सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
परमात्माके प्रत्येक विधानमें उनकी दयाका अनुभव करो ;
परमात्माके प्रत्येक विधानमें उनकी दयाका अनुभव करो ;
वेद, महापुराण एवं उपपुराणों की शास्त्रोक्त दृष्टि से एक सच्चा आध्यात्मिक विवेचन ;
एक धर्मात्मा और ज्ञानी राजा थे।
अपनी प्रजापर उनकी स्वाभाविक ही बड़ी भारी दया थी, किंतु सब लोग इस बातको नहीं जानते थे।
वे अपने मन्त्रिमण्डल और गुप्तचरोंद्वारा अपनी असहाय और दीन - दुखी प्रजाकी हर समय खबर रखा करते थे और सबको यथायोग्य सहायता पहुँचाया करते थे।
Mahabala Brass Gold Plated Lord Shivji for Statue Decorative Car Dashboard, 6 cm
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| { Theme | Idol |
| Brand | Saubhagya Global |
| Colour | Yellow |
| Style | Traditional |
| Material | Earthenware |
| Occasion | All Season |
| Product Dimensions | 5L x 2W x 6.5H Centimeters |
| Cartoon Character | Home decor |
| Specific Uses For Product | Indoor |
| Age Range (Description) } | All Ages |
{ About this item
- Quality Assurance: This Religious/ Vastu Idol is durable & long lasting Shine 23 k Gold Plating. It is easily cleanable by wet/dry cotton cloth.
- Size: Length-5cm, Width-2.0cm, Height-6.5cm Weight:47gms
- Use: This Decorative Murti can be used as Pooja Mandir interior decoration accessories / table decor items/ showcase decoration/ car dashboard showpiece.
- A Positive Impact: As per Vastu mythology, religious spiritual idols showpieces placed in north east direction of drawing/ living & pooja room, brings Health, Wealth, Peace & Happiness among members of the home Like Mother, Father, Husband, Wife, Brother, Sister, Son, Daughter & Friend.
- A Perfect Gift: It is a Best Gift for Marriage Anniversary, Parents, Mothers day, Wedding Return Gift, Birthdays, House warming, Office/ Shop Inauguration, Festive occasions-Like Diwali, Gruh-pravesh & Corporate Gifts. }
उनकी राजधानीमें एक क्षत्रिय बालक रहता था, जो बहुत ही सुशील, सदाचारी, बुद्धिमान् और चतुर था तथा राजामें उसकी भक्ति थी।
सनातन वैदिक दर्शन में परमात्मा की दया का अर्थ केवल यह नहीं है कि मनुष्य को उसकी इच्छा के अनुसार सुख, धन, सफलता या सुविधा मिल जाए।
परमात्मा की दया का वास्तविक अर्थ है—
जीव को उसके कर्म, धर्म, ज्ञान, विवेक, आत्मशुद्धि और अंततः परम सत्य की ओर ले जाने वाली व्यवस्था।
इस लिए शास्त्रों की दृष्टि से जीवन में आने वाली प्रत्येक परिस्थिति को केवल “सुख” अथवा “दुःख” के रूप में देखना पूर्ण दृष्टि नहीं है।
कभी प्राप्ति में अनुग्रह दिखाई देता है, कभी अप्राप्ति में संरक्षण, कभी विलम्ब में शिक्षा, कभी बाधा में सावधानी, कभी दुःख में कर्मफल की अनुभूति और कभी उसी दुःख से भीतर जागने वाला वैराग्य परमात्मा की कृपा का माध्यम बन सकता है।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय सावधानी आवश्यक है—
हर घटना को मनमाने ढंग से “भगवान की दया” घोषित करना शास्त्रोक्त प्रमाण नहीं है।
वेद और पुराण कर्म, धर्म, ऋत, दैवी व्यवस्था, पुरुषार्थ और ईश्वर-कृपा—
इन सबको परस्पर जोड़कर देखते हैं।
उसके माता-पिता उसे छोटी अवस्थामें ही छोड़कर चल बसे थे।
उस बालकने अपने माता - पितासे सुनकर पहलेसे ही यह समझ रखा था कि हमारे राजा बड़े ही दयालु और अनाथरक्षक हैं।
इस लिये जब माता - पिता मरे, तब उसे जितनी चिन्ता होनी चाहिये थी, उतनी नहीं हुई।
ऋग्वेद में दया—अपराध के बाद भी क्षमा की प्रार्थना ;
चारों वेदों में ऋग्वेद परमात्मा की दया के अनुभव का अत्यंत गंभीर आधार प्रस्तुत करता है।
वरुणदेव से की गई प्रार्थनाओं में मनुष्य अपने अपराध, भूल और दुर्बलता को स्वीकार करके क्षमा की याचना करता है।
ऋग्वेद 7.89 में प्रार्थना है—
“मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं...”
और उसी सूक्त में वरुण से कहा गया है कि मनुष्य से अज्ञान अथवा दुर्बलता के कारण जो भूल हुई हो, उसके लिए उसे क्षमा मिले।
सूक्त में बार - बार “क्षमा करो, बचाओ” की भावना प्रकट होती है।
इसका आध्यात्मिक अर्थ बहुत सीधा है।
मनुष्य से भूल हो सकती है।
कर्मफल की व्यवस्था है, परंतु वैदिक साधना मनुष्य को निराशा में नहीं छोड़ती।
वह उसे कहती है—
अपराध स्वीकार करो, सत्य की ओर लौटो और दैवी व्यवस्था की शरण लो।
अर्थात् परमात्मा की दया का पहला अनुभव यह हो सकता है कि मनुष्य को अपनी भूल दिखाई देने लगे।
जिसे अपनी गलती ही दिखाई नहीं देती, उसमें सुधार की शुरुआत कठिन है।
परंतु जब अंतःकरण कहता है—
“मैंने गलत किया”—
तो वही पश्चात्ताप आध्यात्मिक परिवर्तन का द्वार बन सकता है।
इस लिए दुःख में केवल यह पूछना कि “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ?”
पर्याप्त नहीं है। कभी यह भी पूछना चाहिए—
“इस परिस्थिति से मुझे क्या सीखना है ?”
यही वैदिक आत्मपरीक्षण है।
वह समझता था कि दयालु राजा आप ही मेरी व्यवस्था कर देंगे।
वह बालक स्कूलमें पढ़ता था।
उसके सहपाठियोंने उसे अनाथ होनेपर भी निश्चिन्त देखकर पूछा कि ' तुम्हारे माता - पिता तो मर गये, अब तुम्हारा निर्वाह कैसे होगा ?'
लड़केने उत्तर दिया कि हमारे राजा बड़े दयालु हैं, वे स्वयं ही सारी व्यवस्था कर देंगे।
यह बात गुप्तचरोंके द्वारा राजाके कानतक पहुँची।
यजुर्वेद—परमात्मा की व्यवस्था में शान्ति और समन्वय ;
यजुर्वेद में कर्म, यज्ञ, ऋत, धर्म और विश्वव्यवस्था का विशेष संबंध दिखाई देता है।
वैदिक दृष्टि में संसार अव्यवस्थित घटना-समूह मात्र नहीं है।
अग्नि, वायु, सूर्य, जल, पृथ्वी, आकाश और जीव—
सब एक व्यापक ऋत अर्थात् दैवी - सामंजस्य से जुड़े हैं।
प्रसिद्ध वैदिक शान्ति-मंत्र में कहा जाता है—
“द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः
पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः...”
अर्थात् आकाश, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियाँ, वनस्पतियाँ और समस्त जगत में शान्ति की कामना की जाती है।
यहाँ “दया” केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं है।
परमात्मा की कृपा का अनुभव समस्त सृष्टि के संतुलन में करना वैदिक दृष्टि है।
सूर्य समय पर उदित होता है, ऋतुएँ अपने क्रम से आती हैं, वर्षा जलचक्र को चलाती है, पृथ्वी जीवन को धारण करती है, वनस्पतियाँ पोषण देती हैं—
ये सब मनुष्य के व्यक्तिगत नियंत्रण से बाहर की व्यवस्थाएँ हैं।
इसलिए वैदिक मनुष्य केवल मांगता नहीं, कृतज्ञ भी होता है।
परमात्मा की दया को पहचानने का एक सरल मार्ग है—
जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, उसके लिए कृतज्ञ होना।
जो हमारे नियंत्रण में है, उसमें धर्मपूर्वक पुरुषार्थ करना।
यही संतुलन शास्त्रोक्त जीवन का महत्वपूर्ण आधार है।
राजाने मन्त्रियोंके द्वारा उसका पता लगाया।
मन्त्रियोंने कहा कि 'वह बालक बड़ा ही सुन्दर, सुशील, सदाचारी, धर्मात्मा, बुद्धिमान् और राजभक्त है।
उसके माता - पिता मर गये हैं, इस लिये इस समय वह सर्वथा अनाथ हो गया है।
अब उसे केवल आपका ही एकमात्र भरोसा है।'
सामवेद—परमात्मा की ओर उठती हुई प्रार्थना ;
सामवेद का स्वर ही उपासना, स्तुति और आध्यात्मिक भाव से जुड़ा हुआ है।
सामगान में वैदिक मंत्र केवल पढ़े नहीं जाते, बल्कि विशेष स्वर-विन्यास के साथ गाए जाते हैं।
इसका आध्यात्मिक संकेत यह है कि परमात्मा से संबंध केवल तर्क का विषय नहीं है।
श्रद्धा, उपासना, स्तुति और अंतःकरण की शुद्धि भी वैदिक साधना के अंग हैं।
जब मनुष्य प्रार्थना करता है, तब वह यह स्वीकार करता है कि—
“मैं सर्वशक्तिमान नहीं हूँ।”
यह स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विनम्रता है।
सामवेद की उपासना - दृष्टि हमें सिखाती है कि जीवन की प्रत्येक उपलब्धि को केवल अपने अहंकार की उपलब्धि न मानें।
मनुष्य पुरुषार्थ करता है, परंतु उसके पुरुषार्थ के लिए शरीर, प्राण, बुद्धि, अवसर, प्रकृति और समय—
इन सबका सहयोग पहले से उपलब्ध है।
इसलिए सफलता के समय अहंकार के स्थान पर कृतज्ञता परमात्मा की दया को पहचानने का मार्ग बनती है।
राजाने पूछा कि 'उसके लिये क्या प्रबन्ध किया जाय ?'
मन्त्रियोंने कहा 'जो सरकारकी इच्छा।'
राजाने उसके खान - पान और विद्याध्ययनके लिये प्रबन्ध करनेकी और रहनेके लिये मकान बनवा देनेकी आज्ञा दे दी।
अथर्ववेद—रक्षा, आरोग्य और संकट से उबारने की प्रार्थना ;
अथर्ववेद में जीवन के अनेक व्यावहारिक पक्षों से संबंधित मंत्र मिलते हैं—
आरोग्य, दीर्घायु, सुरक्षा, शान्ति और संकट से मुक्ति की प्रार्थनाएँ।
अथर्ववेद 7.42 में सोम और रुद्र से रोग तथा पाप से मुक्ति की प्रार्थना मिलती है।
वहाँ रोग को दूर करने और किए हुए दोष से मुक्ति की कामना की गई है।
अथर्ववेद में दीर्घायु और स्वास्थ्य की प्रार्थनाएँ भी हैं।
एक सूक्त में जीवन - शक्ति को पुनः प्राप्त करने और दीर्घ जीवन की कामना की गई है।
इससे एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है—
शास्त्र दुःख को देखकर केवल भाग्य को दोष देने की शिक्षा नहीं देता; वह उपचार, प्रार्थना, अनुशासन और संरक्षण—
सभी को स्वीकार करता है।
अर्थात् यदि रोग आया है तो चिकित्सा करना भी धर्मसम्मत है; प्रार्थना करना भी।
यदि संकट आया है तो सावधानी रखना भी आवश्यक है; ईश्वर-स्मरण भी।
परमात्मा की दया का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य कोई उपाय न करे और केवल चमत्कार की प्रतीक्षा करे।
पुरुषार्थ भी दैवी व्यवस्था का ही एक अंग है।
राजाकी इस उदारतासे मन्त्रीलोग बहुत प्रसन्न हुए।
यह बात जब उस बालकके कानोंतक पहुँची तो उसके आनन्दका पार ही नहीं रहा।
उसकी भक्ति राजामें और भी बढ़ गयी; साथ ही विश्वास भी दूना - चौगुना हो गया।
कर्म और परमात्मा की दया—दोनों को साथ समझना ;
शास्त्रीय दृष्टि में एक बहुत बड़ी भूल यह है कि मनुष्य प्रत्येक दुःख को भगवान का “दण्ड” और प्रत्येक सुख को भगवान का “पुरस्कार” समझ ले।
भगवद्गीता कर्म, प्रकृति और ईश्वर की उपस्थिति को साथ रखती है।
गीता 18.61 में भगवान कहते हैं—
“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति...”
अर्थात् ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं।
इसका अर्थ यह है कि परमात्मा जीव से दूर कोई बाहरी सत्ता मात्र नहीं हैं।
दैवी उपस्थिति जीव के अंतरतम से संबंधित है।
और गीता 18.62 में ईश्वर की शरण ग्रहण करने पर उनकी कृपा से परम शान्ति की बात आती है।
उसी अध्याय के अंत में 18.66 में भगवान कहते हैं—
“मामेकं शरणं व्रज...”
और भय न करने का आश्वासन देते हैं।
इस लिए परमात्मा की दया का सबसे ऊँचा रूप केवल सांसारिक सुविधा नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान, अशान्ति से शान्ति और अहंकार से शरणागति की ओर ले जाना है।
एक दिन जब वह लड़का स्कूलमें पढ़ रहा था,
श्रीमद्भागवत—दुःख में भी अनुकम्पा देखने की शिक्षा ;
श्रीमद्भागवत महापुराण में परमात्मा की अनुकम्पा का अत्यंत प्रसिद्ध प्रमाण 10.14.8 में मिलता है।
श्लोक है—
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥
यहाँ “अनुकम्पाम्” अर्थात् भगवान की करुणा / अनुकम्पा की प्रतीक्षा करने की बात आती है, जबकि जीव अपने कर्मों के परिणामों को सहन कर रहा है।
यह श्लोक अत्यंत गहरा है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर दुःख को जबरदस्ती अच्छा कह दिया जाए।
बल्कि यह सिखाता है कि साधक दुःख की स्थिति में भी भगवान से संबंध नहीं तोड़े।
अर्थात्—
दुःख आया → निराश मत हो।
कर्मफल है → उससे सीखो।
प्रार्थना करो → भीतर से टूटो मत।
धर्म छोड़ो मत → परमात्मा की अनुकम्पा पर विश्वास रखो।
यही भागवत की दृष्टि है।
तो उसके किसी प्रेमी सहपाठीने आकर दुखी मनसे कहा कि 'भैया! तुमसे ऐसा क्या अपराध हो गया है, जो राजाके सिपाही तुम्हारी झोपड़ी तुड़वा रहे हैं ?'
बालकने बहुत प्रसन्नतासे उत्तर दिया कि 'भाई! राजाकी मुझपर बड़ी भारी दया है।
गरुड़ पुराण—दया केवल भावना नहीं, आचरण भी है ;
गरुड़ पुराण में आचार, दान, सत्य, संयम और दया को धार्मिक जीवन से जोड़ा गया है।
गरुड़ पुराण के एक आचार-विवेचन में सत्य, दान, दया, विद्या, पूजा और दम आदि को श्रेष्ठ आचार के लक्षणों में गिना गया है।
इससे एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है—
जो व्यक्ति परमात्मा की दया चाहता है, उसे स्वयं भी दया का पात्र बनना चाहिए।
केवल पूजा करके बाहर निकलते ही निर्दयता करना शास्त्रीय साधना की पूर्णता नहीं है।
यदि परमात्मा सर्वभूतों में स्थित हैं, जैसा गीता कहती है, तो जीवमात्र के प्रति दया परमात्मा - भक्ति की स्वाभाविक परिणति होनी चाहिए।
इसीलिए—
दया → धर्म है।
सत्य → धर्म है।
दान → धर्म है।
संयम → धर्म है।
सेवा → धर्म है।
और इनका मूल उद्देश्य केवल बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धि है।
सम्भव है, वे झोपड़ीको तुड़वाकर मेरे लिये अच्छा मकान बनवा दें।'
यह बात भी गुप्तचरोंद्वारा राजातक पहुँची।
राजाका प्रेम लड़केके प्रति और भी बढ़ गया।
एक दिन राजाने अपने मन्त्रियोंसे पूछा कि 'आपलोग जानते हैं, मैं अब वृद्ध हो चला हूँ।
परमात्मा की दया का अर्थ मनुष्य की इच्छा पूरी करना नहीं ;
यह बात विशेष रूप से समझना आवश्यक है।
यदि कोई मनुष्य किसी वस्तु को चाहता है और वह वस्तु मिल जाती है, तो यह कहना सरल है—“भगवान ने दया की।”
लेकिन यदि वही वस्तु नहीं मिली तो क्या भगवान ने दया नहीं की?
शास्त्र ऐसा सरल गणित नहीं देता।
कभी प्राप्ति में कल्याण हो सकता है और कभी अप्राप्ति में भी।
कभी सफलता मनुष्य को धर्म से दूर कर सकती है और कभी असफलता उसे आत्मचिंतन की ओर मोड़ सकती है।
इस का अर्थ यह नहीं कि हर असफलता निश्चित रूप से भगवान की कृपा है।
ऐसा दावा शास्त्र से सिद्ध नहीं किया जा सकता।
सही शास्त्रीय दृष्टि यह है—
परिस्थिति जो भी हो, उसमें धर्म, विवेक, पुरुषार्थ और ईश्वर-स्मरण को बनाए रखना।
यही दया का अनुभव करने की साधना है।
मेरे कोई पुत्र नहीं है, इसलिये अब युवराजपद किसे दिया जाय ?
'मन्त्रियोंने कहा, 'जिसे सरकार योग्य समझें।'
राजाने कहा कि 'मैंने तो उस अनाथ क्षत्रिय बालकको, जिसकी आपलोग सदा प्रशंसा करते रहे हैं, इस पदके योग्य समझा है।
JD FRESH 3 Inch Adiyogi Statue with Rudraksh Mala/Resin Car Dashboard Idols/Lord Shiva for Pooja/Shivratri Gift/Decor/Shiv Murti/Mahadev Statues/Decorative Items for Home/Office (Black)
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| { Theme | Wedding |
| Brand | JD FRESH |
| Colour | Black |
| Style | Modern |
| Material | Resin |
| Occasion | Diwali, Friendship Day, Housewarming, Mother S Day, Wedding |
| Product Dimensions | 14L x 11W x 9H Centimeters |
| Cartoon Character | Shiva |
| Specific Uses For Product | car |
| Age Range (Description) } | Adult |
{ About this item
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परमात्मा की दया कर्मफल को नकारती नहीं ;
सनातन दर्शन में कर्म का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि मनुष्य अपने कर्मों के परिणामों को भोगता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि परमात्मा उससे दूर हो गए।
भागवत 10.14.8 का संदेश यही है कि मनुष्य अपने कर्मफल को सहते हुए भी भगवान की अनुकम्पा की ओर देख सकता है।
इसलिए जब जीवन में कठिन समय आए, तो तीन प्रश्न पूछे जा सकते हैं—
पहला—मैंने क्या कर्म किए हैं?
दूसरा—इस परिस्थिति में मेरा वर्तमान धर्म क्या है?
तीसरा—मैं इस स्थिति में परमात्मा को कैसे स्मरण करूँ?
यह तीनों प्रश्न मिलकर शास्त्रीय दृष्टि बनाते हैं।
आप लोगोंकी क्या सम्मति है?'
बस, इतना कहनेकी देर थी, तमाम मन्त्रियोंने एक स्वरमें कहा-'हाँ, सरकार, बड़ी अच्छी बात है।
वह कुमार बहुत ही सुन्दर, सुशील, सच्चरित्र, बुद्धिमान्, राजभक्त और धर्मात्मा है।
वह सब प्रकारसे युवराजपदके योग्य है।
हम लोगोंने भी उसीको इस पदके योग्य समझा है।'
दया का सबसे सूक्ष्म रूप—विवेक का जागना ;
परमात्मा की दया केवल बाहर दिखाई देने वाली घटना नहीं है।
कभी दया इस रूप में आती है कि—
गलत कार्य करते समय भीतर से आवाज आती है—“यह मत करो।”
किसी अन्याय के बाद अंतरात्मा बेचैन होती है।
अहंकार के बीच विनम्रता उत्पन्न होती है।
भोग के बीच वैराग्य उत्पन्न होता है।
क्रोध के बाद पश्चात्ताप आता है।
अज्ञान के बीच ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न होती है।
और सबसे महत्वपूर्ण—
मनुष्य को अपने भीतर परमात्मा की उपस्थिति का स्मरण होने लगता है।
गीता 18.61 में ईश्वर को सभी प्राणियों के हृदय में स्थित बताया गया है ।
इस लिए परमात्मा की दया का एक अत्यंत गहरा अनुभव यह हो सकता है कि मनुष्य अपने अंतःकरण को शुद्ध करने लगे।
सब की बात सुनकर राजाने उसे युवराज बनाना निश्चित कर लिया।
यह बात राज्यके उच्च पदाधिकारियोंको भी विदित हो गयी।
एक दिन कुछ बड़े - बड़े अफसर उस बालकके घर गये।
बालकने उनका बड़ा आदर - सत्कार किया।
अफसर बोले, 'आपपर महाराजा साहबकी बहुत भारी कृपा है।'
दया को पहचानने के शास्त्रोक्त संकेत ;
चारों वेदों और पुराणिक धर्म - दृष्टि को एक साथ देखने पर परमात्मा की दया को पहचानने के कुछ आध्यात्मिक संकेत स्पष्ट होते हैं—
१. धर्म की ओर लौटना
अधर्म छोड़कर सत्य और उचित कर्म की ओर मन जाना।
२. अपनी भूल स्वीकार करना
ऋग्वैदिक वरुण-प्रार्थना की तरह अपराध स्वीकार करके क्षमा माँगना ।
३. संकट में धैर्य
संकट आने पर धर्म और ईश्वर-स्मरण न छोड़ना।
४. पुरुषार्थ करना
रोग हो तो उपचार, आर्थिक समस्या हो तो उचित परिश्रम, मानसिक अशान्ति हो तो साधना और
आवश्यक सहायता—यानी कर्म से पलायन नहीं।
५. दया का आचरण
केवल भगवान से दया माँगना नहीं, बल्कि स्वयं भी प्राणिमात्र के प्रति करुणा रखना।
६. कृतज्ञता
जो मिला है उसे केवल अपना अधिकार न मानना।
७. अहंकार का क्षय
सफलता मिलने पर स्वयं को सर्वकर्ता न मानना।
८. शरणागति
जब मनुष्य अपनी सीमाओं को पहचानकर परमात्मा की शरण में जाता है, तब गीता का “मामेकं शरणं व्रज” जीवन का आध्यात्मिक आधार बनता है ।
क्षत्रियकुमारने कहा- 'मैं इस बातको भलीभाँति जानता हूँ कि सरकारकी मुझपर बड़ी भारी कृपा है, तभी तो उन्होंने मेरे भोजन, वस्त्र, पठन - पाठन और जमीन मकानका सब प्रबन्ध कर दिया है।'
अफसर बोले- 'इतना ही नहीं, आपपर महाराजा साहबकी बहुत भारी कृपा है, इतनी कृपा है कि जिसे आप कल्पनामें नहीं ला सकते।'
परमात्मा के विधान को समझने की अंतिम दृष्टि ;
परमात्मा का विधान मनुष्य की इच्छा से बड़ा है।
हम किसी घटना को केवल आज की दृष्टि से देखते हैं।
शास्त्र जीवन को कर्म, संस्कार, धर्म, आत्मा और मोक्ष की व्यापक दृष्टि से देखते हैं।
इस लिए प्रत्येक घटना को देखकर तुरंत यह निर्णय कर देना कि—
“यह भगवान की कृपा है”
या
“यह भगवान की नाराज़गी है”
हमेशा शास्त्रोक्त निष्कर्ष नहीं है।
इसके बजाय अधिक शुद्ध दृष्टि यह है—
“जो परिस्थिति सामने आई है, उसमें मेरा धर्म क्या है? मुझे क्या सीखना है?
कौन - सा कर्म सुधारना है ?
किस प्रकार ईश्वर का स्मरण बनाए रखना है ?”
यही दृष्टि मनुष्य को परिस्थितियों का दास बनने से बचाती है।
लड़का कहने लगा- 'क्या महाराजा साहबने मेरे विवाहका खर्च देना भी मंजूर कर लिया?'
अफसरोंने कहा- 'विवाह तो मामूली बात है, महाराजा साहबकी तो आपपर बहुत भारी दया है।'
बनाकर युवराजपदतक दे सकते हैं।
निष्कर्ष—परमात्मा की दया को बाहर नहीं, जीवन की सम्पूर्ण व्यवस्था में देखो
ऋग्वेद में मनुष्य अपनी भूल के लिए वरुण से क्षमा माँगता है।
यजुर्वेद की शान्ति-दृष्टि समस्त विश्व में संतुलन और मंगल की कामना करती है।
सामवेद उपासना और स्तुति के माध्यम से मनुष्य को दैवी सत्ता के प्रति समर्पित करता है।
अथर्ववेद रोग, संकट, भय और जीवन-सुरक्षा के लिए दैवी सहायता की प्रार्थना करता है।
श्रीमद्भागवत भगवान की “अनुकम्पा” को दुःख के बीच भी स्मरण करने की शिक्षा देता है।
गरुड़ पुराण सत्य, दान, दया और संयम को श्रेष्ठ आचार से जोड़ता है।
और भगवद्गीता ईश्वर को प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित बताकर अंततः शरणागति और परम शान्ति की ओर ले जाती है।
बालकने कहा- 'क्या महाराजा साहब मुझे दो-चार गाँव देना चाहते हैं ?'
अफसर बोल उठे- 'यह भी कुछ नहीं।'
बालकने पूछा- 'बतलाइये न, क्या महाराजा साहबने दस - बीस गाँवोंकी जागीर देनेका निश्चय किया है ?'
अफसर बोले- 'सरकारकी आपपर इससे भी बहुत अधिक दया है।'
बालकने कहा- 'मैं तो इसके आगे कुछ नहीं जानता, आप ही बताइये कि क्या बात है ?'
अफसरोंने कहा-'क्या कहें, हम सभी लोग सदा अपने ऊपर आपकी कृपा चाहते हैं।'
बालकने कहा- 'ऐसा न कहिये, मैं तो आप सबका सेवक हूँ, आपलोगोंकी कृपासे ही महाराजकी मुझपर कृपा हुई है; महाराजा साहबकी विशेष दयाकी बात बतलाइये।'
अफसरोंने कहा कि हमने तो आपको बता दिया कि हमलोग सदा आपकी कृपा चाहते हैं।
क्या आप हमारे कथनका अर्थ नहीं समझे ?'
कुमारने कहा-'कृपा करके स्पष्ट बतलाइये।'
इस लिए “परमात्मा के प्रत्येक विधान में उनकी दया का अनुभव करो” का शास्त्रोक्त अर्थ यह नहीं है कि जीवन में कभी दुःख आए ही नहीं।
इसका गहरा अर्थ है—
सुख आए तो अहंकार मत करो।
दुःख आए तो ईश्वर को मत छोड़ो।
भूल हो तो पश्चात्ताप करो।
कर्मफल आए तो धैर्य रखो।
संकट आए तो पुरुषार्थ करो।
सफलता मिले तो कृतज्ञ बनो।
अवसर मिले तो धर्म करो।
दया मिले तो दया बाँटो।
और प्रत्येक परिस्थिति में अपने अंतःकरण को परमात्मा की ओर मोड़ते रहो।
यही वह दृष्टि है जिसमें मनुष्य धीरे - धीरे समझता है कि परमात्मा की कृपा केवल मनचाही वस्तु प्राप्त हो जाने का नाम नहीं; बल्कि सत्य को पहचानने की बुद्धि, गलत से लौटने का साहस, दुःख में धैर्य, धर्म में स्थिरता, प्राणिमात्र के प्रति दया और अंततः परम सत्य की ओर जाने की प्रेरणा भी उसी अनुग्रह के रूप हैं।
वह बेचारा अनाथ बालक यह कल्पना भी कैसे करता कि महाराजा साहब मुझे अपने राज्यका उत्तराधिकारी अफसर बोल उठे-
'श्रीमान्ने आपको युवराज बनाया है।'
सुनते ही बालक आश्चर्यमें भरकर बोल उठा- 'युवराज बनाया है ?'
अफसरोंने कहा-'जी हाँ! युवराज बनाया है।'
अब बालकके आनन्दका पार नहीं रहा, वह आनन्दमुग्ध हो गया।
यह तो दृष्टान्त है।
इसे दाष्र्टान्त ( उदाहरणके रूप ) में इस प्रकार घटाना चाहिये।
यहाँ भगवान् राजा हैं, साधक क्षत्रिय बालक है।
भगवद्भक्ति ही राजभक्ति है, साधकका 'योगक्षेम' ही खान - पान - मकान आदि व्यवस्था है।
भगवत्प्राप्त पुरुष ही मन्त्री हैं।
दैवीसम्पदाप्राप्त मुमुक्षु पुरुष ऊँचे अफसर हैं और भक्त शिरोमणि कारक - पुरुषोंका सर्वोच्च पद ही युवराजपद है।
इस प्रकार जो साधक परमपिता परमात्माकी असीम दयाका अनुभवकर उसके प्रत्येक विधानमें पद पदपर आह्लादित होता रहता है, वह इस अविनाशी युवराजपदका अधिकारी बन जाता है।
“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे...” — परमात्मा सभी के हृदय में स्थित हैं।
अतः परमात्मा की दया को केवल बाहर घटने वाली घटनाओं में मत खोजो—
अपने भीतर जागते हुए सत्य, विवेक, करुणा, क्षमा, धर्म, भक्ति और शरणागति में भी उसका अनुभव करो।
*यही वेद-पुराणसम्मत आध्यात्मिक दृष्टि है।* जय श्री कृष्ण....!!!
!!!!! शुभमस्तु !!!
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