सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
*💐💐भगवान के दर्शन की बात... 💐💐*
*( श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज )*
एक बालक ने श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज से पूछा कि आपको भगवान के दर्शन हुए हैं क्या?
जवाब देते हुए तर्क की मुद्रा में श्रीस्वामीजी महाराज बोले कि तुम अपना खजाना बताते हो क्या?
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बालक समझ भी नहीं पाया और बोल भी नहीं पाया कि अब क्या कहना चाहिये।
फिर किसीने बालक को वहीं रोक दिया।
श्रीस्वामीजी महाराज का कहना है कि 'जब लोग अपने लौकिक धन को भी ( हरेक को ) बताना नहीं चाहते, बताने योग्य नहीं समझते, तो फिर अलौकिक धन, पारमार्थिक खजाना क्या बताने योग्य है! अर्थात् हरेक को बताने योग्य नहीं है।'
लोगों को अगर कह दिया जाय कि हाँ मेरे को भगवान के दर्शन हुए हैं तो लोगों के जँचेगी नहीं, उलटे तर्क पैदा होगा। दोषदृष्टि करेंगे।
( इससे उनका नुकसान होगा )।
( लोगों को बताने से विघ्न बाधाएँ भी आती है। )
सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दका ने कहा है कि भक्त प्रह्लाद की भक्ति में इतनी बाधाएँ इसलिये आयीं कि उन्होंने भक्ति को ( लोगों के सामने ) प्रकट कर दिया था।
( अगर प्रकट न करते तो इतनी बाधाएँ नहीं आती ं) ।
श्रीसेठजी ने भी गुप्त रीति से ही साधन किया है और सिद्धि पायी है।
चूरू की हवेली के ऊपर कमरे में उनको चतुर्भुज भगवान विष्णु के दर्शन हुए थे।
श्रीस्वामीजी महाराज ने वहाँ पधार कर वो जगह बताई थी कि यहाँ श्रीसेठजी को भगवान के दर्शन हुए थे।
श्रीसेठजी मुँह पर चद्दर ओढ़े सो रहे थे उस समय भगवान ने दर्शन दिये।
ऊपर चद्दर ओढ़ी होने पर भी भगवान दिखलायी कैसे पड़ रहे हैं?
उन्होंने चद्दर हटा कर देखा तो भगवान वैसे ही दिखाई दिये जैसे चद्दर के भीतर से ( साफ ) दीख रहे थे।
बीच में चद्दर की आड़ होने पर भी भगवान के दीखने में कोई फर्क नहीं पड़ा।
श्रीसेठजी कहते हैं कि ऐसे चाहे बीच में पहाड़ भी आ जाय तो भी भगवान के दीखने में कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
यह बात प्रसिद्ध है कि श्रीसेठजी ने कई लोगों की मौजूदगी में भाईजी श्रीहनुमान प्रसादजी पोद्दार को भगवान के दर्शन करवाये थे।
भाईजी से जब कहा गया कि भगवान के चरण पकड़ो।
तब उन्होंने चरण पकड़ने के लिये हाथ बढ़ाये तो वो हाथ श्रीसेठजी के चरणों में गये।
( कई लोगों के मन में जिज्ञासा रहती है कि ऐसे ही श्रीस्वामीजी महाराज को भी भगवान के दर्शन हुए थे क्या ? उनके लिये ये बातें काम की है। )
आज ही एक पुराने सत्संगी सज्जन बोले कि श्रीस्वामीजी महाराज ने मेरे सामने बताया है कि श्रीसेठजी ने स्वामीजी महाराज से कहा कि आप अपनी भगवत्प्राप्ति ( वाली सिद्धि ) लोगों में प्रकट न करें तो अच्छा रहेगा क्योंकि ( अयोग्य ) लोग पीछे पड़ जाते हैं कि मेरे को भी करवादो, हमारे को भी भगवान के दर्शन करवादो आदि आदि।
( मेरे को जो भगवान के दर्शन हुए थे उसको ) मैंने प्रकट कर दिया था जिसके कारण मेरे को भी मुश्किल का सामना करना पड़ा। अस्तु।
अपने को साधक मानने में हानि नहीं है, हानि तो सिद्ध मानने में है।
अपने को सिद्ध मानने में बहम भी हो सकता है पर साधक मानने में क्या बहम होगा।
जो अपने को साधक मानता है वह उन्नति करता ही चला जाता है ( सिद्ध मानकर रुकता नहीं कि अब मेरे को क्या करना है, जो करना था सो तो कर लिया )।
श्रीसेठजी ने कहा है ( इतने महान होकर भी ) स्वामीजी अपने को साधक ही मानते हैं।
( यह इनकी विशेषता है ) ।
इस प्रकार पारमार्थिक लाभ गोपनीय रखने में ही फायदा है।
ऐसे अधिकारी मिलने दुर्लभ हैं जिनको ऐसी रहस्य की बातें बतायीं जायँ।
अधिकारी को तो महापुरुष अत्यन्त गोपनीय रहस्य भी बता देते हैं।
जय श्री कृष्ण....
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|| श्री जानकी स्तुति हिन्दी अर्थ सहित ||
दरिद्रता का नाश तथा समस्त कामनाओं की प्राप्ति हेतु !
श्रीस्कन्दम हापुराण में सेतु माहात्म्य के अन्तर्गत् भगवती जानकी की स्तुति का प्रकरण प्राप्त होता है ।
इस स्तुति का पाठ करने से पापों का नाश, दरिद्रता का संहार तथा साधक को अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है ।
जानकि त्वां नमस्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम्
दारिद्र्यरणसंहर्त्रीं भक्तानाभिष्टदायिनीम् ।
विदेहराजतनयां राघवानन्दकारिणीम् ॥
भूमेर्दुहितरं विद्यां नमामि प्रकृतिं शिवाम् ।
पौलस्त्यैश्वर्यसंहर्त्रीं भक्ताभीष्टां सरस्वतीम् ॥
पतिव्रताधुरीणां त्वां नमामि जनकात्मजाम् ।
अनुग्रहपरामृद्धिमनघां हरिवल्लभाम् ।।
श्री हनुमान जी बोले - जनकनन्दिनी ! आपको नमस्कार करता हूँ ।
आप सब पापों का नाश तथा दारिद्र्य का संहार करने वाली हैं।
भक्तों को अभीष्ट वस्तु देने वाली भी आप ही हैं।
राघवेन्द्र श्रीराम को आनन्द प्रदान करने वाली विदेहराज जनक की लाड़ली श्रीकिशोरीजी को मैं प्रणाम करता हूँ।
आप पृथ्वी की कन्या और विद्या ( ज्ञान ) - स्वरूपा हैं, कल्याणमयी प्रकृति भी आप ही हैं।
रावण के ऐश्वर्य का संहार तथा भक्तों के अभीष्ट का दान करने वाली सरस्वती रूपा भगवती सीता को
मैं नमस्कार करता हूँ।
पतिव्रताओं में अग्रगण्य आप श्रीजनक दुलारी को मैं प्रणाम करता हूँ।
आप सब पर अनुग्रह करने वाली समृद्धि, पापरहित और विष्णुप्रिया लक्ष्मी हैं।
आत्मविद्यां त्रयीरूपामुमारूपां नमाम्यहम् ।
प्रसादाभिमुखीं लक्ष्मीं क्षीराब्धितनयां शुभाम् ॥
नमामि चन्द्रभगिनीं सीतां सर्वाङ्गसुन्दरीम् ।
नमामि धर्मनिलयां करुणां वेदमातरम् ॥
पद्मालयां पद्महस्तां विष्णुवक्षःस्थलालयाम् ।
नमामि चन्द्रनिलयां सीतां चन्द्रनिभाननाम् ॥
आह्लादरूपिणीं सिद्धिं शिवां शिवकरीं सतीम्
नमामि विश्वजननीं रामचन्द्रेष्टवल्लभाम् ।
सीतां सर्वानवद्याङ्गीं भजामि सततं हृदा ॥
आप ही आत्मविद्या, वेदत्रयी तथा पार्वतीस्वरूपा हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
आप ही क्षीरसागर की कन्या महालक्ष्मी हैं, जो भक्तों को कृपा - प्रसाद प्रदान करने के लिये सदा उत्सुक रहती हैं।
चन्द्रमा की भगिनी लक्ष्मी स्वरूपा सर्वांगसुन्दरी सीता को मैं प्रणाम करता हूँ।
धर्म की आश्रयभूता करुणामयी वेदमाता गायत्री स्वरूपिणी श्रीजानकी को मैं नमस्कार करता हूँ।
आपका कमल में निवास है, आप ही हाथ में कमल धारण करने वाली तथा भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में निवास करने वाली लक्ष्मी हैं, चन्द्रमण्डल में भी आपका निवास है, आप चन्द्रमुखी सीतादेवी को मैं नमस्कार करता हूँ।
आप श्रीरघुनन्दन की आह्लादमयी शक्ति हैं, कल्याणमयी सिद्धि हैं और भगवान् शिव की अर्द्धांगिनी कल्याणकारिणी सती हैं श्री रामचन्द्रजी की परम प्रियतमा जगदम्बा जानकी को मैं प्रणाम करता हूँ।
सर्वांग सुन्दरी सीताजी का मैं अपने हृदय में निरन्तर चिन्तन करता हूँ ।
इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराणान्तर्गत सेतु
माहात्म्य में श्री जानकी स्तुति सम्पूर्ण हुई ॥
हनुमानञ्जनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबल:
रामेष्ट: फाल्गुनसख: पिङ्गाक्षोऽमितविक्रम:।
उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशन:
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।।
एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मन:
स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च य: पठेत्।
तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्
राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन।।
हनुमान,अञ्जनीसूनु, वायुपुत्र,महाबल,रामेष्ट, फाल्गुन सख ( अर्जुनके मित्र ), पिङ्गाक्ष ( भूरे नेत्रवाले ), अमित विक्रम,उदधिक्रमण ( समुद्र को लांघ जाने वाले) , सीता।
शोक विनाशन, लक्ष्मण प्राणदाता औरदशग्रीवदर्पहा ( रावण के घमण्ड को दूर करने वाले ) , ये बारह नाम श्री हनुमानजी के हैं जो उनके गुणों के द्योतक हैं।
इन बारह नामों का जो रात्रि में सोने के समय या प्रातः काल उठने पर अथवा यात्रारम्भ के समय पाठ करता है, उस व्यक्ति के समस्त दुख दूर हो जाते हैं।
वह व्यक्ति युद्ध के मैदान में, राजदरबार में या भीषण संकट में जहां कहीं भी हो, उसे कोई भय नहीं होता।
|| बालाजी महाराज की जय हो ||
!!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏


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