सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
परम अर्थ 🌷🌷🌷🌷
परम अर्थ
भगवान कृष्ण ने गीता के द्वारा जो संदेश दिया है , उसमे पूरा प्रेम , पूरा ज्ञान भरा हुवा है !
उसमे कर्म प्रेरणा भरी हुई है !
गीता में चित्त का समाधान कैसे हो इस का सुंदर मार्गदर्शन किया है !
किसी बात पर ज्यादा जोर नहीं कोई आग्रह नहीं यह है गीता की खासियत !
जीवन के लिये जो जरूरी बातें है जैसे , भक्ति , ज्ञान , गुण विकास , यज्ञ , दान , तप , चित्तशुध्ही , समाज सेवा , लोकसंग्रह , और जीवन मरण समस्यां !
इन सब बातों का समाधान गीता बतातीं है !
मनुष्य जीवन पर सर्वाधिक उपकार गीता ग्रंथ का है !
राम हरी
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|| "ब्रज रस धारा " ||
हरीराम व्यास'जी जिन्होंने राजा को
दिव्य वृंदावन के स्वरुप का दर्शन कराया ।
व्यास जी ओरछा नरेश 'मधुकरशाह' के 'राजगुरु' थे।
और 'गौड़ संप्रदाय'के वैष्णव थे।
ये संस्कृत के शास्त्रार्थी पंडित थे और सदा शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार रहते एक बार जब ये वृंदावन आये और गोस्वामी हितहरिवंश जी को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा।
गोसाईं जी ने नम्र भाव से यह पद कहा -
यह जो एक मन बहुत ठौर करि कहि कौनै सचु पायो।
जहँ तहँ बिपति जार जुवती ज्यों प्रगट पिंगला गायोयह पद सुनकर व्यास जी चेत गए और हितहरिवंश जी के अनन्य भक्त हो गए।
और हितहरिवंश जी के शिष्य होकर राधावल्ल भी हो गए।
और मन में ठान लिया कि वृंदावन छोड़कर अन्यत्र कही भी कदम तक नहीं रखेगे।
वृन्दावन में जिस प्रकार'निधि वनराज 'स्वामी श्रीहरिदासजी की साधना स्थली है, श्रीहित हरिवंश महाप्रभुजी की 'सेवा कुंज 'साधना स्थली है, उसी प्रकार बनखण्डी से लोई बाजार जाते हुए सेवाकुंज के दक्षिण भाग से लगा‘किशोर वन’रसिक संत श्रीहरिराम व्यासजी की साधना स्थली है।
हरि हम कब हवै हैं ब्रजवासीय।
ठाकुर नन्दकिशोर हमारे, ठकुराइन राधा सी।
कब मिलि हैं वे सखी सहैली, हरिवंशी हरिदासी।
वंशीवट की शीतल छैंया,सुभग नदी यमुना सी।
इतनी आस व्यास की पुजवौ, वृन्दा विपिन विलासी।।
जब ओरछा नरेश मधुकर शाह इन्हें लेने आये, तो इन्होने मना कर दिया।
कि हम वृंदावन छोड़कर अन्यत्र नहीं जायेगे।
तब उन्होंने प्रश्न किया गुरुदेव!
ऐसी कौन - सी विशेषता है वृंदावन में ?
ये मै मानता हूँ कि ये धाम है, पर भजन तो कही भी रहकर किया जा सकता है ना ?
आप चलिए आपके भजन में कोई व्यवधान नहीं डालेगा।
तब हरिराम व्यास जी ने उत्तर दिया - श्री धाम वृंदावन का समय स्वरुप यहाँ प्रकट है।
इस लिए मै एक कदम भी बाहर नहीं निकाल सकता ।
राजा बोले -गुरुदेव !
यदि कृपा हो जाए तो दास को भी उस चिन्मय,रसमय दिव्य स्वरुप के दर्शन करा दीजिये।
तब व्यास जी ने राजा के सिर पर हाथ रखा, और फिर नरेश की तो मानो द्रष्टि ही बदल गई, दिव्य वृंदावन के साक्षात् दर्शन होने लगे, यही नहीं नित्य बिहार करते श्यामा - श्याम के परिकर सहित दर्शन हो गए,एक पल में ही सब कुछ बदल गया।
कहाँ तो गुरु जी को ले जाने के लिए आये थे, अब कह रहे है, कि मुझे राज्य से कोई काम नहीं मै अब वृंदावन से नहीं जाऊँगा।
अब तो बड़ी समस्या हो गयी,राजा ही जब वैरागी हो गया तो राज्य कैसे चलेगा,सबने गुरुदेव से प्रार्थना करि, गुरुदेव ने मधुकर शाह को आशीर्वाद देते हुए कहा राजन! जाओ तुम जहाँ तक जाओगे तुम्हे कभी वृंदावन का वियोग नहीं होगा यहाँ से लेकर तुम्हारे राज्य तक वृंदावन का स्वरुप तुम्हारे लिए प्रकट रहेगा,सच है गुरुदेव क्या नहीं कर सकते।
इस प्रकार संत ने व्रज की महिमा प्रकट की ।
|| वृन्दावन धाम की जय हो ||
॥ भगवद् चिन्तन ॥
|| कर्म से भाग्य निर्माण ||
🕉 कर्म ही हमारे भाग्य के निर्माता होते हैं।
सदैव अच्छा करो और निश्चिंत हो जाओ क्योंकि समय लग सकता है, लेकिन आपने फूलों का बीज बोया है तो आपके आंगन में फूल ही खिलने वाले हैं।
वर्तमान के अच्छे - बुरे कर्म ही भविष्य में हमारे भाग्य का निर्धारण करने वाले हैं।
परमात्मा से कभी शिकायत मत किया करो क्योंकि आप अभी इतने समझदार नहीं हुए कि उसके इरादे समझ सकें।
🕉 यदि उस ईश्वर ने आपकी झोली खाली की है तो चिंता मत करना क्योंकि शायद वह पहले से कुछ बेहतर उसमें डालना चाहता है।
आपके पास समय हो तो उसे दूसरों के भाग्य को सराहने में न लगाकर स्वयं के भाग्य को सुधारने में लगाओ।
परमात्मा भाग्य का चित्र अवश्य बनाता है, लेकिन उसमें कर्म रूपी रंग तो हमारे द्वारा स्वयं ही भरा जाता है। श्रेष्ठ कर्म ही श्रेष्ठ भाग्य का निर्माण करते हैं।
🙏🌹 जय श्री कृष्ण 🌹🙏
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥
भावार्थ:
सभी प्रकार के संग्रह का अंत क्षय है।
बहुत ऊंचे चढ़ने के अंत नीचे गिरना है।
संयोग का अंत वियोग है और जीवन का अंत मरण है।
भगवद् चिंतन :
|| उपेक्षा नहीं सहयोग करें ||
🌞 दूसरों के प्रति उपेक्षा का नहीं सहयोग का भाव रखें।
यदि दूसरों के लिये जीना सीखो तो दूसरे भी आपके लिये जीने लग जायेंगे।
आपके द्वारा की गई उपेक्षा किसी के जीवन को विषादग्रस्त बना देती है इस लिए दूसरों की उपेक्षा करने से सदैव बचना चाहिए।
वृक्ष भी फल तब ही दे पाते हैं, जब आप उनकी अच्छे से परवरिश करते हैं।
जिस दिन आपके मन में उनके लिए उपेक्षा का भाव आ जायेगा तो वो भी आपको अपनी शीतल छाया और मधुर फलों से वंचित कर देंगें।
🌞 दूसरों की उपेक्षा करने की अपेक्षा दूसरों का सहयोग करना आपको अधिक मानवीय बनाता है।
जब तक आपका जीवन परोपकार और परमार्थ में संलग्न रहेगा तब तक आपकी प्रतिष्ठा और उपयोगिता दोनों बनी रहेगी क्योंकि परमार्थ ही प्रतिष्ठा को जन्म देता है।
आप दूसरों के लिए अच्छा सोचो, आप दूसरों के लिए जीना सीखो, आप दूसरों के लिए सहयोगी बनो, लाखों होंठ प्रतिदिन आपके लिए प्रार्थना करने को आतुर रहेंगे।
भगवान विष्णु को श्रीहरि' कहे जाने का रहस्य :
भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनहार,जगदीश,लक्ष्मीपति, जगत पिता जैसे उपनामों से भी जाना जाता है।
भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर शांत मुद्रा में लेटे रहते हैं।
ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ही संसार के पालनकर्त्ता हैं और सच्ची श्रद्धा से आराधना करने पर भक्तों के सभी कष्टों का निवारण करते हैं।
भगवान विष्णु अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते और उनकी सभी वांछित मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
नारायण के श्रीहरि होने का महत्व-
पौराणिक कथाओं के अनुसार, हरि का अर्थ होता है हरने वाला, उद्धार करने वाला और भगवान विष्णु संपूर्ण सृष्टि के पापों और कष्टों को हरते हैं।
ऋषि मुनियों के ग्रंथों और पुराणों में भी इस बात का उल्लेख है कि ‘हरि हरति पापाणि’ अर्थात जो भक्तों के जीवन के सभी पाप हर लेते हैं, वही हरि हैं।
माना जाता है कि जो भी भक्त सच्ची लगन से भगवान विष्णु की पूजा करता है और विशेष उपायों से प्रसन्न करता है, श्रीहरि उसके सभी पापों से मुक्त कर उसे मोक्ष प्रदान करते हैं, इसी लिए नारायण को श्री हरि कहा जाता है।
हमारी सनातन संस्कृति भी हमें सिखाती है कि भगवान विष्णु की आराधना करते हुए उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि वो हमारे जीवन के सभी संकटों से मुक्ति प्रदान करें।
ग्रंथों में बताया गया है कि सच्चे मन से की गई स्तुति से भगवान श्रीहरि शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों का कल्याण करते हैं।
|| जय श्री हरि विष्णु भगवान की जय ||
जय जय श्री राधे
विधि का विधान :
श्री रामजी का विवाह और राज्याभिषेक, दोनों शुभ मुहूर्त देख कर कि ए गए थे; फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ, न ही राज्याभिषेक!
और जब मुनि वशिष्ठ से इसका उत्तर मांगा गया, तो उन्होंने साफ कह दिया
"सुनहु भरत भावी प्रबल,
बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।
हानि लाभ, जीवन मरण,
यश अपयश विधि हाथ।।"
अर्थात - जो विधि ने निर्धारित किया है, वही होकर रहेगा!
न श्रीराम के जीवन को बदला जा सका, न श्रीकृष्ण के!
न ही महादेव शिव जी, सती की मृत्यु को टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आवाहन करता है!
न गुरु अर्जुन देव जी, और न ही गुरु तेग बहादुर साहब जी, और न दश्मेश पिता गुरु गोविन्द सिंह जी, अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब सर्व समर्थ थे!
रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके!
न रावण अपने जीवन को बदल पाया, न ही कंस, जबकि दोनों के पास अपार समस्त शक्तियाँ थी!
इंसान अपने जन्म के साथ ही जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश - स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है!
इस लिए सरल रहें, सहज रहें, मन, वचन और कर्म से सद्कर्म अच्छे काम में लीन रहें!
मुहूर्त न जन्म लेने का होता है, न मृत्यु का, फिर बाकी सब तो अर्थहीन है!
इस लिए सदैव प्रभुमय रहें,आत्मा मालिक के दिशा निर्देशों की पालना करते हुए आनन्दित रहें!
शुभ मुहूर्त के पचड़ों में न पड़ें, हर पल, उस मालिक का रचा हुआ है और सबका मालिक एक कभी गलत नही कर सकता।।
🙏 🙏
🌺🌺🌺🌺🌺जय श्री कृष्ण🌺🌺🌺🌺🌺🌺
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏


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