।। जीवन की कड़वाश भरी सच्चाई ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। जीवन की कड़वाश भरी सच्चाई ।।


*✍️"परिवार"का हाथ पकड़ कर चलिये; लोगों के  "पैर" पकड़ने की नौबत नहीं आएगी!*

      *परिवार के प्रति जब तक मन में "खोट" और दिल में "पाप" है; तब तक सारे "मंत्र" और "जाप" बेकार है!!*





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       *जीवन एक यात्रा है; रोकर जीने से बहुत लम्बी लगेगी; और हंस कर जीने पर कब पूरी हो जाएगी; पता भी नहीं चलेगा!*


     

*"ईश्वर" से शिकायत क्यों है; ईश्वर ने पेट भरने की जिम्मेदारी ली है; पेटियां भरने की नहीं!!*

   *🙏सादर जय श्री कृष्ण 🙏*

🌱 जैसे विचार, वैसा निर्माण 🌱


कभी सोचा है —

सुबह से लेकर रात तक हम क्या करते हैं ?  

उठते हैं, काम करते हैं, खाते हैं, सोते हैं। 

हर दिन वैसा ही लगता है - बस तारीख़ बदल जाती है।

धीरे - धीरे दिन हफ़्तों में, हफ़्ते महीनों में और महीने सालों में बदल जाते हैं। 

और एक दिन अचानक आईने में देखते हैं और सोचते हैं —

“ज़िंदगी तो निकल गई…”

पर असली सवाल ये नहीं कि हमने कितना जिया, बल्कि ये है कि हमने कैसे जिया।

याद रखिए, हमारा जीवन हमारे विचारों से बनता है।

कुछ लोग दिनभर छोटी-छोटी बातों में उलझे रहते हैं —

“उसने मेरी गाड़ी के आगे गाड़ी क्यों लगाई ?”

“उसने मेरे घर के सामने कूड़ा क्यों फेंका ?”

“उसने मेरे बारे में वो क्यों कहा ?”

धीरे - धीरे ऐसे विचार हमारे अंदर घर बना लेते हैं, और हमारी सोच सीमित हो जाती है —

छोटी, negative, बदले और तुलना से भरी हुई।

वहीं कुछ लोग ऊँचा सोचते हैं —

“मुझे कुछ बड़ा करना है।”

"मुझे देश व समाज की सेवा करनी है"

“मुझे अपने माता-पिता का नाम रोशन करना है।”

“मुझे अपनी किताब लिखनी है, या लोगों की मदद करनी है।”

ऐसे लोग वही बनते हैं, जैसा वो सोचते हैं।

विचार -शब्द बनते हैं। 

शब्द -कर्म बनते हैं। 

कर्म -आदत बनते हैं आदत - जीवन बन जाता है।

यानी -“जैसा सोचोगे, वैसा बनोगे।”

रामायण में इसका सबसे सुंदर उदाहरण हैं - हनुमान जी।

जब लंका जाने की बारी आई, तो सब वानर डर गए-

“यह असंभव है, समुद्र कौन पार कर सकता है ?”

पर हनुमान जी ने भीतर से आवाज़ सुनी —

“अगर ये राम का कार्य है, तो मैं कर सकता हूँ।”

बस! यही विचार उनकी ऊर्जा बन गयी। 

उन्होंने छलांग लगाई और वे उड़ चले और सागर को पार कर दिखाया।

उनके पास पंख नहीं थे, उनके पास विचार था और उस विचार पर विश्वास था।

जरा सोचिए-लंका का कैदखाना…!

चारों ओर राक्षसिनियाँ, धमकियाँ, अपमान और अकेलापन।

ना कोई सखा, ना परिवार, ना कोई उम्मीद।

रावण रोज़ आता था —

सोने के वस्त्र, महल के सपने और मीठे शब्द लेकर।

कहता - “तुम जो चाहो, वो मिल जाएगा। बस राम को भूल जाओ।”

कोई और होता — तो शायद टूट जाता।

पर माता सीता ने कहा-

“मैं शरीर से यहाँ हूँ, पर मन से अयोध्या में हूँ, अपने राम में हूँ।”

यही विचार, यही विश्वास उनकी सबसे बड़ी शक्ति बन गया।

राक्षसों ने शरीर को बाँधा था, पर उनके विचारों को कोई बाँध नहीं पाया।

हमारा भी जीवन वैसा ही है। 

अगर रोज़ सुबह उठकर सोचेंगे —“ये काम मुझसे नहीं होगा।” 

तो वाकई कुछ नहीं होगा।

पर अगर सोचेंगे —

“मैं करूँगा और कर के दिखाऊँगा।”

तो पूरा ब्रह्मांड आपके लिए रास्ता बनाने में लग जाएगा।

ठीक वैसे ही जैसे समुद्र ने हनुमानजी के लिए रास्ता बनाया था।

आपका सोच ही आपका भाग्य बनाती है।

अगर सोच ऊँची है, तो आपका जीवन भी ऊँचा होगा।

अगर सोच सीमित होगी, तो आपका जीवन भी सीमित रह जाएगा।

इसलिए हर सुबह खुद से पूछिए—

“मैं आज क्या सोच रहा हूँ? डर या विश्वास? 

ईर्ष्या या प्रेरणा ? 

छोटे विचार या बड़े सपने ?”

सोचना ही है तो बड़ा सोचो। 

छोटा सोच कर क्यों अपने रचयिता की रचना को शर्मिंदा कर रहे हैं...!

जहां स्वार्थ होगा वहां दुख भी होगा......!

पुराने समय में एक व्यक्ति बहुत गरीब था। 

उसके पास कुछ भी नहीं था। 

दुखी रहता था। 

वह एक दिन गांव के विद्वान संत के पास गया और अपनी सारी परेशानियां बता दीं। 

संत को उस पर दया आ गई और उन्होंने गरीब को पारसमणी दे दी। 

संत ने कहा कि इससे तुम जितना चाहे उतना सोना बना लो। 

तुम्हारी गरीबी हमेशा के लिए दूर हो जाएगी।

पारस पत्थर से गरीब व्यक्ति ने बहुत सारा सोना बना लिया। 

अब वो धनवान हो गया। 

उसके पास सुख - सुविधा की हर चीज थी। 

अपार धन था। 

फिर भी वह दुखी रहने लगा। 

अब उसे अपने धन की चिंता लगी रहती थी। 

उसे चोरों का डर सताता, राजा का डर लगा रहता। 

इतना धन होने के बाद भी उसके जीवन में सुख - चैन नहीं था। 

एक दिन वह फिर से उसी संत के पहुंचा।

संत ने उससे कहा कि अब तो तुम्हारी गरीबी दूर हो गई है, तुम्हारे पास सब कुछ है। 

उस व्यक्ति ने कहा कि महाराज मेरे पास धन तो बहुत है, लेकिन मेरे जीवन में शांति नहीं है। 

आप कोई ऐसा उपाय बता दें, जिससे मेरा मन शांत हो जाए और मेरा सारा डर खत्म हो जाए। 

संत ने कहा कि ठीक है, वह मणी मुझे वापस दे दो। 

इसके लिए व्यक्ति ने मना कर दिया, उसने कहा कि महाराज मैं पारस पत्थर नहीं दे सकता, अब मैं फिर से गरीब नहीं बनना चाहता। 

आप मुझे कोई ऐसा सुख दीजिए जो अमीरी और गरीबी में बराबर मिलता रहे और मृत्यु के समय भी कम न हो।

संत ने कहा कि ऐसा सुख तो भगवान की निस्वार्थ भक्ति में ही मिल सकता है। 

जो लोग बिना किसी स्वार्थ के भक्ति करते हैं, वे अमीरी - गरीबी और मृत्यु के समय, हर हाल सुखी रहते हैं। 

जहां किसी भी तरह का स्वार्थ रहता है, वहां दुख हमेशा रहता है। 

दुखों से मुक्ति चाहते हैं तो भगवान का ध्यान करें, लेकिन बिना किसी स्वार्थ के।

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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।। श्री यजुर्वेद प्रवचन ।।औषधियों में विराजमान नवदुर्गा...।।

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