सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। चलो आज कीर्तन करने के लिये ।।
राधा कृष्ण प्रेम प्रसंग 🦚❤️
प्रसंग 1
राधा के बिना कृष्ण अधूरे
एक बार श्री कृष्ण से पूछा गया: "आपका नाम 'राधा - कृष्ण' क्यों है, 'कृष्ण - राधा' क्यों नहीं?"
प्रभु ने उत्तर दिया:
"क्योंकि राधा मेरी आत्मा है और मैं उसका शरीर।
बिना आत्मा के शरीर का कोई अस्तित्व नहीं होता, इस लिए नाम हमेशा 'राधा' से शुरू होता है।"
सीख:
> प्रेम में सम्मान और समर्पण सबसे ऊपर होता है।
बाल गोपाल की दी हुई जिंदगी।
नेह अपनत्व पूरित भई बन्दगी।।01।।
मैंनें कीड़े-मकोडों को जाना नहीं-
बाल गोपाल की हो गई बन्दगी।।02।।
बाल गोपाल की नित्य करुणा मिली-
सत्य में दूर मन की गई गंदगी।।03।।
बन गए श्याम जबसे हमारे सखा-
बाल गोपाल बस माँगती जिंदगी।।04।।
मेरा गोपाल मुझको दिखता है पथ-
फँस भँवर में अगर भटकती जिंदगी।।05।।
मित्रवर नंद के बाल गोपाल से-
स्नेह अविराम ही माँगती ज़िन्दगी।।06।।
अष्टपल सत्य में रात दिन बंधुवर-
बाल गोपाल प्रिय सोचती ज़िन्दगी।।07।।
बाल गोपाल से प्रीति जिनको नहीं-
उनकी काहे की कैसी रही ज़िन्दगी।।08।।
जबसे प्रभु में मन को रमाया 'राधिके'-
तबसे ही बन गयी कीर्तन मेरी ज़िन्दगी।।09।।
जय जय श्री कृष्ण
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|| मीरा चरित ||
क्रमशः से आगे ..................
राणा विक्रमादित्य ने मीरा को बाँस की छाब में दो काले भुजंग भिजवाये और कहलवाया कि शालिगराम जी और फूल है।
छाब का ढक्कन खोलते ही नाग निकले, लेकिन देखते ही देखते एक ने शालिगराम का स्वरूप ले लिया और एक ने रत्नों के हार का ।
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जब दासी कुमकुम को चेत आया तो वह मीरा के चरणों में सिर रखकर रो पड़ी -
" मैं कुछ नहीं जानती अन्नदाता !
मुझे तो महाराणा के सेवक ने यह छाब पकड़ाई और कहा कि शालिगराम जी और फूल है मैं आपके यहाँ पहुँचा दूँ।
यदि मैं इस साज़िश के बारे में जानती होऊँ तो भगवान इसी समय मेरे प्राण हर लें" फिर एकाएक चौंक कर बोली ," वे कहाँ गये दोनों कालींगढ़ ? "
" ये रहे। "
मीरा ने एक हाथ से शालिगराम जी को और दूसरे से गले में पड़े हार को छूते हुये बताया -
" तुम डरो मत !
मेरे साँवरे समर्थ है। "
श्यामकुँवर बहुत क्रोधित हुई यह सब देखकर और बोली ," अभी जाकर काकोसा से पूछती हूँ कि यह सब क्या है ?
अभी तक तो सुनते ही थे पर आज तो आँखों के समक्ष सब देख लिया। "
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पर मीरा ने बेटी को शांत कर समझाया ," कुछ नहीं पूछना है और हमारे पास प्रमाण भी कहाँ है कि उन्होंने साँप भेजे ।फिर साँप है कहाँ ?
ब्लकि गोमती , जा !जोशी जी को बुला ला ,बोलना शालिगराम प्रभु पधारे है।
प्राणप्रतिष्ठा करनी है।
और चम्पा !
प्रभु के आगमन पर उत्सव भोग की तैयारी करो , और सब महलों में प्रसाद भी बंटेगा। "
श्यामकुँवर तो यह सब देख सकते में आ गई - एक शरणागत का ,एक भक्त का किसी भी स्थिति को देखने का ,उस स्थिति को संभालने का ही नहीं ब्लकि उसे प्रभु की लीला मान उसे उत्सव का स्वरूप दे देना - कितना भावभीना दृष्टिकोण है !"
" और मेरे लिए क्या आज्ञा है हुकम ? "
कुमकुम रो पड़ी - " जो यह प्रसाद मेरे पल्ले में न बँधा होता तो वे नाग मुझे अवश्य डस गये होते।
अब वहाँ जाकर क्या अर्ज़ करूँ ?"
" केवल यही कहना कि छाब को मैं कुंवराणी के पास रख आई हूँ और अर्ज़ कर दिया है कि शालिगराम और फूलों के हार है।
इच्छा हो तो उत्सव के पश्चात आकर तुम प्रसाद ले जाना।
"मीरा ने कहा।"
+++ +++
" न जाने किस जन्म के पाप का उदय हुआ कि ऐसे कार्य में निमित्त बनी।
यदि आपको कुछ हो जाता अन्नदाता ! "
तो मुझे नरक में भी ठिकाना न मिलता।
हुज़ूर आप तो पीहर पधार रही है.......
मुझे भी कोई सेवा प्रदान कर देती !
" दासी ने आँसू पौंछते हुये कहा। "
" मेरी क्या सेवा ?
सेवा तो ठाकुर जी की है।
उनका जो नाम अच्छा लगे , उठते - बैठते काम करते हुये लेती रहो। "
जीभ को न तो खाली रहने दो और न फालतू बातों में उलझायो।
यह कोई कठिन काम नहीं है , पर आदत नहीं होने से प्रारम्भ में कठिन लगेगा ।
आदत बनने पर तो लोग घोड़े - ऊँट पर भी नींद ले लेते है।
बस इतना ध्यान रखना कि नियम छूटे नहीं।
"मीरा ने कहा।"
" मुझे ....... भी एक...... ठाकुर जी....... बख्शावें।
म्हूँ लायक तो कोय न , पण हुज़र री दया दृष्टि सूँ तर जाऊँली। "
कुमकुम ने संकोच से आँचल फैला कर कहा।
मीरा उसके भाव से प्रसन्न हो बोली ," बहुत भाग्यशाली हो जो ठाकुर जी की सेवा की इच्छा जगी।
प्रसाद लेने आवोगी तो जोशीजी भगवान और नाम दोनों दे देंगे।
इनके नाम में सारी मुसीबतों के फंद काटने की शक्ति है।
यदि तुम नाम भगवान को पकड़े रहोगी तो आगे - से - आगे राह स्वयं सूझती जायेगी और वह स्वयं भी आकर तुम्हारे ह्रदय में ,नयनों में बस जायेंगे। "
" आज तो मेरा भाग्य खुल गया।"
कहते हुये उसने अपने आँसुओं से मीरा के चरण पखार दिए ।
शालिगराम जी के पधारने का उत्सव हुआ।
जब जोशी जी ने शालिगराम भगवान का पंचामृत अभिषेक हुआ तो श्यामकुँवर और दासियों ने जयघोष कर मीरा का उत्साह वर्द्धन किया।
मीरा भगवान के स्वयं घर पधारने से प्रसन्न चित्त मुद्रा में पर अतिशय भावुक हो विनम्रता से शीश निवाया।
और ह्रदय के समस्त भावों से प्रियतम का स्वागत करने में तन्मय हो गईं.........!
🌿म्हाँरे घर आयो प्रियतम प्यारा ...........!
क्रमशः ..................
मीरा चरित...!
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संतोषं परमं सुखं :
एक गांव में एक गरीब आदमी रहता था।
वह बहुत मेहनत करता, किंतु फिर भी वह धन न कमा पाता।
इस प्रकार उसके दिन बड़ी मुश्किल से बीत रहे थे।
कई बार तो ऐसा हो जाता कि उसे कई कई दिनों तक सिर्फ एक वक्त का खाना खाकर ही गुजारा करना पड़ता।
इस मुसीबत से छुटकारा पाने का कोई उपाय उसे न सूझता।
एक दिन उसे एक महात्मा जी मिल गए।
उसने उन महात्मा जी की खूब सेवा की।
महात्मा जी उसकी सेवा से प्रसन्न हो गए।
और उसे भगवान की आराधना का एक मंत्र दिया।
मंत्र से कैसे प्रभु का स्मरण किया जाए, उसकी पूरी विधि भी महात्मा जी ने उसे बता दी।
वह व्यक्ति उस मंत्र से भगवान का स्मरण करने लगा।
कुछ दिन मंत्राराधना करने पर देवी उसके सामने प्रकट हुई।
देवी ने उससे कहा, ”मैं तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हूं।
बोलो क्या चाहेते हो?
निर्भय होकर मांगो।“
+++ +++
देवी को इस प्रकार सामने प्रकट हुआ देख वह व्यक्ति एकाएक घबरा गया।
क्या मांगा जाए, यह वह तुरंत तय ही न कर सका, इस लिए हड़बड़ाहट में बोला, ”देवी जी, इस समय तो नहीं, हां मैं कल आपसे मांग लूंगा।“
देवी जी कल प्रातः आने के लिए कहकर अंतर्धान हो गई।
घर जाकर वह व्यक्ति सोच में पड़ गया कि देवी से क्या मांगा जाए ?
उसके मन में आया कि रहने के लिए घर नहीं है, इस लिए वही मांगा जाए।
घर भी कैसा मांगा जाए, वह उस पर विचार करने लगा।
ये जमींदार लोग गांव के सब लोगों पर रोब गांठते हैं, इस लिए देवी से वर मांगकर मैं जमींदार हो जाऊं, तो अच्छा रहे।
यह विचार कर उसने जमींदारी मांगने का निर्णय कर लिया।
इस विचार के आने के बाद वह सोचने लगा कि जब लगान भरने का समय आता है, तब ये जमींदार भी तो तहसीलदार साहब की आरजू मिन्नतें करते हैं।
इस प्रकार इन जमींदारों से बड़ा तो तहसीलदार ही है, इस लिए जब बनना ही है तो बड़ा तहसीलदार क्यों न बन जाऊं?
+++ +++
इस प्रकार विचार कर वह तहसीलदार बनने की इच्छा करने लगा।
अब वह इस निर्णय से खुश था।
लेकिन, उसके मन में विचार समाप्त नहीं हुए और कुछ देर बाद उसे जिलाधीश का ध्यान हो आया।
वह जानता था कि जिलाधीश साहब के सामने तहसीलदार भी कुछ नहीं है।
तहसीलदार तो भीगी बिल्ली सा बना रहता है, जिलाधीश के सामने।
इस तरह उसे अब तहसीलदार का पद भी फीका लगने लगा था।
अतः इच्छाएं बढ़ती चली गईं।
वह सोचने विचारने में ही इतना फंस गया कि कुछ तय नहीं कर पाया कि क्या मांगा जाए।
इस तरह तो दिन बीता ही, रात भी बीत गई।
दूसरे दिन सवेरा हुआ।
वह अभी भी कुछ निर्णय नहीं कर पाया था।
ज्यों ही सूरज की पहली किरण पृथ्वी पर पड़ी त्यों ही देवी उसके सामने प्रकट हो गईं।
उन्होंने पूछा, ”बोलो, अब क्या चाहते हो?
अब तो तुमने सोच विचार कर निश्चय कर लिया होगा कि क्या मांगना है?“
उसने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, ”देवी, मुझे कुछ नहीं चाहिए।
मुझे तो सिर्फ भगवान की भक्ति और आत्म संतोष का गुण दीजिए।
यही मेरे लिए पर्याप्त है।“
देवी ने पूछा, ”क्यों भई, तुमने धन दौलत क्यों नहीं मांगी?“
वह विनम्रता से बोला, ”देवी, मेरे पास दौलत नहीं आई।
बस आने की आशा मात्र हुई तो मुझे उसकी चिंता से रात भर नींद नहीं आई।
यदि वास्तव में मुझे दौलत मिल जाएगी, तो फिर नींद तो एकदम विदा ही हो जाएगी।
इस लिए मैं जैसा हूं, वैसा ही रहना चाहता हूं।
आत्म संतोष का गुण ही सबसे बड़ी दौलत होती है।
आप मुझे यही दीजिए।
साथ ही यह संसार सागर पार करने के लिए भगवान नाम के स्मरण का गुण दीजिए।“
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देवी ने उसे आर्शीवाद दे दिया।
वह व्यक्ति पहले की तरह प्रसन्नता से अपना जीवन बिताने लगा।
जीवन में संतुष्टि से बड़ा कोई धन नहीं है और न ही इससे बड़ा कोई सुख है।
जय जय श्री राधे
!!!!! शुभमस्तु !!!
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85 Web: Sarswatijyotish.com
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
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