।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।


*औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...!* 


*घर में 9 पौधे अवश्य लगाएं...* 

एक मत यह कहता है कि ब्रह्माजी के दुर्गा कवच में वर्णित नवदुर्गा नौ विशिष्ट औषधियों में विराजमान हैं।

*1. शैलपुत्री (हरड़)*🌱🌱

कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि हरड़ हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप है।






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यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। 

यह पथया, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी सात प्रकार की होती है।

*2. ब्रह्मचारिणी (ब्राह्मी)*🌱🌱

ब्राह्मी आयु व याददाश्त बढ़ाकर, रक्तविकारों को दूर कर स्वर को मधुर बनाती है। 

इसलिए इसे सरस्वती भी कहा जाता है।

*3. चंद्रघंटा (चंदुसूर)*🌱🌱

यह एक ऎसा पौधा है जो धनिए के समान है। 

यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है इसलिए इसे चर्महंती भी कहते हैं।

*4. कूष्मांडा (पेठा)*🌱🌱

इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है। 

इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। 

इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो रक्त विकार दूर कर पेट को साफ करने में सहायक है।

 मानसिक रोगों में यह अमृत समान है।

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*5. स्कंदमाता (अलसी)*🌱🌱

देवी स्कंदमाता औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। 

यह वात, पित्त व कफ रोगों की नाशक औषधि है।





*6. कात्यायनी (मोइया)*🌱🌱

देवी कात्यायनी को आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका व अम्बिका। 

इसके अलावा इन्हें मोइया भी कहते हैं। 

यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है।

*7. कालरात्रि (नागदौन)*🌱🌱

यह देवी नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती हैं। 

यह सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी और मन एवं मस्तिष्क के विकारों को दूर करने वाली औषधि है।

+++ +++

*8. महागौरी (तुलसी)*🌱🌱

तुलसी सात प्रकार की होती है सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरूता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। 

ये रक्त को साफ कर ह्वदय रोगों का नाश करती है।

*9. सिद्धिदात्री (शतावरी)*🌱🌱

दुर्गा का नौवां रूप सिद्धिदात्री है जिसे नारायणी शतावरी कहते हैं। 

यह बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है।
☘️ *एक कदम आयुर्वेद की ओर*☘️


     🌹गुड मिठाई नहीं अमृत है🌹
             ( आयुर्वेदिक शास्त्र एवं ज्ञान )


😎👉 *गुड़ में भरपुर विटामिन और मिनरल्स पाएं जाते हैं, जो स्किन को पोषित करते हैं। 
उदाहरण : ⤵
                    🌹👇👇👇🌹
⏩ गुड़ से स्किन सॉफ्ट, हेल्दी, हाइड्रेट और ग्लोइंग बनती है।
⏩ इससे चेहरे पर *झुर्रिया भी नहीं पड़ती और यह पिंपल्स होने से भी रोकता है।

           🌲गुड़ के चमत्कारिक फायदे🌲

                  🌷कम करें वजन🌷
🔥 *मीठा खाने से कैलोरी बढ़ती है जिससे वजन ज्यादा होने लगता है, लेकिन गुड़ में पाएं जाने वाले मिनरल्स विशेषत पोटेशियम वजन को कंट्रोल करने में मदद करते हैं। साथ ही यह मेटाबोलिज्म भी बढ़ाता है।

                🌷कब्ज़ करें दूर🌷
🔥 *गुड़ पाचन का एक बहुत अच्छा साधन है। इससे पाचन तंत्र दुरूस्त बना रहता है और कब्ज, एसिडिटी जैसी समस्याएं नहीं होती है। खाने के बाद गुड़ खाना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद रहता है। 

+++ +++
               🌷घने बाल बनाएं🌷
🔥 *गुड़ आयरन का एक अच्छा स्त्रोत है। 

इसे विटामिन सी से भरपुर चीजों जैसे नींबू, आंवला आदि के साथ खाने से बाल लंबे, घने, काले और हेल्दी बनते हैं। 

ऎसा माना जाता है कि महिने में दो बार शैंपू से पहले गुड़, मुल्तानी मिट्टी और दही का मिश्रण बालों में लगाने से बाल प्राकृतिक रूप से खूबसूरत और लंबे होते हैं।

             🌷लिवर की करें सफाई🌷

🔥 *गुड़ का एक छोटा सा टुकड़ा आपके शरीर से अपशिष्ट पदार्थो को बाहर कर देता है। 

अगर कोई एल्कोहल का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करता है तो लिवर की सफाई के लिए गुड़ बेस्ट है।

             🌷जोड़ों के दर्द में सहायक🌷

🔥 *गुड़ में कैल्शियम पाया जाता है, जो हडि्डयों को मजबूत बनाता है। 

गुड़ के सेवन से हडि्डयों से जुड़ी समस्याओं और जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है। 

रोज अदरक के एक टुकड़े के साथ गुड़ खाने से जोड़ों का दर्द ठीक होता है और ज्वॉइंट्स मजबूत बनते हैं।

                🌷अस्थमा को भगाएं🌷

🔥 *गुड़ में एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाने से यह गले और फेफड़ों के इंफेक्शन से बचाव करता है। 

साथ ही अस्थमा मरीज को सांस लेने में होने वाली दिक्कत को भी दूर करता है।

             🌷इम्यूनिटी को करें मजबूत🌷

🔥 *गुड़ में एंटिऑक्सीडेंट्स, जिंक, सेलेनियम पाया जाता है, जो हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। 

जिससे बैक्टीरिया से लड़ने में मदद मिलती है। 

इस लिए रोज एक छोटा सा गुड़ का टुकड़ा खाना चाहिए।

               🌷खून की करें सफाई🌷

🔥 *अगर रोजाना गुड़ खाया जाएं तो यह खून को प्योरिफाई करता है। 

इससे खून साफ रहता है। 

गुड़ खाने से ब्लड हीमोग्लोबिन बढ़ता है और खून संबंधी कई बीमारियों की जोखिम कम होती है।

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कुरुक्षेत्र का वो 'अंतिम सच' जिसने दुर्योधन को अंदर से तोड़ दिया! :

कल्पना कीजिए उस मंज़र की...!

18 दिनों के भीषण रक्तपात के बाद कुरुक्षेत्र का मैदान अब युद्धभूमि नहीं, शमशान बन चुका था। 

जहाँ कल तक शंखनाद और तलवारों की खनखनाहट थी, आज वहां केवल मृत्यु का सन्नाटा गूंज रहा था। 

टूटे हुए रथ, हाथियों के शव और रक्त से सनी मिट्टी के बीच, कुरु वंश का अभिमानी युवराज दुर्योधन अपनी टूटी जंघाओं के साथ पड़ा था। 

उसकी सांसें उखड़ रही थीं, लेकिन आँखों में पराजय की आग और ह्रदय में 'छल' का आक्रोश अब भी धधक रहा था।
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तभी वहां श्री कृष्ण का आगमन हुआ।

दुर्योधन ने कृष्ण को देखते ही अपना सारा विष उगल दिया,तुमने छल से मुझे हराया है कृष्ण! यदि धर्म युद्ध होता, तो पांडव कभी नहीं जीतते!त्रिलोकीनाथ कृष्ण मंद- मंद मुस्कुराए। 

उनकी मुस्कान में व्यंग्य नहीं, करुणा और सत्य था। 

उन्होंने कहा:-
+++ +++
दुर्योधन! तुम पांडवों के 'छल' को देख रहे हो, लेकिन अपने 'चयन' की भूल को नहीं। 

तुम्हारी हार भीम की गदा से नहीं, तुम्हारे एक गलत निर्णय से हुई है।

वो एक निर्णय, जो इतिहास बदल सकता था।

कृष्ण ने उस राज से पर्दा उठाया, जिसने मरते हुए दुर्योधन की रूह को कंपा दिया। 

कृष्ण बोले:-

तुम्हारी सेना में एक योद्धा ऐसा था,जो साक्षात 'काल' था। 

जिसे यदि तुम सही समय पर कमान सौंपते, तो यह युद्ध 18 दिन नहीं केवल एक प्रहर में समाप्त हो जाता। 

लेकिन तुमने 'हीरे' को छोड़कर 'कंकड़' पर दांव लगाया।वह योद्धा कोई और नहीं,गुरु द्रोण पुत्र अश्वत्थामा थे।

अश्वत्थामा: जिसे दुर्योधन ने कभी 'समझा' ही नहीं।

दुर्योधन अपनी मित्रता और भावनाओं में इतना अंधा था कि उसने कर्ण पर तो भरोसा किया, लेकिन अश्वत्थामा ( जो शिव के अंशावतार थे ) को अनदेखा कर दिया।

कृष्ण ने दुर्योधन को उसकी रणनीतिक भूलों का आईना दिखाया:-
+++ +++
आरंभ ( दिन 1 - 10 ):- 

तुमने भीष्म को सेनापति बनाया, जो पांडवों से प्रेम करते थे। 

वे उन्हें मारना ही नहीं चाहते थे।

मध्य ( दिन 11-15 )- तुमने द्रोणाचार्य को चुना, जो शिष्य - मोह में बंधे थे।

अंत ( दिन 16 - महाभूल ) जब द्रोण गिरे,तब तुम्हें अश्वत्थामा को चुनना चाहिए था। 

उसका क्रोध पिता की मृत्यु के कारण चरम पर था। 

वह 'रुद्र' बन चुका था।

किन्तु, तुमने क्या किया? 

तुमने भावुकता में आकर कर्ण को चुना। 

कर्ण वीर थे, दानवीर थे, लेकिन वे मरणशील थे। 

जबकि अश्वत्थामा अमर थे।

क्यों अश्वत्थामा थे 'विजय की कुंजी' ?

कृष्ण ने अश्वत्थामा की शक्तियों का जो वर्णन किया,वह सुनकर दुर्योधन सन्न रह गया:-

रुद्र अवतार: - 

अश्वत्थामा में भगवान शिव का क्रोध और शक्ति समाहित थी।
+++ +++
अजेय सामर्थ्य:-

जहाँ कृपाचार्य 60,000 योद्धाओं से लड़ सकते थे, अश्वत्थामा अकेले 72,000 महारथियों को धूल चटाने की क्षमता रखते थे।

सर्वश्रेष्ठ शिक्षा:-

उन्हें ज्ञान केवल द्रोण से नहीं, बल्कि परशुराम, व्यास और दुर्वासा जैसे ऋषियों से मिला था।

नारायणास्त्र का ज्ञान:-

अर्जुन के पास भी जिसका काट नहीं था, वह अस्त्र अश्वत्थामा के पास था।

कृष्ण ने कहा:-

दुर्योधन! यदि 16वें दिन सेनापति अश्वत्थामा होते,तो पांडव तो क्या, तीनों लोकों की शक्तियां भी उसे रोक नहीं पातीं।

प्रमाण:-

18वें दिन की वो 'काली रात' दुर्योधन को कृष्ण की बातों का प्रमाण उसी रात मिल गया। 

जब वह मृत्यु शैया पर अंतिम सांसे ले रहा था, उसने अश्वत्थामा को अपना अंतिम सेनापति घोषित किया।

और फिर अश्वत्थामा ने तांडव किया।

अकेले अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में घुसकर वह कर दिखाया जो 11 अक्षौहिणी सेना 18 दिनों में न कर सकी:-
 
धृष्टद्युम्न ( द्रोण का हत्यारा ) का वध।शिखंडी और पांचों उपपांडवों का संहार।

पांडवों की शेष बची पूरी सेना को एक ही रात में गाजर - मूली की तरह काट दिया।

सुबह जब दुर्योधन को यह समाचार मिला, तो उसकी आँखों से आंसू बह निकले। 

यह आंसू खुशी के नहीं, गहरे पछतावे के थे।

उसके अंतिम शब्द मौन चीत्कार बन गए।

हाय! जिस शक्ति को मैं अंत में ढूंढ पाया, यदि उसे पहले पहचान लेता,तो आज कुरुक्षेत्र का विजेता मैं होता दुर्योधन की यह कहानी हमें प्रबंधन और जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाती है:-

संसाधन होना ही काफी नहीं है, सही समय पर सही व्यक्ति की पहचान करना ही असली नेतृत्व है।

अक्सर हम भावनाओं या पूर्वाग्रहों में पड़कर अपने सबसे काबिल 'योद्धाओं को नजरअंदाज कर देते हैं, और जब तक हमें उनकी कीमत समझ आती है,तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

              || हरे कृष्णा जी ||
     🌹🙏 आप स्वस्थ रहें सुरक्षित रहें 🙏🌹
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जय माँ अंबे

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इसे गोबर का कीड़ा कहते हैं ।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। सुंदर कहानी ।।


इसे गोबर का कीड़ा कहते हैं ।


ये कीड़ा सुबह उठकर गोबर की तलाश में निकलता है ।

और दिन भर जहाँ से गोबर मिले उसका गोला बनाता रहता है । 

शाम होने तक अच्छा ख़ासा गोबर का गोला बना लेता है । 







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फिर इस गोबर के गोले को धक्का मारते हुए अपने बिल तक ले जाता है ।

बिल पर पहुँचकर उसे अहसास होता है । 

कि गोला तो बड़ा बना लिया लेकिन बिल का छेद तो छोटा है ।

बहुत कोशिश के बावजूद वो गोला बिल में नहीं जा सकता।






बहुत लोग गोबर के कीड़े की तरह ही हो गए हैं। 

सारी ज़िन्दगी.....!

चोरी ।

मक्कारी ।

चालाकी ।

दूसरो को बेबकूफ बनाकर धन जमा करने में लगे रहते हैं ।

जब आखिरी वक़्त आता है ।

तब पता चलता है के ये सब तो साथ जा ही नहीं सकता ॥

जय श्री कृष्ण...!!!



पैसे घर की इज्जत से बड़े नहीं ||


सम्मान और नैतिकता सबसे महत्वपूर्ण हैं...! 

क्योंकि पैसा खो जाने पर दोबारा कमाया जा सकता है...! 

लेकिन एक बार खोई हुई इज़्ज़त वापस पाना मुश्किल होता है।

इज़्ज़त अच्छे व्यवहार, संस्कारों और चरित्र से बनती है...! 

जो पैसों से नहीं खरीदी जा सकती।

विजय अखबार पढ़ रहा था कि पड़ोसी आया और आकर बोला "एक खुश खबरी है।" 

विजय बोला क्या? 

पड़ोसी धीरे से मगर रहस्यमय अंदाज मे बोला तेरा भाई खेत बेच रहा है। 

विजय ने पूछा  क्यों? 

ऐसी क्या मुसिबत आन पड़ी ? 

पड़ोसी अखबार बनता हुआ बोला जब तेरी भाभी बीमार पड़ी थी तब तेरे भाई ने साहूकार से खेत गिरवी रख कर दो लाख रुपये उधार लिए  थे। 

आज ब्याज सहित चार लाख हो गए है। 

साहूकार ने आखरी चेतावनी दे रखी है। 

खेत ही बेचना पड़ेगा। 

अंदर से विजय की पत्नी सब सुन रही थी। 

बाहर आकर बोली हम लोग अभी जिंदा है। 

ऐसा नही होने देगें। फिर वह भीतर गई और चार लाख रुपये विजय के सामने रखते हुए बोली मेरे पापा ने मेरे नाम एफ डी करवाई थी ये वो पैसे हैं।

जाकर घर की इज्जत बचाओ। 

पैसे भाई से बड़े नही होते। 

विजय बोला मगर मै क्यों जाऊँ? 

भैया तो मुझसे बात ही नही करते। 

और तुम ये कुर्बानी क्यों दे रही हो। 

बिकने दो खेत, बिकता है तो। 

हमें क्या ? 

पत्नी ने पड़ोसी को धक्का देकर कहा चल निकल यहाँ से चुगलखौर। 

तुमने ही दोनों भाईयों के बीच दुश्मनी के बीज बोये है न ? 

पड़ोसी पूँछ दबा कर भाग गया। 

पत्नी ने पति की आँखों मे देखकर कहा खानदानी औरत हूँ। 

मेरे बाप ने यही सिखाया है कि जब परिवार की इज्जत पर बात आये तब सारे मनमुटाव भूल कर एक हो जाना। 

जीवन मे कभी अकेली नही रहोगी। 

फिर पति के हाथ पर पैसे रखे और हाथ पकड़ कर जेठ के घर ले गई।

दोनों ने देखा बड़ा भाई सिर पकड़े आंगन मे खटिया पर बैठा था। 

छोटे भाई ने चुपचाप सारे पैसे भाई की गोद मे रख दिये। 

फिर बोला इतनी बड़ी परेसानी मे गुजर रहे हो भैया। 

मुझे एक बार भी नही पुकारा ? 

बड़ा भाई पैसों की तरफ देखते हुए बोला तुमहारे पास इतने पैसे कहाँ से आये ?

छोटा भाई अपनी पत्नी की तरफ इशारा करते हुए बोला आपकी बहु ने दिये है। 

शादी के समय इसके पिता ने इसके नाम एफ डी करवाई थी।। 

बड़े भाई ने बहु के सामने दोनों हाथ जोड़ दिये। 

बोला बेटा, इतनी बड़ी रकम मै लौटा नही पाऊंगा। 

बहु घुंघट मे ही बोली  मुझे नही चाहिए भैया। 

आप रहन रखा खेत छुड़ा लो। 

पैसे घर की इज्जत से बड़े नही होते बड़े भाई की आँखों मे आँसू बह निकले। 

बोला तुम जैसी बीरबानी हर घर मे पैदा नही हो सकती। 

मै तुम्हारे  खानदान को नतमस्तक होकर प्रणाम करता हूँ।

इस के बाद बड़े भाई ने साहूकार का कर्जा भर दिया। 

और दोनों भाई फिर से एक हो गए।







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सीख :--

जो भाई अपने भाई की बदनामी पर हँसता है। 

उस से बड़ा कुलद्रोही कोई नही हो सकता है। 

जो नारी ससुराल की इज्जत बचाने के लिए खुद आगे खड़ी हो जाए उससे बड़ी संस्कारवान नारी कोई नही हो सकती।

इस लिए भाई के गिरने का इंतजार मत करिये। 

गिरते भाई को बचाने के लिए अपनी फौलादी भुजाएं फैला कर रखिये। 

भाई गिरा तो कुल ही गिर जायेगा। 

फिर तो तुम भी गिरे हुए कुल के कहलाओगे !!

          || जय श्री कृष्ण...!!! ||

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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।। श्रीमद देवीभागवत प्रवचन ।।दुर्गा सप्तशती के अगियार में अध्याय के मंगला चरण में ही श्री भगवती भुवनेश्वरी का ध्यान इस प्रकार वर्णित है ।' में भुवनेश्वरी देविका ध्यान करता हु ।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीमद देवीभागवत प्रवचन ।।

दुर्गा सप्तशती के अगियार में अध्याय के मंगला चरण में ही श्री भगवती भुवनेश्वरी का ध्यान इस प्रकार वर्णित है ।

' में भुवनेश्वरी देविका ध्यान करता हु ।

उनके अंगों की शोभा प्रातःकालके सूर्यदेवके समान अरुणाभ है ।

उनके मस्तक पर चंद्रमा काम अकूत है ।

तीन नेत्रों से युक्त देवी के मुख पर मुस्कान की छटा छाई रहती है ।

उनके हाथों में पाश , अंकुश , वरद  एवं अभय मुंद्रा शोभा पाते है ।'

श्रीमद देवी भागवत में वर्णित मणिद्वीप की अधिष्ठात्री देवी हल्लेखा ( ह्रीं ) मंत्र की स्वरूप शक्ति और सृष्टिक्रम में महालक्ष्मी स्वरूपा----

आदिशक्ति भगवती भुवनेश्वरी भगवान शिवजी के समस्त लीला-विलास की सहचरी है ।

जगदम्बा भुवनेश्वरी का स्वरूप सौम्य और अंगकान्ति अरुण है ।

भक्तों का अभय और समस्त सिद्धियां प्रदान करना इनका स्वभाविक गुण है ।

दशमहाविद्याओं में ये पांचवे स्थान पर परिगणित है ।

श्रीश्रीमद देवीभागवत पुराण के अनुसार मूल प्रकृतिका दुशरा नाम ही श्री भुवनेश्वरी है ।

ईश्वररात्री में जब ईश्वर के झदुप व्यवहार का लोप हो जाता है , उस समय केवल ब्रह्म अपनी अव्यक्त प्रकृति के साथ शेष रहता है , तब ईश्वररात्री की अधिष्ठात्री देवी श्री भुवनेश्वरी कहलाती है ।

अंकुश और पांश इनके आयुध है ।

अंकुश नियंत्रण का प्रतीक है और पांश राग अथवा आशक्तिका प्रतीक है ।

इस प्रकार सर्वरूपा मूल प्रकृति ही श्री भुवनेश्वरी है , जो विश्वव को वमन करनेके वमा, शिवमयी होने से ज्येष्ठा तथा कर्म - नियंत्रण , फलदान और जीवोंको दण्डित करनेके कारण रौद्री कही जाती है ।

श्री भगवान शिवजी के वाम भाग ही श्री भुवनेश्वरी कहलाता है ।

श्री भुवनेश्वरी के संग से ही भुवनेश्वर सदा शिवजी को सर्वेश होने की योग्यता प्राप्त होती है ।

महानिर्वाणतंत्र के अनुसार सम्पूर्ण महाविधाए श्री भगवती भुवनेश्वरी की सेवामे सदा संलग्न रहती है । 

सात करोड़ महामंत्र इनकी सदा आराधना करते है ।
दशमहाविधाए ही दस सोपान है ।

काली तत्व से निर्गत होकर कमला तत्वतक्की दस स्थितियां है , जिनसे अव्यक्त श्री भुवनेश्वरी व्यक्त होकर ब्रह्माण्ड का रूप धारण कर शक्ति है , तथा प्रलय में कमलासे अर्थात व्यक्त जगत से क्रमशः लय होकर कालीरूप में मूल प्रकृति बन जाती है ।

इस लिए इन्हें कालकी जन्मदात्री भी कहा जाता है ।

इस प्रकार बृहन्नीलतन्त्र की यह धारण पुराणों के विवरणों में भी पुष्ट होती है कि प्रकारान्तरसे काली और भुवनेशी दोनों में अभेद है ।

अव्यक्त प्रकृति श्री भुवनेश्वरी ही रक्तवर्णा काली है ।
श्रीश्रीमददेवी भागवत के अनुसार दुर्गम नामक दैत्य के अत्याचार से सन्तप्त होकर देवताओं और ब्राह्मणों ने हिमालय पर सर्वकारणस्वरूपा श्री भुवनेश्वरी की ही आराधना की थी ।

उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवती श्री भुवनेश्वरी तत्काल प्रकट हो गयी ।

वे अपने हाथों में बाण , कमल -पुष्प तथा शाक - मूल लिए हुए थे ।

उन्हों ने अपने नेत्रों से अश्रुजलकी सहस्त्रो धराए प्रकट की ।

इस जल से भूमण्डल के सभी प्राणी तृप्त हो गए ।

समुन्द्र तथा सरिताओं में अगाध जल भर गया और समस्त औषधिया सींच गयी ।

अपने हाथों में लिए गए शांको और फूल-मूल से प्राणियों का पौषण करनेके कारण श्री भगवती भुवनेश्वरी ही ' शताक्षी ' तथा ' शाकम्भरी ' नाम से विख्यात हुई ।

इन्हों ने ही दुर्गमासुरो को युद्ध मे मारकर उसके द्वारा अपहृत वेदोंको देवताओं को पुनः सोपा था ।

उसके बाद भगवती भुवनेश्वरी का एक नाम दुर्गा प्रसिद्ध हुवा ।

श्री भगवती भुवनेश्वरी की उपासना पुत्र - प्राप्ति , घर मे सुख शांति , शत्रुओं के रक्षण हेतु विशेष फलप्रदा है ।

रुद्रयामल में इनका स्तोत्र, कवच, नीलसरस्वती तन्त्र में हृदय सहस्त्र पाठ तथा  महातन्त्रणार्णव में सहस्त्र नाम संकलित है ।

श्री भुवनेश्वरी शक्तिपीठ कांचीपुरम तमिलनाडु और गोंडल गुजरात मे स्थित है ।
🌹जय माँ अंबे 🌹
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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।। श्री हरसिध्दि माता कहानी ।।

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राजा विक्रमादित्य की कुल देवी हरसिद्धि माता की कथा


उज्जयिन्यां कूर्परं व मांगल्य कपिलाम्बरः।
भैरवः सिद्धिदः साक्षात् देवी मंगल चण्डिका।

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माता सती के पिता दक्षराज ने विराट यज्ञ का भव्य आयोजन किया था जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवता व गणमान्य लोगों को आमंत्रित किया । 

परन्तु उन्होंने माता सती व भगवान शिवजी को नहीं बुलाया । 







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फिर भी माता सती उस यज्ञ उत्सव में उपस्थित हुईं । 

वहां माता सती ने देखा कि दक्षराज उनके पति देवाधिदेव महादेव का अपमान कर रहे थे । 

यह देख वे क्रोधित हो अग्निकुंड में कूद पड़ीं । 

यह जानकर शिव शंभू अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने माता सती का शव लेकर सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण शुरू कर दिया । 

शिवजी की ऐसी दशा देखकर सम्पूर्ण विश्व में हाहाकार मच गया । 

देवी-देवता व्याकुल होकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे और संकट के निवारण हेतु प्रार्थना करने लगे । 

तब शिवजी का सती के शव से मोहभंग करने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाया था । 

चक्र से माँ सती के शव के कई टुकड़े हो गए । 

उनमें से १३वा टुकड़ा माँ सती की कोहनी के रूप में उज्जैन के इस स्थान पर गिरा । 

तब से माँ यहां हरसिद्धि मंदिर के रूप में स्थापित हुईं ।

इतिहास के पन्नों से यह ज्ञात होता है कि माँ हरसिद्धेश्वरी सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी थी जिन्हें प्राचीन काल में ‘मांगलचाण्डिकी’के नाम से जाना जाता था । 

राजा विक्रमादित्य इन्हीं देवी की आराधना करते थे एवं उन्होंने ग्यारह बार अपने शीश को काटकर माँ के चरणों में समर्पित कर दिया पर आश्चर्यवाहिनी माँ पुनः उन्हें जीवित व स्वस्थ कर देती थी । 

यही राजा विक्रमादित्य उज्जैन के सम्राट थे जो अपनी बुद्धि, पराक्रम और उदारता के लिए जाने जाते थे । 

इन्हीं राजा विक्रमादित्य के नाम से विक्रम संवत सन की शुरुआत हुई ।

उज्जैन में हरसिद्धि देवी की आराधना करने से शिव और शक्ति दोनों की पूजा हो जाती है। 

ऐसा इसलिए कि यह ऐसा स्थान है, जहां महाकाल और मां हरसिद्धि के दरबार हैं।

कहते हैं कि प्राचीन मंदिर रुद्र सरोवर के तट पर स्थित था तथा सरोवर सदैव कमलपुष्पों से परिपूर्ण रहता था। 

इसके पश्चिमी तट पर ‘देवी हरसिद्धि’ का तथा पूर्वी तट पर ‘महाकालेश्वर’ का मंदिर था। 

18वींशताब्दी में इन मंदिरों का पुनर्निर्माण हुआ। 

वर्तमान हरसिद्धि मंदिर चहार दीवारी से घिरा है।

ऐसा भी कहा जाता है कि सुबह के आरती हर्षद गुजरात में माता रानी करती है साम की आरती उज्जैन के मंदिर पर करती है साम के आरती समय माता रानी के मौजड़ी में बहुत धरती के रज धूल मिट्टी दिखाई देती है ।

देवी प्रतिमा 

मंदिर के मुख्य पीठ पर प्रतिमा के स्थान पर ‘श्रीयंत्र’ है। 

इस पर सिंदूर चढ़ाया जाता है, अन्य प्रतिमाओं पर नहीं और उसके पीछे भगवती अन्नपूर्णा की प्रतिमा है। 

गर्भगृह में हरसिद्धि देवी की प्रतिमा की पूजा होती है। 

मंदिर में महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती की प्रतिमाएँ हैं। 

मंदिर के पूर्वी द्वार पर बावड़ी है, जिसके बीच में एक स्तंभ है, जिस पर संवत 1447 अंकित है तथा पास ही में सप्तसागर सरोवर है।





मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते ही सामने मां हरसिद्धि के वाहन सिंह की विशाल प्रतिमा है। 

द्वार के दाईं ओर दो बड़े-बड़े नगाड़े रखे हैं, जो प्रातः सायं आरती के समय बजाए जाते हैं। 

मंदिर के सामने दो बड़े दीप स्तंभ हैं। 

इनमें से एक का नाम ‘शिव’ है, जिसमें 501 दीपमालाएँ हैं, दूसरे स्तंभ का नाम पार्वती है जिसमें 500 दीपमालाएँ हैं तथा दोनों दीप स्तंभों पर दीपकजलाए जाते हैं।

कुल मिलाकर इन 1001 दीपकों को जलाने में एक समय में लगभग 45 लीटर तेल लग जाता है ।

श्री हरसिद्धि मंदिर के गर्भगृह के सामने सभाग्रह में श्री यन्त्र निर्मित है । 

कहा जाता है कि यह सिद्ध श्री यन्त्र है और इस महान यन्त्र के दर्शन मात्र से ही पुण्य का लाभ होता है । 

शुभफल प्रदायिनी इस मंदिर के प्रांगण में शिवजी का कर्कोटकेश्वर महादेव मंदिर भी है जो कि चौरासी महादेव में से एक है जहां कालसर्प दोष का निवारण होता है ऐसा लोगों का विश्वास है ।

मंदिर प्रांगण के बीचोंबीच दो अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है जिनका दर्शन भक्तों के लिए शांतिदायक रहता है । 

प्रांगण के चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार है एवं मुख्य प्रवेश द्वार के भीतर हरसिद्धि सभाग्रह के सामने दो दीपमालाएँ बनी हुई है जिनके आकाश की और मुख किये हुए काले स्तम्भ प्रांगण के भीतर रहस्यमयी वैभव का वातावरण स्थापित करते हैं । 

यह दीपमालिकाएं मराठाकालीन हैं ।

ज्योतिषियों के अनुसार इसका शक्तिपीठ नामकरण किया गया है । 

ये नामकरण इस प्रकार है- स्थान का नाम 13 उज्जैन, शक्ति का नाम मांगलचाण्डिकी और भैरव का नाम कपिलाम्बर है ।

इस प्राचीन मंदिर के केंद्र में हल्दी और सिन्दूर कि परत चढ़ा हुआ पवित्र पत्थर है जो कि लोगों कि आस्था का केंद्र है ।
जय माताजी 



अनेक देवी-देवताओं की मान्यता क्यों ?

गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्ट, दिव्य स्वरूप और इच्छित फल देने की सामर्थ्य जिसके पास है, उसे देवता कहते हैं। 

कहा जाता है कि हिंदू धर्म में अनगिनत देवी-देवता हैं। 

बृहदारण्यक उपनिषद् के तीसरे अध्याय में याज्ञवल्क्य ने कहा है कि वास्तव में तो देव 33 ही हैं, जिनमें 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, 1 देवराज इंद्र और 1 प्रजापति सम्मिलित हैं। 

अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्यौ, चंद्रमा और नक्षत्र ये 8 वसु हैं, जिन पर सारी सृष्टि टिकी हुई है। 
पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेद्रियां और मन (आत्मा) ये 11 रुद्र हैं। संवत्सर के बारह माहों के सूर्यों को आदित्य कहा जाता है। 

मेघ, इंद्र है और प्रकृति रूप यज्ञमय सारा जीवन प्रजापति है।

वैसे अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य और द्यौ इन 6 देवों में ही सारा विश्व समा जाता है। 

किंतु आम लोगों में धारणा है कि 33 कोटि ( करोड़ ) देवता होते हैं। 

कोटि शब्द के दो अर्थ श्रेणी और करोड़ लगाए जाते हैं। इसी वजह से 33 करोड़ की धारणा बनी होगी ऋग्वेद में ऋषि कहते हैं।

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । 
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ -ऋग्वेद 1/164/46

अर्थात् एक सत्स्वरूप परमेश्वर को बुद्धिमान् ज्ञानी लोग अनेक प्रकारों से अनेक नामों से पुकारते हैं। 

उसी को वे अग्नि, यम, मातरिश्वा, इन्द्र, मित्र, वरुण, दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान इत्यादि नामों से याद करते हैं। 

सारा वैदिक वाङ्मय इसी प्रकार की घोषणाओं से भरा है, जिसमें एक ही तत्त्व को मूलतः स्वीकार करके उसी के अनेक रूपों में ईश्वर को मान्यता दी गई है।

समाज में ब्रह्मा, विष्णु, महेश प्रधान देवता माने जाते हैं और लक्ष्मी सरस्वती तथा दुर्गा प्रधान देवियां हैं। 

सब देवों में श्रेष्ठ कौन है, उसके संबंध में एक कथा है-

एक बार ऋषियों में विवाद होने लगा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों में कौन देवता सबसे बड़ा है? 

इस के लिए ब्रह्मा के पुत्र भृगुजी को नियुक्त किया गया। 

भृगु सबसे पहले ब्रह्माजी के पास ब्रह्मा के लोक में पहुंचे, तो वे पुत्र को देखकर प्रसन्न हुए, लेकिन उसके प्रणाम, स्तुति वंदना न करने से ब्रह्मा क्रोधित होकर बिना कुछ बोले चले गए। 

फिर भृगुजी कैलास पर्वत पहुंचे, तो शिवजी ने अपने भाई को बड़ी प्रसन्नता से गले लगाने का प्रयास किया, तो भृगुजी ने उद्दंडता से कहा-

'मैं आपसे नहीं मिलूंगा, क्योंकि आपने लोक एवं वेद मर्यादा का उल्लंघन किया है।' 

इस व्यवहार से शिव क्रोधित होकर त्रिशूल उठाकर उन्हें मारने दौड़े। 

फिर भृगुजी बैकुंठ लोक में पहुंचे। उस समय श्रीहरि विष्णु सोए हुए थे। 

भृगु बहुत देर तक खड़े रहे, किंतु जब विष्णु की निद्रा भंग न हुई तो क्रोधित होकर भृगु ने उनके वक्षस्थल पर लात मारी। 

विष्णु ने आंखें खोल दीं देखा तो सामने क्रोधित अवस्था में महर्षि भृगु खड़े थे। 

भगवान् ने भृगु के पांव पकड़े लिए और नम्र स्वर में बोले-

"हे ऋषिवर! मेरा वक्ष कठोर है और आपके पांव कोमल। 

कहीं आपके पांव में चोट तो नहीं आई ? 

भगवान् विष्णु के ऐसे प्रेममय व्यवहार को देखकर भृगु बहुत लज्जित हुए। 

भगवान् श्री हरि ने भृगु को ऊंचे आसन पर स्थान दिया और उनके पैर दबाए। 

इस व्यवहार से भृगुजी तृप्त हुए। उन्होंने ऋषियों के सम्मुख आकर कहा-

"भगवान् विष्णु ही सब देवों में श्रेष्ठ हैं।"
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जय हरसिध्दि माता

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