श्रीमद् देवी भागवत प्रवचन — नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को लगाएं ये 9 भोग।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

श्रीमद् देवी भागवत प्रवचन — नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को लगाएं ये 9 भोग, 

श्रीमद् देवी भागवत प्रवचन — नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को लगाएं ये 9 भोग !

श्रीमद् देवी भागवत प्रवचन — नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को लगाएं ये 9 भोग, जानें मां शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक किनको क्या है प्रिय

।। श्री गणेशाय नमः ।। ।। श्री मातृदेव्यै नमः ।। 🌺 जय माता दी। जय जगदम्बे। 🌺

नवरात्रि माँ आदिशक्ति की उपासना, साधना, संयम और भक्तिभाव का पवित्र पर्व है। 

इन नौ दिनों में भक्त माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों का पूजन करते हैं, दुर्गासप्तशती का पाठ करते हैं, मंत्र - जप करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार नैवेद्य अर्पित करते हैं।

नवरात्रि में माता के 9 अलग-अलग स्वरूपों को उनके प्रिय भोग अर्पित करना बहुत फलदायी माना जाता है। 

शास्त्र कहते हैं कि इससे माता का आशीर्वाद जल्दी प्राप्त हो सकता है। 

साथ ही, घर में सुख - समृद्धि के संयोग बनते हैं। 

ऐसे में चलिए विस्तार से जानें मां दुर्गा के 9 स्वरूपों के प्रिय भोग और नवरात्रि में भोग लगाने के जरूरी नियम।

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नवरात्रि में नौ देवियों को नौ अलग-अलग भोग लगाने की परंपरा बहुत प्रचलित है। 

लेकिन किसी धार्मिक विषय पर प्रवचन करते समय एक महत्त्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है—

लोकपरंपरा में प्रचलित मान्यता, किसी पूजा-पद्धति में निर्धारित विधान और मूल शास्त्र में स्पष्ट रूप से दिया गया प्रमाण, ये तीनों एक ही बात नहीं हैं।

इसलिए इस प्रवचन में किसी काल्पनिक व्यक्ति, गाँव, राज्य या देश की कहानी नहीं जोड़ी जाएगी। 

विषय को देवी-उपासना के ग्रंथों, पूजा की परंपराओं और उपलब्ध शास्त्रीय आधार के अनुसार समझाया जाएगा। 

जहाँ नौ दिनों के लिए किसी विशेष भोग का सीधा शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है, वहाँ उसे देवी की अनिवार्य आज्ञा बताने के बजाय प्रचलित परंपरा के रूप में ही प्रस्तुत किया जाएगा।

शारदीय नवरात्रि के नौ पावन दिनों में मां दुर्गा के 9 अलग-अलग स्वरूपों की उपासना की जाती है। 

शास्त्रों के अनुसार, अगर इन नौ दिनों में हर देवी की पसंद के मुताबिक उन्हें भोग लगाया जाए, तो इससे माता का आशीर्वाद जल्दी प्राप्त हो सकता है। 

ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री  मान्या बताती हैं कि शुद्ध सामग्री और कुछ नियमों का पालन करते हुए बनाए हुए भोग से घर का वातावरण सकारात्मक होता है। 

साथ ही, साधक की मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं। 

ऐसे में आइए विस्तार से जानते हैं कि नवरात्रि के 9 दिनों में मां शैलपुत्री से लेकर माता सिद्धिदात्री को उनकी किन-किन प्रिय चीजों का भोग लगाना चाहिए। 

साथ ही, यह भी जानें कि भोग लगाते समय किन नियमों का ध्यान रखना जरूरी होता है।





श्रीमद् देवी भागवत में नवरात्रि का शास्त्रीय आधार ;


प्रमुख संदर्भ: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 26–27 तथा सप्तम स्कन्ध, अध्याय 24।

श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध के 26वें अध्याय में नवरात्रि-व्रत और देवी-पूजन के विधान का वर्णन मिलता है। 

इसमें देवी को चंदन, सुगंधित द्रव्य, पुष्प, बिल्वपत्र, धूप, दीप, फल और अन्न आदि श्रद्धापूर्वक अर्पित करने का उल्लेख है। 

उसी अध्याय में सामर्थ्य के अनुसार पूजन करने और कन्या-पूजन की परंपरा का भी वर्णन मिलता है। 

इससे एक महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है कि देवी की उपासना केवल मिठाई या फल चढ़ाने तक सीमित नहीं है। 

पूजा में शुद्धता, श्रद्धा, मंत्र, नैवेद्य, व्रत, दान और सामर्थ्य के अनुसार सेवा का भी स्थान है।

श्रीमद् देवी भागवत के सप्तम स्कन्ध के 24वें अध्याय में तिथि के अनुसार देवी को अर्पित किए जाने वाले विभिन्न पदार्थों का वर्णन मिलता है। 

वहाँ द्वितीया से लेकर पूर्णिमा तक अलग - अलग नैवेद्यों और उनके बाद ब्राह्मण को देने की परंपरा बताई गई है। 

यह तिथि-आधारित विधान है, इसे बिना भेद किए नवरात्रि के नौ दिनों की सूची नहीं मानना चाहिए। 

इसी आधार पर अब नौ दिनों के नौ भोगों की प्रचलित सूची को समझते हैं और जहाँ मूल ग्रंथ में अलग संदर्भ मिलता है, वहाँ उसे स्पष्ट रूप से अलग रखेंगे।

शारदीय नवरात्रि के 9 दिन, 9 स्वरूप और उनके प्रिय भोग ;


प्रथम दिन — माँ शैलपुत्री को गाय के घी का भोग ;


नवरात्रि के प्रथम दिन माँ दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की उपासना की जाती है। 

शैलपुत्री नाम का अर्थ है पर्वतराज की पुत्री। 

इस स्वरूप में देवी के हाथ में त्रिशूल और कमल तथा वाहन के रूप में वृषभ का चित्रण प्रचलित है।

प्रचलित भोग: गाय का शुद्ध घी अथवा घी से बना सात्त्विक नैवेद्य।

घी को पूजा में पवित्रता, पोषण और दीपक के ईंधन के रूप में भी महत्त्व प्राप्त है। 

भक्त इसे माँ को अर्पित करके अपने जीवन में बल, स्वास्थ्य और स्थिरता की प्रार्थना करते हैं।

श्रीमद् देवी भागवत के तृतीय स्कन्ध, अध्याय 26 में देवी - पूजन के लिए धूप, दीप, पुष्प, फल और भोजन आदि अर्पित करने का आधार मिलता है। 

परंतु इस संदर्भ में प्रथम दिन शैलपुत्री को विशेष रूप से घी चढ़ाने का नौ-दिवसीय क्रम स्पष्ट नहीं दिया गया है। 

इसलिए घी का यह विशेष संबंध प्रचलित नवरात्रि-परंपरा के रूप में समझना उचित है। 

पूजा करते समय स्वच्छ पात्र में थोड़ा घी अर्पित करें। 

भोजन में घी का उपयोग व्रत के अपने नियम और स्वास्थ्य के अनुकूल करें। 

देवी के प्रति समर्पण ही पूजा का मुख्य भाव है।

पहले दिन मां शैलपुत्री के भोग : नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री को शुद्ध देसी घी या या उससे बनी सफेद मिठाई का भोग लगाना चाहिए। 

ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री कहती हैं कि ऐसा करने से स्वस्थ, लंबे और आरोग्य जीवन का आशीर्वाद प्राप्त हो सकता है।

दूसरा दिन — माँ ब्रह्मचारिणी को शक्कर या मिश्री ; 


दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। 

उनका स्वरूप तप, संयम, साधना और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। 

हाथों में जपमाला और कमंडल धारण किए देवी का चित्रण प्रचलित है।

प्रचलित भोग: शक्कर या मिश्री।

मधुर पदार्थ अर्पित करके भक्त अपने जीवन में मधुर वाणी, मन की शांति और साधना में दृढ़ता की प्रार्थना करते हैं। 

यह भोग किसी चमत्कार की गारंटी नहीं, बल्कि भक्ति और शुभ संकल्प का प्रतीक है।

श्रीमद् देवी भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 24 में द्वितीया तिथि पर देवी को शर्करा अर्पित करने और उसके बाद ब्राह्मण को देने का उल्लेख मिलता है। 

यह शास्त्रीय संदर्भ है, लेकिन इसे माँ ब्रह्मचारिणी के नौ-दिवसीय विशेष भोग का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं समझना चाहिए, क्योंकि वहाँ विधान तिथि के आधार पर है। 

अतः इस दिन मिश्री या शक्कर का भोग श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जा सकता है। 

मधुरता केवल प्रसाद में नहीं, बल्कि व्यवहार और वाणी में भी होनी चाहिए।

दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी के भोग : दूसरे दिन पर माता को शक्कर, मिश्री या पंचामृत अर्पित करना चाहिए। 

मान्यता है कि ऐसा करने से परिवार के सदस्यों की आयु लंबी हो सकती है। 

साथ ही, भक्तों में मानसिक शक्ति और शुद्धता आती है।

तीसरा दिन — माँ चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई ;


तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की उपासना की जाती है। 

उनके नाम में चंद्र और घंटा का उल्लेख उनके स्वरूप की विशेषता बताता है। 

धार्मिक चित्रणों में उन्हें अनेक भुजाओं और सिंह अथवा बाघ पर विराजमान दिखाया जाता है।

प्रचलित भोग: दूध, खीर अथवा दूध से बनी सात्त्विक मिठाई।

दूध पोषण का सामान्य आहार है। 

इसे देवी को अर्पित करके भक्त शांति, सौम्यता और अपने कर्तव्यों को निभाने का साहस माँगते हैं।

श्रीमद् देवी भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 24 में तृतीया तिथि पर देवी को दूध अर्पित करने का उल्लेख मिलता है। 

इस प्रकार दूध अर्पित करने का ग्रंथीय आधार उपलब्ध है। 

फिर भी तृतीया तिथि और नवरात्रि के तीसरे दिन का संबंध हमेशा एक ही नहीं होता, क्योंकि चंद्र तिथियाँ और नवरात्रि के दिन अलग-अलग गणना-पद्धतियों में भिन्न हो सकते हैं। 

दूध या खीर अर्पित करते समय स्वच्छता और सात्त्विकता रखें। यदि दूध का सेवन किसी के लिए उपयुक्त न हो, तो केवल पूजा में प्रतीकात्मक रूप से अर्पित करना भी संभव है।

तीसरा दिन मां चंद्रघंटा के भोग : नवरात्रि के तीसरे दिन पर देवी को दूध, खीर या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाएं। 

इस से मानसिक तनाव कम हो सकता है। 

साथ ही, मान्यता है कि जीवन के दुख कम होते हैं और सुख-शांति व खुशहाली के संयोग बनते हैं।

चौथा दिन — माँ कूष्मांडा को मालपुआ ;


चौथे दिन माँ कूष्मांडा की आराधना होती है। 

नवरात्रि की लोकप्रिय परंपरा में उन्हें सृष्टि की ऊर्जा और प्रकाश से संबंधित देवी-स्वरूप के रूप में स्मरण किया जाता है।

प्रचलित भोग: मालपुआ अथवा आटे से बना सात्त्विक पकवान।

मालपुआ बनाने में आटा, दूध या अन्य सामग्री का उपयोग किया जा सकता है। 

घर की परंपरा और व्रत के नियमों के अनुसार सामग्री चुननी चाहिए।

श्रीमद् देवी भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 24 में चतुर्थी तिथि पर देवी को आटे का पकवान अर्पित करने का उल्लेख मिलता है। 

यह मालपुए के प्रचलित भोग से मिलता - जुलता सामान्य आधार प्रस्तुत करता है, लेकिन मूल पाठ में माँ कूष्मांडा के लिए नवरात्रि के चौथे दिन मालपुआ ही अनिवार्य बताया गया है—

ऐसा दावा नहीं करना चाहिए। 

इस दिन भक्त देवी से प्रार्थना कर सकते हैं कि उनके जीवन में उत्साह, विवेक और सद्कर्म करने की शक्ति बनी रहे। 

भोग बनाते समय स्वच्छता रखें और भोजन व्यर्थ न करें।

चौथा दिन मां कुष्मांडा के भोग : चौथे दिन पर माता को मालपुआ अर्पित करने का विधान होता है। 

मान्यता है कि इस प्रसाद को अर्पित करने से निर्णय लेने की क्षमता और रचनात्मकता में वृद्धि के संयोग बनते हैं।

पाँचवाँ दिन — माँ स्कंदमाता को केले ;


पाँचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाती है। 

उनके स्वरूप में मातृत्व, स्नेह और संतान के प्रति संरक्षण का भाव दिखाई देता है। 

देवी की गोद में बाल स्कंद अर्थात् कार्तिकेय का चित्रण मिलता है।

प्रचलित भोग: केला अथवा अन्य ताजे फल।

फल प्रकृति से प्राप्त भोजन हैं। 

उन्हें देवी को अर्पित करना कृतज्ञता और समर्पण का प्रतीक है। 

भक्त परिवार की मंगलकामना, बच्चों के कल्याण और अपने दायित्वों को प्रेमपूर्वक निभाने की प्रार्थना करते हैं।

श्रीमद् देवी भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 24 में पंचमी तिथि पर केले अर्पित करने का उल्लेख है। 

यह फल - भोग के लिए स्पष्ट संदर्भ है। 

फिर भी पंचमी तिथि पर केले का विधान और नवरात्रि के पाँचवें दिन स्कंदमाता को केला अर्पित करने की लोकप्रिय परंपरा—

इन दोनों को प्रमाण की दृष्टि से अलग-अलग समझना चाहिए। 

केले का भोग अर्पित करने के बाद उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है या दूसरों में बाँटा जा सकता है। 

पूजा में फल की संख्या से अधिक महत्त्व श्रद्धा और सद्भाव का है।

पांचवां दिन मां स्कंदमाता के भोग : पंचमी तिथि पर देवी को केले का भोग लगाना चाहिए। 

ज्योतिषाचार्य पं. पंडारामा प्रभु राज्यगुरु शास्त्री कहती हैं कि यह उपासना अच्छी सेहत, शारीरिक ऊर्जा और बच्चों की तरक्की के रास्ते खोल सकती है।

छठा दिन — माँ कात्यायनी को शहद ;


छठे दिन माँ कात्यायनी की उपासना होती है। 

देवी के इस स्वरूप को शक्ति, साहस और अधर्म के विरुद्ध संघर्ष से जोड़कर देखा जाता है।

प्रचलित भोग: शहद।

शहद प्राकृतिक मधुर पदार्थ है। 

इसे अर्पित करते हुए भक्त अपने आचरण में मधुरता, अपने निर्णयों में विवेक और कठिन परिस्थितियों में धैर्य की प्रार्थना करते हैं।

श्रीमद् देवी भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 24 में षष्ठी तिथि पर देवी को मधु अर्थात् शहद अर्पित करने का उल्लेख मिलता है। 

इस लिए शहद अर्पण का तिथि-आधारित शास्त्रीय संदर्भ उपलब्ध है। 

किंतु इस श्लोक को माँ कात्यायनी के लिए विशेष रूप से छठे नवरात्रि-दिन की अनिवार्य आज्ञा बताना उचित नहीं होगा। 

शहद की थोड़ी मात्रा स्वच्छ पात्र में अर्पित की जा सकती है। 

प्रसाद बाँटते समय छोटे बच्चों और उन लोगों की आवश्यकताओं का ध्यान रखें जिन्हें शहद से परहेज करना हो।

छठा दिन मां कात्यायनी के भोग : नवरात्रि के छठे दिन माता को शहद अर्पित करना बहुत शुभ माना जाता है। 

कहते हैं इससे रिश्तों में मिठास आती है। 

साथ ही, आत्मिक शांति मिलती है और जीवन के संकट कम हो सकते हैं।

सातवाँ दिन — माँ कालरात्रि को गुड़ ;


सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। 

उनका उग्र स्वरूप भय, अज्ञान और नकारात्मकता से मुक्ति की प्रार्थना का प्रतीक है। 

देवी का यह रूप स्मरण कराता है कि कठिनाइयों का सामना साहस और धर्म के साथ करना चाहिए।

प्रचलित भोग: गुड़ अथवा गुड़ से बना सात्त्विक पकवान।

गुड़ सामान्य खाद्य पदार्थ है और कई पूजा-परंपराओं में नैवेद्य के रूप में प्रयुक्त होता है। 

भक्त माँ से भय पर विजय, संकटों का सामना करने की शक्ति और अपने कर्तव्यों में दृढ़ता की प्रार्थना करते हैं।

श्रीमद् देवी भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 24 में सप्तमी तिथि के नैवेद्य में गुड़ अथवा शर्करायुक्त पदार्थ के उल्लेख का संदर्भ मिलता है। 

अतः गुड़ का अर्पण इस तिथि-आधारित विधान से जुड़ता है; लेकिन इसे कालरात्रि के लिए नौ दिनों की विशिष्ट सूची का प्रत्यक्ष श्लोक नहीं कहना चाहिए। 

माँ कालरात्रि की उपासना में केवल बाहरी भय से रक्षा की कामना ही नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और अन्यायपूर्ण व्यवहार को दूर करने का संकल्प भी होना चाहिए।

सातवां दिन मां कालरात्रि के भोग : सप्तमी के दिन माता रानी को गुड़ का भोग लगाना चाहिए। 

मान्यता है कि ऐसा करने से बुरी शक्तियों से रक्षा होती है और आत्मविश्वास में वृद्धि हो सकती है। 

यह काम में आने वाली रुकावटों को भी कम कर सकता है।

आठवाँ दिन — माँ महागौरी को नारियल ;


आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा की जाती है। 

उनका गौर वर्ण, श्वेत वस्त्र और शांत स्वरूप पवित्रता तथा शांति के प्रतीक माने जाते हैं। 

इस दिन अनेक भक्त अष्टमी - पूजन, कन्या - पूजन और विशेष नैवेद्य अर्पित करते हैं।

प्रचलित भोग: नारियल।

नारियल अनेक हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों में अर्पित किया जाता है। 

इसे देवी के सामने रखकर भक्त अपने अहंकार का त्याग, मन की शुद्धि और परिवार की मंगलकामना व्यक्त करते हैं।

श्रीमद् देवी भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 24 में अष्टमी तिथि पर नारियल अर्पित करने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। 

इस लिए नारियल के भोग का यह शास्त्रीय आधार उपलब्ध है। 

अष्टमी पर कन्या - पूजन करने वाले परिवार अपनी परंपरा के अनुसार कन्याओं का आदरपूर्वक पूजन करके उन्हें भोजन, फल, मिठाई या दक्षिणा दे सकते हैं। 

देवी भागवत के तृतीय स्कन्ध, अध्याय 26 में कुमारियों के पूजन का भी वर्णन है। 

कन्या - पूजन का मूल भाव बालिकाओं का सम्मान करना है। 

उनके साथ स्नेह, सम्मान और मर्यादा का व्यवहार ही इस भाव को जीवन में उतारता है।

आठवां दिन मां महागौरी के भोग : नवरात्रि अष्टमी के दिन माता को नारियल या नारियल से बनी मिठाइयों का भोग लगाना उत्तम माना जाता है। 

ऐसा करने से साधक की मुरादें पुरी हो सकती हैं। 

साथ ही, जीवन में शुभ और नई शुरुआत के रास्ते खुल सकते हैं।
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नौवाँ दिन — माँ सिद्धिदात्री को तिल अथवा सात्त्विक नैवेद्य ;


नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। 

उनके नाम में सिद्धि प्रदान करने वाली देवी का भाव है। 

भक्त उनसे ज्ञान, विवेक, साधना में प्रगति और जीवन में सद्बुद्धि की प्रार्थना करते हैं।

प्रचलित भोग: तिल; कुछ परंपराओं में हलवा, पूरी, चना और अन्य सात्त्विक पकवान भी अर्पित किए जाते हैं।

यहाँ शास्त्रीय प्रमाण के विषय में विशेष सावधानी आवश्यक है। 

श्रीमद् देवी भागवत के सप्तम स्कन्ध, अध्याय 24 में नवमी तिथि पर लाजा अर्थात् भुने हुए धान या लाई अर्पित करने का उल्लेख है। 

वहीं काले तिल का उल्लेख दशमी तिथि के विधान में मिलता है। 

इस लिए तिल को नवमी के लिए अनिवार्य शास्त्रीय भोग बताना इस संदर्भ के अनुसार सही नहीं होगा। 

नवमी के दिन अपनी कुलपरंपरा और पूजा - पद्धति के अनुसार नैवेद्य अर्पित करें। 

यदि तिल अर्पित करने की पारिवारिक परंपरा है, तो उसका पालन किया जा सकता है; किंतु ग्रंथ में तिथि - विशेष के उल्लेख को बदलकर प्रस्तुत न करें।

नवरात्रि की साधना का उद्देश्य केवल मनोकामना माँगना नहीं, बल्कि ज्ञान, विनय, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति प्राप्त करना भी है।

नौवां दिन मां सिद्धिदात्री के भोग : नवमी के दिन देवी को तिल, हलवा, पुरी और चने का भोग लगाना चाहिए। 

मान्यता है कि इससे हर प्रकार की दुर्घटनाओं से रक्षा होती है। 

साथ ही, जातक की मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं और घर में सुख-समृद्धि के संयोग बनते हैं।


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Dattatreya Polyresin Bonded Bronze Maa Saraswati Idol Statue Murti for Puja (6-inch)

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{ About this item

  • Material: Bonded Bronze
  • Colour : brown
  • Dimension : ( L x B x H) 14.5 cm x 9 cm x 7 cm, weight - 510 gram
  • Included component: 1 Saraswati
  • A mixture of bronze power and resin that is used in sculpture making. In bonded bronze sculpturing, the mixture is poured directly into a mold without the use of the more traditional wax casting process that uses molten metal . Bonded bronze is also called cold cast bronze resin.


देवी-पूजन में नैवेद्य का वास्तविक महत्त्व ;


श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध, अध्याय 26 में देवी को पुष्प, धूप, दीप, फल और भोजन अर्पित करने का विधान मिलता है। 

अध्याय 27 में नवरात्रि-पूजन, हवन, कुमारी-पूजन तथा ब्राह्मण-भोजन जैसे अनुष्ठानों का महत्त्व बताया गया है। 

इससे तीन प्रमुख बातें समझ में आती हैं।

पहली, देवी को अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य श्रद्धा और शुद्धता के साथ तैयार किया जाए।

दूसरी, पूजा अपनी सामर्थ्य के अनुसार की जाए। महँगे पकवान, बड़ी मात्रा में मिठाई या अनेक प्रकार के भोग चढ़ाना प्रत्येक भक्त के लिए अनिवार्य नहीं है।

तीसरी, देवी की उपासना को सदाचार, दान, सेवा, संयम और दूसरों के सम्मान से जोड़ना चाहिए। 

केवल भोग चढ़ाकर अपने व्यवहार में सुधार न करना उपासना के व्यापक उद्देश्य को सीमित कर देता है।

नवरात्रि के नौ दिनों में नौ देवियों की पूजा और नौ अलग-अलग भोगों की सूची आज अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है। 

फिर भी प्रत्येक भोग को देवी भागवत का सीधा उद्धरण बताने से पहले मूल अध्याय और श्लोक की जाँच आवश्यक है। 

इस प्रवचन में प्रचलित नौ - भोग परंपरा और ग्रंथ में वर्णित तिथि - आधारित नैवेद्य के बीच यही अंतर स्पष्ट किया गया है।
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भोग लगाते समय इन नियमों का रखें ध्यान ;


नवरात्रि के दौरान माता को भोग लगाते समय अपना मुख हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ ही रखना चाहिए। 

मान्यता है कि ऐसा करने से पूजा का प्रभाव दोगुना हो जाता है।

माता का प्रसाद हमेशा पीतल, तांबे या चांदी के बर्तन में ही अर्पित करना चाहिए। 

पूजा में कांच या प्लास्टिक के बर्तनों का प्रयोग करना उचित नहीं माना जाता है। 

इस के अलावा, आप जरूरतमंदों को दान भी कर सकते हैं।

प्रार्थना ;


हे जगज्जननी माँ दुर्गा! हमें ऐसी बुद्धि प्रदान करें जिससे हम सत्य और असत्य में अंतर कर सकें। 

हमारी वाणी में मधुरता, मन में करुणा, कर्मों में शुद्धता और जीवन में धर्म के प्रति निष्ठा बनी रहे।

हे माँ शैलपुत्री, हमें स्थिरता दें। 

हे माँ ब्रह्मचारिणी, हमें तप और संयम का मार्ग दिखाएँ। 

हे माँ चंद्रघंटा, हमें साहस दें। 

हे माँ कूष्मांडा, हमारे जीवन में उत्साह बनाए रखें। 

हे माँ स्कंदमाता, हमें वात्सल्य और संरक्षण का भाव दें। 

हे माँ कात्यायनी, हमें अन्याय का सामना करने की शक्ति दें। 

हे माँ कालरात्रि, हमारे भय और अज्ञान को दूर करें। 

हे माँ महागौरी, हमारे मन को निर्मल करें। 

हे माँ सिद्धिदात्री, हमें विवेक और सद्बुद्धि प्रदान करें।

नवरात्रि के इन पवित्र दिनों में हम जो भी नैवेद्य अर्पित करें, वह श्रद्धा, शुद्धता और कृतज्ञता के भाव से अर्पित हो। 

हमारी भक्ति केवल पूजा-स्थल तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे आचरण में भी दिखाई दे।

जय माता दी। जय जगदम्बे। जय माँ दुर्गा।

संदर्भ ग्रंथ


श्रीमद् देवी भागवत महापुराण — तृतीय स्कन्ध, अध्याय 26: नवरात्रि-विधान और देवी-पूजन। 

श्रीमद् देवी भागवत महापुराण — तृतीय स्कन्ध, अध्याय 27: कुमारी-पूजन तथा नवरात्रि-अनुष्ठान का महत्त्व। 

श्रीमद् देवी भागवत महापुराण — सप्तम स्कन्ध, अध्याय 24: तिथि के अनुसार देवी को नैवेद्य अर्पित करने के विधान। 

प्रमाण संबंधी अंतिम टिप्पणी: नौ देवियों के साथ घी, मिश्री, दूध, मालपुआ, केला, शहद, गुड़, नारियल और तिल को जोड़ने वाली लोकप्रिय सूची को एक ही शास्त्र के एक ही अध्याय से अक्षरशः प्रमाणित सूची नहीं माना जाना चाहिए। 

ऊपर मूल ग्रंथ में उपलब्ध तिथि-आधारित संदर्भों को अलग से स्पष्ट किया गया है, ताकि प्रवचन में लोकपरंपरा और शास्त्रीय प्रमाण का अंतर बना रहे।
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