माताजी 🙏
!!!!! शुभमस्तु !!!
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