सनातन विश्व हिंदू धार्मिक अनुसार चार वेदों अठार पुराण अनुसार हिंदी गुजराती भाषा का ब्लॉग पोस्ट
।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।जब ईश्वर ही टूटी हुई चीज से बहुत सुन्दरता से काम लेता है! बादल टूटते हैं तो बारिश होती है !
।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।
।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।
‼️राम कृपा ही केवलम्‼️
❗संतों से समझा❗
Vivo V60 5G (Mist Gray, 8GB RAM, 256GB Storage) with No Cost EMI/Additional Exchange Offers
यहां सच्चे झूठ आरोप सदा लगते ही रहते हैं।
!! फूटा घड़ा !!
।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।। किसी भक्त ने एक बार तुलसीदास जी......
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।
*।।श्री राम: शरणं मम।।*
किसी भक्त ने एक बार तुलसीदास जी महाराजश्री से पूछा कि अंत:करण चतुष्टय में भगवान की उपस्थिति कैसे संभव है ?
सहज रूप से तुलसीदास जी महाराजश्री ने उत्तर देते हुए कहा देखो.......!
*मन* जब बार-बार भगवान की लीलाओं का चिंतन करने की इच्छा करे और संसार की अनिच्छा करे तो समझो मन में भगवान है।
*बुद्धि* जब भगवान के कार्यों की सुसमीक्षा में लगकर सुख लेने लगे और उन्हीं का समर्थन करने लगे तो समझ लो बुद्धि भगवदाकार हो चुकी है।
*चित्त* रूपी घर साफ सुथरा होकर भगवान का आश्रय बन जाये अर्थात भगवान को चित्त से निकलने की इच्छा ही ना हो तो समझ लो कि भगवान चित्त में निवास कर चुके हैं।
खासकर तब जब हमारे चित्त में दूसरे के रहने की जगह ही ना हो।
चित्त के स्वामी भगवान अंदर रहे और दुर्गुण दुर्विचार रूपी अनाधिकारी प्रवेश न करने पाये, तब चित्त में भगवान के होने का प्रमाण बनता है।
*अहंकार* का आधार जब केवल यह रह जाये कि मैं अपने प्रभु का सेवक हूं और मेरे ठाकुर जी मेरे स्वामी है तो यह अहं भक्त को विकृत नहीं होने देता है।
और इसको संक्षेप में ऐसे समझ लो कि यदि अंत:करण के इन चार कमरों में से एक में भी साधक इमानदारी से सच्चा हो जाये, तो फिर चारों में भगवान अपने आप कब्जा कर लेते हैं और साधक धन्य हो जाता है।
जय श्री राम राम राम....!!!
+++ +++
अग्नि की उत्पत्ति कथा तथा वेद एवं पुराणों में माहात्म्य :
एक समय पार्वती ने शिवजी से पूछा कि हे देव! आप जिस अग्नि देव की उपासना करते हैं उस देव के बारे में कुछ परिचय दीजिये।
शिवजी ने उत्तर देना स्वीकार किया।
तब पार्वती ने पूछा कि यह अग्नि किस महिने, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र त तथा लग्न में उत्पन्न हुई है।
+++ +++
श्री महादेवजी ने कहा-आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की आध्धी रात्रि में मीन लग्न की चतुर्दशी तिथि में शनिवार तथा रोहिणी नक्षत्र में ऊपर मुख किये हुए सर्वप्रथम पाताल से दृष्ट होती हुई अगोचर नाम्धारी यह अग्नि प्रगट हुई।
उस महान अग्नि के माता-पिता कौन है? गौत्र क्या है?
तथा कितनी जिह्वा से प्रगट होती है?
+++ +++
श्री महादेवजी ने कहा-वन से उत्पन्न हुई सूखी आम्रादि की समिधा लकड़ी ही इस अग्नि देव की माता है क्योंकि लकड़ी में स्वाभाविक रूप से अग्नि रहती है , जलाने पर अग्नि के संयोग से अग्नि प्रगट होती है, अग्निदेव अरणस के गर्भ से ही प्रगट होती है इसलिये लकड़ी ही माता है तथा वन को उत्पन्न करने वाला जल होता है इसलिये जल ही इसका पिता है।
शाण्डिल्य ही जिसका गोत्र है।
ऐसे गोत्र तथा विशेषणों वाली वनस्पति की पुत्री यह अग्नि देव इस धरती पर प्रगट हुई जो तेजोमय होकर सभी को प्रकाशित करती हुई उष्णता प्रदान करती है।
+++ +++
इस प्रत्यक्ष अग्नि देव के अग्निष्टोमादि चार प्रधान यज्ञ जो चारों वेदों में वर्णित है वही शृंग अर्थात् श्रेष्ठता है।
इस महादेव अग्नि के भूत, भविष्य वर्तमान ये तीन चरण हैं।
इन तीनों कालों में यह विद्यमान रहती है।
इह लौकिक पार लौकिक इन दो तरह की ऊंचाइयों को छूनेवाली यह परम अग्नि सात वारों में सामान्य रूप से हवन करने योग्य है क्योंकि ग्रह नक्षत्रों से यह उपर है...!
इस लिये इन सातों हाथों से यह आहुति ग्रहण कर लेती है तथा मृत्युलोक, स्वर्ग लोक पाताल लोक इन तीनों लोकों में ही बराबर बनी रहती है अर्थात् तीनों लोक इस अग्नि से ही बंध्धे हुऐ स्थिर है।
जिस प्रकार से मदमस्त वृषभ ध्वनि करता है उसी प्रकार से जब यह घृतादि आहुति से जब यह अग्नि प्रसन्न हो जाती है तो यह भी दिव्य ध्वनि करती है।
इन विशेषणों से युक्त अग्नि देवता महान कल्याणकारी रूप धारण करके हमारे मृत्यु लोकस्थ प्राणियों में प्रवेश करे जिससे हम तेजस्वी हो सकें और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।
+++ +++
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जिस अग्नि ने उदर में समाहित कर रखा है, वह विश्वरूपा अग्नि देवी है जिसके उदर में प्रलयकालीन में सभी जीव शयन करते हैं तथा उत्पत्ति काल में भी सभी ओर से अग्नि वेष्टित है।
उसकी ही परछाया से जगत आच्छादित है तथा जैसा गीता में कहा है अहं वैश्वानरो भूत्वा‘‘ अर्थात् यह अग्नि ही सर्वोपरि देव है।
जिस अग्नि के बारह आदित्य यानि सूर्य ही बारह नेत्र है।
उसके द्वारा सम्पूर्ण जगत को देखती है।
सात इनकी जिह्वाएं जैसे काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता , सुध्धूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी , विश्वरूपी इन सातों जिह्वाओं द्वारा ही सम्पूर्ण आहुति को ग्रहण करती है।
+++ +++
इस महान अग्नि देव के ये सात प्रिय भोजन सामग्री है।
जिसमें सर्व प्रथम घी, , दूसरा यव , तीसरा तिल, चौथा दही, पांचवां खीर, छठा श्री खंड, सातवीं मिठाई यही हवनीय सामग्री है जिसे अग्नि देव अति आनन्द से सातों जिह्वाओं द्वारा ग्रहण करते है।
+++ +++
भजन करने वाले ऋत्विक जन की यह अग्नि चाहे ऊध्ध्र्वमुखी हो चाहे अध्धोमुखी हो अथवा सामने मुख वाली हो हर स्थिति में सहायता ही करती है तथा इस अग्निदेव में प्रेम पूर्वक ‘‘स्वाहा‘‘ कहकर दी हुई मिष्ठान्नादि आहुति महा विष्णु के मुख में प्रवेश करती है अर्थात् महा विष्णु प्रेम पूर्वक ग्रहण करते हैं जिससे सम्पूर्ण देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीनों देवता तृप्त हो जाते हैं।
इन्हीं देवों को प्रसन्न करने का एक मात्र साधन यही है।
पुराणों में अग्नि का महात्म्य :
अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं।
ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं।
सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।
+++ +++
वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है।
अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व - साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है।
ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार - बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है।
+++ +++
आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे - आगे चलते हैं।
युद्ध में सेनापति का काम करते हैं इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था।
+++ +++
पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं।
ये सब देवताओं के मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हीं के द्वारा देवताओं तक पहुँचती है।
केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं।
इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती हैं।
ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में अग्नि की प्रार्थना करते हुए विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अग्निदेवता की स्तुति करता हूँ, जो सभी यज्ञों के पुरोहित कहे गये हैं।
पुरोहित राजा का सर्वप्रथम आचार्य होता है और वह उसके समस्त अभीष्ट को सिद्ध करता है।
उसी प्रकार अग्निदेव भी यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
+++ +++
अग्निदेव की सात जिह्वाएँ बतायी गयी हैं।
उन जिह्वाओं के नाम : - काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णी, स्फुलिंगी तथा विश्वरुचि हैं।
पुराणों के अनुसार अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए।
इनके पुत्र-पौत्रों की संख्या उनंचास है।
भगवान कार्तिकेय को अग्निदेवता का भी पुत्र माना गया है।
स्वारोचिष नामक द्वितीय स्थान पर परिगणित हैं।
ये आग्नेय कोण के अधिपति हैं।
अग्नि नामक प्रसिद्ध पुराण के ये ही वक्ता हैं।
प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर इनका मुख्य तीर्थ है।
इन्हीं के समीप भगवान कार्तिकेय, श्राद्धदेव तथा गौओं के भी तीर्थ हैं।
+++ +++
अग्निदेव की कृपा के पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं।
उनमें से कुछ इस प्रकार हैं।
महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा माँगने का निवेदन किया।
गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुण्डल माँगा।
उत्तंक ने महाराज के पास पहुँचकर उनकी आज्ञा से महारानी से कुण्डल प्राप्त किया।
रानी ने कुण्डल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुण्डलों को सावधानी से ले जाइयेगा, नहीं तो तक्षक नाग कुण्डल आप से छीन लेगा।
मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुण्डलों को लेकर पाताल में चला गया।
+++ +++
अग्निदेव की कृपा से ही उत्तंक दुबारा कुण्डल प्राप्त करके गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे।
अग्निदेव ने ही अपनी ब्रह्मचारी भक्त उपकोशल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था।
अग्नि की प्रार्थना उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त करता है।
उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है।
+++ +++
अग्निदेव का बीजमन्त्र रं तथा मुख्य मन्त्र रं वह्निचैतन्याय नम: है।
ऋग्वेद के अनुसार,अग्निदेव अपने यजमान पर वैसे ही कृपा करते हैं, जैसे राजा सर्वगुणसम्पन्न वीर पुरुष का सम्मान करता है।
एक बार अग्नि अपने हाथों में अन्न धारण करके गुफा में बैठ गए।
अत: सब देवता बहुत भयभीत हुए।
अमर देवताओं ने अग्नि का महत्व ठीक से नहीं पहचाना था।
+++ +++
वे थके पैरों से चलते हुए ध्यान में लगे हुए अग्नि के पास पहुँचे।
मरुतों ने तीन वर्षों तक अग्नि की स्तुति की।
अंगिरा ने मंत्रों द्वारा अग्नि की स्तुति तथा पणि नामक असुर को नाद से ही नष्ट कर डाला।
देवताओं ने जांघ के बल बैठकर अग्निदेव की पूजा की।
अंगिरा ने यज्ञाग्नि धारण करके अग्नि को ही साधना का लक्ष्य बनाया।
+++ +++
तदनन्तर आकाश में ज्योतिस्वरूप सूर्य और ध्वजस्वरूप किरणों की प्राप्ति हुई।
देवताओं ने अग्नि में अवस्थित इक्कीस गूढ़ पद प्राप्त कर अपनी रक्षा की।
अग्नि और सोम ने युद्ध में बृसय की सन्तान नष्ट कर डाली तथा पणि की गौएं हर लीं।
अग्नि के अश्वों का नाम रोहित तथा रथ का नाम धूमकेतु है।
!!!!! शुभमस्तु !!!
+++ +++
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85 Web: Sarswatijyotish.com
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
+++ +++
।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।
*"मैं न होता तो क्या होता”*
अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्हों ने देखा मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर वे गदगद हो गये।
वे सोचने लगे।
Vivo V60 5G (Mist Gray, 8GB RAM, 256GB Storage) with No Cost EMI/Additional Exchange Offers
Visit the vivo Store https://amzn.to/4nWdzi1
यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो सीता जी को कौन बचाता???
बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मै न होता तो क्या होता ?
परन्तु ये क्या हुआ सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं।
आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है की उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है।
अब उन्हें क्या करना चाहिए?
जो प्रभु इच्छा।
जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है।
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !
इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...
*मै न होता तो क्या होता*🙏🙏🙏जय श्री राम!!💐💐💐
बहू ने बुजुर्ग को पेंशन न मिलने पर घर से निकाला!
अगले ही दिन बुर्जुग ने जो किया...!
सर्दियों की हल्की ठंड थी।
सुबह का उजाला अभी - अभी फैलना शुरू हुआ था।
शहर के किनारे बसे एक पुराने मोहल्ले में एक छोटा सा घर था, जिसमें रहते थे 78 वर्षीय राम प्रसाद शर्मा, उनका बेटा मनोज और बहू सीमा।
साथ में दो छोटे-छोटे पोते भी थे। राम प्रसाद का चेहरा झुर्रियों से भरा था, पर उनकी आंखों में एक गहरी शांति और गरिमा थी।
उनकी चाल धीमी थी, मगर हर कदम में एक सलीका था।
वे अपने छोटे से पेंशन पर ही गुजारा करते थे।
महीने की शुरुआत में जो रकम आती, उसका एक हिस्सा बच्चों के लिए चॉकलेट या छोटी-छोटी चीजें खरीदने में खर्च हो जाता और बाकी घर के खर्च में दे देते।
खुद के लिए बस जरूरत भर का।
पर इस बार किस्मत ने अजीब मोड़ लिया।
पेंशन आने की तारीख बीत गई, लेकिन रकम खाते में नहीं आई।
राम प्रसाद ने सोचा शायद एक-दो दिन में आ जाएगी, इसलिए किसी को बताया नहीं।
लेकिन जब सीमा को बैंक से पैसे ना मिलने की बात पता चली तो उसके लहजे में बदलाव आने लगा।
वह दिन भर चाय का कप जोर से मेज पर रखती, मनोज जो पास ही अखबार पढ़ रहा था, चुप रहता।
उसने न पिता का साथ दिया, न पत्नी को रोका।
शाम तक ताने और कड़वे शब्द बढ़ते गए। सीमा ने पोते-पोतियों के सामने कहा, अब तो इनके आने का भी कोई मतलब नहीं।
महीने की पेंशन भी नहीं आ रही।
बस घर में बोझ बनकर बैठे हैं।
राम प्रसाद चुपचाप सुनते रहे।
उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बस एक गहरी चुप्पी थी, जैसे मन में कुछ तय कर लिया हो।
एक रात की चुप्पी और एक फैसला-
रात को जब सब सो चुके थे, राम प्रसाद ने अपनी पुरानी कपड़े की थैली निकाली, जिसमें बस दो-तीन जोड़ी कपड़े, एक पुराना रजाई का कवर और एक छोटा फोटो एलबम था।
पोते की पुरानी ड्राइंग कॉपी भी उसमें रखी थी, जिसमें बच्चे ने लिखा था, मैं तुमसे प्यार करता हूं, दादा जी।
उन्होंने थैली कंधे पर डाली, दरवाजा खोला और बाहर निकल गए।ठंडी हवा चली, पर उनके कदम स्थिर थे।
सुबह तक किसी ने ध्यान नहीं दिया।
जब सीमा ने देखा कि राम प्रसाद बिस्तर पर नहीं हैं तो उसने मनोज से कहा, कहीं अपने किसी रिश्तेदार के यहां चले गए होंगे।
अच्छा ही है, थोड़ी राहत मिल जाएगी।”
मनोज बस चुपचाप सिर झुका कर बैठा रहा।
सुबह की अफरातफरी-
अगली सुबह मोहल्ले की गली में अचानक अफरातफरी मच गई।
दूर से गाड़ियों के हॉर्न सुनाई देने लगे।
पड़ोसी खिड़कियों से झांकने लगे।
देखते ही देखते गली में एक लंबा सरकारी काफिला दाखिल हुआ।
काले रंग की ऐसी हुई, दो पुलिस जीप और पीछे मीडिया वैन।
गाड़ियां घर के सामने आकर रुकीं। पुलिस अफसरों ने चारों तरफ घेरा बना लिया।
दरवाजा खुला और पहले बाहर उतरे दो सफेद शर्ट और काले कोट पहने अधिकारी।
उनके पीछे राम प्रसाद शर्मा थे।
मगर यह वही साधारण कपड़ों में झुके कंधों वाले बुजुर्ग नहीं थे।
आज उन्होंने ग्रे रंग का सिलवाया हुआ सूट पहना था।
गले में नेशनल सर्विस का बैज चमक रहा था।
जूतों में चमक थी और चाल सीधी, आत्मविश्वास से भरी हुई।
सीमा के हाथ से चाय का कप गिर गया।
मनोज दरवाजे पर जम सा गया।
पड़ोसी काफूसी करने लगे, अरे यह तो कोई बड़े अफसर लग रहे हैं।
क्या यह वही शर्मा जी हैं जो यहां चुपचाप रहते थे?
राम प्रसाद ने ऊपर देखा।
घर की बालकनी में सीमा खड़ी थी, चेहरा पीला पड़ चुका था।
मनोज ने नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं की।
भीड़ की फुसफुसाहट और कैमरों की फ्लैश के बीच राम प्रसाद ने गहरी सांस ली।
अब उनकी कहानी, उनका सच और उनकी चुप्पी टूटने वाली थी।
सच का पर्दाफाश-
गली में हलचल बढ़ चुकी थी।
पत्रकार माइक्रोफोन लेकर आगे बढ़े।
कैमरे चालू हो गए।
लोग अपने-अपने घरों से निकल कर देखने लगे।
आखिर यह माजरा क्या है?राम प्रसाद ने बिना किसी जल्दबाजी के घर के दरवाजे की ओर कदम बढ़ाए।
उनके पीछे एक सीनियर पुलिस अफसर चल रहा था जो बार-बार झुककर उनसे कुछ कह रहा था।
सीमा दरवाजे पर खड़ी थी, हाथ कांप रहे थे।
राम प्रसाद ने चुप्पी तोड़ी, मनोज, पता है मैं कल रात कहां था?मनोज ने धीमे स्वर में कहा, नहीं, बाबूजी।
मैं गया था जिला कलेक्टर के दफ्तर।
पेंशन रुकी क्यों?
यह देखने।
वहां पता चला कि विभाग में रिश्वतखोरी हो रही है।
पैसे देने वालों की फाइलें पहले पास होती हैं, बाकियों को महीनों लटकाया जाता है।
उनकी आवाज स्थिर थी, लेकिन हर शब्द में एक ठंडा गुस्सा था।
भीड़ खामोश होकर सुन रही थी।
मैंने खुद जाकर सबूत इकट्ठा किए और फिर आज सुबह मुख्य सचिव और मीडिया को बुलाकर यहां लाया ताकि उन्हें दिखा सकूं कि जो इंसान पेंशन के लिए भटक रहा था, वह कोई मजबूर बुजुर्ग नहीं बल्कि वही अफसर है जिसने इस राज्य की कई योजनाएं शुरू की थीं।
सीमा के पैर कांप गए। वह सोचने लगी कि वह कितनी गलत थी।
परिवार की टूटती दीवारें राम प्रसाद ने सीमा की तरफ देखा और कहा, लेकिन जो सबसे बड़ा घाव दिया वह यह था कि तुमने मुझे बच्चों की नजरों में गिरा दिया।
उनके शब्द तीर की तरह चुभे।
पत्रकारों ने सवाल करने शुरू किए, सर, क्या आप कार्यवाही करवाएंगे?
क्या आप भ्रष्ट अफसरों को सस्पेंड कराएंगे?राम प्रसाद ने कहा, न्याय जरूर होगा और शुरुआत मैं अपने ही घर से करूंगा।
क्योंकि सम्मान की शिक्षा घर से मिलती है।
अगर घर में ही बुजुर्गों का अपमान हो तो समाज में क्या उम्मीद करेंगे?
भीड़ में हलचल मच गई।
सीमा के आंसू निकल पड़े, लेकिन इस बार राम प्रसाद का चेहरा कठोर था।
उन्होंने पुलिस अफसर की ओर इशारा किया, “चलो अब दफ्तर चलते हैं।
रिपोर्ट दर्ज करनी है।
राम प्रसाद खड़े हुए और जैसे ही बाहर निकले, कैमरों की फ्लैश फिर से चमक उठी।
गली में हर कोई सोच रहा था, इस आदमी ने कल तक चुपचाप अपमान सहा और आज पूरे सिस्टम को हिला दिया।
असली सच का खुलासा हुआ दफ्तर पहुंचते ही मीडिया और अफसर पीछे हट गए।
अब कमरे में बस राम प्रसाद, कलेक्टर और कुछ भरोसेमंद अधिकारी बैठे थे।कलेक्टर ने धीरे से कहा, सर, आप चाहे तो इन मामलों को सीधा मंत्रालय भेज सकते हैं।
आपके पास सबूत भी हैं और अधिकार भी।
राम प्रसाद ने कुर्सी पर टिकते हुए गहरी सांस ली, मुझे पता है, लेकिन यह सिर्फ कागज का मामला नहीं है।
यह इंसानियत का मामला है।
जिस विभाग का काम बुजुर्गों की सेवा करना है, वहीं अगर उनका शोषण हो, तो यह मेरी आत्मा को चोट पहुंचाता है।
कलेक्टर चुप हो गए।
थोड़ी देर की खामोशी के बाद उनके एक पुराने साथी शर्मा जी जो विशेष रूप से मिलने आए थे, धीरे से बोले, राम प्रसाद जी, अब तो आप रिटायर हो चुके हैं।
इतनी मेहनत, इतनी गुप्त जांच, आखिर क्यों?
राम प्रसाद ने उनकी ओर देखा और आवाज धीमी कर दी, क्योंकि मैंने अपनी मां को इसी सिस्टम के हाथों मरते देखा है।
कमरे का माहौल ठंडा पड़ गया।
मेरी मां विधवा थी।
पेंशन उनका हक थी।
लेकिन महीनों तक उन्हें सिर्फ टालमटोल और बेइज्जती मिली।
उन्होंने कभी रिश्वत नहीं दी और एक दिन लाइनों में खड़े- खड़े धूप में गिर पड़ी।
फिर कभी उठी ही नहीं।
उसी दिन मैंने कसम खाई थी कि अपने पद का इस्तेमाल सिर्फ कागजी आदेशों के लिए नहीं करूंगा बल्कि इस सिस्टम को इंसानियत सिखाने के लिए करूंगा।
कलेक्टर की आंखें भर आईं।
शर्मा जी ने धीमे स्वर में कहा, तो इस लिए आप रिटायर होने के बाद भी साधारण कपड़ों में छोटे से घर में चुपचाप रह रहे थे।
राम प्रसाद ने सिर हिलाया, हां।
असली चेहरा तभी दिखता है जब सामने वाला सोचता है कि तुम बेबस हो।
मैं जानबूझकर साधारण जीवन जीता रहा ताकि देख सकूं आज भी इस देश में इंसानियत बची है या नहीं।
इसी दौरान बाहर से एक कांस्टेबल आया, सर, घर से मैडम और उनके पति आए हैं।
मिलने की इजाजत चाहिए।
राम प्रसाद ने गहरी सांस ली, बुला लो।
दरवाजा खुला और सीमा अंदर आई।
पीछे-पीछे मनोज।
दोनों के चेहरे पर शर्म और पछतावा साफ था।
सीमा ने आते ही पैरों में गिरते हुए कहा,बाबूजी, मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी।
मुझे माफ कर दीजिए।
उस वक्त बस गुस्से में मैं नहीं समझ पाई कि आपने हमारे लिए कितनी कुर्बानियां दी हैं।
राम प्रसाद ने उसे उठाया, लेकिन चेहरे पर सख्ती बरकरार थी, गलती इंसान से होती है, लेकिन बुजुर्ग का अपमान गलती नहीं, चरित्र का आईना होता है।
मैंने जो सिखाना था, वह आज तुम्हें और इस पूरे मोहल्ले को सिखा दिया है।
मनोज की आंखें झुकी थीं।
उसने धीमे स्वर में कहा, बाबूजी, मैं आपका बेटा होकर भी आपके साथ खड़ा नहीं हुआ।
आज जिंदगी भर उस शर्म के साथ जीना पड़ेगा।राम प्रसाद ने बस इतना कहा, अगर सच में शर्म है तो इसे बदल दो।
अपने घर से,अपने बच्चों से शुरू करो ताकि अगली पीढ़ी सीख सके।
बुजुर्ग बोझ नहीं होते, वरदान होते हैं।
सीमा और मनोज चुपचाप सिर हिलाते रहे।
जाते-जाते राम प्रसाद ने कलेक्टर से कहा, इन अफसरों पर सख्त कार्रवाई करो।
और हां, पेंशन विभाग में एक नया नियम लागू करना।
जो भी बुजुर्ग पेंशन के लिए आए, उसे बैठाकर चाय पिलाओ।
यह कानून से बड़ा आदेश होगा।
इंसानियत का आदेश।
कमरे में सन्नाटा था, लेकिन उस सन्नाटे में एक अजीब सी गरिमा थी।
अंत में राम प्रसाद उठकर बाहर निकले।
बाहर बारिश रुक चुकी थी और गली के लोग उनके लिए ताली बजा रहे थे।
लेकिन उनके कदम भारी थे क्योंकि वह जानते थे असली लड़ाई अभी भी जारी थी।
|| जय श्री राम!! ||
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
।। चलो आज कीर्तन करने के लिये ।। बाल गोपाल की दी हुई जिंदगी। नेह अपनत्व पूरित भई बन्दगी।।01।।
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। चलो आज कीर्तन करने के लिये ।।
बाल गोपाल की दी हुई जिंदगी।
नेह अपनत्व पूरित भई बन्दगी।।01।।
मैंनें कीड़े-मकोडों को जाना नहीं-
बाल गोपाल की हो गई बन्दगी।।02।।
बाल गोपाल की नित्य करुणा मिली-
सत्य में दूर मन की गई गंदगी।।03।।
बन गए श्याम जबसे हमारे सखा-
बाल गोपाल बस माँगती जिंदगी।।04।।
मेरा गोपाल मुझको दिखता है पथ-
फँस भँवर में अगर भटकती जिंदगी।।05।।
मित्रवर नंद के बाल गोपाल से-
स्नेह अविराम ही माँगती ज़िन्दगी।।06।।
अष्टपल सत्य में रात दिन बंधुवर-
बाल गोपाल प्रिय सोचती ज़िन्दगी।।07।।
बाल गोपाल से प्रीति जिनको नहीं-
उनकी काहे की कैसी रही ज़िन्दगी।।08।।
जबसे प्रभु में मन को रमाया 'राधिके'-
तबसे ही बन गयी कीर्तन मेरी ज़िन्दगी।।09।।
जय जय श्री कृष्ण
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
*गीतावली रामायण*
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
🌹 *जय श्री राम*🌹
*गीतावली रामायण*
*चारू चौक बैठत भई भूप भामिनी सोहै।*
*गोद मोद मूरति लिए सुकृती जन जोहै।।*
Amazon Basics True Wireless in Ear Earbuds with Mic, Up to 36 Hours Play Time, Low-Latency Gaming Mode, IPX4 Water-Resistance, Bluetooth 5.4 (Black)
Visit the amazon basics Store https://amzn.to/3JEnTgB
*भावार्थ*👉श्री तुलसीदास जी कहते है कि सुन्दर चौको में बैठी हुई रानियाँ गोद में आनन्द मूर्ति बालकों को लिए अति शोभायमान हो २ही है पु०यवान लोग उन्हें देख रहे है।।
।।१४।।
*जय श्री कृष्ण.......*
*जय जय श्री सीताराम*
*जय जय श्री राधे*
🌸🙏🌸
|| गीता में जाति का वर्णन ||
जन्मना मन्यते जातिः कर्मणा मन्यते कृतिः ।
तस्मात् स्वकीयकर्तव्यं पालनीयं प्रयत्नतः ।।
ऊँच-नीच योनियों में जितने भी शरीर मिलते हैं, वे सब गुण और कर्म के अनुसार ही मिलते हैं।
गुण और कर्म के अनुसार ही मनुष्य का जन्म होता है।
भगवान् ने गीता में कहा है कि प्राणियों के गुणों और कर्मों के अनुसार ही मैंने चारों वर्णों- ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ) की रचना की है-
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः
अतः गीता जन्म- ( उत्पत्ति ) से ही जाति मानती है अर्थात् जो मनुष्य जिस वर्ण में जिस जाति के माता - पिता से पैदा हुआ है, उसी से उसकी जाति मानी जाती है, जाति’ शब्द जनी प्रादुर्भावे’ धातु से बनता है, इस लिए जन्म से ही जाति मानी जाती है, कर्म से नहीं।
कर्म से तो कृति’ होती है,जो कृ धातु से बनती है।
परंतु जाति की पूर्ण रक्षा उसके अनुसार कर्तव्य कर्म करने से ही होती है।
भगवान् ने जन्म के अऩुसार ही
कर्मों का विभाग किया है।
मनुष्य जिस वर्ण- ( जाति ) में जन्मा है और शास्त्रों ने उस वर्ण के लिए जिन कर्मों का विधान किया है, वे कर्म उस वर्ण के लिए ‘स्वधर्म’ हैं और उन्हीं कर्मों का जिस वर्ण के लिए निषेध किया है, उस वर्ण के लिए वे कर्म परधर्म’ हैं।
जैसे, यज्ञ कराना, दान लेना आदि कर्म ब्राह्मण के लिए शास्त्र की आज्ञा होने से ‘स्वधर्म’ हैं परंतु वे ही कर्म क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के लिए शास्त्र का निषेध होने से ‘परधर्म’ हैं।
स्वधर्म का पालन करते हुए यदि मनुष्य मर जाय, तो भी उसका कल्याण ही होता है परंतु पर धर्म दूसरों के कर्तव्य कर्म का आचरण जन्म मृत्यु रूप भय को देने वाला है।
अर्जुन क्षत्रिय थे अतः युद्ध करना उनका स्वधर्म है।
इस लिए भगवान् उनके लिए बड़े स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि क्षत्रिय के लिए सिवाय युद्ध और कोई कल्याणकारक काम नहीं है अगर तू इस धर्ममय युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति का त्याग करके पाप को प्राप्त होगा भगवान् ने गीता में अपने - अपने वर्ण के अनुसार कर्तव्य - कर्म करने पर बहुत जोर देकर कहा है कि निष्कामभाव से अपने - अपने कर्तव्य कर्म में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेता है;
अपने कर्मों के द्वारा परमात्मा का पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
परमात्मा का पूजन पवित्र वस्तु से
होता है, अपवित्र वस्तु से नहीं।
अपना कर्म ही पवित्र वस्तु है और दूसरों का कर्म अपने लिए ( निषिद्ध होने से ) अपवित्र वस्तु है।
अतः अपने कर्म से परमात्मा का पूजन करने से ही कल्याण होता है और दूसरों के कर्म से पतन होता है।
अपने कर्म ( स्वकर्म ) को भगवान् ने ‘सहज कर्म’ कहा है।
सहज कर्म का अर्थ है-
साथ में पैदा हुआ।
जैसे, कोई क्षत्रिय के घर में पैदा हुआ तो क्षत्रिय के कर्म भी उसके साथ ही पैदा हो गये।
अतः क्षत्रिय के कर्म उसके लिए सहज कर्म हैं।
भगवान् ने भी चारों वर्णों के सहज, स्वभावज कर्मों का विधान किया है।
इन स्वभावज कर्मों को करता हुआ मनुष्य पाप का भागी नहीं होता।
जैसे, स्वतः प्राप्त हुए न्याययुक्त युद्ध में मनुष्यों की हत्या होती है, पर शास्त्रविहित सजह कर्म होने से क्षत्रिय को पाप नहीं लगता।
मनुष्य जिस जाति में पैदा हुआ है, उसके अनुसार शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म करने से उस जाति की रक्षा हो जाती है और विपरीत कर्म करने से उस जाति में कर्म संकर होकर वर्णसंकर पैदा हो जाता है।
भगवान् ने भी अपने लिए कहा है कि यदि मैं अपने वर्ण के अनुसार कर्तव्य का पालन न करूँ तो मैं वर्णसंकर पैदा करने वाला तथा संपूर्ण प्रजा का नाश ( पतन ) करने वाला बनूँ।
अतः जो मनुष्य अपने वर्ण के अनुसार कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इंद्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला और पापमय जीवन बिताने वाला मनुष्य संसार में व्यर्थ ही जीता है।
सभी मनुष्यों को चाहिए कि वे अपने - अपने कर्तव्य कर्मों के द्वारा अपनी जाति की रक्षा करें।
इस के लिए पाँच बातों का ख्याल रखना जरूरी है-
1-विवाह-
कन्या को लेना और देना अपनी जाति में ही होना चाहिए क्योंकि दूसरी जाति की कन्या लेने से रज - वीर्य की विकृति के कारण उनकी संतानों में विकृति ( वर्णसंकरता ) आयेगी।
विकृत संतानों में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा नहीं होगी।
श्रद्धा न होने से वे उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध- तर्पण नहीं करेंगे, उनको पिंड पानी नहीं देंगे।
कभी लोक - लज्जा में आकर दे भी देंगे, तो भी वह श्राद्ध तर्पण, पिंड पानी पितरों को मिलेगा नहीं।
इस से पितर लोग अपने स्थान से गिर जाएंगे।
गीता कहती है कि जो शास्त्र विधि को छोड़कर मनमाने ढंग से कर्म करता है, उसे न तो अंतः करण की शुद्धिरूप सिद्धि मिलती है न सुख मिलता है और न परमगति की प्राप्ति ही होती है।
अतः मनुष्य को कर्तव्य अकर्तव्य के विषय में शास्त्र को ही सामने रखना चाहिए।
2- भोजन-
भोजन भी अपनी जाति के अनुसार ही होना चाहिए।
जैसे ब्राह्मण के लिए लहसुन, प्याज खाना दोष है परंतु शूद्र के लिए लहसुन, प्याज खाना दोष नहीं है।
यदि हम दूसरी जाति वाले के साथ भोजन करेंगे तो अपनी शुद्धि तो उनमें जाएगी नहीं, पर उनकी अशुद्धि अपने में जरूर आ जाएगी।
अतः मनुष्य को अपनी जाति के अनुसार ही भोजन करना चाहिए।
3-वेशभूषा-
पाश्चात्य देश का अनुकरण करने से आज अपनी जाति की वेशभूषा प्रायः भ्रष्ट हो गयी है।
प्रायः सभी जातियों की वेशभूषा में दोष आ गया है, जिससे ‘कौन किस जाति का है’-
इस का पता ही नहीं लगता।
अतः मनुष्य को अपनी जाति के अनुसार ही वेशभूषा रखनी चाहिए।
4. भाषा-
अन्य भाषाओं को, लिपियों को सीखना दोष नहीं है, पर उनके अनुसार स्वयं भी बन जाना बड़ा भारी दोष है।
जैसे अंग्रेज़ी सीखकर अपनी वेशभूषा, खान - पान, रहन - सहन अंग्रेजों का ही बना लेना उस भाषा को लेना नहीं है, प्रत्युत अपने - आपको खो देना है।
अपनी वेशभूषा, खान- पान, रहन - सहन वैसे का वैसा रखते हुए ही अंग्रेजी सीखना अंग्रेजी भाषा एवं लिपि को लेना है।
अतः अन्य भाषाओं का ज्ञान होने पर भी बोलचाल अपनी भाषा में ही होनी चाहिए।
5- व्यवसाय-
व्यवसाय ( काम - धंधा ) भी अपनी जाति के अनुसार ही होना चाहिए।
गीता ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए अलग - अलग कर्मों का विधान किया है।
|| जय श्री कृष्ण जी ||
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोप...
-
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोप...
-
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोप...
-
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोप...




